Friday, August 8, 2014

संत ज्ञानेशवर का आत्मनिर्माण part - 3

     इन्द्रायणी नदी का तट.. बालक ज्ञानेशा (श्री ज्ञानदेव जी) पसीने से लथपथ था। सूर्य का भीषण ताप उसके अंगों को झुलसा रहा था। ज्ञानेशा स्नान करने आया था। इन्द्रायणी के शीतल जल को अपलक दृष्टि से देखता हुआ वह सीढि़याँ उतरने लगा। तभी भीषण गर्जना हुई। यह एक कट्टरपंथी ब्राह्मण का स्वर था- ‘ओ लड़के! भाग यहाँ से! इस सरिता में ब्राह्मण स्नान करते हैं। इसे अपनी काया तो क्या, छाया से भी मैली मत कर...’ ज्ञानेशा के कदम ठिठक गए। उसने धीरे से कहा- ‘बाबा, नदी के इस ओर पानी में गाय, बैल, भैंसे और कई पशु नहाते हैं। मैं भी इधर कोने में ही डुबकी लगाऊँगा और चला जाऊँगा। नहाने दो न मुझे।’
     ‘ओए! तू अपनी बराबरी ब्राह्मणों की गायों से करता है! तेरी इतनी हिम्मत! तू तो पशुओं से भी हीन है। जा, कोई नाली-नाला ढूँढ़ नहाने के लिए...भाग यहाँ से!’- ब्राह्मण मुख से आग उगल रहा था। पास ही, कुछ ब्राह्मण-कुमार खेल रहे थे। अवसर भाँपते ही उन्हें तो खेल सूझ गया। उन्होंने तटवर्ती कंकड़-पत्थर उठाए और ज्ञानेशा को निशाना बना-बनाकर फेंकने लगे। ज्ञानेशा की कोमल देह जगह-जगह से छिल गई। बड़ी मुश्किल से बचता-बचाता, कंकरीले तट पर रास्ता बनाता हुआ वह बच निकला। कुटिया की ओर... राह में... ज्ञानदेव की देह घायल थी। पर उससे अधिक मन आहत था। ज्ञानेशा का हृदय चीस उठा- ‘हे विठोबा! हमारा क्या अपराध है? उन ब्राह्मणों द्वारा खोदे गए कुँओं पर तो हम जाते ही नहीं। पर अब क्या तेरी नदियों पर भी हमारा अधिकार नहीं? पशुओं तक का है, हमारा नहीं! क्यों है ऐसा देव? वो ऊँचे, हम नीचे कैसे? पग-पग पर ये अपमान की चोटें क्यों?... हमारे माता-पिता ने अपने जीवन तक का त्याग कर दिया। फिर भी इनकी घृणा का विष दूर नहीं हुआ! अन्याय की भी कोई सीमा होती है, केशवा! उफ! कैसे हैं ये लोग?’
     ज्ञानेदव के मन में प्रश्नों का झंझावात उमड़ने-घुमड़ने लगा था। किसी प्रकार का तर्क या तथ्य उसे उत्तर नहीं दे पा रहा था। कोई गणित इस स्थिति में सटीक नहीं बैठता था। ऐसे में कैसे मन-बुद्धि को समझाया जाए? एक ही पंथ शेष था-मन-बुद्धि से परे का पंथ-आत्मा की राह! ज्ञानेशा की अंतरात्मा में गीता का एक श्लोक गूँज उठा, जिसका भावार्थ था-
     शीत ऊष्ण सुख दुःख तथा शत्रु मित्र समान,
     बन निःसंग विचरे सदा सहे मान-अपमान।
     निंदा-स्तुति सम जानता तोष भरा मन में,
     स्थिरमति प्रिय वह भक्त है सर्वोपरि जग में।
     यह था एक साधक का अपना सनातन तर्क, अपना अलौकिक गणित- ‘मुझे क्रुद्ध नहीं होना चाहिए। यह तो एक दिव्य परिस्थिति है, जो मेरे लिए ही निर्मित की गई है ताकि मेरा निर्माण हो सके! मुझमें संयम पैदा हो सके! मुझमें सहनशक्ति, क्षमा जैसी सद्वृत्तियाँ जाग पाएँ! मुझमें समभाव विकसित हो जाए! अच्छा है... अच्छा है...ऐसी स्थितियों में ही तो स्थिर मति बनती जाती है। इसलिए क्षुब्ध क्यों होना? भला एक अनगढ़ पत्थर छैनी-हथौड़ी से कोई गिला-शिकवा करता है? नहीं न! तो तू क्यों करता है, ज्ञानेशा? इन्हें धैर्य से सहन कर!’ ज्ञानेशा इस महातर्क की औषधि स्वयं को पिलाते हुए वापिस लौटने लगा। इसलिए घर पहुँचने तक उसके आहत मन के सारे घाव सूख गए।
     निर्जन स्थान में बनी, अपनी कुटिया के आँगन में... भाई निवृत्ति, सोपान और मुक्ता- तीनों किसी गहन मंत्रणा में व्यस्त थे। ज्ञानेशा ने एक मृदु सी मुस्कान मुख पर लिए आँगन में प्रवेश किया। बड़े भाई निवृत्ति (जो ज्ञानेशा के आध्यात्मिक-गुरु भी माने गए हैं) को झुककर प्रणाम किया। फिर छोटी बहन मुक्ता से पूछा- ‘क्यों मुक्ताई, क्या मंत्रणा चल रही है? किसी गहन विषय पर सोच-विचार करते लग रहे हो सभी!’ मुक्ता और सोपान खीं-खीं करके हँस दिए। मुक्ता बोली- ‘हाँ, ज्ञानू भईया, बहुत ही गहन-गंभीर विषय पर हम सभी गोष्ठी कर रहे थे।’
     ज्ञानेशा (उत्सुकता से)- बताओ न, किस विषय पर?
     सोपान (भारी भरकम स्वर निकालता हुआ)- ...कि आज मांडे कैसे पकाए जाएँ! गर्मागर्म, पतले-पतले, मृदु मांडे! चारों भाई-बहन हँस दिए। मुक्ता ने बात आगे बढ़ाई- ‘ज्ञानू भईया! हमारे निवृत्ति दादा (बड़े भाई) ने आज इच्छा की है, मांडे खाने की।’
     ज्ञानेशा- निवृत्ति दादा की इच्छा, माने गुरु की आज्ञा! मुक्ता, अब तो हर स्थिति में उसे पूरा करना ही करना है।
     सोपान- ठीक कहते हो, भइया। आप और मैं मधुकरी में आटा माँग कर लाते हैं। रास्ते में (कुम्हारिन) कमला मौसी के घर से खपरैल (मटका) भी उठा लाएँगे। मुक्त उसे उल्टा करके मांडे सेक लेगी।
     मुक्ता- हाँ! हाँ! मुझे सुबह वन में कुछ कंद मूल मिले थे। तब तक मैं उनसे सब्जी और चटनी बना लेती हँू। वाह! आज तो दावत हो जाएगी!
     दादा निवृत्ति ने बड़ी अर्थ भरी मुस्कान दी। ज्ञानदेव ने झोला टाँगा और सोपान के संग गाँव आलंदी की ओर बढ़ गया। गाँव पहुँचकर...पहला द्वार खटखटाया... भिक्षाम् देहि! मधुकरी दे दो, बाबा... भिक्षाम् देहि! झटके से द्वार खुला। सामने एक बोदी वाला रूढि़वादी नकचढ़ा पोंगा शास्त्री आ खड़ा हुआ। उसका नाम था- विसोबा चाटी। उसकी भृकुटियाँ चढ़ी हुई थीं। मुखाकृति वक्र थी। नेत्र द्वेष से तप्त थे। दोनों बालकों को देखते ही उसने धावा बोल दिया- ‘अरे ओ पाखंडी संन्यासी की औलादों! दूर भागो! मेरे आँगन में अपनी पापी छाया मत डालो। तुम वो जंगल छोड़कर इधर गाँव में कैसे आ गए-नासपीटों! वहीं भूखे-प्यासे रहकर मर-खप क्यों नहीं जाते? बार-बार अपनी मनहूस सूरत दिखाने क्यों चले आते हो? क्या आलंदी में छूत की महामारी फैलाओगे?’
