Sunday, January 24, 2016

योगिराज Shyama Charan Lahiri part-3

योगिराज चाहते थे कि सभी लोग गृहस्थ-जीवन में रहकर स्वयं अपने द्वारा उपार्जित अर्थ के माध्यम से ही जीविका का निर्वाह करें एवं साथ ही साथ योग-साधना करते हुए धीरे-धीरे आत्मोन्नति के मार्ग पर अग्रसर हों। उन्होंने स्वयं उसी आदर्श को उपस्थित किया है। वे स्वयं साधारण, सहज, सरल तथा आडम्बरहीन जीवन जीकर योग की साधना करते हुए साधना के उच्च शिखर पर पहुँचे थे। और गृहस्थ या सांसारिक व्यक्ति के सामने एक उज्जवल आदर्श की स्थापना की है। हम यह नहीं जानते कि इस प्रकार का आदर्श और किसी ने स्थापित किया है या नहीं। संसार में रहकर साधना और भजन करने के लिये समयाभाव की दलील यदि कोई देता तो वे उसे नहीं मानते थे। बल्कि वे कहा करते थे कि यदि सचमुच किसी में ईश्वर-साधना की सदिच्छा या अच्छी भावना का संस्कार है तो वह सांसारिक व्यस्तता के बावजूद उसे कर सकता हैं। दूसरों पर निर्भर रहकर जीविका-निर्वाह करने की वृत्ति का वे कभी भी समर्थन नहीं करते थे। वे जानते थे कि आधुनिक स्वोपार्जनरत मनुष्य को अर्थ-संकट से ग्रस्त समाज के ऊपर निर्भर रहना पड़ता है। इसीलिए वे प्राचीन योगियों के कठोर आदर्शों का अनुमोदन नहीं करते थे। अपने घर में गुप्त रूप से साधना-रत योगियों की सुख-सुविधा के प्रति ही अत्यधिक आग्रहशील थे। उन्होंने ही सर्वप्रथम ऋषियों द्वारा प्रदर्शित कठिन योग की प्रणालियों को सामान्य लोगों के लिए उपयोगी बनाया, योग के बन्द द्वार को खोलकर सब के लिए सुगम योगमार्ग बनाया। उन्हें पता था आधुनिक क्षीणजीवी या कमजोर मनुष्य के पक्ष में प्राचीन योग की कठोर साधना सम्भव नहीं। इसीलिए उसकी प्राचीन जटिलताओं को सुलझाते हुए सर्वसाधारण के पक्ष में उसे प्रत्यक्ष फलप्रद, आडम्बरहीन, सहज, साध्य तथा सरल योग-साधना के रूप में परिवर्तित किया। उनके इस प्रयास के पूर्व प्राचीन कठोर योग-साधना सर्वसाधारण के लिए असम्भव-सा प्रतीत होता था। इस युग में उन्होंने ही सर्वप्रथम इस कठोर प्राचीन योग साधना को उपयोगिता की ऐसी दिशा प्रदान की है जो सबके लिए कल्याणकारी है। उनका यह प्रयास मानव समाज के लिए अविस्मरणीय रहेगा। उनके इस प्रयास ने मानव समाज को आत्मानुसंधान की दिशा में और भी उच्च स्तर पर प्रतिष्ठित कर दिया है। आज योग-साधन गृहस्थ मनुष्य-समाज के लिए कोई कठिन कार्य नहीं है। हमारे प्राचीन ऋषिगण भी योगसिद्ध मुक्त पुरुष थे। उन्होंने भी संसारिक जीवन में बँधकर विवाहित जीवन का निर्वाह करते हुए वर्णश्रम विधि के अनुसार योगयुक्त स्थिति में सभी कार्य सम्पन्न किया है। यही भारतीय संस्कृति की धारा है।  
      योगिराज कहा करते थे कि प्रत्यक्ष दर्शन के बिना प्रेमभक्ति एवं प्यार का जन्म नहीं होता। जैसे पुत्रहीन के लिए पुत्र-प्रेम सम्भव नहीं किन्तु पुत्र-जन्म के साथ ही उस पुत्र के प्रति क्या पूरा प्रेम-प्यार जाग उठता है? नहीं; तत्काल ऐसा नहीं होता; किन्तु पुत्र को प्रतिदिन जितना ही देखेगा लालन-पालन करेगा उतना ही धीरे-धीरे पुत्र के प्रति आकर्षण अनजाने ही बढ़ता जाएगा। जिसने ईश्वर को कभी देखा नहीं उसमें अनुमान से उसके प्रति सच्ची प्रेम-भक्ति कैसे सम्भव है? सम्भवतः पूर्व जन्म में अर्जित संस्कारों के कारण लाखों व्यक्तियों में किसी एक के भीतर वैसे प्रेम की अभिव्यक्ति हो सकती है। प्रतिदिन प्राणकर्म रूप या प्राणायाम सम्बन्धी कौशलपूर्ण योग-कर्म या अभ्यास करते रहने से कुछ न कुछ आत्मज्योति के दर्शन अवश्य ही होते रहते है प्रतिदिन जितनी ही आत्मज्योति का दर्शन प्राप्त होता रहेगा, उतनी ही तुम्हारे भीतर अज्ञात रूप से प्रेम-भक्ति की अभिव्यक्ति होगी। तब केवल उस अपरूप चिर निर्मल आत्मज्योति के दर्शन की इच्छा जाग्रत होगी जिसका दर्शन इस दृश्यमान जगत में सम्भव नहीं। इस प्रकार प्रत्यक्ष दर्शन में जितनी ही वृद्धि होती रहेगी उतनी ही उसके प्रति प्रेम-भक्ति भी विकसित होती रहेगी। अन्त में जब निर्निमेष दृष्टि से आत्मज्योति के दर्शन में तन्मय हो जाने पर प्रेम-भक्ति की रसानुभूति में उन्मत्त हो जाओगे। तभी अज्ञान-पाश के कट जाने पर शुद्ध भक्ति जन्मेगी। अतएव ईश्वर सत्ता के दर्शन के बिना ईश्वर के प्रति सच्ची प्रेम भक्ति सम्भव नही। वह सम्पूर्णतः प्राणकर्म या प्राणायाम सापेक्ष है।
