Sunday, December 22, 2013

पतंजलि के योग दर्शन में संयम

     अंतर्यात्रा विज्ञान के प्रयोग अपनी प्रगाढ़ता में हमें शक्तिस्रोत से जोड़ते हैं। यहाँ तक कि हमें हमारे व्यक्तित्व व अस्तित्व को शक्तिपुज के रूप में परिवर्तित एवं रूपांतरित करते हैं। इस चमत्कारिक सत्य को पढ़कर यह जिज्ञासा जागनी स्वाभाविक है-कैसे? किस तरह? इन प्रश्नों के समाधान में बस इतना कहना है कि हमारी वास्तविकता, हमारी यथार्थता, यानी कि हमारी स्वयं की अंतरसत्ता-अंतरात्मा स्वाभाविक ही समस्त शक्तियों का स्रोत व शक्तिपुंज है, लेकिन हम       इसकी अनुभूति से सदा अनजान व अपरिचित बने रहते हैं। संभवत: इस अनुभूति में अनेक अवरोध हैं, अड़चने हैं। योग के प्रयोग क्रमिक रूप से इन सभी अवरोधों, अड़चनों को समाप्त करते हैं। और तब हमारे अस्तित्व के कण-कण से, व्यक्तित्व के रोम-रोम से शक्ति की तरंगें सूर्य रश्मियों की तरह प्रवाहित होने लगती हैं।
     सामान्य जीवन क्रम में हमारी वृत्तियाँ बहिर्मुखी हैं। जो हमें बाहर दिखता है, उसी के बारे में हम अनुभव कर पाते हैं। शरीर की शक्तियों व सामथ्र्य का परिचय हमे इसी रूप में मिलता है। इन्हें विकसित करने के प्रयास भी बाहरी होते हैं। विचारों व भावनाओं का अनुभव बाहरी नहीं है, आंतरिक है, इसलिए इनकी शक्ति व सामथ्र्य के बारे में हम जान नहीं पाते। बस, जो थोड़ा-बहुत आंतरिक अनुभव हो पाता है, उसमें हम स्वयं को उलझा-फँसाकर दुखी-परेशन होते रहते हैं। विचारों के अविराम द्वंद्व और भावनाओं के निरंतर विक्षोभ ही इनकी कहानी हैं। अंतर्यात्रा विज्ञान के प्रयोग हमें इस जटिल-कठिन स्थिति से उबारते हैं। इनके द्वारा हम स्वयं की वृत्तियों को अंतर्मुखी बनाकर इनकी शक्तियों का परिचय पाते हैं और क्रमिक रूप से स्वयं की अंतरसत्ता से जुड़कर उत्तरोत्तर शक्तिसंपन्न बन जाते हैं।  क्या बिना किन्हीं बारही साधनों के शक्तिसंपन्न बनना, समर्थ होना संभव है? अंतर्यात्रा विज्ञान इसका उत्तर सुनिश्चित हाँ में देता है, लेकिन योग विज्ञान के लिए व्यक्ति व व्यक्तित्व का शक्तिसंपन्न व समर्थ-बलशाली होने से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण है उसका सद्गुणसंपन्न होना, गुणवान होना, मानवीय मूल्यों के प्रति सचेष्ट एवं समर्पित होना। इन योगकथा की पिछली कड़ी में इसी सच की चर्चा व व्याख्या की गर्इ थी। इस कथा-कड़ी के पिछले सूत्र में कहा गया था कि मैत्री आदि गुणों पर संयम कर लेने से उस गुणवत्ता विशेष में बड़ी क्षमता आ जाती है। योग के अनुसार समर्थ होने से, शक्तिसंपन्न होने से अधिक जरूरी है सद्गुणसंपन्न होना; क्योंकि सद्गुणों के अभाव में शक्ति के दुरुपयोग की संभावना हमेशा बनी रहती है। गुणहीन व्यक्तियों के पास जो भी शक्ति आती है, वो हमेशा दुरुपयोग करते हैं, फिर यह शक्ति चाहे सामाजिक हो, राजनीतिक हो या फिर वैज्ञानिक अथवा आध्यात्मिक।    इसीलिए पहले सद्गुण, फिर शक्ति। इसीलिए महर्षि पतंजलि पहले सद्गुणों की चर्चा-चिंतन करने के बाद अब बल की, शक्ति की चर्चा अपने इस अगले सूत्र में करते हैं-     
बलेषु हस्तिबलादीनि।। 3/14।।
शब्दार्थ-बलेषु- (भिन्न-भिन्न) बलों में (संयम करने से); हस्तिबलादीनि- हाथी आदि के बल के सदृश (संयम के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के) बल प्राप्त होते हैं।
भावार्थ- हाथी आदि के बल पर संयम करने से, संयम के अनुरूप हाथी आदि के बल के सदृश बल व शक्ति प्राप्त होती है।
     बड़ा रहस्यमय व अद्भुत है यह सूत्र। जीवन व प्रकृति की समस्त शक्तियों की कुंजी है यह। जो कुछ भी हम चाहते हैं, उसी पर संयम को केंद्रित कर देना है, फिर वैसा ही घटित होने लगेगा; क्योंकि व्यक्ति अनंत है, असीम है। जैसा रूप या स्वरूप, सद्गुण या शक्ति हम पाना चाहते हैं, वैसा ही संयम से पा सकते हैं, फिर सभी तरह के चमत्कार संभव हो सकते हैं। सब कुछ हमारे ऊपर निर्भर करता है। तब अगर हम हाथी जैसे अथवा किसी अन्य जैसे शक्तिशाली होना चाहते हैं तो हो सकते हैं, बस, उस विचार को बीज की भाँति भीतर सँजोकर, उसे संयम से पोषित करना है। इस सूत्र का दुरुपयोग भी संभव है। सूत्र तो बस, कुंजी है। अगर कोर्इ व्यक्ति शैतान का रूप रखना चाहता है या कोर्इ गलत रूप लेना चाहता है, तो वह उस भाँति हो सकता है। हालाँकि गलती करने वालों के लिए प्रकृति का दंड- विधान सतत सक्रिय है, फिर भी गलत करना संभव तो है ही।
     सत्य यही है कि जितना गलत उपयोग भैतिक विज्ञान का संभव है, उतना ही गलत उपयोग अंतर्यात्रा विज्ञान या योग विज्ञान का भी संभव है। योग का गलत उपयोग न हो सके, इसीलिए इसके प्रथम चरण में ही व्यक्तित्व-जीवन के परिष्कार की सुनिश्चित व्यवस्था की गर्इ है। भौतिक विज्ञान ने परमाणु ऊर्जा की खोज की है, उसका घातक प्रक्षेपण करके पूरी पृथ्वी को जलाकर भस्म किया जा सकता है। इस समूची धरती को कब्रिस्तान में बदला जा सकता है, लेकिन इसके सदुपयोग से पूरी धरती के सारे शहर जगमगाए जा सकते है। ऊर्जा की सभी जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव इस सूत्र की व्याख्या में कर्इ उदाहरण दिया करते थे। उनका कहना था कि इस सूत्र के रहस्य को पुरातनकाल में कुछ लोगों ने जान लिया था। उनमें से एक वानरराज बालि थे, दूसरे अंजनी पुत्र हनुमान। इन दोनों में हनुमान का ज्ञान बालि से कहीं अधिक था। हालाँकि बालि को भी बल पर संयम की असाधारण क्षमता प्राप्त थी। इसी वजह से जो भी प्रतिपक्षी उसके सामने आता, बालि उसकी समस्त शक्तियों को स्वयं में आत्मसात् कर लेता था। उसका स्वयं का बल तो उसके पास था ही। इस तरह उसके सामने प्रतिपक्षी योद्धा का बल घटकर आधा रह जाता; जबकि उसका स्वयं का बल ड्योढ़ा-दूना हो जाता। इस तरह बालि की विजय सुनिश्चित होती और प्रतिपक्षी की पराजय सुनिश्चित। संयम की इस प्रक्रिया की प्रवीणता ने बालि को अहंकारी, दंभी बना दिया था। अपने छोटे भार्इ सुग्रीव का उसने सब कुछ छीन लिया। बाद में हनुमान की सहायता से भगवान श्रीराम ने उसे दंडित किया। हालाँकि उन्हें भी उसे छिपकर मारना पड़ा; क्योंकि प्रत्यक्ष होने पर संभावना यही थी कि बालि उनकी शक्तियों पर संयम करके उन्हें भी आत्मसात् कर लेता।

