Thursday, August 16, 2012

INSPIRING PILLS


मूर्खस्य पंचचिन्हानि गर्वो दुर्वचनं तथा।
हठी चैन विषादी  च परोक्तं नैन मन्यते ।।
अर्थात मूर्ख के पाँच लक्षण हैं - प्रथम गर्व करना, दूसरा दुर्वचन बोलना, तीसरा हठ करना, चौथा कलह करना एवं पाँचवाँ कहे हुए वचनों का पालन न करना ।
महर्षि कणाद वेदों के प्रकांड विद्वान व परम तेजस्वी एवं निरासक्त ऋषि थे। एक बार राजा उदावर्त उनसे ब्रह्म विद्या का ज्ञान लेने पहुँचे और उनके समक्ष सहस्त्रों स्वर्ण मुद्राएँ रखकर उनसे ज्ञान देने का आग्रह करने लगे। महर्षि बोले - ‘‘राजन्! इन मुद्राओं का मूल्य मेरी निगाह में कूड़े के समान है। अध्यात्म का ज्ञान पाने के लिए धनबल की नहीं, तपबल की आवश्यकता होती है। आप संयम, शील व सदाचार के व्रत का पालन करें और उचित अवधि के बाद शिष्य  के रूप में यहां लौटें तो ज्ञान के अधिकारी बनेंगे।’’ यह सुनकर राजा को क्रोध आ गया व आक्रोश में कुछ बोलने ही वाले थे कि उनके मंत्रियों ने उन्हें समझाया- ‘‘ऋषि कणाद तपस्या, निरासक्ति व वैराग्य की साक्षात् प्रतिमा हैं। उनके प्रति दुर्भाव रखकर आप पाप के भागी बनेंगे।’’ बात उदावर्त की समझ में आ गई । उन्होंने लंबे समय तक पंच महाव्रतों का पालन किया और फिर श्रद्धा भाव से महर्षि कणाद के समक्ष प्रस्तुत किए। तब जाकर वे ब्रह्म विद्या के ज्ञान को पाने के लिए सुपात्र बन सके ।
संत ज्ञानेश्वर एक बाग के पास से गुजर रहे थे। माली को पौधों को पानी देते देखकर वे अपने शिष्यों  से बोले - ‘‘क्या तुम लोग इस पानी की विशेषता जानते हो?’’ शिष्यों  ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर करी। संत ज्ञानेश्वर बोले-’’ये पानी अपनी इच्छा के बगैर काम करता है। माली इसको जिस पौधे पर डाल देता है वहां जाता है। हमें अपना जीवन माली के पानी की तरह बना लेना चाहिए। अपनी सब कामनाओं, आकांक्षाओं व समस्याओं को माली रूपी भगवान के हाथों सौंप देने में अलग ही आनंद हैं।’’ शिष्यों को उनके कथन का गूढ़ मर्म समझ में आ गया।
एक बार मगध नरेश ने कौशल प्रदेश पर हमला कर दिया। युद्ध में कौशल नरेश की हार हुई । कौशल नरेश ने मगध के राजा के समक्ष प्रस्ताव रखा कि उनके साथ के 15-20 व्यक्तियों को वे जाने दें, शेष के साथ वे यथोचित व्यवहार करने को स्वतंत्र हैं। मगध नरेश ने इस प्रस्ताव के लिए हामी भर दी। कुछ समय पश्चात कौशल नरेश 20 व्यक्तियों को विदा कर सपरिवार युद्ध बंदी के रूप में मगध के राजा के सामने आकर खड़े हो गए। मगध के राजा ने सोचा था कि कौशल नरेश स्वयं भागेंगे, पर उन्हें सामने खड़ा पाकर वे बड़े आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने पूछा - ‘‘वे कौन थे, जिनके जीवन की सुरक्षा के लिए आपने स्वयं को बंदी बना लिया।’’ कौशल नरेश बोले - ‘‘राजन्! वे सभी हमारे राज्य के विद्वान व संत थे। राज्य की पहचान उस राज्य के आदर्शो, मूल्यों, सत्कार्यो व संस्कारों से होती है। मैं भले ही मारा जाऊँ, पर इन परंपराओं को जीवित रखने के लिए उनका जीवित रहना आवश्यक था।’’ मगध नरेश यह सुनकर हतप्रभ रह गए और बोले - ‘‘जिस राज्य में धर्म, दया व परोपकार का इतना ऊँचा स्थान है, उस पर आधिपत्य का दुस्साहस मैं कैसे कर सकता हूँ?’’ उन्होंने कौशल नरेश को ससम्मान मुक्त कर दिया।
