Tuesday, August 5, 2014

राधानाथ स्वामी की अध्यात्मिक खोज यात्रा part-4

            एक दिन एक शुभचिन्तक ने घनश्याम बाबा को नये कपड़े दिये। उन्होंने लजाते हुए उनसे दृष्टि हटाई और कहने लगे। ‘‘यह शरीर भक्तों द्वारा पहने गये पुराने वस्त्रों को ही स्वीकार करता है।’’ घनश्याम बाबा केवल उन्हीं वस्त्रों को पहनते थे जिन्हें पहले किसी साधु ने पहना हो। ऐसे वस्त्रों को वे अमूल्य मानते थे।
            एक अन्य रात्रि मैंने घनश्याम बाबा को अकेले बैठकर एक छोटे हार्मोनियम पर सन्दुर राग गाते सुना। भक्ति में लीन वे इस बात से अनभिज्ञ थे कि कब मैंने उनके कमरे में प्रवेश किया। यद्यपि मैं उनके गीत की भाषा नहीं समझ पा रहा था, उनकी भक्ति की मधुरता ने मुझे सबकुछ समझा दिया। कभी उनके स्वर हर्ष से झूम उठते और कभी वे अपने प्रियतम से विरह की भावना में विषाद करते। मुझे बताया गया था कि वे अपनी युवावस्था में एक राजा के दरबार में प्रमुख संगीतज्ञ थे। वे अपने गायन में इतने मग्र थे कि एक घण्टा बीतने के पश्चात् उनका ध्यान मुझपर गया। मुझे देखकर वे पुलकित हो गये। ‘‘कृष्णदास, तुम आ गये।’’ फिर उन्होंने मुझसे पूछा, ‘‘क्या तुम गोपीजनवलभ को सुलाने में मेरी सहायता करोगे?’’ पचास वर्षों से प्रत्येक रात्रि वे ऐसा कर रहे थे, किन्तु अब वृद्धावस्था के कारण वे उन्हें उठाकर सुलाने में अक्षम थे। उनकी सहायता करना मेरे लिए गौरव की बात थी।
            जब मैं जाने लगा उन्होंने पूछा, ‘‘कृष्णदास, आज रात तुम कहाँ सोओगे?’’
            ‘‘युमना के तट पर, जहाँ मैं प्रतिदिन सोता हँू।’’
            उन्होंने मेरा हाथ थाम लिया और मेरे सिर पर एक चिन्तित पिता के समान हाथ फेरने लगे। ‘‘किन्तु बाहर ठिठुराती ठण्ड है। आज रात तुम यहीं सो जाओ।’’
            ‘‘किन्तु बाबाजी मैं प्रत्येक रात्रि वहीं सोता हँू।’’
            ‘‘किन्तु आज तुम यहीं सो जाओ।’’
            वे कक्ष के बाहर एक छोटे गलियारे के फर्श पर सोते थे। घर के लोग उनके इर्द-गिर्द चलकर उस रास्ते से घर में आते-जाते थे। जब मैं फर्श पर सोया तो घनश्याम बाबा ने अपना एकमात्र कम्बल मुझे ओढ़ा दिया।
            मैं यह कैसे सहन कर सकता था। उस फटे-पुराने कम्बल को मैंने उन्हें वापस सौंप दिया। ‘‘यह आपका कम्बल है। आपको ही इसका उपयोग करना चाहिए।’’
            ‘‘इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, कोई आवश्यकता नहीं है।’’ ऊँची आवाज में कहते उन्होंने कम्बल लेने से मना कर दिया।
            ‘‘आप वृद्ध हैं और मैं अभी युवा हँू। आपको ही इसका उपयोग करना चाहिए।’’ मैंने फिर से उन्हें कम्बल दे दिया।
            किन्तु वे उछल पड़े, ‘‘नहीं चाहिए, नहीं चाहिए।’’
