Sunday, January 24, 2016

योगिराज-श्यामचरण लाहिड़ी part-1

भगवान शंकर का विराट मंदिर ...। चहुँ ओर ‘ऊँ नमः शिवाय’ महामंत्र की गूँज! वायुमंडल घंटियों के नाद से तरंगित था। मंदिर के परिसर में एक छोटे से बालक ने प्रवेश किया । उसके संग थी, उसकी माता मुक्ताकेशी। बालक का पूरा नाम था-श्यामचरण लाहिड़ी।
     मंदिर की पवित्र सुरभि से श्यामा अभिभूत था । उसकी आँखें छोटी-छोटी थीं। पर जिज्ञासाओं की कुंड थीं। वह मंदिर की स्थूलता में सूक्ष्मता को ढूँढ़ रहा था। दृश्यों में अदृश्य को भाँप रहा था। एकाएक उसकी दृष्टि भगवान शिव की मूरत की ओर सरक गई। अनुपम आकर्षण ने उसे बाँध लिया। यह आकर्षण भौतिक चमक या गुलाबी गुलाबों के प्रति नहीं था। वैराग्य के सौन्दर्य ने उसे मोह लिया था। जटाजूट! तन पर रमी भस्म! साधनस्थ मुद्रा की भव्यता! महादेव के ध्यान की गहराई में मुँदे नेत्र श्यामा को भा गए थे। उनके भाल पर समाई अतुलनीय शांति श्यामा में जिज्ञासाओं की खलबली मचा रही थी।
     उसने माता मुक्ताकेशी से पूछा- ‘माँ! ये कौन से भगवान जी हैं? ये नेत्र मँूद कर ऐसे क्यों बैठे हैं?’ माता मुक्ताकेशी धार्मिक वृत्ति की थी। अपनी पूर्व जानकारी के आधार पर बोली- ‘श्याम! ये देवाधिदेव भगवान शिव हैं। ये नेत्र मूँद कर ध्यान में लीन हैं!’
     श्यामा- माँ! तुम कहती हो कि भक्त ध्यान लगता है, अपने भगवान को पाने के लिए। पर फिर भगवान किसको पाने के लिए ध्यान कर रहे हैं? भगवान शिव तो स्वयं भगवान हैं! फिर वे किसकी साधना कर रहे हैं?
     मँ निरुत्तर हो गई। झुंझलाती हुई बोली- ‘तेरी छोटी सी बुद्धि की ये बड़ी-बड़ी उलझनें मैं नहीं सुलझा सकती। तू शिव जी से ही पूछ, वे ध्यान लगाकर क्या-क्या करते रहते हैं? ... और अभी चल, लोटा जल से भर और मेरे साथ कुछ पूजा-अर्चना कर लें।’
     कुछ समय के बाद माँ-बेटा वापिस घर लौट आए। पर श्यामा का मन और हृदय वहीं ध्यानस्थ शिव-मूरत के पास छूट गया था। घर के छोटे से मंदिर में स्थापित शिव-मूर्ति के सामने खड़ा होकर वह अक्सर पूछा करता- ‘भगवान जी! आप ध्यान क्यों लगाते हो?’
     एक दिन-मुक्ताकेशी की साँसें फूल रही थीं। जान साँसत में थी। वह श्यामा को खोज-खोज कर थक गई थी। उसका कुछ अता-पता नहीं था। उसके सारे मित्रों के घर-आँगनों में वह फेरी लगा आई थी। पर श्यामा कहीं नहीं मिला था। दोपरी के बाद... श्यामा मिला।
     मगर किस स्थिति में? गाँव के एक सुनसान क्षेत्र के एक वृक्ष की छाँव में! ध्यान की अवस्था में बैठा हुआ। अपनी देह पर उसने मिट्टी मली हुई थी। नेत्र मूँदे हुए वह गहनता में लीन था। गज़ब का स्वरूप था उसका- इतना दिव्य! इतना भव्य!
     मुक्ताकेशी तो ठगी-सी रह गई। विचारों की विद्युत उसके मानस में कौंध पड़ी- ‘हाय राम! जिस आयु में बालक मिट्टी में खेलते हैं, कपड़े सनते हैं- उसमें यह श्यामा मिट्टी को भभूति की तरह तन पर रमाकर बड़े-बड़े संन्यासियों जैसे ध्यान कर रहा है! चैकड़ी मारकर, रीढ़ तान कर, ऐसा अडोल बैठा है- मानो साक्षात् शिव की प्रतिमा हो!.... सच! अद्भुत है, मेरा श्यामा!’
     कुछ क्षणों के बाद, श्यामा ने आँखें खोलीं! मुक्ताकेशी उसके समीप ही बैठी थी। पहले शब्द जो श्यामा के मुख से झरे, वे थे- ‘माँ! मैं जान गया, शिव ध्यान लगाकर क्या करते हैं?’
     मुक्ताकेशी (श्यामा के कंधों पर से मिट्टी झाड़ते हुए)- क्या जाना तूने?
     श्यामा (गहरी वाणी में)- एक दिन मैं भी वही कार्य करुँगा।
     मुक्ताकेशी- ऐसा क्या करते हैं शिव? और ऐसा क्या करना है तुझे, जो शिव करते हैं?
     श्यमा मौन रहा। उसके स्वर गहन तंद्रा में खो गए। शायद उसकी चेतना को दिव्य रहस्य खोलना अभी मंजूर नहीं थ। पर आगे चलकर.... स्वयं समय ने सकल समाज को इन सवालों का जवाब दिया।
     33 वर्ष की आयु में श्यामा को गुरु मिले- महावतार बाबा। पूर्व जन्मों की साधना प्रखर रूप से प्रकट हुई। सुषुप्ति में सोया गुरुत्व जागृत हुआ। यही श्यामा प्रतिष्ठित हुआ- सद्गुरु श्यामाचरण लाहिड़ी के रूप में! वही सद्गुरु- जो जीवंत शिव हुआ करते हैं। साक्षात् महेश्वर के प्रतिरूप!
     लाहिड़ी महाशय का एक शिष्य था- कृष्णराम- एकनिष्ठ गुरु भक्त! अनूठी प्रीति थी, उसकी गुरु-चरणों के प्रति! गुरु के हाथों में वह शिलावत समर्पण कर चुका था। इसलिए लाहिड़ी महाशय भी उसके अस्तित्व के हर स्तर पर शिव के समान आसीन थे।
     एक दिन... लाहिड़ी महाशय के श्री चरण बनारस की गलियों को पावन कर रहे थे। कृष्णराम उनके पद्चिह्नों का अनुसरण कर रहा था। भीड़भाड़ वाली गलियों से दोनों तनिक आगे निकलकर खुले मैदान में पहुँच गए। सहसा लाहिड़ी जी का स्वर उभरा- ‘कृष्णराम! कपड़े का एक टुकड़ा मुझे देना।’
     कृष्णराम में थोड़ा अचम्भा जागा। उसने बुद्धि के अश्व दौड़ाए और बोला- ‘गुरु जी, कहीं की सफाई करनी है, तो मुझे बताइए। मैं वहाँ कपड़ा फेर देता हँू।
     लाहिड़ी जी रहस्यमयी भाव से मुस्कुराए, बोले- ‘सफाई तो करनी है। पर वह तुम नहीं कर पाओगे। हमें ही करनी होगी।... लाओ, हमें एक कपड़े का टुकड़ा दो।’
     जब गुरु-वचन मन-बुद्धि की पकड़ में न आएँ, तो शिष्य को बेतर्क-बेशर्त समर्पण कर देना चाहिए। वही कृष्णराम ने किया। तुरन्त अपनी धोती की किनारी को फाड़ा और टुकड़ा लाहिड़ी जी को सौंप दिया।