बेटे ने कहा- ‘‘पिताजी हम भगवान का भजन नहीं करेंगे। भगवान पक्षपाती हैं, उन्होंने किसी को बहुत ध्न दिया, किसी को बहुत थोड़ा। ऐसे भेदभाव करने वाले की याद हम क्यों करें?’’ उस समय पिता ने कोर्इ उत्तर नहीं दिया। दूसरे दिन पिता ने कहा- ‘‘बेटे आज घर के सामने बाग लगाएँगे। पिता-पुत्रा दोनों उसमें जुट गए, पर बेटा असमंजस में था कि पिताजी ने उत्तर क्यों नहीं दिया? एक पेड़ नीम का लगाया गया दूसरा आम का। दो पफीट के पफासले पर दोनों पेड़ बढ़ने लगे। पेड़ बड़े हुए, कुछ दिन बाद पफल आए, एक का कड़वा दूसरे का मीठा। पिता ने कहा- ‘‘बेटे एक ही ध्रती के दो बेटों ने एक ही स्थान पर समान सुविधएँ पार्इ, पर यह विषमता कहाँ से आ गर्इ?’’ बेटे ने समझ लिया कि यह प्राकृतिक गुण है कि जो जैसा चाहता है, अपनी सृष्टि बना लेता है, परमात्मा उसके लिए दोषी नहीं।
एक धनी व्यक्ति के घर में आग लग गर्इ। सेठ जी अपने अनुचरों के साथ दौड़-दौड़कर घर का किमती सामान निकालने लगे। देर होने पर ज्ञात हुआ कि सामान तो सारा निकल आया, पर सेठ जी का पुत्र अंदर ही रह गया। सब जानकर चीख-पुकार शुरू हुर्इ, पर तब तक देर हो चुकी थी। वस्तुओं के आकर्षण में मनुष्य इतन अंधा हो जाता है कि वो भूल जाता है कि बहुमूल्य क्या है? उस धनी व्यक्ति की भाँति मनुष्य भी अपना जीवन निरर्थक  उद्देश्यों के पीछे भागने में लगा देता है और जब होश आता है तो पता चलता है कि हम अपना जीवन सँवारना ही भूल गए।
एक धनी राजकुमार भगवान बुद्ध के पास पहुँचा। उसने तथागत से प्रश्न किया-’’ हे प्रभु! ये बताएँ कि मनुष्य को साधनों का उपभोग कैसे करना चाहिए, जिससे उसमें संग्रह की प्रवृ​ित्त्ा भी न पनपे और आवश्यकताएँ भी पूर्ण होती रहे।’’
बुद्ध बोले-’’ पुत्र! मनुष्य को अल्प, सुलभ और निर्दौष, इन तीन व्रतों का पालन करते हुए भोग करना चाहिए। अल्प का अर्थ है कि जितने कम में हमारी आवश्यकताएँ पूर्ण हो जाएँ, उतना ही भोग किया जाए। दुसरा, उन वस्तुओं का उपभोग न करें, जो दुर्लभ या अत्याधिक मूल्यवान हों। तीसरा, इस बात का सदैव ध्यान रखें कि उपयोग में लार्इ जाने वाली वस्तु दोषों से रहित अर्थात र्इमानदारी से, परिश्रम से और सदाचार से प्राप्त की गर्इ हो। जो व्यक्ति इन व्रतों का पालन निष्ठापूर्वक करता है, वो कर्मों को करता हुआ भी उनमें लिप्त नहीं होता। ‘‘
एक धनी व्यक्ति मरणोपरांत स्वर्ग पहुँचा। उसे अपेक्षा थी कि उसके साथ वहाँ बहुत आदरपूर्ण व्यवहार किया जाएगा, पर जब उसने देखा कि उसके महल के पीछे रहने वाले निर्धन व्यक्ति को वहाँ सर्वोच्च सत्कार दिया जा रहा है तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसने चित्रगुप्त से प्रश्न किया- ‘‘ मैं इस व्यक्ति का अच्छे से जानता हूँ। ये जीवन भर फटेहाल रहा और इसे आप इतना सम्मान दे रहे है, जबकि मैंने जीवन भर दान-पुण्य किए और मुझे अन्य व्य​िक्यों की तरह ही समझा जा रहा है।’’ चित्रगुप्त बोले-’’ इस व्यक्ति ने हर रात सरसों के तेल का एक दीया जलाकर सड़क के किनारे रखा है। ‘‘ अब धनपति और कुपित हो उठा और बोला-’’ तब तो आपका व्यवहार और भी पक्षपातपूर्ण है। मैंने हर दिन अपने मंदिर में घी के हजारों दीये जलवाए हैं और सरसों के तेल के केवल एक दीये को नित्य जलाने पर इसका इतना मान क्यांें?’’ चित्रगुप्त गंभीर स्वर में बोले-’’ पुण्य धन से प्रदर्शन से नहीं, सार्थक कर्मों को करने से अर्जित होता है। इसके दीये ने उस अँधेरी गली में अनेकों को पथ दिखाया और तुम्हारे दीये केवल तुम्हारी समृद्धि और अहंकार के लिए जले। ‘‘ कर्मों की महत्त्ाा मूल्य के आधार पर नहीं, वरन कार्य की उपयोगिता के आधार होती है।
परिवर्तन मनुष्य की मन:स्थिति के अनुरूप परिस्थितियाँ तैयार करता है। भयभीत के लिए परिवर्तन हमेशा डरावना होता है और आशावादी के लिए सदा उत्साहवर्द्धक। आदमी केवल अपने मन की स्थिति के अनुसार परिस्थितियों से प्रसन्न या परेशान होता है।   - किंग व्हिटनी जूनियर
अखण्ड ज्योति नवंबर 2012
रूस में एक छोटे से कसबे में 1839 में एक बच्ची जन्मी। हेलेना नामक इस संवेदनशील बालिका को समाज में स्त्रियों की दुर्दशा देखकर रोना आ जाता था। उन्हें एक प्रौढ़ से जबरदस्ती विवाह के बंधनों में बाँध दिया गया, पर उस वातावरण से निकल कर वे विश्वयात्रा पर निकल पड़ीं। अपना नाम रखा मैडम ब्लावट्स्की। उन्होंने न केवल काफी भ्रमण किया, स्वाध्याय भी किया। नियति उन्हें भारत ले आर्इ। यहाँ के योगी-सिद्ध-संतों से वे मिलीं। अज्ञात की खोज को उन्होंने अपना प्रिय विषय बना लिया, ताकि सभी अपना आत्मविकास कर सकें इसके लिए उनने’ सीक्रेट डॉक्ट्रीन ‘ नामक ग्रंथ लिखां वे लोक से परे पारलौकिक शक्तियों का अस्तित्व मानती थी। बाद में जब वे 1873 में अमेरिका में बस गर्इ तो उनने अपने कार्य को विधिवत् संस्थागत रूप दिया। ‘‘ थियोसोफिकल सोसाइटी ‘‘ की उन्होंने स्थापना की। बाद में मद्रास में अडयार नदी के तट पर समुद्र किनारे उन्होंने इसके अंतर्राष्ट्रीय कार्यालय की स्थापना की। वे सच्चे अर्थों में विश्व नागरिक थीं, विश्वबंधुत्व की साकार प्रतिमा थी।
जिस प्रकार एक ही मक्खी दूध में पहुँचकर उसे अभक्ष्य बना देती है, उसी प्रकार एक ही दुर्गुण मनुष्य की अनेक विशेषताओं को नष्ट कर देता है।
-भतर्ृहरि
अगर आपको लगता है कि दर्द बड़ी खराब चीज है। हमें कभी दर्द न हो, ऐसी भगवान से पार्थना है तो जराइन सज्जन के बारे में जान लें -मेपलबुडमोण्टाना(अमेरिका) के हेनरी स्माइथ के 148 बड़े ऑपरेशन हो चुके है। 39 वर्ष की उम्र में 49 वर्ष की उम्र तक अनवरत उन ने दर्द सहा। 200 घंटे से ज्यादा वे ऑपरेशन टेबल पर रहे और मजे की बात कि हमेशा मुस्कराते रहे। वे एक सफल शेयर मार्केट के दलाल थे और बड़ी प्रसन्नता पूर्वक अपनी पत्नी के साथ जिए। वे बहुत तेज चलते और खूब घूमते थे। नृत्य करना एवं घोड़े की सवारी उनके प्रिय शौक थे। जब वे मरे तो दर्द से नहीं, सोते हुए धीरे से मौत आर्इ और उन्हें ले गर्इ!
