Monday, November 5, 2012

आसान रास्ता काफी मुश्किल रास्ता साबित हो सकता है




एक बार एक लार्क चिड़िया जंगल में गाना गा रही थी। तभी, एक किसान उसके पास से किड़ों से भरा संदूक ले कर गुजरा। लार्क चिड़िया ने उसे रोक कर पूछा ‘‘ तुम्हारे संदूक में क्या है, और तुम कहाँ जा रहे हो?’’ किसान ने जवाब दिया कि उस संदूक में कीड़े है, वह बाजार में उन कीड़ो के बदले पंख खरीदने जा रहा है। लार्क ने कहा, ‘‘ पंख तो मेरे पास भी है। मैं अपना एक पंख तोड़कर तुम्हें दे दूँगी, इससे मुझे कीड़े नहीं तलाशने पड़ेगे। ‘‘ किसान ने लार्क को कीड़े दे दिये, और लार्क ने बदले में उसे अपना एके पंख तोड़ कर दे दिया। उसके बाद रोज यही सिलसिला चलता रहा, और एक दिन ऐसा भी आया, जब लार्क के पास देने के लिए कोई पंख ही नहीं बचा था। वह उड़ कर कीड़े तलाशने लायक नहीं रह गई । वह भद्दी दिखने लगी, और उसने गाना छोड़ दिया। जल्दी ही वह मर गई । यही बात हमारी जिन्दगी के लिये भी सच है।  कई बार हमें जो रास्ता आसन लगता है।  कई बार वही बाद में मुश्किल साबित होता है। 
    
                                      जीत आपकी से साभार       

गन्दगी का ही परिणाम



संसार में सौदर्य बना रहे गन्दगी और कुत्सा न भड़के इसलिए गन्दगी को ढककर रखा जाता है और फूलों को सजाकर रखा जाता है। बच्चे दस्त करते है तो उस पर तुरन्त मिट्टी या राख डाली जाती है ताकि  दुर्गन्ध तुरन्त रूक जाये इसी तरह चारित्रिक गन्दगी को ढकना चाहिए। संभव है हमारी माँ के भी कदम डगमागये हों पर हमारी संस्कृति में नारी के माता स्वरूप की ही कल्पना की गई कामिनी या रमणी रूप में नहीं। गन्दगी चर्चाओं से लोगों में नाराजी की अपेक्षा गन्दगी कल्पनायें ही जागृत होती है इसलिए ऐसी चर्चायें ही नहीं करनी चाहिए।
जब की आज यह चर्चायें चटखारे ले लेकर की जाती है गर्म गर्म सुर्खियों में छपती है इतना ही नहीं बेशर्मी की हद देखें की उससे भी घटिया चित्र छापे जाते है इन सुर्खियों समाचारों नंगे चित्रों से जनमानस में कितनी गन्दगी उभरती होगी। उस गन्दगी का ही परिणाम आज सिसकियाँ दिलाने वाले समाचार प्रतिदिन पढ़ने को मिलते है। एक तो कोढ़ उस पर खाज। एक तो करेला सो भी नीम चढ़ा। एक ओर पब संस्कृति और उसे सहमति देने वाला मीडिया, सिनेमा, चित्रकार ,कवि ,पत्रकार। अकेला और निहत्था अभिमन्यु और चक्रव्यूह-अपना भारतीय दर्शन भारतीय संस्कृति। यह आज का जलता हुआ प्रश्न है जिसे चाहिए संस्कारों की ऐसी शीतल बयारी जो आने वाली पीढ़ी का जीवन बचा सकें और उसे कुँए में गिरने से रोक सके।
गायत्री उपवन से साभार

Friday, November 2, 2012

महात्मा जी की बिल्ली

महात्मा जी की बिल्ली
एक बार एक महात्माजी अपने कुछ शिष्यों के साथ जंगल में आश्रम बनाकर रहते थें, एक दिन कहीं से एक बिल्ली का बच्चा रास्ता भटककर आश्रम में आ गया । महात्माजी ने उस भूखे प्यासे बिल्ली के बच्चे को दूध-रोटी खिलाया । वह बच्चा वहीं आश्रम में रहकर पलने लगा। लेकिन उसके आने के बाद महात्माजी को एक समस्या उत्पन्न हो गयी कि जब वे सायं ध्यान में बैठते तो वह बच्चा कभी उनकी गोद में चढ़ जाता, कभी कन्धे या सिर पर बैठ जाता । तो महात्माजी ने अपने एक शिष्य को बुलाकर कहा देखो मैं जब सायं ध्यान पर बैठू, उससे पूर्व तुम इस बच्चे को दूर एक पेड़ से बॉध आया करो। अब तो यह नियम हो गया, महात्माजी के ध्यान पर बैठने से पूर्व वह बिल्ली का बच्चा पेड़ से बॉधा जाने लगा । एक दिन महात्माजी की मृत्यु हो गयी तो उनका एक प्रिय काबिल शिष्य उनकी गद्दी पर बैठा । वह भी जब ध्यान पर बैठता तो उससे पूर्व बिल्ली का बच्चा पेड़ पर बॉधा जाता । फिर एक दिन तो अनर्थ हो गया, बहुत बड़ी समस्या आ खड़ी हुयी कि बिल्ली ही खत्म हो गयी। सारे शिष्यों की मीटिंग हुयी, सबने विचार विमर्श किया कि बड़े महात्माजी जब तक बिल्ली पेड़ से न बॉधी जाये, तब तक ध्यान पर नहीं बैठते थे। अत: पास के गॉवों से कहीं से भी एक बिल्ली लायी जाये। आखिरकार काफी ढॅूढने के बाद एक बिल्ली मिली, जिसे पेड़ पर बॉधने के बाद महात्माजी ध्यान पर बैठे।
विश्वास मानें, उसके बाद जाने कितनी बिल्लियॉ मर चुकी और न जाने कितने महात्माजी मर चुके। लेकिन आज भी जब तक पेड़ पर बिल्ली न बॉधी जाये, तब तक महात्माजी ध्यान पर नहीं बैठते हैं। कभी उनसे पूछो तो कहते हैं यह तो परम्परा है। हमारे पुराने सारे गुरुजी करते रहे, वे सब गलत तो नहीं हो सकते । कुछ भी हो जाये हम अपनी परम्परा नहीं छोड़ सकते।
यह तो हुयी उन महात्माजी और उनके शिष्यों की बात । पर कहीं न कहीं हम सबने भी एक नहीं; अनेकों ऐसी बिल्लियॉ पाल रखी हैं । कभी गौर किया है इन बिल्लियों पर ?सैकड़ों वर्षो से हम सब ऐसे ही और कुछ अनजाने तथा कुछ चन्द स्वार्थी तत्वों द्वारा निर्मित परम्पराओं के जाल में जकड़े हुए हैं।
ज़रुरत इस बात की है कि हम ऐसी परम्पराओं और अॅधविश्वासों को अब और ना पनपने दें , और अगली बार ऐसी किसी चीज पर यकीन  करने से पहले सोच लें की कहीं हम जाने – अनजाने कोई अन्धविश्वास रुपी बिल्ली तो नहीं पाल रहे ?