            एक वाद-विवाद शुरु हो गया। उनके जबरदस्ती करने पर मैंने वापस नदी के तट पर जाने की धमकी दी। मैंने कम्बल नीचे रखा और दरवाजे की ओर चल दिया।
            ‘‘कोई बात नहीं, कोई बात नहीं।’’ उन्होंने कम्बल उठा लिया। ‘‘ठीक है, मैं ही इसे ओढूँगा।’’
            मैं उनके निकट लेट गया और सर्दियों की उस ठण्डी रात को गरमाहट के लिए सिकुडकर सो गया। कुछ समय पश्चात् गरमाहट का अनुभव होने पर मेरी नींद टूटी। मैंने फर्श पर लेटे हुए घनश्याम बाबा की ओर देखा जो तूफान में हिलते पत्ते के समान सर्दी से काँप रहे थे। उनके ऊपर कोई कम्बल नहीं था। मैं समझ गया कि उन्होंने मेरे सोने के पश्चात् वह कम्बल चुपके से मेरे ऊपर डाल दिया था। धीरे से मैंने वह कम्बल उन्हें ओढ़ा दिया।
            जैसे ही कम्बल ने उनका स्पर्श किया वे उछल पडे़ और चिलाये, ‘‘कोई जरुरत नहीं है। कोई जरुरत नहीं है। तुम श्रीकृष्ण के मित्र हो। तुम्हे अच्छी नींद लेनी चाहिए।’’
            ‘‘फिर मैं यमुना पर चला जाऊँगा, ‘‘मैंने जोर से कहा और दरवाजे की ओर चल दिया।
            वे फिर से उस कम्बल को स्वीकारने के लिए मान गये, किन्तु बाद में रात को पुनः गरमाहट पा मेरी नींद खुल गई। घनश्याम बाबा का दुर्बल शरीर सर्दी में बुरी तरह से काँप रहा था। मैंने फिर से उनपर कम्बल रखने का प्रयत्न किया। ‘‘कोई आवश्यकता नहीं है, कोई आवश्यकता नहीं है।’’
            घनश्याम बाबा जिनसे भी मिलते उनकी सेवा करना उन्हें बहुत अच्छा लगता। पिछले पचास वर्षों में भगवान् के लिए पानी लाने के अतिरिक्त वे उस छोटे-से मंदिर के आसपास के क्षेत्र को छोड़कर कहीं नहीं गये थे। वास्तव में वे सपने में भी अपने विग्रहों को छोड़कर जाने का विचार नहीं करते थे। उनकी सेवा के लिए उन्होेंने अपना जीवन और प्राण समर्पित कर दिये थे।
            एक दिन प्रातः जब मैं नदी से आ रहा था मैंने एक सुनसान गली में वृद्ध घनश्याम बाबा को कठिनाई से चलते देखा। मैं सहायता के लिए दौड़ा। बड़ी मुश्किल से वे पानी की एक बाल्टी उठाने का प्रयत्न कर रहे थे, जो विग्रहों के स्नान के लिए उन्होंने यमुना से भरी थी। हर कुछ पग चलने के बाद वे थककर खडे़ हो जाते।
            ‘‘बाबाजी, कृपया मुझे अपनी बाल्टी उठाने दीजिए।’’
            एक कठोर दृष्टि से देखकर उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘कोई जरुरत नहीं है, कोई जरुरत नहीं हैैै।’’
            मैं उन्हें इस प्रकार कठिन परिश्रम करता हुआ नहीं देख सकता था।
            ‘‘कृपया मुझे उठाने दें। मैं युवा हँू। बिना किसी कठिनाई के मैं इसे पाँच मिनट में मंदिर तक पहँुचा दूँगा। आप वृद्ध और दुर्बल हो गये हैं। आपको आधा घंटा लगेगा। कृपया मुझे ले जाने दें।’’
