Friday, September 14, 2012

आखिर यह भी तो नहीं रहेगो।


एक फकिर यात्रा करने गया। रास्ते में किसी गाँव में रात पड़ी तो लोगों से बोला : रात पड़ी है मुझे कहाँ ठहरना चाहिए? है कोई यहाँ धर्मात्मा आदमी? बोले :’’धर्र्मात्मा तो बहुत है, धनी भी बहुत है लेकिन एक शुक्रगुजार व्यक्ति है, उसको लोग शाकिरबोलते है। तुम उसके यहाँ चले जाओ। शाकिर के पास पहुँचा वह फकिर। शाकिर ने बड़ी आवभगत की और अहोभाव से जितनी भी सेवा हो सकती है, दो दिन तक की। फकीर जब यात्रा को आगे निकाला तो शाकिर ने रास्ते में खाने के काम आये ऐसी कुछ सूखी सब्जी, कुछ मीठी रोटियाँ तो कुछ चरपरी रोटीयाँ, कुछ आचार खजुर आदि-आदि बड़े प्रेम से उनको देकर विदाई  दी। फकीर ने कहा :’’ शाकिर जितने तुम धनी हो उतने नम्र भी हो और जितना नम्रता का सदगुण है उतना ही साधुसेवा का भी तुम्हारें पास भण्डार है अल्लाह करे तुम और भी बढो। शाकिर हँसा :’’ यह भी तो कब तक? नहीं रहेगा  फकीर को थोड़ा सा सोचने को विवश होना पड़ा लेकिन फिर याद आया, गुरूदेव ने कहा था किकोई  कुछ गहरी बात कहे तो वाद-विवाद में नहीं पड़ना, देखते रहना। फकीर आगे चला। वह फकीर हज करने गया। जब दो साल के बाद लौटा तो देखा शाकिर का महल, इमारतें, उसकी लम्बी-चौड़ी दुकाने व बाजार सब गायब। उसने किसी से पूछा:’’ यह कैसे हुआ? बोले : बाढ़ आई  थी, उसमें सब बह गया। अब वह शाकिर हमदाद नाम के मुसलमान जमींदार के यहाँ काम करता है भैसें दुहता है, चारा कटता है, ठंडी-ठंडी रात में खेत में पानी पिलाता है। पहले तो शाकिर बड़ा धनी था, अब इस कंगले की बच्चियों की शादी की भी कहीं जमावट नहीं होती। फकिर ने सोचा जिसके घर मैंने आदर सत्कार पाया, वह गरीब हो गया तो क्या है, मुझे जाना चाहिए। हमदाद के नौकर शाकिर ने झोंपड़ी में उस फकीर के लिए चटाई , फटा टाट बिछा दिया, रूखी-सुखी रोटी दी। सुबह को वह साधु जाने को था, उसकी आँखों में आँसू थे। वह बोला :’’ शाकिर अल्लाह ने क्या कर दिया। शाकिर हँसा और बोला:’’ आपने सत्संग में सुना होगा की कोई भी अवस्था सदा नहीं रहती। अमीरी थी उसको याद करके दु:खी क्यों होना और गरीबी है उसको सच्चा मानकर परेशान क्यों होना? यह भी तो चला जाएगा। शाकिर की आँखों में संतुष्टि थी, वाणी में मधुरता थी और हृदय में संतो कें संग का प्रभाव था। फकीर सोचता है मैं तो बाहर से फकीर हुँ लेकिन यह गृस्हथ शाकिर सचमुच मुझे सत्संग के प्रभाव से, गुरूदीक्षा के प्रभाव से भीतर का फकीर है, भीतर का साधु है। मैं चाहता हुँ अब से तुम भी भीतर के साधु हो जाओ। तुम इरादा करो। डेढ-दो साल के बाद फिर अपना रूख यात्रा का बनाया। देखता क्या है वह जमींदार शाकिर जो हमदाद के यहाँ तुच्छ मजदूरी करता था, जिसे रूखी रोटियाँ खानी पड़ती थी, रात भी जागता और दिन में भी मजदूरी करता, वह अब जमींदारों को भी मात कर