Thursday, April 11, 2013

प्राण शक्ति का अभिवर्धन – प्राणायाम


जैसे पंखा चलाने के लिए, बल्ब जलाने के लिए करंट चाहिए, वैसे ही जड़ पदार्थों से बने मानव शरीर को चलाने के लिए एक प्रकार की शक्ति चाहिए। उसका वर्णन हमारे शास्त्रों में प्राण शक्ति के नाम से आता है। प्राण शक्ति को बढ़ाने की विद्या को प्राणायाम कहा जाता है अर्थात प्राणों का विस्तार, अभिवर्धन।
अब से सौ-पचास वर्ष पूर्व वायुमण्डल प्राण-शक्ति से भरपूर था। फसलों के द्वारा, शुद्ध वायु के द्वारा पर्याप्त प्राण जीवों को प्राप्त हो जाता था। परन्तु आज के वैज्ञानिक युग में प्राण तत्व में भारी गिरावट आयी है। रासायनिक खादों व कीटनाशक दवाओं ने खाद्य पदार्थों के प्राण तत्व को कम कर दिया है। विद्युत उपकरणों से पौष्टिक व प्राण तत्व में गिरावट आयी है। वाहनों के धुएं, बढ़ते औद्योगिकरण व मोबाइल के बढ़ते प्रचलन ने वायुमण्डल के प्राण तत्व को बहुत कमजोर कर दिया है।
एक छोटी सी घटना का जिक्र करना यहाँ उचित प्रतीत होता है। एक बार एक गाँव में सास बहू खुली रसोर्इ में रोटी पका रही थी। अचानक दूर खड़े एक छोटे बच्चे ने गर्म दूध का गिलास अपने ऊपर गिरा लिया। दोनों छोड़कर उसको साफ सफार्इ करने लगी। दीवार पर बैठे एक कौए ने मौका देखकर गूँथे हुए आटे में चोंच भरी व थोड़ा सा आटा चोंच में दबाकर ले उड़ा। यह देखकर सास बहुत दुखी हुर्इ। बहु ने सांत्वना देते हुए कहा कि माँ जी परेशान न हों यह आटा गाय को देकर दूसरा गूँथ लेते हैं। इस पर सास बोली, ‘‘बहू मैं परेशान इसलिए नहीं हो रही हूँ कि आटा बेकार हो गया। अपितु मैं दुखी इसलिए हो रही हूँ कि हमारा गूँथा आटा शक्तिहीन है।’’ यह सुनकर बहु को आश्चर्य हुआ व शक्तिहीन कैसे कहा, इसका कारण पूछा। सास ने बताया कि जब वह उसकी (बहू की) उम्र की थी। तब एक बार एक कौए ने गूँथे आटे में चोंच मारी परन्तु कौआ चोंच में आटा दबाकर न ले जा सका क्योंकि आटा इतना मजबूत था कि जोर लगाने पर भी वह नहीं टूट पाया। हमारा आटा तो इतना कमजोर हो गया है कि आराम से कौआ उसको तोड़ ले गया।
कहने का तात्पर्य है कि हर चीज प्राणहीन होती जा रही है। खेती बाड़ी का गलत ढंग, भोजन बनाने का गलत ढंग, खाने पीने का गलत ढंग। हमारी जिह्वा (जीभ) भोजन से प्राण तत्वों को चूसती है। परन्तु हम जल्दी-जल्दी  चबाकर जीभ को प्राणतत्व चूसने का मौका ही नहीं देते। उदाहरण के लिए यदि किसी को दूध अथवा पानी पीना हो तो गटगट करके पी जाते हैं। यहाँ तक कि पानी को भी धीरे-धीरे चूस-चूस कर पीना चाहिए यह भावना करते हुए कि जल का प्राण तत्व जिह्वा के माध्यम से शरीर में अवशोषित हो रहा है। इस प्रकार पिया हुआ पानी बहुत लाभप्रद हो जाता है।
खान-पान के तौर तरीकों को सुधारकर शरीर में प्राण तत्व को बढ़ाया जा सकता है।
श्वास-प्रश्वास के द्वारा भी वातावरण के प्राण तत्व को अवशोषित किया जा सकता है। आमतौर पर लोग इतने भर को ही प्राणायाम कहते हैं। अथवा यहीं तक सीमित रहते हैं। श्वास-प्रश्वास की यह प्रक्रिया प्रात:काल खुले वातावरण में की जाती है। क्योंकि खुले वातावरण में प्राण तत्व अधिक होता है। मोबाइलों के बढ़ते टावर इस प्राण तत्व के दुश्मन प्रतीत होते हैं। उनसे निकलती Electromagnetic rays वातावरण को विषैला बनाती चली जा रही हैं। अत: टावर की 200 मीटर के रेंज में रहना खतरे से खाली