     प्रकृति के दंड-विधान के अनुरूप बालि को दंडित होना पड़ा। बालि के स्वभाव के ठीक विपरीत हनुमान भगवान के परम भक्त एवं विनम्र थे। जनसेवा-र्इश्वरसेवा उनका ध्येय था। वह धरती की शक्तियों पर संयम करने में निष्णात होने के साथ प्रकृति की समस्त दिव्य शक्तियों, देव शक्तियों पर संयम करने में निष्णात थे, परंतु उनहें अपने बल पर कोर्इ भी अभिमान न था। इसीलिए तो वह प्रभु की योजना व कार्य में उनके सहयोगी बने। उनसे सभी का कल्याण हुआ। आज भी वह अपने सद्गुणों व शक्ति के कारण अनगिनत जनों के आराध्य हैं। उनका उदाहरण देते हुए परमपूज्य गुरुदेव कहा करते थे, संयम की योग्यता व प्रयोग-विधि के आदर्श है-हनुमान, जिन्होंने अपनी शक्तियों का उपयोग सदा ही लोक-कल्याण में किया। जिनके जीवन का एक ही ध्येय वाक्य था-राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम। यही तो है संयम के सदुपयोग की परिभाषा।
अखंड ज्योति दिसम्बर २०१३ से साभार 