दर्द से भी क्या डरना!
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 2011

गर्भ से ही दें बच्चों को अच्छे संस्कार


बहुत पहले अमेरिका में जन्मे एक बालक की बहुत चर्चा हुई इस बालक की आंखों में -’जे’ और ‘डी’ अक्षरों जैसी आकृतियॉं उभरी हुई थी । वैज्ञानिकों ने उसकी बहुत जांच की, पर कारण न जान पाए । आखिर इस गुत्थी को एक मनोवैज्ञानिक ने सुनझाया । बालक की माता ने उन्हें बताया - मैं अपने विद्याध्ययन काल से ही जीन डिक्सन की विद्वता से प्रभावित रही हूँ  । मेरी सदा से यह इच्छा रही है कि मेरी जो संतान हो, वह जीन डिक्सन की तरह की विद्वान हो । मैंने अपनी यह इच्छा कभी किसी को बताई तो नहीं, पर जब भी इस बात की याद आती तो मैं दीवार या कॉपी पर जे.डी. अक्षर लिखकर अपनी स्मृति को गहरा किया करती थी ।’’ इसके साथ उन्होंने अपने अध्ययन काल की कई कॉपियॉं और पुस्तकें भी दिखाई , जिनमें जे.डी. लिखा मिला ।
हमारे पूर्वज इन सब बातों से भली भॉंति परिचित थे इसलिए उन्होंने गर्भाधान संस्कार को हमारी भारतीय संस्कृति में कराए जाने वाले षोडश संस्कारों में से एक संस्कार माना था और उसे पूर्ण पवित्रता के साथ संपन्न करने की प्रथा और उसे पूर्ण पवित्रता के साथ संपन्न करने की प्रथा प्रचलित की थी । उस समय बालक का निर्माण माता-पिता भावभरे वातावरण में किया करते थे और जैसी आवश्यकता होती थी, उस तरह की संतान समाज को दिया करते थे ।
जीवात्मा के अवतरण और उसकी विकास यात्रा में योदान देना माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है । पिता गर्भधारण में केवल सहयोग प्रदान करता है, किंतु बाद में उस गर्भ को पकाने का कार्य माता के माध्यम से ही संपन्न होता हैं इसलिए पिता की अपेक्षा माता का उत्तरदायित्व अधिक है । बिना उचित ज्ञान एवं स्थिति की जानकारी लिए माता इस कर्तव्य का भली भॉति पालन कर सकेगी, यह असंभव जैसा है । अतएव महिलाओं को यह जानकारी होना आवश्यक है कि संतान केवल काम-वासना का परिणाम नहीं है, अपितु परिवार व समाज के प्रति एक महती उत्तरदायित्व भी है ।
वर्तमान समय में सबसे ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता बच्चों पर ही है । बच्चे हीसमाज एवं राष्ट्र का भविष्य हैं । बच्चे ही इस देश की प्राण-ऊर्जा हैं । यदि इन्हें सॅंवारा जा सकें, इन पर विशेष रूप से ध्यान दिया जा सके तो निश्चित रूप से क्रमश: परिवार, समाज, राष्ट्र एवं विश्व का कल्याण हो सकता है । आज पैदा होने वाले बच्चे कल भविष्य में युवा बनकर देश की बागडोर एवं अन्य जिज्मेदारियॉं सॅंभालते हैं । यदि उन्हें ठीक प्रकार से गढ़ा नहीं गया, उनमें सही समझ पैदा नहीं हुई , तो उनका जीवन कुंठित एवं रूग्ण हो जाएगा और फिर उनका जीवन इस देश पर एक भार होगा । एक सुसंस्कारित बच्चा ही अपने माता-पिता के नाम को उज्जवल एवं प्रकाशित कर सकता है और अगर हर घर में सुसंस्कारित बच्चे पैदा होने लेगं, तो निश्चित रूप से धरती के हर घर-परिवार में स्वर्गीय वातावरण हो जाएगा ।