नहीं है। प्राण शक्ति का तीसरा बड़ा स्रोत है- सविता देवता अर्थात सूर्य। हमारे पूर्वज, ऋषि-मुनि सूर्योपासना के माध्यम से वातावरण से प्राण शक्ति खींच लिया करते थे। इस प्राण शक्ति से वो सदा जीवन्त व निरोग बने रहते थे। हनुमान जी के गुरु सूर्य थे। सूर्य साधना करते-करते हनुमान जी सूर्य के समान तेजस्वी होते चले गए। उनका तेज देखकर लोगों को लगता जैसे सूर्य उनके भीतर समा गया हो अथवा उन्होंने सूर्य निगल लिया हो। इसलिए कहावत पड़ गयी ‘बाल समय रवि भक्ष लियो’ परन्तु मौलिक रूप से असम्भव जान पड़ता है कि कोर्इ छोटा बच्चा सूर्य को निगल जाए।
सूर्य के प्राण शक्ति के स्त्रोत को कोर्इ छेड़ नहीं सकता। अधिक दोहन के कारण धरती का प्राण शक्ति स्रोत कमजोर हो गया। औद्योगिक क्रान्ति ने वायुमण्डल का प्राण दूषित कर डाला, परन्तु सवितादेव अभी बचे हैं व सभी प्रकार के प्रदुषण से मुक्त है। जिन्हें स्वस्थ रहना है, ताकतवर बनना है उन्हें सूर्य का ध्यान करना होगा। किसी ने ठीक कहा है -
‘नित्य सूर्य का ध्यान करेंगे, अपनी प्रतिभा प्रखर करेंगें।’
आने वाले समय में सूर्य उपासकों की संख्या तेजी से बढ़ेगी। शीघ्र ही पूरे विश्व का ध्यान प्राण शक्ति के इस अकूल भण्डार सविता की ओर जाने वाला है। सविता की शक्ति से जब युग की समस्याओं का समाधान किया जाता है तो इस विज्ञान को सावित्री कहते हैं। सविता की शक्ति का उपयोग जब व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक उन्नति में करता है तो इसको गायत्री कहा जाता है। गायत्री, सावित्री के सर्व-प्राचीन शोध-कर्ता ऋषि विश्वामित्र माने जाते हैं। उन्होंने इस प्रयोग के माध्यम से आसुरी शक्तियों का विनाश किया। रामायण में इसको बला-अतिबला विद्या के नाम से पुकारा गया है। कुछ दशकों पूर्व इस महान विज्ञान के प्रणेता श्री अरविन्द व श्री राम आचार्य (गायत्री परिवार के संस्थापक) हुए हैं। श्री अरविन्द की लिखी “सावित्री महाकाव्य” अपने आप में एक विलक्षण कृति है। श्री अरविन्द एक विलक्षण प्रतिभा के धनी थी। नवम्बर, 1926 से वह पाण्डिचेरी में एकान्त में रहते थे। कभी-कभी ही किसी से मिलते थे। एक बार नेता जी सुभाष चन्द्र बोस उनसे मिलने गए। नेता जी ने अपनी क्रान्तिकारी योजनाएं उनके समक्ष रखी व सहयोग का निवेदन किया। श्री अरविन्द बोले - इतनी साधना वो कर चुके हैं कि देश आजाद हो जाए। उनका जवाब था- जब चाहें वो देश को आजाद करा लेंगे। इस पर उनके शिष्यों ने कहा- देश को आजादी आपके (श्री अरविन्द) जन्मदिन पर मिलनी चाहिए। श्री अरविन्द ने सहमति में अपना सिर हिला दिया। नेता जी यह सब समझ न सके व एक प्रकार के पागलपन अथवा कपोल-कल्पनाएं मानकर बुरा-सा मुँह बनाकर (नेताजी ने हुँह कहकर मुँह फेरा) वहाँ से बाहर आने लगे। श्री अरविन्द ने उन्हें रोककर कहा कि तुम एक ऐसी टीम तैयार करो जो आजादी के बाद देश को सम्भाले। श्री अरविन्द ने कहा कि आजादी के बाद देश का घोर नैतिक पतन वो अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर चिन्तित हैं। आजादी के बाद राष्ट्र की बागडोर धीरे-धीरे स्वार्थी व भ्रष्ट लोगों के हाथों में जाती उन्हें दिखार्इ दे रही है।
उस समय तो नेताजी मुँह फेरकर वहाँ से निकल लिए परन्तु बाद में उन्हें अपनी गलती का भारी पश्चाताप हुआ। आजादी के बाद साधना व सन्यास को अपना लक्ष्य बनाकर वो सक्रिय राजनीति से दूर हो गए।
