Saturday, September 15, 2012

र्इष्र्या का फल


एक बार एक सेठ ने दो विद्वानों को भोजन पर आमंत्रित किया। समय पर दोनों विद्वान पधारे, तो सेठ ने उनका स्वागत किया। उनको आदर से आसन पर बिठाया। उनमें से एक विद्वान जब स्नान करने के लिए गए, तो सेठ ने दूसरे विद्वान से कहा, महाराज। ये आपके साथी तो महान विद्वान मालूम देते है? यह और विद्वान? क्या बात करते हो सेठ जी यह तो निरा बैल है बैल। विद्वान ने उत्तर दिया। सेठ जी को बहुत बुरा लगा, किन्तु वह चुप ही रहा। पहले विद्वान जब स्नान करके वापस आए, तो दूसरे विद्वान स्नान करने के लिए गए। सेठ जी ने उनसे भी वही प्रश्न किया, महाराज आपके साथी तो महान विद्वान लगते है? विद्वान बोले, सेठ जी किसने बहका दिया आपको? वह तो निरा गधा है गधा। सेठ इस समय भी मौन ही रहा। जब भोजन का समय आया, तो सेठ ने चाँदी की थाली में ढककर एक विद्वान के आगे घास रख दी और दूसरे के आगे भूसा रख दिया। दोनों के बैठने पर सेठ जी ने निवेदन किया कि भोजन प्रारंभ कीजिए। विद्वानों ने जब ढक्कन उठाया, तो उस भोजन को देखकर दोनों विद्वान क्रोध से तमतमा उठे। बोले, हमारे अपमान का आपमें साहस कैसे हुआ? सेठ जी ने हाथ जोड़कर नम्रता से कहा, महाराज, मैंने तो आप लोगों के कथन के अनुसार ही आप लोगों के सम्मुख भोजन परोसा है। आपने इनको बैल बताया था और इन्होंने आपको गधा बताया था, सो वैसा ही भोजन मुझे मँगाना पड़ा। इसमें मेरा क्या दोष  है? विद्वानजी, मैं तो आप दोनों को ही विद्वान समझता था, इसलिए आमन्त्रित किया था, किन्तु वास्तविकता का ज्ञान तो आप लोगों से ही प्राप्त हुआ है। सेठ की बात सुनकर दोनों विद्वान मन-ही-मन लज्जित हुए।
परस्पर ईर्ष्या  का परिणाम अच्छा नहीं होता। स्वयं यदि प्रतिष्ठा प्राप्त करनी हो तो अपने योग्य साथियों को भी प्रतिष्ठित करना होगा। ईर्ष्या  से जहाँ मानसिक अशान्ति रहती है, वहाँ साथ ही अपमान भी होता है। ईर्ष्या  एक धीमी आग है जो मनुष्य को बुरी तरह जला डालती है।

अपान मुद्रा





सम्पूर्ण शरीर में मुख्य रूप से प्राण वायु स्थित है। यहीं प्राण वायु शरीर के विभिन्न अवयवों एवं स्थानों पर भिन्न-भिन्न कार्य करती है। इस दृष्टि से उनका नाम पृथक-पृथक दिया गया है। जैसे- प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। यह वायु समुदाय पांच प्रमुख केन्द्रों में अलग-अलग कार्य करता है। प्राण स्थान मुख्य रूप से हृदय में आंनद केंद्र (अनाहत चक्र) में है। प्राण नाभि से लेकर कठं-पर्यन्त फैला हुआ है। प्राण का कार्य श्वास-प्रश्वास करना, खाया हुआ भोजन पकाना, भोजन के रस को अलग-अलग इकाइयों में विभक्त करना, भोजन से रस बनाना, रस से अन्य धातुओं का निर्माण करना है। अपान का स्थान स्वास्थय केन्द्र और शक्ति केन्द्र है, योग में जिन्हें स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधर चक्र कहा जाता है। अपान का कार्य मल, मूत्र, वीर्य, रज