Tuesday, September 17, 2013

अंतर जगत और वाह्य जगत

ध्यान के क्षणों में गुरुदेव की वाणी ने कहा देखो, जैसा बाहरी जगत है वैसा ही एक अंर्तजगत भी है। एक आत्मा का संसार है, एक नाम रुप का संसार है। और वत्स, यदि बाहरी जगत में आश्चर्य है, रहस्य है, विशालता है, सौंदर्य है, महान गौरव है तो अंर्तजगत में भी अमेय महानता और शक्ति, अवर्णनीय आंनद तथा शान्ति और सत्य का अचल आधार है। हे वत्स! बाहरी जगत अंर्तजगत का आभास मात्र है, और इस अंर्तजगत में तुम्हारा सत्यस्वरुप स्थित है। वहाँ तुम शाश्वतता में जीते हो जब कि बाहरी जगत समय की सीमा में ही आबद्ध है। वहाँ अनन्त और अपरिमेय आनन्द है, जबकि बाहरी जगत में संवेदनायें, सुख तथा दु:ख से जुड़ी हुर्इ है। वहाँ भी वेदना है किंतु अहो, कितनी आनंददायी वेदना है! सत्य का पूर्णत: साक्षात्कार न कर पाने के विरह की अलौकिक वेदना! और ऐसी वेदना विपुल आनंद का पथ है।

आओ, अपनी वृति को इस अंर्तजगत की ओर प्रस्तुत करो। आओ, मेरे प्रति उत्कट प्रेम के पंखों से उड़कर आओ। गुरु और ​शिष्य के संबंध से अधिक घनिष्ट और भी कोर्इ संबंध है क्या? हे वत्स, मौन! अनिर्वचनीयता!! यही प्रेम का लक्षण है। तथा मौन की गहन गहराइयों में भगवान विराजमान हैं। सभी बाहरी झंझटों का छोड़ों। जहाँ भी मैं जाउँ, तुम आओ। मैं जो बनूँ, तुम भी वही बनो। भगवत पवित्रता के लिए भक्तों के हृदय विभिन्न मंदिर है, जहाँ सुगंधित धूप की तरह विचार ईश्वर की ओर उठते है। तुम जो कुछ भी करते हो उसका अध्यात्मीकरण कर लो। रुप अरुप सभी में ब्रहा का, देवत्व का दर्शन करो। ईश्वर से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है।

अंर्तजगत की अंतरतम गुहा में जिसमें व्यक्ति उत्कट प्रेम या कातर प्रार्थना द्वारा प्रविष्ट होता है, वहाँ अनुभूति में आध्यात्मिक जगत के ब्रह्माण्ड के बाद ब्रह्माण्ड भरे हुये है तथा ईश्वर सर्वदा सन्निकट है। वह भौतिक अर्थ में निकट नहीं किंतु आध्यात्मिक अर्थ में हमारी आत्मा के भी आत्मा के रुप में। वे हमारी आत्मा के सार तत्त्व है। वे हमारे सभी विचारों तथा अंतरतम में छिपे अति गोपन आकांक्षाओं के भी ज्ञाता है। स्वंय को समर्पित कर दो। प्रेम के लिए प्रेम! जितना अधिक तुम अंतर में प्रविष्ट करते हो उतना ही तुम मेरे निकट आते हो क्योंकि मैं अंतरतम का निवासी हूँ। क्योंकि मैं ही वह चुम्बक हूँ जो तुम्हारी अनुभूति तथा आत्मा की महीमा को प्रगट करता है। मैं आत्मा हूँ, विचार या रुप से अछूती आत्मा! मैं अभेद, अविनश्वर आत्मा हूँ। मैं परमात्मा हूँ। ब्रहा हूँ।

गुरुदेव की वाणी कितनी आश्चर्यजनक है! मेरी आत्मा पुकार उठती है। हे महाभाग, आप स्वयं ईश्वर है। आप जिसका उपदेश देते है आप स्वंय वही है। आप विश्व की आत्मा है। आप सर्वस्व है। यदपि आपकी माया विविध रुप का आभास देती है तथापि आप स्वंय एकम् अद्वितीयम् हैं। आपके एकत्व की महिमा महान् है, क्योंकि आत्मा एक है। आत्मा सारभूत है जिसमें अंश या विभाग नहीं है। आत्मा एक ही ज्योति है जो विभिन्न रंगों के काँचों से देखी जा रही है। हे गुरुदेव, मुझे कृपया उस जीवन में ले चलिये जो आपका जीवन है। 

आप ब्रह्मा है! आप विष्णु हैं! आप सदाशिव है! आप ब्रह्मा है! परम् ब्रह्मा है!!
              हर हर बम बम महादेव!