     गुरु और शिष्य पुनः मैदान में आगे बढ़ने लगे। अभी कुछ ही क्षण बीते होंगे... मैदान के पास स्थित पहाड़ी पर जो रास्ता था, उससे एक बैलगाड़ी गुज़र रही थी। सहसा उसका पहिया एक पत्थर से टकराया और उससे एक टुकड़ा छिटककर नीचे लुढ़कने लगा। लुढ़कता हुआ वह सीधा लाहिड़ी महाशय की टाँगा से जा टकराया। ऐसा आघात किया कि वहाँ गहरा घाव बन गया।
     कृष्णराम चीखा- ‘गुरु जी!... आह! यह कैसे...? आप यहाँ आइए...इधर...इधर... इस वृक्ष की छाँव तले बैठिए।’ कृष्णराम ने सहारा देकर लाहिड़ी महाशय जी को बिठाया। फिर उसने घाव देखा, जो कि गहरा था। रक्त-धार देखकर वह बौरा सा गया। अफरा-तफरी में उसने अपने गमछे से घाव को साफ किया। फिर बदहवास स्थिति में बड़बड़ाया- ‘औषधि!.... मैं कहीं आसपास से औषधि लेकर आता हँू। आप तनिक यहीं ठहरिए।’
     इधर लाहिड़ी महाशय सहज थे, स्थिर थे। ठीक जैसे एक राजा द्रष्टा बनकर अपने ही आदेश को क्रियान्वित होते देखता है। उन्होंने मुस्कुराते हुए कपड़े का वही टुकड़ा जो पहले ही कृष्णराम से लेकर अपने पास रख लिया था, उसे अपनी टाँग पर बाँधा और खड़े हो गए।
     औषधि के लिए इधर जाऊँ या उधर- कृष्णराम दाएँ-बाएँ ताँक-झाँक कर रहा था। लाहिड़ी जी ने उसके कंधे पर अपना हाथ रखा, उसे थपथपाया और समझाया- ‘ठहर जा कृष्णराम! ठहर जा!... कहीं नहीं जाना। हमने उस कपड़े से पट्टी बाँध ली है। यदि औषधि की दरकार होती, तो हम उसे भी संग लेकर चलते।’
     गुरु के ये वचन कृष्णराम पर बिजली से कौंधे। घबराहट को चीरकर विवके का प्रकाश प्रगटा। कृष्णराम ने दोनों हाथ जोड़ दिए। ‘गुरु जी!... इसका अर्थ है, आप पहले ही जानते थे कि यह दुर्घटना घटने वाली है! इसीलिए वह कपड़े का टुकड़ा आपने लिया था। है न जी?’ - कृष्णराम ने उत्सुकता से पूछा। लाहिड़ी महाशय जी के होठों पर सरल सी हँसी खेल गई।
     कृष्णराम के मन का अवसाद वाणी में भर आया- ‘तो फिर गुरु जी, आपने अपनी रक्षा क्यों नहीं की? जब चट्टान लुढ़क रही थी, तब आप आगे या पीछे हो जाते। स्वयं को यह पीड़ा क्यों होने दी? कहिए न!...’
     योगीराज ने तिरछी दृष्टि से कृष्णराम की ओर निहारा और रहस्योद्घाटन किया- ‘क्योंकि पगले, हम स्वयं ही यह दुर्घटना होने देना चाहते थे। हमने तुझे कहा था न, हमें सफाई करनी पडे़गी- इस दुर्घटना से कर्म-संस्कारों की ही सफाई करनी थी हमें।’
     कृष्णराम- पर गुरु जी, आप तो कर्म-बंधनों से मुक्त हैं। आप पर किसी कर्म-संस्कार की गठरी नहीं, फिर आपने यह फल क्यों भोगा?
     योगीराज लाहिड़ी- अरे भोलेराम, ये मेरे नहीं, तेरे कर्म-संस्कारों का प्रतिफल था। नियति ने तुझे आजीवन अपाहिज़ बना देने के लिए आज का दिवस तय किया था। इस पत्थर का असहनीय आघात तेरी टाँग पर होना था।
     घाव देखकर कृष्णराम के कलेजे पर जो भार पड़ा था, वह इस बात को सुनकर और अधिक भारी हो गया। नयनों के किवाड़ों पर जो अश्रु थमे थे, वे अपनी सीमा लाँघ गए। कृष्णराम सुबकने लगा। उसका कंठ ऐसा रुंधा कि आगे कुछ पूछ नहीं पाया। उसकी अंतरात्मा कैलाश की उस ऊँची चोटी का दर्शन कर उठी, जहाँ गुरुदेव योगीराज लाहिड़ी जी साक्षात् शिव स्वरूप में स्थित थे! शिष्य के कर्म-संस्कारों के संहारक शिव!
     वापिस आश्रम में.... माता काशीमणि (लाहिड़ी जी की पत्नी) को कृष्णराम ने सारी बात बताई। वे औषधि व लेप आदि लेकर योगीराज के कक्ष में पहुँची। संग में कृष्णराम भी था, जो कृतज्ञता के भार से सिर नहीं उठा पा रहा था।
     काशीमणि (कक्ष में प्रवेश करते ही)- स्वामी, वह कृष्णराम बता रहा था कि....
     योगीराज लाहिड़ी- हाँ! हाँ!... छोटी-मोटी चोट ही है। कृष्णराम तो बतंगड़ बना रहा है।
     कृष्णराम मौन रहा। बस उसने झुककर योगीराज की धोती तनिक ऊपर की और काशीमणि को बंधी हुई पट्टी दिखाई। काशीमणि ने तुरन्त पट्टी खोली। यह क्या!! चर्म स्वस्थ थी। घाव था ही नहीं!...
     इतने में काशीमणि की नज़र दूसरी टाँग पर गई। उन्होंने वहाँ से धोती हटाकर देखा, तो बड़ा गहरा घाव वहाँ दिखाई दिया। काशीमणि अचम्भित! बौराई आँखों से वह कभी पट्टी देखतीं, कभी घाव, तो कभी योगीराज का मुखमंडल! कृष्णराम भी प्रहेलिका में उलझा था।
     योगीराज हँसते हुए बोले- ‘इसमें इतना अचकचाने की क्या बात है!... उस समय यह पगला कृष्णराम तो बदहवास था। औषधि के लिए इधर-उधर ताँक-झाँक कर रहा था। इसलिए मैंने स्वयं ही पट्टी बाँध ली थी। इसे संभालने के चक्कर में मुझे भी ध्यान नहीं रहा। मैंने गलती से दूसरी टाँग पर पट्टी बाँध ली।... चलो छोड़ो! लाओ, भई लाओ, लेप लगाओ इस घाव पर!’
     कृष्णराम- आप और गलती? जो गुरुदेव विधि के जटिल गणित में हेर-फेर कर अपने नए समीकरण बनाते हैं- वे पट्टी बाँधने में गलती कर दें! ऐसा मैं मान ही नहीं पा रहा, योगीराज। आप मुझे क्या समझना चाहते हैं, कृपया स्पष्ट शब्दों में समझाएँ।
     योगीराज लाहिड़ी- कृष्णराम! घाव दे हके हैं। पीडाएँ देह की हैं। तू देह में रहता है, इसलिए इन यातनाओं से बद्ध है। मैं आत्मा में रहता हँू, ब्रह्म में स्थित हँू। इसलिए मुझे ये पीड़ा-तीड़ा नहीं व्यापती। पंचभूत निर्मित देह लेकर इसीलिए साकार होता हूँ ताकि...