जैसे श्री अरविन्द अपनी सावित्री-साधना से देश के आजाद कराने में संकल्पित थे, वैसे ही श्री राम आचार्य सूर्य विज्ञान के सिद्ध पुरुष होकर नवीन सृष्टि की रचना के लिए प्रयासरत रहे। अपने सावित्री विज्ञान के बल पर उन्होंने नवयुग की घोषणा की।
प्राण-शक्ति अभिवर्धन पर लिखते-लिखते हम गायत्री व सावित्री के उच्चस्तरीय प्रयोगों की ओर मुड़ गए। संक्षेप में, प्राण-शक्ति अभिवर्धन के निम्न नियम हैं :-
1- प्रात: काल सूर्योदय से पूर्व जागरण, स्नान, भ्रमण, सूर्य प्रणाम, सूर्य ध्यान, सूर्य नमस्कार, आज्ञा-चक्र पर उगते हुए सूर्य का ध्यान करें (दस मिनट से आधा घण्टे तक)।
2- हल्का व्यायाम, गहरा श्वास-प्रश्वास, अनुलोम विलोम।
3- मन्त्र जप (गायत्री, महामृत्युंजय अथवा सदगृरु द्वारा दिया)।
4- दीपक जलाने से प्राणशक्ति बढ़ती है। यज्ञ-हवन से प्राणशक्ति बढ़ती है।
5- कामुक वातावरण से दूर रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करें।
6- भोजन सुपाच्य, हल्का, कम पका हुआ हो।
7- निस्वार्थ सेवा, निष्काम कर्म योग प्राण शक्ति बढ़ाता है।
8- मन को उच्च विचारों से सदा ओत-प्रोत रखें।
9- देश-भक्ति, ईश्वर-भक्ति को जीवन में स्थान दें।
10- स्वाध्याय अर्थात श्रेष्ठ पुस्तकों के अध्ययन की आदत डालें।
11- ईर्ष्या, द्वेष, भय, महत्वाकांक्षाओं से बचें।
12- गौ-सेवा से प्राणशक्ति बढ़ती है। गौशालाओं में सेवा करें।
13- निंदा-चुगली, पर दोष दर्शन में रुचि न लें। घटिया समाचार पत्र, घटिया सीरियल व अश्लील दृश्यों से सदा दूरी बनाने का प्रयास करें।
14- तीर्थ सेवन करें। जहाँ वातावरण में प्राणशक्ति अधिक हो, ऐसी जगह पर समय लगाएं। जिन व्यक्तियों के पास उच्च प्राण हों उनका संग करें। इससे व्यक्ति का प्राण स्वत: उर्ध्वगामी होता है व विकसित होता है।
15- सबके प्रति शुभ कामना व मंगल भावना रखें। क्षमा करना सीखें। व्यर्थ की बातो को मन में न उलझाये रखें। पुरानी फाइलें बंद करें।
16- खुलकर हँसने का अभ्यास करें। रात को सोने से पूर्व प्रार्थना एवं ईश्वर का धन्यवाद करो।
17- अपने को कर्ता भाव से मुक्त करें। अपने स्थान पर ईश्वर को कर्ता मानकर चिंतामुक्त रहें।
18- जीवन बहुत छोटा है। इसे व्यर्थ की चर्चा, चिंता व चेष्टा में अथवा अपने प्रति हुए अनुचित व्यवहार की दुखद यादो मे खर्च न होने दे।
19- मेरा यहाँ कुछ नहीं और मुझे कुछ नहीं चाहिए - यह जो सीख लेता है उसको संसार में कभी भय नहीं रहता और उसे कोर्इ परतन्त्र नहीं कर सकता।
20- क्रोध विवेक को, अहंकार मन को और लोभ इन्सानियत को खाता है। चिन्ता आयु को, रिश्वत इंसाफ को व वासना आदमी को खा जाती है।
21- हम अपने सत्य की पूजा करें - अच्छी बात है, करनी भी चाहिए, परन्तु दूसरों के विश्वास  का भी सम्मान करे, यह भी आवश्यक है।
22-  एक बार क्रोध करने पर शरीर में खून की 8 बूँदें कम हो जाती हैं, जबकि 8 बूँद रक्त के निर्माण में 5 दिन लगते हैं। अत: क्रोध न करें। क्रोध की एक ही औषधि है - मौन व्रत। क्रोध मूर्खता से प्रारम्भ होकर पश्चाताप पर समाप्त होता है।
23- नित्य अन्तर्मुख, प्रसन्न, आनन्दित व ईश्वर के सनातन सपूत होकर कार्य करो - न कि खिन्न, अधीर और उद्विग्न होकर।
24- जीवन में सरल, सहज और सजग रहो। जीवन में व्यस्त रहो, मस्त रहो। पर अस्त-व्यस्त न रहो।