उसके पश्चात मेरी आत्मा मानो सातवें आसमान में पहुँच गर्इ। और मैंने मनुष्य की दिव्यता के दर्शन किए। मनुष्य की दुर्बलता के महत्व को भी समझा। मैने देखा वहाँ सब कुछ दिव्य है। तथा इस दिव्य ज्योति के भीतर मैने देखा कि इस अंर्तजगत में अनुभूति के पर्वत पर गुरुदेव मानो दूसरे कृष्ण हो कर विराजमान हैं। गहन! समय से गहन! आकाश से भी अधिक सर्वव्यापी हैं ध्यान राज्य का यह अंतर्जगत। वहाँ अधंकार हो ही नहीं सकता। क्योंकि वहाँ केवल ज्योति है। वहाँ अज्ञान हो ही नहीं सकता क्योंकि वहाँ ज्ञान है। वहाँ मृत्यु का वश नहीं चलता। अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगा नहीं सकता, वायु सुखा नहीं सकती। वह उस पुराण पुरुष का राज्य है। जीवन की सभी छलनाओं के पार असीम और कूटस्थ है।

और उस महिमा में अंतरतम से बोलते हुये गुरुकी वाणी ने कहा वत्स! यह तुम्हारी विरासत है। अनन्तशक्ति तुम्हारी है। जब सभी शक्ति तुम्हारी है तब क्या तुम दुर्बल हो सकते हो। इन्द्रियों के दिखावे से तुम संतुष्ट नहीं रह सकते। इस ब्राहा जगत् की तड़क भड़क के पीछे मृत्यु तथा विस्मृति ही है। जब मृत्यु आती है यह शरीर शव हो जाता है किंतु आत्मा सदैव मुक्त है। वह अशरीरी है। साक्षी है, क्योंकि शरीरों का नाश हो सकता है किंतु आत्मा अनश्वर है।

मेरी आत्मा ने गुरुदेव से निवेदन किया-महाभाग, कितना अदभुत है! वहाँ मृत्यु नहीं है! और तब गुरुदेव ने कहा वत्स! वहाँ वासनासंभूत जीवन भी नहीं हैं क्योंकि लोग जिसके भूखे है वह संसार कीच ही तो है। दूषित वासनाओं में आनंद लेनेवाले लोग कीचड़ में सने शरीर में आनंद से लोटने वाले बैल के समान ही तो है, उनके लिए यह पथ बहुत लम्बा है क्योंकि इच्छाओं के ताने बाने से बनी माया उनके पथ में आड़े आती है। तुम उसके परे जाओ। तुम्हारा समय आएगा। उपर की ओर देखो। वहाँ अनन्तज्योति है। उपर देखो और वह ज्योति तुम्हारे मन की अपारदर्शिता को अवश्य भेद जायेगी।

इन शब्दों को सुनकर मुझे स्मरण हो आया कि चैतन्य ही आत्मा का स्वरुप है तथा मुक्ति ही लक्ष्य है। और वह लक्ष्य यहाँ और अभी है, मरणोपरान्त नहीं, तथा जीवात्मा का भाग्य निश्चित है और वह है आत्म-साक्षात्कार, जहाँ समय मिट जाता है। जहाँ भौतिक और मर्त्य चेतना विलुप्त हो जाती है। जहाँ ज्योति जो कि जीवन है, सत्य है, शांति है, वह प्रकाशित होती हैं। जहाँ सभी स्वप्न समाप्त हो जाते है, वासनायें असीम अनुभूति में विलीन हो जाती है। जो कि महत् विस्तार का क्षेत्र है। उस अनन्त की अनुभूति के लिए, समय का अवसान कर देने के लिए, इन्द्रिय प्रभूत कल्पनाओं की समाप्ति के लिए, अनंत की मुक्ति के लिए ही यह अनुभूति है।   

हरि ओम् तत् सत्   with thanks from  समाधि के सोपान    --एफ जे अलेकजेन्डर
published by  - adwait ashram 

जप व ध्यान का समन्वय

भारतीय साधनाओं में जप योग अपना विशिष्ट स्थान रखता है। अधिकतर धर्मो व मठो के लोग माला लिए किसी न किसी मंत्र का जप करते मिलते हैं। जप व ध्यान की समान्वित विधि (अर्थात दोनों एक साथ) मानवीय चेतना को विकार रहित बनाकर ऊचांर्इयों तक सरलता पूर्वक ले जाती हैं। इस प्रक्रिया में ध्यान अपने आराध्य के पूर्ण चित्र या शरीर के किसी विशेष भाग पर अथवा मंत्र के अर्थ या शब्दों पर किया जाता है। मंत्र का अर्थ है मनन करने से त्राण दिलाने वाला, अर्थात जिसके मनन से दुख, कष्ट क्लेश से व्यक्ति मुक्त हो उसे मंत्र कहा जाता हैं। शास्त्र कहते है कि शब्द में बहुत शक्ति होती है और मंत्र स्वर की लहरियाँ सम्पूर्ण आकाश मण्डल में प्रवाहित होकर साधक के तीनों शरीरों (स्थूल, सूक्ष्म, व कारण) पर प्रभाव डालती है। यदि व्यक्ति मंत्र के अर्थ को जानता है व भावना पूर्वक उस अर्थ को ध्यान में रखते हुए जप करता है तो उसका प्रभाव अधिक होता हैं परंतु यदि व्यक्ति मंत्र के अर्थ से अनजान है तब भी मात्र यान्त्रिक ढंग से जप करने पर भी वैज्ञानिक आधारों पर मंत्र से समबन्धित स्वरुप साधक के अंत:करण में प्रविष्ट होकर आत्म प्रकाश फैलाएगा। उदाहरण के लिए यदि व्यक्ति गायत्री मंत्र का जप करता है तो उसे सविता के तेज का ध्यान करना होता है और भावना करनी होती है कि वह प्रकाश साधक के पापों, कषाय कल्मषों, दोष दुर्गुणों को काटकर देवत्व का संचार कर रहा है। यदि व्यक्ति ऐसा ध्यान अथवा भावना नहीं भी कर पाता, तब भी स्वत: यह प्रक्रिया धीमी गति से चलती रहती हैं। साधक कुछ वर्षो में ही विकार रहित होना आरम्भ हो जाता है।