     तलवार से भी अधिक धारदार ताने! उफ! सुनने वाले को काट-काट के टुकड़े कर डाले! पर हमारे इन ज्ञानी साधकों की क्या प्रतिक्रिया थी, जानते हैं? संयम! संयम! संयम! ज्ञानेशा ने मुस्कुराते हुए मीठा सा उत्तर दिया- ‘विसोबा काका! दूर भगाना है, तो क्रोध और द्वेष को भगाओ! देखो, ये आपका कितना अहित कर...’ अभी ज्ञानेशा की पंक्ति पूरी भी नहीं हुई थी, विसोबा चाटी बोल उठे- ‘ओ भीखमंगों! मुझ पर उपदेश झाड़ने चले हो? ठहरो, तुम्हारी तो...!!’ विसोबा ने द्वार पर रखा मोटा डंडा उठा लिया। बालकों की ओर लपके। ज्ञानेशा और सोपान ने आव देखा न ताव... सिर पर पैर रखकर भागे।
     ‘आटा तो मिल नहीं, चाँटा ज़रूर मिल जाता, भईया’-सोपान हाँॅफते हुए बोल उठा। ज्ञानेशा ने भी लम्बी गहरी साँस भरी- ‘कोई बात नहीं, कोई बात नहीं, सोपान! विसोबा काका को मन ही मन क्षमा कर दो।  नही ंतो, भीतर बैर जन्म ले लेगा, जो आगे चलकर बड़ा मानसिक क्लेश मचाएगा।’ पर सोपान तनिक विद्रोही हो चला था। दाँत पीसता हुआ बोला- ‘मेरा बस चले तो, इन ढपोलशंखी धूर्त मार्तंडों को इनकी बोदी से ही पकड़कर गोल-गोल घुमा दूँ और ज़ोर से धरा पर पटक डालूँ! ज्ञानेशा ने तुरन्त अपनी बाँह छोटे भाई के कंधों पर रख दी, समझाया- ‘नहीं, नहीं, सोपान! इतना उबाल अच्छा नहीं। निवृत्ति दादा कहते हैं न, आनंद मनाना है, तो परमानंद को ध्याओ। इन छोटी-मोटी बातों पर क्या विचार करना? देखो, ज़रा संयम धर कर देखो, तुम स्वयं को कितना ऊँचा, कितना विराट अनुभव करोगे। मैं भी ऐसा ही करता हँू।’
     सोपान- आप ठीक कहते हो, भईया। वैसे भी हमें अपने लक्ष्य से नहीं भटकना चाहिए, जो है- ‘मांडे!’ दोनों भाई हँस दिए और अगले द्वार की ओर बढ़ चले। द्वार खटखटाया, पुकारा- ‘भिक्षाम् देहि! मधुकरी दे दो, माई!’ स्त्री ने द्वार खोला। ‘तनिक ठहरो!’ कहकर भीतर जाने ही लगी थी कि ज्ञानेशा ने विनय की- ‘आज मधुकरी में आटा दे दो, माई।’ स्त्री उदार थी। बर्तन भर कर आटा लाई और ज्ञानेशा का पूरा झोला ही भर दिया। दोनों बालक प्रसन्न हो उठे। कुम्हारिन कमला के घर की ओर बढ़ गए। अब तो सोपान चल नहीं, फुदक रहा था। अत्यंत उमंगित था। बार-बार झोले का भार अपने हाथों में ले लेता था। भार अनुभव करते ही तालियाँ बजाता और खिलखिलाता था। ज्ञानेशा ने फिर से सोपान को सावधान किया-‘सोपान! अधिक हर्ष मत मनाओ। दादा निवृत्ति कहते हैं-हर्ष कब संघर्ष में बदल जाए, कुछ पता नहीं।’
     दोनों कुम्हारिन कमला के आँगन में पहुँच गए। तरह-तरह के मटकों की कतारें सुशोभित थीं। ज्ञानेशा ने पुकारा- ‘कमला मौसी... कमला मौसी! एक खपरा दे दोगी क्या?’ कमला का चारों बालकों के प्रति स्नेह अपार था। ज्ञानेशा का स्वर सुनते ही वह दौड़कर बाहर आ गई। सोपान ने निजी इच्छा रखी- ‘मौसी, आज हमने मांडे खाने की योजना बनाई है। निवृत्ति दादा की यही इच्छा है। इसलिए मांडे सेकने के लिए एक खपरा चाहिए।’
     कमला- हाँ, हाँ... क्यों नहीं! बहुत बढि़या! अभी देती हँू एक चपटा खपरा... मुक्ता को कहना, चूल्हे पर इसे उल्टा रख दे। कमला पंक्ति में से एक उपयुक्त खपरा उठाने लगी। तभी... एक प्रचण्ड भूचाल आँगन में आ धमका। इस भूचाल का नाम था- विसोबा चाटी। अपने सेवकों से कहकर उसने बालकों पर नज़र रखवाई हुई थी। उन्हीं के खबर देने पर वह कमला के आँगन पहुँचा था। उसकी कुटिल दृष्टि सीधी ज्ञानेशा की लदी-फंदी झोली पर गई। फिर कमला के हाथों में टिके खपरा पर! उस धूर्त को समझते देर न लगी। कुत्सित स्वर में चीख पड़ा- ‘आ हा... ये कंगाल भीखमंगे माँग-माँग के मांडे उड़ाने की सोच रहे हैं। दो-दो गज लंबी जीभ हो गई तुम दुष्टों की! पूरी आलंदी को मूर्ख बनाते हो। पेट की आग बुझाने का बहाना बनाते हो... और मांडों की ललक रखते हो! थोड़ी बहुत भी लज्जा है या सारी हया घोल कर पी गए हो, पाखंडियों! टुकड़खोर चोर कहीं के!’
     कमला भी सहम गई थी पर फिर भी हिम्मत बटोर कर वह बोली- ‘साहब! बालक ही तो हैं। सालों में एक बार मांडे पकाकर खा भी लिए तो क्या?... वही आटा है...! ‘चुप कर, कुम्हारिन! अपनी औकात में रह!’ विसोबा चाटी पहले से भी ऊँचे व उग्र स्वर में चीखे- ‘तूने ही इन ठीकरों को सिर चढ़ा रखा है!... इतना कहते-कहते चाटी क्रोध से पागल हो गए। ताव में आकर पाँव चलाने लगे। कुम्हारिन के मटके एक-एक करके चूर-चूर करते गए। कमला के हाथ से भी खपरा छीन कर चकनाचूर कर डाला।
     दोनों बालक अपनी आँखों के सामने विनाशकारी तांडव देख रहे थे। कमला के नेत्र भी डबडबा आए थे। सोपान में रोष का उफान उठा गया था। वह प्रबल प्रतिक्रिया करने वाला था कि तभी ज्ञानेशा ने उसका हाथ दबाया और आँखों ही आँखों में शांत रहने को कहा। बालकों की यह शांति देखकर विसोबा चाटी ज्यादा जल-भुन गया। मुख से अंगारे उगलता हुआ आगे बढ़ा और ज्ञानेशा का झोला छीनकर पटक दिया।  सारा आटा टूटे मटकों के टुकड़ों और मिट्टी में जा मिला। विसोबा चाटी ने अंतिम धमकी दी- ‘नरक के कीड़ों! मैं टुकड़ा भर भी मांडे तुम्हें खाने नहीं दूँगा। तुम्हारी तो ऐसी की तैसी!’
    
