Wednesday, September 17, 2014

पांच दुर्लभ चीजें

पाप से अपने को बचानाः चुगली, निन्दा और अशुद्ध आहार से अर्थात् पापजनक आहार व पापजनक व्यवहार से अपने को बचाना। वास्तव में जीव खुद निष्पाप है। वास्तव में आप ब्रह्म-परमात्मा के अविभाज्य अंग हैं, शुद्ध हैं किन्तु अशुद्ध वासनाओं से मिलकर अशुद्ध हो जाते हैं, अशुद्ध कर्मां से मिलकर अशुद्ध हो जाते हैं। इसलिएः
            जानिअ तबहिं जीव जग जागा।
            जब सब बिषय बिलास बिरागा।।
परमात्मा के पद में रुचि हो। और यह रुचि कैसे हो? बार-बार उसका नाम लो, उसका गुणगान करो, उसको प्रति करो।
निरपेक्षताः किसी से हमें कुछ चाहिए नहीं। जितनी निरपेक्षता आएगी उतना मनुष्य ब्रह्मात्व में जल्दी जग जाएगा। अपेक्षा ही ब्रह्म-परमात्मा से दूर रखती है।
सहनशक्तिः सास ने कुछ कह दिया, बहू ने, भाई ने, बेटे ने कुछ कह दिया या दुश्मन ने कुछ सुना दिया तो उद्विग्न न हों, धैर्य रखें। फिर उसको समझायें कि ‘यह ऐसा नहीं, ऐसा है।’ ऐसा करने वाला आदमी बड़ा प्रभावशाली हो जाएगा।
प्रिय बोलने की शक्तिः यह बड़ी दुर्लभ चीज है। जो किसी से भी मीठी बात नहीं करता, वह अशांत व्यक्ति सभी के द्वेष का पात्र बन कर रह जाता है। लोगों से मिलते समय जो स्वयं ही बात आरंभ करता है और सबके साथ प्रसन्नता से बोलता है, उस पर सब प्रसन्न रहते हैं। जो मधुर वचन बोलता है, दूसरों को मान देता है उसका आंतरिक आनन्द बढ़ जाता है। ‘अं...अॅं...हॅंू...हूॅंह...’ करके जो दूसरों को नीचा दिखाता है, उसने जीना सीखा ही नहीं। अहं भरी मानसिकता, शुष्कता व अहंकारवाली वाणी नहीं, प्रेम-नम्रता, निस्वार्थता और सारगर्भित वाणी हो। आप अमानी रहें, दूसरों को मान दें।
दान देने की शक्तिः पैसा आना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन देने कि शक्ति होनी चाहिए। कंजूस ब्याज-पे-ब्याज ले-ले के, सम्भाल-सम्भाल के और अंत में छोड़ के मर जाता है। भगवान की कृपा तब देने की शक्ति आती है।

            यदि आप में ये पांच सद्गुण आ गए तो ब्रह्मत्व में प्रतिष्ठित करने में रह महापुरुष हॅंसते-खेलते आपको ब्रह्मसुख में, ईश्वरीय सुख में ले जा सकते हैं।

Sunday, September 14, 2014

आदर्शवादिता

अजय और समीर पार्क में खेल रहे थे। अचानक अजय बोला - ‘दोस्त, एक बात बता! बड़े होकर अगर तेरे पास दो गाडि़याॅं होंगी, तो क्या तू मुझे एक गाड़ी उपहार के रूप में दे देगा?’
समीर - ‘अरे बिल्कुल! भला इसमें भी कोई पूछने वाली बात है? दोस्ती पहले आती है, बाद में संसार की चीजें।’
अजय - अच्छा, अगर तेरे पास दो-दो आलीशान बंगले होंगे, तो क्या तब भी तू मुझे अपना एक बंगला उपहार में दे देगा?
समीर- हाॅं, हाॅं मित्र, पक्का दे दूॅंगा। तेरे बिना कहे ही, मैं अपना एक बंगला तेरे नाम कर दूॅंगा।
अजय - क्या बात है मित्र! तेरे जैसे दोस्त हर किसी को मिलें... अच्छा, तेरे पास यदि दो अच्छी पेन्सिलें हों, तो क्या तू मुझे एक दे देगा?
समीर (एकदम से) - बिल्कुल नहीं!
अजय (हैरानी से) - पर क्यों? पेन्सिल तो गाड़ी और बंगले के सामने बहुत छोटी चीज है।
समीर - बुद्धु, मेरे पास न अभी दो गाडि़याॅं हैं, न बंगले। इसलिए मैंने कह दिया कि मैं तुझे इनमें से एक-एक दे दूॅंगा। पर मेरे पास दो बहुत अच्छी पेन्सिलें तो अभी ही हैं। अगर मैं ‘हाॅं’ कह दूॅंगा, तो मुझे तुझे वे अभी देनी पड़ेगी, जो मैं कतई नहीं दूॅंगा। वे मेरी हैं। तुझे क्यों दूॅं?