      प्रत्येक मनुष्य के शरीर मे मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी शक्ति सोई हुई है। इस शक्ति को जब तक प्राणायाम या प्राण-कर्म द्वारा जगाया नहीं जा सकता तब तक साधन-भजन बाह्य आडम्बर है। साधना का उद्देश्य यह नहीं कि कि स्वर्ग-लोक में मृत्यु के पश्चात् वहाँ के आनन्द और ऐश्वर्य का उपभोग करेंगे। वैसे भोग की प्राप्ति तो बिना साधना के भी हो सकती है। वह तो किए गए सुकर्म का फल भोग मात्र है; सच्ची साधना का फल नहीं। साधना के द्वारा जीव की प्रगाढ़ मोह-निद्रा जब टूट जाती है तब उसे शिवत्व अथवा स्थिरत्व प्राप्त होता है अर्थात् वह पूर्णत्व प्राप्त कर लेता है। इसलिए योगी को कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत करना ही होगा। जीव का आत्मा शिवस्वरूप है, मंगलमय है जो मोह और अज्ञान से ढंका हुआ है। यह शिवरूपी आत्मा, व्योमतत्त्व अर्थात् विशुद्ध चक्र में शव के रूप में सुप्त है। इस सुप्तावस्था को जगाना होगा। प्राण-कर्म या प्राणायाम द्वारा कंठ में वायु के स्थिर होने से ही सुप्तावस्था चली जाती है। और कंठ में वायु स्थिर होने से ही नीलकंठ की संज्ञा प्राप्त होती है अर्थात् वायु की स्थिरता ही कंठ में नीलकंठता की परिभाषा है। शरीरस्थ पांच चक्र पांच तत्त्व के केन्द्र है। पृथ्वी, जल, अग्नि (तेज), वायु (मरुत) एवं व्योम (अकाश) प्रत्येक केन्द्र में अवस्थित है। शक्ति सभी चक्रों में समान-मात्रा में स्थित है। किन्तु मूलाधार चक्र में शक्ति के जाग्रत होने पर वह वायवीय शक्ति सुषुम्ना के भीतर से ऊपर की ओर उठती रहती है और क्रमशः सभी चक्रों में स्थित शक्ति को जाग्रत करते हुए पूर्ण रूप से जाग्रत होकर पाँचों चक्रों को मुक्त कर देती है। और तब इस स्थिति में अज्ञान का आभास तक नहीं मिलता। तब आत्मा का अज्ञान निद्रारूपी आवरण के छिन्न होने पर दूर हो जाता है और अन्त में शिव-शक्ति का मिलन होता है।
      कृष्णराम के दो पुत्र और एक कन्या रात खा-पीकर सो गये। उनकी पत्नी ने विनयपूर्वक उनसे कहा- ‘‘छोटे लड़के के जनेऊ या यज्ञोपवीत का समय पार कर गया उसके जनेऊ की कोई व्यवस्था आपने नहीं की। जितनी जल्दी हो सके उपनयन-संस्कार की व्यवस्था करो।’’
      कृष्णराम गरीब ब्राह्मण थे; किसी प्रकार गृहस्थी का निर्वाह हो जाता था। लड़के के उपनयन संस्कार के लिए पैसा कहाँ। वे गुरु महाराज के अनन्य भक्त और सेवक थे। कृष्णराम को इन सब बातों की कोई चिन्ता नहीं। पत्नी को सान्त्वना देते हुए कहा- ‘‘गुरु महाराज की जब कृपा होगी उपनयन की ठीक व्यवस्था हो जायेगी। मेरे पास तो पैसे नहीं है, अकारण चिन्ता करके क्या करूँगा। जिसकी चिन्ता है वे स्वयं ही करेंगे।’’
      कृष्णराम दूसरे दिन सुबह उठकर गुरु महाराज को साथ में लेने गंगा स्नान के लिए प्रतिदिन की तरह योगिराज के घर गये। योगिराज आसन पर बैठे थे। कृष्णराम के प्रणाम करते ही योगिराज ने अपने आसन के नीचे से तीस रुपया निकाल कर दिया और कहा- इस रुपये के द्वारा शास्त्रानुसार अपने लड़के का उपनयन संस्कार करो। आडम्बर अथवा दिखावे का कोई प्रयोजन नहीं।’’ कृष्णराम ने लज्जित होते हुए कहा- ‘‘गुरु महाराज, आप मुझ पर हमेशा कृपा करते हैं। मैं तो ठीक से आपकी सेवा भी नहीं कर पाता। मुझे आप रुपया क्यों देंगे?’’