समस्या कहीं तो समाधान कहीं


यह लेख वतस्तुत: भारत की जनता के लिए लिखा गया है। भारत की जनता का रहन-सहन, चाल-चलन, चिन्तन आचरण सब कुछ बिगड़ता जा रहा है। उन्होंने अपने पुरातन सूत्रों को ताक पर रखकर पश्चिम के खराब तौर-तरीकों को अपनाना प्रारम्भ कर दिया है। पश्चिम में अधिकांश जगह जलवायु ठण्डी है, चेतना की स्थिति कम संवेदनशील है। यदि हम उसका अन्धानुकरण करेंगे तो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के समान होगा।
व्यक्ति दिनोंदिन समस्याओं से ग्रस्त होता जा रहा है परन्तु समाधान ढूँढता है ज्योतिषियों व पण्डितों के पास। एक बार एक महिला अपनी बेटी को लेकर मेरे पास आयी। बेटी को कुछ नर्वस सिस्टम से सम्बन्धित रोग परेशान कर रहा था। कहने लगी कि हमने सब चिकित्सकों, ज्योतिषियों से इलाज कराया पर रोग काबू नहीं आया। मैं लड़की व माँ से उनकी रुचियों व दिनचर्या के बारे में छानबीन करने लगा। एक घण्टे के भीतर लड़की के पास कर्इ फोनकाल आयी। मैंने पूछा कि वह कितने मोबाइल रखती है उसने उतर दिया - चार। उसकी हर जेब में एक मोबाइल था। उसने बताया कि उसे जन्मदिन पर ये मोबाइल उसके सम्बन्धियों ने भेंट दिये हैं।
मैंने उसे बड़े सरल से पाँच समाधान दिए।
                     1.         सर्वप्रथम मोबाइल एक वर्ष के लिए कोर्इ न रखें।
                     2.         प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें व उगते सूर्य को प्रणाम करें।
                     3.         प्रतिदिन आधा घण्टा आसन प्राणायाम ध्यान करें।
                     4.         अच्छी पुस्तकों का स्वाध्याय करें।
                     5.         पन्द्रह दिन में एक बार अस्वाद-व्रत करें।
ऐसा करने वह तीन माह में स्वस्थ हो गयी। उसकी माता जी हजारों रूपए व समय बरबाद कर चुकी थी। अनेक प्रकार के ग्रह-शान्ति व ज्योतिष उपाय कर चुकी थी पर समस्या सुलझ नहीं रही थी।
लेखक ज्योतिष व कर्मकाण्ड का विरोधी नहीं है। परन्तु कठिनार्इ यह है कि हम लोग अनेक प्रकार के एच्छिक व अनैच्छिक विषों के शिकार बनते चले जा रहे हैं जो हमारी समस्याओं के मूलभूत कारण हैं। यदि हमने इन कारणों को दूर न किया तो हमारी समस्याएँ बढ़ती चली जाएंगी।