मंत्र उच्चारण तीन प्रकार का होता हैं। पहला बैखरी जो यज्ञ में बोला जाता हैं एक बोलता है सभी सुन सकते है, दूसरा उपांशु जिसमें साधक के जीभ होट हिलते है परन्तु आवज मुँह से बाहर नहीं आती, तीसरा मानसिक जप अंदर ही अंदर चलता है। जप में समान्यत: उपाँशु प्रक्रिया अपनायी जाती है। मानसिक जप बहुत शक्तिशाली होता है काफी अभ्यास के बाद ही सफल हो पाता है। जप में ज्यों ज्यों आगे बढ़ते जाँएगे, ध्यान की सघनता और आराध्य में सलंग्नता बढ़ती जाएगी और कालान्तर में मानासिक जप के साथ स्वत: ध्यान चलेगा जो समाधि या ब्राही स्थिति में परिवर्तित हो जाएगा।

गीता के दशम अध्याय में अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि यज्ञों में जप यज्ञ मैं हूँ। वीर शिवाजी के गुरु रामदास जी को आध्यात्मिक उचाइँया 'श्री राम जय राम जय जय राम' के जप से मिली जो उन्होनें गोदावरी कें जल में खड़े होकर तेरह करोड़ बार जपा। जय राम आश्रम के संस्थापक श्री जय राम जी महाराज ने गंगा जी में खड़े होकर सवा करोड़ गायत्री जपा। जिससे वो अदभुत शक्तियों व सिद्धियों से स्वामी हो गए।

जप किस मंत्र का करे इस संदर्भ में श्री कृष्ण जी सर्वाधिक महत्व गीता में गायत्री को देते है। (छन्दों में गायत्री मैं हूँ) सामान्य परिस्थितियों में गायत्री मंत्र सर्वाधिक लाभप्रद हैं। परंतु यदि कोर्इ व्यक्ति रोग के चंगुल से मुक्ति चाहता है तो मृत्युजंय महामंत्र का जप भी कर सकता है। इसके अतिरिक्त अनेक मंत्रों का शास्त्रों में वर्णन आता है। कोर्इ भी लिया जा सकता है। आज सब कुछ अस्त व्यस्त है। वैदिक काल में सभी गायत्री जपते थे। यदि एक मंत्र भारत के लोग पकड़ ले तो वह बहुत शक्तिशाली हो जाएगा क्योंकि उसकी शक्ति आकाश मण्डल में एकत्र होती चली जाएगी। भारतीय दर्शन के ज्ञाता U.S.A. टाइम्स पत्रिका के सम्पादक श्री कंरजिया भारत आए। भारत के पत्रकारों ने उनसें पूछा कि एटम बम से दुनिया की रक्षा कौन करेगा। उन्होने बताया गायत्री मंत्र पत्रकारों ने पूछा-वह कैसे? उन्होने बताया गायत्री मंत्र से सद्बुद्धि व सद्भावना का विकास होता है। यदि कोर्इ देश एटम बम से हमला करना चाहे और भारत की चौथार्इ जनता भी एक समय में एक साथ गायत्री मंत्र का जप करें तो हमलावर की बुद्धि पलट जाएगी वह अपने हाथ से इतने बडे विनाश को संरजाम नहीं दे पाएगा।

व्यक्ति के भीतर एक प्रश्न और उठता है क्या मंत्र का कोई नुक्सान भी हो सकता है। सात्विक मंत्रों से कोर्इ हानि नहीं होती चाहे उसे कैसे भी क्यों न जपा जाए। यदि ठीक से विधि विधान से नहीं किया जाएगा तो लाभ पूरा नहीं होगा। परंतु हानि भी नहीं होगी। हानि केवल तांत्रिक मंत्रों से पहुँचती है इसलिए उनके लिए सावधानी रखना अनिवार्य है।

उदाहरण के लिए गायत्री मंत्र पूर्ण सात्विक है परतु यदि इसका उल्टा कर दिया जाए तो यह अग्नि बाण बन जाता है व वाममार्गी हो जाता है।