            आज हर इंसान समीर की तरह अपने आप को बहुत आदर्शवादी दिखाता है। भाषण देने को, वायदे करने को सपने दिखाने को, आदर्श झाड़ने को तो बहुत होते हैं उसके पास! लेकिन जब वास्तविकता में कुछ करने की बात आती है, तो हो जाती है उसकी टायॅं-टायॅं फिस्स!

Sunday, September 7, 2014

शरीर के दर्द और योग

     शरीर में जैसे ही किसी ऊतक, कोशिका, अंग या प्रणाली पर किसी आन्तरिक रोग या बाहरी दुर्घटना से हमला होता है, तभी शरीर में दर्द पैदा होता है। दर्द नहीं होता तो शरीर की आन्तरिक या बाह्य खतरों से रक्षा सम्भव नहीं होती। शरीर की क्षति हो जाने पर या सम्भावित नुकसान के अनुमान से दर्द उतरकर हमारा ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करता है। दर्द शरीर की रक्षा प्रणाली की प्रबल प्रक्रिया है। हाथ के कटने पर चमड़ी ऊपर से कटी, चमड़ी के नीचे ऊतकों और कोशिकाओं की क्षति हुई, रक्षा प्रणाली हरकत में आई तथा उसने सूजन द्वारा कटे स्ािान को घेर लिया। कटे स्थान पर पूरी हलचल मच गई ताकि शरीर की नुकसान से रक्षा की जा सके। रोग अन्दर ऊतकों, कोशिकाओं या अंगोें पर हमला करता है जिससे बचने के लिए पूरी रक्षात्मक प्रणाली हरकत में आ जाती है। शरीर में दो तरह के दर्द होते हैं। एक अकस्मात दर्द, जो कटने या चोट लगने पर होता है। दूसरा दर्द लगातार रहने वाला दर्द, जो किसी रोग से शरीर में पैदा होता है। इन दोनों ही अवस्थाओं में दर्द रीढ़ से होकर मस्तिष्क तक जाते हैं।
     शरीर में अन्दर या बाहर से जब भी खतरा आएगा, तभी खतरे के केन्द्र-बिन्दु पर मौजूद हमारी नाडि़यों के छोर अपने विद्युत संकेतों द्वारा रीढ़ में पहुॅंच कर न्यूराॅन को सूचना देंगे। रीढ़ तक पहुॅंचे दर्द के संकेत तीव्रतम गति के साथ मस्तिष्क में थेलेमस (Thalamus) ग्रन्थि में पहुॅंच जाते हैं। थेलेमस ग्रन्थि हरकत में आकर अपनी पूरी शक्ति को शरीर में आए खतरे से बचाने के लिए झोंक देती है। इससे हमारा रक्तचाप और हृदय की धड़कन बढ़ जाएगी। हमारी श्वास गति तेज हो जाएगी तथा शरीर में बेचैनी और पसीना आ जाएगा।
     मस्तिष्क का विद्युत-परिपथ तन्त्र कुछ संकेत हमारे ब्रह्मरन्ध (Medulla) की ओर पहुॅंचाकर हमारे भावनात्मक शरीर को प्रभावित कर देता है। इससे दर्द का आवेग और बढ़कर हमारी माॅंसपेशियों को भी मरोड़ देता है। शरीर दर्द से भर जाता है तथा दर्द का केन्द्र भी पता लगाना कठिन हो जाता है। दुर्घटना से शरीर को बचाने के लिए जल्दी कदम नहीं उठाए जाएॅं या लम्बी बीमारी, जिसका इलाज नहीं हो पा रहा है - इन दोनों स्थितियों में दर्द अपना मार्ग निश्चित और प्रबल कर लेता है। यही कारण होता है कि रोग ठीक हो जाने पर भी दर्द का भय ज्यों का त्यों बना रहता है। शरीर में दर्द का हमारे विचारों और भावनाओं से गहरा सम्बन्ध बन जाता है। उदाहरण के लिए, यदि आप गठिया, सन्धिवात या साईटिका के दर्द से पीडि़त हैं, तब हमारी परिसरीय संवेदी तंत्रिकाएॅं (Periphery Nervous System) जो दर्द के यातायात का माध्यम होती हैं, वे ऐंठ जाती हैं। दर्द का मार्ग पक्का बन जाता है। इस स्थिति में दर्द दोनों दिशाओं में, यानि अपने केन्द्र बिन्दु से आरोही स्थिति में मस्तिष्क की ओर जाता है तथा अवरोही स्थिति में मस्तिष्क से वापिस दर्द के बिन्दु पर इस प्रकार आता और जाता रहता है। दर्द आरोही स्थिति में दैहिक व्यग्रता (Physiological) तथा अवरोही स्थिति में मनोंविकारों के अवसाद से भरा होता है। यही कारण होता है जिससे हमारा सारा शरीर व्यग्रता, अवसाद और उदासी से भर जाता है। इस प्रकार दर्द का मार्ग पक्का बनकर स्थाई बन जाता है जिसको तोड़ना व समाप्त करना रोग ठीक करने से भी कठिन है।
