Wednesday, July 15, 2015

स्वास्थ्य के शत सूत्र

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                   जिन नियमों को अपनाकर व्यक्ति स्वस्थ जीवन जी पाए उनकी जानकारी व वैज्ञानिक विवेचन नीचे दिया जा रहा है। अच्छा तैराक वह होता है जिसे नदी ष्ेऽ सभी भंवरों की जानकारी होती है न कि वह जो भंवर में फंस जाए। यह संसार भी एक भवसागर है जिसमें अनेक भंवर होते हैं। यदि एक बार व्यक्ति भंवर में फंस जाए तो निकलने में काफी कठिनाई होती है, प्राण जाने का भय भी रहता है। इसी प्रकार यदि व्यक्ति किसी गम्भीर रोग ष्ेऽ चंगुल में फंस जाए तो बहुत दर्द सहना पड़ता है व प्राण जाने का खतरा भी मंडराता रहता है। इसीलिए समझदारी इसी में है कि हम यथा सम्भव स्वास्थ्य ष्ेऽ स्वर्णिम सूत्रों का विस्तृत अध्ययन व पालन करने का प्रयास अवश्य करें। स्वास्थ्य के सूत्रों को पाठकों को अपनी प्रकृति के अनुसार ग्रहण करना चाहिए। स्वस्थ व्यक्ति के लिए सूत्र अलग हैं व रोगी के लिए अलग। उदाहरण के लिए शीतल जल में स्नान से बहुत लाभ होता है परन्तु यदि ज्वर पीडि़त व्यक्ति ठण्डे जल से नहा ले तो हानि भी हो सकती है। इसी प्रकार घी खाने से व्यक्ति हष्ट-पुष्ट बनता है परन्तु जिसका हाजमा कमजोर है वह यदि घी खा ले तो पेट दर्द अथवा दस्त से पीडि़त हो सकता है। अतः पाठकों से विनम्र निवेदन है कि विवेक का प्रयोग करते हुए अथवा किसी उत्तम वैद्य के परामर्श से साथ ही सूत्रों का लाभ उठाएॅं। ये सूत्र निम्नलिखित हैं।
1. भूख व भोजन
     अच्छे स्वास्थ्य ष्ेऽ लिए यह आवश्यक है कि उचित भूख लगने पर ही भोजन किया जाए। ऐसा क्यों करें? कारण यह है कि जो भोजन हम करते हैं उसका परिपाक आमाशय में होता है। यदि भूख ठीक न हो तो आमाशय ष्ेऽ द्वारा भोजन ठीक से नहीं पकता अथवा पचता। इस कारण भोजन से जो रस उत्पन्न होते हैं वो दूषित रहते हैं। ये रस व्यक्ति में रोग उत्पन्न करते हैं व स्वास्थ्य खराब करते हैं। इस समस्या ष्ेऽ आयुर्वेद में आमवात कहा जाता है। किसी ने सत्य ही कहा है-
   ”आम कर दे काम तमाम“
श्।ड। पे जीम जमतउ नेमक पद ।लनतअमकं वित मदकवजवगपदे. ज्ीम ष्।उंष् ंतम मदकवजवगपदे वितउमक पद जीम पदजमेजपदमे कनम जव ंिनसजल कपहमेजपवद. ज्ीम सवू कपहमेजपअम पितम समंके जव वितउंजपवद व िमितउमदजंजपवद पदेपकम जीम पदजमेजपदमे ंदक जींज पद जनतद बंद पदबतमंेम जीम वितउंजपवद व िचने ंदक उनबने. ज्ीम वितउंजपवद व िष्।उंष् पे पदबतमंेमक प िजीम विवक पे तपबी पद ंिेज विवकेए चंबांहमक विवकए इनतहमतेए चप्र्रंेए दवद.अमह कपमज ंदक वजीमत ीमंअल हतमंेल पजमउे.  ..;क्त. टपातंउ ब्ींनींदद्ध
यह आमवात ही सन्धिवात का मूल कारण होता है।
         परन्तु आज विडम्बना यह है कि व्यक्ति को खुलकर भूख लगना ही भूख लगना ही बंद हो गया है प्राष्ृऽतिक भूख व्यक्ति को लग नहीं पा रही है। बस दो या तीन समय भोजन सामने देख व्यक्ति भोजन कर डालता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति भूख से कम खाए। भोजन पेट की भूख से तीन चैथाई करें। एक चैथाई पेट खाली रखें। जब पेट भरने लगे अथवा डकार आ जाए तो भोजन करना बन्द कर दें। ठूस-ठूस कर खाने से शरीर भारी हो जाता है। भूख से अधिक खाने पर पाचन तन्त्र पर एक दबाव बनता है। पेट, आमाशय, आॅंतें मिलकर पाचन तन्त्र बनता है, इसमें फूलने सिकुड़ने की क्रिया होती रहती है, और उलट पुलट के जिए जगह की गुंजाईश रखे जाने की आवश्यकता पड़ती है। इस सारे विभाग में ठूॅंस-ठूॅंस कर भरा जाए और कसी हुई स्थिति में रखा जाए, तो स्वभावतः पाचन में बाधा पड़ेगी, अवयवों पर अनावश्यक दबाव-खिंचाव रहने से उनकी कार्यक्षमता में घटोतरी होती जाएगी। उन अंगों से पाचन के निमित्त जो रासायनिक स्त्राव होते हैं, उनकी मात्रा न्यून रहेगी और सदा हल्की-भारी कब्ज बनी रहेगी।
 आहार के सम्बन्ध में यह विशेष उल्लेखनीय है कि सच्ची एवं परिपक्व भूख लगने पर ही खाना खाएॅं। रुस के स्वास्थ्य विशेषज्ञ ब्लाडीमार कोरेचोवस्को का मत है - भूख से जितना अधिक खाते हैं, समझना चाहिए कि उतना ही विष खाते हैं।
            बच्चों ष्ेऽ लिए भोजन में कोई नियम नहीं रखने चाहिए। जब इच्छा हो खाएॅं। युवाओं ष्ेऽ पौष्टिक भोजन नियमानुसार करना चाहिए व प्रौढ़ भोजन सन्तुलित करें।
अपवाद ;म्गबमचजपवदेद्धः
 बहुत से व्यक्ति डायबिटिज व अन्य घातक रोगों ष्ेऽ चंगुल में फंस कर बहुत कमजोर हो गए हैं। ऐसे लोगों को यह सुझाव दिया जाता है कि हर दो तीन घण्टें में ष्ुऽछ न ष्ुऽछ खाते रहें अन्यथा बहुत दुर्बलता अथवा अम्लता ;।बपकपजलद्ध बनने लगेगी।