Monday, September 16, 2013

निःस्वार्थी व सेवा भावी व्यक्ति पर कृपा बरसती है सिद्ध पुरुषो की

आम तौर पर समाज में यह मान्यता प्रचलित है कि सिद्ध पुरुषो की कृपा पाने के लिए उनकी पूजा, अर्चना, चरण वन्दना करनी होती है अथवा उनसे दीक्षित होना पड़ता हैं। जब मैं छात्र जीवन में था तब मेरे मन में एक प्रश्न उठता था कि देवशक्तियाँ क्या चापलूसी पसन्द करती है मेरी अन्तरात्मा से उत्तर मिलता था नहीं। फिर ऐसा क्यों है कि व्यक्ति अपने कर्मो व आचरण को शुद्ध करने का प्रयास नहीं करता, अपितु मन्दिरो, गुरुद्धारों, पीर पैगम्बरो से मनौतियां (help), मांगता घुमता है। 1990 में जब मैं R.E.C. Kurukshetra में Computer Department में Lecturer लगा तब मेरे मन में बड़े पैमाने पर धार्मिक आध्यात्मिक साहित्य के अध्ययन की इच्छा का उदय हुआ। इसी क्रम में श्री राम आचार्य जी का साहित्य भी मिला। उससे पता चला कि साधना, पूजा पाठ कर्म काण्ड का उद्देश्य मानव के अंत:करण को निर्मल बनाना ही है।जैसे-2 मानव मन शुद्ध व पवित्र होता जाता है वैसे-2 व्यक्ति की पात्रता दैव कृपा धारण के लिए बढ़ती जाती है। कहते है 
‘‘मन चंगा तो कटौती में गंगा‘‘ 
मन की पवित्रता के लिए माध्यम कुछ भी हो सकता है- कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग, ध्यान योग, जप योग आदि-2। इनमें से कर्म योग को सबके लिए आवश्यक व सरल कहा गया हैं। क्योंकि व्यक्ति को जीवन निर्वाह के लिए कोर्इ न कोर्इ कर्म अवश्य करना होता है। यदि हम कर्म योग साध लें तो अन्य योग स्वत: आत्मा में प्रकाशित हो जाते हैं। यदि कर्म गलत करते रहें और उनको सुधारने का प्रयत्न न करें तो अन्य ज्ञान, ध्यान कुछ भी फलीभूत नहीं हो पाएगा। इसलिए भगवदगीता को निष्काम कर्म योग का शास्त्र माना जाता हैं।

हम यहां एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण देने जा रहे हैं जिन्होने रोगियों की सेवा भाव से चिकित्सा करते-2 महान शक्तियों व सिद्धियों के धनी नीम करौली के बाबा का हृदय जीत लिया। जबकि वो उनको जानते तक न थे। नीम करौली के बाबा का अदभुत व्यक्तित्व था। बड़े-2 राजनेताओं से लेकर गरीब जनता उनके दर्शन व आशीर्वाद के लिए ललायित रहती थी। आगन्तुको में अहं व कुटिलता की गंध आते ही बाबा उनसे नहीं मिलते थे। एक बार गुलजारी लाल नन्दा जी उनसे मिलने गए। बाबा ने उनसे मिलने को मना कर दिया। यदपि नंदा जी बड़े धार्मिक भी थे व राजनीति में उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त थे, परन्तु न मालूम बाबा को क्या बात बुरी लगी। बहुत 
चाहने पर भी नंदा जी को मायूस होकर वापिस लौटना पड़ा। किसी-2 से बड़े प्रेम से लम्बे समय तक बात करते थे और किसी-2 को देखकर कम्बल में मुहं छिपा लेते थे। बाबा अक्सर एक कम्बल ओढ़ कर रखते थे। 

नीम करौली के बाबा एक बार इलाहबाद आए। भक्तों व रोगीयों की भीड़ उनके पास बड़ी संख्या में जुट गयी। इलाहबाद में एक होम्योपैथिक चिकित्सक ड़ा ब्रहमास्वरुप सक्सेना उच्च् न्यायालय के समीप अपने घर पर ही रोगीयों को सस्ती व अच्छी चिकित्सा करते थें उनकी पत्नी अक्सर उनको अधिक धन कमाने के लिए प्रेरित करती, गरीबी का रोना रोती थी। परन्तु ड़ा साहब शान्त भाव से पत्नी के तानो को सह लेते व रोगीयों की बड़ी सहृदयता से सेवा करते थे। एक बार उनके क्लीनिक में विचित्र तरह के रोगियों का आना हुआ। एक दिन तो एक ऐसा रोगी आया, जिसकी दोनों आँखें चेहरे से बाहर निकल आर्इ थीं। सक्सेना जी ही उसे देखकर घबरा गए, क्योंकि यह तो सर्जरी का केस था। वे रोगी से बोले आप किसी सर्जन के पास चले जाइए। मेरे पास इसका 
कोर्इ समाधान नहीं है। मेरी दवा से भला आपका कैसे भला हो सकता है। रोगी ने कहा- डॉक्टर साहब! आप ही मेरी चिकित्सा करेंगे और मैं आप से ही दवा लूँगा। मुझे पूर्ण विश्वास है कि दवा खाने के बाद मैं स्वस्थ हो जाउँगा। सक्सेना जी ने कहा - मेरी दवा में कोर्इ जादू नहीं है और न ही मैं कोर्इ जादू टोना जानता हुँ, जो तुम्हें ठिक कर दूँगा। रोगी ने कहा- आप निश्चिन्त होकर देवा दें, क्योंकि हमारे इष्ट एवं आराध्य बाबा नीम करौली ने कहा है कि आपकी दवा से हम स्वस्थ एवं प्रसन्न हो जाएँगे।