दें, ऐसा अमीर बन गया है। वार्तालाप से पता चला कि हमदाद को कोई संतान नहीं थी। उसकी जो लम्बी-चौड़ी जमींदारी थी वह शाकिर को दे गया और सोने का देग(पात्र), हीरे-जवाहरात से भरा हुआ चरू जहाँ गढ़ा था वह जगह भी बता दी। पहले की सम्पदा से अभी कई गुना ज्यादा सम्पदा हो गयी। फकीर बोला की हद हो गई शाकिर। तुमने कहा था यह भी गुजर जाएगा। अच्छा है गरीबी गुजर गई डाकिनी। अल्लाह करे तुम ऐसे ही बने रहो। शाकिर हँसा:’’ फकीर बड़े-बड़े अमीरों को, बादशाहों को जो कुछ मिला वह बीत गया मेरा कब तक रहता? क्या यह भी चला जाएगा? या तो यह चला जाएगा अथवा इसको मेरा मानने वाला चला जाएगा। कौन रहता है जहाँ संयोग है वहाँ वियोग है तुमने सत्संग तो सुना होगा न। मैंने संतो के वचन आत्मसात् किये है। हिन्दू धर्म की वेदांती संतों की ज्ञान धारा का हिस्सा ( सत्संग, साहित्य ) लेकर सुफीवाद बना है। तो सुफी संत वेदांती संत की ही बात कहते है सब गुजरता है, उसको जाननेवाला अंतरात्मा शाश्वत है। वही अल्लाह है, वही भगवान है, वही राम है, वही रहमान है। फकीर आगे बढ़ा। यात्रा करके जब लौटा डेढ़-दो साल के बाद तो क्या देखता है, शाकिर का महल तो है लेकिन उसमें कबूतर गुटर-गूँ, गुटर-गूँ कर रहे है।
कह रहा है आसमाँ यह समाँ कुछ भी नहीं।
रोती है शबनम कि नैरंगे जहाँ कुछ भी नहीं।।
जिनके महलों में हजारों रंग के जलते थे फानूस।
झाड़ उनकी कब्र पर है और निशाँ कुछ भी नहीं।।
शाकिर कब्रिस्तान में सोया है। महल खाली बेटियों की शादी हो गयी, बूढ़ी पत्नी कोने में पड़ी है। फकीर सोचता है अरे मनुष्य। तु गर्व किसी बात का करता है?
मत कर भाया गरव गुमा, गुलाबी रंग उड़ी जावेलो।
मत कर भाया गरव गुमान, जवानीरो रंग उड़ी जावेलो।।
उड़ी जावेलो फीको पड़ी जावेलो, रे काला मर जावेलो,
पाछे नहीं आवेलो, मत कर भाया गरव गुमान
धन रे दौलत थारा माल खजाना रे
छोड़ी जावलो रे पलमां उड़ी जावेलो।।
पाछो नहीं आवेलो, मत कर भाया गरव गुमान
क्यों इतराता है और क्यों परेशान होता है। जिसके पास ज्यादा है वह भी नहीं टिकेगा। मेरे पाय मुसीबत है वह भी नहीं टिकेगी। यह मुसीबत में है और मैं मौज में हुँ, लेकिन न मौज रहगी और न मुसीबत रहेगी, उसको जानने वाला दिलबर दाता ही तो रहता है इसको पक्का करले मौज हो जायेगी मौज।
पूरे हैं वे मर्द जो हर हाल में खुश हैं।
मिला अगर माल तो उस माल में खुश हैं।
हो गये बेहाल तो उसी हाल में खुश हैं।