     हमारी नाडि़यों और माॅंसपेशियों की सहायता से बना दर्द का स्थाई मार्ग आसनों के अभ्यास से टूट जाता है। प्रत्येक आसन अपनी पूरी क्षमता से करें तथा उसके साथ श्वास का भरना और निकालना धीरें-धीरें करें। अपना ध्यान आसन के लिए की जाने वाली आकुचन-संकुचन की प्रक्रिया की ओर बनाए रखें। आसन का आकुचन श्वास भर कर तथा संकुचन श्वास निकाल कर करें। आसन की स्थिति में श्वास निकालते हुए शरीर में मौजूद किसी भी दर्द की चिन्ता और उत्तेजना को बाहर निकालें। लगातार आसन के अभ्यास से आप दर्द से बनने वाली रासायनिक और भावनात्मक घबराहट को शरीर से दूर कर पाएॅंगे। आसन की स्थिति में श्वास भर कर तथा आॅंखें बन्द किए हुए शरीर को स्थिर करे और जिस अंग में दर्द है, वहाॅं ध्यान रखें। इस तरह शरीर और मस्तिष्क के मध्य एक रिश्ता बना लेते हैं, जो हमें शारीरिक दर्द के संभालने में मददगार होता है। योगासन का निरन्तर किया जाने वाला अभ्यास हमारे परिसरीय संवेदी तंत्रिका के छोरों को शक्ति देता है। धीरे-धीरे हमारी हड्डियों, मांसपेशियों और नस-नाडि़यों का ढाॅंचा सुदृढ़ बन जाता है और उनका आपसी तालमेल दर्दों को जड़ से उखाड़ फेंकने में सहायता करता है।
     प्राणायाम का अभ्यास रीढ़ के चेतना केन्द्रों पर न्यूराॅन का मस्तिष्क तक पहुॅंचने से पहले ही दमन की देने की शक्ति प्रदान करता है। नाडि़यों और न्यूराॅन के बीच चलने वाला दर्द का परिस्परिक प्रभाव यह निर्णय करता है कि दर्द के संकेत को मस्तिष्क तक कब भेजना है। इस तरह हम प्राणायाम के अभ्यास से अपने चेतना केन्द्रों को सक्रिय कर लेते हैं और दर्द का दरवाजा बन्द कर देते हैं। वैज्ञानिक शोधों से सिद्ध हुआ है कि आसनों के बाद किया जाने वाला धीमी, लयबद्ध और लम्बी श्वास का अभ्यास शरीर नाडि़यों के छोरों से आए दर्द के संकेतों को ग्रहण करके रीढ़ में मौजूद (Spinathalmic tract) को सक्रिय या निष्क्रिय कर सकता है। आसन और प्राणायाम शरीर में आॅक्सीसटोसिन तथा इंडोर्फिन (Endorphin) हार्मोन पैदा करता है, जिससे दर्द शरीर को प्रभावित नहीं कर पाता तथा इससे हमें उपचारात्मक शक्ति प्राप्त होने लगती है। आसन-प्राणायाम के उपरान्त किया जाने वाला शवासन, योग निद्रा या ध्यान का अभ्यास हमारे मस्तिष्क में ‘अल्फा’ किरणें उत्पादित कर देता है। इससे मस्तिष्क के बाएॅं आवरण में ‘गामा’ तरंगें उठने लग जाती हैं। ये किरणें कोमल और अनित्य होती हैं लेकिन दर्द के अवरोही रास्तों को प्रभावित कर मस्तिष्क से वापिस शरीर में जाने वाले रास्तों को बन्द करने में मदद करती हैं। मस्तिष्क में उठने वाली ‘थीटा’ तरंगें सम्मोहन शक्ति देती हैं। साधक को जब यह शक्ति मिलती है, तब वह शरीर के प्रत्येक दर्द से दूर हो जाता है। वह बिना किसी दर्दनाशक दवा के ही शल्य चिकित्सा करा सकता है और अंगारों पर चल सकता है। लगातार किए जाने वाले योगाभ्यास से अन्त में अत्यन्त धीमी गति से मस्तिष्क में ‘डेल्टा’ तरंगें प्रवाहित होने लगती हैं जो ‘दर्द कहीं नहीं’ का अहसास कराती हैं और आनन्द को प्रदान करती हैं। साधक शरीर के विध्नों और व्यवधानों से ऊपर उठ जाता है। साधना की यह प्रबल शक्ति बिना उकताए लगातार और आनन्दपूर्वक क्रमबद्ध तरीके से किए जाने वाले योगाभ्यास से कुछ काल के उपरान्त ही प्राप्त हो जाती है।
साभारः योग मंजरी
लेखकः वेद प्रकाश राठी

