Sunday, August 3, 2014

बाबा नीम करोली , राधानाथ स्वामी एवं प्रोफेसर रिचर्ड Part-2

अगली दोपहर मैं उसी धूलभरे मार्ग से होता हुआ हनुमान मंदिर पहँुच गया। न जाने क्यों मेरा मन आकांक्षाओं से भरा था। मंदिर में एक मिनट भी नहीं बीता होगा कि 20-24 वर्षीय एक व्यक्ति मेरे पास आया। ‘‘महाराजजी अभी आपसे मिलना चाहते हैं,’’ उसने कहा।
     ‘‘मुझसे?’’ मैंने अपनी ओर संकेत करके पूछा, ‘‘महाराजजी कौन हैं और वे मुझे कैसे जानते हैं?’’
     ‘‘ओह, वे तुम्हारे बारे में सब जानते हैं।’’
     ‘‘कृपया क्या तुम मुझे महाराजजी के विषय में कुछ बताओगे?’’ मैंने पूछा।
     ‘‘अभी नहीं। महाराजजी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। हम बाद में बातें करेंगे।’’
     मेरा हाथ पकड़कर वह मुझे एक धूप से भरे आँगन में ले गया जहाँ मधुरता से मुस्काते हुए एक मोटे व्यक्ति चैकड़ी मारे लकड़ी के पलंग पर बैठे थे। उनका शरीर एक पुराने कम्बल से ढका था। मैं निकट आ गया। छोटी सफेद दाढ़ी से भरा उनका चेहरा एक अलौकिक उल्लास से चमक रहा था। उनकी तेज आँखें मेरी आँखों के झरोखों से मेरे जीवन के रहस्यों में झाँकती हुई प्रतीत हो रही थीं। वे थे नीम करोली बाबा। जब मैं हिमालय में रह रहा था मैंने उनके असाधारण गुणों के विषय में सुना था। उनके अनुयायी स्नेहपूर्वक उन्हें महाराजजी बुलाते थे।
     जब मैं उनके निकट गया तो वे अपने सामने भूमि पर अर्धगोलाकार में बैठे कुछ भारतीय शिष्यों से हिन्दी में बोल रहे थे। मुझे देखते ही उनकी मोहक मुस्कान फूट पड़ी और उन्होंने मेरा स्वागत किया। उन्होंने अपनी तर्जनी उठाई और एक अनुवादक के माध्यम से बोलने लगे। ‘‘तुमने ज्ञान की खोज में अपनी सम्पत्ति एवं सभी सुख-आराम का त्याग किया है और बहुत संघर्ष करके भारत आये हो। अब तुम अकेले भ्रमण कर रहे हो और भगवान् के लिए रो रहे हो, जबकि वहाँ दूर बैठा तुम्हारा परिवार तुम्हारे लिए रो रहा है।’’ हाथ के सौम्य संकेत से उन्होेंने मुझे अन्यों के साथ बैठ जाने के लिए कहा। ‘‘डरो मत,’’ उन्होंने ये शब्द इतनी गम्भीरता से कहे कि उनकी भौंहे तन गई और होंठ कड़क हो गये। ‘‘सभी कठिनाईयों को सहन करते हुए आनन्दित रहो। भगवान् श्रीकृष्ण ने तुम्हारी प्रार्थनायें सुन ली हैं और वे तुम्हें वृन्दावन लाये हैं। राम और कृष्ण के नामों का कीर्तन करने से सबकुछ प्राप्त हो जाता है ‘‘किन्तु,’’ सिर हिलाते हुए उन्होंने कहा, ‘‘लोग निन्दा और कलह की बुरी आदत के कारण स्वयं अपने लिए नरक उत्पन्न्ा कर रहे हैं। कभी भी दूसरों के दोष मत देखो और अहंकार के मार्ग पर मत चलो।’’
     ऐसा लगा कि शायद उन्हें मेरे बारे में सबकुछ मालूम था और उन्होंने वही शब्द कहे जिनकी मुझे आवश्यकता थी। मैं मन्त्रमुग्ध और आश्चर्यचकित हो गया। ‘‘किन्तु लगभग पूरी दुनिया इसी जंजाल में फँसी है, मैं कैसे बच सकता हँू?’’ मैंने पूछा।
     मुस्कुराहट के साथ उनकी आँखें दमक उठीं। ‘‘सब से प्रेम करो, सब की सेवा करो और सब को भोजन खिलाओ। हनुमानजी के समान बिना स्वार्थ और लोभ के सेवा करो। यह कुँजी है भगवान् को जानने की।’’
     एक विनोदी बच्चे के भाव के साथ उन्होंने अपना हाथ अपने मुख की ओर किया और संकेत द्वारा हमें प्रसाद के लिए आमन्त्रित किया।
     प्रसाद के लिए बने विशेष हाॅल में प्रवेश करते हुए मैंने अपने मार्गदर्शक से उनके गुरु के विषय में सुनने की आतुरता व्यक्त की। वे मान गये। ‘‘मैं हिमालय में स्थित नन्दीताल के निकट एक गाँव से हँू और बचपन से ही महाराजजी से प्रेम करता हँू।’’ हम भूमि पर पंक्तियों में बैठ गये। एक भक्त ने हमारे सम्मुख पत्तल रख दी और करछी से उसमें स्वादिष्ट प्रसाद परोस दिया। मेरे मेजबान सफेद कमीज और पैन्ट पहने हुए थे, उनके घुँघराले काले बालों में तेल लगा था और वे सुन्दरता से कंघी किये थे। एक छोटी प्रार्थना के पश्चात् वे नीम करोली बाबा की कुछ स्मृतियाँ बताने लगे। ‘‘महाराजजी एक सिद्ध पुरुष हैं। मैंने स्वयं अपनी आँखों से उनके भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञान को देखा है। वास्तव में वे सदैव जानते हैं कि मैं कहाँ हँू और क्या कर रहा हँू।’’ उन्होंने कुल्हड़ से शीतल लस्सी का घूँट भरा।
     ‘‘मैं तुम्हें कुछ और बताता हँू,’’ उन्होंने कहा। ‘‘महाराजजी कई बार एक ही समय में दो स्थानों पर होते हैं। यह प्रमाणित हो चुका है। हम सर्वथा अनपेक्षित क्षणों में उनके प्रकट या अप्रकट होने की अपेक्षा करते हैं। उनके विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। किसी भी क्षण वे प्रकट या अदृश्य हो सकते है; कभी दण्ड देते हैं तो कभी प्रशंसा करते हैं; कभी पहेलियों में बात करते हैं तो कभी गहन सत्य बोलते हैं; किसी को यह संसार त्यागने के लिए कहते हैं तो किसी को विवाह करने के लिए। किन्तु एक बात से हम सब विश्वस्त हैं कि वे सदैव हमारे अच्छे गुणों को ऊपर लाते हैं और हमें भगवान् के निकट ले जाते हैं।’’ वह गर्व से मुस्कुराया। ‘‘यद्यपि नीम करोली बाबा एक गम्भीर योगी हैं, उनका नटखटपन हमारा मन मोह लेता है। बिल्कुल हनुमानजी की तरह।’’
     मुझे गरम-गरम हलवा परोसा गया, सूजी और घी से बना। मुँह में लार उत्पन्न्ा कर देने वाली महक से कमरा भर उठा। हम खा ही रहे थे कि नीम करोली बाबा दरवाजे पर आये। हमें प्रसाद का आनन्द लेते देखे वे प्रसन्न्ातापूर्वक मुस्कुराये। मुझे भी उनके मधुर स्वभाव को देखकर बहुत आनन्द हुआ। उन्होंने हमें जो सिखाया वे स्वयं उसके मूर्तिमान स्वरूप थे। ‘‘सभी से प्रेम करो, सभी की सेवा करो और सभी को भोजन खिलाओं।’’ हनुमानजी की भाँति।
     अगले दिन मैं पुनः वहाँ आया और देखा कि महाराजजी कुछ अनुयायियों के बीच बैठे रामायण से हनुमानजी की भक्ति-कथायें सुना रहे थे। भावावेश में नीम करोली बाबा काँप रहे थे और उनके नेत्रों से अश्रु प्रवाहित हो रहे थे। अगले कुछ सप्ताहों तक मैं प्रतिदिन घण्टा-डेढ़-घण्टा महाराजजी के चरणों में बैठकर बिताता। जब मैं वहाँ होता वे कोई औपचारिक प्रवचन नहीं देते, अपितु अपने अनुयायियों के साथ बातचीत या कीर्तन करते। मैं यह देख सम्मोहित हो गया कि कैसे वे प्रश्नों का छोटा किन्तु बुद्धियुक्तसटीक उत्तर देते थे, जैसे, ‘‘भगवान् की सृष्टि के प्रत्येक जीवन की नम्रता, सम्मान और प्रेम से सेवा करो,’’ या, ‘‘केवल श्रीराम के नामों का कीर्तन करो और सबकुछ प्राप्त हो जायेगा।’’ एक दिन वे मेरी ओर मुड़े, उनकी आँखें मानो मेरी आत्मा को टटोल रही थीं। तभी एक अँगुली उठाकर वे बोल उठे, ‘‘एक, एक, एक। भगवान् एक हैं।’’