     फिर चाटी ने अकड़ में अपना अंगरखा झाड़ा और तमतमाता हुआ आँगन से चला गया। आँगन में चारों ओर विध्वंस ही विध्वंस था। प्रलयकारी तूफान आया था और सबकुछ लील कर चला गया था। दोनों बालक थरथर काँप रहे थे। सोपान के कंठ में हिचकियाँ भर गई थीं। घोर संताप दोनों के मन में उबल रहा था। ज्ञानेशा ने एक नज़र उठाकर कमला की ओर देखा। उसकी भी ऐसी ही दशा थी। दोनों भाई लुटे-पिटे कदमों से अपने सिद्ध द्वीप की ओर चल पड़े। अब तो ज्ञानेशा का संयमचारी मन भी सिसकने लगा था- ‘इतना अपमान! इतना तिरस्कार! इतना अनादर! इतनी उपेक्षा! हे ईश्वर, हमारा अस्तित्व ही तूने क्यों गढ़ा?...’

     दोनों अपने आँगन तक पहँुच गए। निवृत्ति और मुक्ता, दोनों उत्सुक कदमों से उनकी तरफ बढ़े। ज्ञानेशा कुछ नहीं बोला। कुटिया में अकेले प्रवेश कर, उसने किवाड़ बंद कर लिए। भीतर से सांकल भी जड़ दी। बाहर आँगन में सोपान ने रोते-रोते सारा प्रसंग कह सुनाया। अब आगे इन बालकों की क्या प्रतिक्रिया रहेगी? इस घोर अपमान को वे कैसे आत्म-निर्माण की सीढ़ी बनाएँगे, ऐसी कौन-सी दिव्य योजना होगी इन नन्हें साधकों की, जो विसोबा चाटी जैसे क्रूर और महा-हिंसक जीव को भी इनके चरणों में गिरने को विवश कर देगी?