     कृष्णराम (सुबकता हुआ)-ताकि मुझ जैसे निम्न कोटि के, देहासक्त साधक के कर्म-संस्कारों को अपनी देह पर भोग सकें! हैं न जी?... परन्तु गुरुदेव, आपकी यह पावन-पुनीत देह संसार के लाखों अनुयायिों के जीवन का केन्द्र है। यह मेरे कारण आहत हो, यह मुझे गंवारा नहीं। हे योगीराज! मैं संकल्प करता हँू, ऐसी साधना करुँगा कि मेरे पूर्व कर्म-संस्कार ज्ञानाग्नि में दग्ध हो जाएँ! मन-वचन-कर्म से आपको इतना समर्पित रहूँगा कि नए कर्म-संस्कारों की गठरी न बनने पाए।    

Monday, January 4, 2016

अनन्त सुप्त शक्तियों का भाँडागार-सहस्त्र कमल


शास्त्रों में कुण्डलिनी को अनेक शक्तियों का प्राण कहा है। सुषुप्त पड़ी कुण्डलिनी को जागृत कर लेने वाला इस लोक के अनन्त ऐश्वर्य का स्वामी वन जाता है। भारतवर्ष में इस विद्या की शोध की गई है। कुण्डलिनी शक्ति की कोई सीमा और थाह नहीं है।
किन्तु कुण्डलिनी जागृत कर लेना जीव का अन्तिम लक्ष्य नहीं है। जीव का अन्तिम लक्ष्य है मोक्ष की प्राप्ति या ब्रह्म निर्वाण। अपने आपको ब्रह्म की सायुज्यता में पहुँचा देना ही मनुष्य देह धारण करने का उद्देश्य है अनेक साधन और योग उसी के लिये बने हैं। कुण्डलिनी का भी वही उद्देश्य है उस पर अपनी टिप्पणी करते हुए योग प्रदीपिका में लिखा है-
उद्घाटयेत्कपार्ट तु यथा कुँचिकया हठात्।
कुँडलिन्या तथा योगी मोक्ष द्वारं विभेदयेत्॥
(105)
अर्थात् जिस प्रकार कोई मनुष्य अपने बल से द्वार पर लगी हुई अगँला आदि को ताली से खोलता है उसी प्रकार योगी कुण्डलिनी के अभ्यास द्वारा सुषुम्ना के मार्ग का भेदन करता है और ब्रह्म-लोक में पहुँच कर मोक्ष को प्राप्त होता है।
शिर के मध्य से (ब्रह्मरंध्र) में 1 हजार पंखुड़ियों का कमल है उसे ही सहस्रार चक्र कहते हैं उसी में ब्राह्मी शक्ति या शिव का वास बताया गया है यहीं आकर कुण्डलिनी शिव से मिल गई है। इसे आत्मा का स्थान, सूत्रात्मा धाम आदि कहते हैं। यहीं से सारे शरीर की गतिविधियों का उसी प्रकार संचालन होता है जिस प्रकार पर्दे में बैठा हुआ कलाकार उँगलियों को गति दे-देकर कठपुतलियों को नचाया करता है। विराट् ब्रह्माण्ड में हलचल पैदा करने वाली सूत्र शक्ति और विभाग इस सहस्रार कमल के आसपास फैल पड़े हैं। यहीं अमृत पान का सुख, विश्व-दर्शन संचालन की शक्ति और समाधि का आनन्द मिलता है। यहाँ तक पहुँचना बड़ा कठिन होता है। अनेक साधक तो नीचे के ही चक्रों में रह जाते हैं उनमें जो आनन्द मिलता है उसी में लीन हो जाते हैं। इसलिये कुण्डलिनी साधना द्वारा मिलने वाली प्रारम्भिक सिद्धियों को बाधक माना गया है। जिस प्रकार धन-वैभव ऐश्वर्य और सौंदर्यवान युवती पत्नियों का सुख पाकर मनुष्य संसार को ही सब कुछ समझ लेता है उसी प्रकार कुण्डलिनी का साधक भी बीच के ही छः चक्रों में दूर दर्शन, दूर श्रवण, दूसरों के मन की बात जानना, भविष्य दर्शन आदि अनेक सिद्धियाँ पाकर उनमें ही आनन्द का अनुभव करने लगता है और परम-पद का लक्ष्य अधूरा ही रह जाता है।
सहस्रार चक्र में पहुँच कर भी साधक बहुत समय तक उस पर स्थिर नहीं रह पाते हैं। वह साधक की आन्तरिक और आध्यात्मिक शक्ति तथा साधना के स्वरूप पर निर्भर है कि वह सहस्रार में कितने समय तक रहता है उसके बाद वह फिर निम्नतम लोकों के सुखों में जा भटकता है पर जो अपने सहस्रार को पका लेते हैं वह पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त कर अनन्त काल तक ऐश्वर्य सुखोपभोग करते हैं।
सहस्रार दोनों कनपटियों से 2-2 इंच अन्दर और भौहों से भी लगभग 3-3 इंच अन्दर मस्तिष्क के मध्य में “महाविवर” नामक महाछिद्र के ऊपर छोटे से पोले भाग में ज्योति-पुँज के रूप में अवस्थित है। कुण्डलिनी साधना द्वारा इसी छिद्र को तोड़ कर ब्राह्मी स्थिति में प्रवेश करना पड़ता है इसलिये इसे “दशम द्वार” या ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं।
इस स्थान पर पहुँचने की शक्यों का वर्णन करते हुए शास्त्रकार ने कहा है-तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारी भवति” अर्थात् वह परम विज्ञानी, त्रिकालदर्शी और सब कुछ कर सकने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है वह चाहे जो कुछ करे उसे कोई पाप नहीं होता। उसे कोई जीत नहीं सकता।
ब्रह्मरंध्र एक प्रकार से जीवात्मा का कार्यालय इस दृश्य जगत में जो कुछ है और जहाँ तक हमारी दृष्टि नहीं पहुँच सकती उन सबकी प्राप्ति की प्रयोगशाला है। भारतीय तत्त्वदर्शन के अनुसार यहाँ 17 तत्त्वों से संगठित ऐसे विलक्षण ज्योति पुँज विद्यमान् हैं जो दृश्य जगत में स्थूल नेत्रों से कहीं भी नहीं देखे जा सकते। समस्त ज्ञानवाहक सूत्र और बात नाड़ियाँ यहीं से निकल कर सारे शरीर में फैलती हैं। सूत्रात्मा इसी भास्कर श्वेत दल कमल में बैठा हुआ चाहे जिस नाड़ी के माध्यम से शरीर के किसी भी अंग को आदेश-निर्देश और सन्देश भेजता ओर प्राप्त करता रहता है। वह किसी भी स्थान में हलचल पैदा कर सकता है किसी भी स्थान की बिना किसी बाध्य-उपकरण के सफाई ओर प्राणवर्धा आदि, जो हम सब नहीं कर सकते वह सब कुछ कर सकता है। यह सब ज्योति पुञ्जों के स्स्रण आकुंचन-प्रकुञ्चन आदि से होता है। नाक, जीभ, नेत्र, कर्ण, त्वचा इन सभी स्थूल इन्द्रियों को यह प्रकाश-गोलक ही काम कराते हैं और उन पर नियन्त्रण सहस्रारवासी परमात्मा का होता है। ध्यान की पूर्वावस्था में यह प्रकाश टिमटिमाते जुगनू चमकते तारे, चमकीली कलियाँ, मोमबत्ती, आधे या पूर्ण चन्द्रमा आदि के प्रकाश-सा झलकता है। धीरे-धीरे उनका दिव्य रूप प्रतिभासित होने लगता है उससे स्थूल इन्द्रियों की गतिविधियों में शिथिलता आने लगती है और आत्मा का कार्य-क्षेत्र सारे विश्व में प्रकाशित होने लगता है। सामान्य व्यक्ति को केवल अपने शरीर और सम्बन्धियों तक ही चिन्ता होती है उस पर योगी की व्यवस्था का क्षेत्र सारी पृथ्वी, और दूसरे लोकों तक फैल जाता है उसे यह भी देखना पड़ता है कि ग्रह-नक्षत्रों की क्रियायें भी तो असंतुलित नहीं हो रही। स्थूल रूप से इन गतिविधियों से पृथ्वी वासी भी प्रभावित होते रहते हैं इसलिये अनजाने में ही ऐसी ब्राह्मी स्थिति का साधक लोगों का केवल हित संपादित किया करता है। उसे जो अधिकार और सामर्थ्य मिली होती हैं वह इतने बड़े उत्तरदायित्व को संभालने की दृष्टि से ही होती है। वैसे वह भले ही शरीरधारी दिखाई दे पर उसे शरीर की सत्ता का बिलकुल ज्ञान नहीं होता। वह सब कुछ जानता, देखता, सुनता और आगे क्या होने वाला है वह सब पहचानता है।

विज्ञानमय कोष और मनोमय कोष के अध्यक्ष मन और बुद्धि यहीं रहते हैं और ज्ञानेन्द्रियों से परे दूर के या कहीं भी छिपे हुए पदार्थों के समाचार पहुँचाते रहते हैं। आत्म-संकल्प जब चित्त वाले क्षेत्र से बुद्धि क्षेत्र में पदार्पण करता है तब दिव्य दृष्टि बनती है और वह आज्ञा चक्र से निकल कर विश्व ब्रह्माण्ड में जो अनेक प्रकार की रश्मियाँ फैली हैं उनसे मिलकर किसी भी लोक के ज्ञान को प्राप्त कर लेती है। विद्युत तरंगों के माध्यम से जिस प्रकार दूर के अन्तरिक्ष यानों को पृथ्वी से ही दाहिने-बायें (ट्रीवर्स) किया जा सकता है। जिस प्रकार टेलीविजन के द्वारा कहीं का भी दृश्य देखा जा सकता है उसी प्रकार बुद्धि और संकल्प की रश्मियों से कहीं के भी दृश्य देखे जाना या किसी भी हलचल में हस्तक्षेप करना मनुष्य को भी सम्भव हो जाता है। मुण्डक और छान्दोग्य उपनिषदों में क्रमशः खण्ड 2 और 9 में इन साक्षात्कारों का विशद वर्णन है और कहा गया है-हिरण्यभये परेकोणे विरजं ब्रह्म निष्फलं, तच्छुत्रं ज्योतिषाँ ज्योति तद् परात्मनो बिदुः” अर्थात् आत्मज पुरुष इस हिरण्मयं कोष में शुभ्रतम ज्योति के रूप में उस कला रहित ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं।