और गर्भ को बाहर निकालना है। सोना, बैठना, उठना, चलना आदि गतिमय स्थितियों में सहयोग करना है। जैसे अर्जन जीवन के लिए जरूरी है, वैसे ही विर्सजन भी जीवन के लिए अनिर्वाय है। शरीर में केवल अर्जन की ही प्रणाली हो, विर्सजन के लिए कोई अवकाश न हो तो व्यक्ति का एक दिन भी जिंदा रहना मुश्किल हो जाता है। विर्सजन के माध्यम से शरीर अपना शोधन करता है। शरीर विर्सजन की क्रिया यदि एक, दो या तीन दिन बन्द रखे तो पूरा शरीर मलागार हो जाए। ऐसी स्थिति में मनुष्य का स्वस्थ्य रहना मुश्किल हो जाता है। अपान मुद्रा अशुचि और गन्दगी का शोधन करती है।
विधि-- मध्यमा और अनामिका दोनों अँगुलियों एवं अंगुठे के अग्रभाग को मिलाकर दबाएं। इस प्रकार अपान मुद्रा निर्मित होती है। तर्जनी (अंगुठे के पास वाली) और कनिष्ठा (सबसे छोटी अंगुली) सीधी रहेगी।
आसन-- इसमें उत्कटांसन (उकड़ू बैठना) उपयोगी है। वैसे सुखासन आदि किसी ध्यान-आसन में भी इसे किया जा सकता है।
समय-- इसे तीन बार में 16-16 मिनट करें। 48 मिनट का अभ्यास परिर्वतन की अनुभूति के स्तर पर पहुँचाता है। प्राण और अपान दोनों का शरीर में महत्व है। प्राण और अपान दोनों को समान बनाना ही योग का लक्ष्य है। प्राण और अपान दोनों के मिलन से चित्त में स्थिरता और समाधि उत्पन्न होती है।
लाभ—
शरीर और नाड़ियों की शुद्धि होती है।           
मल और दोष विसर्जित होते है तथा निर्मलता प्राप्त होती है।   
कब्ज दूर होती है। यह बवासीर के लिए उपयोगी है। अनिद्रा रोग दूर होता है। 
पेट के विभिन्न अवयवों की क्षमता विकसित होती है।
वायु विकार एवं मधुमेह का शमन होता है।
मूत्रावरोध एवं गुर्दों का दोष दूर होता है।
दाँतों के दोष एवं दर्द दूर होते है।
पसीना लाकर शरीर के ताप को दूर करती है।
हृदय शक्तिशाली बनता है।
विशेष -- एक्युप्रेशर के अनुसार इसके दाब केंद्र बिंदु श्वासनली तथा आमाशय के रोग दूर करते है पेशाब संबंधी दोषों को यह दूर करती है। यह मुद्रा दोनों हाथ से करनी है। उससे पूर्ण लाभ उठाया जा सकता है। किसी कारण से एक हाथ दूसरे कार्य में लगा हुआ हो तो एक हाथ से भी मुद्रा की जा सकती है। दोनों हाथों से करने में जितना लाभ है उतना एक हाथ से प्राप्त नहीं होता है। किन्तु फायदा अवश्य होता है। प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान वायु के दोषों का परिष्कार अपान मुद्रा से किया जा सकता है।
नोट-- इस मुद्रा से मूत्र अधिक आ सकता है। इससे डरने की आवश्यकता नहीं है।
(’मुद्रा रहस्य से साभार)

मानसिक स्वास्थ्य और सदाचार


प्रसिद्ध है कि जिस मनुष्य का मन बिगड़ता है, उसका स्वभाव भी बिगड़ जाता है। असयम, असत्य, अभिमान, ईर्ष्या , दम्भ, का्रेध, हिंसा और कपट आदि दुर्गुण ही बिगड़े स्वभाव के लक्षण है। ये सूक्ष्म रोग है। दु:स्वभाव वाला व्यक्ति इन्द्रियों के तेज और शक्ति को खो बैठता है और शरीर को भी रोगी बना देता है। अब यहाँ किसी दोष से कौन सा रोग होता है, थोंड़ा इस पर विचार कर लें।