संत ज्ञानेशवर का आत्मनिर्माण part-2

विट्ठल पंत का वंश असाधारण था। निष्ठावान्, कुलीन ब्राह्मण-परिवार में अध्ययन-चिंतन बराबर होता है। विट्ठल के पितामह त्र्यंबक पंत के गुरु नाथ-संप्रदाय के प्रतिष्ठाता गोरखनाथ थे। विट्ठल के पिता तथा माता को नाथ-संप्रदाय के दूसरे गुरु गहिनीनाथ से दीक्षा प्राप्त हुई थी। साधक-परिवार में जन्म लेने के कारण विट्ठल पंत में बचपन से ही वैराग्य उत्पन्न्ा हो गया था। वे विद्वानों के निकट वेद-शास्त्रों का अध्ययन और विचार-विमर्श करते थे। यहाँ तक कि योग्य गुरु की तलाश में निरंतर तीर्थयात्रा पर चले जाते थे।
            इसी यात्रा के दौरान वे अपनी जन्मभूमि आपेगाँव से आलन्दी आये। यहाँ सिद्धेश्वर मंदिर में ठहरे। कस्तूरी की गंध शीद्य्र फैल जाती है। इनके ज्ञान और निर्मल स्वभाव को देखकर सिद्धोपंत कुलकर्णी आकर्षित हुए। वे इसी प्रकार के युवक की खोज में थे। उन्होंने कल्पना की कि ऐसे व्यक्ति के हाथ अगर अपनी बेटी सौप दूँ तो गौरव की बात होगी। एक दिन उन्होंने अपनी इच्छा विट्ठल के सामने प्रकट की। विट्ठल ने सिद्धोपंत को कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया। वास्तव में विट्ठल सर्वदा अपने आत्मचिन्तन में इस प्रकार लीन रहते थे कि उनका ध्यान इन बातों की ओर नहीं जाता था। सिद्धोपंत ने अनुमान लगाया कि विट्ठल की इच्छा नहीं है।
            कई दिनों बाद एक रात को विट्ठल ने स्वप्न में देखा कि स्वयं भगवान् विट्ठल उसे आदेश दे रहे हैं-‘‘यह विवाह तुम कर लो। इससे तुम्हारे वंश का मुख उज्जवल होगा।’’ दूसरे दिन विट्ठल स्वयं ही सिद्धोपंत के यहाँ जाकर अपनी स्वीकृति दे आये। सिद्धोपंत की बेटी रुक्मिणी से उनका विवाह हो गया। देखते ही देखते कई वर्ष बीत गये। इस बीच विट्ठल के माता-पिता का देहान्त हो गया। आपेगाँव वापस आने के कुछ दिनों बाद विट्ठल की स्थिति चिन्ताजनक हो गयी। सर्वदा पठन-पाठन में लगे रहनेवाला व्यक्ति निकम्मा हो गया। अपनी बेटी से यह समाचार पाकर सिद्धोपंत तत्काल आपेगाँव आकर अपने साथ बेटी-दामाद को लेकर आलन्दी चले आये।
            कुलकर्णी का विश्वास था कि यहाँ विट्ठल अपनी गृहस्थी की जिम्मेदारी को समझेगा, पर वे हमेशा पठन-पाठन में लगे रहे। गृहस्थी का मायाजाल उन्हें बाँध नहीं सका। सहसा एक दिन विट्ठल ने अपनी पत्नी से कहा-‘‘बहुत दिनों से काशी जाने की इच्छा हो रही है। तीर्थयात्रा हो जायगी और शायद उधर ही कहीं अपनी व्यवस्था करूँगा।’’ रुक्मिणी अत्यन्त पतिपरायण स्त्री थी। उसने न तो पति को जाने से रोका और न साथ ले चलने के लिए अनुरोध किया। सहर्ष अनुमति देती हुई बोली-‘‘जल्द वापस आइयेगा।’’
            काशी आकर विट्ठल पंत अध्ययन में जुट गये। सौभाग्य से एक दिन श्रीपादस्वामी से मुलाकात हो गयी। इनके ज्ञान और साधना से प्रभावित होकर विट्ठल ने संन्यास ग्रहण कर लिया। अपना वास्तविक परिचय गुप्त रखा। संन्यास लेने के बाद विट्ठल का नया नाम चैतन्य आश्रम हुआ। श्रीपादस्वामी स्वयं जगद्गुरु शंकरचार्य की आश्रम-शाखा के संन्यासी थे। बारह वर्ष के बाद एक दिन पुनः उन्हें अपने गुरु के आदेश से आलन्दी वापस आना पड़ा। विट्ठल पंत अक्सर सोचते थे कि शायद आगे चलकर गाँववालों का क्रोध शान्त हो जायगा और उन्हें अपना खोया हुआ सम्मान फिर प्राप्त हो जायगा। वे इसी आशा में लम्बी अवधि तक आलन्दी में निवास करते रहे। इस बीच में वे चार संतानों के पिता बने।
            संतानों के नामकरण में उन्होंने अपने ज्ञान का परिचय दिया, जिसका उपयोग अपने परवर्ती जीवन में बच्चों ने किया। ‘निवृत्ति’ बड़े लड़के का नाम था जिसका अर्थ है- समाप्ति, छुटकारा, मुक्ति, विश्राम। वे आगे संतान नहीं चाहते थे, पर इसके बाद ज्ञानदेव ने जन्म लिया। तीसरा सोपान यानी सीढ़ी और अन्त में आयी मुक्ता। समाजपतियों की उपेक्षा के कारण विट्ठल का मन आलन्दी से उचट गया। उन्हें तीर्थयात्रा की सनक सवार हुई। रुक्मिणी से अनुरोध करते ही वह भी तैयार हो गयी। कई दिनों बाद विट्ठल सपरिवार नासिक आये। कुशावर्ती में नित्य स्नान करने के बाद त्र्यंबकेश्वर का दर्शन करते थे। इसके बाद ब्रह्मगिरि की फेरी करते थे। भिक्षा में जो कुछ मिलता, उसीसे संतोष कर लेते थे। शेष समय अध्यात्म और ब्रह्म-चिन्तन में व्यतीत होता रहा।