     पश्चिमी लोग भी नीम करोली बाबा को जानते हैं, मुझे यह उस समय तक मालूम नहीं पड़ा जब तक मेरी पीढ़ी के एक विख्यात् व्यक्ति बाबा रामदास वहाँ नहीं आये। एक दिन जब मैं महाराजजी के चरणों में बैठा था रामदास के साथ विदेशियों का एक छोटा समूह अचानक आश्रम में आ पहँुचा। रामदास बाबा 1960 के दशक के हिप्पी आन्दोलन के प्रसिद्ध व्यक्ति थे। पहले वे हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक विवादग्रस्त प्रोफैसर रिचर्ड एल्पर्ट थे जिन्होंने टिमेाथी लियरी के साथ मिलकर इस दावे के साथ एल.एस.डी. (एक मादक पदार्थ) का प्रसार किया था कि इसके सेवन से आध्यात्मिक चेतना विकसित होती है।
     प्रवेश करने पर रामदास ने नम्रता से अपने सफेद होते सिर को एक छोटे बालक के समान अपने गुरु की गोद में रख दिया। उनके गुरु के हृदय से स्नेह उमड़ पड़ा और वे लाड़पन से अपने शिष्य की सफेद होती दाढ़ी को खींचते और उसके सिर को एक बालक की भाँति थपथपाते हुए हँसने लगे। महाराजजी ने कहा, ‘‘हम तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहे थे।’’ मेरे लिए यह देखना बहुत रोचक था कि एक विख्यात् हार्वर्ड विद्वान् और प्रभावशाली व्यक्ति अपने साथ हो रहे एक छोटे शरारती बच्चे जैसे व्यवहार का आनन्द ले रहा था। महाराजजी ने मुस्कुराते हुए हमारी और देखा और हाथ हिलाते हुए बोले, ‘‘जाओ, प्रसाद ले लो।’’ महाराजजी को रहस्यमय तरीके से उनके असूचित आगमन का भान हो गया था, तभी अन्य दिनों की अपेक्षा आज अधिक मात्रा में विशेष भोज की व्यवस्था की गई थी।
     मुझे रामदास और उनके समूह को वृन्दावन के कुछ पवित्र स्थलों पर ले जाने का सौभाग्य मिला। एक दिन हमने आनन्दमयी माँ के आश्रम में उनके कीर्तन और प्रवचन में भाग लिया। उन्हें हिमालय में मेरे साथ हुई भंेट का स्मरण था। विशाल श्रोता समूह को प्रवचन देते हुए उन्होंने मेरी ओर देखा और सिर हिलाया तथा मेरे आध्यात्मिक मार्ग की सही दिशा की पुष्टि करते हुए कहा, ‘‘जब भी तुम्हारे लिए सम्भव हो पवित्र नाम के प्रवाह को बनाये रखो। भगवान् के नामों का उच्चारण भगवान् के ही संग में रहने के समान है। यदि तुम अपने परम मित्र के साथ संग करोगे तो वे तुम्हारे समक्ष अपना सच्चा सौन्दर्य प्रकट करेंगे।’’ जब कार्यक्रम समाप्त हुआ रामदास और मैं अंतरंग वार्तालाप करने लगे। किन्तु राम हो रही थी, इसलिए उन्होंने मुझे बातचीत जारी रखने के लिए अगले दिन अपने निवास पर आमन्त्रित किया।
     मैं समय से पहले ही जयपुर धर्मशाला पहँुच गया। वह अतिथिगृह कपड़ों की दुकानों और खाने-पीने के खोमचों के बीच शोरगुल से भरी एक गली में बना था। दोनों ओर से आते रिक्शाचालक पैदल चलने वालों को हटाने के लिए जोर-जोर से भोंपू बजा रहे थे। बाबा रामदास ने दरवाजा खोला। प्रातःकालीन सूर्य की किरणों से उनका मुस्कुराता चेहरा चमक उठा। मैंने अपनी दृष्टि उनके कमरे में घुमाई जो किसी विख्यात् प्रोफेसर का निवासस्थान नहीं अपितु एक सीधे-सादे साधु का कमरा लग रहा था। शिष्टता से वे मुझे कमरे में रखे एकमात्र पलंग तक ले गये। मुझे बैैठाने के पश्चात् वे स्वयं अपनी लहराती सफेद धोती को फैला चैकड़ी मारकर बैठे गये। हम आमने-सामने बैठे थे। उनके गँजे होते सिर के सफेद बाल लहराकर उनके कँधे पर गिर रहे थे।
     पास की खिड़की से आये हवा के झोंके ने उनकी बिखरी दाढ़ी को हल्के से हिला दिया। उनकी बड़ी नीली आँखें चमक रही थीं। आँखों के कोनों में पड़ी धुँधली झुर्रियाँ उनकी मुस्कुराहट के साथ और गहरी हो जाती। बिना कोई शब्द कहे हम केवल आँखों के माध्यम से एक-दूसरे के हृदयों में देख रहे थे। वे क्षण मानो कालातीत थे। हमारे बीच उस लम्बी टकटकी ने मेरी दृष्टि को इस प्रकार प्रभावित किया कि कभी वे मुझे एक मासूम बच्चे लगते तो कभी एक प्राचीन उदासीन साधु।
     अनायास ही मुझे भगवद्गीता का एक श्लोक स्मरण हो आया-‘‘जिस प्रकार शाश्वत आत्मा इस शरीर में बाल्यावस्था से युवावस्था और फिर वृद्धावस्था में प्रेवश करती है, उसी प्रकार मृत्यु के समय वह अन्य शरीर में प्रवेश करती है। आत्मज्ञानी व्यक्ति ऐसे परिवर्तन से विमोहित नहीं होता।’’ एक विलक्षण शान्ति पूरे कमरे में छाई थी। इसी प्रकार शायद आधा घण्टा बीत गया, फिर रामदास ने एक गहरी श्वास भरी, अपने कन्धों को धीरे से उचकाया और खामोशी तोड़ते हुए ओउम् का उच्चारण किया।
     ‘‘क्या आप मुझे अपनी आध्यात्मिक यात्रा के विषय कुछ बता सकते हैं?’’ मैंने उनसे पूछा। मैं यह जानने के लिए उत्सुक था कि वे भारत कैसे आये और कैसे अपने गुरु से मिले।
     रामदास पलंग पर थोड़ा हिलडुल कर सीधे बैठे गये, मानो कथा सुनाने के लिए स्वयं को तैयार कर रहे हों। ‘‘कुछ वर्ष पूर्व मैं भारत आया था,’’ उन्होंने आरम्भ किया। ‘‘मैं अपने साथ एल.एस.डी लाया, यह सोचते हुए कि यहाँ हमें कोई तो मिलेगा जो इसके विषय में हम पश्चिमवासियों से अधिक समझ पायेगा। यात्रा के दौरान मुझे एक अमरीकी साधु भगवान् दास मिले, जिन्होंने मुझे नीम करोली बाबा के पास भेजा। यह 1964 की बातें हंै। मैं अपनी माँ की मृत्यु से शोकग्रस्त था। महाराजजी ने मेरे हृदय में देखा और अकल्पनीय करुणा द्वारा मुझे ढाढस बँधाया। मेरे द्वारा अपने जीवन के विषय में एक भी शब्द कहे बिना उन्होंने मेरे हृदय को पढ़ लिया और मेरे भूतकाल की गोपनीय बातें बता दीं। उनकी शक्तियों ने उनके प्रेम, बुद्धि और हास्य-विनोद के साथ मिलकर मेरे जीवन को परिवर्तित कर दिया।’’
     ‘‘जब मैं पहली बार उनसे मिला मुझे भी ऐसा ही अनुभव हुआ था,’’ मैंने कहा। ‘‘ऐसा लगा मानो उन्हें मेरे बारे में सबकुछ मालूम था।’’
     बाबा रामदास मुस्कुराये। ‘‘एक दिन महाराजजी ने मुझझे पूछा, ‘वह दवाई कहाँ है’। पहले तो मैं चकरा गया किन्तु भगवान् दास ने बताया कि वे एल.एस.डी. के बारे में पूछ रहे हैं। कौतूहलवश मैंने शुद्ध एल.एस.डी. की तीन गोलियाँ निकालकर उन्हें दे दीं और मुझे आश्चर्य में डालते हुए वे उन्हें निगल गये। मैं वैज्ञानिक तरीक से उनकी प्रतिक्रिया को जाँचने के लिए तैयार था, किन्तु कुछ नहीं हुआ-कुछ भी नहीं। वे तो एल.एस.डी. से परे हैं!’’
     हिमालय के योगियों की शक्तियों का प्रत्यक्ष अनुभव होने के कारण मैं विस्मय से हँसने लगा।