शाकिर तुमने जिंदगी का रहस्य जाना। धन्य है शाकिर तुम्हारा सत्संग। धन्य है तुम्हारे सत्संगकर्ता सदगुरू।। शाकिर। मैं तो फकीर बना लेकिन असली फकीरी तो तेरी जिदंगानी है। तेरी जिंदगानी में असली फकीरी झलकती है। अब मैं तेरी क्रब देखना चहाता हुँ शाकिर। वहाँ पर जाऊँगा, दुआ माँगुगा, फूल चढ़ाऊँगा। गृहस्थ शाकिर, फकीरी को भी फकीरी का संदेश दे, ऐसे फकीर शाकिर की कब्र पर जाऊँगा। वह फकीर शाकिर की कब्र पर गया। क्या देखता है कि कब्र पर लिखा है, आखिर यह भी नहीं रहेगा। फकीर ने सिर पीटा की, हद हो गयी, अमीरी नहीं रहेगी चलो मान लिया। गरीबी नहीं रहेगी चलो मान लिया, बीमारी नहीं रहेगी चलो मान लिया। तंदरूस्ती नहीं रहेगी चलो मान लिया। यह सब बदलता है लेकिन कब्र कहाँ चली जायेगी? कब्र के पत्थर पर लिखवा दिया था, आखिर यह भी नहीं रहेगा। फकीर फिर आगे बढ़ा यात्रा को। जब लौटने लगा तो सोचा, जाते-जाते शाकिर की कब्र पर जरा सिजदा करता हुआ जाता हुँ। देखा तो कब्रिस्तान ही नहीं है। उसने लोगों से पूछा:’’ क्या हुआ, कब्र को कैसे पर (पंख) लग गये? बोले:’’ जलजला (भूकम्प) आया था, पूरा कब्रिस्तान गायब हो गया। अब उसी कब्रिस्तान पर बड़ी-बड़ी इमारते खड़ी है। हे संसार! तू एक पल भी बदले बिना नहीं रहता और हे नासमझ मनुष्य! तू उसको स्थिर रखने में अपनी कई जिंदगीयाँ कर चुका है। मेरी जवानी बनी रहे, मेरा यश बना रहे, मेरी पदोन्नती बनी रहे, मेरा पद बना रहे श्वास-श्वास में तू बिगड़ता जा रहा है, फिर तेरा क्या बना रहेगा भाई !
ऐ गाफिल ! न समझा था, मिला था तन रतन तुझको।
मिलाया खाक में तूने, ऐ सजन ! क्या कहूँ तुझको?
अपनी वजूदी हस्ती में तू इतना भूल मस्ताना।
करना था किया वो न, लगी उलटी लगन तुझको।
अपने आत्मा-परमात्मा को पाना था, वह नहीं किया। जिसको छोड़ जाना है उसी के पीछे लगा रहा। उसी की परीक्षा पास की। उसी के पीछे सर-सर करके सर-खोपड़ी एक कर दी। और जिनको सर-सर कहता है, उनका न सिर रहा। कौन सी निशा में तू सो रहा है? संत तुलसी दास ने ऐसे लोगों को झकझोरा है:
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा।
देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।
(श्री रामचरित मानस)
मैं विद्यार्थी  हुँ। वह दिन आयेगा मैं स्नातक हो जाऊँगा। वह दिन आयेगा जब बड़ी नौकरी पाऊँगा, आईएएस बनूँगा। मकान होगा, शादी होगी, गाड़ी होगी, सुखद दिन होगें। अरे! जब ये दिन आएगें तो जाएगें भी। अभी नहीं है तो बाद में भी नहीं रहेगें। विश्वनियंता परमात्मा सत्स्वरूप, आनंदस्वरूप, शुद्ध-बुद्ध ब्रह्म तुम्हारा होकर बैठा है और तुम बीते हुए का शोक करके परेशान हो रहे हो, भविष्य का भय करके भयभीत हो रहे हो और वर्तमान मेंयह चला ना जायऐसा सोच के भयभीत होकर उसके पिट्ठू बन रहे हो। अरे! जो अवस्था आयेगी वह तो जायेगी। डरने की क्या जरूरत है? फिर नया आयेगा। यह शरीर जायेगा तो फिर नया मिलेगा, नहीं मिला तो मुक्ति हो जायेगी। ये बातें तुम नहीं जानते हो इसलिए खामखाह परेशान, खामखाह भयभीत, खामखाह शोकातुर, चिंतित और खामखाह बीमार हो रहे हो। बन जाओ तुम भी शाकिर।
तेरा भाणा मीठा लागे। इतना ही तो समझना है।
अपमान हुआ, वाह-वाह! मान हुआ, वाह-वाह!
जो कुछ आया, वाह-वाह! बीत रहा है, बह रहा हैवाह-वाह!