सक्सेना जी बड़े असंमजस में पड गए। जैसे-तैसे उन्होंने उसे दर्दनिवारक अर्निका की गोलियाँ दे दी। रोगी ने जैसे ही उसे खाया, उसकी आँखे अंदर धँस गर्इ और उसका भयावह चेहरा शान्त एवं सौम्य हो गया। उसे देख वहाँ सभी लोग हैरान एवे हतप्रभ थे इस घटना के पश्चात उनके यहाँ असाध्य रोगियों का आवागमन बढ़ गया। सभी असाध्य रोगी कहते कि उन्हें बाबा नीम करौली ने भेजा है। सक्सेना जी की मिठी गोलियों से वे न केवल स्वस्थ होते थे। बल्कि उनका स्वास्थ्य सामान्य रोगियों की तुलना में शीघ्रता से सुधरता था। सामान्य रोगी देरी से ठीक होते थे और असाध्य रोगी जल्दी स्वस्थ होत थे। यह जानकर सब असमंजस में पड़ जाते। सबसे हैरानी की बात तो यह थी कि डॉ सक्सेना बाबा से सर्वथा अपरिचित थे। वे उन्हें कहीं से भी नहीं जानते थे, पंरतु इस घटना से उनके अंदर श्रद्धा एवं विश्वास का अंकुरण होने लगा।

एक दिन अचानक सक्सेना जी की क्लीनिक में एक व्यक्ति प्रविष्ट हुए। वह व्यक्ति नंगे पैर थे “वेत धोती एवं कम्बल ओढ़े थे। उन्नत ललाट, जाज्वल्यमान आँखे तथा चेहरा दिव्य कांति से सराबोर थे। उनकी बोली ऐसी थी कि बस, सुनते ही रहने का मन करता था। उन्होंने डॉक्टर सक्सेना जी से कहा- मैं अपनी हथेली में कुछ गरमी सी महसूस कर रहा हूँ। कोर्इ दवा तो दे दो। सक्सेना जी ने इस व्यक्ति से उसके संदर्भ में कुछ पूछना चाहा। उस व्यक्ति ने कहा- सक्सेना जी! ये सब पूछने वाली बाते हमें पसन्द नहीं। आप तो हमें जो समझ में आए वो दवा दे दो और हाँ! ध्यान रखना, फिर हम आपके पास दोबारा कभी नहीं आएँगे, इसलिए अधिक मात्रा में दवा दो। बाबा जी ने सक्सेना साहब सें कुछ बातें की और दवा उठाकर चल दिये। बाहर जाते ही उन्हें दो मरीजों ने पहचान लिया। यह बात आग की तरह आस-पास फैल गयी और उनके दर्शनों के लिए भीड़ जुटने लगी। मरीजो ने डॉ साहब को बताया ये ही नीम करौली के बाबा है जिनकी आलौकिक शक्तियाँ पूरे देश में यहाँ तक कि विश्व में इतनी अधिक प्रकाशित हुयी कि उनका नाम किसी से अनजान नहीं रहा। 

बाबा जी हनुमान भक्ति, करते-2 हनुमानमय हो गए थे। वह कहा करते थे कि हनुमान जी इस युग के जीवन्त देव हैं। उन्हें भाव भरे हृदय से पुकारें, तो प्रत्यक्ष खड़े हो जाते हैं। इंसान हृदय से पुकारे तो कुछ भी असम्भव नहीं रह जाता है, परन्तु पुकार ही तो नहीं पाता है। व्यर्थ की उलझनों में उलझा अपना जीवन नष्ट करता रहता है।

सक्सेना जी का हृदय इस बात से ग्लनि से भर गया कि स्वयं भगवान उनके द्वार पर आया और एक घंटे से अपनी बारी की प्रतीक्षा में बाहर बैठा रहा वे उन्हें पहचान न सकें। इसके पश्चात उनका जीवन ही बदल गया उनकी सारी चिन्ताएँ दुख दर्द सदा के लिए शान्त हो गए। उनके हृदय में भक्ति की अनावरत धारा बह उठी। वे अब बड़े भावपूर्ण से मरीजों की सेवा में जुट गए।

रोगमुक्त जीवन कैसे जीएं?