            उनके चेहरे पर बच्चे जैसी मासूम मुस्कुराहट खिल आई और वे अनुरोध करने लगे, ‘‘तुम गोपीजनवलभ के युवा मित्र हो। तुम सुख से रहो। मैं उनका बूढ़ा सेवक हँूं। मेरा जीवन सेवा के लिए ही है। तुम जाओ और वृन्दावन का आनन्द लो। उसी में मेरी प्रसन्न्ाता है।’’
            उनकी नम्रता से मेरा हृदय पिघल गया लेकिन मन चिन्तित हो उठा। ‘‘कृपया मान जाइये। आपकी बाल्टी उठाने में मुझे सबसे अधिक प्रसन्न्ाता होगी।’’ मैंने बाल्टी के हैण्डल को पकड़कर खींचा। बाबाजी की पूरी देह पेड़ के समान तन गई। दृढ़ता से अकड़कर उन्होंने पूरी शक्ति से उस हैण्डल को पकड़ लिया। उन्होंने उसे इस प्रकार जकड़ लिया जैसे पहाड़ की चोटी से निःसहाय लटकता व्यक्ति उस रस्सी को पकड़ता है जो उसे मौत से बचाकर रखती है।
            उन्होंने हताशा से मेरी आँखों में झाँका। ‘‘मैं एक गरीब बूढ़ा व्यक्ति हँू। मेरी एकमात्र सम्पत्ति मेरी सेवा है।’’ उनकी आँखें लाल हो गई और उनमें आँसू भर आए। ‘‘यदि तुम भगवान् की मेरी सेवा छीन लोगे, तो तुम मेरे प्राण ही ले लोगे। कृपया मुझे जीने दो। कृपा करो।’’
            मेरा हृदय बैठ गया। मैं कर ही क्या सकता था? मैंने उन्हें उनका जीवन लौटा दिया, और बाल्टी भी। किन्तु जब उन्होंने देखा कि मैं उनके प्रति कितना चिन्तित था, वे मेरे साथ मिलकर उसे उठाने के लिए राजी हो गये। चलते हुए वे हर मिनट मुझसे पूछाते कि मैं ठीक तो हँू।
            एक रात्रि घनश्याम बाबा ने मुझे राधारानी के गाँव बरसाना जाने का सुझाव दिया। वे जोर देते हुए बोले, ‘‘कृष्णदास, बरसाना का अनुभव करके तुम्हारा जीवन बदल जायेगा।’’ मेरे उत्साह को देखकर उन्होंने लजाते हुए कहा, ‘‘जब तुम वहाँ जाओ तो राधारानी से कहना कि उनका तुच्छ सेवक घनश्याम उनका दर्शन करना चाहता है।’’
            मेरा हृदय गुमनामी में रहने वाले इन छोटे-से वृद्ध व्यक्ति से बहुत प्रभावित हुआ था। वे केाई बडे़ विद्वान, विख्यात् गुरु या सिद्ध योगी नहीं थे। किन्तु वे एक सच्चे सन्त थे और उनकी नम्रता भगवान् के प्रति उनके प्रेम की अभिव्यक्ति थी।
            एक समय मैं अन्य पश्चिमवासियों के समान सोचता था कि नम्रता स्वयं को तुच्छ समझने की एक चेष्टा है अथवा आत्मविश्वास के अभाव को दर्शाने वाली एक कमजोरी। यहाँ तककि यह एक नकारात्मक सनक है जो आगे चलकर हीन भावना या निराशा में बदल सकती है। किन्तु घनश्याम बाबा जैसे लोगों के संग में मैंने पाया कि सच्ची नम्रता इसके विपरीत है, क्योंकि यह हमें एक ऐसी अनन्त शक्ति से जोड़ती है जो हमारी स्वयं की शक्ति से कहीं अधिक श्रेष्ठ है-वह है कृपा की शक्ति। सच्ची नम्रता का अर्थ है भगवान् की महानता में गर्व का अनुभव करना और अन्यों के गुणों के प्रति सच्ची सराहना रखना।