            देवयोग से एक दिन दुर्घटना हो गयी, जिसके कारण विट्ठल की जीवन-धारा में अदुभुत परिवर्तन हो गया। उस दिन मंदिर-दर्शन करने के बाद जब सभी लोग घर वापस आ रहे थे तभी जंगल के भीतर से बाघ के गरजने की आवाज आयी। भय से घबराकर जिसे जिधर मार्ग मिला, उधर भाग निकल। किसी को इतना होश नहीं था कि कौन, कहाँ है, पता लगाता। जंगल से बाहर सुरक्षित स्थान पर आने के बाद विट्ठल को पता लगा कि केवल निवृत्ति को छोड़कर सभी साथ आ गये है। एक ऊँची चट्टान पर चढ़कर विट्ठल निवृत्ति को पुकारने लगे। उनकी आवाज जंगल में गूँजती रही, पर दूसरी ओर से कोई आवाज नहीं आयी। यह देखकर अनजाने आशंका से रुक्मिणी रोने लगी। माँ को रोते देख बच्चे भी रोने लगे।
            विट्ठल ने कहा- ‘‘रोने से वह वापस नहीं आयेगा। लगता है किसी पेड़ पर या किसी गुफा में छिप गया है वर्ना उसकी आवाज सुनाई देती। अब कल सबेरे जंगल में जाकर खोजना पड़ेगा। दूसरे दिन सभी लोग निवृत्ति की तलाश में जंगल के भीतर गये। इसी प्रकार तीसरे, चैथे दिन तक लोग खोजते रहे, पर निवृत्ति का कहीं पता नहीं चला। बाद में विट्ठल ने यह सोचकर संतोष कर लिया कि भगवान् ने उन्हें किसी पाप का दंड दिया है। आठवें दिन अचानक निवृत्ति वापस आ गया। उसे देखते ही माँ ने कंठ से लगाया। पिता ने गोद में उठाया और भाइयों ने प्रणाम किया।
            माँ के प्रश्न करने पर निवृत्ति ने बड़ी रोमांचकारी कहानी सुनाई। उसने कहा कि आप लोगों से बिछुडने के बाद मैं दायीं ओर अंजनी पर्वत की गुफा की ओर भागा। थोड़ी देर बाद वहाँ एक महात्मा आये और मुझे अपने साथ लेकर भीतर की ओर बढ़े। आगे एक स्थान पर काफी बड़ा घर था। दूसरे दिन मुझे उन्होंने अपने शिष्यों के साथ स्नान के लिए भेजा। स्नान करने के बाद जब मैं वापस आया तब उक्त महात्मा ने कहा-‘निवृत्ति, आज तुम्हारे जीवन का महत्वपूर्ण दिन है। गुरु गोरखनाथ की कृपा से कल तुम्हारा आगमन हुआ और उन्हीं की प्रेरणा से आज तुम्हें दीक्षा दे रहा हूँ। अब यहाँ कुछ दिनों तक आसन, मंत्र आदि सीखना पडे़गा। इसके बाद ही तुम घर जा सकोगे।’ श्रद्धेय गुरुवर गहिनीनाथ मुझे ध्यान, आसन और यौगिक क्रियाओं की शिक्षा देते रहे। आज दोपहर के बाद उनसे अनुमति प्राप्त होने पर मैं चला गया।
            गहिनीनाथ का नाम सुनते ही विट्ठल समझ गये कि मेरे माता-पिता के गुरु ने निवृत्ति को अपना मंत्र-शिष्य बनाया है। उन्हें यह जानकर प्रसन्न्ता हुई कि उनका बालक नाथ-संप्रदाय में दीक्षित होने पर भी कृष्ण-भक्त बनता जा रहा है। बड़े भाई की साधन से प्रभावित होकर ज्ञानेदव ने उनसे दीक्षा ली। ज्ञानदेव से सोपन और मुक्ता ने दीक्षा ली। इस प्रकार विट्ठल की सभी संतानें नाथ-संप्रदाय के अंतर्भुक्त हो गयीं।
            पिता से वेद-उपनिषद् शास्त्रों का अध्ययन करते हुए लड़के बड़े होते गये। अब विट्ठल ने निश्चय किया कि वंश-परंपरा के अनुसार बच्चों का यज्ञोपवीत होना चाहिए और यह कार्य अपनी जन्मभूमि में जाकर सम्पन्न्ा करना चाहिए। आपेगाँव आकर विट्ठल ने स्थानीय कर्मकांडियों से निवेदन किया कि कृपया अब मुझे अपनी जाति में सम्मिलित कर लीजिये। मुझे अपने बच्चों का यज्ञोपवीत-संस्कार करना है। बदले में प्रायश्चित्त के लिए आप लोग जो दंड देंगे, उसे मैं स्वीकार कर लूँगा।
            ब्राह्मणों ने धर्म-ग्रंथांे की छानबीन करने के बाद निर्णय दिया- ‘‘संन्यास लेने के बाद तुम पुनः गृहस्थ-आश्रम में आये हो। इस प्रकार देानों आश्रमों को तुमने कलंकित किया है। इसका एकमात्र प्रायश्चित्त है-मृत्यु। यह इसलिए कि भविष्य में तुम्हारी तरह अन्य कोई अपराध करे तो तुम्हारे उदाहरण से उसे शिक्षा प्राप्त हो। अगर हम तुम्हें क्षमा कर देंगे तो भविष्य में लोग तुम्हारी तरह पापाचार करते रहेंगे। इस प्रकार हमारा धर्म, हमारा समाज, नैतिकता आदि नष्ट हो जायेंगे।’’
            कर्मकांडियों के इस निर्णय को सुनकर विट्ठल सन्न्ा रह गये। यह एक ऐसा निर्णय था जिसे सहज ही स्वीकार कर लेना आसान नहीं था। कई दिनों तक मानसिक यंत्रणा भोगने के बाद अपनी संतानों की मंगल कामना के लिए पंडितों का निर्णय उन्होंने स्वीकार कर लिया। उन्हें इस बात पर संतोष हुआ कि उनके बलिदान के पश्चात् इन निष्पाप बच्चों को उचित सम्मान मिलेगा।
            अपने चारों बच्चों को असहाय अवस्था में छोड़कर एक दिन विट्ठल अपनी पत्नी के साथ चुपचाप चल दिये। कहा जाता है कि प्रयाग में जाकर इन दोनों ने जल-समाधि ले ली। माता-पिता के चले जाने के बाद चारों बच्चे इतने असहाय हो गये कि इन्हें भीख मिलना कठिन हो गया। न जाने कितने दिन जंगली फल खाते रहे। उपवास इनके जीवन का श्रृंगार बन गया। 