धीरे-धीरे विज्ञान भी इन मान्यताओं पर पहुँचने लगा है। पाश्चात्य देशों में मस्तिष्क के अनेक आश्चर्यजनक तथ्यों की खोज की गई है। यद्यपि अभी उनकी जानकारी बहुत स्वल्प और सीमित है तथापि उससे भारतीय तत्त्व दर्शन की पुष्टि को बड़ा बल मिला है। लोग यह मानने लगे हैं कि मस्तिष्क में ऐसे तत्त्व हैं जो अधिक नहीं तो किसी भी पुस्तक के 20 अरब पृष्ठों से भी अधिक ज्ञान भण्डार अपने मस्तिष्क में सुरक्षित रख सकते हैं। एक व्यक्ति एक दिन में लगभग 50 लाख चित्र देखता है। चित्रों के साथ ही वह उनकी बनावट, रंग-रूप ध्वनि, सुगन्ध और मनोभावों का भी आकलन करता है। कुछ समय बाद वह चित्र और पढ़ा हुआ सब विस्तृत हो जाता है। हम केवल यह बातें याद रख पाते हैं जो या तो बहुत आकर्षक रहीं हो अथवा जिनसे अपने जीवन का कोई अंश या सम्पूर्ण जीवन बहुत तीव्रता से प्रभावित हुआ है। ऐसी अविस्मरणीय घटनाओं को छोड़ कर शेष सब भूल जाता है किन्तु ऐसा सोचना भारी भूल है। जिस तरह प्रभावी घटनाओं को हम सेकेण्डों में दोहरा लेते हैं उसी प्रकार मस्तिष्क के तहखानों में संगृहीत प्रति सेकेण्ड एक चित्र की दर से अब तक जो कुछ देख, सुन सके हैं उस सबको कभी भी किसी भी समय मस्तिष्क की पेटी से खोलकर ढूँढ़ा और उसी तरह रंग, वर्ण, सुगन्ध आदि के साथ देखा जा सकता है जिस तरह किसी समय देखा गया है।
इस दिशा में प्रसिद्ध अमरीकी डाक्टर बिल्डर पेनफील्ड ने उल्लेखनीय खोजें की हैं। उन्होंने मस्तिष्क की अनेक बात नाड़ियों की विद्युत इलेक्ट्रान छुआकर देखा कि कोई विशेष नस या नाड़ी उत्तेजित करने से विलक्षण याददाश्तें आती हैं। उन्होंने एक एक बार 9 वर्षीय लड़की पर प्रयोग किया। मस्तिष्क के एक भाग पर विद्युत आवेश देते ही वह एक घटना सुनाने लगी-मैं अपने भाइयों के साथ खेत में घूम रही थी। मेरे भाई मुझे चिढ़ाने के लिये खेत में छुप-छुप जाते। इस तरह मैं उनसे भटक गई तभी एक आदमी दिखाई दिया। कोई सपेरा था। उसने मुझे साँपों का थैला दिखाया तो मैं डर गई और भागकर हाँफते हुए घर पहुँची।”
जब डा.पेनफील्ड ने उस लड़की की माता से पूछा तो माता ने बताया कि सचमुच जब वह 3 वर्ष की थी तब ऐसी घटना घटी थी। आमतौर पर 3 वर्ष की बालिका को कोई घटनायें याद नहीं रहतीं पर इस प्रयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि मनुष्य के मस्तिष्क में न जाने कितने जीवनों के संस्कार छिपे पड़े हैं और वह फिल्म की रील की तरह जाग्रत और स्वप्नावस्था में गूँजते रहते हैं।
यह घटना ऐसी थी जो केवल वर्तमान जीवन के ही अदृश्य भाग से सम्बन्धित थी पर एक बार उन्होंने एक लड़के पर जब ऐसा ही प्रयोग किया तो वह लड़का एक मधुर गीत गुनगुनाने लगा। वह गीत रिकार्ड पर लिया गया। यद्यपि उसे वह लड़का भी नहीं जानता था पर पीछे पता लगाने पर मालूम हुआ कि वह गीत किसी अन्य भाषा का अर्थयुक्त सुन्दर गीत था। इस घटना को मस्तिष्क की “सर्वज्ञता” शक्ति के रूप में भी लिया जा सकता है और पुनर्जन्म के भी रूप में। किसी भी रूप में ले सूत्रात्मा की अमरता या उनकी अक्षय शक्ति ही सिद्ध होती है। डा.पेनफील्ड ने अनेक ऐसे प्रयोग किये जो कर्मफल की भी पुष्टि करने में समर्थ हैं।
डा. पेनफील्ड के पास ऐसा रोगी आया जिसे मिर्गी आती थी। उसका आपरेशन करके उन्होंने देखा कि जब मिर्गी आती है तो एक विशेष नस ही उत्तेजित होती है उसे काटकर अलग कर दिया तो वह रोगी सदा के लिए अच्छा हो गया। बाद में पेनफील्ड ने बताया कि मस्तिष्क में कई अरब प्रोटीन-अणु पाये जाते हैं इन प्रोटीन-अणुओं में औसत आयु 70 वर्ष के लगभग सवा दो अरब सेकेण्ड होते हैं इन क्षणों में जागृत स्वप्न में वह जो कुछ देखता, सुनता और अनुभव करता है वह सब मस्तिष्क के कार्यालय में जमा रहता है और उसमें से किसी भी अंश को विज्ञान की मदद से पढ़ा जाना सम्भव है। मस्तिष्क के 10 अरब स्नायु नसों में अगणित आश्चर्य संगृहीत है उन सबकी विधिवत् जानकारी करने वाला कोई यन्त्र बना सका तो जीव किन-किन योनियों में कहाँ-कहाँ जन्म लेकर आया है और उसने कब क्या पाप, क्या पुण्य किया है उस सबकी जानकारी प्राप्त करना सम्भव हो जायेगा। उन सबकी याददाश्त दिलाने वाला सहस्रार में बैठा हुआ वह क्रिस्टल मात्र है जिसे हमारे धर्म ग्रन्थों में सूक्ष्मात्मा कहते हैं।
इस आचरण की पुष्टि के लिये हनावा होकाइशी (जापान) का एक उदाहरण दिया जा सकता है। 101 वर्ष की आयु में मरने वाले इस ज्ञान के अवतार का जन्म सन् 1722 में हुआ था और मृत्यु 1883 में। जब वह सात वर्ष का था विधाता ने उससे नेत्र-ज्योति छीन ली। उसने नेत्रहीन होकर भी ज्ञानार्जन की साधना आरम्भ की। उसने 40 हजार पुस्तकें पढ़ीं। कुछ ग्रन्थ तो उसे केवल एक बार ही सुनाये गये थे। उसके मस्तिष्क में ज्ञान का अनन्त भण्डार जमा हो गया। वह ऐसे उदाहरण प्रस्तुत कर देता था जो कभी औरों की कल्पना में भी न आते थे। अपने मित्रों के आग्रह पर उसने एक पुस्तक लिखी जो 2810 खण्डों में तैयार हुई। क्या इसे मस्तिष्क की साधारण शक्ति कहा जा सकता है?
कुछ वर्ष पूर्व इच्छा शक्ति के चमत्कारों का प्रत्यक्ष प्रदर्शन के लिए डॉ. एलेक्जेण्डर ने एक सार्वजनिक प्रदर्शन मैक्सिको में किया था। प्रदर्शन यह था कि आकाश में छाये बादलों को किसी भी स्थान से- किसी भी दिशा में हटाया जा सकता है और उसे कैसे ही शकल दी जा सकती है। उन्हें बुलाया जा भगाया जा सकता है। नियत समय पर प्रदर्शन हुआ। उस समय आकाश में एक भी बादल नहीं था। पर प्रयोगकर्ता ने देखते-देखते घटायें बुला दीं और दर्शकों की माँग के अनुसार बादलों के टुकड़े अभीष्ट दिशा में बखेर देने और उनकी विचित्र शक्लें बना देने का सफल प्रदर्शन किया।
अमेरिका के अलवामा राज्य में ‘गाड्स डेन’ नगर के समीप एक इसी प्रकार का आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न युवक फ्रैंक रेन्स रहता है। उसे सिर्फ अंग्रेजी ही आती है। इस युवक की विशेषता यह है कि आप दुनिया की कोई भी भाषा उसके सामने किसी भी लहजे में बोलें, वह आप के साथ-साथ उसी लहजे में धारा प्रवाह बोलता चला जायेगा। एक शब्द के बाद दूसरा कोन-सा शब्द बोला जाएगा यह उसे खुद-ब-खुद मालूम हो जाता है और सेकेंड का भी अन्तर किये बिना वह सारी बातें उस व्यक्ति के साथ-साथ बोलता चला जाता है। इसे देखने में ऐसा लगता है मानो एक ही ग्रामोफोन से बस्टिरियों की तरह दो लाउडस्पीकर जुड़े हुए हों। टी. वी. के कुछ कार्यक्रमों में फैंकरेन्स ने गाने भी गाये। गीत साथ वाले गायक के स्वर लय से मिलाकर इस प्रकार गाया गया मानो फ्रैंक को वह गीत पहले से ही आता हो। एक अन्य अवसर पर रेन्स को लोलोब्रिगिडा नामक एक महिला से पाला पड़ा। वह अनेक भाषाएँ जानती थी, किन्तु फ्रैंक उन सभी भाषाओं को उसी प्रकार दोहराता गया जैसे वह महिला बोल रही थी। लोलोब्रिगिडा ने कुछ बनावटी शब्द भी कहे जिनका न तो कोई अर्थ था न ही वे किसी भाषा से संबद्ध थे। पर फ्रैंक ने उन्हें ज्यों का त्यों दुहरा दिया।