अपने बच्चे को संस्कारवान बनाने के लिए एक महिला ने संत ईसा से एक बार प्रश्न किया - ‘‘आप हमें बताइए कि बच्चे की शिक्षा-दिक्षा कब से प्रारंभ की जानी चाहिए ।’’ ईसा  मसीह ने उत्तर दिया - ‘‘गर्भ में आने के 100 वर्ष पहले से ।’’ यह उत्तर सुनकार स्त्री को बहुत आश्चर्य हुआ । तब ईसा मसीह ने इस बात को समझाया कि यद्यपि सौ वर्ष पूर्व बच्चे का अस्तित्व नहीं होता, लेकिन उसकी जड़ उसके बाबा या परबाबा के रूप में सुनिश्चित होती है । उसकी मन:स्थिति, उसके आचार, उसके संस्कार पिता के माध्यम से बच्चे के अंदर आते हैं, इसी तरह माता-पिता के विचार, उनके रहन-सहन, आहार-विहार से भी बच्चे का निर्माण होता है । संत ईसा मसीह का यह कथन पूर्णतया सत्य है । इसके कई उदाहरण हैं- भगवान राम जैसे महापुरूष का जन्म रघु, अज और दिलीप आदि पितामहों के तप की परिणति थी एवं योगेश्वर कृष्ण का जन्म देवकी और वसुदेव के कई जन्मों की तपश्चर्या का पुण्यफल था । ठीक इसी तरह अठारह पुराणों के रचयिता भगवान व्यास का जन्म भी तभी हुआ, जब उनकी पांच पितामह पीढ़ियों ने घोर तप किया था । मनुष्य द्वारा की गई भक्ति एवं तप ही उसे इस योग्य बनाते हैं। जो अपने चित्त के कुसंस्कारों का शमन हेतु कोई तप नहीं करता एवं साधारण जीवन व्यतीत करते हुए परिवार की वृद्धि करता है, तो उसकी संतानों में भी कई कुसंस्कारों का आगमन हो जाता है, जो उसके भावी जीवन के लिए बहुत घातक सिद्ध होते हैं ।
हर माता-पिता अपने बच्चे के उज्जवल भविष्य के लिए धन-संपदा को एकत्रित करते हैं, उसके विकास के लिए बहुत चिंता करते हैं । लेकिन यदि माता-पिता अपने बच्चे को विरासत में अच्छे संस्कार दे सकें, तो फिर उन्हें कुछ और खास चीज देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि ऐसी संताने न केवल अपना भविष्य सुधार लेंगी, बल्कि औरों के लिए भी साधन-सुविधांए जुटा लेंगी।
संतान उत्पति के संदर्भ में स्वामी विवेकानंद का कथन है कि यदि माता-पिता बिना प्रार्थना किए संतानोत्पति करते हैं तो ऐसे संतान ‘अनार्य’ है और समाज पर भारस्वरूप है । ‘आर्य’ संतानें वे ही हैं, जो माता-पिता द्वारा भगवान से की गई निर्मल प्रार्थना के फलस्वरूप उत्पन्न होती हैं। वे ही परिवार, समाज का हितसाधन कर सकती है।