Friday, December 20, 2013

देवत्व की राह

देवत्व की राह की मंजिल देवत्व है, जहाँ हमारी कथनी और करनी में मेल हो, जहां हमारी आत्मा में सच्चार्इ और भलार्इ के प्रति पूर्णाग प्रेम हो और झूठ और बुरार्इ के प्रति पूर्णाग घृणा हो। ऐसा नहीं कि यह मंजिल नामुमकिन है मनुष्यात्मा के लिए, मगर मुश्किल यह है कि हम इस मंजिल को पाने से डरते हैं।
कोर्इ छोटे गांव का लड़का मुम्बर्इ जाकर फिल्मों का हीरो बनना चाहता हो, मगर साथ ही साथ इस बात का इज़हार करने से भी डरता हो कि सब लोग मज़ाक उड़ायेंगे। अपने अन्दर उसे वो सब नज़र आता है, जो उसे ‘हीरो’ बनने में काम आयेगा, मगर वो इतना बड़ा सपना देखने से ही डरता हो। कर्इ बार मुम्बर्इ के लिए बस या ट्रेन पकड़कर निकले भी, मगर दो-चार स्टेशन बाद ही उतर जाये या वापस अपने गांव की ट्रेन पकड़ ले। यही हाल मनुष्यात्मा का है। देवता बनना चाहती है आत्मा, मगर अपने आपसे भी यह बात कबूल करने से डरती है। कर्इ बहाने बनाती है, जैसे कि इस दुनिया में संतों को तो भीख मांग कर गुजारा करना पड़ता है, कहां देवता बनने को निकलूँ। यथास्थिति में रहना कितना आसान है। क्यों देवत्व की राह पकड़ कर जान का जंजाल मोल लूं? जिधर देखो दुनिया में झूठ का बोलबाला है। आम आदमियों की भरमार है। भला मैं ही क्यों स्पेशल बनने की कोशिश करूं आदि-आदि। मगर, अधिकारी आत्मा को इसमें मजा ही नहीं आता। उसे मालूम है कि देवत्व तक पहुंचने की सामग्री उसके अन्दर मौजूद है, मगर हिम्मत नहीं पड़ती कि पीछे न मुड़ने की ठानकर देवत्व की राह पर चल पड़े।
इस डर से पनपता है सच्चार्इ-भलार्इ के प्रति दोगला बर्ताव। जब तक राह आसान रही, तक तक सच्चार्इ-भलार्इ के मुरीद बने, मगर जहां राह जरा कठिन हुर्इ, वहां अपने उसूलों को तोड़-मरोड़कर अपने फायदे मुताबिक ढालना चालू। लेकिन, यह राह बहुत फिसलन भरी है। आप लाख सोचें कि सिर्फ इस बार यह पाप कर लूं, यह तो एक अपवाद है, मगर चढ़ती बाढ़ में अपने घर की एक दीवार से एक र्इट निकालना भी बहुत बड़ी भूल होती है। मुसीबत के वक्त में हमें अपनी सुरक्षा मजबूत करने की जरूरत है, न कि कोर्इ औचित्य स्थापित करने की या अपवादों की पैरवी करने की।
हीरो बनने की ठानी है, तो मुम्बर्इ की राह से कदम भटकने न दो और सतत् प्रयास करो, वरना अगर बिन पेंदे के लोटे की तरह कभी इधर तो कभी उधर लुढ़कते रहे, तो हीरो नहीं ‘भांड’ बनकर रह जाओगे। देवत्व की मंजिल अच्छी लगती है, नेचर के सभी जगतों से पूर्ण मेल में रहना सुखद लगता है, तो ठानो मन में कि देवत्व की राह से भटकोगे नहीं, अपने उसूल पहला मौका मिलते ही सस्ते दामों में बेचोगे नहीं। वदा करो अपने आपसे कि अपने ज़मीर को जिन्दा रखोगे। देवत्व की राह की मंजिल बहुत हसीन है, इस राह में कदम भटकने न दो, सतत् चलते रहो इस पर, ताकि इस लोक में न सही, परलोक में आकर तो देवत्व की मंजिल को पा सको।
           शुभ हो! शुभ हो! शुभ हो! शुभ हो!