क्या कोर्इ ज्योतिष कर्मकाण्ड विष के प्रभाव को समाप्त करने में सक्षम है। हर विद्या की अपनी एक सीमा होती है। उस सीमा के भीतर ही उससे सहायता ली जा सकती है। सोमनाथ के मन्दिर पर गजनवी के आक्रमण के समय तान्त्रिकों ने आश्वासन दिया कि उनका तन्त्र गजनवी की सेना का सामना कर लेगा, जो कि मूर्खतापूर्ण बात थी। तन्त्र से दो चार दस व्यक्तियों का सामना हो सकता था, हजारों की सेना का नहीं।
हमें हमारी समस्याओं से निजात पाने के लिए अपनी संस्कृति के प्रति प्रेम पैदा करना होगा। उनके मौलिक सूत्रों को जीवन में अपनाना होगा। विशेषकर ब्रह्मचर्य आश्रम की दृढ़ता व महता पर ध्यान देना होगा। अन्यथा व्यक्ति के जीवन को मजबूत आधार कहाँ से मिल पाएगा। विद्यालयों, महाविद्यालयों में लड़के-लड़कियों के बीच बढ़ती घनिष्टता को रोकना आवश्यक है। लड़कों व लड़कियों के Sections अलग-अलग रखने चाहिएं जिससे उनके interactions कम से कम हो सकें। Co-education वाले सिस्टम को रोकने का प्रयास करना चाहिए। लड़कियों के ड्रेसस को अनुशासित करने की बहुत आवश्यकता है। आज तकनीकी कॉलेजों में लड़कियाँ पार्टियों में खुले आम ​ड्रिंक करने लगी हैं। मात्र 10-12 वर्ष के अन्दर-अन्दर नारी जाति ने सब मर्यादाओं की धज्जियाँ उड़ाकर रख दी हैं।
उनकी मौलिक प्रवृति ही बदलती जा रही है। लज्जा, मर्यादा व शालीनता नारी के आभूषण माने जाते रहे हैं। परन्तु देखा-देखी यह सब कुछ पिछड़ेपन के प्रतीक समझे जाने लगे हैं। कैसे नारी जाति अपनी सन्तानों को श्रेष्ठ चरित्र दे पाएगी यह ठीक प्रत्येक संस्कृति-प्रेमी के भीतर कचोटती है। अपनी संस्कृति, अपने राष्ट्र को प्रेम करने वाले लोग एकजुट होकर कुछ कठोर कदम उठाकर समाज को अनुशासित करने का प्रयास करें, तभी समस्याओं का समाधान हो पाएगा। यदि हर मिशन अपने अहं व अपने स्वार्थ में ही जिएगा तो उसमें व आम आदमी में क्या अन्तर है। जो संवेदनशील है। सनातन धर्म से प्यार करते हैं, भारत माँ की पीड़ा को समझते हैं ऊँचे पदों पर बैठे हैं ऐसे व्यक्ति एकजुट होकर कुछ सामूहिक निर्णय लें। भले ही उससे उन्हें उनके पदों को त्याग करना पड़े। जब तक त्याग व बलिदान का भाव हममें नही आएगा, तब तक समस्याओं का समाधान कहाँ निकलेगा।
                                    जय भारत! जय हिन्द!