(1) असंयम- जीभ को असंयमी रखने से वह चाहे जैसे स्वाद में रस लेने लगती है और चाहे जितना खाने को आतुर रहती है। परिणामस्वरूप पेट में अधिक अयोग्य भोजन चला जाता है। और वह पेट या अँतड़ियों में रोग उत्पन्न करता है। इसी प्रकार जीभ के असंयमी होने पर यदि वह चाहे जैसी वाणी उच्चारण करे तो जीभ द्वारा संबधित मस्तिष्क के ज्ञान तंतुओं को हानि पहुँचती है। और कुछ समय पश्चात् जीभ कैंसर या लकवा हो जाने की स्थिति में पहुँच जाती है। यह देखकर हमें भी सिखाना चाहिए। इसी प्रकार शरीर की समस्त इन्द्रियाँ भी असंयमी व्यवहार से अनेक प्रकार के रोगा उत्पन्न करती है।
(2) असत्य- असत्य बोलने वाले व्यक्ति की शक्ति नष्ट हो जाती है। और वह सामान्य रोग का शिकार हो जाता है। जीवन शक्ति का आधार तेजहै और वह तेजअसत्य से नष्ट हो जाता है। असत्य बोलने वाला तेजहीन हो जाता है। साथ ही असत्य वाणी बोलने से हृदय और मस्तिष्क के ज्ञान तन्तुओं की हानि होती है। कुछ समय पश्चात् वह हृदय के रोग, पागलपन, पथरी, लकवा आदि रोगों से भी दु:खी हो जाए तो कोई  आश्र्चय की बात नही।
(3) अभिमान- मनुष्य में वात, पित और कफ तीनों को एक साथ सन्निपात के रूप में उतपन्न करने वाला अभिमान है और इसी से किसी कवि ने कहा है। कि पाप-मूल अभिमान। यह अभिमान ही मनुष्य के दुगुणों का राजा है और सब दोषों  तथा रोगों को  करने वाला बलवान लोहे का चुम्बक है। अभिमानी व्यक्ति वात, पित और कफ के छोटे बड़े रोगों से दुखी रहते है।
(4) ईर्ष्या- ईर्ष्या करने वाले मनुष्य में पित्त बढ़ जाता है, जिससे मनुष्य की इन्द्रियों की तेजस्विता नष्ट हो जाती है। ऐसे मनुष्य के बुद्धि और हृदय पित्त के तेजाब में जल जाते है। एवम् वह किसी भी काम में प्रगति नहीं कर पाता। ऐसे मनुष्य पित्त, पथरी, जलन, लीवर की खराबी आदि रोगों से दु:खी रहते है।
(5) क्रोध- बिगड़े हुए मन की कामनाओं से पूर्ण न होने से अथवा उनमें विध्न आने से क्रोध उत्पन्न होता है। कोई मनुष्य दूसरे की हानि कर सकेगा या नहीं वह तो दैवाधीन है, परन्तु सर्वप्रथम वह स्वंय की भी हानि करता ही है। क्रोध करने में मनुष्य के मस्तिष्क को अपनी बहुमूल्य एवम् अधिक ओज शक्ति को उपयोग करना पड़ता है। इस प्रकार अमूल्य ओज नष्ट हो जाता है। परिणामस्वरूप जीवन शक्ति नष्ट होती चली जाती है। तदुपरान्त क्रोध के मस्तिष्क में आते ही ओज के विशाल एवं विकृत प्रवाह से मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु क्षीण हो जाते है। बिजली का प्रवाह घर में लगे हुए बल्ब को पारिमाणिक मात्रा में आने पर तो जलाता है परन्तु अधिक मात्रा में आने पर बल्ब को नष्ट कर देता है। कभी-कभी तो घर को भी हानि पहुँचाता है। इसमें रक्षा पाने के लिए घर के बाहर फ्यूज की व्यवस्था की जाती है। संयम और विवेक ही हमारे फ्यूज है। इन्हें त्याग देने पर ओज का अत्याधिक प्रवाह क्रोध के रूप में उत्पन्न हो जाता है। और मस्तिष्क के कितने ही भागों को जोखिम में  डाल देता है। बल, बुद्धि भी धीरे-धीर क्षीण होने लगते है।