      योगिराज ने कहा- ‘‘देखो कृष्णाराम देनेवाला मालिक तो एक ही है वे तो किसी-न-किसी के हाथ से ही देते हैं। अभी वे मेरे हाथ से ही दे रहे हैं तो फिर तुम लोगे क्यों नहीं?’’
      कृष्णाराम ने सम्मान पूर्वक उस रुपये को ले लिया।
      पाँचकोड़ी वन्द्योपाध्याय योगिराज के एक प्रिय भक्त थे जिनकी साधना अत्यन्त उन्नत थी; किन्तु गृहस्थी के पंकिल या गँदले परिवेश में रह कर भगवत्-साधना करना अत्यन्त कठिन देखकर उनके मन में वैराग्य का उदय हुआ। उन्होंने मन ही मन निश्चय किया कि घर-बार छोड़ कर चले जाएँगे। किन्तु इसके पहले गुरुदेव की अनुमति चाहिए। वन्द्योपाध्याय जी ने एक दिन गुरुदेव के पास आकर संन्यास लेने की अनुमति प्राप्त करने के लिए निवेदन किया।
      योगिराज ने उनकी सारी बात सुनकर गम्भीर स्वर में कहा- ‘‘तुम्हारे जनेऊ का भार अधिक है या जटा का भार अधिक है? तुम क्या साधु की हैसियत से स्वयं का प्रचार करना चाहते हो ताकि लोग तुम्हें मानें-जाने और कुछ अर्थोपार्जन हो? देखो, गेरुआ वस्त्र पहनने से लोग यदि साधु हो सकते तो गधे-घोडे़ सभी साधु हो जाते। उनका भी रंग तो गेरुआ है तो फिर उन्हें साधु क्यों नहीं कहोगे? यह सब पागलपन छोड़ो, गृहस्थी में रहो स्वयं जो उपार्जन कर सकते हो उसी जीविका पर जीवन का निर्वाह करो और ईश्वर की साधना करो। दूसरों से दान लेकर जीवन-यात्रा का निर्वाह नहीं करोगे।’’
      अन्त में सिर झुकाए पाँचकोड़ी वन्द्योपाध्याय चले गये। यही आगे चलकर केशवानन्द ब्रह्मचारी के नाम से विख्यात हुए थे।
      योगिराज कहा करते थे कि भारतवर्ष में अध्यात्म-जगत के कंकाल स्वरूप मठ, मिशन एवं आश्रम का अभाव नहीं है। मठ-मिशन करने से ईश्वर की साधना नहीं होती। ये सब ईश्वर की साधना में बाधा उपस्थित करते है। किस प्रकार मठ और मिशन का प्रचार-प्रसार हो, इसी ओर ध्यान लगा रहता है। इसीलिए वे एकान्त एवं गोपन साधना पर अधिक बल देते थे। उनका कहना था कि गेरुआ पहनने पर लोग साधु के रूप में पहचान सकते है; किन्तु साधना में व्याघात या बाधा पड़ती है। सफेद कपड़े में लोग पहचान नहीं सकते और साधना भी भली भाँति हो सकती है। संन्यासी-जीवन अत्यन्त कठिन है, इसी कारण उन्होंने किसी भक्त को संन्यासी होने की अनुमति नहीं प्रदान की। हालाँकि पहले से ही संन्यासी में दीक्षित उनके अनेक भक्त थे। वे गृहस्थ को घर-संसार में ही रहने को कहा करते थे और संन्यासी को संन्यास आश्रम में रहने को उपदेश देते। उनका उपदेश था कि जो जिस आश्रम में है वह उसी आश्रम में रहकर आत्मसाधना करे। परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं। ऐसी स्थिति में ही कल्याण होगा। वे पोशाक परिवर्तन का निषेध करते। वे कहते थे कि रंगीन पोशाक पहनकर साधु होने से ही ईश्वर की प्राप्ति होगी ऐसी-बात नहीं हैं जो जिस पोशाक में है और जो जिस परिवेश में है वही तुम्हारे अनुकूल है। उसी प्रकार रहकर ही आत्मसाधना करते रहो तभी जीवन सफल होगा।  
महाप्रयाण
मरते मरते जग मरा, मरना ना जाने कोय ।
ऐसा मरना कोई ना मरा, जे फिर न मरना होय ।।
मरना है दुई भांति का, जो मरना जाने कोप ।
रामदुआरे जो मरे, फिर ना मरना होय ।।
            संसार में लोगों की मृत्यु हो रही है परन्तु किस भांति मरना चाहिए यह कोई नहीं जानने का प्रयास करता। कोई भी उस विधि को नहीं जानता जिससे दोबारा न मरना पडे। वस्तुतः मरण दो प्रकार का होता है एक सामान्य मृत्यु है व दूसरी मृत्यु है राम दुआरे मृत्यु अर्थात् उसमें दोबारा जीवन का जन्म नहीं होता।
                                                                                                             -सन्त कबीर