ऐसा हुआ, ऐसा होना चाहिए, तू फिकर न कर, फरियाद न कर वाह-वाह! कर बस।
क्योंकि देने वाल तू ही है। माँ के गर्भ में दूध की व्यवस्था तूने की थी। माँ की जेर के साथ हमारी नाभि जोड़ना तेरी कला-कुशलता है वाह! वह!! मेरे रब ! मेरे प्रभु ! मेरे प्यारे ! बस यह सीख जाओ, मौज हो जायेगी।
वर्तमान समय हुआ तो आपका भूतकाल रसमय और भविष्य भी आयेगा तो वर्तमान के रस में रसीला हो के आयेगा। बहुत मौज हो जायेगी।

नाड़ी तंत्र एवं सात चक्र

सूर्य व चद्र नाड़ी- 
इच्छाओं की पूर्ति के लिए कोई  क्षमता अवश्य होनी चाहिए। इच्छा तृप्ति के लिए यह शक्ति शरीर के दायीं ओर पिंगला नाड़ी पर कार्यवृति धारण करती है। यह कार्य स्रोत शारीरिक तथा बौद्धिक गतिविधियों का स्रोत है। अपनी गतिविधि के उप-फल के रूप में यह मस्तिष्क के दायीं ओर अंह को विकसित करता है। बायें और दायें दोनों सूक्ष्म-मार्ग स्थूल रूप से मेरूरज्जू के बाहर नाड़ी-प्रणाली को व्यक्त करते है।
सूर्य स्रोत में पुरूषत्व गुण जैसे विश्लेषण, स्पार्धा, सहनशीलता आदि निहित है। चन्द्र स्रोत में सोम्यता, प्रतिसम्वेदना, सहयोग तथा अतर्बोध आदि मादा गुण सम्मिलित है। मस्तिष्क के दो गोलार्ध विरोधी परन्तु सम्पूरक कार्य करते है। शरीर के दायें भाग पर नजर रखने वाले बायें गोलर्ध की विशेषता विचार करना, योजना बनाना तथा विश्लेषण करने जैसे रैखिक प्रक्रम है। शरीर के बायें भाग का ध्यान रखने वाला दायां गोलार्ध भावना, स्मृति और इच्छाऔं आदि में कार्यरत है।
सात चक्र
1- मूलाधार चक्र-
रीढ़ की हड्ड़ी के निचले छोर से थोड़ा सा बाहर की ओर मूलाधार नामक पहला चक्र स्थित है। मूलाधार चक्र का स्थान रीढ़ की हड्डी के एकदम निचले हिस्से में होता है। यानि यह जननेन्द्रिय और गुदा के मध्य में होता है। इस चक्र के बिलकुल उपर कुंडलिनी शक्ति होती है। मूलाधार चक्र को जागृत किए बिना कुंडलिनी शक्ति को जगृत नहीं किया जा सकता। मूलाधार चक्र को अधार चक्र, प्रथम चक्र, बेस चक्र या रूट चक्र भी कहते हैं। यह चक्र निष्कपटता तथा विवेक देवता द्वारा शासित है। यह देवता रीढ़ की हड्ड़ी में स्थित पवित्र अस्थि में विश्राम करती हुर्इ कुंडलिनी की अपवित्र इरादों के अनुचित प्रवेश से रक्षा करता है। मुलाधार चक्र से उपर की ओर पवित्र त्रिकोणकार अस्थि में स्थित मूलाधारकहलाता है।
1-मूलाधार चक्र यदि दुर्बल हो तो कुंडलिनी अपने स्थान से नहीं उठती और यदि यह चक्र अपवित्रता ग्रसित हो तो कुंडलिनी उठने के बाद भी खिंच कर वापस अपने स्थान पर आ जाती है। कुंडलिनी का उत्थान मूलाधार से सातवें चक्र तक होता है जहां यह सामूहिक चेतना को व्यक्त करने वाली आत्मा से एकाकार कर लेती है। शरीर के अन्दर मूलाधार चक्र को शारीरिक क्रियाओं, अवरोधन और मल-त्याग को संभालना है। अमर्यादित यौन संबंध, अवांछित नैतिकता, निष्कासन अंगों पर दबाव ( जैसे कब्ज तथा पेचिश ) इस चक्र में तनाव के कारण बनते है। प्रजनन को भी कई  प्रकार से यह चक्र नियंत्रित करता है। नशीले पदार्थ तथा तांत्रिक क्रियाएं इस चक्र को अत्यंत हानि पहुंचाते है। जागृत मूलाधारचक्र साहस, निष्कपटता तथा निर्देशन बुधि  प्रदान करता है। इस प्रकार का व्यक्ति अत्यंत शुभकर तथा पास-पड़ोस के लिए सौभागय और र्इश्वरीय आंनद को लाने वाला होता है। इस चक्र के देवता श्री गणेश है। यदि आपने अपने मूलाधार चक्र को जागृत कर लिया तो सच मानिएं आपने श्रीगणेश को प्राप्त कर लिया। यानि आपकी आध्यात्मिक उन्नति की शुरुआत हो जाएगी।