(6) हिंसा- हिंसा क्रोध और अभिमान के उतपन्न होती है। इसमें प्रवृत रहने वाले व्यक्ति का रक्त सदा खौलता एवं गर्म रहता है। हिंसा में मस्तिष्क और हृदय दोनों गंदे होते है। अभिमान और क्रोध से उतपन्न रोगों के उपरान्त ऐसे मनुष्य में हृदय से उतपन्न रोग भी होते है। पराया दु:ख देखकर जो हृदय एकदम नरम बनकर द्रवित होने लगता है, वहीं हृदय अपने दु:खों के सामने वज्र जैसा भी बन जाता है। यह हृदय की सत्य और वास्तविक स्थिति का गुण है। हिंसा वाले मनुष्य में हृदय के ये गुण नष्ट हो जाते है। वह लोगों का दु:ख देखकर हँसता है और अपने ऊपर दु:ख आने पर निम्न श्रेणी का भीरू बन जाता है। तत्पश्चात हृदय में और सम्पूर्ण शरीर में गर्म रक्त भ्रमण करने से शरीर में वात-पित्त-कफ उत्पन्न होता है।
(7) छलकपट- कपट करने वाला व्यकित भी सूक्ष्म रूप से हिंसा ही करता है। पंरतु उसकी हिंसा करने की युक्ति मायामय-कपटमय होने से दिखाई नहीं देती। वह साधारण विष जैसी होती है। इससे ऐसे मनुष्य भी ऊपर वर्णित हिंसा वाले व्यक्ति के समान ही रोगों के शिकार बन जाते है। उसे जिस रोग का दण्ड मिलता है, वह धीरे-धीरे असर करने वाले विष के समान ही होता है।  
(From: Yog Manjiri Magzine)

वास्तविक उन्नति


लोग बोलते है, उन्नति-उन्नति लेकिन अपनी-अपनी मान्यता और कल्पना की उन्नति एक बात है। वास्तविक उन्नति कौन सी है? बढ़िया फर्नीचर है, बढ़िया खाने-पीने की चीजें बहुत हैं, घूमने के साधन बहुत है जिसमें भोग-साम्रगी बढ़ाने की वृति हो, वह समझों पैशाचिक उन्नति है। भोग साम्रगी बढ़ाकर जो अपने को बड़ा मानता है, समझो वह पिशाच-योनि की वासनावाला व्यक्ति है। जो धन बढ़ाकर अपने को बड़ा मानता है वह राक्षसी वृति का है। राक्षसों के पास खुब धन होता है। रावण के पास देखो सोने की लंका थी। मै रावण हुँ बड़ा धनी हुँ जो दुसरो पर अधिकार जमाकर अपने को बड़ा मानना चाहता है उसकी दानवी उन्नति है। दानव लोग दुसरों पर अधिकार जमाकर अपने को बड़ा बनाने में ही खप जाते है। जो सद्भाव का विकास करके बड़ा बनना चहाते है, सत्संग में जाकर जप-ध्यान करके, दीक्षा ले अपनी उन्नति करना चाहते है, उनका असली बड़प्पन का रास्ता अच्छी तरह से खुलने लगता है। वे ज्ञान-विज्ञान से तृप्त होकर असली पुरुषार्थ , पुरुषार्थ  अर्थ इति पुरुषार्थ :।  परमात्मा के अर्थ में शरीर को रखेगे, खायेंगे-पियेंगे, देंगे-लेंगे लेकिन महत्व भगवान को ही देंगे। उनमें सागर जैसी गम्भीरता आ जाती है। सागर के ऊपर की तरंगें खुब उछलती-कुदती है। लेकिन गहराई  में बड़ा शांत पानी, ऐसे ही वे नींद से उठेगें तो उनकी बुद्धि भगवान की गम्भीर उदधि की गहराई  जैसी अवस्था में होगी। जैसे श्रीरामचंद्रजी को राज्यभिषेक  की खबर मिली तो भी उछल-कुद नहीं। सागर की गहराई  में जैसे पानी गम्भीर रहता है, ऐसे ही रामचंद्रजी का स्वभाव शांत व गम्भीर रहा। वनवास मिला तो श्रीरामचंद्रजी के चहरे पर शिकन नहीं पड़ी, होता रहता है, संसार है।