                                                           -परलोक सन्देश

सुभाषित

नत्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सवे वयमतः परम्।।2/12।।
आत्मा नित्य है, इसलिए शोक करना व्यर्थ है। वास्तव में ऐसा नहीं है कि मैं किसी काल में नहीं था अथवा तू नहीं था अथवा ये राजा लोक नहीं थे, न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरूषं पुरूषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।।2/15
हे पुरूषश्रेष्ठ् सुख दुःख को समान समझने वाले जिस धीर पुरूष को इन्द्रियों के विषय व्याकुल नहीं करते हैं वह मोक्ष के योग्य होता है।
य एनं वेŸिा हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतौ नायं हन्ति न हन्यते।।2/19
जो आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते, क्योंकि आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जाता है।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।2/20
यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्म लेता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत!
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि।2/30
हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीरों में सदा ही अवध्य (जिसका वध नहीं किया जा सके) है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिये तू शोक करने योग्य नहीं है।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गतेषूपजायते।
सङ्गत्सा´्जायते कामः कामात्क्रोधेऽभिजायते।।2/62।।
विषयों का चिन्तन करने वाला पुरूष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पडक्ष्ने से क्रोध उत्पन्न होता है।
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽतु विधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।।2/67
क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेते है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरूष की बुद्धि को हर लेती है।
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमा´्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति।।2/71
जो पुरूष सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममता रहित अहंकार रहित और स्पृहा रहित हुआ विचरता है, वही शान्ति को प्राप्त होता है।
सुभाषित
निम्नलिखित सुभाषित कण्ठस्थ कीजिए-
     हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम्।
     श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनमफ्।।1।।
     अर्थः हाथ का गहना दान देना, गले का गहना सत्य बोलना, कान का गहना शस्त्र सम्मत बातों को सुनना, जिनके पास ये गहने हैं उनको अन्य धन सोने-चाँदी के गहनों से क्या मतलब? अर्थात् कुछ भी मतलब नहीं।
     विद्या ददाति विनयं, विनयात् याति पात्रताम्।
     पात्रत्वाद् धनमाप्नोति, धनाद्धर्मः ततः सुखम्।।2।।
     अर्थः विद्या विनम्रता देती है, विनम्रता से योग्यता आती है, योग्यता से धन प्राप्त होता है, धन से धर्म होता है, धर्म से सुख की प्राप्ति होती है।
     पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।
     धाराधरो वर्षति नात्महेतोः परोपकाराय सतां विभूतयः।।3।।
     अर्थः जिस प्रकार नदियाँ स्वयं जल नहीं पीती, वृक्ष स्वयं फल नहीं खाते, मेघ स्वयं के लिए वर्षा नहीं करते, उसी प्रकार सज्जनों की विभूतियाँ भी दूसरों की भलाई के लिए होती हैं।
     व्यायामपुष्टगात्रस्य, बुद्धिस्तेजो यशोबलम्।
     प्रवर्धन्ते मनुष्यस्य, तस्माद् व्यायाममाचरेत।।4।।
     अर्थः व्यायाम से मनुष्य का शरीर पुष्ट होता है, बुद्धि तीव्र होती है तथा यश और बल की वृद्धि होती है, इसलिए व्यायाम करना चाहिए।
     उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनौरथैः।
     न हि सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।5।।
     अर्थ: परिश्रम करने से ही कार्य की सिद्धि होती है, इच्छाओं से नहीं, क्योंकि सोए हुए सिंह के मुँह में हिरन स्वयं प्रवेश नहीं करते हैं, अर्थात् कर्म करने से ही कार्य सिद्ध होते हैं।
संतवाणी
दोहे
     निम्नांकित दोहे कण्ठस्थ कीजिए और भावार्थ समझने का प्रयत्न् कीजिए-
     दुःख में सिमरिन सब करैं सुख में करै न कोय।
     जो सुख में सुकिरन करै दुःख काहे को होय।।!।।
     साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
     सार-सार को गहि रहे थोथो देय उड़ाय।।2।।
     मीठी वाणी बोलिए तजि माया, अभिमान।
     ना जाने किस वेश में मिल जाये भगवान।।3।।
     रहिमन देखि बड़ेन को लघु न दीजिए डारि।
     जहाँ काम आवै सुई कहा करै तरवारि।।4।।
     कपट भाव मन में नहीं सबसे सरल स्वभाव।
     नारायण ता भक्त की लगे किनारे नाव।।5।।