     रामदास कमर सीधी रखे चैकड़ी मारकर बैठे रहे। ऊपर की ओर खुलीं उनकी हथेलियाँ उनकी गोद में रखी थीं। ‘‘मैं महाराजजी के संग से स्वयं को अलग नहीं रख पाया और इसलिए जितना सम्भव हुआ उनके साथ रहा। मुझे अपना शिष्य स्वीकारते हुए उन्होंने मुझे रामदास नाम दिया, अर्थात् भगवान् राम का सेवक। उनके असाधारण संग में महीने बीत गये। भले ही मैं अमरीका में बहुत प्रभावशाली था, महाराजजी ने मुझे वहाँ से किसी को उनके पास लाने से मना कर दिया।’’ रामदास ने अविश्वास में अपना सिर हिलाया। ‘‘किसी भी संसारी वस्तु की ओर उनका रुझान नहीं है, न धन, न नाम और न अनुयायी। मैंने उन जैसा व्यक्ति कभी नहीं देखा।’’ अपने गुरु के प्रति प्रेम की अनुभूति करते हुए उनकी वाणी काँपने लगी। ‘‘जब मैं महाराजजी के साथ बैठता हँू तो मुझे लगता है कि मेरे हृदय में सभी के प्रति निःस्वार्थ प्रेम हैं’’ उसी वर्ष में 1962 में रामदास ने अपनी कथा एक प्रसिद्ध पुस्तक बी हीयर नाओ में प्रकाशित की।   
साभार: अनोखा सफ़र