डव्ठः 9312833729

संतुलित दांपत्य जीवन और पत्नी की भूमिका

            संतुलन और सामंजस्य एकांगी नहीं होता अर्थात् एकाकी प्रयत्न से सामंजस्य का प्रयास प्रायः निरर्थक रखने के लिए समतुल्य भार की वस्तुएॅं रखनी पड़ती हैं, नाव के दोनों सिरों पर बैठे दो लोग यदि संतुलन खो दें तो नाव डूबने का खतरा रहता है, इसी प्रकार परिवाररूपी नाव को संतुलित रखने अर्थात् डूबने से बचाए रखने में दोनों व्यक्तियों अर्थात दंपती का पारस्परिक सहयोग एवं सहकार आवश्यक है, अन्यथा एक दूसरे किनारे पर ले जाना चाहता है और दूसरा दूसरे किनारे पर तो फिर कशमकश की स्थिति का निर्माण हो जाएगा। ऐसी परिस्थिति में सांमजस्य द्वारा संतुलन बनाया जा सकता है। कार में बैठने वाले अनेक लोग होते हैं, किन्तु चालक एक ही। इसी प्रकार मोटर, ट्रेन, वायुयान को एक ही चालक द्वारा नियंत्रित किया जाता है, किन्तु चालक यदि संतुलन खो देता है तो भीषण दुर्घटनाएॅं होती देखी गईं हैं। इस कसौटी में पत्नी ही खरी उतरती है, क्योंकि वह अहर्निश परिवार के सम्पर्क एवं सान्निधय में रहती है, पति तो बाहर रहकर, नौकरी अथवा काम-धंधे द्वारा परिवार की आवश्यकताओं की संपूर्ति हेतु प्रयत्नशील रहता है। प्रश्न यह उठता है कि संचालक यदि प्रशिक्षित नहीं तो दुर्घटना की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
             परिवार को हम एक गाड़ी ही मानें और उस गाड़ी की आवश्यकताएॅं जुटाने वाला अर्थात् ईंधन, पानी की व्यवस्था करने वाले व्यवस्थापक पति को मान सकते हैं, तो परिवार को संचालित एवं संपादित करने के लिए एक संयोजक की भी आवश्यकता रहती है। चालक की थोड़ी सी असावधानी ही गाड़ी को क्षतिग्रस्त कर सकती, अर्थात् परिवार संस्था चैपट हो सकती है। बनाना सरल है, किन्तु चलाना कठिन है, कमाना जितना सरल है खर्च करना उतना ही कठिन है। आदमी की समझदारी इस बात में नहीं निहित है कि वह कितना और कैसे कमाता है? वरन् कैसे और कितना खर्च करता है? इस दृष्टि से भी पत्नी का दायित्व पति से अधिक माना जा सकता है। पत्नी ही परिवार की वास्तविक कत्र्ता-धत्र्ता होती है, उसी के विवेक से परिवार सुखी एवं समुन्नत होता चला जाता है और अविवेक से दुखी एवं अवनत होता जाता है। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द ने ‘गबन’ उपन्यास में पत्नी की उस कमजोरी का चित्रण किया है, जिसमें पति को गबन करना पड़ा और सजा भी काटनी पड़ी।