वैज्ञानिकों के लिए अतीन्द्रिय क्षमताएँ चुनौती और गुत्थी बनकर खड़ी हैं जो उनके वैज्ञानिक नियमों को ऐसे लांघ जाती हैं जैसे वायु बहुमंजिली इमारतों को। इटली का गियोवानी गलान्ती रात के अन्धेरे में ऐसे पढ़ता है जैसे सूरज की रोशनी में सामान्य आदमी। जम्मू शिक्षा विभाग के एक कर्मचारी गोपीकृष्ण साधारण हिन्दी पढ़े हैं, छोटी कक्षाओं के अध्यापक थे। एक बार उन्हें ऐसा लगा कि वे कई भाषाएँ जानते हैं। तब से वे जर्मन, फ्रेंच, ग्रीक, अरबी, संस्कृत आदि कई भाषाओं में न केवल वार्तालाप करने लगे वरन् भावभरी कविताएँ भी रचने लगे। उस विलक्षण उभार के सम्बन्ध में अनेक अनुसंधानकर्ताओं ने खोजबीन भी की है।

Thursday, December 31, 2015

नव वर्ष की शुभ कामनाएँ

Wish You a Bright, Prosperous, Healthy and Spiritual new year 2016
दुनियाँ में जितने धर्म, सम्प्रदाय, देवता और भगवानों के प्रकार हैं उन्हें कुछ दिन मौन हो जाना चाहिये और एक नई उपासना पद्धति का प्रचलन करना चाहिए जिसमें केवल “माँ” की ही पूजा हो, माँ को ही भेंट चढ़ाई जाये?
माँ बच्चे को दूध ही नहीं पिलाती, पहले वह उसका रस, रक्त और हाड़-माँस से निर्माण भी करती है, पीछे उसके विकास, उसकी सुख-समृद्धि और समुन्नति के लिये अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है। उसकी एक ही कामना रहती है मेरे सब बच्चे परस्पर प्रेमपूर्वक रहें, मित्रता का आचरण करें, न्यायपूर्वक सम्पत्तियों का उपभोग करें, परस्पर ईर्ष्या-द्वेष का कारण न बनें। चिर शान्ति, विश्व-मैत्री और “सर्वे भवन्ति सुखिनः” वह आदर्श है, जिनके कारण माँ सब देवताओं से बड़ी है।
हमारी धरती ही हमारी माता है यह मानकर उसकी उपासना करें। अहंकारियों ने, दुष्ट-दुराचारियों स्वार्थी और इन्द्रिय लोलुप जनों ने मातृ-भू को कितना कलंकित किया है इस पर भावनापूर्वक विचार करते समय आंखें भर आती है। हमने अप्रत्यक्ष देवताओं को तो पूजा की पर प्रत्यक्ष देवी धरती माता के भजन का कभी ध्यान ही नहीं आया। आया होता तो आज हम अधिकार के प्रश्न पर रक्त न बहाते, स्वार्थ के लिये दूसरे भाई का खून न करते, तिजोरियाँ भरने के लिये मिलावट न करते, मिथ्या सम्मान के लिये अहंकार का प्रदर्शन न करते। संसार भर के प्राणी उसकी सन्तान-हमारे भाई हैं। यदि हमने माँ की उपासना की होती तो छल-कपट ईर्ष्या-द्वेष दम्भ, हिंसा, पाशविकता, युद्ध को प्रश्रय न देते। स्वर्ग और है भी क्या, जहाँ यह बुराइयाँ न हों वहीं तो स्वर्ग है। माँ की उपासना से स्वर्गीय आनंद की अनुभूति इसीलिये यहीं प्रत्यक्ष रूप से अभी मिलती है। इसलिये मैं कहता हूँ कि कुछ दिन और सब उपासना पद्धति बंद कर केवल “माँ” की मातृ-भूमि की उपासना करनी चाहिये।


-स्वामी विवेकानन्द

Saturday, December 19, 2015

NEEM KAROLI



New Pocket Book Rs 10/- Page 80

BABAJI, ACHARYAJI and ex President of India V.V. Giriji

Bharat Ratan V. V. Giri had deep faith in a saint of North India called Neem Karoli Baba. Once when he visited Baba the great saint said: Today our country lacks saints, reformers and true thinkers. Regarding himself Baba said: I carry out a few austerities but Pandit Shriram Sharma Acharya along with being a high stature personality of penance and a spiritual visionary is a saint, reformer and thinker. He writes a lot on great sacred thinking. Our country’s youth must learn a lot from him. 


Sunday, November 15, 2015

संवेदनहीन भारत की दीपावली


            21वीं सदी में लोगों ने भले ही शिक्षा, विज्ञान व समृद्धि में कितनी ही प्रगति कर ली हो परन्तु संवेदनहीनता की सभी हदें पार कर डाली हैं। धन के होने का अर्थ है उसके पास प्रकृति के सााि खिलवाड़ करने की क्षमता भी है। उसे अपने धन का उपयोग अपने अहं व मनोरंजन के लिए प्रकृति व पर्यावरण के विनाश के लिए प्रयोग करने की खुली छूट हमारे समाज, हमारे  प्रशासन ने दे रखी है। वास्तव में किसी ने सत्य कहा है-
कनक कनक ते सौ गुनी,मादकता अधिकाय।
इहि खाए बौराए दें,इहि पाए बौराए।।
दीपावली के अवसर पर जहाॅं लोगों को सरसों के तेल के दीपक जलाकर वायु प्रदूषण को समाप्त करना था वहाॅं हवा को पटाखों के द्वारा 23 गुणा अधिक जहरीला बना दिया गया। यह आंकड़ा है भारत की राजधानी दिल्ली का जहाॅं सबसे अधिक सभ्य जनता व सर्वोच्च राजनैतिक तन्त्र विराजमान है। लोग ज्यादा और महंगी पटाखेबाजी करके अपनी शान दिखाने की होड़ में यह भूल जाते हैं कि उनको इस कुकृत्यों का कितना घातक परिणाम पूरी मानव जाति को झेलना पडेगा।
            प्रशासन का निकम्मापन देखिए वह मात्र लोगों को अपिल भर कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के बीस प्रदूषित शहर में से तेरह भारत में हैं। उस पर भी दिल्ली का नंबर सबसे पहले है फिर भी हमारी जनता और प्रशासन प्रर्यावरण के प्रति बिलकुल सजग नहीं है। क्या केवन AIIMS व अन्य बड़े अस्पताल खोलकर लोगों के स्वास्थ्य को सुधारा जा सकता है। क्या केवल विकास-विकास व आर्थिक सुधारों के दम पर लोगों को खुशहाल किया जा सकता है। नहीं इसके लिए चाहिए संवेदनशील व्यक्तित्व जिसका लोप भारत की धरती से होता चला जा रहा है। मूर्खता की हदें हमने पार कर दी हैं पर्यावरण को रोंद कर हम अपनी कब्रे खोद रहे हैं व उसको भी बड़ी शान समझ रहे हैं। क्या अंतर रह गया है एक पशु और एक मानव में। सभ्य मानव, अमीर व बड़े आदमी का दायित्व है कि लोगों के सामने एक अच्छा आदर्श प्रस्तुत करे परन्तु दुर्भाग्य है देश का कि हम सब विवेकहीनता के वशीभूत होकर भेड़चाल में चलकर कुछ भी अनर्थ करके अपने को बड़ा आदमी समझने लग जाते हैं।

विडम्बना यह भी है कि इस तरह के प्रदूषण को रोकने का जिम्मा जिन विभागों पर है वे भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन ईमानदारी से नहीं करते। लोगों से पटाखों पर रोक की अपील कारगर नहीं होती। इसलिए उत्पादन और आपूर्ति के स्तर पर पटाखों की घातकता पर रोक लगाई जानी चाहिए। जो रासायनिक पदार्थ सेहत पर नुकसानदायक असर डालते हैं उनके प्रयोग पर रोक तथा उनके विकल्प के उपयोग के लिए पटाखा  उत्पादकों को प्रेरित  किया जाना चाहिए। सल्फर डाईआॅक्साइड आदि अस्थमा व ब्रोंकाइटिस के रोगियों के लिए घातक साबित होता है। इसके अलावा रंगीन आतिशवाजी में प्रयोग होने वाले तांबे, बेरियम, और स्ट्रेटियंग जैसी धातुओं के उपयोग पर रोक लगनी चाहिए। ये पदार्थ प्रदूषण फैलाने में ज्यादा भूमिका  निभाते हैं। दूसरी कोशिश ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों पर रोक की होनी चाहिए। पश्चिम बंगाल की पहल इस दिशा में सार्थक साबित हुर्ह है। अमूमन पटाखों के शोर के स्तर के लिए कट-आॅफ 145 डेसीबल रखी गई है जो काफी ज्यादा है। पश्चिम बंगाल में इस घटाकर 90 डेसीबल किया गया है। इस प्रयास ने पटाखों से होने वाले प्रदूषण व ध्वनि प्रदूषण को कम करने में मदद की है। दरअसल यह त्योहारी प्रदूषण एक गंभीर मामला है जिसे गंभीरता से लेते हुए तत्काल कदम उठाने की जरुरत है।