राधानाथ स्वामी की अध्यात्मिक खोज यात्रा part-1

ये प्रसंग राधानाथ स्वामी की प्रसिद्ध पुस्तक अनोखा सफर - एक अमेरिकी स्वामी की आत्म कथा से लिए गए हैं 19 वर्ष की उम्र में रिचर्ड स्लेविन नामक एक रोमांच प्रिय अमेरिकी युवक अध्यात्म की खोज में शिकागों स्थित अपने घर को छोड़कर युरोप एवं मध्य-पूर्व एशिया के स्थल मार्ग से चल कर भारत पहुॅंचतें हैं भरत में आकर हिमानय के वनों एवं गुफाओं, योगयों, नागा बाबाओं, लामाओं एवं आयु सन्तों के सान्ध्धिय में शिक्षा ग्रहण करते हैं। अनन्तः उनकी यात्रा उन्हें भारतिीय अध्यात्म के केन्द्र बिन्दृ तक ले जाती है और वह एक प्रसिद्ध गुरू के रूप में भारत माता की सेवा करते हैं परमसत्य की खोज में उनकी यह साहसपूर्ण यात्रा अनके परीक्षाओं खतरों से प्रलोभनों से भर है तथा हम सबके लिए एक अद्भुत मार्गदर्शिका है
     