2. भोजन का समय
            दो समय भोजन काना अच्छा होता है। भोजन करने का सबसे अच्छा समय प्रातः 8 से 10 बजे व सांय 5 से 7 बजे ष्ेऽ बीच है। यदि कोई भारी खाद्य पदार्थ लेना है तो प्रातः ष्ेऽ भोजन में ही लें, क्योंकि पाचन क्षमता सूर्य से प्रभावित होती है। 12 बजे ष्ेऽ आस-पास पाचन क्षमता सर्वाधिक होती है, अतः 10 बजे तक किया गया भोजन बहुत अच्छे से पच जाता है। अन्न वाले खाद्य पदार्थ दो बार से अधिक न लें। परन्तु आवश्यकतानुसार तीन बार भी भोजन किया जा सकता है। सांयकाल भोजन हल्का करें। भोजन का पाचन सूर्य पर निर्भर करता है। सूर्य की ऊष्मा से नाभिचक्र अधिक सक्रिय होता है। भोजन पचाने में लगी अग्नि को जठराग्नि कहा जाता है जिसका नियंत्रण नाभि चक्र से होता है। जिनका नाभि चक्र सुस्त हो जाता है, कितना भी चूर्ण चटनी खा लें भोजन ठीक से नहीं पच पाता। गायत्री का देवता सविता ;सूर्यद्ध है अतः नाभि चक्र को मजबूती ष्ेऽ लिए गायत्री मंत्र का आधा घण्टा जप अवश्य करें। दो ठोस आहारों के बीच 6 घण्टें का अन्तर रखें। 3 घण्टें से पहले ठोस आहार न लें। अन्यथा अपच होगा जैसे हाण्डी में यदि कोई दाल पकाने के लिए रखी जाए उसके थोड़ी देर बाद दूसरी दाल डाल दी जाए तो यह सब कच्चा पक्का हो जाएगा। बार-बार खाने से भी यह स्थिति उत्पन्न होती है। भोजन के पश्चात् 6 घण्टें से अधिक भूखे न रहें। इससे भी अम्लता इत्यादि बढ़ने का खतरा रहता है।
3. भोजन की प्रकृति
            रोटी ष्ेऽ लिए मोटा प्रयोग करें यह आॅंतों में नहीं चिपष्ेऽगा। मैदा अथवा बारीक आटा आॅंतों में चिपक कर सड़ता है जिससे आॅंतों ष्ेऽ संक्रमण ;इन्फेक्शनद्ध का खतरा बढ़ जाता है।  साबूत दालें भिगोकर अंष्ुऽरित कर खाएॅं। भोजन का जरूरत से ज्यादा पकाएॅं नहीं। भोजन ष्ेऽ विषय में कहा जाता है - हितभुक, )तभुक मितभुक हितभुक का अर्थ है वह भोजन करें तो हितकारी हो।   जैसे दूध ष्ेऽ साथ मूली व दही ष्ेऽ साथ खीर लेना अहितकारी है परन्तु ष्ेऽले ष्ेऽ साथ छोटी इलाइची एवं चावल ष्ेऽ साथ नारियल की गिरी लाभप्रद है )तभुक का अर्थ है भोजन )तु ष्ेऽ अनुष्ूऽल हो उदाहरण ष्ेऽ लिए ग्रीष्म )तु में आटे में गेहूॅं ष्ेऽ साथ जौ पिसवाना लाभप्रद रहता है क्योंकि जौ की प्रष्ृऽति शीतल होती है परन्तु वर्षा )तु में गेहूॅं ष्ेऽ साथ चना पिसवाना आवश्यक है वर्षा )तु में वात ष्ुऽपित होता है जिसको रोकने ष्ेऽ लिए चना बहुत लाभप्रद रहता है। अन्यथा व्यक्ति कमर दर्द व अन्य पीड़ाओं से ग्रस्त हो सकता है। अन्तिम मितभुक का अर्थ है भूख से कम भोजन करें। पेट को ठूॅंस-ठूॅंस कर न भरें।
4. भोजन के समय की स्थिति
भोजन से पूर्व अपनी मानसिक स्थिति शान्त कर लें। भोजन शान्त मन से चबा-चबा कर व स्वाद ले-लेकर करें। यदि भोजन में रस आए तो वह शरीर को लगता है अन्यथा खाया-पीया व बेकार निकल गया तथा पचने में मेहनत और खराब हो गई। भोजन करते हुए किसी भी प्रकार ष्ेऽ तनाव, आवेश, भय, चिन्ता ष्ेऽ विचारों से ग्रस्त न हों। भोजन ईश्वर का प्रसाद मानकर प्रसन्न मन से करें। भोजन को खूब चबा-चबा कर खाना चाहिए। आचार्य भाव मिश्र कहते हैंः-
ईष्र्याभयक्रोध् समन्वितेन, लुब्धेन रुग् दैन्यनिपीडितिेन।
विद्वेष युक्तेन च सेव्यमान, अन्नं न सम्यष््ऽ परिपाकमेतिû
      अर्थात् भोजन ष्ेऽ समय ईष्र्या, भय, क्रोध, लोभ, रोग, दीनता का भाव, विद्वेष रखने से खाया हुआ अन्न भली-भाँति नहीं पचता है, जिससे रस रक्तादि की उत्पत्ति भी ठीक प्रकार शु( रूप से नहीं होती है। अतः सुखपूर्वक बैठकर प्रसन्नता से धीरे-धीरे खूब चबा-चबा कर भोजन करना चाहिए।
भोजन ष्ेऽ समय कोई अन्य काम जैसे पुस्तक पढ़ना, टीवी देखना न करें। भोजन को सही से चबाने पर उसमें पाचक रसों का समावेश उपयुक्त मात्रा में होता है। यदि जल्दी जल्दी में भोजन को पेट की भट्टी में झोंक दिया जाए तो इसका परिणाम अपच, दस्त तथा गैस उत्पति के रूपमें अनुभव किया जा सकता है। जो लोग अप्रसन्न मन से भोजन करते हैं उनके शरीर में कीटोन्स ;विषाक्त तत्वद्ध बढ़ने लगते हैं। अतः जो भी भोजन ग्रहण करें प्रसन्न मन से भगवान् को धन्यवाद देना न भूलें।
5.  दिन में भोजन के पश्चात् थोड़ी देर विश्राम एवं सांयकाल लगभग 100-200 कदम अवश्य चलें।
6. भोजन ष्ेऽ पश्चात् एक घण्टे तक जल न पीएँ। यदि आवश्यकता लगे तो भोजन ष्ेऽ बीच अल्पमात्रा में पानी पीएँ, क्योंकि अधिक जल पीने से पाचक रस मन्द हो जाते हैं।
