Tuesday, April 7, 2015

असाध्य रोग के लिए क्या करें

            जब व्यक्ति किसी असाध्य रोग से पीडि़त होता है तो वह यह चाहता है कि उसे ऐसी कोई औषधि मिल जाए जिससे उसका यह रोग दूर हो जाए। एक डाॅक्टर से दूसरे डाॅक्टर तक एक हस्पताल से दूसरे तक चक्कर लगाते - लगाते मरीज की कमर टूट चुकी होती है। वह लाखों रूपया खराब कर चुका होता है। ऊपर से व्यक्ति भारी निराशा के दौर से गुजर रहा होता है व अपना मनोबल खो चुका होता है। मौत की भयावह कल्पनाएॅं उसकी पीड़ा को और बढ़ देती हैं।
            ऐसा व्यक्ति व उसका परिवार सर्वप्रथम शान्त व सकारात्मक वातावरण उत्पन्न करे। सर्वप्रथम उन कारणों को खोजें जिनसे यह समस्या उत्पन्न हुई है, उन कारणों की हटाए बिना रोग का समाधान नहीं निकल पाता दवाइयाॅं अपना काम उचित रूप् से नहीं कर पाती, उदाहरण के लिए पाचन तन्त्र की समस्या अधिकतर बारीक पीसे आटे से होती है। व्यक्ति अधिकतर अपना आटा तो मोटा नहीं पिसवाता। परन्तु तरह-तरह के पाचक चूर्ण प्रयोग करता रहता है। इससे उसके पेट में तरह-तरह की दवाईयाॅं चली जाती है। परन्तु स्थिति नियंत्रण में नहीं पाती । इसी प्रकार जो लोग कम मात्रा में पानी पीते हैं उनको रक्तचाप व न्यूरोमस्कूलर रोग होने लगते है, व्यक्ति हाई बी.पी. की दवाईयाॅं खाता है और उसके साइड इफेक्ट उसकी स्थिति को लगातार बिगाड़ते रहते हैं। इसीलिए यह कहा जाता है कि रोग के मूल कारण को खोजें, दूसरी बात आवश्यक बात है धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना रोग के मूल कारण पता लगने के बाद धैर्यपूर्वक क्रियान्वित (Implement) करना होता है, व्यक्ति की बिगड़ी आदतें जल्दी से सुधार के लिए तैयार नहीं हो पाती, यदि व्यक्ति 5 सालों से कुछ गलतियाॅं करता आ रहा है तो और उनमें सुधार करता है तो परिणाम आने में 5-7 माह अवश्य लगेंगे। इसलिए बिना हताश हुए सकारात्मक रूप् रखते हुए, कुछ माह योग करना आवश्यक है। असाध्य रोग के निवारण में निम्न बातें जरूरी हैं।
            रोग के कारणों को हटाया जाए, यदि रोग के कारण अनुवांशिक है तो उनमें सुधार लाने के लिए बहुत अधिक तप शक्ति की आवश्यकता होती है।
            मृत्यु के भय से व्यक्ति मुक्त रहे,मृत्यु एक सहज प्रक्रिया है, परन्तु मृत्यु का भय और सगे-सम्बन्धियों का मोह उसको पीड़ादायक बना देता है।
            ईश्वर विश्वास बनाकर रखें के ईश्वर कृपा से बड़ी से बड़ी कठिनाई का हल भी निकालना सम्भव है।
            परमात्मा ने व्यक्ति को Self-Healing की बहुत बड़ी क्षमता दी है। बशर्तें की व्यक्ति की मानसिकता सकारात्मक हो।
            व्यक्ति भगवान से प्रार्थना करे कि यदि व रोगमुक्त होता है तो मानव कल्याण के लिए कुछ न कुछ अपना योगदान अवश्य प्रस्तुत करेगा।
            सप्तधातु विद्या के ज्ञान द्वारा व्यक्ति आवश्यक औषधि का प्रयोग करे।

            जिस प्रकार का व्यक्ति का खान-पान, रहन-सहन होता जा रहा है अपने वाले चार-पाॅंच वर्षों में भारत की लगभग एक-तिहाई जनता जटिल व असाध्य रोगों के शिंकजे में फसने जा रही है। ये जटिल रोग व इनका निदान इतना पीड़ादायी है कि व्यक्ति यह नहीं समझ पाएगा कि जीना अच्छा है या मरना। इतनी दवाईयाॅं व उनके इतने Side-effect व्यक्ति को जीवन को साक्षात् नरक बना देती है। मृत्यु की गोद उसे जीवन के अधिक उचित प्रतीत होने लगती है। इन रोगों का भय से अधिक समस्याएॅं उत्पन्न करता है। अनेक व्यक्ति इस प्रकार के पाए गए जो सप्त धातु विद्या के ज्ञान द्वारा रोगमुक्त हो गए परन्तु अन्तर्मन उस रोग के भय से उतना त्रस्त हो चुका है कि रोग न होने की अवस्था में भी उसका आभास व दर्द महसूस करते हैं।

भारत की महिलाएॅं संस्कृति की कब्र न खोदें

            देवसत्ताओं ने अपने तपोबल से नारियों को समाज की गुलामी की जंजीरों से मुक्त कर एक बड़ा कार्य किया है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत की नारियाॅं समाज व संस्कृति की मर्यादा को ताक पर रखकर मनमाने वस्त्र पहनें व मनमानी हरकतें करें। यदि ऐसा होता है तो पूरा भारत का युवा वासना के आवेश में बहकर संस्कृति व समाज को तहस-नहस कर डालेगा। इसका उत्तरदायित्व व दोष किसके सिर पर आएगा? निश्चित रूप् से उन लड़कियों को व उनके माॅं-बाप को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा। इतनी सामाजिक व धार्मिक संस्थाएॅं भारत में हैं परन्तु इस मुद्दे पर चुप हैं। कड़ाई से नारी शक्ति को अनुशासित करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। हम सभी को बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं के साथ बेटी को शालीन बनाओं का नारा भी जोड़ना पड़ेगा अन्यथा इसका भारी खमियाजा भारत के समाज को भुगतना पड़ेगा।