शराब व सोमरस में अन्तर

कितने ही टी.वी. सीरियलों में दिखाया जाता है कि देवता इन्द्र की सभा में सुन्दर-सुन्दर अप्सराएँ सोमरस का वितरण करती हैं व सभी देव उसका आनन्द लेते हैं। इस सोम रस को लोग शराब बताया करते हैं। आजकल अपनी बुरी लत को सही सिद्ध करने के लिए लोग अपनी संस्कृति को भी कलंकित करने से नहीं चूकते।
हमारे धर्म ग्रन्थों में जिस सोमरस की बात की गर्इ है वह कोर्इ शराब नहीं थी। वह एक प्रकार का औषधीय गुणों से भरपूर पेय पदार्थ था। इसमें सोम लता एक मुख्य घटक होता था। जिसका वर्णन 24 प्रकार के ग्रंथों में मिलता है।
औषधि: सोम: सुनोते: पदेनमभिशुण्वन्ति। निरुक्त शास्त्र  (11-2-2)
अर्थात सोम एक औषधि है जिसको कूट पीस कर इसका रस निकालते हैं। ये लताएं पर्वत श्रृंखलाओं में पार्इ जाती हैं। राजस्थान के अर्बुद, उड़ीसा के महेन्द्र गिरी, विन्ध्याचल, मलय आदि अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी कोमल लताएं उगती हैं।
सोम को गाय के दूध में मिलाने पर ‘गवशिरम्’ दही में ‘दध्यशिरम्’ बनता है। शहद अथवा घी के साथ भी किया जाता था।
कुछ लोगों का कथन है कि डाक्टर लोग थोड़ा बहुत शराब सेहत के लिए लाभप्रद बताते हैं। शराब के विषय में बड़ा गहन शोध करने वाले एक पाश्चात्य चिकित्सक हुए हैं - अलैक्जेण्डर एलस्टर। उनके अनुसार - ‘यह बात कोर्इ महत्व नहीं रखती कि शराब कम पी जा रही है या ज्यादा; रोज़ पी जा रही है या कभी-कभी! जहर तो जहर ही है - बूँद भर हो या गिलास भर! और जिसको इस जहर का एक बार चस्का लग गया, उसकी प्यास बढ़ती ही जाती है। सेहत के नाम पर थोड़ी पीने वाले आगे चलकर पियक्कड़ बन जाते हैं। किसी ने सुन्दर कहा - ‘जिसने स्वास्थ्य के लिए पहली घूँट भरी, वो मज़े के लिए दूसरी, बेशर्मी के लिए तीसरी और पागलपन के लिए चौथी घूँट भरने को मजबूर हो गया।’
इसी बात से मुझे महान साहित्यकार टॉलस्टाय द्वारा भी कही एक बात याद आर्इ। टॉलस्टाय भारतीय दर्शन और महात्मा गांधी से बहुत प्रभावित थे। अपनी कहानी में वह लिखते हैं - शराब का पहला दौर लोमड़ी की तरह मिथ्याभाषी बना देता है। दूसरा दौर भेड़िये की तरह झगड़ालू व उन्मादी बना देता है। तीसरा दौर सूअर के समान मदहोश और अक्षम बना देता है। गंदगी और पतन की ओर ले जाता है।’ इतना कहकर अंत में टॉलस्टाय सवाल उठाते हैं - ‘क्या शराब इन्हीं लोमड़ियों, भेड़ियों और सुअरों के रक्त से बनी है?’ सोचो! क्या पशु बनाने वाली यह शराब औषधि हो सकती है?
ऋग्वेद में शराब की घोर निंदा करते हुए कहा गया-
हृत्सु पीतासो युध्यन्ते दुर्मदासो न सुरायाम्।
अर्थात सुरापान करने या नशीले पदार्थों को पीने वाले अक्सर युद्ध, मार-पिटार्इ या उत्पात मचाया करते हैं।
इससे बिल्कुल विपरीत था, हमारे वैद्कि ऋषियों का चमत्कारी आविष्कार - ‘सोम-रस’! वह एक पूर्ण सात्त्विक, अत्यंत बलवर्धक, आयुवर्धक व भोजन-विष के प्रभाव को नष्ट करने वाली औषधि थी। ऋग्वेद (6-47-1) का कहना है-
स्वादुष्किलायं मधुमां उतायम्, तीव्र: किलायं रसवां उतायम।
उतोन्वस्य पपिवांसमिन्द्रम, न कश्चन सहत आहवेषु।।
अर्थात सोम बड़ी स्वादिष्ट है, मधुर है, रसीली है। इसका पान करने वाला बलशाली हो जाता है। वह अपराजेय बन जाता है।
शास्त्रों में सोमरस लौकिक अर्थ में एक बलवर्धक पेय माना गया है। परन्तु इसका एक पारलौकिक अर्थ भी देखने को मिलता है। साधना की ऊँची अवस्था में व्यक्ति के भीतर एक प्रकार का रस उत्पन्न होता है उसके केवल ज्ञानीजन ही जान सकते हैं अन्य कोर्इ नहीं -
सोमं मन्यते पपिवान् यत् संविषन्त्योषधिम्।
                         सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति कश्चन।। (ऋग्वेद-10-85-3)
अर्थात बहुत से लोग मानते हैं कि मात्र औषधि रूप में जो लेते हैं वही सोम है ऐसा नहीं है। एक सोमरस हमारे भीतर भी है जो अमृत स्वरूप परम तत्व है जिसको खाया पिया नहीं जाता केवल ज्ञानियों द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।

Friday, April 5, 2013

चेतना का स्तर ऊँचा उठाकर कर दिया समाधान!