7. सप्ताह में एक दिन इच्छानुसार स्वादिष्ट भोजन कर सकते हैं। पाँच दिन सामान्य भोजन करें व एक दिन व्रत अवश्य करें। सामान्य भोजन में मिर्च मसालों का प्रयोग कम से कम करें।
8. घी का सेवन वही करें जो शारीरिक कार्य अधिक करते हैं। मानसिक कार्य करने वाले घी का सेवन अल्प मात्रा में ही करें। पित्त प्रकृति वालों के लिए घी का प्रयोग लाभप्रद होता है।
9. दूध या पेय पदार्थों को जल्दी-जल्दी नहीं गटकना चाहिए। धीरे-धीरे चूस-चूस कर पीना चाहिए। पेय पदार्थों का तापक्रम न तो अधिक गर्म हो न ही अधिक शीतल।
10. घी में तले हुए आलू, चिप्स आदि का प्रयोग कम से कम करना चाहिए। तलने ष्ेऽ स्थान पर भाप द्वारा पकाना कहीं अधिक गुणकारी व सुपाच्य होता है।
11. क्या खाया? कितना खाया? यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि कितना पचाया यह महत्वपूर्ण है।
12. भोजन जीवन का साधन मात्र है। शु(, सात्विक व स्वच्छ भोजन से ही जीवन अच्छा हो सकता है।
13. इतना मत खाओ कि तुम्हारा शरीर आलसी हो जाए।
14. दिनान्ते च पिवेद् दुग्धं निशान्ते च जलं पिबेत्।
भोजनान्ते पिवेत् तक्रं वैद्यस्य किं प्रयोजनम्û
            यदि रात्रि ष्ेऽ शयन से पूर्व दुग्ध, प्रातःकाल उठकर जल ;उषापानद्ध और भोजन ष्ेऽ बाद तक्र ;मट्ठाद्ध पिएँ तो जीवन में वैद्य की आवश्यकता ही क्यों पड़े?
15. दीर्घ आयु के लिए भोजन का क्षारीय होना आवश्यक है। क्षार व अम्ल का अनुपात 3ः1 होनी चाहिए। जो लोग अम्लीय भोजन करते हैं उसमें उनको रक्त-विकार अधिक तंग करते हैं। कुछ शोधों के निष्कर्ष यह भी बताते हैं कि भोजन में क्षार तत्व बढ़ाकर हृदय की धमनियों के इसवबांहम भी खोलें जा सकते हैं। भोजन में अम्लीय पदार्थों की मात्रा कम रखें। 
            स्वस्थ रहने के लिए रक्त की क्षारीयता 80 प्रतिशत तथा अम्लता 20 प्रतिशत होनी चाहिए। यह सन्तुलन बना रहता है, तब तक रोगों का भय नहीं रहता है। आज की पश्चिम जीवनशैली को अपनाकर हमारे देश में अस्पताल और डाॅक्टर दोनों बढ़ने पर तथा नई-नई दवाओं का आविष्कार होने पर भी रोग और रोगी दोनों ही घटने का नाम नहीं ले रहे हैं। आवश्यकता है क्षारीयता प्रदान करने वाले खाद्यों का उत्पादन भी बढ़ाया जाए और जीवनशैली में भी लाया जाए। रक्त को क्षारीयता प्रदान करने वाले खाद्यों में चोकर युक्त आटे की रोटी, अंकुरित अनाज, मूली, गाजर, टमाटर, पत्तागोभी, हरा धनिया, मेथी, पालक, बथुआ, चने इत्यादि शाक-सब्जी, सलाद तथा सभी ताजे पके हुए मीठे फल लेने चाहिए। सभी फल एवं हरी सब्जियों का प्रयोग करें। अंकुरित मूॅंग, अंकुरित चना, अंकुरित सोयाबीन इत्यादि का भरपूर प्रयोग करें। मैदा, बेसन, बिना छिलके की दालें एवं सफेद चीनी, सफेद नमक, तेल, शराब, चाय, काॅफी, कोल्ड-ड्रिंक्स जैसे बोतलबंद पेय, बिस्कुट, ब्रैड , आचार, चाट, कचैड़ी, समौसा, नमकीन एवं पराठें, पूड़ी आदि खून में अम्लता बढ़ाकर रोग पैदा करते हैं अतः स्वास्थ्य रक्षा के लिए अपने दैनिक भोजन में अधिकाधिक फल तथा हरी सब्जियों को स्थान देना चाहिए।
16. तीन सफेद विषों का प्रयोग कम से कम करें - सफेद नमक, सफेद चीनी व सफेद मैदा।
17. फल सब्जियों में ।दजपवगपकंदजे पर्याप्त मात्रा में होते हैं। इनका प्रयोग लाभप्रद रहता है।
18. कभी-कभी बादाम व अखरोट का भिगोकर सेवन करते रहें। इससे जोड़ों की ग्रीस अर्थात् ताकत बनी रहती है अखरोट में व्उमहं3होता है जो सेहत के लिए जरुरी है।
19. जितना सम्भव हो जीवित आहार लें। अधिक तला भुना पदार्थ व जंक फूड मृत आहारों की श्रेणी में आते हैं।
20. गेहूॅं, चावल थोड़ा पुराना प्रयोग करें।
21. घर में फ्रिज में कम से कम सामान रखने का प्रयास करें। पुराना बारीक आटा व सब्जी का प्रयोग जोड़ों के दर्द को आमन्त्रित करता है।
22. भोजन के उपरान्त वज्रासन में बैठना बहुत लाभकारी होता है। भोजन करने के पश्चात् एक दम न सोएॅं न दिन में, न रात में।दिन में भोजन के पश्चात् थोड़ी देर विश्राम व सांयकाल लगभग 100-200 कदम अवश्य चलें।
23. भोजन के पश्चात् दाई साॅंस चलाना अच्छा होता है। इससे जठाराग्नि तीव्र होती है व पाचन में मदद मिलती है।
24. पानी सदा बैठकर धीरे-धीरे पिएॅं, एकदम न गटकें। जल पर्याप्त मात्रा में पिएॅं अन्यथा भ्पही ठच् शिकार हो जाएॅंगे। सामान्य परिस्थितियों में जल इतना पीएॅं कि 24 घण्टें में 6 बार मूत्र त्याग हो जाए। मूत्र त्याग करते समय अपने दाॅंत बीच कर रखें।
नियमित दिनचर्याः