            मृत्यु का नाम सुनते ही अच्छे-अच्छो का रक्त चाप ;ठण्च्ण्द्ध बढ़ जाता है। व्यक्ति इस नाम से दूर भगाना पसन्द करता है। परन्तु योगी मृत्यु की तैयारी स्वयं करता है। वह इस सत्य से भयभीत नहीं होता। इसका प्रमाण योगिराज के शिष्य युक्तश्वर जी के शिष्य योगानन्द परमहंस जी ने यू.एस.ए में इच्छा मृत्यु का वरण करके दिया था।
            श्रीभगवद्गीता च्संददपदह व िक्मंजी के विषय में क्या कहती है निम्न पता चलता है।
         प्रयाणकाले मनसाऽचलेन, भकत्या युक्तो योगबलेन च व
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपति दिव्यम् ।।
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूध्न्र्याधयात्मनं प्राणमास्थितो योग धारणाम् ।।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ।।
                                                                                                                          गीताः
            अर्थात् प्रयाण-काल में स्थिरचित्त होकर भक्तिपूर्वक जो योगबल द्वारा दोनों भौंहों के बीच प्राण को धारण करते हुए ईश-स्मरण करता है वह दिव्य परमात्मस्वरूप पुरुष को प्राप्त करता है। समस्त इन्द्रियों पर नियंत्रण करके अर्थात् इन्द्रियों द्वारा बाह्य विषयों को ग्रहण न करते हुए मन को निसलम्ब भाव से स्थिर करके दोनों भौहों के बीच प्राण को सम्पूर्णतः स्थापित करके एकाक्षर ब्रह्म नाम रूप ओंकार का जप करते-करते मुझे (कूटस्थ को) स्मरण करते हुए जो देह त्याग करते हैं उन्हें परम गति की प्राप्ति होती है। 
            एक दिन योगिराजने मधुर मुस्कान के साथ शान्त में काशीमणि देवी से कहा- ‘‘देखों! अब मेरा यहाँ का काम समाप्त हो गया। जाने का समय आ गया, केवल ‘‘माह रहूँगा, उसके बाद चला जाऊँगा। तुम लोग शोक मत करना’’। महायोगी अपने महाप्रस्थान का दिन निश्चित कर मानव लीला की समाप्ति के लिए प्रस्तुत हो गए। 26 सितम्बर 1895 ई. बृहस्पतिवार के महाष्टमी के दिन अपने मकान में भगवद्गीता के श्लोके की धीमे और मधुर स्वर में व्याख्या कर रहे है सूर्योस्त की बेला है बाहर अष्टमी के गाजे बाजे बज रहे हैं। सभी का मन बोझित है योगिराज पदमासन लगाकर बैठ गए। आँखों में आँसू भरे तमाम भक्तों की ओर देखते हुए बोले- ‘‘अब मेरे जाने का समय हो गया। तुम लोग शोक मत करो। नश्वर दे हके न रहने पर की सद्गुरु की सत्ता रहती है। मैं हमेशा तुम लोगों के साथ हँू।’’ साँयकल 5 बजकर 25 मिनट पर उन्होंने महाप्रयाण किया। सभी भक्तो ने अपनी श्रद्धा निवेदित करते हुए उन्हें अन्तिम प्रणाम कर गृहस्थ आश्रम की मर्यादा के अनुसार अन्त्येष्टि संस्कार सम्पन्न किया। योगिराज एक अमृतमय ज्योतिर्तोक की यात्रा पर चले गए किन्तु जिस आदर्श की उन्होंने स्थापना की और मुक्तिमार्ग की खोज की उस पर चलकर आज लाखों नर-नारी अपने जीवन का कल्याण कर रहे हैं।

श्यामचरण लाहिड़ी part-2

एक बार योगिराज के साले राजचन्द्र सान्याल के उच्च शिक्षा प्राप्त युवा पुत्र तारकनाथ, पेट के किसी असाध्य रोग से आक्रान्त थे। लम्बी चिकित्सा के बावजूद किसी प्रकार का लाभ न होते देखकर वे वायु-परिवर्तन के लिये कानपुर जाकर अपने पिता के एक घनिष्ठ मित्र के यहाँ रहने लगे। इस दरम्यान वहाँ के एक व्यक्ति ने उनसे कहा- ‘‘औषधि के द्वारा तुम्हारा यह रोग दूर नहीं होगा। यदि तुम्हें किसी महात्मा का आर्शीवाद प्राप्त हो जाए तो यह शीद्य्र ही दूर हो जायेगा।’’ और यह भी बताया कि ‘‘गोरखपुर में एक ऐसे महात्मा हैं। वहाँ जाकर जल्द ही उनकी कृपा प्राप्त करने की चेष्टा करो।’’ तारकनाथ गोरखपुर जाने की तैयारी करने लगे; उसी समय उनके पिता के मित्र ने सारी बातें सुनकर कहा- ‘‘तुम्हारे घर में ही महात्मा हैं और तुम महात्मा की खोज में कहीं और जा रहे हो?’’ तारकनाथ ने विस्मयपूर्वक पूछा ‘‘मेरे यहाँ महात्मा कहाँ से आ गए? मैंने तो कभी किसी महात्मा की चर्चा सूनी नहीं।’’ उनके पिता के मित्र ने कहा- ‘‘क्या तुम अपने फूफा श्यामचरण लाहिड़ी को जाने नहीं? वे ही महात्मा हैं। उनका आशीर्वाद प्राप्त करने की चेष्टा करो तभी कल्याण होगा।’’