            इसके विपरीत पत्नी द्वारा पतियों को जीवन-दृष्टि देने वाले ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं, जिससे वे अपने जीवन में उल्लेखनीय भूमिका का निर्वाह कर सकें, अन्यथा उनका जीवन आरम्भ में घिनौना ही था। इस संदर्भ में रत्नावली, विद्योत्तमा एवं वाल्मीकि की पत्नी का स्मरण यहाॅं समीचीन ही है। पति को प्रत्येक दृष्टि से पत्नी सहायक सिद्ध हो सकती है, साहित्य साधना में भामती का उदाहरण, रणभूमि में कैकेयी एवं हाड़ारानी अविस्मरणीय हैं। अभिप्रायः स्पष्ट है कि ये पत्नियाॅं स्वय। संतुलन खो देतीं तो हम ऐसे महापुरूषों से वंचित रह जाते। नैतिक, सांस्कृतिक दृष्टि से इनकी संतुलन क्षमता अद्वितीय मानी जा सकती है, क्योंकि दांपत्य जीवन की आधारशिला में दोनों की उपादेयता अप्रतिम ही मानी जाती है। दांपत्य जीवनरूपी संस्था को संविधान की सफलता विशेष रूप से नारी की ही गुणवत्ता पर आधारित है। पत्नी की व्यवहारकुशलता ही बिगड़े मिजाज पतियों की रामबाण औषधि सिद्ध हुई है, पति की साज-संभाल के प्रति सतर्कता, उसकी आवश्यकताओं का यथासम्भव ध्यान आयु के अनुरूप प्रेम और सम्मान का आदान-प्रदान, पति को संतुष्ट बनाए रखने में पत्नी की सफलता, उसकी बुद्धि-कौशल एवं प्रत्युत्पन्नमति पर निर्भर करता है। अतः दांपत्य जीवन के संतुलन की कुंजी पत्नी ही कही जा सकती है। जो पत्नी प्रेम, सम्मान, सौहार्द्र एवं सद्भाव के गुणों से ओत-प्रोत है तथा जिसे अपने कत्र्तव्यों और उत्तरदायित्वों का बोध है। वह पति के लिए वरदान ही कही जा सकती है। ऐसे दांपत्य ही सही अर्थों में सुखी एवं सम्पन्न कहे जा सकते हैं। संपन्नता का अभिप्राय धन एवं वैभव से नहीं है। बलिक दांपत्य जीवन के स्वर्ण सूत्रों को जीवन में सफलतापूर्वक चरितार्थ करने से है अन्यथा अनेक धन की दृष्टि से संपन्न कहे जाने वाले दंपति नारकीय जीवन जीने के लिए विवश हैं। वहीं दूसरी ओर सुमन के अर्थात् सुन्दर मन के विचारों की संपदा के धनी दंपति गौरवशाली एवं गरिमामय जीवन जीते हैं जो अनुकरणीय एवं आदर्श कहे जाते हैं।
            नारी भावना की साक्षात् प्रतिमूर्ति एवं देवी होती है। सद्भावना ही मनुष्यों को जोड़ने एवं दुर्भावना तोड़ने का कार्य करती है, किंतु पति-पत्नी में निर्मल प्रेम है तो दोनों में सदैव वैचारिक एवं भावनात्मक तादात्मय रहेगा और घृणा एवं द्वेष है तो कटुता रहेगी। यह वैज्ञानिक सत्य है कि क्रिया की प्रतिक्रिया समान रूप से होती है।
            जिस प्रकार ध्वनि की प्रतिध्वनि की प्रतिध्वनि एवं विंब का प्रतिविंब समानधर्मा होता है। उसकी प्रकार प्रेम की प्रतिक्रिया प्रेम होती है और क्रोध एवं घृणा की क्रोध एवं घृणा। गेंद की जितनी जोर से दीवार पर मारेंगे उतने ही जोर से लौटकर आएगी। प्रेम वह पारस है, जिस किसी लौहगण को संस्पर्श करता है, स्वर्ण में परिणत कर देता है। पति-पत्नी में यदि परस्पर प्रेम हो तो वे एक-दूसरे को विश्व सुन्दर एवं विश्वसुन्दरी से कम नहीं मानते, भले चर्मचक्षुओं से वे कुरूप प्रतियोगिता में प्रथम आने वाले हैं। दंपति के लिए प्रेमचक्षुओं की महत्ता को रखना संतुलन के लिए अनिवार्य आवश्यकता है।