            अधिकांश व्यक्ति अपनी जीवन-शैली को अस्त-व्यस्त रखते हैं इस कारण रोगों की चपेट में आने लगते हैं। रोगी होने पर एलोपैथी अथवा अन्य चिकित्सकों से इलाज कराते हैं, परन्तु जीवन-चर्या को ठीक करने की ओर ध्यान नहीं देते। इस कारण रोग जिद्दी ;बीतवदपबद्ध होने लग जाते हैं। जब रोग घातक स्थिति तक पहुॅंच जाता है तभी आॅंख खुलती है व रोग ष्ेऽ निवारण ष्ेऽ लिए बहुत परेशानी उठानी पड़ती है। यदि हम पहले से ही सचेत रहकर अपनी जीवनचर्या पर नियन्त्रण रखें तो हम )षियों ष्ेऽ अनुसार ‘जीवेम शरदः शतम्’ अर्थात् 100 वर्ष तक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। इसष्ेऽ लिए हमें निम्न सूत्रों को जीवन में अपनाना होगा।
25.  प्रातःकाल सूर्योदय से दो घण्टा पूर्व अवश्य उठें। )षियों ने इसे ब्रह्ममुहूत्र्त की संज्ञा दी है। इस समय की वायु में जीवनी शक्ति सर्वाधिक होती है। वैज्ञानिकों ने शोध किया है कि पेड़-पौधों की वृ(ि इस समय व संधिकाल ;दिन-रात ष्ेऽ मिलने का समयद्ध में सबसे अधिक होती है।
26.  प्रातः उठने ष्ेऽ पश्चात् ऊषा पान ;जलपानद्ध करें। यह जल ताजा पी सकते हैं। यदि रात को ताम्र पात्र में जल भरकर रख दें वह पीना अधिक लाभप्रद है। ताम्र पात्र को विद्युत रोधी लकड़ी, रबड़, प्लास्टिक ष्ेऽ ऊपर रखें इससे पानी में ऊर्जा निहित हो जाती है। यदि सीधा जमीन या स्लैब आदि पर रख दें तो यह ऊर्जा जमीन में चली जाती है। शीत )तु में जल को हल्का गर्म करष्ेऽ पीयें व ग्रीष्म )तु में सादा ;अधिक ठण्डा न होद्ध लें। जल की मात्रा इच्छानुसार लें। जितना पीना आपको अच्छा लगे- आधा किलो, एक किलो, सवा किलो उतना पी लें। जोर-जबरदस्ती न करें। कई बार अधिक पानी-पीने ष्ेऽ चक्कर में हृदय की धड़कन बढ़ती है या पेट में दर्द आदि महसूस देता है, अतः जितना बर्दाश्त हो उतना ही पानी पिया जाए।
27.  जल पीकर थोड़ा टहलने ष्ेऽ पश्चात् शौच ष्ेऽ लिए जाएँ। मल-मूत्र त्यागते समय दाँत थोड़ा भींचकर रखे व मुँह बंद रखें। मल-मूत्र त्याग बैठकर ही करना उचित होता है।
28.  मंजन जलपान करने से पहले भी कर सकते हैं व शौच जाने ष्ेऽ बाद भी। ब्रश से ऊपर-नीचे करष्ेऽ मंजन करें। सीधा-सीधा न करें। यदि अंगुली का प्रयोग करना हो तो पहली अंगुली तर्जनी का प्रयोग न करें। अनामिका ;त्पदह थ्पदहमतद्ध अंगुली का प्रयोग करें, क्योंकि तर्जनी अंगुली से कभी-कभी ;मनः स्थिति ष्ेऽ अनुसारद्ध हानिकारक तरंगें निकलती हैं जो दाँतों, मसूड़ों ष्ेऽ लिए हानिकारक हो सकती है। कभी-कभी नीम की मुलायम दातुन का प्रयोग अवश्य करें। इससे दाँतों ष्ेऽ कीटाणु मर जाते हैं यदि नीम की दातुन से थोड़ा-बहुत रक्त भी आए तो चिन्ता न करें। धीरे-धीरे करष्ेऽ ठीक हो जाएगा। ष्ुऽछ देर नीम की दातुन करते हुए रस चूसते रहें उसष्ेऽ पश्चात् थोड़ा-सा रस पी लें। यह पेट ष्ेऽ कीटाणु मार देता है। यदि पायरिया ष्ेऽ कारण दाँतों से रक्त अधिक आए तो बबूल की दातुन का प्रयोग करें वह काफी नरम व दाँतों को मजबूती प्रदान करने वाली होती है। मंजन दोनों समय करना अच्छा रहता है- प्रातःकाल व रात्रि सोने से पूर्व। परन्तु दोनों समय ब्रश न करें। एक समय ब्रश व एक समय अंगुलि से मंजन करें। अधिक ब्रश करने से दाँत व मसूढ़े कमजोर होने का भय बना रहता है। मंजन करने ष्ेऽ पश्चात् दो अंगुलि जीभ पर रगड़कर जीभ व हलक साफ करें। हल्की उल्टी का अनुभव होने से गन्दा पानी आँख, नाक, गले से निकल आता है। इससे टान्सिलस की शिकायत नहीं होती।
29.  स्नान ताजे जल से करें, गर्म जल से नहीं। ताजे जल का अर्थ है जल का तापक्रम शरीर ष्ेऽ तापक्रम से कम रहना चाहिए। छोटे बच्चों ;5 वर्ष से कमद्ध ष्ेऽ लिए अधिक ठण्डा जल नहीं लेना चाहिए। शरद् )तु में भी जल का तापक्रम शरीर ष्ेऽ तापक्रम से कम ही होना चाहिए, परन्तु बच्चों, वृ(ों व रोगियों को गुनगुने जल से स्नान करना चाहिए। स्नान सूर्योदय से पूर्व अवश्य कर लेना चाहिए। रात्रि में पाचन तन्त्र ष्ेऽ क्रियाशील रहने से शरीर में एक प्रकार की ऊष्मा ;ीमंजद्ध बनती है जो शीतल जल में स्नान करने से शांत हो जाती है, परन्तु यदि सूर्योदय से पूर्व स्नान नहीं किया गया तो सूर्य की किरणों ष्ेऽ प्रभाव से यह ऊष्मा और बढ़ जाती है तथा सबसे अधिक हानि पाचन तन्त्र को ही पहुँचाती है।
30. स्नान ष्ेऽ पश्चात् भ्रमण ;तेज चाल सेद्ध, योगासन, प्राणायाम, ध्यान, पूजा का क्रम बनाना चाहिए। इसष्ेऽ लिए प्रतिदिन आधा से एक घण्टा समय अवश्य निकालना चाहिए। बच्चों को भी मंदिर में हाथ जोड़ने, चालीसा आदि पढ़ने का अभ्यास अवश्य कराना चाहिए।
 शारीरिक श्रम व व्यायाम