मूलाधार चक्र की विकृति से बीमारियां
जो व्यक्ति अधिक कामुक, छल, कपट, प्रपंच और अहंकार को पालने वाला होता है, उसके मूलाधार चक्र में विकृतियां आने लगती है। इससे रीढ़ की हड्डी की बीमारियां, जोड़ों का दर्द, रक्त विकार, शरीर विकास की समस्या, कैंसर, कब्ज, गैस, सिर दर्द, जोडों की समस्या, गुदा संबंधी बीमारियां, यौन रोग, संतान प्राप्ति में समस्याएं, मानसिक कमजोरी आ सकती है। इन सभी समस्याओं से बचने के लिए जरूरी है कि हम शुद्ध आचरण करें, शुद्ध विचार रखें, कामवासना की शुद्धता का पालन करें, अहंकार त्यागें और अपने आप में मासूमियत विकसित करें। यदि  इन आप इन बातों का पालन कर लेते है तो निश्चित ही अपने आप में श्रीगणेश को जागृत कर लेंगे।
2-स्वाधिष्ठान चक्र- 
भौतिक शरीर में दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान चक्र के नाम से जाना जाता है। यह गुर्दे, जिगर के नीचे का हिस्सा, अग्नाश्य (पेनक्रियांस) प्लीहा (स्पलीन) और आंत्र (इन्टैस्टाइन) को चलाने का कार्य करता है। मस्तिष्क के भूरे तथा सफेद कणों की कमी को पूरा करने के लिए यह चक्र पेट की चर्बी के कणों को तोड़ कर मस्तिष्क को उर्जा प्रदान करता है। तथा इस प्रकार मस्तिष्क की विचार शक्ति को नव जीवन प्रदान करता है। फिर भी अत्याधिक सोच विचार, हीन भावना सूर्य स्रोत को नि:शक्त कर देती है। चिंता इसी स्रोत का अपव्यय करके इसे दुर्बल बनाती है। यह चक्र र्सोदर्य बोध तथा कलात्मक दृष्टि कोण उत्पन्न करता है। दैवी सरस्वती इसकी शासक है।
3-नाभि चक्र-
भौतिक रूप में नाभि-चक्र नाम का तीसरा चक्र पेट और जिगर के उपरी भाग की देखभाल करता है। अव्यवस्थित जीवन शैली, उतेजनापूर्ण  चिन्तन, धन लोलुपता इस चक्र के विकास में बाधा उत्पन्न करता है।
4-हृदय चक्र-
करूणा सभी पैगम्बरों और अवतरणों का सार-तत्व है। एक स्वस्थ हृदय चक्र ही इसका स्रोत है। केवल हृदय चक्र द्वारा ही निर्मल प्रेम के सुखद उल्लास का अनुभव हो पाता है। पति-पत्नी में से किसी का एक दूसरे पर प्रभुत्व जमाना या स्वामित्व भाव-ग्रस्त होना वास्तविक प्रेम का गला घोंट देता है। तथा संबंधों के विकास में बाधा डालता है। तिरस्कृति की अवस्था में नारी हतोत्साहित हो जाती है और उसमें दबा-दबा क्रोध विकसित हो जाता है। यह क्रोध प्राय: बच्चों पर या चरित्रहीनता के रूप में प्रकट होता है। तथा पुरानी बीमारियों की स्थिती में नारियों में स्तन संबंधी रोग उत्पन्न हो जाते है। असंतुलित जीवन, तीव्र अनुशासन, कठोर व्यवहार एवं हठ योग इस चक्र को दूषित करते है। दैवी नियमों की अवहेलना, र्इश्वर का अपमान, आत्मतत्व की और उदासीनता, दास्ता, चापलूसी तथा झूठी नम्रता इस चक्र के लिए हानिकारक है।
मध्य हृदय-मध्य हृदय की अधिष्ठात्री श्री जगदम्बा जी है। यह शक्तिप्रदायनी है। असुरक्षा भावना, भय, आशंका आदि से यह चक्र व्यथित हो जाता है। जगदम्बा रूप में श्री माता जी से हृदय-पूर्वक प्रार्थना करने से यह चक्र ठीक हो जाता है।