अपमान को आत्मनिर्माण की सीढ़ी बनालो part-1

संत ज्ञानेशवर जिन्होंने अपमान को आत्मनिर्माण की सीढ़ी बना लिया    

 साधना पथ तो है ही युᄐ का पंथ! युᄐ भी किसी अन्य से नहीं, स्वयं अपने आप से! अस्त्र-शस्त्रों से लैस सैनिकों से नहीं, विकारों से लैस मन के विचारों से! इन्हीं शत्रु विचारों में से एक है- ‘मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? यह तो अन्याय है! मेरा अपमान है!... उसने मुझसे ऐसे कटु लहजे में बात क्यों की? उसने मेरी ओर हेय दृष्टि से क्यों देखा? उसने आᄀखें क्यों तरेरी? क्या मेरी कोई इज्जत नहीं? कोई सम्मान नहीं?’

     अक्सर, इन विचारों के प्रबल शस्त्र साधक के मन को विदीर्ण कर डालते हैं। उसके भीतर कोहराम मचा देते हैं। मान-सम्मान का मोर्चा संभालता हुआ साधक थक-हार जाता है। इस परिस्थिति में विजय श्री का बिगुल कैसे बजाया जाए? अन्याय और अपमान की स्थितियों में एक साधक का क्या कर्म है, क्या धर्म है? उसकी प्रति￘िया कैसी होनी चाहिए?
इस समस्या को सुलझाया महाराष्ट के प्रसिद्ध चार आत्मज्ञानी भाई बहनों ने - श्री निवृकत्तनाथ, श्री ज्ञानदेव, श्री सोपान और बहन मुक्ता। ये बचपन से ही दूध नहीं, अपमान के घूंट पी-पीकर बड़े हुए। इन्हें मुख्य बाॅंव आलंदी से बाहर सिद्धद्यीप में निष्कासित कर दिया गया। इनके माता-पिता को देह-त्याग करने के लिए विवश किया गया। माता-पिता ने ग्राम-सभा की इस अन्यायकारी बर्बरता को भर शिरोधाय कर लिया, अपनी जीवन-ल्ीला समाप्त कर छाली-सिर्फ इसलिए कि उनके बच्चों को गाॅंव बाले स्वीकार कर लें। परन्तु तब भी न्याय का प्रकाश नहीं हुआ। ये छोटे-छोटे अनाथ भई बहन बाॅंव के बाहर एक निर्जन कुटिया में जैसे-तैसे पलते-बढ़ते रहे। अपमानकारी ताने और अन्यायकारी व्यवहार-यही इनकी खुराक थी। परन्तु....परन्तु.... इतिहास साक्षी है, इन्होंने ‘अपमान को भी अपने ‘आत्मनिर्माण का साधन बना लिया! कैसे? आइण् जानें!
                                              साभार अखंड ज्ञान अगस्त २०१४
            पूना शहर से 15 मील दूर इन्द्रायणी नदी के किनारे आलन्दी नामक गाँव है जहाँ सिद्धेश्वर मंदिर है जिसमें नित्य श्रद्धालु भक्त नदी में स्नान करने के पश्चात् दर्शन के लिए आते है। श्रीमती रुक्मिणी बाई नित्य की तरह अपने पड़ोस में रहनेवाली सहेली सुनन्दा नायक के साथ दर्शन आयी थी। परिक्रमा समाप्त करने के बाद उसकी नजर एक ओर बैठे एक सौम्य संत पर पड़ी जो ध्यान लगाये एकटक मंदिर की ओर देख रहे थे। एक अनजाने आकर्षण से रुक्मिणी बाई ने संत के समीप जाकर जमीन से माथा टेककर प्रणाम किया। संत ने प्रसन्न्ा मुद्रा में कहा-‘‘सौभाग्यवती हो बेटी। दूधो नहाओ, पूतों फलो।’’
            सहसा रुक्मिणी बाई की आकृति पर विषाद की रेखाएँ प्रस्फुटित हो गयी। सुनन्दा ने प्रणाम करते हुए कहा- ‘‘ऐसा आर्शीवाद किस काम का जो फलदायक न हो।’’ संत ने विस्मय से पूछा-‘‘क्यों बेटी, मेरा आर्शीवाद फलदायक क्यों नहीं होगा?’’
            सुनन्दा ने तेज स्वर में कहा-‘‘जो नारी सुहागिन होती हुई विधवा-सा जीवन व्यतीत कर रही हो, वह भला दूधो नहाओ, पूतों फलो जैसा आर्शीवाद लेकर क्या करेगी। आप अपना आर्शीवाद लौटा लीजिए।’’ अत संत तनकर बैठ गये। कुछ क्षण तक गौर से रुक्मिाणी बाई की ओर देखने के बाद उन्होंने पूछा-‘‘आखिर बात क्या है? मैं प्रत्यक्ष रूप से देख रहा हँू कि यह देवी कई सुसंतानों की जननी होगी।
            सुनन्दा ने कहा- ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है महाराज? इनके पति लगभग 11-12 वर्ष हुए तीर्थयात्रा करने काशी गये थे। बाद में पता चला कि वहीं श्रीपादस्वामी संत से दीक्षा लेकर संन्यास ग्रहण कर लिया है। संन्यासी व्यक्ति कैसे पुनः गृहस्थ बन सकता है। सहसा संन्यासी महाशय की आकृति कठोर हो गयी। प्रश्नसूचक दृष्टि से देखते हुए उन्होंने पूछा- ‘‘उसके नाम और रंग-रूप के बारे में कुछ बता सकती हो? मैं यहाँ से काशी जाऊँगा। अगर वह काशी में कहीं होगा तो उसे यहाँ भेज दूँगा, क्योंकि युवा-पत्नी से छल करके संन्यास लेना अपराध है। इससे संन्यास-धर्म नष्ट हो जाता है। साधना निष्फल हो जाती है।’’
            सुनन्दा ने उत्तर दिया- ‘‘रुक्मिणी बाई के पति का नाम विट्ठल पंत है। दुबले-पतले, गोरा रंग है। दाहिने हाथ में एक बार फोड़ा हुआ था, उसका निशान है। बात करते समय नजर नीचे रखते है।’’ संत ने कहा- ‘‘तुम चिंता मत करो बेटी। काशी जाकर मैं स्वयं तुम्हारे पति की खोज करूँगा। उसे तुम्हारे पास अवश्य भेजँूगा। मेरा आर्शीवाद कभी निष्फल नहीं होगा। तुम एक-दो नहीं, कई संतानों की जननी बनोगी और वे स्वनामधन्य होंगे।’’
            रुक्मिणी तथा सुनन्दा ने एक बार पुनः जमीन से सिर लगाकर प्रणाम किया और फिर वापस चली गयीं। संत अन्य कोई नहीं, स्वयं श्रीपादस्वामी थे। विट्ठल पंत की रूपरेखा को सुनते ही वे समझ गये कि यह चैतन्य आश्रम ही है जिसने छल करके उनसे संन्यास लिया है। काशी आते ही एक दिन उन्होंने पुकारा-‘‘विट्ठल, यहाँ आओ।’’ इस संबोधन को सुनते ही चैतन्य आश्रम चैंक उठा। श्रीपादस्वामी ने अनुभव किया कि उनका संदेह ठीक था।
            चैतन्य आश्रम के पास आने पर उन्होंने कहा-‘‘वत्स, छल करने से साधना क्षतिग्रस्त हो जाती है। भले ही सर्वसाधारण न समझे, पर सर्वशक्तिमान् ईश्वर इसे जान लेते हैं। तुमने मुझे, अपनी पत्नी को, गाँव के निवासियों को धोखा दिया है। संन्यास-ग्रहण करते समय तुमने मुझसे कहा था कि तुम पत्नी-पुत्र-हीन हो। गुरु से कपट करते तुम्हें लज्जा नहीं आयी?’’ विट्ठल को स्वप्न में भी विश्वास नहीं था कि उनके गुरु तीर्थ-दर्शन के सिलसिले में उसके गाँव जायेंगे। वहाँ इनकी मुलाकात रुक्मिणी से हो जायेगी। वे हतप्रभ होकर गुरु के कटुवचन चुपचाप सुनते रहे।
            विट्ठल को चुप रहते देख श्रीपादस्वामी का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने मृदुस्वर में कहा-‘‘अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है। तुम्हारी पत्नी तुम्हारे लौटने की प्रतीक्षा कर रही है। मेरा आदेश है कि उस देवी को मनोकष्ट मत दो। घर वापस चले जाओ। गृहस्थ-जीवन में भी तुम साधना कर सकते हो। मेरी शुभकामनाएँ सर्वदा तुम्हारे साथ रहेगी।’’
            विट्ठल पंत गुरु की आज्ञा मानकर आलन्दी वापस आ गये। मध्ययुग में ब्राह्मणवाद अत्यन्त कठोर हो गया था। बार-बार मुसलमानों के आक्रमण और अत्याचारों के कारण कर्मकांडी पंडित उदार होने के बदले रूढि़वादी बनते गये। सारा हिन्दू-समाज इनके बंधनों में जकड़ता गया। ऐसे माहौल में विट्ठल पंत ने संन्यास-आश्रम त्यागकर पुनः गृहस्थ-आश्रम को अपनाया।   
            विट्ठल अपने यहाँ की समाज-व्यवस्था से अपरिचित नहीं थे। वे यह जानते थे कि यह एक अक्षम्य अपराध है, इसे समाज कभी क्षमा नहीं करेगा। संन्यासी बनने का अर्थ है- समाज तथा परिवार के निकट मृत बन जाना। संन्यासी कभी अपनी जन्मभूमि में वापस नहीं आते।
            आलन्दी आते ही उन्हें सारा समाज घृणा की दृष्टि से देखने लगा। वे समाज से बहिष्कृत कर दिये गये। गाँव के अंतिम छोर पर वे सपरिवार अछूतों-सा जीवन व्यतीत करने को बाध्य हुए।