     तारकनाथ को आश्चर्य हुआ। उनके फूफा एक महात्मा हैं, ऐसी बात इसके पहले उन्होंने कभी सुनी नहीं। कितनी बार उनके घर जा चुके हैं, उनसे कितनी बातें की है; किन्तु उनमें महात्मा जैसा कुछ दिखा नहीं।
     तारकनाथ काशी लौट आए और अपने पिता को साथ लेकर अपने फूफा से भेंट की।
     फूफा ने सारी बातें सुनकर तारकनाथ को एक टोटके वाली दवा दीं। तारकनाथ उसका इस्तेमाल करके नीरोग हो गए। उसके पश्चात् तारकनाथ उनसे योग की दीक्षा लेकर साधना में तल्लीन हो गए। किसी प्रकार के उपार्जन की चेष्टा न करते हुए देखकर योगिराज ने उन्हें कम साधना करने का आदेश दिया और कहा- ‘‘साधना भी करनी होगी और व्यवसाय के द्वारा जीविका का निर्वाह भी करना होगा। दूसरे के सहारे रहकर जीवन व्यतीत करना उचित नहीं। अपनी गृहस्थी स्वयं ही चलाना उचित है।’’
     यही तारकनाथ उसके पश्चात् अँगरेजी के प्रधान अध्यापक होने के बावजूद साधना के उच्चतम शिखर पहुँचने में समर्थ हुए थे।
     इससे साबित होता है कि योगिराज स्वयं को कितना गोपन रखते थे।
     एक बार की घटना है। योगिराज की मझली लड़की हरिकामिनी ससुराल से यहाँ आई है। अचानक उसे एश्यिाटिक काॅलरा हो गया। काशीमणि देवी ने योगिराज से अनुरोध किया कि जैसे भी हो कोई व्यवस्था करो और लड़की को बचाओ। तुम्हारे रहते हुए लड़की क्या मर जायेगी?
     योगिराज के मन में कोई उद्विग्नता नहीं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। काशीमणि देवी बार-बार अनुरोध करती हैं कि जैसे भी हो लड़की को बचाओ।
     योगिराज ने बिना कुछ कहे एक अपामार्ग की जड़ और ढाई गोलमिर्च देते हुए
 कहा- ‘‘ये दोनों एक साथ पीसकर पिला दो।’’
काशीमणि देवी ने सोचा विवाहिता लड़की है क्या पता कुछ हो जाये तो उसकी ससुराल में तरह-तरह की बात उठेगी, इसलिए डाक्टर की दवा ही ठीक है। वे योगिराज द्वारा दी गई दवा न देकर डाक्टर की दवा ही देने लगी। किन्तु दूसरे दिन लड़की का स्वर्गवास हो गया।
      योगिराज अन्य दिनों की तरह उस दिन भी शाम को गीता की व्याख्या कर रहे हैं और उनके सुयोग्य शिष्य पंडित पंचानन भट्टाचार्य गीता के मूल श्लोक का पाठ कर रहे हैं। अनेक भक्त उपस्थित हैं। इसी बीच ऊपर के कमरे में जोर-जोर से रोने की आवाज सुनाई पड़ी । सभी उपस्थित व्यक्ति विचलित हो गये। कारण पूछने पर योगिराज ने बताया कि- ‘‘मझली लड़की मर गई, इसीलिये सभी रो रहे हैं। लगता है श्मशान ले जाने वाले आये हैं।’’
      भट्टाचार्य महोदय ने गीता की पुस्तक को बन्द करते हुए कहा- ‘‘बस आज यही तक।’’
      योगिराज ने गम्भीरता पूर्वक कहा- ‘‘वे लोग अपना काम करें, तुम लोग अपना काम करो।’’
      उपस्थित सभी भक्तों ने कहा- ‘‘इस समय गीता की व्याख्या सुनने के लिये मन में धैर्य और स्थैर्य नहीं है आज बन्द रहने दिया जाये।’’
      योगिराज के मन में कोई उद्वेलन नहीं- जैसे कुछ हुआ ही नही। शान्त स्वर में उन्होंने कहा- अच्छा तो फिर बन्द रक्खो।
      दूसरे दिन योगिराज के साले राजचन्द्र सान्याल ने आकर योगिराज से पूछा- प्रियजनों की मृत्यु या वियोग में जो दुःख सामान्य व्यक्ति को होता है, वैसा क्या तुम्हें होता है?