दायां हृदय- दायां हृदय के अधिष्ठाता श्री सीता राम जी है। मर्यादा इनका गुण है। मर्यादा विहिनता इस चक्र को हानि पहुंचाती है। यह पिता का चक्र हैं। जो पिता अपने बच्चों को अधार्मिकता में उतारता है या जिसकें संबंध अपने बच्चों से ठीक नहीं उसका यह चक्र विकृत हो जाता है। तथा उसे श्वास रोग हो सकता है। श्री राम तथा सीता के गुणों को अपने अंदर स्थापित करने तथा प्रार्थना करने से यह चक्र ठीक हो जाता है।
5-विशुद्धि चक्र-
विशुद्धि चक्र शरीर का प्रथम छन्ना (फिल्टर) है। अत: यह अति संवेदनशील चक्र है। तथा बाहरी जीवाणुओं से रक्षा करता है। दूषित वायु में श्वास लेना, तथा ध्रुमपान से यह चक्र रूद्ध हो जाता है। झूठे अंधाधुध मंत्रोच्चारण से भी इस चक्र की संवेदनशीलता भंग हो जाती है। झूठे गुरूओं द्वारा दिये गए मंत्र इसकी संवेदनशीलता के लिए अति हानिकारक है।
इस चक्र के देवता राधा कृष्ण व्यवहार में कुशलता का उपदेश देते है। जिससे कि मनुष्य चतुराई  से विपत्ति का सामना कर सकें। जब यह चक्र खुलता है। तो मानवीय लघु-ब्रह्मंड़ अंतरिक्षीय ब्रहमांड  के प्रति जागरूक हो उठता है।
(अर्थात मानाव विराट के प्रति जागरूक हो जाता है।)
6-आज्ञा चक्र-
विकास के छठे चरण पर कुंड़लिनी इस चक्र का छेदन करके पूर्ण गौरव के साथ सातवें चक्र पर आरोहित हो पाती है। अंह से मुक्ति प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सबको क्षमा करना पड़ता है।
दूसरों को क्षमा करने से हमारा अंह कम होता है।  परमात्मा के विषय में अनुचित विचार भी इस चक्र में बाधा उत्पन्न करते है। धार्मिक लोग मतांध हो जाते है। वे शास्त्रों के शब्द-जाल में उलझ कर पैगम्बरों द्वारा बताया सार-तत्व खो देते है। मनुष्य को कट्टर नहीं बनना है।
येशु मानव मात्र को सब दोषों से मुक्त करने के लिए आये। उन्होने सब को क्षमा कर दिया तथा सब दोषों को स्वय  पर ले लिया। स्वय को क्रूसारोपित करवा कर मानव को स्वनिहित अंह (अभिमान) का स्पष्ट अनुभव करने में सहायता की। मानव  के महान पश्चाताप का उद्य हुआ जिसने उसे अपने अंह की दुष्टता को देखने के योग्य बनाया। परिणामत: मानव में नम्रता जाग्रत हुर्इ।
(From a book of Mata Nirmla Devi Sahaj Yoga with thanks)
अवधू सहस दल अब देख। 
श्वेत रंग जहाँ पैंखरी छवि, अग्र डोर विशेख।।
अमृत वरषा होत अति झरि, तेज पुंज प्रकाश।
नाद अनहद बजत अद्भुत, महा ब्रह्मविलास।।
                             -सन्त चरण दास

उस सहस्त्रार चक्र में हज़ार पंखुडि़यों वाला कमल है, जो जल के बिना ही विकसित होता है। जानते हो, उससे निरन्तर अमृत की वर्षा होती है। वह अमृत जिसका पान कर जीवात्मा के दुःख, पाप, व्याधि आदि समाप्त हो जाते हैं। उस नगर में अद्भुत संगीत भी बज रहा है। ऐसी मधुर ध्वनि, जिसकी कोई हद नहीं- अनहद बाजे बाजन लागे, चोर नगरिया तजि-तजि भागे। उन बाजों-ध्वनियों को सुनकर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार रूपी चोर, जो हमारी पुण्य पूँजी को लूट रहे थे, डर कर भाग जाते है। कितना विलक्षण है यह नगर, जहाँ कोई भय, दुःख क्लेश नहीं!! यदि है, तो मात्र आनंद ही आनंद, मात्र दर्शन ही दर्शन!