Wednesday, August 6, 2014

हृदय रोग तथा अन्य रोगों में लाभदायक - अर्जुन छाल चूर्ण


वैद्यकीय जगत में ‘अर्जुन छाल चूर्ण’ अति प्रशंसनीय रहा है। पित्त से होने वाले रक्त स्त्राव रोगों की रामबाण औषधि होने के साथ-साथ हृदय में होता हुआ अंजाइना (शूल) कोरोनरी, इन्सफीसीयसी, आर्टीरीओस्केलोरोसीस, वात प्रकोप से होता हुआ कोरोनरी ब्रान्यमां स्पाक्षम,  हृदय को कम रक्त मिलने से होता हुआ शूल और हृदय की मांस पेशियों को सुदृढ़ करने के लिए ‘अर्जुन छाल चूर्ण’ अत्यन्त उपयोगी है। हृदय रोग के अलावा अन्य रोगों में भी उपयोगी है।

सेवन विधि - आधा गिलास दूध और आधा गिलास पानी लेकर उसमें आधा चम्मच पाउडर डालकर उबाल लें। जब यह आधा रह जाए तो छानकर रख लें। गुनगुना रह जाने पर एक छोटा चम्मच शहद अथवा मीठा मिलाकर पी लें। इसे खाली पेट लें और एक घंटे तक कुछ न खाएं।

कुछ प्रयोग-रोगों परः 1. ‘अर्जुन छाल चूर्ण ’ बड़ी हरड़ें, रासना, कचुरो, पीपर, सौंठ, पुष्कर मूल सभी सम भाग में यमात्रा मेंद्ध लेकर बारीक चूर्ण करें। इसमें मृगश्रृंग और जवाहर मोहरापिष्टी 1/2 मात्रा में मिक्स करें। ये चूर्ण 1 से 2 भाग मधु या अच्छी प्रकार के च्यवनप्राश के साथ सुवह शाम लेना चाहिए।
हृदयशाूल, अनजाईनल पेन, कोरोनरी इन्सफीयन्सी, रक्तनालिका ब्लाॅकेज बगैरा में अच्छा परिणाम दिखता है।
(जिनको मधुमेह हो, वे मधु या च्यवनप्राश का उपयोग न करें)
2. अस्थिभंग (फ्रेक्चर) में ‘अर्जुन छाल चूर्ण’ दूध के साथ सुवह शाम नियमित लेने से हड्डी जल्द ठीक होती है।
3. खांसी में ‘अर्जुन छाल चूर्ण’ और अडुसा का चूर्ण मिलाकर मधु के साथ सुवह शाम लेना चाहिए।
4. वृद्धावस्था में हृदयरोग होना का डर लगता हो तो अर्जुन छाल चूर्ण गाय के घी के साथ मिलाकर सुवह शाम लेना चाहिए।

Since human studies in Western countries with arjuna herb are quite limited, we don't have a good idea how long arjuna should be taken without a break. To be on the safe side, it would be a good idea to be off arjuna one or two days a week, and one week per month.