            प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए मात्र वाणी ही पर्याप्त नहीं है, वरन यह कहना अत्युक्ति न होगा कि प्रेम की भाषा मौन होती है। मात्र सांकेतिक रूप से दूसरे के भावों को समझने में सक्षम हो जाते हैं, जैसे सीताजी रामचन्द्र जी की आंतरिक भावना को समझकर ही केवट को देने के लिए मुंदरी देने लगी थीं- पत्नी अपने पति के हृदय से सुपरिचित रहती है तभी उसकी दांपत्य जीवन के सच्ची सफलता मानी जा सकती है।
            आत्मीयता की अनुभूति के संबंध में भी यही नियम लागू होता है। आत्मीयता की अभिव्यक्ति भी वाणी द्वारा संभव नहीं। यदि की भी जाती है तो कृत्रिमता परिलक्षित होती है। आत्मीयता जिससे होती है, उसे दिया जाता है- सम्मान, प्रेम, सद्भाव आदि पाने के पूर्व देने ही पड़ते हैं। यदि पाने की इच्छा है और देना नहीं जानते, तो संतुलन बिगड़ने की ही संभावना रहती है। प्रशंसा एक ऐसा अचूक ब्रह्मास्त्र है, जिस पर चलाया जाता है, खाली नहीं जा सकता है। इसे प्रशंसापाश भी कहा जा सकता है। जैसे प्रेमपाश में आबद्ध प्राणियों को अलग नहीं किया जा सकता, वैसे प्रशंसा में बंधकर सहज उन्मुक्ति संभव नहीं। मनोवैज्ञानिक सत्य है कि अपनी प्रशंसा सुनकर हर व्यक्ति प्रसन्न होता है। फिर ऐसे अस्त्र का प्रयोग पति-पत्नी क्यों नहीं करते? पति की सहानुभूति अर्जित करने एवं संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि प्रशंसा का सहारा लिया जाए। परस्पर प्रशंसा से सद्भावना का संचार होता है।
            प्रशंसा का अभिप्रायः गुणों की, सत्कर्मों की ही प्रशंसा की जाए। जिससे एक-दूसरे को प्रोत्साहन भी मिलता रहेगा और प्रेरणा भी। असद्वृत्तियों और दुष्प्रवृत्तियों की प्रशंसा अहितकर होगी। असद्कार्यों की आलोचना में दांपत्य का संतुलन वर्तमान में तो डगमगाता दीखे, किंतु दूरगामी परिणाम अनुकूल ही होंगे। दुर्विचार की आलोचना से अवमानना भी हो सकती है, किंतु मंदोदरी इस भय से अपने पति रावण का न समझाए, ऐसा नहीं हो सकता।
            नवदंपति द्वारा जब एक नूतन सदस्य परिवार में संतान के रूप में जुड़ जाता है, तब कुछ ऐसी अनुभूति करने लगते है कि खास पति महोदय की पत्नी का प्रेम कुछ कम हो गया है। वस्तुतः ऐसा है नहीं तथापि संतान स्वाभाविक रूप में प्रेम-विभाजन का कारण होती है।