            जो नारियाॅं भारत के समाज में पवित्रता लाने में अपना योगदान नहीं दे सकती उन्हें देवी कैसे माना जा सकता है। वो तो मानव रूप् में साक्षात् सूर्पनखा हैं। राक्षस हैं व कुल व संस्कृति की कब्र खोदने पर उतारू हैं। विज्ञान के दुरुप्रयोग से हवा पानी प्रदूषित हो गए किसानो द्वारा फसलों, अनाजों, में विषाक्त तत्वों की वृशी कर दी गयी| हे देवी! तुमसे देवसत्ताओं को बहुत आशाएं थी की तुम अपने देवत्व से इन विषों का निवारण करोगी परन्तु तुमने भी अज्ञान वश अपनी हरकतों से अश्लीलता का विष समाज में घोलना प्रारंभ कर दिया| जो रही सही कसर भी वो तुमने पूरी कर डाली| चेतो! हे देवी! चेतो! वासना के आवेश में यदि तुम भी औरों के समान संवेदनहीन हो जाओगी तो भारत माता के आंसू कौन पोंछेगा| देव संस्कृति को बचने वाली शक्ति, भक्ति, पवित्रता, दिव्यता की मूर्त! हे भारत की नारी अपने मूल सवरूप को पुनः धारण करो जिससे तरह तरह के विषों में जलते भारत के पुत्रों को राहत मिल सके व भारत विशव में जगतगुरु बन सके| रक्षक ही अगर भक्षक बन जाएगा तो इस धरा का सर्वनाश हो जायेगा| अत: हे मातरी शक्ति ! करुणा, पवित्रता, उदारता की धाराएं मेरे भारत में बहा दो जिससे स्वार्थ, वासना, महत्वकांक्षा व रोगों से त्रस्त मेरे देशवासिओं के दुःख दूर हो सकें, मेरा आपसे यही निवेदन हैं| 


देवत्व  के फूलों से, धरती को सुगन्धित कर दो। 
करुणा की मूर्ति हो, अमृत से सिंचित कर दो। 
वासनाओ की होली जला, फिर से पवित्रता वरसा दो। 
तुम  हो गुणो की खान, मेरे भारत को स्वर्ग बना दो। 
शक्ति का हो अवतार, सिंह की हुंकार कर दो। 
विकारों से ग्रस्त मानवता, बुराइयों का दमन कर दो।  

युग ऋषि का जीवन संघर्ष और हमारी भूमिका

                युग निर्माण योजना के महान अभियान को पूरा करने के लि युग-ऋषि श्रीराम ‘आचार्य’ जी द्वारा बड़े यत्न पूर्वक गायत्री परिवार की स्थापना की गई थी। गायत्री परिवार का विराट स्वरूप तो उभरा परन्तु आपेक्षित सफलता नहीं मिली। जो दावे हम सन् 2000 से पहले बड़े आत्मविश्वास के साथ करते थे वह सब आज देखने सुनने को नहीं मिलते। ऐसा किन कारणों से हुआ। इस विषय पर गायत्री परिवार को समर्पित परिजनों द्वारा व्यापक विचार मंथन आवश्यक है।
            युग निर्माण योजना की पूर्ति हेतु हमें आत्म निर्माण व लोककल्याण दो पक्षों को साथ लेकर चलना है परन्तु हम मात्र भवन निर्माण कर प्रसन्न हो गए। सन् 2000 से पूर्व हमें मिशन के प्रचार प्रसार की आवश्यकता थी इसके लिए बड़े पैमाने पर समयदान, अंशदान माॅंगा गया। तत्पश्चात् हमें सवा लाख लोगों का चयन कर उन्हें अनुकूल वातावरण देकर युग के विश्वामित्रों के रूप् में उभारना था। वह कार्य हमारा अधूरा रह गया। अनेक स्वार्थी, महत्वाकांक्षी, अहंकारी व्यक्तित्व मौका पाकर मिशन पर हावी होते चले गए व शक्तिपीठों व गोष्ठियों में बहुत तरह का वाद-विवाद बढ़ चला। आम जनता को गायत्री परिवार से बहुत आशाएॅं अपेक्षाएॅं रखती थी उनकी उम्मीदों पर हम खरे नहीं उतर पाए।

             जो परिजन मिशन की गौरव गरिमा को पुनः ऊपर उठाने के लिए कृत संकल्प हैं, युग निर्माण योजना के लिए अपने जीवन की आहुति समर्पित करना चाहते हैं वो यह पुस्तक अवश्य पढ़ें। उनके लिए ये पुस्तक एक प्रकाश स्तम्भ का कार्य कर रही है। गायत्री परिवार की रीति-नीति, अभियान के स्वरूप का व्यापक विश्लेषण किया गया है। यह पुस्तक गायत्री परिजनों की आवाज के रूप् में उभरेगी व रूके हुए कार्य को गति प्रदान कर देवात्मा हिमालय के संकल्प को पूर्ण करेगी यही हमारा विश्वास है।

Monday, April 6, 2015

Myths of Today (आज के युग की भ्रान्तियाॅं)