(to be continued)

स्वस्थ कौन ?


आयुर्वेद के गंथों की रचना करने के पश्चात महार्षि चरक के मन में विचार उठा कि प्रवास पर निकला जाए और परखा जाए कि स्वास्थ्य के सूत्रों को जन-जन तक पहुचाने का उनका प्रयास सफल हुआ या नहीं। महर्षि वेश बदलकर वैद्यो की एक सभा में पहुँचे और सबके समक्ष एक प्रश्न रखा कि को·रूक?’ अर्थात रोगी कौन नहीं है? एक वैद्य ने उतर दिया की स्वस्थ वह है, जो नित्य च्यवनप्राश खाता है। कोई  बोला कि स्वस्थ वह है, जो शिलाजीत का सेवन करता है। किसी ने लवण भास्कर को श्रेय दिया तो किसी ने चंद्रप्रभा वटी को समग्र गुणें की खान बताया। उनके उतरो  को सुन महार्षि का मन क्षोभ से भर उठा। वे सोचने लगे की इन्होंने तो मनुष्य शरीर को औषधियों का संग्रहालय बना दिया, मेरी वर्षो की तपस्या विफल हो गई । इन्हीं विचारों में मग्न महार्षि चरक वैद्य वाग्भट के सामने से गुजरे। मन में असंतोष तो था, पर तब भी आशावश उनने यही प्रश्न वाग्भट महाराज से किया। वाग्भट ने उतर  दिया- हितभुक् मितभूक् ऋतभूक। अर्थात स्वस्थ वह है, जिसका आहार मित है, ऋतुओं के अनुसार है और शरीर के लिए हितकार हो, वाग्भट का उत्त्ार सुनकर महार्षि का मन प्रसन्नता से भर उठा।
उपरोक्त प्रंसग में मानव को स्वस्थ रखने के लिए एक बहुत गहरा संदेश छिपा हुआ है। मनुष्य में यह दुर्बलता पायी जाती है कि वह अपनी बिगड़ी आदतों के कारण अपने आहार विहार को ठिक नहीं करता अपितु अपने रोग मुक्ति के लिए भाँति-भाँति की दवाइयाँ खोजता फिरता है। ऋषि का स्पष्ट आदेश है कि स्वस्थ वही रह सकता है। जिसका आहार विहार सही हो चाहे वो कितनी ही बढिया से बढिया दवा क्यों न खा ले।
हितभुक- अर्थात वह आहार-विहार अपनाए जो उसके लिए हितकारी हो। आहार अर्थात भोजन, विहार का अर्थ है आचरण रहन-सहन। बच्चे के लिए पौष्टिक भोजन हितकारी है तो बड़ो के लिए संयमित भोजन। वात प्रधान व्यक्ति के लिए एक प्रकार का भोजन व इन्द्रिय संयम आवश्यक है। तो पित्त  प्रधान व्यक्ति के लिए क्रोध न करना व शीतलता प्रदान करने वाले पदार्थ उपयुक्त हैं।
ऋतभुक-आहार-विहार ऋतुओं के अनुसार बदलना चाहिए। गर्मी की ऋतु में हल्के वस्त्र पहनना, शीतल जल में स्नान लाभदायक हो सकता है, परन्तु शीत ऋतु में उनी वस्त्र पहनना, व हल्के गर्म पानी में स्नान करना हितकारी है। ऋतुओं को ध्यान में रखते हुए अनुकूल आहार-विहार करना चाहिए।
मितभुक- व्यक्ति को मिताहारी रहना चाहिए। यह तपस्वी जीवन की ओर, संयमी जीवन की ओर ऋषियों का संदेश है। जितना भूख है उससें थोडा कम खाए, समय पर खाए, अनावश्यक ठूसाँ-ठाँसी न करें। इसी प्रकार अधिक के लालच में न पड़े, अपरिग्रही बनें कृत्रिम जीवन से बचने का प्रयास करें। प्रकृति वातावरण में रहें। Luxurious life भाँति-2 के रोगों को आमन्त्रित करती है जैसे मधुमेह व मोटापा आदि। अत: आवश्यकता से अधिक सुख के साधन घरो में एकत्र न करें। जो जितना अपरिग्रही रह सकें, दिखावों से बच सकें, बच्चों की भाँति सरल निष्कपट रह सकें वही स्वस्थ जीवन जी सकता है।