31. स्वस्थ व्यक्ति प्रतिदिन इतना श्रम अवश्य करें कि उसष्ेऽ शरीर से पसीना निकलता रहे। इससे खून की सफाई हो जाती है। जो व्यक्ति पर्याप्त मेहनत नहीं करता उसको व्यायाम, योगासन अथवा प्रातः सांय तीन चार कि.मी. पैदल चलना चाहिए।
32. हमारा सम्पूर्ण शरीर माॅंसपेशियों का बना है। माॅंसपेशियों की ताकत बनाए रखने ष्ेऽ लिए उचित शारीरिक श्रम अथवा व्यायाम अनिवार्य है।
 33. चीन ष्ेऽ लोग स्वस्थ व ताकतवर होते हैं क्योंकि वो साइकिलों का प्रयोग खूब करते हैं। पहले महिलाएॅं घर का कार्य स्वयं करती थी इससे बहुत स्वस्थ रहती थी, परन्तु आज ष्ेऽ मशीनी युग ने हमारी माता-बहनों का स्वास्थ्य चैपट कर दिया है। यह हमारे सामने प्रत्यक्ष है कि बागडि़यों व पहाड़ी महिलाओं को प्रसव में बहुत कम कष्ट होता है। उनष्ेऽ यहाॅं आराम से घर पर ही बच्चे पैदा हो जाते हैं क्योंकि वो मेहनत बहुत करती हैं।
34. शारीरिक श्रम व्यक्ति अपनी सामथ्र्य ष्ेऽ अनुसार करें। यदि रोगी व दुर्बल व्यक्ति अधिक मेहनत कर लेगा तो उसे लाभ ष्ेऽ स्थान पर हानि भी हो सकती है। इस स्थिति में पैदल चलना बहुत लाभप्रद रहता है।
35. समाज में ष्ुऽछ अच्छी परिपाटियाॅं अवश्य चलें। जैसे प्रातः अथवा सांय पूरा परिवार मिलकर स्वयं लघु वाटिका चलाए ष्ुऽछ फल, फूल, सब्जियाॅं उगाए। इससे परिवार को अच्छी सब्जियाॅं मिलेंगी व शारीरिक श्रम भी होगा।
36.  इन्द्रिय संयम - इस नियम ष्ेऽ अन्तर्गत जीभ व जननेन्द्रिय का संयम आता है। जिह्वा संयम ष्ेऽ लिए सप्ताह में एक दिन अस्वाद व्रत अर्थात् बिना नमक मिर्च मसालों का अस्वाद भोजन करें। जननेन्द्रिय संयम ष्ेऽ लिए अश्लील वातावरण से बचने का प्रयास करें। गलत वातावरण बड़े-बड़े जितेन्द्रिय का भी पतन कर देता है।
            विवाहित व्यक्ति भी गृहस्थ जीवन में मर्यादानुसार ही सम्भोग करें। 25 से 35 वर्ष तक ष्ेऽ गृहस्थी हफ्ते, दो हफ्ते में एक बार, 35 से 45 वर्ष की आयु तक ष्ेऽ गृहस्थी तीन चार सप्ताह में एक बार व इससे ऊपर दो चार माह में एक बार ही मिलें। महिलाओं ष्ेऽ )तुकाल में यह वर्जित है क्योंकि इस समय प्रष्ृऽति अनुष्ूऽल नहीं होती।
37. आहार, निद्रा व ब्रह्मचर्य इन तीनों बातों से स्वास्थ्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है। आहार में मांस, अण्डा, शराब, मिर्च-मसाले व अधिक नमक से बचना चाहिए। निद्रा छः से आठ घण्टे ष्ेऽ बीच लेनी चाहिए व अश्लील चिन्तन से बचना ही ब्रह्मचर्य है।
38. जीवन आवेश रहित होना चाहिए। ईष्र्या-द्वेष, बात-बात पर उत्तेजित होने का स्वभाव जीवनी शक्ति को भारी क्षति पहुँचाता है।
39. रात्रि को सोते समय मच्छरों से बचने ष्ेऽ लिए मच्छरदानी का प्रयोग करना चाहिए। कीटनाशकों का कम से कम प्रयोग करना चाहिए। लम्बे समय तक मच्छरनाशक रसायनों ष्ेऽ उपयोग से मनुष्य को सर्दी-जुकाम, पेट में ऐंठन और आँखों में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। ये लक्षण और विड्डतियाँ पायरेथ्राइडस नामक ड्डत्रिम कीटनाशक ष्ेऽ कारण होती हैं जो कीटों ष्ेऽ तंत्रिका तन्त्र पर हमला करता है। सेफ्टी वाच समूह ‘सी.यू.टी.एस.’ ने अपने नए प्रकाशन ‘इज इट रियली सेफ’ में बताया है कि ये रसायन मानव शरीर ष्ेऽ लिए बहुत-ही विषैले और हानिकारक होते हैं।
40.  भोजन बनाते समय साबुत दालों का प्रयोग करना चाहिए। छिलका उतरी दालों का प्रयोग बहुत कम करना चाहिए। आटा चोकर सहित मोटा प्रयोग में लाना चाहिए। बारीक आटा व मैदा कम से कम अथवा कभी-कभी ही प्रयोग करना चाहिए। दाल, सब्जियों को बहुत अधिक नहीं पकाना चाहिए। आधा पका ;ींस िबववाद्ध भोजन ही पाचन व पौष्टिकता की दृष्टि से सर्वोत्तम है।
41. व्यस्त रहें, मस्त रहें ष्ेऽ सूत्र का पालन करना चाहिए। व्यस्त दिनचर्या प्रसन्नतापूर्ण ढंग से जीनी चाहिए।
42. प्रातः उठते ही दिनभर की गतिविधियों की रूपरेखा बना लेनी चाहिए व रात्रि को सोते समय दिन भर की गतिविधियों का विश्लेषण करना चाहिए। यदि कभी कोई  गलती प्रतीत होती हो, तो भविष्य में उस त्रुटि को दूर करने का संकल्प लेना चाहिए।
43. शयन ष्ेऽ लिए बिस्तर पर मोटे बाजारू गद्दों का प्रयोग न करें, हल्ष्ेऽ रूई ष्ेऽ गद्दों का प्रयोग करें।
घर में अथवा आस-पास नीम चढ़ी गिलोय उगाकर रखें व हफ्ते पन्द्रह दिन एक-दो बार प्रातःकाल उबालकर पीते रहें। गिलोय से शरीर स्वस्थ व निरोग रहता है। लीवर सुचारू रूप् से काम करता है।
44. शीत )तु में दो तीन माह ;क्मबमउइमतए श्रंदनंतलए थ्मइतनंतलद्ध  आॅंवले का उपयोग करें। यह बहुत ही उच्च कोटि का स्वास्थ्यवर्धक रसायन है।
45. प्रातःकाल सूर्योदय के समय सविता देवता को प्रणाम कर उत्तम स्वास्थ्य की कामना करें व गायत्री मन्त्र पढ़ें। इससे सूर्य स्नान होता है। नस नाडि़यों के रोग जैसे सर्वाइकल आदि नहीं होते।
46. वस्त्र सदा ढीलें पहने। नाड़े वाले कुर्ते-पजामे सर्वोतम वेश हैं। कसी जीन्स आदि बहुत घातक होती हैं।
47. जब भी मिठाई खाएॅं, कुल्ला अवश्य करें।
48. घर में तुलसी उगाकर रखें इससे सात्विक ऊर्जा में वृद्धि होती है तथा वास्तु दोष दूर होते हैं। समय-समय पर तुलसी का सेवन करते रहें।
49. मोबाईल पर लम्बी बातें न करें। यह दिमाग में टयूमर व अन्य व्याधियाॅं उत्पन्न कर सकता है।
50. देसी गाय के दूध घी का सेवन करें। देसी गौ का सान्निधय भी बहुत लाभप्रद रहता है।
51. दस-पन्द्रह दिन में एक बार घर में यज्ञ अवश्य करें। अथवा प्रतिदिन घी का दीपक जलाएॅं।
52. ध्यान रहे लम्बे समय तक वासना, ईष्र्या, द्वेष, घृणा, भय, क्रोध के विचार मन में न रहें अन्यथा ये आपका स्नायु तन्त्र ;छमतअवने ैलेजमउद्ध विकृत कर सकते हैं। यह बड़ा ही दर्दनाक होता है न व्यक्ति जीने लायक होता है न मरने लायक।
53. धन ईमानदारी से कमाने का प्रयास करें। सदा सन्मार्ग पर चलने का अभ्यास करें। इससे आत्मबल बढ़ता है।
54. सदा सकारात्मक सोच रखे। यदि आपने किसी का बुरा नहीं सोचते तो आपके साथ बुरा कैसे हो सकता है। यदि आपसे गलतियाॅं हुई हैं तो उनका प्रायश्चित करें। इससे उनका दण्ड बहुत कम हो जाता है। जैसे डाकू वाल्मिकी ने लोगों को लूटा तो सन्त हो जाने पर बेसहारों को सहारा देने वाला आश्रम बनाया।
55. रोग का उपचार नहीं कारण खोजिए। रोगों का इलाज औषधालय में नहीं भोजनालय में देखिए।
56. यदि किसी को बार-बार जुकाम होता है तो नाक में रात्रि में सोने से पहले दो बूॅंद शुद्ध सरसों का तेल अथवा गाय का घी डालें। इससे नेत्र ज्योति बढ़ती है। दिमाग तेज होता है व नजला जुकाम आदि विकारों से राहत मिलती है।
57. रात्रि में सोने से पहले पैरों के तलवों पर सरसों के तेल की हल्की मालिश  करने से नस-नाडि़याॅं मजबूत होती है व नींद अच्छी आती है।
58. यदि किसी के हृदय की धड़कन बढ़ती है तो यह हृदय की माॅंसपेशियों की कमजोरी दर्शाता है इसके लिए 10 पत्ते पीपल के लेकर दोनों तरफ से थोड़ा-थोड़ा कैंची से काटकर दो गिलास पानी में उबाल लें। जब पानी एक गिलास बचे तो उसको हल्के नाश्ते के बाद 10-10 मिनट के उपरान्त तीन बार पीएॅं। इससे हृदय की माॅंसपेशियाॅं मजबूत होती हैं व धड़कन में राहत मिलती है। पीपल का पत्ता हृदय की ेींचम का होता है व उत्तम ीमंतज जवदपब माना जाता है। यह प्रयोग 10-15 दिन तक कर सकते हैं।