            माॅं का वात्सल्य जब पराकाष्ठा पर पहुॅंचने लगता है तो पति की उपेक्षा की संभावना हो सकती है। ऐसे अवसर पर भी पत्नी को विशेष सतर्कता से संतुलन स्ािापित करने की आवश्यकता होती है। पति को यह आभास नहीं होना चाहिए कि उसके प्रति अब पत्नी के प्रेम में कुछ कमी आई है। संतान के प्रति पिता का भी तो प्रेम होता है, उसकी भी संतति है। एक और महत्त्वपूर्ण बात दांपत्य जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है, जहाॅं कहीं गत्यावरोध होता है, तो उसकी प्रतिक्रिया होती है। बर्तन आपस में टकराने पर आवाज करते हैं। नीड़ों के समीप कलरव होता है, इसी प्रकार पति-पत्नी की स्वाभाविक रूप से कभी-कभी किसी भी विषय में मतभेद हो सकता है। ऐसी स्थिति में जब कभी उत्तेजना अथवा आवेश का जन्म हो तो उसे एकांत में ही अभिव्यक्ति करना श्रेयस्कर है। आपसी मतभेद के मनोमालिन्य को दूसरे के सामने प्रकट करने से अहं को ठेस पहुॅंचती है। अकेले में डाॅंट-डपट, पुचकार-फटकार, प्रेम से और क्रोध विज्ञापित नहीं हो पाता, जिससे वह पड़ोस में अथवा मोहल्ले में चर्चा का विषय नहीं बनता। आपसी मनोमालिन्य का विज्ञापन कटुता एवं मनोगुत्थियों को बढ़ाता है। मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जो बात किसी व्यक्ति से मनवाना चाहते हों, यदि दोस्तों अथवा भीड़ के बीच है तो उसका अहं गलत बात की भी पैरवी करेगा अर्थात् आड़े आएगा, किन्तु उसी बात को अकेले में समझा दो तो अहं की तुष्टि हो जाती है और संतुलन बिगड़ने से बच जाता है। असंतुलन प्रत्येक स्थिति में अलाभकर है। विशेषकर दांपतय जीवन के लिए तो यह अभिशाप कहा जा सकता है।