(अधिक जानकारी के लिए पढ़ें- सनातन धर्म का प्रसाद)

Thursday, September 13, 2012

मानसिक शांति


विहाय कामान्य: सर्वान्पूमांश्रच्रति नि:स्पृह:।
निर्ममो निंरहकार स शान्तिमधिगच्छति।।
अर्थात जो पुरुष संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममातारहित, अहंकार रहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है।, वही शांति को प्राप्त होता है एवं स्थितप्रज्ञ कहलाता है। अर्थात मानसिक शांति समस्वरता, जीवन योग की धुरी एक ही है-विहाय कामान्य:-संपूर्ण त्याग। यही सच्चे शिष्य की, संतुलित व्यक्ति की निशानी है कि उसकी कोई कामनाएँ नहीं रहती इसीलिए वह शांति को प्राप्त द्रिष्ट गोचर होता है। वह ममता रहित भी होता है। कामना के रहते बुद्धि स्थिर नहीं रह सकती। कामना बाँधती है तो भक्ति मुक्त करती है। कामनाएँ घसीटती हैं तो भक्ति विर्सजन की ओर ले जाती है। जब कामनाएँ है बुद्धि अस्थिर है तो वह परमात्मचेतना में स्थित पुरुष कैसे बन सकता है। वही व्यक्ति स्थितप्रज्ञ हो सकता है जिसकी बुद्धि स्थिर हो। जब यह हो जाता है, संसार में मन नहीं रहता, स्रष्टि  के केन्द्र में व्यक्ति स्थिर हो जाता है, लगता है मै बुद्धि से परे हूँ। फिर दुनिया भर के प्रपंच मुझे सता नहीं सकते। नाम क्यों नहीं मिला, यश क्यों नहीं गाया गया, मेरी कीर्ती क्यों नहीं हुर्इ, मेरी निंदा क्यों हुई , यह सब चीजें परेशान नहीं करतीं। छोटा बच्चा खिलौना टुटने पर रोने लगता है, इसी प्रकार अस्थिर व्यक्ति कामनाओं के पूरा न होने पर रोता है, व्यथित होता है तथा तनाव ग्रस्त हो जाता है, जबकि एक बड़ा बच्चा जिसके लिए खिलौने कोई महत्व नहीं रखते, ऐसा कोई  प्रसंग आने पर परेशान नहीं होता। एक परिपक्व व्यक्ति की तरह स्थितप्रज्ञ की स्थिति होती है। ऐसी स्थिति बनती है जब हम कामनाओं से मुक्त होकर आत्मा में स्थित हो जाते है।
अगले श्लोक में भगवान कहते है-
दु:खेवनुद्विगन्मना: सुखेविगतस्पृह:।
वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनीरूच्यते।।
अर्थात दुखो की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निसपृह है तथा जिनके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए है, ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि कहा जाता है। दुखो के कारण तो कई आते है, पर उन्हें स्थितप्रज्ञ सहन कर लेता है, उद्विग्न नहीं होता। उसे सुख की कामना भी नहीं होती। सुख पाने की आकांश में वह उद्विग्न भी नहीं होता। वह वीतराग हो जाता है। स्वंय को राग, भय, क्रोध से परे चलकर अपनी मन:स्थिति उच्चस्तर बना लेता है। हम जैसे समान्य व्यक्ति सुखों की इच्छा बराबर बनाए रखते है, दुख में परेशान हो जाते है। यही हममें व स्थितप्रज्ञ में सबसें बड़ा अन्तर है।