1. व्यक्ति के दुःख का मूल कारण मात्र उसके दुर्गुण हैं। जबकि व्यक्ति पूरी उम्र यह सोचता रहता है कि वह अमुक व्यक्ति अथवा अमुक कारण से परेशान हुआ। वास्तविकता यह है कि स्वयं की कमजोरी ही दुःखों का मूल कारण है।
2. युग निर्माण आन्दोलन को तेजी प्रदान करने के लिए हमें बड़ी संख्या में प्रचारक चाहिए। (X) यह उक्ति अब निरर्थक प्रतीत होती होने लगी है। सतयुगी वातावरण के धरती पर निर्मित करने के लिए हमें आत्म-निर्माणी, आत्मदानी चाहिएॅं। प्रचारकों की आवश्यकता मात्र सन् 2000 तक थी। गुरुदेव ने इसी कारण 2000 तक ही लोगों से समयदान की माॅंग की थी। क्योंकि आत्मनिर्माण जिनका होने लगता है उनसे समयदान नहीं माॅंगा जाता वो स्वयं समय दान स्वेच्छा से करते हैं। अपितु उनके जीवन का ध्येय ही मिशन होने लगता है। गुरुदेव ने अनेक संकेत देकर हमें यह बात समझाने का प्रयास किया है परन्तु हमारे जहन में प्रचार - प्रचार इतनी गहराई तक चला गया है कि आगे कुछ समझ में नहीं आता है। शताब्दी समारोह की विफलता का संकेत भी यही था कि व्यापक प्रचार अभियान पर रोक लगाकर आत्मनिर्माण की दिशा में सार्थक प्रयास करने प्रारम्भ किए जाएॅं।
3. भगवान की खुशी के लिए हमें पूजा पाठ करनी चाहिए (X)। भगवान उन व्यक्तियों से प्रसन्न होता हैं अथवा उन पर कृपा करते हैं जो सद्गुणों को धारण करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। आरती, चालीसा, पाठ भी इसीलिए करते हैं ताकि देवताओं के महान गुणों को हम धारण करने लगें। परन्तु यदि यह मात्र गान तक सीमित रहे हमारे चरित्र का विकास न कर पाए तो इसका उचित लाभ नहीं मिल पाता। अतः सदैव श्रेष्ठ गुणों व शुद्ध
भावना के विकास के लिए प्रयत्नशील रहें।
4. स्वस्थ भारत के निर्माण के लिए हमें ।प्डै जैसे बड़े अस्पतालों की आवश्यकता है (X)। बड़े चिकित्सालयों के द्वारा हम भारत को रोग मुक्त नहीं बना सकते। इसके लिए सप्तधातुओं की पुष्टि का आयुर्वेद का विज्ञान समझना अनिवार्य है। समय साक्षी है कि आज से 25 वर्ष पूर्व कितनी डमकपबंस सुविधाएॅं थी परन्तु रोग बहुत कम थे। आज कितनी अधिक चिकित्सा सुविधाएॅं हैं परन्तु घर-घर में लोग रोग से पीडि़त हैं। इसके लिए पढ़े लेखक की अगली प्रकाशित होने वाली पुस्तक ‘स्वस्थ भारत’।
5. सुख समृ(ि के लिए हमें विज्ञान की उन्नति करनी होगी (X)। विश्व में सुख, शान्ति, समृ(ि लाने के लिए हमें अध्यात्म एवं विज्ञान दोनों के समन्वय व सन्तुलन की आवश्यकता है। मात्र एक पक्ष विज्ञान पर जोर देने से धरती खुशहाल नहीं हो पाएगी। सुखी वही लोग हैं जो अपने जीवन में अध्यात्म एवं विज्ञान दोनों को समान रूप् से महत्व देकर चलते हैं। अध्यात्म को पीछे छोड़ने पर दुनिया में सद्गुणी व सेवा भावी व्यक्ति उत्पन्न नहीं हो पाएगा। इससे विज्ञान विकास के स्थान पर विनाश ही करेगा। विज्ञान के साथ यदि अध्यात्म न जुड़े तो अहंकारी व्यक्तित्वों के द्वारा युद्धों, आतंकवाद आदि के खतरे बढ़ते चले जाएॅंगे।
6. भारत के विकास के लिए बड़े शिक्षा संस्थानों को खोला जा रहा है इसकी बहुत आवश्यकता है (X)।
            भारत का विकास तब तक नहीं होगा जब तक यहाॅं का धर्म तन्त्र व राजतन्त्र साफ-सुथरा व आदर्शवादी नहीं होगा। भारत में धर्मतन्त्र व राजतन्त्र दोनों ही जातिवाद, परिवारवाद, क्षेत्रवाद तथा भ्रष्टाचार से ग्रसित हैं। इसके लिए भारत की जनता दोषी है। जो भी धर्मतन्त्र व राजतन्त्र में लोग उच्च पदों पर आसीन हैं। उनके जयकारे लगाना, उनकी चापलूसियाॅं करना व उनसे निहित स्वार्थों की पूर्ति करना, यह यहाॅं के लोगों के खून में बस गया है। इसी कारण भारत के राजनेता व धर्मनेता मूल समस्याओं की ओर जनता को जागरूक न कर इधर-उधर की चीजों में लोगों का ध्यान भटकाते रहते हैं। यदि भारत की जनता इनसे प्रश्न पूछे?
            बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए धर्मतन्त्र, राजतन्त्र सामाजिक संस्थाएॅं कोई बड़ी मुहिम क्यों नहीं चलाती? बढ़ती जनसंख्या हमें पर्यावरण असन्तुलन, बेरोजगारी, गन्दगी, चोरी चकारी, भ्रष्टाचारी, भीड़-भाड़ वाले जीवन की ओर धकेल रही हैं। सभी समस्याओं का मूल है यह सभी जानते है इसके उपरान्त भी सभी चुप हैं? क्यों?
            समाज में बढ़ती अश्लीलता भारत की संस्कृति व सभ्यता पर सबसे बड़ा कलंक है परन्तु इसका विरोध करने का कोई अच्छा प्रयास नहीं हो रहा है क्यों? हम सभी मौन हैं, लाचार हैं?
            जब शेर, चीते हम पर आक्रमण कर रहे हों तो कुत्ते, बिल्लियों से लड़कर अपने को सामथ्र्यवान सिद्ध करना कहाॅं की समझदारी है। बड़ी विकट समस्याएॅं समाज के सम्मुख हैं परन्तु धर्मतन्त्र व राजतन्त्र उन पर चुप रहता है व छोटे-छोटे कर्म कर अपनी डींगें हाॅंकता है।
7. दरिद्र वह है जिसके पास पेट भर खाने को भोजन भी उपलब्ध न होता हो (X)। दरिद्र तो वास्तव में वह है जिसके पास भोजन तो है पर भूख नहीं है। धन तो है पर नींद नहीं है।
8. हे भगवान! हम सबको दीर्धायु प्रदान करें। भगवान से सदा उच्च जीवन लक्ष्य की प्रार्थना करें। जिसके जीवन का लक्ष्य ऊॅंचा होता है उसी का जीवन सार्थक होता है। निरर्थक जीवन चाहे छोटा हो या बड़ा उसका कोई लाभ नहीं होता अतः जीवन सदा उद्देश्य परक ही रहना चाहिए।
9. अमुक व्यक्ति के पास बहुत धन, गाड़ी, बंगला, सामाजिक पद-प्रतिष्ठा बहुत कुछ है वह बहुत सुखी है (X)। सुखी केवल वही रह सकता है जो आत्म साक्षात्कार के लिए प्रयत्नशील हैं। ऐसे व्यक्ति को श्रीमद् भगवद्गीता निम्न प्रकार परिभाषित करती है
 निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। द्वन्द्वैर्विमुक्ता सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्।।
जो झूठी प्रतिष्ठा, मोह तथा कुसंगति से मुक्त हैं, जो शाश्वत तत्व को समझते हैं, जिन्होंने भौतिक काम को नष्ट कर दिया है, जो सुख तथा दुख के द्वन्द्व से मुक्त हैं और जो मोहरहित होकर परम पुरुष के शरणगत होना जानते हैं, वे उस शाश्वत राज्य को प्राप्त होते हैं।