59. घर में प्रतिदिन घी का दीपक जलाने से नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है व परिवार के सदस्यों का तेज बढ़ता है। जिन लोगों को भूत-प्रेत, टोने-टोटकों का भय हो वो कभी-कभी 24 घण्टें अखण्ड दीप जलाएॅं।

Monday, July 6, 2015

‘‘कैसे होगा युग निर्माण’’

कुछ दिन पहले की बात है कि मैं अपना मकान बनवा रहा था। मजदूर, मिस्त्री, लोग काम कर रहे थे । तभी थोडी बूदाँ बाँदी प्रारम्भ हुयी। सभी वर्षा से बचने के लिए एक ओर खडे हो गए परन्तु मैंने देखा एक मोटा ताजा मजदूर वर्षा में भी काम कर रहा था। मैंने उससे कहा भाई थोड़ा रोड के नीचे आ जाओं भीग जाओगे तो बीमार हो जाओगे। वह बोला बाऊ जी अगर वर्षा तीन-चार घण्टा चली ओर मैने काम रोके रखा तो मैं बिना काम किए मजदूरी नहीं ले सकँूगा। मैंने कहा ठेकेदार ने तो आपको काम पर लगा दिया। अब उसे मजदूरी देनी पड़ेगी चाहे काम हो या वर्षा के कारण न हो। उसने कहा यदि काम रूक तो ठेकेदार दुःखी मन से हमें पैसा देगा ओर में किसी के मन के दुःखी करके पैसा नहीं लेता। क्योंकि दुःखीमन से दिया पैसा हमें नहीं फलेगा। यह बात मेरे भीतर तक चीरती हुयी चली गयी। तभी दो मिस्त्री मेरे पास आए व कहने लगे कि बाऊ जी वर्षा में पकोडे होते तो क्या आनन्द आता। मैं दुकान से पकोडे ले आया व एक-एक कर सबके देने लगा । उस मोटे वाले  मजदूर की जब बारी आयी तो उसने लेने से मना कर दिया व कहा कि मैं किसी की कमाई का नहीं खाता क्या पता कैसी कमाई है सेठ लोगों की कमाई खराब होती है। सभी मजदूर मिस्त्री पकोडे खाने लगे। वर्षा बढ़ी तो वह अपने छोले से हनुमान चालीसा निकलकर पढ़ने लगा । एक छोटे से मजदूर को इतना ज्ञान, इतना संयम यह देखकर मेरे आश्चर्य की सीमा न रही कि भारत की आत्मा अभी जिन्दा है। जो आदर्श एक अनपढ़ मजदूर ने मुझे दिखाया वह आदर्श मैंने बड़े-बड़े धर्मधिकारियों व प्रबुद्ध वर्ग में भी नहीं देखा। धन के देखकर अच्छे अच्छो की लार टपकने लगती है।  
मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी क्या है? बड़ा ही स्पष्ट समाज का रवैया है ‘धन’। जिसके पास पैसा है उसके आगे पीछे सब घूमते हैं। आश्रम के पदाधिकारी के यदि या सूँघ आ जाए कि बड़े सेठ आए है तो उसकी पूरी सेवा पानी होगी मंच पर जमकर भी होगी। कब तक हमारे मन में धन के प्रति लोभ बना रहेगा व हम अपने प्रिय कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करते रहेंगे। जब तक मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी को नहीं बदला जाएगा। तब तक युग निर्माण कैसे सम्भव हो पाएगा? परम पूज्य गुरुदेव एक ऐसे आदर्श के जिन्होंने बिड़ला जी के लौटा दिया ताकि मिशन धनवालों के हाथ की कटपुतली न बन जाए। धनवान, स्वार्थी व महत्वाकाँक्षी लोग मिशन पर यदि हावी होते चले जाँएगे कि ‘कैसे होगा युग निर्माण’।
दूसरा प्रश्न है कि क्या हम अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक है। हम जो गायत्री परिवार के सदस्य है पूज्यवर हमें ब्राह्मण पुरोहित की भूमिका निभाने के लिए दे गए हैं। ब्राह्मण पुरोहित अपनी भूमिका भूल गया, मात्र पैर पुजवाने धन कमाने तक सीमित रह गया। तो पूरे समाज में त्राहि-2 मच गयी। धर्मतन्त्र, राजतन्त्र, अर्थतन्त्र तीनों मिलकर जन सामान्य का शोषण कर रहे थे उस समय पूज्यवर का अवतरण इस धरा पर हुआ और लाखों ब्राह्मणों पुरोहितो की उत्पत्ति गायत्री परिवार के रूप में हुयी। तीनों तन्त्रों को दिशा देना ब्राह्मण पुरोहितों का कार्य है। यह कार्य इतना सरल नहीं है इसके लिए दो बात चाहिए पहला कि हमारा दामन पक्का साफ हो हम  लोभ मोह में न फंसे हो, व्यक्तिगत अंह, परिवारवाद, जातिवाद से बचे हों । दूसरा हमारे अन्दर पर्याप्त तपोबल हो अर्थात हम समर्थ भी हों। ऋषियों के तपोबल के किससे हमने खूब सुने हैं । कि ऋषि अगस्त ने तपोबल से समुद्ध पी लिया था विश्वमित्र का तपोबल प्रसिद्ध है आदि-2। यदि हम लोग व्यक्तिगत अंह नहीं छोड पा रहे है, परिवारवाद, जातिवाद में उलझे पड़़े है, पदो को लेकर खींचातानी बनी रहती है, शक्तिपीठों पर वाद विवाद, झगड़े होते रहते है- तो ‘कैसे होगा युग निर्माण’। अब बात आती है सामथ्र्य की यदि हम समर्थ नहीं होंगे तो मात्र सदविचारों का प्रचार करते रह सकते है उनकी स्थापना नहीं हो पाएगी। आचार्य जी मात्र 2000 तक प्रचार अभियान चाहते थे इसलिए उन्होंने 2000 के बाद किसी का समय दान नहीं मांगा था । सन् 2000 के बाद हमें चुने हुए परिजनों के समर्थ बनाने की दिशा में ध्यान देना था। हमें प्रचार स्थली के स्थान पर साधना स्थली चाहिए थी। क्या साधना व्यक्ति के समर्थ बनाती है? इस प्रश्न का उत्तर कौन देगा? यदि नहीं बनाती तो ऋषि इतने समर्थ कैसे थे कि राजा लोग उनसे भय खाते थे। यदि बनाती है तो अभी तक हम 24,000 समर्थ व्यक्तित्व क्यों नहीं तैयार कर पाए। ऐसी दशा में हम कैसे युग निर्माण के ठेकेदार बनते है? कहीं न कहीं गडबड़ जरूर है या तो हमारी नीयत में खोट है कि हम समर्थ व्यक्तित्व उभरते नहीं देखना चाहते जिससे युग निर्माण के संघर्ष से बचे रहें, मात्र जन सामान्य के युग निर्माण का स्वपन दिखाकर अपने पैर पुजवाते रहें और मान सम्मान का जीवन जीते रहें। या फिर हमें वह विज्ञान अभी तक पता ही नहीं चल पाया जिससे साधना से समर्थ व्यक्तित्व की उपलब्धि होती है। जो लिखा जा रहा है वह बड़़ी कडवी सच्चाई है । भय इस बात का नहीं है कि इससे मिशन की बदनामी होगी। भय तो इस बात का है कि कब तक हम लोगों की आँखों पर पर्दा डालकर रखेंगे। यह पर्दा दिनोदिन झीना होता जा रहा है जिस दिन यह उतर गया आने वाली पीढ़ी हमारे मुँह पर थूकेगी व अपने प्रश्नों का जवाब माँगेगी कि हमने युग निर्माण के नाम पर क्या किया? हम कहेंगे कि हमने सन् 2014 साधना वर्ष घोषित किया। क्या हमने यह भी घोषणा की कि हमें इस वर्ष में क्या सफलता मिली इसका विश्लेषण हमने क्यों नहीं किया। यदि हमें सौ भी उच्चस्तरीय साधक समर्पित कार्यकर्ता मिले तो हमने अका क्या नियोजन किया? हमने साहब बाँध तो बहुत बड़ा बनाया परन्तु जो बिजली बनी उसको घरों तक भेजने का तन्त्र नहीं विकसित किया तो क्या होगा? हम अव्वल दर्जे के मूर्ख कहलाएगें। वह बाँध व बिजली हमारे लिख खतरा बन जाएँगे।