एक बार स्वामी रामकृश्ण ​मिशन के सदस्यों में ​विभिन्न आध्यात्मिक मत मतान्तरों व गतिविधियों को लेकर वाद विवाद छिड़ गया। विवाद इतना बढ़ा कि  मठ में आगन्तुकों से लेकर हर कोई परेशान होने लगा। स्वामी रामकृष्ण परमहंस शरीर छोड़ चुके थे व स्वामी ​ विवेकानन्द विदेश प्रवास पर थे। अन्त में स्वामी ब्रह्मानन्द (राखाल) जी की अन्तचेर्तना में एक युक्ति सूझी। सबको सन्देश दिया गया कि राखाल सन्ध्या समय सबको ध्यान कराएँगे।
      स्वामी ब्रह्मानन्द जी के नेतृत्व में सांयकालीन सभी सदस्य ध्यान के ​लिए एकत्र हुए। स्वामी जी की ध्यान साधना से सभी अन्तमुर्खी हो गए व कुछ की चेतना उच्च स्तर पर पहुँचने लगी। चेतना के उच्च स्तर पर वो लोग अपनी गलतियों व मूखर्ताओं को सोच-सोचकर बड़े शर्मिंदा होने लगे। कुछ तो अपने अपशब्दों के लिए दूसरों से क्षमा माँगने लगे व कुछ गले मिलकर फूट-फूट कर रोने लगे। शीघ्र ही चारों ओर प्रेम, अस्मीयता का वातावरण ​ दिखने लगा। इस प्रकार स्वामी जी ने लोगों की चेतना को ऊँचा उठाकर उनके भीतर व्याप्त मनमुटाव समाप्त किया ।
      मानव जीवन, परिवार व समाज में अनेक प्रकार के झगड़े झन्झट, वाद-​विवाद चलते रहते हैं। परन्तु यदि लोगों की चेतना को ऊँचा उठाने का प्रचार किया जाए तो बहुत प्रकार की समस्याओं का स्वत: ही समाधान हो जाएगा। अतिमानस क्षमताओं से सम्पन्न कुछ व्यक्ति यह कहने लगे हैं ​कि धरती तेजी से एक नए आयाम (New Dimension) में प्रवेश करने जा रही है। यह नया आयाम जन चेतना को ऊँचा उठाने का देवात्मा हिमालय का एक प्रयास है ​जिससे युग की समस्याओं को ​बिना विनाश के हल ​किया जा सके। साधना की मानसिकता वाले व्यक्ति शीघ्र ही इस प्रक्रिया का लाभ उठाकर अपनी चेतना से परमात्म चेतना को जोड़ने में सफल हो सकेगें व अल्प प्रयास में ही शांति, शक्ति आनन्द के केन्द्र बन जाएंगें।
          यदि हम ध्यान का नियमित अभ्यास करें व चेतना को उच्च मनोभूमि (विज्ञानमय, आनंदमय कोष ) की ओर चढ़ाएं  तो हम न केवल अपने दैनिक जीवन की समस्याओं को सुलझाने मे सक्षम होंगे, अपितु अपनी प्रतिभा का बहुमुखी विकास भी कर सकते हैं।  इससे आगे बढ़ने पर प्रसुप्त शक्तियों के केंद्र जाग्रत कर सिद्ध पुरुषों की श्रेणी मे भी जा सकते हैं ।

Monday, April 1, 2013

सुविचार

तुम औरों का भला करना सीखो, तो तभी तुम्हारा जन्म लेना सफल हो  सकता है, वरना तुम्हारा अस्तित्व किसी काम का नहीं !
                                                                      -भगवान देवात्मा

यह सही है कि इंसान को गुस्सा नहीं करना चाहिए पर जो इंसान ज्यादा गुस्सा करते है वो प्यार भी उतना अधिक करते है। क्योकि लाल रंग गुस्से व खतरे का प्रतीक है तो गुलाब के समान गहरे प्यार की भी निशानी है।
       मनुष्य सुबह से शाम तक काम करके इतना नहीं थकता, जितना क्रोध या चिंता से एक घंटे में थक जाता हैं।

     देववाणी  के साथ जुड़ने के बाद कोई आत्मा जहाँ तक  उच्च प्रभावों को ग्रहण करता है , वहाँ तक उसके भीतर वह नई ज्योति प्रकट होती है कि जिससे वह आत्मिक जीवन की असलियत और उसके नियमों को ज्यादा से ज्यादा देखने और पहचानने के योग्य बनता जाता है !

कितना कम जानते हैं हम क्या है ! और उससे भी कितना कम जानते हैं हम कि हम क्या हो सकते हैं !
                                                                       - बायरन

हम नेचर में कोई क्रिया करके उसके फल से बच नहीं सकते ! यह फल दो ही प्रकार के हो सकते हैं, शुभकर या अशुभकर !                                                                    -भगवान देवात्मा      

जिन्दगी में मुश्किले तमाम हैं, फिर भी इन होंठो पर मुस्कान हैं।
क्योकिं जीना जब हर हाल में हैं, तो फिर मुस्कुराकर ही जीने में क्या नुकसान हैं।।

खुबसूरत तस्वीरे नेगेटिव से तैयार होती हैं और वो भी अँधेरे कमरे में; इसलिए जब भी आपके जीवन में अंधकार नज़र आए, तो समझ लीजिएगा कि ईश्वर आपके भविष्य की सुन्दर सी तस्वीर का निर्माण कर रहा हैं।

FEAR
Forget Everything And Run
            or
Face Everything And Rise

The choice is Yours!