            मैं समझने लगा कि सच्ची नम्रता का अर्थ यह नहीं है कि मुझे कायर बनकर चुनौतियों से भागना होगा। अपितु सच्ची नम्रता मुझे निष्ठा, आदर, प्रेम और कृतज्ञता के साथ अपने पूरे साधन जुटाकर चुनौतियों पर विजय प्राप्ति हेतु चेष्टा करने के लिए प्रेरित करती है। ऐसी नम्रता द्वारा हम भगवान् के हाथों में एक निमित्त मात्र बनने का प्रयास करते हैं।
            स्वयं को दूसरों से अच्छा समझना हमें अपने जीवन की एक आवश्यकता लगती है। सच्ची नम्रता इस विकृत मानसिकता से परे एक गहरा सिद्धान्त सिखलाती है। वह सिद्धान्त हमें घमण्डी बनने और अपने से छोटों पर रौब जताने से बचाता है। नम्रता का गुण हमें उन लोगों से ईष्र्या करने से रोकता है जो हमसे अधिक निपुण है। जब व्यक्ति नम्र होता है तो वह कृतज्ञ हो जाता है तथा भगवान् एवं उन सभी को श्रेय देता है, जिन्होंने कभी उसकी सहायता की थी। एक नम्र हृदय वाला व्यक्ति सरलता से अपनी गलतियों को स्वीकार कर लेता है तथा और अधिक सीखने के लिए तैयार रहता है। नम्र बनना अपने अहम् को मारना नहीं है, अपितु ऐसे सच्चे अहम् को जगाना है जो सदैव ईश्वर तथा अन्य लोगों से प्रेम करने के लिए तत्पर रहता है।

            मैं सीख रहा था कि सर्वाधिक गहन रहस्य यह है कि जिस स्तर तक व्यक्ति में ये महान् गुण होते हैं, वह स्वयं को अत्यन्त तुच्छ, भगवान् का अंश और सभी का सेवक मानता है। दूसरों की निःस्वार्थ सेवा ही घनश्याम बाबा के हृदय का एकमात्र आनन्द थी। घनश्याम बाबा मुघ्े अबतक मिले सर्वाधिक धनी और सुखी लोगों में से एक थे। ऐसे सरल व्यक्ति जो सहज हृदय से भगवान् से प्रेम करते थे।

Sunday, August 3, 2014

राधानाथ स्वामी की अध्यात्मिक खोज यात्रा part-3

भक्ति की पराकाष्ठा 
            एक दिन श्रीपाद बाबा मुझे और असीम को एक प्राचीन मंदिर में ले गये। अन्दर हमने लाल पत्थरों से बने एक विशाल कक्ष और ऊँची को देखा। मंदिर लम्बे समय से उपेक्षित था। धुँधले प्रकाश में बंदर सो रहे थे। बड़े-बड़े काले चमगादड़ ऊँचे गुम्बद के किनारों पर उल्टे लटके हुए थे और नीचे पत्थर के फर्श पर उनके मल के चिह्न दिखाई दे रहे थे। हम मंदिर से निकलकर एक टूटे-फूटे मार्ग पर चलने लगे जो अचानक समाप्त हो गया। सामने दो फुट चैड़ा एक खुला नाला था। श्रीपाद बाबा ने हँसते हुए हमें उकसाया, ‘‘चलो, मैं तुम्हें एक विशेष मंदिर दिखाना चाहता हँू।’’ हमने नाले पर पडे़ एक पत्थर पर चलकर उसे पार किया। कुछ दूर आगे चलकर हमने स्वयं को एक अजीब से घर में पाया। एक ओर बच्चे उछलकूद कर रहे थे और दूसरी ओर उनकी माँ धरती पर बैठी छोटे चूल्हे पर भोजन पका रही थी। यह कैसा मंदिर है? मैं सोचने लगा।