10. गीता का सन्देश है कर्म किए जा, फल की इच्छा न कर (X)।
            गीता का मुख्य सन्देश है कि मानवता व धर्म की स्थापना के लिए जो लोग युद्ध स्तर का प्रयास करते हैं स्वयं भगवान उनके जीवन का रथ हाॅंकने के लिए तत्पर हो जाते हैं। गीता वास्तव में विद्वानों का विषय नहीं है। जो आत्माएॅं अपने जीवन की आहुति देने के लिए संकल्पबद्ध होती हैं गीता उन्हीं के भीतर अवतरित होती है व उन्हीं को वास्तव में समझ आती है अन्य तो शब्दजाल में ही उलझे रहते हैं।       


सत्संकल्प व हमारा जीवन

            गायत्री परिवार के व्यक्ति बहुत समय से सत्संकल्प पाठ करते आ रहे हैं। समय आ गया है जब हम यह देंखे कि यह सत्संकल्प हमारे जीवन में उतर पाया है या नहीं। इसी का विवेचन यहाॅं पर किया गया है। लेखक समय-समय पर अनेक कड़वे-मीठे अनुभवों से गुजरता रहा है। एक बार एक वरिष्ठ प्रोफेसर ने गायत्री परिवार पर व्यंग्य करते हुए कहा ये लोग सिर्फ नारे लगाते हैं, माला घुमाते हैं परन्तु जहाॅं दस लोग एकत्र होते हैं वहाॅं आपस में खींचतान व मनमुटाव प्रारम्भ हो जाता है। समाज के सामने अपने आचरण व चरित्र के माध्यम से एक ऊॅंचा आदर्श प्रस्तुत करने के लिए सत्संकल्प एक बहुमूल्य औषधि गुरुवर देकर गए हैं। आवश्यकता है कि मात्र इनका पाठ ही न हो अपितु जीवन में इनको उतारा भी जाए। एक-एक संकल्प पर विचार किया जाए कि हमारे जीवन में यह कितना आत्मसात हो पाया है। जहाॅं कमी नजर आए उसे और अधिक दृढ़ता से लागू किया जाए। अन्यथा क्या होगा वही जो कुछ पक्षियों का हुआ था। एक बार कुछ पक्षी महात्मा जी के पास अपनी व्यथा रोने गए कि शिकारी हमें पकड़ लेता है व बहुत कष्ट देता है। महात्मा जी ने कहा कि यह बात याद करो- शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा हम नहीं फसेंगे। परन्तु एक बार जब महात्मा जी घूमने निकले तो देखा कि पक्षी शिकारी के जाल में फंसे वही सूत्र दोहरा रहे हैं तो महात्मा जी की समझ आया सूत्र तो याद किया पर उस पर चले नहीं। किसी ने सत्य कहा है-
            "केवल दीपक की बात करने से तो अंधेरा नहीं मिट जाएगा।
            अंधेरा मिटाने के लिए तो दीपक जलाना ही पड़ेगा।।"
    1. क्या हम ईश्वर को सर्वव्यापी मानते हैं यदि मानते हैं तो फिर डर किस बात का? वह हर पल हर क्षण हमारे साथ है हमारी सहायता के लिए हमें शक्ति, साहस, प्रेम व दिव्य गुण प्रदान करने के लिए। कभी भी किसी भी स्थिति में हम उससे वह प्राप्त कर सकते हैं जिसकी हमें आवश्यकता है व अपने व्यक्तित्व को ऊॅंचा उठा सकते हैं।
        क्या हम ईश्वर को न्यायकारी मानते हैं? हम अक्सर छोटी-छोटी बातों व छोटी मानसिकता में ही उलझकर एक-दूसरे से बदला लेने, छींटाकशी, नीच दिखाने में पूरा जीवन व्यर्थ गंवा देते हैं। यदि ईश्वर न्यायकारी है तो हमारे साथ न्याय अवश्य होगा अतः दूसरे के आचरण को न देख अपना चरित्र व आचरण सही रखा जाए तथा ईश्वरीय अनुशासन व मर्यादाओं का सदा पालन किया जाए।
     2. क्या हम संयमी व नियमित जीवनचर्या का पालन करते हैं? आत्म संयम अर्थात् स्वयं स्वेच्छा से संयम का पालन करना किसी के दबाव से नहीं अपितु स्वप्रेरित होकर संयमित जीवन जीना। क्या हमारी दिनचर्या में नियमितता है क्या हम समय पर उठते, जागते, खाते व सोते हैं। सप्ताह में एक बार अस्वाद व्रत करते हैं नियमित व्यायाम करते हैं? ब्रह्मचर्य का उचित पालन करते हैं।
     3. स्वाध्याय व सत्संग में क्या अन्तर है। स्वाध्याय से अर्थ है अच्छी पुस्तकों का अध्ययन व अपना आत्म विश्लेषण।
          सत्संग का अर्थ है ऐसे लोगों का संग जो सत्य से अर्थात् दिव्य चेतना से जुड़े हैं। उच्च चेतना से जुड़े लोगों के सम्पर्क में आने से ही चेतना का स्वतः आरोहण होना प्रारम्भ हो जाता है। पहले लोग आचार्य वर्ग के प्रति बहुत श्रद्धा रखते थे। इससे अपने आचार्य व अनुचर ;शिष्यद्ध दोनों की बहुत उन्नति होती थी। यदि व्यक्ति आचार्य को श्रद्धा प्रदान करेंगे तो आचार्य की स्वतः कुण्डलिनी जाग्रत होग व उस उच्च चेतना का लाभ सबको मिलेगा। श्री रामड्डष्ण परमहंस जब भी अपनी एक महिला शिष्या गोपाल की माॅं के सम्पर्क में आते थे भाव समाधि में चले जाते थे।
         यदि उचित आचार्य नहीं मिलते तो इस कमी की पूर्ति महापुरुषों की फोटो से भी होती है। अपने ड्राइंग रूम में अच्छी - अच्छी फोटो लगाएॅं जिससे मन में उच्च भाव व उच्च विचार सदा प्रवेश करते रहें। उच्च विचारों के लिए स्वाध्याय तथा उच्च भावों को ग्रहण करने के लिए सत्संग अनिवार्य है। आज से 100 वर्ष पूर्व ज्ञान का इतना प्रचार नहीं था। लोगों को उच्च विचार देने वालों की कमी थी परन्तु उच्च भाव बहुत था। हमने उस बल पर देश को आजाद करा लिया।
          परन्तु आज विचार बहुत है जगह-जगह कथावाचक, वक्ता लोगोंको श्रेष्ठ विचार दे रहे हैं परन्तु उच्च भाव की सर्वत्र कमी है। ऐसे चरित्र बहुत कम हैं तो उच्च भावों से परिपूर्ण रहते हैं।
            किसी ने सत्य ही कहा है-
           "जाग रे कबीरा जाग
            तन के उजले, मन के काले