मैंने ऋषिकेश को छोड़कर उत्तर में हिमालय की और ऊँचाइयों पर जाने का निश्चय किया। देव प्रयाग में मुझे एक ऐसा व्यक्ति मिला जिसका चरित्र मेरे मानसपटल पर सदा-सदा के लिए अंकित रहेगा। एक सर्द सुबह जब तारे धूमिल हो रहे थे और नये दिन का सूर्य उदित होने ही वाला था, मैं पर्वत से उतरकर उस स्थान पर पहँुचा जहाँ भागीरथी और अलकनन्दा का संगम होता है। इस संगम से आगे नदी का नाम गंगा पड़ता है। वहाँ नदी का गीत कोलाहलपूर्ण था। नदी के भीषण प्रवाह की शक्ति से अनभिज्ञ मैं स्नान हेतु उसमें उतर पड़ा। मैंने जैसे ही एक कदम बढ़ाया तेज प्रवाह ने मेरे पैर उखाड़ दिये और मैं खतरनाक ढलानों की ओर बहने लगा। उसी समय  मेरे निकट स्नान कर रहे एक बलवान व्यक्ति ने मेरी भुजा को अपने शिकंजे में पकड़कर खींचा और मुझे तट तक ले गया। मेरे रक्षक ने फिर अपनी दाहिनी हथेली मेरे सिर पर रखी और पूरे हृदय से मेरे संरक्षण के लिए मन्त्रों का जप करने लगा। इस प्रकार मैं पहली बार कैलाश बाबा से मिला।
     कैलाश बाबा लगभग साठ वर्ष के थे। उनका शरीर बलशाली था और उन्होंने अपनी सफेद होती जटाओं को सिर पर बाँधा हुआ था। जब वे जटायें खोलते तो वें जमीन तक लटक जातीं। अनेक दशकों से उन्होंने अपने शरीर के किसी भी बाल को नहीं काटा था। उनका चेहरा चैकोर, लम्बी भूरी आँखें, ऊँचे कपोल और मुँह में सारे दाँत सलामत थे, जो वृद्ध साधुओं में अत्यन्त दुर्लभ है। उनके तन पर कन्धों से पैरों तक एक ही वस्त्र था। वे अपने हाथ में लोहे का एक त्रिशूल रखते थे जिसके ऊपर एक बड़ा डमरु बँधा रहता था। उस डमरु के दो सिर थे, प्रत्येक का व्यास लगभग बारह इंच था और उसके बीच रस्सी से बँधी एक गेंद लटकी हुई थी। जब बाबा डमरु हिलाते तो वह गंेद घूमती हुई दोनों सिरों पर टकराकर ऊँची आवाज करती। लोहे का एक भिक्षापात्र और एक पुराना कम्बल उनकी सम्पत्ति का कुल हिस्सा था।
     कैलाश बाबा ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मुझे सिखाया कि एक यायावार साधु को कैसे जीवन यापन करना चाहिए। ठण्डी रातों में हम नदी को देखते-देखते पहाड़ों के किनारे सो जाते। एक रात उन्होंने मुझे अपना कम्बल दिया और मेरे बार-बार मना करने पर भी वे जोर देते रहे। तत्पश्चात् अनेक रातों तक हम एकसाथ एक ही कम्बल में सोये। उन्होंने मुझे सिखाया कि कैसे जंगल के कंदमूल, फलों और पत्तों की पहचानकर भोजन और औषधियाँ प्राप्त की जा सकती है।
     मुझे गाँव में ले जाकर उन्होंने सिखाया कि किस प्रकार सद्व्यवहार के साथ साधु आदरपर्वूक भिक्षा माँगता है। पश्चिम संस्कृति के विपरीत यहाँ साधुओं द्वारा गाँवों में भिक्षा माँगना जीवन यापन का एक सम्मानजनक तरीका माना जाता है, क्योंकि लोग साधुओं से इतना कुछ पाते हैं कि बदले में वे भिक्षा देकर उनकी सेवा करते हैं। कैलाश बाबा जैसे महान् व्यक्ति को भिक्षा माँगता देखकर मुझे लगा कि भिक्षा माँगना भी एक महान् कार्य है। उन्होंने मुझे सूखे चिवड़े पर निर्वाह करना सिखाया। यह सबसे सस्ता भोजन है और कोई भी बनिया प्रसन्न्ातापूर्वक इसे दे देता है, और क्योंकि यह जल्दी खराब नहीं होता इसलिए जंगल में हफ्तों तक इसे खाकर निर्वाह किया जा सकता है। भोजन के लिए उसमें केवल नदी का जल मिलाने की आवश्यकता है। उन्होंने मुझे सिखलाया कि कैसे शरीर को रगड़कर नहाना। खाने और स्वच्छ रहने की शिक्षाओं के अतिरिक्त उन्होंने मुझे न केवल पवित्र नदियों, मंदिरों, वृक्षों, सूर्य, चन्द्र और यज्ञाग्रि का, अपितु साँप, बिच्छू एवं सभी जंगली जानवरों का भी आदर करना सिखाया। वे अंग्रेजी नहीं बोलते थे, लेकिन उनमें अपने विचार मुझ तक सम्प्रेषित करने की एक जादुई शक्ति थी, विशेषतः यह विचार कि भगवान् सभी जीवों के हृदय में निवास करते हैं। उदाहरणतः उन्होंने मुझे एक विषैले साँप के हृदय में स्थित आत्मा को देखना और उसे चले जाने का रास्ता देकर उसका सम्मान करना सिखाया। साधुओं की संगत के दौरान अन्य साधुओं को विभिन्न्ा उपाधियों के आधार पर सम्बोधन करना और उनके साथ भोजन करने का शिष्टाचार भी उन्होंने मुझे सिखाया।
     एक साथ भ्रमण करते हुए वे धीरे-धीरे मेरे पिता तुल्य बनते गये और वे मुझपर इतना प्रेम बरसाने लगे मानो मैं उन्ही का पुत्र हँू। यद्यपि हमने कभी बात नहीं की, किन्तु जहाँ हृदय में परस्पर स्नेह होता है वहाँ भावनाओं की अभिव्यक्ति भाषा की सभी सीमाओं को लाँघ जाती है। एक सादे संकेत से, अँगुली दिखाने, मुस्कुराने या भौंहे सिकोड़ने से उन्होंने मुझे वह सब कुछ सिखा दिया जिसकी मुझे आवश्यकता थी। दिखने में वे एक भयंकर ऊबड़-खाबड़ पहाड़ जैसे व्यक्ति लगते, जो तपस्या से कठोर होकर हाथ में त्रिशलू उठाये घूमते थे। किन्तु मैंने उनमें एक ऐसा व्यक्ति पाया जो मुझे अबतक मिले सर्वाधिक दयालु और सज्जन पुरुषों में से एक था। हम जो भी सादा भोजन एकत्रित करते वे पहले मुझे भरपेट खिलाते और फिर स्वयं खाते। जब मैं पहले खाने से मना करता तो वे अपनी अबोध दृष्टि द्वारा सहजता से मुझे पराजित कर देते। वास्तव में वे जब भी मेरी ओर देखते स्नेहभरे आँसू उनकी आँखों में उमड़ आते। स्नेह के एक पर्वत तुल्य कैलाश बाबा के प्रति मेरे हृदय में ऐसा प्रेम था जैसा एक आजीवन मित्र के प्रति रहता है।
     उनसे एवं अन्य लोगों से मैं हिन्दु धर्म में पाये जाने वाले भगवान् के विभिन्न्ा रूपों और देवी-देवताओं के विषय में जानने लगा। मैं उन देवताओं की प्रतिमाओं और उनके द्वारा लिये गये विभिन्न्ा स्वरूपों के विषय में कुछ निश्त् िनहीं कर पा रहा था, क्योंकि मेरे लिए वे सभी नये थे। किन्तु मैं देख सकता था कि ये मूर्तियाँ गहरे प्रेम और भाक्ति को प्रेरित करती हैं। मेरे मन के द्वार खुले थे और मैं सबकुछ समझने के लिए उत्सुक था।
     कैलाश बाबा के आराध्य देव शिवाजी थे। शिवजी ईश्वर के वे स्वरूप हैं जो भौतिक जगत् और उसके संहार का नियंत्रण करते हैं। कैलाश बाबा निरन्तर ओअम् नमः शिवाय मन्त्र का जप करते रहते। जब हम जंगली पथ से गुजरते तो वे ऊँची आवाज में शिव-पार्वती के नाम पुकारते, ‘‘जय शंकर,’’ ‘‘हे विश्वनाथ,’’ ‘‘हे केदारनाथजी,’’ ‘‘जय श्रीपार्वती,’’ और ‘‘हे उमा माता,’’। जब भी हम अन्य शैवों के पास होते तो हम एकसाथ मंत्रोच्चारण करते। कीर्तन जब अपनी पराकाष्ठा पर पहँुच जाता तो कैलाश बाबा हर्षातिरेक में जोर-जोर से अपना डमरु बजाने लगते। उसकी आवाज लगभग बहरा कर देने वाली होती। वह डमरु साधुओं को हर्ष से उन्मादित कर देता। वे पागलों की भाँति अपना सिर घुमाने लगते और उनकी जटायें इधर-से-उधर लहराने लगती। कुछ साधु ताली बजाते और शेष अपने पैरों पर खडे़ होकर एक दैवी नृत्य करने लगते।
     बिना ठौर-ठिकाने के रहने वाले इन साधुओं में कैलाश बाबा का बहुत सम्मान था। जंगल में एक वृद्ध तपस्वी ने मुझे चुपचाप बताया कि कैलाश बाबा सैकड़ों वर्ष बूढ़े हो सकते हैं। किसी को भी उनकी वास्तविक उम्र का ज्ञान नहीं था। उनके पास रोगियों को ठीक करने और अद्भुत कार्य करने की अलौकिक योग-सिद्धियाँ थीं। ‘‘लगभग तीस वर्ष पूर्व मैंने प्रत्यक्ष इनके चमत्कारों को देखा था,’’ उस व्यक्ति ने कहा। ‘‘लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी और बाबा को भगवान् की तरह पूजने लगी। लेकिन बाबा ने जान लिया था कि आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य सिद्धियों या ख्याति की प्राप्ति नहीं है। उन्होंने प्रण लिया कि वे कभी भी अपनी इन शक्तियों का प्रदर्शन या वर्णन नहीं करेंगे। उन्होंने न तो शिष्य बनाये और न ही कोई आश्रम खोला, अपितु अकेले हिमालय के वनों में घूमते रहे।’’ मुझे यह जानकर आश्चर्य नहीं हुआ कि कैलाश बाबा के पास महान् योग शक्तियाँ थीं। निश्चित् ही मैं उनसे प्रभावित था, किन्तु मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया उनके चरित्र ने और अपने आध्यात्मिक मार्ग के प्रति उनकी समर्पित भक्ति ने।
     जैसे-जैसे दिन बीते मुझे एहसास होने लगा कि कैलाश बाबा की एकान्त में जाने की इच्छा हो रही है। मैं उनपर बोझ नहीं बनना चाहता था और समझ गया कि मेरे लिए भी अब आगे बढ़ने का समय आ चुका है। उनके चरणों में प्रणाम करते हुए मैंने उनसे आशीर्वाद की याचना की। बाबाजी ठहाका लगाकर हँस पड़े। फिर उनकी आँखों में आँसू भर आये और उन्होंने कसकर भालू के समान मेरा आलिंगन किया। तब एक मन्त्र उच्चारण करके उन्होंने मुझे अपना आर्शीवाद दिया। विदाई के समय उनके हृदय की कोमलता और विरक्ति की दृढ़ता ने मुझे छू लिया। हम एक-दूसरे से एक पिता और पुत्र के समान प्रेम करते थे, किन्तु हम समझ गये कि विचरते साधु होने के कारण हम पुनः कभी नहीं मिल पायेंगे।