खून पसीना बहाता जा, तान के चादर सोता जा,
यह नाव तो हिलती जायेगी, तु हँसता जा या रोता जा ।।
संसार है, बीतने दो। गम्भीरता से इसको देखो। ऐसा करने वाला व्यक्ति परमार्थ के रास्ते अच्छी तरह से तरक्की करता है। उसमें विनयी स्वभाव आ विराजता है। मै ऐसा हूँ  मै वैसा हूँ यह मान्यता उसकी क्षीण हो जाती है। मै भगवान का हूँ और  भगवान मेरे है सत्स्वरूप है, चेतनस्वरूप है आनंदस्वरूप है और सदा मेरा साथ निभाना वाला अगर कोई  है तो भगवान ही है। ऐसी ऊँची उसकी सूझबूझ हो जाती है। पिछले जन्म की माँ नहीं है, बाप नहीं है, मित्र नहीं है लेकिन अंतरात्मा तो वही का वही। बचपन के मित्र नहीं है, सखा नहीं है, स्नेही नहीं है। बचपन में जो मेरी तोतली भाषा  के साथ थे अथवा किशोर अवस्था में थे, वे न जाने कहाँ चले गए। उनको जानने वाला अभी भी परमात्मा मेरे साथ है। ऐसी सूझबूझ उसकी बढ़ती जाती है। उसका अंह अन्य वस्तु, अन्य व्यक्ति के फंदे में नहीं फँसता, उसका मैं मूलस्वरूप परमात्मा के मैं से स्फुरित होता है और उसी में शांति पाता है। उसमें तुच्छ अंहकार का अभाव हो जाता है। ऐसे जो वास्तविक उन्नति के रास्ते पर चलते है, उनको साधक कहते है। वे परम पद की साधना में ही उन्नति मानते है। चाहे रहने खाने की सुविधा अच्छी हो या साधारण, लेकिन चिंतन भगवान का, शांति भगवान में, चर्चा भगवान की, आनंद भगवान का, विनोद भगवान से, माधुर्य भगवान का तो ये वास्तविक उन्नति के धनी साधक आत्मसुख में, आत्मचर्चा में, आत्मज्ञान में, परमात्मरस में रसवान हो जाते है। ऐसे लोगों को कुछ बातों का ध्यान रखना होता है। पहला, अपने कर्म जाँचे की हम दूषित  कर्म तो नहीं करते अथवा दूषित  कर्मवालों के प्रभाव में तो हम खिंच नहीं जाते है। दूसरा, हमारे में धैर्य है कि नहीं। जरा-जरा सी बात में हम चिढ़ जाते है या प्रभावित हो जाते है, ऐसा तो नहीं है। तीसरा, आत्मनिरींक्षण करके महापुरुषो  के वचनों को आत्मसात् करने की तत्परता रखनी चाहिए। ऐसे लोगों को भगवान की प्राप्ति सुगम हो जाती है। उनमें भगवान के दिव्य गुण आने लगते है। प्रशांत चित्त, दयालु स्वभाव, स्वार्थरहित प्रेम, सदा सत्यचिंतन, सत्य में विश्रांति, साधननिष्ठा में दृढ़ता, सहृदयता, आस्था और श्रद्धा विश्वास, प्रभुप्रीति, पूर्ण आत्मीयता, प्रभु मेरे है, मैं प्रभु का हुँ और प्रभु के नाते सब मेरे है, मै सबका हुँ - ऐसे दिव्य गुणों में वे अपनी उन्नति मानते है। सचमुच यहीं उन्नति है। राजा भतर्हरि लिखते है कि मनुष्य जीवन में गुणी जनों का संग, संतजनों का संग, संतजनों का संत्सग और उनके मार्ग से परमात्मा में शांति, प्रीति-वास्तविक उन्नति यही है। सत्संग से राक्षसी