      योगिराज ने मुसकराते हुए कहा- ‘‘दुःख तो सभी को होग; किन्तु ज्ञानी व्यक्ति के पक्ष में कुछ पार्थक्य है। जैसे पत्थर की गोली को अगर सख्त जगह पर जोर से मारो तो वह उछलती हुई दूर निकल जायेगी; किन्तु उसी को यदि नर्म मिट्टो पर जोर से मारो तो वह उसमें धँस जायेगी। इसी प्रकार ज्ञानी व्यक्ति को दुःख आघात नहीं दे सकता है। आघात उस पर भी होता है, किन्तु लौट जाता है और अज्ञानी उसी आघात से हाय-हाय करते हैं।’’
      जल में तैरत कमल के पत्तों की तरह सांसारिक जीवन का निर्वाह करते हुए यह महान गृहीयोगी कितनी सहजता के साथ दुःख, क्लेश-कष्ट से सदैव निर्लिप्त रहा करते थे। ठीक उसी तरह जिस प्रकार गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है-
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ । समदुःखसुखंधीरं सोऽमृत्वाय कल्पते ।।
      अर्थात् समस्त सुख-दुख में समभाव से जो धैर्यवान व्यक्ति व्यथित नहीं होते, उन्हें अमरत्व एवं शाश्वत आनन्द प्राप्त होता है।
      योगिराज प्रतिदिन सायंकाल गंगा के किनारे राणामहल घाट पर टहलने जाया करते थे। वहीं गंगा-तट पर भक्त कृष्णाराम का घर था। योगिराज कुछ देर तक टहलकर कृष्णाराम के मकान के बरामदे में बैठा करते और गीता के सम्बन्ध में नाना प्रकार की व्याख्याएँ करते। उसके बाद अँधेरा होने के पर्व ही वे घर वापस आकर बैठकखाने में बैठ कर भक्तों को उपदेश दिया करते। रात के नौ बजते ही सभी भक्त चले जाते। इसी क्रम में वे जब भक्तों को उपदेश देते तब कभी किसी समय ऐसा भी देखने में आता  िकवे अचानक हाथ जोड़ कर माथे से लगाकर प्रणाम करते। उपदेश के समय बीच-बीच में वे इसी तरह की मुद्रा में क्यों प्रणाम करते, यह उपस्थित भक्तों की समझ में नहीं आ पाता और पूछने का साहस भी नहीं जुटा पाते। इस प्रकार धीरे-धीरे भक्तों में एक कौतूहल की सृष्टि हुई।
      एक दिन जब उन्होंने उपेदश देते हुए अचानक प्रणाम किया तब उसी समय एक व्यक्ति घर से बाहर आकर देखता है कि एक भक्त योगिराज के बरामदे में साष्टांग प्रणाम कर रहा है और योगिराज उसी प्रणाम को स्वीकार कर रहे हैं। घर के भीतर से देखने का उपाय नहीं था। इस प्रकार बाहर से जब भी कोई उनके प्रति अपना प्रणाम निवेदित करता तब वे उसका प्रत्याभिवादन करते। यहाँ तक कि बहुत दूर से भी यदि उन्हें कोई प्रणाम करता तो वे उसका प्रत्याभिवादन करते यह भी देखने में आता। पास और दूर, भीतर और बाहर सभी कुछ उनके निकट स्वच्छ हो गया था। सभी के भीतर वे उसी एक को ही देखते।
      योगिराज ने कभी भी अपना प्रचार या प्रसार नहीं चाहा। इसीलिए वे किसी को अपना चित्र या फोटो खींचने की अनुमति नहीं देते थे। एक दिन सभी भक्तों ने उनका चित्र या फोटो खिंचवाने का निर्णय लिया और उनके ही एक भक्त एवं कुशल फोटोग्राफर गंगाधर दे को बुलाकर लाया गया। अब उन लोगों ने योगिराज की सहमति के लिए निवेदन किया। इस पर योगिराज ने कहा- ‘‘फोटो खीचने की कोई जरुरत नहीं। फोटो खींचने पर भविष्य में तुम सब साधना छोड़कर फोटो की ही पूजा शुरु कर दोगे।’’
      किन्तु भक्त कहाँ छोड़ने वाले थे। उनके बार-बार अनुरोध करने पर अन्त में योेगिराज ने फोटो खींचने की अनुमति दे दी। गंगाधर बाबू के साथ सभी भक्त प्रसन्नता के साथ फोटो लेने के लिए तैयार हो गये। योगिराज कैमरा के सामने जाकर बच्चों जैसी उत्सुकता के साथ कमरा के तमाम कल-पुर्जों के बारे में जानकारी लेने लगे। गंगाधर बाबू ने भी उत्साह पूर्वक कैमरे के विभिन्न अंशों के बारे में बताना-समझाना शुरू किया।
      किन्तु फोटो लेने के समय गंगाधर बाबू को एक बड़े संकट का सामना करना पड़ा। कैमरे के लेन्स में योगिराज की छवि प्रतिबिम्बित ही नहीं हो रही है। उन्होंने सोच कैमरे में कहीं कोई त्रुटि है। किन्तु परीक्षा करके देखा कि दूसरों का चित्र लेन्स में ठीक-ठाक प्रतिबिम्बित हो रहा है। गंगाधर बाबू को इतनी देर में सारा रहस्य समझ में आ गया। उन्होंने देखा कि योगिराज मुस्करा रहे है । इस बार गंगाधर बाबू ने हाथ जोड़ते हुए निवेदन किया- ‘‘आप दया करें नही ंतो फोटो नहीं खिच पायेगी और न तो भक्तों की मनोकांछा ही पूर्ण होगी।’’