बच्चों का सुसंस्कारित बनाने का सबसे उपयुक्त समय उसका गर्भकाल है। गर्भधारण काल में माता का चिंतन, चरित्र और व्यवहार तीनों ही उसके उदर में पह रहे बच्चे को प्रभावित करते हैं। इस अवस्था में वह जिस तरह के बच्चे की कल्पना करती है, जिस तरह का भोजन करती है जिस तरह का वातावरण उसे मिलता है, वह सब बच्चे के अंदर सूक्ष्म रूप से समाहित होता जाता है। माता की आदतें, इच्छाएं आदि भी संस्कार के रूप में उसकी संतान के अंदर प्रवेश कर जाते हैं, जो समयानुसार परिलक्षित होते हैं। इस अवस्था में माता का शारिरिक, मानसिक व भावनात्मक स्वास्थ्य बच्चे के स्वास्थ्य को विनिर्मित करता है। यदि माता-पिता अपने बच्चे के लिए किसी क्षेत्र में विशेष योग्यता की चाहत रखते हैं तो उन्हें बच्चे के गर्भकाल में ही प्रशिक्षण देने का प्रयास करना चाहिए और प्रशिक्षण माता को देना चाहिए, क्योंकि गर्भावस्था काल में बच्चे की संवेदनशीलता अत्यंत विकसित होती हैं। इस अवस्था में माता जो भी देखती है, सीखती हे, महसूस करती हे, इच्छा करती है, कल्पना करती है, उसके अनुरूप ही उसके बच्चे के व्यक्तित्व का निर्माण बीज रूप में हो जाता है, जो समयानुसार विकसित होता है।
शोध अध्ययनों में ऐसा देखा गया हैं कि गर्भकाल के दौरान जिन माताओं ने संगीत का प्रशिक्षण लिया, उनके बच्चे सुरीले, मधुर कंठ वाले पैदा हुए। जिन माताओं ने अपनी रूचि के अनुसार चित्रकारी, लेखन, अच्छी पुस्तकों का अध्ययन आदि किया, उनके बच्चे आगे चलकर उसी तरह की योग्यता में प्रवीण हुए। इससे यह स्पष्ट होता है कि गर्भकालीन माता को दिया गया प्रशिक्षण उसके बच्चे में वही गुण विकसित करने का सबसे अच्छा माध्यम है।
इस संदर्भ में महाभारत की सुविख्यात घटना है कि महाभारत युद्ध के समय तक दिन द्रोणाचार्य ने पांडवों का वध करने के लिए चक्रव्यूह की रचना की। उस दिन चक्रव्यूह का रहस्य जानने वाले एकमात्र अर्जुन को कौरव बहुत दूर तक भटका ले गए और इधर पांडवों के पास चक्रव्यूह भेदन का आमंत्रण भेज दिया। यह जानकर सब सारी सभा सन्नाटे में थी, तब 23 वर्षीय राजकुमार अभिमन्यु खड़े हुए और बोले - ‘‘मैं चक्रव्यूह भेदन करना जानता हूं।’’ युधिष्ठिर ने साश्चर्य प्रश्न किया - ‘‘पुत्र! मैंने तो तुम्हें कभी भी चक्रव्यूह भेदन सीखते न देखा और न ही सुना।’’ तब अभिमन्यु ने कहा - ‘‘तात् जब मैं अपनी मां सुभद्रा के पेट में था और मां को प्रसव पीडा प्रारंभ हो गई थी, तब मेरे पिता अर्जुन पास ही थे। मां का ध्यान दरद की ओर से बंटाने के लिए उन्होंने चक्रव्यूह भेदन की क्रिया बतानी प्रारंभ की। छह द्वारों के भेदन की क्रिया बताने तक मेरी मां ध्यान से सुनती रहीं और गर्भ में बैठा हुआ मैं उसे सीखता चला गया, पर सातवें और अंतिम द्वार भेदन को सुनाने से पूर्व ही मां को निद्रा आ गर्इ एवं उन्हीं के साथ मैं भी विस्मृति में चला गया। उसके बाद मेरा जन्म हो गया। छह द्वार तो मैं आसानी से तोड़ लूंगा। सातवें में सहायतार्थ आप सब पहुंच जाएंगे तो उसे भी तोड़ लूंगा।’’