     लोगों से मधुर सम्बन्ध बनाना और उन्हें छोड़कर पुनः आगे बढ़ जाना, यह कड़वा-मीठा अनुभव मेरे द्वारा चुने गये जीवन का एक अंग बन चुका था। यह मेरे लिए कठिन था। लेकिन विरह की पीड़ा सम्बन्धों की मधुरता को मेरे हृदय में जीवन्त बनाये रखती। मुडकर कैलाश बाबा से दूर जाते हुए मैंने प्रार्थना की कि मैं उन्हें कभी न भूलूँ। और आज भी वे मेरे हृदय में विद्यमान है।   
साभार: अनोखा सफ़र   

Monday, July 28, 2014

जीवन की पूर्णता के लिए भक्ति व शक्ति आवश्यक

मानव जीवन को कुशलता व सफलतापूर्वक जीने के लिए भक्ति व शक्ति दोनें का विकास आवश्यक है। यदि हम केवन एक पक्ष पर ही ध्यान देंगे तो जीवन कहीं न कहीं कष्ट कठिनाई से घिरने लगेगा। इस सत्य को दर्शाने वाली एक रोचक पुराण कथा का वर्णन किया जा रहा हैः-
पुराण में चर्चा हैः कोसल नरेश अनिरुद्ध एक काशीरात अविरुद्ध की। ये दोनों ही जगन्माता के निष्ठावान भक्त थे। संयोग से इल दोनों को ही महर्षि मुद्गल का मार्गदर्शन प्राप्त था। साझा मार्गदर्शन के बावजूद इनकी मति साझी न थी।इनके विचार अलग थे, प्रकृति या स्वभाव भिन्न था। महर्षि मुद्गल ने इन्हें अनेक तरह से समझाया, पर इन दोनों को बात पूरी न समझ में आई। अपने स्वभाव के अनुरूप कोसल नरेश अनिरूद्ध शक्ति की ओर आकर्षित थेऋ जबकि काशीराज अविरूद्ध की रुचि भक्ति की ओर थी। अनिरुद्ध जिस तरह से भक्ति को व्यर्थ समझते थे, ठीक उसी तरह से अविरुद्ध के लिए शक्ति निस्सार थी।
            महर्षि ने उन्हें अनेकों ढंग से समझाया। उनमें परस्पर मेल-मिलाव के प्रयास भी कराए, परन्तु उन्हें इसमें कोई विशेष सफलता नहीं मिली। स्वभाव के भेद के साथ उनकी दिशाएॅं भी भिन्न रहीं। हालाॅंकि ये दोनों ही महर्षि का विशेष आदर करते थे। इसीलिए उनके कारण इनमें प्रत्यक्ष में कोई विवाद न था। इसी बीच महर्षि ने तप के लिए हिमालय की ओर प्रस्थान किया। उनके प्रस्थान के साथ कोसल नरेश की शक्ति अब नियंत्रित न रही। काशी के राजा अपनी भक्ति के कारण लोकप्रिय थे। उनका नाम चहुॅं ओर फेल रहा था। वे दीनों के रक्षक और निराधार के आधार थे।
            कोसलपति ने जब उनकी कीर्ति का विस्तार देखा तो वे जल-भुन गए। झट उन्होंने सेना ली और काशी पर चढ़ आए। युद्ध में काशीराज हार गए और वन में भाग गए, पर किसी ने कोसल नरेश का स्वागत नहीं किया। काशीराज की पराजय से वहाॅं की प्रजा दिन-रात रोने लगी। कोसल नरेश ने देखा कि प्रजा उनका असहयोग कर कहीं विद्रोह न कर बैठे, इसलिए शत्रु को निःशेष करने के लिए उन्होंने घोषणा करा दी कि जो काशीपति को ढूॅंढ़ लाएगा, उसे सौ मोहरें दी जाएॅंगी। जिसने घोषण सुनी, आॅंख-कान बंद कर जीभ दबा ली।
            इधर काशीराज दीन-मलीन हो जंगलों में भटक रहे थे। एक दिन एक पथिक उनके सामने आया और पूछने लगा - ”वनवासी! इस वन का कहाॅं जाकर अंत होता है औ काशी का मार्ग कौन-सा है?“ राजा ने पूछा - ”तुम्हारा वहाॅं जाने का कारण क्या है?“ पथिक बोला - ” मैं व्यापारी हूॅं। मेरी नौका डूब गई है। अब द्वार-द्वार भीख माॅंगता फिरता हूॅं। मैंने सुना था कि काशी का राजा बड़ा उदार है, अतएव उसी के दरवाजे जा रहा हूॅं, शायद वही मेरी कुछ मदद कर सके।“ थोड़ी देर कुछ सोचकर राजा ने कहा -”चलो, तुम्हें वहाॅं पहुॅंचा ही आउळॅं। तुम बहुत दूर से परेशान होकर आए हो।“
            इसके कुछ दिन बाद कोसल नरेश की सभा में एक जटाधारी व्यक्ति आया। कोसल नरेश ने पूछा -” कहिए किसलिए पधारे? जटाधारी ने कहा - ”मैं काशीराज हूॅं। आपने मुझे पकड़ लाने वाले को सौ स्वर्ण मुद्राएॅं देने की घोषणा कराई है। बस, मेरे इस साथी को धन दे दो। इसने मुझे पकड़कर आपके पास उपस्थित किया है।“ यह सुनकर उस व्यापारी के साथ सारी सभा सन्न रह गई। प्रहरी की आॅंखों में भी आॅंसू आ गए। कोसलपति भी सारी बातें जानकर स्तब्ध रह गए।
            क्षण भर के बाद उनका अंतर्विवेक जाग उठा, वह बोले - ”महाराज! गुरुदेव महर्षि मुद्गल सत्य कहते थे - शक्ति के साथ भक्ति न हो तो विवेक नहीं रह जाता। आज आपके भक्तिपूर्ण जीवन के सान्निधय में मेरा विवेक जाग उठा है। आज के युद्ध में मैं अपनी दुरंत आशा को जीतूॅंगा। आपका राज्य भी लौटा देता हूॅं, साथ ही अपना हृदय भी प्रदान करता हूॅं“। बस, झट उन्होंने उनका हाथ पकड़कर सिंहासन पर बिठला दिया और उनके मलिन मस्तक पर मुकुट चढ़ा दिया। सारी सभा धन्य-धन्य कह उठी। व्यापारी को भी उसकी माॅंगी हुई स्वर्ण मुद्राएॅं मिल गईं। इतने में महर्षि मुद्गल भी उसी सभा में पधार गए। काशीराज व कोसल नरेश, दोनों ने उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने इन दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहा- ”अब तुम दोनों ठीक समझे कि जगन्माता के नित्यस्वरूप को शक्ति व भक्ति के सुखद संयोग से ही समझा जा सकता है।“