Thursday, November 5, 2015

युग के विश्वामित्र का आवाहन last page

महाकाल के संकल्प युग परिवर्तन की पूर्ति हेतु सूक्ष्म जगत् से प्रचण्ड प्रवाह  धरती पर भेजा जा रहा है। परन्तु लौकिक जगत् में गुड़ गोबर सब एक हो जाने से कोई भी महत्वपूर्ण कदम इस दिशा में आगे नहीं बढ़ रहा है।
            गुड़ गोबर एक हो जाने का अर्थ है कि इस अभियान में बहुत से ऐसे लोगों की घुसपैठ हो गई है जो युग निर्माण के नाम पर अपने अहं, स्वार्थ व महत्त्वाकांक्षाओं का ही पोषण कर रहे हैं। जो संगठन को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है। जैसे नेता देश सेवा के नाम पर वोट माॅंगते हैं पर इसके पश्चात् क्या-क्या नहीं करते, यह किसी से छुपा नहीं है। क्या कारण है कि पाॅंच करोड़ लोगों का एक विशाल तन्त्र समाज पर अपना कोई विशेष प्रभाव नहीं दिखा पा रहा है। जबकि आचार्य जी के अनुसार ‘जिस दिन 24 लाख लोग कदम से कदम मिला कर इस अभियान को पूरा करने के लिए आगे बढ़ेंगे उस दिन युग निर्माण के सूर्य को चमकने से कोई नहीं रोक सकेगा।’
            युग निर्माण अभियान की सफलता के लिए साहसी, तपस्वी, बुद्धिमान, जुझारू व संवेदनशील 24,000 नायकों की आवश्यकता है जो ब्रह्मकमल के रूप् में खिलकर भारत की इस धरती को अपनी सुगन्ध से सुभाषित कर सकें व देवसत्ताओं की आशाओं पर खरे उतर सकें।

             भारत की 24 करोड़ की धर्म पारायण जनता से यदि केवल 24,000 सुपात्र आत्माओं का चयन कर उनको उच्च स्तरीय साधनाओं के द्वारा पोषित कर उनका संगठन बनाकर ब्रह्मास्त्र के रूप् में प्रयोग किया जाए तो इस धरती से शीघ्र ही असुरी शक्तियों का विनाश सम्भव है। परन्तु कठिनाई यह है कि व्यक्तिगत स्वार्थों व पद-प्रतिष्ठा के मोह में फंसे महानुभावों को यह बात समझ आए कैसे। भगवान की इस इच्छा की पूर्ति के लिए जिन दिव्य आत्माओं को भीतर यह तड़प उत्पन्न हो रही है उनके आवाह्न के लिए ही यह पुस्तक ‘युग के विश्वामित्र का आवाह्न’ लिखी जा रही है।
विश्वामित्र राजेश

Wednesday, October 28, 2015

एसिडिटी का घरेलू उपचार (HOME REMEDIES FOR ACIDITY)

शायद ही कोई एसिडिटी शब्द से अपरिचित होगा।आजकल की भागदौड भरी और अनियमित जीवनशैली के कारण पेट की समस्या आम हो ली है।एसिडिटी को चिकित्सकीय भाषा में गैस्ट्रोइसोफेजियल रिफलक्स डिजीज (GERD) के नाम से जाना जाता है। आयुर्वेद में इसे अम्ल पित्त कहते हैं। आज इससे हर दूसरा व्यक्ति या महिला पीडि़त है। एसिडिटी होने पर शरीर की पाचन प्रक्रिया ठीक नहीं रहती। एसिडिटी का प्रमुख लक्षण है रोगी के सीने या छाती में जलन। अनेक बार एसिडिटी की वजह से सीने में दर्द भी रहता है, मुंह में खट्टा पानी आता है। जब यह तकलीफ बार-बार होती है तो गंभीर समस्या का रूप धारण कर लेती है। एसिडिटी के कारण कई बार रोगी ऐसा महसूस करता है जैसे भोजन उसके गले में आ रहा है या कई बार डकार के साथ खाना मुँह में आ जाता है। रात्रि में सोते समय इस तरह की शिकायत ज्यादा होती है। कई बार एसिड भोजन नली से सांस की नली में भी पहुंच जाता है, जिससे मरीज को दमा या खांसी की तकलीफ भी हो सकती है। कभी-कभी मुंह में खट्टे पानी के साथ खून भी आ सकता है।एसिडिटी तभी होती है, जब पेट में एसिड का अधिक स्राव होने लगता है. जब यह स्राव तेज हो जाता है, तो हमें अंदर से ऐसा महसूस होता है कि हमारा सीना जल रहा है. ज्यादातर ऐसा तभी होता है जब हम तेज मिर्च मसाले वाला भोजन खाते हैं। 

एसिडिटी का घरेलू इलाज :
१. एसिडिटी होने पर चाय काफी का सेवन कम कर देना चाहिए। ग्रीन टी का सेवन लाभप्रद होता है। 
२. अधिक से अधिक हरी सब्जियों का खासकर जिन सब्जियों में विटामिन बी और ई हो, सेवन करना चाहिए।जैसे की सहजन, बीन्स, कद्दू, पत्ता गोभी, प्याज और गाजर। 
३. खाना खाने के बाद तरल पेय का सेवन न करें। आधे घंटे के बाद ही गुनगुना नीबू पानी पियें। 
४. खाने में केला,खीरा,,ककड़ी, तरबूज, नारियल पानी धनिये पुदीने की चटनी और बादाम की शिकंजी का सेवन करना चाहिए। 
५. सौंफ और चन्दन  का सर्बत बना कर पीने से पेट की जलन को शांत किया जा सकता है। 
६. नींबू और शहद में अदरक का रस मिलाकर पीने से, पेट की जलन शांत होती है।
७. एसिडिटी में पाइनेपल के जूस का सेवन करने से विशेष फायदा होता है क्योकि यह एंजाइम्स से भरा होता है. खाने के बाद अगर पेट अधिक भरा व भारी महसूस हो रहा है, तो आधा गिलास ताजे पाइनेपल का जूस पीएं. सारी बेचैनी और एसिडिटी खत्म हो जाएगी। 
८. ज्यादा स्मोकिंग करना और ज्यादा शराब पीने से बचना चाहिए, इसके बदले में अच्छी क्वालिटी के च्युंगम,कच्ची सौंफ  या लौंग चबाना चाहिए। 
९. दही के छाछ में भुना हुआ पिसा जीरा डाल कर सेवन करने से भी लाभ मिलता है। 
१०. मूली का नियमित सेवन करने से एसिडिटी में लाभ होता है।
११. सुबह-सुबह खाली पेट गुनगुना पानी पीने से एसिडिटी में फायदा होता है।पानी में पुदीने की कुछ पत्तियां डालकर उबाल लीजिए। हर रोज खाने के बाद इन इस पानी का सेवन कीजिए। 
१२. अदरक और परवल को मिलाकर काढा बना लीजिए। इस काढे को सुबह-शाम पीने से एसिडिटी की समस्या समाप्त होती है।
१३. दूध में मुनक्का डालकर उबालना चाहिए। उसके बाद दूध को ठंडा करके पीने से फायदा होता है और एसिडिटी ठीक होती है।
१४. एसिडिटी होने पर मुलेठी का चूर्ण या काढ़ा बनाकर उसका सेवन करना चाहिए। इससे एसिडिटी में फायदा होता है।
१५. त्रिफला चूर्ण को दूध के साथ पीने से एसिडिटी समाप्त होती है। पेट की जलन शांत होती है।
१६. शाह जीरा अम्लता निवारक होता है। डेढ लिटर पानी में २ चम्मच शाह जीरा डालें । १०-१५ मिनिट उबालें। यह काढा मामूली गरम हालत में दिन में ३ बार पीयें। एक हफ़्ते के प्रयोग से एसिडीटी नियंत्रित हो जाती है।
१७.एसिडीटी निवारण हेतु आंवला क उपयोग करना उत्तम फ़लदायी होता है।
१८.तुलसी के दो चार पत्ते दिन में कई बार चबाकर खाने से अम्लता में लाभ होता है।इसका रस निकाल कर भी थोड़ी थोड़ी मात्रा में सेवन किया जा सकता है। 
१९. हर तीन टाइम भोजन के बाद गुड जरुर खाएं। इसको मुंह में रखें और चबा चबा कर खा जाएं।
२०. एक कप पानी उबालिये और उसमें एक चम्मच सौंफ मिलाइये। इसको रातभर के लिए ढंक कर रख दीजिये और सुबह उठ कर पानी छान लीजिये। अब इसमें 1 चम्मच शहद मिलाइये और तीन टाइम भोजन के बाद इसको लीजिये।
२१.गैस से फौरन राहत के लिए 2 चम्मच ऑंवला जूस या सूखा हुआ ऑंवला पाउडर और दो चम्मच पिसी हुई मिश्री ले लें और दोनों को पानी में मिलाकर पी जाएं।
२२. २५ ग्राम धनिये की रात में पत्थर के बर्तन में भिगो दें, सुबह छान कर थोड़ा सा सुहागे की बुकनी मिलाकर कुछ दिन नियमित सेवन करें, शर्तिया लाभ मिलेगा। 



http://kumarhealth.blogspot.in/2014/11/home-remedies-for-acidity.html

Wednesday, October 7, 2015

निम्न रक्तचाप :कारण,बचाव और इलाज"