            एक छोटे-से कक्ष में एक अविश्सनीय दृश्य देखकर मैं विस्मित हो गया। वहाँ एक वेदी पर राधा-कृष्ण के विग्रह विराजमान थे। लगभग दो फुट ऊँचे श्रीकृष्ण काले पत्थर के और राधारानी चमकते काँसे की थीं। वे अत्यन्त प्राचीन दिख रहे थे। अजीब बात थी कि वहाँ रहने वाला परिवार अपने घर में स्थित इन सुन्दर विग्रहों के प्रति उदासीन प्रतीत हो रहा था। किन्तु जब हम निकट गये हमने देखा कि फटे वस्त्र पहने एक अधेड़ व्यक्ति भगवान् को पंखा झल रहे थे। वे लगभग सत्तर वर्ष के छोटे-पतले व्यक्ति थे और उनकी कोमल आँखों में प्रेमाश्रु भरे थे। उनका सिर और चेहरा मुँडा हुआ था और वे अत्यन्त दुर्बल लग रहे थे। कक्ष से शीद्य्रता से बाहर आकर उन्होंने अपने सभी अतिथियों के चरणों पर प्रणाम किया। घुटनों के बल बैठकर उन्होंने कृतज्ञताभरे आँसुओं के साथ बार-बार हमारा स्वागत किया।
            ‘‘मैं आपका आज्ञाकारी सेवक हँू,’’ वे रुक-रुककर बोले। ‘‘कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिए।’’ फिर उन्होंने कक्ष में विराजित विग्रहों की और संकेत किया। ‘‘कृपया राधा-कृष्ण से मिलिए। श्रीकृष्ण ने आज आपको इसलिए बुलाया है क्योंकि आप उनके प्रिय मित्र हैं, लेकिन जहाँ तक मेरा प्रश्न है मैं केवल उनका एक तुच्छ सेवक हँू। सेवा करना ही मेरा एकमात्र सौभाग्य है। कृपया मुझे अपनी सेवा करने दीजिए।’’
            घनश्याम बाबा से यह मेरी पहली भेंट थी।
            जब श्रीपाद बाबा ने उन्हें बताया कि कैसे वृन्दावन पहँुचने के लिए मैं इतनी दूर से यात्रा करके आया हँू तो घनश्याम बाबा आश्चर्य से रोमांचित हो उठे। ‘‘श्रीकृष्ण ने आपको बुलाया है इसलिए आप इतने समुद्र और महाद्वीप पारकर सुदूर देश से यहाँ आये है,’’ घनश्याम बाबा ने कहा। ‘‘वे लम्बे समय से आपकी प्रतीक्षा कर रहे थे। अन्ततः आप आ ही गये।’’ उनकी वाणी भर्रा उठी, ‘‘हाँ आखिर आप आ ही गये।’’ घनश्याम बाबा का छोटा वयोवृद्ध चेहरा सौम्य और कमजोर प्रतीत हो रहा था। उनकी छोटी धुंधली आँखें, गोल नाक, पतले होंठ और हल्की झुर्रियाँ उनके चेहरे पर एक स्थायी उदासी के भाव उत्पन्न्ा करते थे। उनकी वाणी के धीमे स्वर में भी यही भावना गूँजती थी। किन्तु इन सबके पीछे उनकी आत्मा एवं हृदय आनन्दमय प्रेम से इस प्रकार परिपूरित थे कि जो भी उनके सम्पर्क में आता वे उसके जीवन को भी वह प्रेम भर देते। हमें अपने विग्रहों के सामने खड़ा देख घनश्याम बाबा हर्ष से फूले न समाये।