Friday, July 18, 2014

सद वाक्य

  1. अवांछनीय परिस्थिति से उभरने के लिए की गई पुकार का नाम ही प्रार्थना है।
  2. यदि मनुष्य के पास कोई ऐसा आदर्श नहीं है, जिसके लिए वह मर-मिट सके तो उसके पास ऐसा कुछ भी सार्थक नहीं है जिसके लिए वह जीवन जीए।
  3. व्यक्ति सुबह शाम जप, ध्यान व पूजा पाठ तो करता है परन्तु शेष दिन की गतिविधियों एवं व्यावहार में वह शुद्र मानसिकता और स्वार्थीपन दिखाता है। ऐसा व्यवहार घण्टों की ध्यान साधना द्वारा प्राप्त फल पर पानी फेर देता है। 
  4. सद्गुणों का विकास व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति का एक मूलभुत अंग है। इसकी तुलना खेत में से कंकर पत्थर और खरपतवार निकालने से की जा सकती है जिसके बिना मिट्टी उपजाउ नहीं बन सकती। बिना सद्गुणों के विकास के व्यक्ति में वह पात्रता विकसित नहीं होती जिससे व्यक्ति आध्यात्मिक उळॅंचाईंयों को छू सके। मर्यादाएॅं और नैतिक मूल्य योग रूपी वृक्ष की जड़ के समान हैं।
  5. खाया पिया अंग लगेगा, दान किया संग चलेगा, बाकि बचा जंग लगेगा।
  6. दो जरूरी काम खुश रहें व खुश रखें।
  7. वाणी की अपेक्षा व्यक्तित्व से उपदेश देना कहीं अधिक प्रभावशाली है।
एक दुआ है रब्ब से,
किसी का दिल न दुःखे मेरी वजह से।
ऐ खुदा कर दे कुछ ऐसी इनायत मुझपे कि
खुशियाॅं ही मिलें सबको मेरी वजह से।।

जो दूसरों के दुख में दुखी होकर दया करता है वह खुद दुःख दे छूट जाता है। जो दूसरों के कष्ट में खुशी मनाता है वह खुद कष्ट में जा गिरता है।


      शीत ऊष्ण सुख दुःख तथा शत्रु मित्र समान,
      बन निःसंग विचरे सदा सहे मान-अपमान।
      निंदा-सतुति सम जानता संतोष भरा मन में,
      स्थिरमति प्रिय वह भक्त है सर्वोपरि जग में|

न त्वहं कामये राज्यं, न स्वर्गं, न पुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानाम् प्राणिनामार्तिनाशनम्।।
अर्थात् न मैं राज्य की कामना करता हूॅं, न स्वर्ग की और न मोक्ष की। मेरी तो बस एक ही मुराद है- दुःख आदि से तप्त प्राणी मात्र के सभी संतापों का नाश हो।

हमारी प्रवृत्ति दूसरों की बाह्य अवस्था देखकर उनके बारे में अच्छे-बारे की धारणाएं बनाने और केवल उनके दुर्गुणों को ढूंढ़ने की है। किन्तु यदि हम उनकी सतह के नीचें खोजेंगे तो हम पायेंगे कि असंख्य तत्त्व मिलकर एक व्यक्ति के स्वभाव के निर्माण करते हैं। दूसरों में हमें जो देाष दिखते हैं वे विषम परिस्थितियों के परिणाम हो सकते हैं, या वे ऐसी मानसिक प्रतिक्रियायें हो सकती हैं जो सदमें, आघात, शोषण, परित्याग, मोह भंग, असुरक्षा की भावना, पीड़ा, उलझन या रोग से उत्पन्न होती हैं।


यदि हम किसी के बुरे आचरण के मूल कारण को समझ जायेंगे, तो घृणा की अपेक्षा उस पर करुणा दर्शायेंगे। क्योंकि क्या प्रत्येक आत्मा मूलतः अच्छी नहीं है? एक सज्जन रोग से घृणा करेगा, परन्तु रोगी से प्रेम करेगा।