निम्न रक्तचाप :कारण,बचाव और इलाज"

हमारे गलत खान पान  और रहन सहन के कारण हम लोग लो ब्लड प्रेशर के शिकार हो जाते हैं। आज हम इसी विषय पर विस्तृत चर्चा करते हैं। हमारे दिल से सारे शरीर को साफ खून की सप्लाई लगातार होती रहती है। अलग-अलग अंगों को होने वाली यह सप्लाई आर्टरीज (धमनियों) के जरिए होती है। ब्लड को प्रेशर से सारे शरीर तक पहुंचाने के लिए दिल लगातार सिकुड़ता और वापस नॉर्मल होता रहता है - एक मिनट में आमतौर पर 60 से 70 बार। जब दिल सिकुड़ता है तो खून अधिकतम दबाव के साथ आर्टरीज में जाता है। इसे सिस्टोलिक प्रेशर कहते हैं। जब दिल सिकुड़ने के बाद वापस अपनी नॉर्मल स्थिति में आता है तो खून का दबाव आर्टरीज में तो बना रहता है, पर वह न्यूनतम होता है। इसे डायास्टोलिक प्रेशर कहते हैं। इन दोनों मापों - डायास्टोलिक और सिस्टोलिक को ब्लड प्रेशर कहते हैं। ब्लड प्रेशर दिन भर एक-सा नहीं रहता। जब हम सोकर उठते हैं तो अमूमन यह कम होता है। जब हम शारीरिक मेहनत का कुछ काम करते हैं जैसे तेज चलना, दौड़ना या टेंशन, तो यह बढ़ जाता है। बीपी मिलीमीटर्स ऑफ मरकरी (एमएमएचजी) में नापा जाता है।
                              दरअसल निम्न रक्तचाप में रक्त का प्रवाह बहुत धीमा पड़ जाता है अर्थात् ऊ पर का रक्तचाप सामान्य से घटकर 90 अथवा 100 रह जाए तथा नीचे का रक्चाप 80 से घटकर 60 रह जाए, ऐसी स्थिति को निम्न रक्तचाप कहते है। दौर्बल्य, उपवास, भोजन तथा जल की कमी, अधिक शारीरिक तथा मानसिक परिश्रम, मानसिक आघात तथा अधिक रक्त बहने की दशा में यह रोग हो जाता है। निम्न रक्तचाप में नब्ज धीमी पड़ जाती है, थोड़ा सा परिश्रम करने पर रोगी थक जाता है। शरीर का दुर्बल होना, आलस्य अनुत्साह, शक्ति का घटते जाना, बातें भूल जाना, मस्तिष्क अवसाद, विस्मृति, थोड़ी सी मेहनत में ही चिड़चिड़ाहट, सिर दर्द, सिर चकराना आदि इसके लक्षण होते है।

प्रमुख कारण

* अधिक मानसिक चिंतन।
* अधिक शोक।
* अधिक क्रोध।
* आहार का असंतुलन होना।
* बहुत अधिक मोटापा।
* पानी या खून की कमी।
* उलटियां, डेंगू-मलेरिया, हार्ट प्रॉब्लम, सदमे, इन्फेक्शन, ज्यादा मोशन आने।
* अचानक सदमा लगना, कोई भयावह दृश्य देखने या खबर सुनने से भी लो बीपी हो सकता है।

प्रमुख लक्षण
* चेहरे पर फीकापन।
* आंखों का लाल हो जाना।
* नाड़ी की गति धीमी होना।
* प्यास लगना और तेज रफ्तार से आधी-अधूरी सांसें आना।
* निराशा या डिप्रेशन
* धुंधला दिखाई देना
* थकान, कमजोरी, चक्कर आना
* निम्न रक्तचाप में शारीरिक निर्बलता का अधिक अनुभव होता है।
* रक्त की अत्यधिक कमी के कारण निम्न रक्तचाप की उत्पत्ति होती है, इसलिए रोगी चलने-फिरने में बहुत कठिनाई अनुभव करता है।
* सीढ़ियां चढ़ने में बहुत परेशानी होती है।
* हृदय जोरों से धड़कता है और सारा शरीर पसीने से भीग जाता है।
* पुरुषों में नपुंसकता के लक्षण उत्पन्न होते है। जबकि स्त्रियों में काम-इच्छा की उत्पत्ति नहीं होती है। ऐसे में स्त्री-पुरुष का यौन आनंद नष्ट हो जाता है।
* निम्न रक्तचाप के कारण रोगी को भूख नहीं लगती, क्योंकि भोजन के प्रति अरुचि हो जाती है।
* स्वादिष्ट पकवानों की सुगंध भी रोगी को आकर्षित नहीं कर पाती। भूख नष्ट हो जाती है।
* सोफे या बिस्तर से उठाकर खड़े होने पर नेत्रों के आगे अंधेरा छा जाता है और सिर चकराने लगता है।
* सिरदर्द भी होता है।
* रोगी को अधिक प्यास लगती हैं।
* निम्न रक्तचाप की विकृति पर पड़े रहना चाहता है। किसी काम को करने की इच्छा नहीं होती है।

खानपान- 
* पालक, मेथी, घीया, टिंडा व हरी सब्जियां लें।
* अनार, अमरूद, सेब, केला, चीकू व अंगूर खाएं।
* कॉलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ न हो तो थोड़ा-बहुत घी, मक्खन व मलाई खाएं।
* केसर, दही, दूध और दूध से बने पदार्थ खाएं।
* सेंधा नमक का इस्तेमाल करें।
* सेब, गाजर या बेल का मुरब्बा चांदी का वर्क लगाकर खाएं।
* दिन व रात में अधिक पानी पीना चाहिए। कम से कम डेढ़ से दो लीटर पानी जरूर पीएं

* तुलसी, काली मिर्च, लौग और इलायची की चाय बनाकर पीएं। मात्रा सबकी एक-एक ग्राम। इसे छानकर गर्म ही पीना चाहिये। इसे रोज़ाना दिन में 1 बार पीने से निम्न रक्तचाप यानि Low Blood Pressure बहुत ही जल्दी ठीक हो जाता है। 
* राई तथा सौठ के चूर्ण को बराबर मात्रा में लेकर पानी में मिलाएं और पैर के तलवों पर लगाएं। प्रतिदिन सब्जी में लहसून का छौक (तड़का) लेने से निम्न रक्तचाप में तत्काल लाभ होता है।
* देशी गुड़ हर रोज 50 ग्राम की मात्रा में खाएं या २५ ग्राम गुड एक गिलास पानी में घोल कर उसमे थोड़ा  नीबू का रस और नमक मिला कर दिन में दो बार सेवन करे। 
* सेब, पपीता, अंजीर, आम आदि का अधिक सेवन करें।
* प्रतिदिन गाजर के एक गिलास रस में 10 ग्राम शहद मिलाकर पीएं। यह प्रयोग 30 दिनों तक करें।
* पुदीने की चटनी या रस में सेंधा नमक, काली मिर्च, किशमिश डालकर सेवन करें।
* प्रातः बासी मुंह सेब का मुरब्बा चांदी के वर्क के साथ खाएं।
* हींग के सेवन से रक्त जम नहीं पाता अर्थात् रक्त संचार ठीक रहता है। इसलिए निम्न रतचाप ठीक रहता है। इसलिए निम्न रतचाप में हींग का सेवन करें।
* भोजन के बाद आधा कप नारंगी पानी अवश्य पीएं।

* आंवले के 2 ग्राम रस में 10 ग्राम शहद मिलाकर कुछ दिन प्रातःकाल सेवन करने से लो ब्लड प्रेशर दूर करने में मदद मिलती है।
* लो ब्लड प्रेशर को सामान्य बनाये रखने में चुकंदर रस काफी कारगर होता है। रोजाना यह जूस सुबह-शाम पीना चाहिए। इससे हफ्ते भर में आप अपने ब्लड प्रेशर में सुधार पाएंगे।
* जटामानसी, कपूर और दालचीनी को समान मात्रा में लेकर मिश्रण बना लेँ और तीन-तीन ग्राम की मात्रा मेँ सुबह-शाम गर्म पानी से सेवन करें। कुछ ही दिन मेँ आपके ब्लड प्रेशर में सुधार हो जायेगा।
* रात्रि में 2-3 छुहारे दूध में उबालकर पीने या खजूर खाकर दूध पीते रहने से निम्न रक्तचाप में सुधार होता है।
* अदरक के बारीक कटे हुए टुकडों में नींबू का रस व सेंधा नमक मिलाकर रख लें। इसे भोजन से पहले थोडी-थोडी मात्रा में दिन में कई बार खाते रहने से यह रोग दूर होता है।
* 200 ग्राम मट्ठे मे नमक, भुना हुआ जीरा व थोडी सी भुनी हुई हींग मिलाकर प्रतिदिन पीते रहने से इस समस्या के निदान में पर्याप्त मदद मिलती है।
* 200 ग्राम टमाटर के रस में थोडी सी काली मिर्च व नमक मिलाकर पीना लाभदायक होता है। उच्च रक्तचाप में जहां नमक के सेवन से रोगी को हानि होती है, वहीं निम्न रक्तचाप के रोगियों को नमक के सेवन से लाभ होता है।
* गाजर के 200 ग्राम रस में पालक का 50 ग्राम रस मिलाकर पीना भी निम्न रक्तचाप के रोगियों के लिये लाभदायक रहता है।
* दूध में दो-तीन छुहारे देर तक उबलकर सेवन करने से शक्ति बढ़ने पर निम्न रक्तचाप का निवारण हाता है।