            मैं उनके साथ और समय बिताने लगा। प्रतिदिन प्रातः नौ बजे मैं उस टूटे-फूटे फुटपाथ से होकर इस एक कक्ष के मंदिर में आता। मुझे उनका संग बहुत अच्छा लगता। मैं जब भी आता वे एक ही स्नेहभरे अभिवादन से मेरा स्वागत करते, ‘‘मैं तुम्हारा आज्ञाकारी सेवक हँू।’’ और वे इस पर अमल भी करते थे। प्रेमपूर्वक वे अपना सबकुछ बिना किसी अपेक्षा के दूसरों को दे देते। मैं भी यह गुण प्राप्त करने के लिए लालायित था।
            एक दिन प्रातः जब मैं और घनश्याम बाबा अकेले बैठे थे तो मैंने उनसे पूछा कि वे पहली बार वृन्दावन कैसे आये। उन्होंने अपना सिर झुका लिया। ‘‘मेरी कहानी का कोई महत्व नहीं है,’’ वे बोले। फिर उन्होंने ऊपर आकाश की ओर देखा और कहा, ‘‘किन्तु एक पापी के ऊपर श्रीकृष्ण की कृपा की कहानी सुनने योग्य है।’’ धीरे से वे मुझे बताने लगे कि कैसे उनका लालन-पालन एक संभ्रान्त परिवार में हुआ था। ‘‘जब मैं एक युवक था मैं अपने परिवार के साथ वृन्दावन की यात्रा पर आया। यहाँ पर भगवान् की कृपा के जाल ने मेरे हृदय को बंदी बना लिया। मेरे पास वापस जाने की शक्ति नहीं थी।’’ कथा सुनाते हुए घनश्याम बाबा नम्रता से झुकते गये। उन्होंने बताया  कि कैसे उनके परिवार वाले उनके द्वारा एक उज्ज्वल भविष्य को छोड़कर वृन्दावन में रहने के निर्णय से हक्के-बक्के रह गये। ‘‘उन्होंने मुझे डराया कि वे मुझे अपनी सम्पत्ति के अधिकार से वंचित कर देंगे, किन्तु मैं अडिग रहा। श्रीकृष्ण ने मेरा हृदय चुरा लिया था,’’ उन्होंने कहा। धरती पर सोते और प्रतिदिन व्रजवासियों के घर से भिक्षा में मिली सूखी रोटी खाते हुए उन्होंने कभी अपने पुराने ऐश्वर्य की अभिलाषा नहीं की। ‘‘अपितु,’’ उन्होंने कहा, ‘‘मैं कृतार्थ था कि मुझे श्रीकृष्ण के घर में ही उनकी सेवा करने का अवसर मिला।’’
            घनश्याम बाबा की गहरी आँखें एक सहमे हुए बालक के समान इधर-उधर देख रही थीं। ‘‘लम्बे समय से मेरा हृदय अर्चाविग्रहों की आराधना करने के लिए लालायित था। फिर एक दिन ऐसा आया जिसे मैं कभी नहीं भूल सकता। उस दिन निकट के एक उद्यान में एक पेड़ के नीचे बैठकर मैंने अँगुली से मिट्टी पर ‘श्रीराधा’ लिखा। मैं दिनभर पुष्पों, गीतों और प्रार्थनाओं से मुलायम धूल में लिखे हुए उस नाम की पूजा करता रहा। अन्ततः सूर्यास्त के समय मैंने अपने हाथ से राधारानी के नाम को मिटा दिया।’’
            घनश्याम बाबा चुप हो गये और अपने प्रिय विग्रहों को निहारने लगे। स्पष्ट दिख रहा था कि वे अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे थे। एक लम्बी चुप्पी के पश्चात् उन्होंने कथा को जारी किया। ‘‘जहाँ वह नाम लिखा था वहाँ भूमि पर हाथ फेरते हुए मुझे कोई सुनहरी वस्तु दिखाई दी। मैं विस्मित हो उठा। ‘यह क्या है?’ मैंने सोचा, ‘मैं तब आऊँगा जब यहाँ पर कोई नहीं होगा।’ अगले दिन प्रातः मैंने अपने हाथों से उस स्थान को खोदा जहाँ मैंने राधारानी का नाम लिखा था।’’ घनश्याम बाबा के धैर्य का बाँध टूट गया। उमड़ते आँसू उनके गालों से होकर बह निकले और वे कँपकँपाती हुई वाणी में अपनी प्रेमभरी कथा का वर्णन करने लगे। ‘‘जिस सुनहरी वस्तु का स्पर्श मेरी अँगुलियों ने किया था वह मेरी राधारानी के सिर का ऊपरी भाग था। उनका विग्रह मेरे लिए धरती से प्रकट हुआ। उन्हीं के साथ धरती के अन्दर ही श्रीकृष्ण का श्याम विग्रह था। उनके आधार पर उनका नाम लिखा था, ‘गोपीजनवलभ’, अर्थात् वे जो गोपियों को प्रिय हैं।’’
            उनकी वाणी भर्रा उठी। ‘‘लेकिन मेरे पास कुछ नहीं था, कुछ भी नहीं। मैं उनके लिए कर ही क्या सकता था?’’ घनश्याम बाबा ने प्रेमभरी दृष्टि से अपने विग्रहों की ओर देखा और धीरे से कहा, ‘‘मैं नहीं जानता कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, किन्तु उन्होंने स्वयं को मेरी देखरेख में रख दिया। इसलिए मैंने दिन-रात उनकी सेवा की। आरम्भ में लोग भोग लगाने के लिए कुछ भोजन दे जाते थे। लम्बे समय तक मैंने एक पेड़ के नीचे उनकी पूजा की। फिर इस परिवार के बुजुर्गों ने गोपीजनवलभ को बेघर देखकर यह कमरा हमें दे दिया। मैं लगभग पचास वर्षों से यहाँ उनकी सेवा कर रहा हँू।

            जैसे-जैसे सप्ताह बीतते गये मुझे घनश्याम बाबा के चरित्र से और प्रेरणा मिली। ‘‘मैं तुम्हारा आज्ञाकारी सेवक हँू, मैं तुम्हारा आज्ञाकारी सेवक हँू,’’ मुझे अपना सबकुछ देते हुए वे बस यही कहते। हम दोनों मिलकर गोपीजनवलभ के लिए गाते या मोरपंख के पंखे से उन्हें हवा ढुलाते। प्रतिदिन वे जोर देकर कहते कि मैं उधर ही भगवान् का प्रसाद पाऊँ, जो तीन व्रज रोटी होता। व्रज रोटी वृन्दावन के लोगों का आम भोजन है। भले ही साधारण लोगों के दृष्टिकोण से व्रज रोटी सादी एवं रूखी रोटी होती है लेकिन श्रद्धावान लोगों के लिए यह एक अमूल्य वरदान है। वृन्दावन की धरती में उगे अन्न्ा और भक्तों के हाथों से बनी तथा श्रीकृष्ण को अर्पित की गई व्रज रोटी अत्यन्त पवित्र प्रसाद माना जाता है। कृतार्थ हो मैं घनश्याम बाबा की व्रज रोटी खाने लगा। 
            एक दोपहर नदी में स्नान करते हुए मुझे एक परिचित साधु मिले। वे साधुबाबा मुझे सदैव आशीर्वाद देते थे, लेकिन आज उन्होंने कठोर वचनों से मुझे डाँट दिया। वे तट से ही चिलाये, ‘‘तुम्हारे कारण घनश्याम बाबा भूखे रहते है।’’
            ‘‘यह कैसे?’’ मैंने पूछा।
            उन्होंने मुझे घूरकर देखते हुए कहा, ‘‘एक व्रजवासी प्रतिदिन उनके लिए तीन रोटी लाता है। वही उनका एकमात्र भोजन है। और प्रतिदिन तुम उन्हें खा जाते हो। कितने स्वार्थी हो तुम!’’