Tuesday, May 20, 2014

साधना में कर्म संस्कारों का क्षय

     प्रत्येक साधक यह चाहता है कि उसका ध्यान-जप में मन लगे। क्या कारण है कि कुछ व्यक्ति आराम से तीन चार घण्टें जप कर लेते हैं व अन्य दस पन्द्रह मिनट में ही उबने लगते हैं?
     जिनके चित्त का भार अधिक होता है उनमें जड़ता अधिक पाई जाती है जिस कारण वो अधिक तामसिक वृत्ति में रहते हैं। ऐसे बहुत से व्यक्ति होते हैं जो ऊपर से साफ सुथरे दिखते हैं परन्तु चित्त का भार अधिक होने से प्रयास करने पर भी जप ध्यान नहीं कर पाते। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो ऊपर से रजोगुणी दिखते हैं बाह्य जगत् में उलझे हैं परन्तु चित्त का भार कम है। ऐसे व्यक्ति आम तौर पर सुखी जीवन जीने के कारण ध्यान साधना की ओर प्रवृत्त नहीं होते। वातावरण के रंग में रंगे मौज-मस्ती का जीवन जीते रहे होते हैं। ये यदि अन्तर्मुखी होकर साधना के मार्ग पर चलें तो शीघ्र उन्नति कर सकते हैं।
     चित्त का भार कर्म संस्कारों की प्रबलता से बढ़ता है। कर्म संस्कारों के क्षीण करने के लिए भोगना एक माध्यम है, स्वयं के प्रयासों से जूझना दुसरा माध्यम है तथा किसी आध्यात्मिक शक्ति के तप का हस्तक्षेप तीसरा माध्यम है। आमतौर पर व्यक्ति को ये तीनों माध्यम अपनाने पड़ते हैं। यदि कर्म संस्कार नीच प्रवृत्ति के हैं तो भोगना काफी दुखदायी रहता है। बार-बार रोग आना, दुर्घटनाएँ होना आदि समस्याएँ पैदा होती हैं। ज्ञान, भक्ति, कर्म, ध्यान, यज्ञ, आयुर्वेद, medical science सभी का सहारा लेना पड़ता है। उदाहरण के लिए एक साधक के कर्म संस्कार कटते समय उसमें आवेश ( Anxiety ) पैदा होने लगे। आवेश पैदा होना बहुत से साधकों के जीवन में एक जटिल समस्या है। यदि यह बढ़ जाए तो व्यक्ति मानसिक रूप से विकृत भी हो सकता है। साधक के अपने मन को शान्त करने के लिए शान्ति के भावों को पैदा करना होता है। उन आयुर्वेदिक दवाईयों का प्रयोग करना होता है जो पित्त शान्त करती हैं जैसे मुक्ता पिष्टी ब्रह्म रसायन, खमीरा आदि। आवेश वाले वातावरण से स्वयं को दूर रखना होता है। बढ़े हुए वायु तत्व को नियन्त्रित करने के कुछ साधनात्मक उपाय करने होते हैं। अन्यथा ह्रदय की धड़कन बढ़ना, अधिक पसीना आना, बेचैनी उत्पन्न होना ये आवेश के लक्ष्ण हैं। यदि नींद कम हो जाए तो उसके लिए एैलोपैथिक हल्की trangualizer भी प्रयोग करनी पड़ सकती है।
     देवसताएँ अपनी तप शक्ति का प्रयोग भी साधक के कर्म संस्कारों को काटने में करती हैं। श्री अरविन्द के अनुसार इस प्रक्रिया में 30 वर्ष लग सकते हैं। परन्तु आज मानव में इतना धैर्य कहाँ जो तीस वर्ष की प्रतीक्षा करें। आचार्य जी ने इस प्रक्रिया को सरल बनाकर तीन से पांच वर्ष के भीतर कर्म संस्कारों के क्षय करने का प्रयोग अनेक साधकों पर किया है।
     यदि व्यक्ति को आध्यात्मिक जीवन जीना है तो सबसे पहले उसे अपने कर्म-संस्कारों का क्षय करना होगा, क्योंकि आध्यात्मिक जीवन की डगर में सबसे बड़ी बाधा उत्पन्न करने वाले ये कर्म संस्कार ही हैं। इसलिए अपनी जीवनशैली में तप-साधना, आराधना को अनिवार्य रूप से सम्मिलित करना चाहिए, ताकि जीवन पिछले कर्म-संस्कारों के भार से उबरता रहे।
     हमारे देश में जितने भी महान संत एवं भक्त हुए हैं, उनका जीवन भी कुछ इसी प्रकार का था। वे भी हर क्षण-हर पल भगवान के लिए जीवन जीते थे और अपने किए गए हर कार्य को भगवान को सौंपते थे। इस तरह वे जो भी कार्य करते थे, भगवद्शक्ति से जुड़ कर करते थे। उन्हें यह एहसास होता था कि वे केवल यंत्र मात्र है और भगवान ही उनके माध्यम से कार्य कर रहे हैं। यन्त्र तो केवल माध्यम होता है, कर्ता नहीं। जो उस यन्त्र को बजाता है, वह असली कर्ता होता है और उस यन्त्र से जो ध्वनि निकलती है, वह बजाने वाले के ऊपर निर्भर करती है। यन्त्र को इसके लिए कोई चिन्ता नहीं करनी पड़ती। इसी कारण हमारे देश के सन्त व भक्त बहुत ही निश्चित व निर्भीक रहते थे। उन्हें कोई चिन्ता नहीं सताती थी, वे हर पल स्वयं को भगवान के लिए समर्पित पाते थै।

     भगवान के लिए जीवन जीना ही आध्यात्मिक जीवन है। भगवान के साथ सतत जुड़ने से हमारे कर्मों का तेजी से क्षय होता है। हमारे विचारों व भावनाओं में प्रखरता का समावेश होता है। जीवात्मा प्रकाशित होती है और आंतरिक संबल मिलता है कि कोई है, जो सदैव उसके साथ है और उसे संरक्षण व मार्गदर्शन प्रदान कर रहा है।