* रात को बादाम की तीन-चार गिरी जल में डालकर रखें। प्रातः उठकर गिरी को पीसकर मिस्री और मक्खन के साथ खायें और ऊपर से दूध पीने से निम्न रक्तचाप नष्ट होता 


है।
* रोगी का एक साथ अधिक मात्रा में भोजन नहीं करना चाहिए। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिन में कई बार भोजन करना चाहिए।
* 1/4 चम्मच हल्दी पाउडर, 1/4 चम्मच धनिया पाउडर, 1 चुटकी अदरक का पाउडर या पिसी हुई सौंठ, 1 चुटकी इलायची पाउडर और 2 चम्मच चीनी मिला लीजिये। 1 पैन में 1 कप दूध और 1/2 कप पानी और यह मिश्रण डालकर चाय की तरह उबाल लीजिये,फिर इसे छान लीजिये। इसे गर्म ही पीना चाहिये। इसे रोज़ाना दिन में 1 बार पीने से कुछ ही समय में Low Blood Pressure यानि निम्न रक्तचाप ठीक हो जाता है। 
बचाव और इलाज-
स्मोकिंग से परहेज करें, एक्टिव रहें और ज्यादा टेंशन न करें तो लो बीपी से बचा जा सकता है।

ऐलोपैथी
ऐलोपैथिक डॉक्टर लो बीपी को एक बीमारी न मानकर दूसरी बीमारियों का लक्षण या परिणाम मानते हैं, इसलिए बिना जांच वे कोई भी दवा नहीं खाने की सलाह देते हैं।

होम्योपैथी
होम्योपैथी में अलग-अलग वजहों से होने वाले लो बीपी के लिए अलग-अलग दवाइयां हैं :
1. एक्सिडेंट, ऑपरेशन या महिलाओं में डिलिवरी या पीरियड्स के दौरान ज्यादा खून बह जाने से होने वाले लो ब्लड प्रेशर के लिए चाइना-30 की पांच-पांच गोलियां दिन में चार बार तीन-चार दिन तक लें।



2. किसी भी प्रकार का सदमा लगने से होने वाले लो ब्लड प्रेशर में एकोनाइट-30 या इग्नीशिया-30 या मॉसकस-30 की पांच-पांच गोलियां दिन में चार बार या कालीफॉस-6 एक्स की चार-चार गोलियां चार बार लें।



3. अगर अक्सर लो ब्लड प्रेशर रहता हो तो आर्सेनिक एल्बम-30 या जेल्सिमियम-30 या फॉसफोरिक एसिड-30 की पांच-पांच गोलियां दिन में चार बार लें।

आयुर्वेद

इनमें से कोई एक उपाय करें :
1. सिद्धमकरध्वज की खुराक मरीज की हालत के मुताबिक वैद्य से बनवाकर लें।
2. वृह्दवातचिंतामणि रस की आधी-आधी गोली सुबह-शाम दूध से लें।
योगेंद्र रस की आधी गोली पानी से दिन में एक बार लें।
(सिद्धमकरध्वज, वृह्दवातचिंतामणि रस व योगेंद रस, ये तीनों दवाएं बहुत ज्यादा बीपी लो होने पर सिर्फ वैद्य की देखरेख में ही लेनी चाहिए।)
3. मकरध्वज की एक गोली रोज लें।
4. कपूरादि चूर्ण एक छोटी चम्मच सुबह-शाम पानी से कुछ दिन तक लगातार लें। इसे शुगर के मरीज भी ले सकते हैं।
5. हरगौरी रस एक रत्ती सुबह-शाम शहद से लें।
6. मृगांग पोटली रस पाउडर की एक रत्ती सुबह-शाम पानी से लें। शुगर वाले भी सकते हैं। दिल के लिए अच्छा है और ताकत भी देता है।
7. चार रत्ती या आधा छोटा चम्मच अश्वगंधा चूर्ण या दो रत्ती ताप्यादि लौह या दो रत्ती प्रवाल पिष्टी (प्रवाल पिष्टी कैल्शियम बढ़ाती है) या चार रत्ती
8. आंवला चूर्ण या कामदुधा रस की गोली दो रत्ती पानी से लें।
9. दो चम्मच अश्वगंधारिष्ट बराबर पानी मिला कर सुबह-शाम लें।
10. दो छोटी चम्मच बलारिष्ट या अर्जुनारिष्ट आधे कप पानी से लें।
11. शुगर के मरीज अर्जुन की छाल का दो चम्मच चूर्ण पानी में उबाल लें। फिर छानकर पीएं।
12. शुगर के मरीज अश्वगंधा का पाउडर आधा छोटा चम्मच पाउडर पानी से लें या एक-एक गोली सुबह-शाम लें।

नुस्खे

1. रात को पांच बादाम भिगोकर सुबह खाली पेट एक बादाम व एक काली मिर्च लेकर दो से तीन मिनट तक चबाकर खाएं। बाकी बादामों को भी इसी तरह खाएं। 15-20 मिनट बाद नाश्ता कर सकते हैं।

2. चाय-कॉफी ले सकते हैं। इनसे बीपी बढ़ता है। नमक-चीनी का घोल या इलेक्ट्रॉल पाउडर का घोल भी ले सकते हैं।

3. हल्दी का आधा चम्मच पाउडर दूध के साथ दिन में किसी भी वक्त लें। इससे आराम मिलता है। ठीक होने पर छोड़ दें। इसे किसी भी मौसम में ले सकते हैं।

4. छिले हुए चार बादाम, एक चम्मच शहद और एक चम्मच मिश्री को एक साथ पीस लें। सुबह-शाम इस पेस्ट को खाएं।

5. गाय या बकरी का एक पाव दूध, दो चम्मच गाय का घी, काली मिर्च के 10 दाने और 10 ग्राम मिश्री को उबालकर इसमें एक चम्मच शहद मिलाकर सुबह-शाम पीएं। शुगर के मरीज मिश्री व शहद न लें।

6. मक्खन एक चम्मच, मिश्री स्वादानुसार और एक चांदी का वर्क मिलाकर सुबह-शाम कुछ दिन सेवन करें।

7. हर रोज गाय के दूध के साथ एक-दो सिंघाड़े खाएं।

8. दूध व चावल की खीर में छोटी इलायची, चिरौंजी, बादाम व केसर डालकर खाएं।

9. पका हुआ शरीफा और सीताफल का सेवन करने से भी फायदा होता है।

10. काले चने 20-25 ग्राम और 10 नग किशमिश रात को पानी में भिगो दें। सुबह शौच के बाद खाली पेट इस पानी को पीकर चने व किशमिश खा लें। आधे घंटे बाद चाय पी सकते हैं। शुगर के मरीज बिना किशमिश के चने खाएं व पानी पीएं।

11. सात-आठ गिरी मुनक्का व बादाम मिलाकर रोज खाएं।

12. रात को दो-तीन अंजीर भिगोकर सुबह खाएं। शुगर के मरीज सिर्फ एक अंजीर भिगोकर लें।

13. एक बड़ी इलायची व पुदीने के थोड़े-से पत्तों को उबाल कर उसका पानी पीएं। चाय में डालकर भी पी सकते हैं।

नेचरोपैथी

तौलिया या किसी और कपड़े को सादे पानी में भिगोकर निचोड़ लें। चार उंगल चौड़ी पट्टी बनाएं। चटाई बिछाकर उस पर पट्टी फैला दें और खुद उस पर लेट जाएं। 10 मिनट तक लेटे रहें। ध्यान रहे कि पट्टी उतनी ही चौड़ी हो, जो रीढ़ की हड्डी को ही लंबाई में कवर करे, पूरी कमर को नहीं। यह लो व हाई बीपी, दोनों में फायदेमंद है। इससे थोड़ी देर में ही बीपी सामान्य हो जाएगा। इसे दिन या रात में किसी भी वक्त कर सकते हैं लेकिन सोते वक्त करना बेहतर है। लगातार 45 दिन करें।
योग

1. लो बीपी में ये आसन व क्रियाएं फायदेमंद हैं।
2 . अनुलोम-विलोम, भस्त्रिका व उज्जायी प्राणायाम करें। 3. कपालभाति क्रिया, उत्तानपादासन, कटिचक्रासन, पवनमुक्तासन, नौकासन, मंडूकासन और लेटकर साइकिलिंग करें।

With Thanks from:
http://kumarhealth.blogspot.in/2013/07/blog-post_17.html