पूज्य गुरुदेव शतसूत्री योजना अपने हिमालय प्रबरू के दौरान लेकर आए। क्या हमने एक-एक योजना के लिए एक-एक विभागाध्यक्ष बनाया। जो साधक हमें साधना वर्ष के दौरान मिले हो उन्हें उनकी योग भूमि, योग्यता व अनुभव के हिसाब से शतसूत्री कार्यक्रमों में झोंकना चाहिए। अपनी शतसूत्री  योजना के प्रति हमें गम्भीर होने की आवश्यकता है। परन्तु हमने इस दिशा में सार्थक प्रयास नहीं कर पा रहे हैं तो ‘कैसे होगा युग निर्माण’।
रोगों के ऐलोपैथिक इलाज से काम नहीं चलता इसके लिए आयुर्वेदिक उपचार चाहिए। भारत सरकार ‘स्वच्छ भारत’ अभियान के अन्र्तगत साफ सफाईयाँ करा रही है परन्तु जब तक पालिथीन समाप्त नहीं हो जाती, जनसंख्या नियन्त्रित नहीं होती तब तक यह अभियान कैसे सिरे चढ़ेगा। केवल कुछ 2 अक्तूबर जैसी तारीखें आएँगी साफ सफाईयाँ बड़े स्तर पर होगी व कुछ समय के लिए भारत साफ सुथरा दिखेगा परन्तु कुछ दिनों बाद फिर वही गंदगी ऐलोपैथी उपचार में यही होता है कुछ समय के लिए रोग हब जाता है व फिर दोबारा उभर कर आता है।
जब तक हम रोगों का आयुर्वेदिक उपचार नहीं करेंगे उनकी जडे़ नहीं कटेगी। यही समस्या हमारे साथ है जब तक हम 24,000 लोगों को समर्थ नहीं बनाएँगे तब तक हम सभी अभियानों को पूर्णता तक नहीं पहुँचा पाएँगे।
मित्रों रोगों को दूर करने के लिए करवी औषधि दी जाती है पुरोहितो को समाज के कड़वे घँूट पीने पड़ते हैं जैसा कि स्वामी विवेकानन्द, दयानन्द के अल्पायु में शरीर छोड़ना पड़ा। राजीव दीक्षित जैसे महान राष्ट्र भक्त के मात्र 43 वर्ष की आयु में ही धरती से विदा होना पड़ा। सच्चे लेखकों के कड़वी सच्चाईयाँ लिखनी ही पड़ती हैं।
आज हमें कठोर आत्मविश्लेषण की आवश्यकता है कि हम युग निर्माण की दिशा में कितना आगे बढ़ पाए। कुछ बाराती दुल्हन लेने गए बाजे की धुन में इतना मस्त हो गए कि गोल-2 ही घूमते रहे। हम भी ढोल, दपली, भजनों कीर्तनों, प्रवचनों का आनन्द तो ले परन्तु लक्ष्य सदा याद रखें-युग निर्माण। यह शब्द हमें खाते पीते, सोते जागते सदा हमारे कर्तव्य का बोध कराता रहे हमारे गुरू के संकल्प को याद दिलाता रहे। मात्र कुछ भजन गाकर, मीठी मीठी बातें कहने सुनने से युग निर्माण यदि होना होता तो 40 वर्ष से ऊपर हम यही करते आ रहे है। समाज में गन्दगी की जड़े इतनी गहराई तक जा चुकी है कि ऐलोपैथिक उपचार से काम चलने वाला नहीं हैं। हम सफाईयाँ करते-करते थक जाते हैं परन्तु गन्दगी साफ नहीं होती। हमारे युवा भाई ब्रह्मचर्य की किताबें पढ़-पढ कर अच्छे-अच्छे संकल्प बनाते है परन्तु युवतियाँ जब उल्टे सीधे वस्त्र धारणा कर सड़क पर निकलती है तो सारे संकल्प धरे के धरे रह जाते है। हमारे माननीय प्रधानमन्त्री जी ने नारा दिया- ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ परन्तु मित्रों हमें युग निर्माण के लिए एक पंक्ति ओर जोड़ी होगी।
‘बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओं एवं बेटी को शील व संस्कारवान बनाओ’ अब नारी जागरण के साथ नारी संस्कार शिविर चलने चाहिए। जब तक नारियाँ शील व संस्कारवान नहीं बनेगी ‘कैसे होगा युग निर्माण’।
जो लोग गुरु सत्त देव सत्ताओं से गहराई से जुड़े है वो संस्कृति का यह पतन देखकर कराह उठते हैं। ऐसे लोगों के संगठित होने की आवश्कता है समर्थ होने की आवश्यकता है और एक बार मिलकर जोर लगाने की आवश्कता है जिसमें गन्दगी की इनज ड़ों तक हम पहुँच सके वो आमूल पूल परिवर्तन व क्रान्ति समाज में हो सके।
मैं व्यक्तिगत रूप से अपने सभी परिजनों का बहुत सम्मान करता हँू व उनसे यह आशा भी करता हँू कि गुरुदेव के इस प्यारे बालक को अन्यथा न लें, अपितु इस माध्यम से व्यक्त देव सत्ताओं की पींडा व चेताक्षी के समझें। महाकाल की प्रतिक्रिया युग निर्माण को लेकर रोद्र रूप धारण करने जा रही है जो लोग भी धर्मतन्त्र व राजतन्त्र के उच्च पदो पर बैठे है परन्तु अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक नही है स्वार्थों से जुडे है उनका समय निकट आ चुका है। गोस्वामी जी ने सत्य ही कहा है-
‘‘जासु राज प्रिय प्रजा दुःखारी, सो नृृप अवश्य नरक अधिकारी।’’
अर्थात् जिस राजा की प्रजा दुःखी हो वह राजा अवश्य नरक का अधिकारी है। इसी कारण पहले राजा बेटा बदलकर यह आकलन करते थे कि प्रजा दुःखी है या सुःखी। परन्तु अब वह भाव हमारे उच्च पदों पर बैठें लोगों में धीरे-धीरे करके घट रह गया है। जिन लोगों ने महत्वपूर्ण पदो पर बैठकर अपने कर्तव्यों का उचित पालन नहीं किया उनका नाम ‘काले अक्षरों’ में लिखा जाएगा। हम गायत्री परिवार के परिजनों के महाकाल ने बहुत पवित्र व महान कार्य दिया है इसके अनुरूप हम अपने व्यक्तित्व को ढाल सकें अपना जीवन दान इस महान उद्देश्य के लिए कर सकें व महान क्रान्तिकारियों की तरह हमारी आहुति भी इस युग निर्माण के महायज्ञ में स्वीकार हो यह प्रार्थना हम देवसत्ताओं से करते है।
‘वंय राष्ट्रे जागृृयाम पुरोहितः’ के अपने कर्तव्य के पूरा करना हम गायत्री परिजनों का कर्तव्य है हमारे अन्दर भगवान इतना आत्मबल ब्रह्मबल दें कि हम व्यक्ति की प्रतिमा, पद प्रतिष्ठा को देखकर दबाव न माने वरण सच्चाई पर डटे रहने व वास्विकता का बोध कराने से पीछे न हटें। व्यक्तिगत रूप से ईष्र्या द्वेष न पालें, घृणा इत्यादि के भाव मन में न लाएँ  परन्तु गुरुवर के संकल्पों का सदा याद रख उस आधार पर अपने जीवन का निर्माण करें। यदि पाँच करोड के गायत्री परिवार से 24,000 थी ऐसी विश्वामित्र उभर आए तो उसी दिन रावण की सोने की लंका ढ़ह जाएगी व महाकाल का युग निर्माण का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हो जाएगा। अभी ऐसे लोगों की संख्या कम है जो सच्चाई व अच्छाई के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा सकें अतः आसुरी शक्तियाँ पलटवार करके अनेक बाधाएँ उत्पन्न करती है। धीरे-धीरे ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है व आसुरी शक्तियों का मनोबल टूट रहा है। सावधान, ये आसुरी शक्तियाँ कदम वेश में पीले सब तरह के लोगों के भीतर अपना डेरा जमाए बैठी है अतः हमें सावधानी के साथ संगठित होकर आगे बढ़ना है। युग निर्माण का इतिहास बनने जा रहा है जिनके जीवन की आहुति महाकाल स्वीकार करेगा उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा वो इस लोक में व परलोक में ब्रह्मा ज्ञान व परम पद के प्राप्त होंगे। आइए हम भी इस पुनीत कार्य में भाग लेने में पीछे न हटें व महाकाल के सपूत होने का गौरव प्राप्त करें।
‘जय भारत जय महाकाल’
विश्वामित्र रजश
देश की रक्षा के लिए, हमें वीर जवान चाहिए।
लोगों की भूख मिटाने को, मेहनती किसान ।