उन्नति, मोहिनी उन्नति, तामसी उन्नति, राजसी उन्नति इनका आकर्षण  छूटकर असली उन्नति होती है। सत्संग के बिना की ये सब उन्नतियाँ अपनी-अपनी जगह पर व्यक्ति को उन्हीं दायरों में लगा देती है। लेकिन सत्संग के बाद पता चलता है कि वास्तविक उन्नति प्रजा की, राजा की और मानव की किसमें है? श्री योगवासिष्ठ महारामायण, के मुख्य श्रोता है भगवान रामजी और वक्ता है भगवान राम के गुरू वसिष्ठजी। वसिष्ठजी महाराज कहते है : हे राम जी। यदि आत्मतत्त्व की जिज्ञासा में हाथ में ठीकरा ले चंड़ाल के घर से भिक्षा ग्रहण करे तो वह भी श्रेष्ठ है पर मूर्खता से जीना व्यर्थ है। संसार को सत्य मानना, देह को मैंमानना, मिलने-बिछुडनेवाली चीजों के लिए सुखी-दु:खी होना- यह मूर्खता है। तुच्छ मति वाले प्राणी इसी में उलझते, जन्मते-मरते रहते है। मनुष्य भी ऐसे ही जिया और ऐसे ही मरा, प्रकृति के प्रभाव में परेशानीवाली योनि में भटकता रहा तो धिक्कार है उन उन्नतियों को।
आत्मलाभात् न परं विद्यते।
आत्मज्ञानात् न परं विद्यते।
आत्मसुखात् न परं विद्यते।
इन वचनों की तरफ ध्यान देकर वास्तविक उन्नति की तरफ चलना चाहिए। इंद्रियशुद्धि, भावशुद्धि और आत्मज्ञान देने वाले महापुरुषो  का मार्गदर्शन सच्ची उन्नति और शाश्वत उन्नति देता है, बाकी सब नश्वर उन्नतियाँ नाश की तरफ घसीट कर ले जाती है। अत: जहाँ सत्संग मिलता है उस स्थान का त्याग नही करना चाहिए। वास्तविक उन्नति अपने आत्मा-परमात्मा ज्ञान से, आत्मा-परमात्मा की प्रीति से, आत्मा-परमात्मा में विश्रांति पाने से होती है। जिसने सत्संग द्वारा परमात्मा में आराम करना सीखा, उसे ही वास्तव में आराम मिलता है। बाकी तो कहाँ है आराम? साँप बनने में भी आराम नही, भैंस बनने में भी आराम नही है। कुत्ता या कलंदर बनने में भी आराम नही, आराम तो है अंतर्यामी राम का पता बतानेवाले संतों के सत्संग में, ध्यान में योग में। वहाँ जो आराम मिलता है, वह स्वर्ग में भी कहाँ है। संत तुलसीदासजी कहते है :
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।
(श्री रामचरित मानस)
सत्संग की बड़ी भारी महिमा है, बलिहारी है। मैं भगवान का हुँ भगवान मेरे है। संसार और शरीर पंचभौतिक है लेकिन जीवात्मा चैतन्य है, परमात्मा का है। परमात्मा के साथ हमारा संबंध शाश्वत है। पक्का निश्चय करो कि, आज से मैं भगवद्रस पिऊँगा। वास्तविक उन्नति का मर्म जानकर तुच्छ उन्नति को उन्नति मानने की गलती निकाल दुँगा। वास्तविक उन्नति जिसकी होती है, उसे तुच्छ उन्नति करनी नहीं पड़ती, अपने आप हो जाती है। गहरा श्वास लो और सवा मिनट श्वास रोककर जितना हो सके ॐ कार का जप करो, वास्तविक उन्नति बिल्कुल हाथों-हाथ। दस बार रोज करो, चालीस दिन के अनुष्ठान, मौन व एकांत से आपको चमत्कारिक अनुभव होने लगेगे। मुझे हुए है, तुमको क्यों नही होगे। मुझे मिला है तो तुम्हें क्यों नहीं मिलेगा।
(From Magazine: Rishi-Prasad)