 अधिकांश व्यक्ति अपनी जीवन-शैली को अस्त-व्यस्त रखते है इस कारण रोगों की चपेट में आने लगते हैं। रोगी होने पर एलोपैथी अथवा अन्य चिकित्सकों से इलाज कराते हैं, परन्तु जीवन-चर्या को ठीक करने की ओर ध्यान नहीं देते। इस कारण रोग जिद्दी (chronic) होने लग जाते हैं। जब रोग घातक स्थिति तक पहुंच जाता है तभी आंख खुलती है व रोग के निवारण के लिए बहुत परेशानी उठानी पड़ती है। यदि हम पहले से ही सचेत रहकर अपनी जीवनचर्या पर नियन्त्रण रखें तो हम ऋषियों के अनुसार ‘जीवेम शरद: शतम्’ अर्थात् 100 वर्ष तक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। इसके लिए हमें निम्न सूत्रों को जीवन में अपनाना होगा।

1)  प्रात:काल सूर्योदय से दो घण्टा पूर्व अवश्य उठें। ऋषियों ने इसे ब्रह्ममुहूर्त्त की संज्ञा दी है। इस समय की वायु में जीवनी शक्ति सर्वाधिक होती है। वैज्ञानिकों ने शोध किया है कि पेड़-पौधों की वृद्धि इस समय व संधिकाल (दिन-रात के मिलने का समय) में सबसे अधिक होती है।

2)  प्रात: उठने के पश्चात् ऊषा पान (जलपान) करें। यह जल ताजा पी सकते हैं। यदि रात को ताम्र पात्र में जल
भरकर रख दें वह पीना अधिक लाभप्रद है। ताम्र पात्र को विद्युत रोधी लकड़ी, रबड़, प्लास्टिक के ऊपर रखें इससे पानी में ऊर्जा निहित हो जाती है। यदि सीधा जमीन या स्लैब आदि पर रख दें तो यह ऊर्जा जमीन में चली जाती है। शीत ऋतु में जल को हल्का गर्म करके पीयें व ग्रीष्म ऋतु में सादा (अधिक ठण्डा न हो) लें। जल की मात्रा इच्छानुसार लें। जितना पीना आपको अच्छा लगे- आधा किलो, एक किलो, सवा किलो उतना पी लें। जोर-जबरदस्ती न करें। कर्इ बार अधिक पानी-पीने के चक्कर में हृदय की धड़कन बढ़ती है या पेट में दर्द आदि महसूस देता है, अत: जितना बर्दाश्त हो उतना ही पानी पिया जाए।

3)  जल पीकर थोड़ा टहलने के पश्चात् शौच के लिए जाएं। मल-मूत्र त्यागते समय दांत थोड़ा भींचकर रखे व मुंह बंद रखें। मल-मूत्र त्याग बैठकर ही करना उचित होता है।

4)  मंजन जलपान करने से पहले भी कर सकते हैं व शौच जाने के बाद भी। ब्रुश से ऊपर-नीचे करके मंजन करें। सीधा-सीधा न करें। यदि अंगुली का प्रयोग करना हो तो पहली अंगुली तर्जनी का प्रयोग न करें। अनामिका (Ring Finger) अंगुली का प्रयोग करें, क्योंकि तर्जनी अंगुली से कभी-कभी (मन: स्थिति के अनुसार) हानिकारक तरंगे निकलती हैं जो दांतो, मसूड़ों के लिए हानिकारक हो सकती है। कभी-कभी नीम की मुलायम दातुन का प्रयोग अवश्य करें। इससे दांतों के कीटाणु मर जाते हैं यदि नीम की दातुन से थोड़ा-बहुत रक्त भी आए तो चिन्ता न करें। धीरे-धीरे करके ठीक हो जाएगा। कुछ देर नीम की दातुन करते हुए रस चूसते रहें उसके पश्चात् थोड़ा-सा रस पी लें। यह पेट के कीटाणु मार देता है। यदि पायरिया के कारण दाँतों से रक्त अधिक आये तो बबूल की दातुन का प्रयोग करें वह काफी नरम व दाँतों को मजबूती प्रदान करने वाली होती है। मंजन दोनों समय करना अच्छा रहता है- प्रात:काल व रात्रि सोने से पूर्व। परन्तु दोनों समय ब्रुश न करें। एक समय ब्रुश व एक समय अंगुलि से मंजन करें। अधिक ब्रुश करने से दाँत व मसूढ़े कमजोर होने का भय बना रहता है। मंजन करने के पश्चात् दो अंगुलि जीभ पर रगड़कर जीभ व हलक साफ करें। हल्की उल्टी का अनुभव होने से गन्दा पानी आँख, नाक, गले से निकल आता है।

5)  स्नान ताजे जल से करें, गर्म जल से नहीं। ताजे जल का अर्थ है जल का तापक्रम शरीर के तापक्रम से कम रहना चाहिए। छोटे बच्चों (5 वर्ष से कम) के लिए अधिक ठण्डा जल नहीं लेना चाहिए। शरद् ऋतु में भी जल का तापक्रम शरीर के तापक्रम से कम ही होना चाहिए, परन्तु बच्चों वृद्धों व रोगियों को गुनगुने जल से स्नान करना चाहिए। स्नान सूर्योदय से पूर्व अवश्य कर लेना चाहिए। रात्रि में पाचन तन्त्र के क्रियाशील रहने से शरीर में एक प्रकार की ऊष्मा (heat) बनती है जो शीतल जल में स्नान करने से शांत हो जाती है, परन्तु यदि सूर्योदय से पूर्व स्नान नहीं किया गया तो सूर्य की किरणों के प्रभाव से यह ऊष्मा और बढ़ जाती है तथा सबसे अधिक हानि पाचन तन्त्र को ही पहुंचाती है।