समाज की सुख के लिए इन्सान ।।

Wednesday, June 17, 2015

कृणवन्तो विश्वमार्यम््




एक बार की बात है कि मुझे जल बचाओं Save Water अभियान के अन्तर्गत एक बड़े सेमिनार में जाने का अवसर मिला। वहाँ बड़े-बड़े अधिकारी एव विद्वानो के भाषण हुए। एक विद्वान का उदबोधन मुझे बहुत पसन्द आयाब में उनसे बहुत प्रभावित हुआ। कुछ माह पश्चात् मुझे एक बड़े कार्यक्रम में वक्ता के रूप में बुलाया गया। उस भव्य आयोजन में सारी सड़के पानी से धोयी गयी मुख्य अतिथि के स्वागत के लिए। मुख्य अतिथि स्वागत से बहुत प्रसन्न हुए व आयोजको को मोटी धनराशि सहायता के रूप में दी । जानकारी से पता चला कि ये अतिथि वो ही है जो ेंअम ूंजमत पर बहुत बढि़या बोले परन्तु इस कार्यक्रम में सड़को पर पानी बहाने पर इन्हें कोई दर्द न हुआ। हमारे देश की बिडम्बना यही है कि केवल कोरी भाषणबाजी करने वाले बड़े पदो पर बैठे मजे कर रहे है परन्तु उनके खून में देशभक्ति नहीं हैं।
यही समस्या सामाजिक व आध्यात्मिक मिशन्ते के साथ भी होने लगती है। जो मिशन को खड़ा करते है वो अपना खून पसीना बहा देते हैं। परन्तु जो उसको चलाते हैं उनमें से बहुत से पदाधिकारी मिशन के लिए भाषणबाजी करते घमूते है।  कोई दर्द नहीं रखते खाली कार्य करने वालो की जगह वो चापलूसो व भाटो को अपने ईद गिर्द पाले रखते है। हमें अपने मिशन के इस विडम्बना से बचाना है। सभी मिशनो में दो तरह के लोग होते है।
1.         स्वार्थी व महत्वाकाँक्षी
2.         मिशन के लिए त्याग ओर बलिदान करने की इच्छा वाले
हमें दूसरे नम्बर वाले लोगो को छाँट कर अलग करना है। उन लोगो को मुख्य स्थान पर लाना है जिनके खून में मिशन भरा है। परन्तु इसमें एक बाधा आती है स्वार्थी व महत्वाकाँक्षी व्यक्ति जो ऊँचे पदो पर बैठे होते हैं ऐसे लोगो से डरते हैं क्योंकि इससे इनकी कमियाँ उजागर होने का भय रहता है जिसमें इनकी पद प्रतिष्ठा छिन सकती है। मान लीजिए हमने 24,000 ऐसे व्यक्तियों को चुना जो मिशन के लिए अपने जीवन की आहुति देना चाहते हो । अब दूसरा कदम है इनको समर्थ बनाना । इस सन्दर्भ में मुझे गुरू गोविन्द सिंह जी की उक्ति बहुत ही सही लगती है-
‘‘सवा लाख से एक लडाऊँ, तब गोविन्द सिंह नाम कहाऊँश्’’ श्री गुरु जी अपनी सेना को इतना समर्थ बनाने चाहते थे कि एक-एक सवा-सवा लाख मुगलो से भिड़ो से भयभीत न हों । क्या आज हम भी अपने मिशन में इस प्रकार की भावना का संचार कर सकते हैं। क्या सावित्री साधना के द्वारा व्यक्ति को इतना साहसी व पराक्रमी बनाना सम्भव है? इस प्रकार के मुद्दो पर मिशन के शुभचिन्तको के विचार करना अनिवार्य है।
आज भारत का सम्पूर्ण समाज अर्थ प्रधान हो गया है। विचारको, साधको, त्यागी तपस्वी लोगो को समाज दूर से ही प्रणाम करना पसन्द करता है । परन्तु यदि किसी के पास बहुत सा धन है तो लोग उसके दई गिर्द मक्खियों की तरह भिनभिनाते है। मेरे अनेक प्रकार के मित्र हैं कुछ धनी है कुछ राजनेता है कुछ समाजसेवी तो कुछ श्रेष्ठ विचारक। मेरा बड़ा ही कड़वा अनुभव है कि सबसे अधिक सम्मान पैसे वालो व राजनेताओं का होता है। चार तन्त्र अर्थ तन्त्र, ज्ञान तन्त्र, धर्म तन्त्र व राजतन्त्र में आज अर्थ तन्त्र अर्थ तन्त्र सबसे ऊपर आकर खड़ा हो गया है उसके ठीक नीचे राजतन्त्र है तत्पश्चात् ज्ञान तन्त्र व धर्मतन्त्र की मान्यता है। भारत की प्राचीन परम्परा ऐसी नही थी । हमारे यहाँ ज्ञान तन्त्र व धर्म तन्त्र सर्वोपरि माने जाते थे। उनके नीचे राजतन्त्र व अर्थ तन्त्र आते थे।  पूज्य गुरुदेव इस बात से भलीभाँति परिचित थे उन्होंने अपने जीवन में कभी धनवानो को मिशन पर हावी नही होने दिया। जब बिडता जी उनके पास खाली चैक लेकर आए तो उन्होंने उसके सम्मानपूर्वक लेटा दिया। क्या आज भी ऐसी निस्पृृहता हमारे मिशन में विद्यमान है अथवा हमने बडे़-बड़े भवन आदि बनाने के चक्कर में धनवानो को आगे अपने घुटने टेक दिए यह एक विचारणीय प्रश्न है।
आज मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी मात्र उसका धन है। मुझसे लोग प्रश्न कर सकते है कि आपको पुस्तकें लिखने की ंनजीवतपजल  किसने दी परन्तु पैसे वालो से कोई पूछने को हिम्मत नही करता कि उनको इतना धन एकत्र करने की अनुमति किसने दी? धनवानो को देखते ही लोग शाले व गुलदस्ते उठाए उनके पीछे कुत्तो की तरह दुम हिलाते घूमते हैं ताकि उनसे कुछ मुद्रा हथियाई जा सके। ऐसी स्थिति में युग के निर्माण की बड़ी-बड़ी बातें मंचो से करने का क्या लाभ जहाँ हमारा स्वाभिमान हमारा चरित्र इतना खोखला हो चुका है।
हमारा देश भारत आज बड़ी दयनीय दशा से गुजर रहा है कहीं कुछ भी नियन्त्रित व अनुशसित नही है। धर्म तन्त्र का राजतंन्त्र पर नियन्त्रण नही है। राजतन्त्र का जनसँख्या वृद्धि पर कोई नियन्त्रण नहीं है। समाज का महिलाओं पर कोई नियन्त्रण नहीं है। उन्हें मनमाने वस्त्र पहनने व भौडें चालचलन की पूरी छूट है।
फसलों में कीटानाशक व रसायनिक खादो के प्रयोगों पर कोई नियन्त्रण नही है। युवाओं का अपने वीर्य पर नियन्त्रण नहीं है अर्थात् वीर्यवान युवा कहाँ देखने को मिलते है । प्रशासन व पुलिस वर्ग का भ्रष्टाचार पर कोई नियन्त्रण नही है। समाचार पत्र पर निगाह डालें तो एक से एक घटिया स्तर की खबरें पढ़ने को मिलती है । अन्र्त कराह उठता है कि क्या यह वही भारत है जहाँ 33 करोड़ देवी देवता वास करते थे। आज तो यहाँ छदम वेश में राक्षस निवास करते है। चेहरा व तमगा ब्रह्माज्ञानी का लगा है परन्तु भीतर ब्रह्मा राक्षस बैठा है।
इतनी दुर्दशा इस देश व धरती की शायद ही कभी हुयी हो जब अपने ही देश के युवा अपनी ही संस्कृति व मान मर्यादाओं से खिलवाड करते हुए घूम रहे हों ।
उपचार केवल एक ही है जो इस राष्ट्र से, इस संस्कृति से मानवता से प्रेम करते हों, वो सामने आएँ, एकत्रित व संगठित हो तथा धर्म की स्थापना के लिए त्याग तप भरा जीवन जिएँ, सावित्री-गायत्री साधना द्वारा समर्थ व संवेदनाशीलता के अर्जित करें जिसके पुनः मानव धर्म की स्थापना हो सके। सूर्य सदा पूर्व से निकलता है संस्कृति व सद््ज्ञान सदा पूरे विश्व में पूर्व से ही फैलता है। अब समय आ गया है हम अपनी चेतना को विकसित कर प्रज्ञा के स्तर तक ले जाएँ व ऋषियों के सविधान के इस राष्ट्र में लागू करें।
                                                                                                                        विश्वमित्र

Tuesday, June 2, 2015

आज का विचार

किसी सद उद्देश्य के ळिए जीवन भर कठिनाइयों से जूझते रहना ही महापुरुष होना है

कायर केवल नीति की बातें करते हैं, बहादुर उसकी रक्षा के लिए मर मिटते हैं