Tuesday, August 5, 2014

स्वस्थ, सबल और संवेंदनशील बनने का मार्ग

जीवन का लक्ष्य केवल भैतिक सुख और सफलता ही प्राप्त कर लेना ही नहीं है बल्कि जीवन में सबलता, संयम, संतुलन एवं संवेदनशीलता का भी समावेश होना चाहिए जिसके माध्यम से प्रत्येक मानव अपने जीवन के साथ समाज में दूसरे लोगों को भी जीवन को सुधारने और संवारने में सहायक सिद्ध हो।

इस संदर्भ में विस्तार से जानने के लिए निम्न दो पुस्तकें पढ़ें।
सनातन धर्म का प्रसाद
साधना समर- चुनौतियां और समाधान (A Guide to Spiritual Transformation)
सम्पर्क सूत्रः rkavishwamitra@gmail.com
vishal Mob: 9254761220

राधानाथ स्वामी की अध्यात्मिक खोज यात्रा part-5

            मैं नेपाल की राजधानी काठमाण्डू गया और वहाँ से सात मील पूर्व में स्थित बोधनाथ पर्वत पहुँचा। पर्वत के नीचे फूलों से भरे वृक्षों के एक कुंज में मैं ध्यान करने लगा। आँखें खोलने पर मैंने एक सुन्दर इन्द्रधनुष को देखा जो हिमालय की समूची घाटी पर खिंचा हुआ था और मानसून मेघों से रची नीली पृष्ठभूमि पर चमक रहा था मैंने शीतल सौंधी पवन की एक गहरी साँस ली। शीद्य्र ही ऊँची पदचापों ने मुझे मेरी स्वप्निल स्थिति से निकालकर मेरा ध्यान एक यूरोपी पर्यटक की ओर आकर्षित किया वह छाती फुलाये खाने-पीने के सामान का एक बड़ा थैला हाथ में लिए जा रहा था। छह फुट से ऊँचे, सुनहरे बालों और टी-शर्ट के नीचे से उभरती माँसपेशियों वाले इस व्यक्ति का डील-डौल एक बाॅडी-बिल्डर जैसा था। अचानक जंगल से निकले भूरे बन्दरों की एक टोली ने उसे घेर लिया। भले ही हर बन्दर उसके सामने पिद्दी दिख रहा था, वे बन्दर उसकी कमजोरी ढूँढ़कर हमला करने की कला अच्छी तरह से जानते थे। वे दाँत दिखाते हुए गुर्राये और डरावनी मुद्राओं से उसे धमकाने लगे। उस महाबली ने अपनी एक बलिष्ठ भुजा में अपना सामान पकड़ा और दूसरी से एक बड़ा पत्थर उठा लिया। फिर एक योद्धा की भाँति उस पत्थर को घुमाते हुए उसने उन छोटे लुटेरों का कचूमर बनाने की धमकी दी। किन्तु बन्दरों को कोई फर्क नहीं पड़ा तथा वे पहले से भी ज्यादा जोर से गुर्राने लगे। वे छोटी छलाँगे भर अपने शिकार के पास आये और उसके मन पर हमला करने में सफल हो गये। डर से उस पहलवान के हाथ-पाँव फूल गये और वह एक सहमे हुए बच्चे के समान काँपने लगा। अन्त में एक छोटा बन्दर ठीक उसके पीछे आया और उसके हाथ से थैला खींच लिया। पहलवान ने रोकने की चेष्टा भी नहीं की। बिना उसपर ध्यान दिये बन्दर थैले के इर्द-गिर्द खाने के लिए जमा हो गये। घबराहट से काँपता हुआ वह महाकाय दुबककर निकल गया।

            कुछ ही क्षणों में लगभग आठ वर्ष का एक दुबला-पतला नेपाली लड़का वहाँ पहुँचा। बन्दरों की टोली ने अपनी लूट का भोग करना आरम्भ ही किया था कि उस छोटे बच्चे को आता देख उनमें खलबली मच गई। बच्चा हाथ में पत्थर लिये उनकी ओर दौड़ा। लुटेरों का दल चीखने लगा, उनकी आँखों में आतंक उतर आया। अचानक उन्होंने थैला छोड़ा और भाग खड़े हुए। उस बच्चे ने थैला उठाया और खाने बैठ गया। सारे बन्दर चिन्ताग्रस्त हो दूर से देख रहे थे। मैं आश्चर्यचकित था। यह क्या हुआ? वह नटखट बालक मुश्किल से उस भीमकाय यूरोपी के एक साथ के बराबर था। बन्दर उस भीमसेन के धमकाने से टले नहीं क्योंकि उन्होंने उसके मन में बैठे भय को भाँप लिया था। किन्तु वे उस बालक से डर गये क्यांेकि उस बालक को उनसे कोई भय नहीं था। भगवान् की ओर निरन्तर स्पष्ट होते मेरे मार्ग पर यह घटना मुझे क्या सिखा रही थी। यदि हमारे मन में डर बैठ जाता है तो हम कमजोर होकर हार सकते हैं। वह विदेशी व्यक्ति बन्दरों से अपरिचित था, किन्तु नेपाली बच्चा जीवनभर बन्दरों के बीच रहा था। इसलिए, हम उससे डरते हैं जिसे हम नहीं जानते। अपने आध्यात्मिक स्वरूप के ज्ञान और भगवान् में सच्ची श्रद्धा से हम समस्त भयों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। हे भगवान्, कृपया मुझे ऐसा साहस दें जिससे मैं आप तक पहँुचने का मार्ग प्राप्त कर सकूँ। जीवन में भय एक प्रबल शक्ति है। बीमारी का भय, विफलता, अन्यों को निराश करने का या आर्थिक पतन का भय। शत्रुओं, चोरों, धोखेबाजों या जीवन में शंकाओं सहित अन्य अनेक वस्तुओं का भय। माँ की गोद में शिशु समस्त भय से मुक्त हो जाता है। ऐसी श्रद्धा हमें शान्ति प्रदान करती है, भले ही उस श्रद्धा की उत्पत्ति वैज्ञानिक या दार्शनिक ज्ञान से हो अथवा सरल विश्वास से। सच्ची श्रद्धा या तो भगवान् के प्रत्यक्ष अनुभव से आती है अथवा उन लोगों के संग से जिनके पास वह श्रद्धा है। मुझे ईसा मसीह के ये शब्द स्मरण हो आये, ‘‘जबतक कोई इस बालक के समान नहीं बनता, वह भगवान् के धाम में प्रवेश नहीं कर सकता।’’ हे भगवान्, क्या कभी मुझे ऐसी श्रद्धा का वरदान मिलेगा?