            ‘‘क्या?’’ नदी तट से ऊपर आता मैं हक्का-बक्का रह गया। ‘‘ऐसा नहीं हो सकता। कृपया मेरा विश्वास करें मुझे यह बिल्कुल मालूम नहीं था।’’
            अगले दिन घनश्याम बाबा ने मुझे अपने सादे घर के फर्श पर बैठाया और प्रेम से व्रज रोटियाँ परोस दीं। मैंने पत्तल को दूर हटा दिया। ‘‘आज मुझे भूख नहीं लग रही। मैं नहीं खाऊँगा।’’
            यह सुनकर घनश्याम बाबा दुःखी हो गये। ‘‘तुम्हें खाना ही होगा। यह गोपीजनवलभ का प्रसाद है। उन्होंने तुम्हारे लिए ही रखा है।’’ मैंने मना कर दिया। हाथ जोड़कर काँपते हुए उन्होंने विनती की, ‘‘क्या मेरे पापों के कारण तुम मेरी सेवा स्वीकार नहीं कर रहे हो? कृपया मेरी रोटी खा लो।’’
            मेरा हृदय टूट रहा था। मैंने उनसे याचना की, ‘‘घनश्याम बाबा मैं आपकी सारी रोटियाँ खा लेता हँू और आप भूखे रह जाते हैं। मुझे तो कहीं भी रोटियाँ मिल सकती हैं, किन्तु आप यह स्थान छोड़कर कहीं नहीं जाते।’’
            ‘‘किन्तु मेरे पास और भी रोटियाँ हैं,’’ घनश्याम बाबा ने जोर देते हुए कहा। ‘‘कोई कमी नहीं है।’’ फिर से उन्होंने पत्तल मेरे सामने रख दी। ‘‘मैं भीख माँगता हँू, कृपया खाकर प्रसन्न्ा रहो।’’
            मैंने फिर से उसे धकेल दिया। ‘‘यदि आपके पास और रोटियाँ हैं तो मुझे दिखाओ।’’
            ‘‘कोई ज़रुरत नहीं है, कोई ज़रुरत नहीं है,’’ उन्होंने निराशा से काँपते ऊँचे स्वर में कहा।
            ‘‘मैं तब तक रोटियाँ नहीं खाऊँगा जब तक आप मुझे और रोटियाँ नहीं दिखायेंगे।’’ उन्होंने मेरा उत्तर देने के लिए आवाज और ऊँची की। ‘‘नहीं, इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, कोई आवश्यकता नहीं है। रोटियाँ उस कमरे में हैं।’’
            मैंने तुरन्त उठकर उस कमरे में खोजा, परन्तु वहाँ कुछ नहीं मिला। ‘‘बाबाजी, यहाँ एक भी रोटी नहीं है। आप मेरे कारण भूखे रह रहे हैं। कृपया आप ही ये रोटियाँ खाइये।’’
            अपने निर्मल हृदय के भाव व्यक्त करते-करते घनश्याम बाबा की आँखें भर आई। ‘‘तुम गोपीजनवलभ के बन्धु हो, किन्तु मैं केवल उनके दासों का दास हँू। मेरे जीवन का एकमात्र आनन्द भक्तों की सेवा करना है। मैं तुमसे भीख माँगता हँू। कि तुम इन रोटियों को खा लो।’’ हाथ जोड़कर उन्होंने याचना की, ‘‘एकमात्र इसी के लिए मैं जीता हँू, कृपया मुझे इससे वंचित मत करो।’’ मैं उनके निःस्वार्थ प्रेम को देखकर रो उठा। अपने प्रिय घनश्याम बाबा को आनन्द देने के लिए मैंने सारी रोटियाँ खा ली।
            अगले दिन मैं सामान्य समय से दो घण्टा देरी से आया, यह सोचते हुए कि अबतक उन्होंने रोटियाँ खा ली होंगी। घनश्याम बाबा उल्लसित हो उठे, ‘‘कृष्णदास, रथीनीकृष्ण दास, आखिर तुम आ गये। गोपीजनवलभ तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।’’ मैंने जो देखा उसपर विश्वास नहीं हुआ। रोटियाँ अभी भी वेदी पर रखी थीं। घनश्याम बाबा ने समझाया, ‘‘मेरे भगवान् तबतक भेंट स्वीकार नहीं करते जब तक उन्हें एक मित्र का संग नहीं मिलता। श्रीकृष्ण ने ये रोटियाँ केवल तुम्हारे लिए बचाई हैं।’’ इन शब्दों के साथ उन्होंने सारी रोटियाँ मेरे सामने रख दीं। ‘‘केवल जब तुम खाओगे तभी राधारानी मुझे अपने सेवक के रूप में स्वीकार करेंगी।’’ मुझे पुनः पराजित होना पड़ा।