            हंस बने बैठे हैं होकर विषधर नाग।"
         बहुत - बहुत बड़ी- बड़ी संस्थाएॅं हैं। बहुत बड़े-बड़े ज्ञानी पुरुष हैं। बड़े-बड़े गीता ज्ञानी हैं, पदाधिकारी हैं, परन्तु हो सकता है कि एक छोटा सा किसान उनसे अधिक ईश्वर को समर्पित हो, उनसे अधिक सरल हो व उच्च भाव से पूर्ण हो। क्या लाभ है उन बड़े पदों का उन सम्मानों का जो व्यक्ति की सरलता व सहजता ही खो दे।
      5. व्यक्ति स्वार्थी न हो जाए जो छोटा सा जीवन भगवान ने दिया है उसमें संकीर्णता कैसी? सदा अपनी पद-प्रतिष्ठा, अहं के बारे में ही न सोचा जाए अपितु दूसरों को भी अवसर प्रदान करें। विभिन्न मन्दिरों, आश्रमों में दो तीन ग्रुपस ;ळतवनचेद्ध बने होते हैं व अपने - अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए लड़ते हैं। यदि दो-दो वर्ष के लिए सभी को अवसर दे दिया जाए तो मनमुटाव समाप्त हो जाएगा। नहीं हम स्वयं को समाज का एक अंग कहाॅं मानते हैं। हम तो केवल अपना ही अपना राज चलाना चाहते हैं। परिवार में एक साल खर्चा पत्नी के हिसाब से चले एक साल पति की राय से । शरीर का प्रत्येक अंग अपना काम सुचारू रूप् से करते हुए दूसरे अंगों का पोषण करता है। परन्तु हमें थोड़े से अधिकार मिल जाएॅं तो हम दूसरों को दबाने का प्रयास व उनके शोषण के लिए तैयार रहते हैं।
          हर स्तर पर यह प्रयास हो व्यक्ति जहाॅं रहता है अपना विकास करते हुए दूसरों को पोषण दे। एक समूह दूसरे समूह का भी आदर करना सीखें। सभी समाज के अभिन्न अंग हैं व एक - दूसरे के विकास में भी हम सभी की उन्नति है यदि मुख यह सोचे कि मैं क्यों भोजन चबाने में इतनी मेहनत करूॅं मुझे क्या मिलना है, जाना तो पेट में है! यदि हृदय सोचे कि मैं साठ हजार मील रक्त प्रवाह का कार्य क्यों करूॅं, इतनी मेहनत मुझसे नहीं होगी। कैसे शरीर का विकास हो पाएगा!
       6. एक व्यक्ति के पास बेईमानी से कमाया दस लाख रुपया है वह आता है किसी संस्था को 2000 रुपये दे जाता है व चारों ओर उसकी जय जयकार होती है परन्तु एक व्यक्ति के पास ईमानदारी से अर्जित दस हजार रुपये हैं उसमें से वह एक हजार रुपया समाज में सत्प्रवृतियों के लिए लगाता है कौन अधिक श्रेष्ठ हुआ?
           समाज में उसी का मूल्याॅंकन अधिक हो रहा है जिसके पास अधिक धन है,  बड़ा पद है अधिक योग्यता है। इस परिपाटी को बदलना होगा। ऐसे व्यक्तियों का मूल्य अधिक है जिन्होंने आदर्शों व सिद्धांतों के लिए अपना जीवन अर्पित किया भले ही वो धनवान न हों, प्रतिभावान न हों।
          बड़ी कड़वी सच्चाई है, समाज को धन से प्यार है। सच्चे इंसान से नहीं। कब यह सिलसिला रूकेगा? धन से क्यों प्यार है बड़ा आश्रम बनाना है बड़ी संस्था चलानी है। उन बड़ी संस्थाओं व आश्रमों का क्या लाभ जहाॅं मात्र धनवानों की ही पूछ हो, आस्थावानों को किनारे कर दिया जाए! सिद्धान्तों की दुहाई देने वाले, आदर्शों की बड़ी-बड़ी बात करने वाले ही जब अमीरों को देख अपनी लार टपका दे इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी?
          हम पूज्य गुरुदेव से सीखें जिन्होंने बिड़ला जी को लौटा दिया क्यों? ताकि संस्था में अमीरों व महत्वाकांक्षी लोगों का वर्चस्व स्थापित न हो जाए। ठीक है हम थोड़े में गुजारा कर लेंगे संस्था  छोटी बना लेंगे लेकिन आए वही जो आदर्शों, सिद्धान्तों व संस्कृति के लिए तड़फ रखते हों। हम गुरु नानक देव से सीखें जिन्होंने गरीब के घर भोजन किया क्योंकि वह परिश्रम की कमाई थी। मनुष्य के मूल्याॅंकन की कसौटी पर व्यक्ति के सद्विचारों व सत्कर्मों से करेंगे।
           कम से कम हम गायत्री परिवार के लोग तो अपनी मानकिता को बदलें। अमीरों व बड़े पद वालों के साथ-साथ अपने छोटे-छोटे खून-पसीना बहाने वाले कार्यकर्ताओं का भी उचित ध्यान रखें। गुरुदेव चाहते थे कि समाज में आध्यात्मिक साम्यवाद आए। उन्होंने एक स्थान पर घोषणा की थी कि आज से अमुक वर्षों के पश्चात् किसी के पास भी निजी धन नहीं रहेगा।
          जब तक मनुष्य के मूल्याॅंकन की कसौटी को नहीं बदला जाएगा तब तक एकता, समता, शुचिता की कैसे स्थापना होगी। दो ही परम्पराएॅं चलती रहेगी - चापलूसी परम्परा व अमीर परम्परा। लोग पदाधिकारियों व अमीरों के पास जाकर उनकी महिमा का गुणगान करते रहेंगे - "जा पर कृपा तुम्हारी होई। ता पर कृपा करे सब कोई।"
          परम्परा कैसे उभर पाएगी यह एक विचारणीय प्रश्न है। मनुष्य की मूल्याॅंकन की कसौटी सर्वत्र पद, प्रतिष्ठा व पैसा ही बने हुए हैं यह रूझान जब बदलेगा तभी एकता, समता व शुचिता आएगी।
       दुसरो के साथ वह व्यवहार नहीं करेंगे जो हमें अपने लिए पसंद नहीं। हम देखते है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए दुसरो से सहानभूति व अच्छे व्यवहार की आशा करता है परन्तु दूसरे व्यक्ति द्वारा एक गलती होने पर उसे गलत ठहराने लगता है व उसकी कमियों का गुणगान करने लगता है। हम कह सकते है कि हम अपनी गलती पर अच्छे वकील होते है और दूसरों की गलती पर अच्छे न्यायधीश होते हैं। 