      योगिराज ने इस बार हँसते हुए कहा- ‘‘खीचा, फोटो खींचो।’’ इस बार कैमरे के लेन्स में उनका चित्र स्पष्ट प्रतिबिम्बत होने लगा।
      इस समय उनके लाखों अनुयायियों या अनुगामी भक्तों के पास जो चित्र देखने को मिलता है उसे उस दिन गंगाधर दे ने खींचा था। इसके अतिरिक्त उनका दूसरा चित्र नहीं खींचा गया। किन्तु आश्चर्य की बात है कि कहीं भी किसी दुकान पर उनका चित्र नहीं मिलता। सम्भवतः वे प्रचार-प्रसार के प्रति विरक्त थे इसीलिए इस प्रकार की गोपनीयता पालन किया है। फोटो देखने पर सहज ही कोई अनुमान कर सकता है कि योगिराज का शरीर कितना सुडौल और सुन्दर था। वे योगी सुलभ दे हके अधिकारी थे। उनकी आँखों की ओर देखने से लगता था जैसे बड़ी तीक्ष्णता के साथ पूरे विश्व-ब्रह्माण्ड को देख रहे हों। वह शाम्भवी मुद्रा की स्थिति है।
      श्यामाचरण साधना के सर्वोच्च शिखर पर आरोहण करके आर्ष अवस्था को प्राप्त करने के बावजूद हमेशा सहजता एवं सरलता के साथ जीवन-यापन करते थे। अत्यन्त साधारण उनकी वेशभूषा थी। स्वल्पभाषी एवं मधुरभाषी श्यामाचरण कभी भी बिना किसी प्रयोजन के योग-विभूति के ऐश्वर्य को व्यक्त नहीं करते थे। कभी-कभी लीला या चमत्कार के बहाने अथवा मोक्षकामी भक्तों के विश्वास को दृढ़ करने की दृष्टि से ही उन्हें योग के चमत्कारों का प्रदर्शन करते देखा गया है। अध्यात्मशक्ति के मुख्यस्त्रोत के रूप में प्रतिष्ठित होकर भी योगिराज स्वयं को अत्यन्त क्षुद्र या अकिंचन समझते थे। भक्तों को भी इसी का उपदेश देते हुए कहा करते थे- ‘‘स्वयं को क्षुद्र या छोटा नहीं समझने पर आत्म-राज्य में प्रवेश नहीं किया जा सकता।’’ कई बार भक्तों से यह भी कहा करते कि- मैं गुरु नहीं हूँ; गुरु शिष्य के बीच कोई भेद या फर्क नहीं रखता हँू।’’
      उस समय योगिराज अध्यात्मशक्ति की ऊँचाई पर थे और अपनी अध्यात्म शक्ति के द्वारा मानव-कल्याण के लिए पतित पावन की भूमिका में प्रतिष्ठित थे। इसके अलावा उनमें कुछ ऐसी शक्ति थी कि केवल उनके दर्शन से ही लोगों का आध्यात्मिक रूपान्तर हो जाता था अनेक साधु-संन्यासी रात के गहरे एकान्त में उनके चरणों में बैठकर अत्यन्त दुरूह योग-साधना की शिक्षा प्राप्त करते थे और प्रातःकाल होते ही सभी चले जाते थे। इस प्रकार उन्होंने कितनी ही विनिद्र रातें काटी हैं। इसके लिए वे कभी उदास या निष्क्रिय नहीं दिखाई पड़ते थे। अवसन्नता का आभास ही नहीं था। हमेशा प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता पूर्वक आगत भक्तों की इच्छा पूर्ण करने की चेष्टा किया करते थे। उस समय उनको देखने से लगता था जैसे कोई करुणा की घनीभूत मूर्ति हो। ऊँच-नीच के भेदाभेद से रहित होकर इस महायोगी को कई बार ऐसा करते देखा गया है कि वे स्वयं भक्तों की खोज-खबर रखते और उन पर अपनी अहैतुकी कृपा-दृष्टि रखते थे।
      योगिराज के वास-स्थान से थोड़ी दूर पर ग्वाला जयपाल भगत की दूध और दही की दुकान थी। वह दिन भर बैठे-बैठे दूध-दही बेचता और देखता कि कितने लोग महाराज जी के पास आते-जाते है। कितने लोग उनकी कृपा पाकर धन्य होते हैं। महाराज जी के प्रति जयपाल की गहरी श्रद्धा थी। जयपाल सोचता कि वह तो मामूली आदमी है, उसे क्या महाराज की कृपा प्राप्त होगी? साहस पूर्वक जयपाल कुछ कह नहीं पाता था। एक दिन जयपाल रास्ते में जा रहा था। अचानक सामने से महाराज जी को आते हुए देखकर वह भक्ति पूर्वक विनम्रता के साथ उन्हें प्रणाम करके रास्ते के किनारे खड़ा हो गया। महाराज जी प्रत्याभिवादन करने के पश्चात् थोड़ा मुस्कराए और कहा- ‘‘जयपाल तुम कल आओगे, तुम्हें दीक्षा दूँगा।’’