अहंकार हमारे उत्थान में बडी दीवार खडी कर देता है। सेवा भाव का अभ्यास करते रहने से इसकी अंतर से कटौति होती चली जाती हैं।
दण्ड देने का अधिकार उसे है, जो प्रेम करता हैं। 
विनयी व्यक्ति खुद ही नहीं झुकता, बल्कि संसार को भी झुका लेता हैं, जो झुकना जानता हैं, दुनिया उसे उठाती हैं।

Thursday, March 28, 2013

आश्चर्य किन्तु सत्य-शुभ कर्मों की शक्ति (तीनों योगो का समन्वय )

एक बार लेखक पी. एच. ड़ी. का कार्य करते-करते कंधे के दर्द से पीड़ित हो गया। सांय काल थोड़ी निराश मुद्रा में चुपचाप लेटा हुआ था। उस समय देव समाज मिशन के एक 80 वर्ष के वृद्ध कार्यकर्ता लेखक से मिलने आये व उनका हाल चाल पूछा। लेखक की इस स्थिति से वह दु:खी हुए वे उसके कंधे पर हाथ रखकर तीन बार शुभ हो- शुभ हो कहा। उसके बाद एक छोटी सी प्रार्थना गायी। लेखक को कंधे के दर्द से तुरन्त राहत मिली व उसके मन में प्रसन्नता की लहर दौड़ गर्इ। आश्चर्य की बात यह है कि देव समाज मिशन के लोग ईश्वर का अस्तित्व नहीं मानते। केवल शुभ कर्मों को करते-करते उनकी आत्मा इतनी शक्तिशाली हो जाती है कि उनके संकल्प से रोग दूर किये जा सकते हैं । तथ्य यह है कि यह संसार कर्मप्रधान है।
कर्मप्रधान विश्व करि राखा , जो जस  करर्इ तस फलु चाखा।
यदि लगातार व्यक्ति शुभ कर्मो को करता रहे व अपने संगी साथियों के लिए श्रेष्ठ  भावना रखे तो भी वह आत्मबल सम्पन्न महापुरूष बन सकता है। तीन योगों- कर्म योग, ज्ञान योग व भक्ति योग में कर्म योग को प्रधानता दी गर्इ है। यदि व्यक्ति निष्काम कर्म योग करता है तभी उसकी आत्मिक उन्नति सम्भव है, मात्र ज्ञान व भक्ति योग से नहीं।
पाण्डवों के साथ स्वयं कृष्ण थे, परन्तु उनसे ध्युत क्रीड़ा की गलती हो गर्इ जिसका बड़ा भंयकर परिणाम उन्हें भुगतना पड़ा। कर्म योगी निस्वार्थ कर्म व शुभ कर्मो में स्वयं को खपा देता है। ज्ञान योगी वैराग्य से पूर्ण होता चला जाता है। भक्ति योग साधक के भीतर प्रेम की भावना भरता रहता है। ध्यान योग व्यक्ति को अन्तर्मुखी बनाकर आत्म चिन्तन सिखाता है।
कर्इ बार व्यक्ति उलझा रहता है कि क्या बड़ा क्या छोटा ? लेखक के मतानुसार सभी का अपना-अपना महत्व है। सुर्इ चाकू तलवार सबकी अपनी-अपनी उपयोगिता है। विवेकी पुरूष समुचित स्थान पर वस्तु का उचित उपयोग जानता है। ऐसे ही कुशल साधक सभी योगों को अपनी उन्नति के लिए प्रयोग करता है। सामान्य तौर पर उन्नति का प्रारम्भ कर्म योग से हौता है जब शुभ कर्मो द्वारा प्रारब्ध का बोझ हल्का हो जाये तभी ज्ञान योग द्वारा वैराग्य आ पाता है। वैराग्य दृढ़ होने पर ही भक्ति योग द्वारा प्रेम रस उत्पन्न होता है। यदि वैराग्य न आये तो इसी प्रेम रस  के मोह अथवा वासना में परिवर्तित होते देर नही लगती। सभी मार्ग एक दूसरे के पूरक है। यदि कर्म योग सधेगा तो बुद्धि निर्मल होगी जिससे ज्ञान योग आयेगा। यदि ज्ञान आया तो व्यक्ति संसार विरक्त होगा वह अपने जीवन लक्ष्य की ओर बढे़गा ऐसी स्थिति में अनासक्त आत्मा प्रभु कृपा व प्रभु प्रेम का दीदार करेगी। व्यक्ति निश्चिन्त होकर जो मार्ग पसन्द आये उस पर आगे बढ़ता रहे। धीरे-धीरे निस्वार्थ कर्म, वैराग्य व प्रेम उसकी आत्मा के आभूषण बनते जाएंगे व जीवन आन्नद व शांति से भरपूर हो जायेगा।