 नर-नारी परस्पर पवित्र दृष्टी रखेंगे:-
भारत की नारी अपनी सात्विकता, दिव्यता, पवित्रता, सौंदर्य एंव गुणवत्ता की दृष्टी से विश्व विख्यात रही है। परन्तु पश्चिम के आधुनिकरण से एंव मिडिया के प्रभाव से उसके इन गुणों में बहुत तेजी से परिवर्तन हो रहा हैं। जिस कारण समाज में चारो और गंदगी व कामुकता तेजी से बढ़ रही है। गुरुदेव कहा करते थे यदि किसी नारी को देखकर हमारे भीतर गायत्री माँ की याद आ जाये तो मनुष्य शक्ति का भंडार बन सकता है परन्तु आज के इस विषम वातावरण में यह कैसे सम्भव है।  इसके लिए युवाओं को जागरूक होना होगा। अपनी वेशभूषा को शालीन रखना होगा व अश्लीलता बढ़ाने वाले जो भी तत्व समाज में घुस आएं हैं उनका विरोध करना होगा।

 संसार में सत्व्रतियों के प्रचार-प्रसार :-
इसके लिए व्यक्ति को साहसी बनना होगा। जो भी दुष्प्रवतियाँ समाज में प्रचलित है उनके लिए लोगों को जागरूक करना होगा। समाज मानसिकता के लोगों को एकत्र कर संगठित कर उन दुष्प्रवतियों के विरुद्ध सत्यग्रह करना होगा। पहले असभय व कम पढ़े-लिखे व समाज में गलत आदते अधिक पाई जाती थी परन्तु आ तो सभ्य एंव पढ़ा-लिखा समाज भी इसका शिकार है। उद्धरण: के लिए खर्चीली शादियां, फैशन परस्ती। धन का दुरूपयोग एंव समाज में व्याप्त भरष्टचार के लिए सभ्य समाज ही मुख्यता दोषी है। 

परम्परों की तुलना में विवेक: 
 आज भी घरो में ऐसी बहुत सी परम्पराएँ चलती है। जिनका लाभ हमें नहीं पता परन्तु हम जबरदस्ती उनको ढो रहे हैं इनको बंद कर देने में भलाई है।