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छेªयः स्यान्निश्रितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शधि मां त्वां प्रपन्नम्।। (2/)
अर्थात् ‘‘कायरता रूपी दोष से उपहत स्वभाव वाले तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हँू कि जो साधन निश्रित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए, क्योंकि मैं आपका शिष्य हँू, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए।’’
यच्छेªयः स्यान्निश्रतं ब्रहि तन्मे।
शिष्यस्तेऽहं शधि मां त्वां प्रपन्नम्।। (2/)
अर्थात्- ‘‘जो भी साधन मेरे लिए निश्रित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए, क्योंकि मैं आपका शिष्य हँू, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए।’’ परम पूज्य गुरुदेव ने कहा था कि जो शांतिकुञ में रहने वाले कार्यकत्र्ता हैं, यदि सन् 2000 तक भी मेरे साथ गाड़ी खींच ले गए, जो बाहर हैं, वे मेरे विचारों से जुड़े रहकर प्रचार प्रसार करते रहे, तो उनका निश्रित ही कल्याण हो जायगा।
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्ररति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहड.ारः स शान्तिमधिगच्छति।। (2/)
अर्थात् जो पुरुष संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर ममतारहित, अहंकार रहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है एवं स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
अगले श्रोक में भगवान् कहते हैं-
दुःखेष्वनुद्विग्रमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोध स्थितधीर्मुनिरुच्यते।। (2/)
अर्थात् दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गाए हैं, ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि कहा जाता है। दुखों के कारण तो कई आते हैं, पर उन्हें स्थितप्रज्ञा सहन कर लेता है, उद्विग्र नहीं होता। उसे सुख की कामना भी नहीं होती। सुख पाने की आकांक्षा में वह उद्विग्र भी नहीं होता। वह वीतराग हो जाता है। स्वयं को राग, भय, क्रोध से परे चलकर अपनी मनः स्थिति उच्चस्तर की बना लेता है। हम जैसे सामान्य व्यक्ति सुखों की इच्छा बराबर बनाए रखते हैं, दुख में परेशान हो जाते हैं। यही हममें व स्थितप्रज्ञ में सबसे बड़ा अंतर है। परमपूज्य गुरुदेव कहते थे कि दुख को तप बना लो एवं सुख को योग बना लो। 
यः सर्वत्रानभिस्त्रेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। (2/)
अर्थात् जो पुरुष स्त्रेहरहित होकर उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष रखता है, उसकी बुद्धि स्थिर है। इसी प्रकार अगले श्रोक में एक महत्वपूर्ण बात भगवान् के श्रीमुख से निकलती है-
यदा संहरते चायं कूर्मोऽड्र.ानीव सर्वशः।।
इंद्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। (2/)
अर्थात् ‘‘कछुआ सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैस ही जब यह पुरुष इंद्रियों के विषयों से इंद्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिए)।’’

गीता कहती है कि एक साधक स्तर का व्यक्ति संभव है कि इंद्रियों को विषयों से हटा ले, पर वे मन पर हमला न कर दें, इसलिए उसे सूक्ष्म इंद्रिय निग्रह में निष्णात होना चाहिए। यह विनोबा का मत है। आगे इकसठवें श्लोक में भगवान् कहते है-
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। (2/)
अर्थात्- ‘‘ इसलिए हर साधक के लिए अभीष्ट है कि वह इन संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके समाहित चित्त हो मरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इंद्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है।’’