जीवन का सत्य और सार्थकता

            युवराज भद्रबाहु अपने समय के सभी युवकों में सर्वश्रेष्ठ, सुन्दर और सुगठित काया का स्वामी था। उसे अपनी सुन्दर काया और अतुल रूप यौवन का गर्व भी था। इस गर्व के कारण वह अन्य राजकुमारों के सामने दर्पभरे वचन भी बोलता रहता था। एक दिन युवराज महामंत्री के पुत्र सुकेशी के साथ बजरा से बाहर सरिता के तट पर भ्रमण कर रहा था। भ्रमण करते हुए युवराज और मंत्री-पुत्र नगर से कुछ दूर चले गए।
            एक स्थान पर, जहाॅं सरिता के दूसरे तट पर श्मशान था, कुछ लोग शव दाह कर रहे थे। युवराज ने मंत्री-पुत्र से पूछा -‘‘वहाॅं क्या हो रहा है?’’
            ‘‘वहाॅं खड़े लोगों का कोई स्नेही जन मर गया है।’’ सुकेशी ने कहा- ‘‘वे लोग उसके मृतशरीर का दाह-संस्कार कर रहे हैं।’’
            ’’अवश्य ही वह कोई कुरूप व्यक्ति होगा।’’ भद्रबाहु यहाॅं भी दर्प भरी टिप्पणी किए बिना नहीं रह सका। ‘‘यदि वह सुन्दर होता तो कोई क्यों जलाना चाहता। अपने पास नहीं रखता।’’
            ‘‘नहीं! ऐसी बात नहीं है, शरीर सुन्दर हो या असुन्दर, मर जाने पर सभी शरीर सड़ने-गलने लगते हैं। अतः उन शरीरों को जला देना पड़ता है।’’ सुकेशी ने कहा।
            यह बात युवराज के जाने किस मर्मस्थल को स्पर्श कर गई कि उसे अपने रूप, सौन्दर्य और यौवन का दर्प टूटे हुए काॅंच के टुकड़ों की तरह बिखर गया प्रतीत होने लगा और वह उदास रहने लगा। उदासी ने उसे इस बुरी तरह आ घेरा कि उसका सुन्दर चेहरा म्लान दिखाई पड़ने लगा। राजा ने अनेक प्रकार युवराज की उदासी और म्लानता का कारण जानना तथा उसे दूर करना चाहा, पर कोई परिणाम नहीं निकला।
            युवराज को इस प्रकार चिंतित और उदास देखकर मंत्री-पुत्र सुकेशी भी व्यथित हुआ। वह भद्रबाहु को हर तरह से बहलाने का प्रयत्न करता, पर युवराज के मुख परछाई रहने वाली म्लानता मिटती ही नहीं थी। राजगुरु कालाचार्य को एक विधि सुझी और वे भद्रबाहु को अपने गुरु महाचार्य के पास ले गए।
            सिद्धयोगी महाचार्य ने अपनी अंतर्दृष्टि से भद्रबाहु की मनोव्यथा, खिन्नता का कारण जान लिया और कहा- ‘‘भद्र! तुम इस शरीर के अंतिम परिणाम की चिन्ता करते हो।’’
            लगा किसी ने दुःखती रग को पहचान लिया हो और भद्रबाहु ने अपनी सारी व्यथा उॅंड़ेल दी। महाचार्य ने कहा- ‘‘अच्छा बताओ! आज तुम भवन के स्वामी हो। उस भवन में निवास करते हो। कल को वह भवन रहने योग्य नहीं रह जाता तो उस भवन को छोड़कर अन्य भवन में जाओगे अथवा नहीं।’’
            ‘‘सो तो जाना ही पड़ेगा महात्मन!’’ भद्रबाहु ने कहा। कालाचार्य बोले- ‘‘इसके बाद वह भवन गिर जाता है या उसमें आग लग जाती है तो इससे तुम्हारा क्या बिगड़ा?’’
            ‘‘कुछ नहीं गुरुदेव।’’
            ‘‘वही नियम शरीर के लिए भी लागू होता है। इसमें निवास करने वाली आत्मा के लिए जब तक यह रहने योग्य है, तभी तक यह सुन्दर है। जराजीर्ण हो जाने पर आत्मा द्वारा इसका त्याग और इसका नाश स्वाभाविक ही है। शरीर नहीं, सुन्दर तो वह आत्मतत्त्व है, जिसके कारण इसकी प्रतिष्ठा है। इसलिए आत्मा के प्रीत्यर्थ, उसके हित व विकास के लिए शरीर को एक उपकरण मात्र समझो। उसके लिए चिंतित मत होओ।’’

            इन वचनों ने भद्रबाहु के ज्ञानचक्षु खोल दिए और उसने निश्चय किया कि वह शरीर के गर्व की अपेक्षा आत्मा की महिमा को समझकर जीवन सार्थकता की सिद्धि के लिए ही प्रयत्नशील रहेगा।