Friday, April 3, 2015

हृदय रोग - कारण व निवारण

           भारत में हृदय रोगियों की सॅंख्या तेजी से बढ़ रही है। सन् 1960 में 60 वर्ष से ऊपर ही हार्ट अटैक आता था। सन् 1990 में यह आयु घटकर 40 वर्ष आ गई। सन् 2000 में 30 वर्ष से ऊपर के व्यक्ति भी हृदय रोग से ग्रस्त हैं। आने वाले समय में ऐसा अनुमान है कि लगभग 20-25 वर्ष के युवा को भी हार्ट अटैक हो सकता है।
            यदि हम जीवन में छोटी-छोटी सावधानियाॅं रखें तो हम हृदय रोगों की चपेट से बच सकते हैं। वैसे तो मेरे भारत मेें लोगों के पास ज्ञान बहुत है बहुत सारी दवाईयाॅं व काम की बातें लोग बताते हैं परन्तु इसके उपरान्त भी हमारे यहाॅं समस्याएॅं विकराल रूप् धारण करती चली जा रही हैं। इसका कारण है उचित ज्ञान व उसको जीवन में उतारने का अभाव। यहाॅं कुछ इस प्रकार तर्क सम्मत समझाया जा रहा है कि हृदय रोगों के कारण जानने व उनसे छुटकारा पाने में बहुत लाभ व्यक्ति को मिलेगा। इसके लिए आवश्यक मनन करने योग्य बिन्दु निम्न हैं।

  1.   एक स्वस्थ व्यक्ति का दिल प्रति मिनट 72 बार धड़कता है अर्थात् इतनी बार फेलता व सिकुड़ता है। एक धड़कन का अर्थ है कि एक बार सिकुड़ना व एक बार फैलना। एक धड़कन में लगा समय = 60/72 = .85 Second इस .85 Second में हृदय .35 Second काम करता है व .5 Second आराम करता है। चिकित्सकों के अनुसार धड़कन 60 से 90 तक हो सकती है। यदि 90 से ऊपर जाती है तो इस रोग को टैकीकार्डिया (Techycardia) कहते हैं और यदि धड़कन 60 से कम होती है तो इसे ब्रेडीकार्डिया (Breadycardia) कहते हैं। जैसे जैसे व्यक्ति के दिल की धड़कन बढ़ती है, प्रति धड़कन समय कम होता जाता है। उदाहरण के लिए यदि प्रति मिनट धड़कन 100 हो जाती है तो प्रति धड़कन समय 60/100 = .6 Second इसमें .35 Second हृदय कार्य करेगा व .25 Second ही हृदय आराम कर पाएगा। यदि आराम का समय कम कर दिया जाए तो व्यक्ति पर बोझ बढ़ जाता है ऐसे ही हृदय पर भी बोझ बढ़ने लगता है। यह हृदय के धड़कन कब बढ़ती है जब हम गुस्सा करते हैं, भयग्रस्त होते हैं, ईष्र्या द्वेष करते हैं, जल्दबाजी के आवेश में रहते हैं अथवा वासनाग्रस्त होते हैं। अतः हृदय के उत्तम स्वास्थ्य के लिए हमें इन दुर्गुणों से बचना होगा तथा शान्त व प्रसन्न रहना सीखना होगा।
  2.             हृदय को अपना कार्य करने के लिए करंट (Electric Pulse Signals) चाहिए व शुद्ध रक्त चाहिए। हृदय से नीला अशुद्ध रक्त फेफड़ों में जाता है व वहाॅं से शुद्ध होकर पुरे शरीर की सत्तर हजार बिलियन कोशिकाओं तक पहुॅंचाया जाता है। जो व्यक्ति गहरी सायं नहीं लेते उनका रक्त शुद्ध नहीं हो पाता। क्योंकि रक्त का अधिकतर शोधन फेफड़ों के निचले हिस्सों से होता है अतः वहाॅं तक वायु का संचार आवश्यक है। मानसिक रूप् से अशान्त व्यक्ति जल्दी-जल्दी साॅंस भरता है व उथली साॅंस लेता है। अतः गहरी साॅंस लेने का अभ्यास करें।
  3.             मानसिक उत्तेजना से हृदय को जो स्नायु तन्त्र (Nervous) करंट भेजती हैं उसमें Disturbance आ जाती है। जैसे यदि Electric Signals में Fluctuations होने लगे तो बल्ब पंखें आदि मशीनों के जलने का खतरा बढ़ जाता है वैसे ही हृदय की विकृति का खतरा बढ़ जाता है। यह तो अच्छा है कि भगवान ने शरीर में Auto-Healing का System बना रखा है जिससे टूट-फूट स्वतः भरती हैं। परन्तु यदि आवेश उत्तेजना अथवा कोई मनोविकार व्यक्ति पर हावी होने लगे तो यह खतरनाक हो सकता है।
  4.             अगला महत्वपूर्ण बिन्दू है कोलेस्ट्राॅल के सम्बन्ध में। कोलेस्ट्राॅल रक्त में एक बहुत ही आवश्यक तत्व है जो अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियों (Endocrine Glands) के हारमोन्स के निर्माण में काम आता है। यह तो एक प्रकार का Raw Material है जो प्रत्येक Cells तक पहुॅंचाना अनिवार्य है। रक्त में तीन-चार प्रकार के कोलेस्ट्राॅल होते हैं
1. High Density (HDL/Good Cholesterol / High density Lipoproteins )  
2. Low Density (LDL/ Bad Cholesterol/ Low density Lipoproteins)
                    The function of LDL is to deliver cholesterol to cells, where it is used in membranes,
3. Tri glyceroids   etc.
           इसमें HDL की मात्रा 40-45 से अधिक व LDL की मात्रा 100 से कम होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त इनका अनुपात LDL/HDL <= 3 होना चाहिए। ट्राई ग्लिसारायड 140 से नीचे होने चाहिए। LDL जंक फूड से तला पूरी, पराठा, पापड़ आदि से आता है व HDL अनाजों, फलों, सब्जियों से आता है। इसके अतिरिक्त कोलेस्ट्राॅल के निर्माण में लीवर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि हमारा व्यक्तित्व व दृष्टिकोण सकारात्मक रहता है तो HDL का निर्माण अधिक होता है और यदि हम गलत व घटिया कोष में संलग्न होते हैं तो LDL का निर्माण अधिक होता है। अतः हमारे कर्मों, विचारों, भोग अर्थात् व्यक्तित्व का सीधा प्रभाव हमारे हृदय पर पड़ता है। क्योंकि यदि LDL बढ़ जाए तो यह शीघ्र ही हृदय की धमनियों में जमने लगता है व blocks आने लगते हैं। इन blocks को हटाना दुष्कर कार्य हैं। लोकी का रस, अर्जुन चूर्ण आदि अनेक उपायों को लम्बे समय तक अपनाने पर भी उचित परिणाम नहीं निकल पाते। परन्तु यदि HDL बढ़ जाए तो यह स्वतः ही Blocks को तोड़ने में सहायक होता है
Excess cholesterol is eliminated from the body via the liver, which secretes cholesterol in bile or converts it to bile salts. The liver removes LDL and other lipoproteins from the circulation. HDL (or really, the HDL precursor) is synthesized and secreted by the liver and small intestine. It travels in the circulation where it gathers cholesterol to form mature HDL, which then returns the cholesterol to the liver via various pathways.
5.  आयुर्वेदिक दवाओं में अर्जुन चूर्ण अथवा खमीरों का प्रयोग हृदय के लिए श्रेष्ठ माने गए हैं। इसका विस्तारपूर्वक बाद में वर्णन किया जाएगा।
   6.    हृदय में तीन मुख्य धमनियाॅं होती हैं यदि एक या दो धमनी में 50% Blocks आ जाए तो भी व्यक्ति का कार्य सुचारू रूप् से चलता रहता है। समस्या तब होती है जब क्रोध, भय अथवा अन्य Negative Emotions के समय धमनियाॅं सिकुड़ जाती हैं तो रक्त दबाव बढ़ने से धमनियों का फ्रेक्चर होकर Clotting शुरू हो जाती है। Angioplasty Test के द्वारा ही यह पता चल पाता है कि कितनी blocks है व कितनी clotting हुई है। अतः अवश्यक्ता इस बात की है कि व्यक्ति शान्त मन, सात्विक भोजन व Positive Emotions को Develop करने को प्रयास करें जिसमें उसका हृदय स्वस्थ रहे।
          7.     हृदय की माॅंसपेशियों को बल देने के लिए प्रतिदिन घूमना व व्यायाम आवश्यक है। जितना व्यक्ति शारीरिक श्रम करता है उतना स्वस्थ रहता है।
  8.   यदि व्यक्ति के हृदय में blockage आया है तो सीढ़ी चढ़ने अथवा अन्य श्रम वाले कार्यों से छाती में दर्द होना प्रारम्भ होता है इसको एन्जाइना पेन कहते हैं। जिसके निवारण के लिए blockage वाली जगह पर स्टंट डालते हैं इस प्रक्रिया को angioplasty कहते हैं।