6) स्नान के पश्चात् भ्रमण (तेज चाल से), योगासन, प्राणायाम, ध्यान, पूजा का क्रम बनाना चाहिए। इसके लिए प्रतिदिन आधा से एक घण्टा समय अवश्य निकालना चाहिए। बच्चों को भी मंदिर में हाथ जोड़ने, चालीसा आदि पढ़ने का अभ्यास अवश्य कराना चाहिए।

7)   भोजन दो बार करना चाहिए। भोजन करने का सबसे अच्छा समय प्रात: 8 से 10 बजे व सायं 5 से 7 बजे के बीच है। यदि कोर्इ भारी खाद्य पदार्थ लेना है तो प्रात: के भोजन में ही लें, क्योंकि पाचन क्षमता सूर्य से प्रभावित होती है। 12 बजे के आस-पास पाचन क्षमता सर्वाध्कि होती है, अत: 10 बजे किया गया भोजन बहुत अच्छे से पच जाता है। अन्न वाले खाद्य पदार्थ दो बार से अधिक न लें। 40 वर्ष की उम्र के पश्चात तो अन्न (भोजन) की आवश्यकता केवल दिन में एक बार ही रह जाती है।

8) शरीर से दिनभर में कोर्इ ऐसा शारीरिक परिश्रम (Physical Exercise) का कार्य अवश्य करें जिसमें पसीना
निकलता है इससे खून की सफार्इ हो जाती है।

9) भोजन के पश्चात् घण्टा दो घण्टा जल न पीएं। यदि आवश्यकता लगे तो भोजन के बीच अल्पमात्रा में पानी पीएं, क्योंकि अधिक जल पीने से पाचक रस मन्द हो जाते हैं।

10) भोजन पेट की भूख से तीन चौथार्इ करें। एक चौथार्इ पेट खाली रखें। जब पेट भरने लगे अथवा डकार आ जाए तो भोजन करना बन्द कर दें। ठूस-ठूस कर खाने से शरीर भारी हो जाता है।

11) सप्ताह में एक दिन इच्छानुसार स्वादिष्ट भोजन कर सकते हैं। पांच दिन सामान्य भोजन करें व एक दिन व्रत अवश्य करें। सामान्य भोजन में मिर्च मसालों का प्रयोग कम से कम करें।

12) घी का सेवन वही करें जो शारीरिक कार्य अधिक करते हैं। मानसिक कार्य करने वाले घी का सेवन अल्प मात्रा में ही करें।

13)  25 वर्ष की आयु तक इच्छानुसार पौष्टिक भोजन करें। 25 वर्ष से 40 वर्ष की आयु तक नियंत्रित भोजन करना चाहिए। 40 वर्ष के पश्चात् बहुत सोच-समझकर भोजन करना चाहिए।

14) भोजन से पूर्व अपनी मानसिक स्थिति शान्त कर लें। भोजन करते हुए किसी भी प्रकार के तनाव, आवेश, भय, चिन्ता के विचारों से ग्रस्त न हों। भोजन र्इश्वर का प्रसाद मानकर प्रसन्न मन से करें। भोजन को खूब चबा-चबा कर खाना चाहिए। आचार्य भाव मिश्र कहते हैं:-
      र्इष्र्याभयक्रोध् समन्वितेन, लुब्धेन रुग् दैन्यनिपीड़ितेन।
      विद्वेष युक्तेन च सेव्यमान, अन्नं न सम्यक् परिपाकमेति।।

      अर्थात् भोजन के समय र्इष्र्या, भय, क्रोध्, लोभ, रोग, दीनता का भाव, विद्वेष रखने से खाया हुआ अन्न भली-भांति नहीं पचता है, जिससे रस रक्तादि की उत्पत्ति भी ठीक प्रकार शुद्ध रूप से नहीं होती है। अत: सुखपूर्वक बैठकर प्रसन्नता से धीरे-धीरे खूब चबा-चबा कर भोजन करना चाहिये।

15)   दूध् या पेय पदार्थों को जल्दी-जल्दी नहीं गटकना चाहिए। धीरे-धीरे चूस-चूस कर पीना चाहिए। पेय
पदार्थों का तापक्रम न तो अधिक गर्म हो न ही अधिक शीतल।

16) चीनी व चीनी से बनी चीजों का प्रयोग कम से कम करना चाहिए। चीनी को सफेद जहर की संज्ञा दी गयी
है। शुगर की आवश्यक पूर्ति के लिए फलों का प्रयोग करना चाहिए।

17)  आहार, निद्रा व ब्रह्मचर्य इन तीनों बातों से स्वास्थ्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है। आहार में मांस, अण्डा, शराब, मिर्च-मसाले व अधिक नमक से बचना चाहिए। निद्रा छ: से आठ घण्टे के बीच लेनी चाहिए व अश्लील चिन्तन से बचना ही ब्रह्मचर्य है।

18)  जीवन आवेश रहित होना चाहिए। र्ईर्ष्या-द्वेष, बात-बात पर उत्तेजित होने का स्वभाव जीवनी शक्ति को भारी क्षति पहुंचाता है।