9.    हृदय के अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्यक्ति उदार हो, श्रमशील हो, क्षमा धैर्य जैसे गुणों को धारण करने वाला हो व ब्रह्मचर्य को अधिक से अधिक पालन करें।
Niacin (Nicotinic Acid)
You may know of niacin as an essential nutrient of the vitamin B complex. At high doses (much higher than required for its role as a vitamin), niacin increases HDL levels and decreases triglyceride and LDL levels. The mechanism of action of niacin is not fully defined, but it appears to inhibit an enzyme in the liver that is involved in triacylglycerol synthesis, causing a decrease in VLDL production.  Another effect in the liver is to prolong the half-life of HDL particles by preventing HDL breakdown.  



            हृदय रोग के कारणों पर यदि विचार किया जाए तो आहार-विहार से अधिक मानसिक स्थिति जिम्मेदार है। लेखक द्वारा दो ऐसे व्यक्तियों का जिक्र यहाॅं पर बहुत स्टीक बैठता है। एक व्यक्ति प्रतिदिन शराब पीता है खान-पान में संयम भी नहीं करता। वजन 90KG से भी ऊपर है पर्याप्त मोटा है परन्तु प्रसन्न रहता है व दूसरों को भी प्रसन्न रखता है उसका LDL/HDL ratio जाॅंच के दौरान सदैव सही पाया जाता है। दूसरा व्यक्ति धार्मिक स्वभाव का है खान-पान, नियम-संयम, जप-तप सभी कुछ करता है, सात्विक जीवन जीता है परन्तु प्रारब्ध वश उसके जीवन में संघर्ष व विपरीत परिस्थितियों द्वारा मानसिक अशान्ति आती रहती है उसका LDL/HDL ratio कई बार बिगड़ जाता है। इस प्रकार यह निर्णय निकलता है कि व्यक्ति को लम्बा जीवन जीने के लिए व हृदय के अच्छे स्वास्थ्य के लिए मानसिक तनाव से सदा बचने का प्रयास करना चाहिए।

नेत्र ज्योति के लिये

बादाम                    = 105 दाने
फिदक                    = 105 दाने
छोटी इलायची        = 105 दाने
तवासीर                 = 30 माशे
चारो मगज            = 30 तोले
देशी खांड              = 1/4 किलो

बादाम गिरी 7 दाने व फिदक गिरी सात दाने रात को मिट्टी के बर्तन में भिगो दे| सवेरे छिलके उतारे और कुण्डी में डालें|
सात छोटी इलायची के बीज, दो माशे तवासीर, चारो मगज दो तोले, इन सबको बारीक़ करके इनमे 1.1/2 चम्मच मक्खन मिला कर इनमे इच्छानुसार खांड मिलाकर चाट ले ऊपर से दूध पि ले|
सवेरे ख़ाली पेट ले व दूध के बाद एक घंटा कुछ न ले|

समय :- 15 May से 30 June (पूरी गर्मी में) 

Thursday, April 2, 2015

भगवान द्वारा भक्त की रक्षा

                                                            भगवान  द्वारा  भक्त  की  रक्षा

आज का विचार



दुनिया का हर शौंक पाला  नहीं  जाता ,
काँच  के खिलौनों  को उछाला  नहीं  जाता ,
मेहनत  करने से  मुश्किलें  हो  जाती हैं आसान ,
क्योंकि हर  काम     तकदीरों पर  टाला नहीं  जाता