19)  रात्रि को सोते समय मच्छरों से बचने के लिए मच्छरदानी का प्रयोग करना चाहिए। कीटनाशकों का कम से कम प्रयोग करना चाहिए। लम्बे समय तक मच्छरनाशक रसायनों के उपयोग से मनुष्य को सर्दी-जुकाम, पेट में ऐंठन और आंखों में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। ये लक्षण और विकृतियां पायरेथ्राइडस नामक कृत्रिम कीटनाशक के कारण होती हैं जो कीटों के तंत्रिका तन्त्र पर हमला करता है। सेफ्टी वाच समूह ‘सी.यू.टी.एस.’ ने अपने नए प्रकाशन ‘इज इट रियली सेफ’ में बताया है कि ये रसायन मानव शरीर के लिए बहुत-ही विषैले और हानिकारक होते हैं।

20)  भोजन बनाते समय साबुत दालों का प्रयोग करना चाहिए। छिलका उतरी दालों का प्रयोग बहुत कम करना चाहिए। आटा चोकर सहित मोटा प्रयोग में लाना चाहिए। बारीक आटा व मैदा कम से कम अथवा कभी-कभी ही प्रयोग करना चाहिए। दाल, सब्जियों को बहुत अधिक नहीं पकाना चाहिए। आधा पका (half cook) भोजन ही पाचन व पौष्टिकता की दृष्टि से सर्वोत्तम है।

21) घी में तले हुए आलू, चिप्स आदि का प्रयोग कम से कम करना चाहिए। तलने के स्थान पर भाप द्वारा पकाना कहीं अधिक गुणकारी व सुपाच्य होता है।

22) व्यस्त रहें, मस्त रहें के सूत्र का पालन करना चाहिए। व्यस्त दिनचर्या प्रसन्नतापूर्ण ढ़ंग से जीनी चाहिए।

23) प्रात: उठते ही दिनभर की गतिविधियों की रूपरेखा बना लेनी चाहिए व रात्रि को सोते समय दिन भर की
गतिविधियों का विश्लेषण करना चाहिए। यदि कोर्इ कभी गलती प्रतीत होती हो, तो भविष्य में उस त्रुटि को दूर करने का संकल्प लेना चाहिए।

24) शयन के लिए बिस्तर पर मोटे बाजारू गद्दों का प्रयोग न करें, हल्के रूर्इ के गद्दों का प्रयोग करें।

Wednesday, August 14, 2013

देश की शान - जय जवान जय किसान


जय जवान:- भारत को चलाने में दो लोगो का अहम योगदान है। एक वह जवान जो अपने प्राणो की बाजी लगाकर देश की रक्षा करता है जब घर से जाता है। तो ये पता नही होता कि जैसे जा रहा है। वैसे वापस आयेगा की नही कर्इ बार हम देखते है। कि बहुत से जवान खुद चलकर गये थे देश की रक्षा करने के लिए लेकिन वह अपने आाप वापिस नही आ सके अपने आप को बलिदान करके राष्ट्र को आहूत हो गये और तिरंगे में लिपट कर घर आये ये गाथा है। भारत भूमि को समर्पित राष्ट्र के नायको की अजादी पाने के लिए भी भारत माता के सुपुत्रों पं. राम प्रसाद बिस्मिल असफँाक उल्ला खाँ भगतसिंह भगवती चरण वोहरा चन्द्रशेखर आजाद सुभाष चन्द्र बोस राजगुरु सुखदेव ने भारत माता का मुख उज्जवल करके प्राणो की आहुति खुशी से दे दी ।
जय किसान:- किसान राष्ट्र की माँ है जो अपने खून पसीने से सर्दी गर्मी की परवाह न करके अन्न पैदा करता है और पूरे देश का पेट भरता है। आज वह किसान आत्म हत्या कर रहा है। उसके ख्ूान पसीने की मेहनत का उसे मूल्य नही मिलता है। जैसा नेहरु जी ने कहा था कि खेती को सहकारी की जाये किसानों को सरकारी नौकरी वालो की तरह वेतन एवं पेशन मिले तो क्या आज किसान आत्महत्या करता यह प्रश्न विचारणीय है। जनता भूखी है। ये आजादी झूठी है। वतन वालो वतन ना बेच देना धरती के जतन ना बेच देना शहीदों ने जान दी है वतन के वास्ते शहीदो के कफन ना बेच देना बहन बेटियों की इज्जत आज तार-तार हो रही है। आम आदमी 27 रु में जी रहा है। बल्कि किस्तों में मर रहा है। स्वतन्त्रता दिवस जाने के बाद छोड़ देता है। ऐसे सवाल इन सवालो का जबाव दो।
आजादी तीन प्रकार की होती है।
1. शासक से लड़कर अपना राज्य लेना।
2. आर्थिक आजादी देश के नागरिको को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना।
3. सामाजिक आजादी देश में पारिवारिकता का माहौल बनाना।
अमर शहीदों का पैगाम जारी रखना है। संग्राम
जय हिन्द