      जयपाल ने भक्ति पूर्वक प्रणाम करके कहा- ‘‘महाराज जी की जय हो।’’ जयपाल आनन्द में निमग्न होकर सोचने लगा कि महाराज जी स्वयं बुलाकर कृपा कर रहे हैं- क्या मैं उनके उपदेश का पालन कर सकूँगा।
      दूसरे दिन जयपाल ठीक समय पर उपस्थित हुआ और दीक्षा प्राप्त की।
      परवर्ती काल में देखा गया कि उसी छोटी-सी दूध दही की दुकान से ही जयपाल ने काफी अर्थोपार्जन किया था। भक्त जयपाल धन-धान्य और पुत्र-परिवार से सम्पन्न होने के बावजूद अन्त में सब कुछ पुत्रों को सौंपकर गंगा के किनारे एक कुटी में अकेले ध्यानस्थ होकर बैठा रहता। जयपाल साधना की उच्च स्तरीय भूमि पर उत्तीर्ण हो चुका था।
      इस प्रकार बाँग्लादेश की भागीरथी के किनारे एक छोटे गाँव में ईंट बनाने के भट्ठे हितलाल सरकार काम करते थे। किसी तरह मामूली आमदनी से घर-गृहस्थी चलाते थे। किन्तु परोपकार की सहजात वृत्ति उनमे थी। किसी गरीब दुःखी के कुछ मांगने पर अपने एवं परिवार के कष्ट की बात भुलाकर उसी समय अपनी सामथ्र्य के अनुसार उसे दान दिया करते थे। हितलाल घर-परिवार के लिए सारे काम करते; किन्तु बीच-बीच में उनका मन पता नहीं कहाँ चला जाता। गंगा के किनारे वे घण्टों बैठे रहते। हालांकि वे समस्त कार्य करते थे लेकिन कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। पता नहीं, हितलाल क्या पाना चाहते थे। उन्हें लगता जैसे जीवन अपूर्ण रह गया।
      हितलाल प्रत्येक दिन की चर्या के अनुसार उस दिन भी काम पर गये थे। नियमित रूप से कत्र्तव्यों का पालन कर रहे थे। अचानक उनके भाव-जगत में एक परिवर्तन आया। अकारण ही चित्त अत्यन्त व्याकुल हो गया। उन्होंने सोचा। यहाँ रहने से कोई लाभ नहीं, अभी ही कहीं चला जाना होगा। सोचने के अनुसार ही काम करना है। कारखाना छोड़कर हितलाल ने चलना शुरू किया। उन्हें ऐसा लगा जैसे कोई अदृश्य शक्ति अपने प्रबल आकर्षण द्वारा खींचे लिए जा रही है। कहाँ जाना है, क्या करना है, उन्हें इसका पता नहीं। मंत्रमुग्ध होकर वे चले जा रहे हैं। कुछ देर बाद रेलवे स्टेशन पर आकर उन्होंने देखा कि ट्रेन खड़ी है। ट्रेन से वे हावड़ा स्टेशन आ गये। हितलाल को इसका कोई ध्यान नहीं रहा। टिकट घर क सामने जाकर उन्होंने कहा- ‘‘एक टिकट दीजिए।’’ टिकट बाबू ने पूछा- ‘‘कहाँ जायेंगे?’’
      हितलाल ने कहा- ‘‘यही कुछ रूपये हैं, इससे जो हो एक टिकट दे दीजिए।’’
      प्रौढ़ टिकट बाबू ने समझा कि यह भलेमानुष किसी कारण से परेशान है। इसीलिए उन्होंने पूछा- ‘‘आप क्या कभी काशी गये हैं?’’
      हितलाल ने कहा- ‘‘नहीं, कभी भी काशी नहीं गया।’’ टिकट बाबू ने मुसकराते हुए कहा- ‘‘तो फिर काशी जाइये। इस रूपये में वहाँ तक का टिकट हो जायेगा। बाबा विश्वनाथ की कृपा से शान्ति प्राप्त होगी।’’
      हितलाल को ज्ञात था कि काशी में बंगाली टोला नाम की एक जगह है। वहाँ अनेक बंगाली रहते हैं। काशी रेलवे स्टेशन पर उतर कर वे पूछते-पूछते बंगाली टोला की ओर रवाना हो गये। पतली गली से वे चल जा रहे हैं। थके-माँदे और भूख-प्यासे हितलाल कहाँ जायेंगे। पता नहीं- चलना है इसीलिए चले जा रहे हैं। अचानक उन्होंने देखा कि एक मकान से सौम्यमूर्ति एक सज्जन व्यक्ति बाहर आकर उन्हें बुला रहे हैं। ‘‘सुनिये, इधर आइये।’’
      हितलाल विस्मयपूर्वक आगे बढ़े और पास जाकर कहा- ‘‘आप मुझे पहचानते नहीं और मैं भी आपको नहीं पहचानता तो फिर आपने मुझे क्यों बुलाया?’’ सज्जन व्यक्ति ने हँसकर कहा- ‘‘वह सब बाद में, आप थके-माँदे और भूखे-प्यासे है, पहले, नहा-धोकर और खा-पीकर आराम कीजिए।’’
      हितलाल ने सोचा इस सज्जन को मेरी व्यथा-कथा कैसे मालूम हुई?
      हितलाल के लिए नहाने-धोने और खाने-पीने की तथा विश्राम की यथोचित व्यवस्था की गई। विश्राम के पश्चात् अन्यान्य लोगों से बातचीत के दौरान उन्हें पता चला कि वे वही महात्मा योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी है जिनके बारे में उन्होंने केवल उनका नाम भर सुन रखा था।     
      इसी बीच योगिराज ने हितलाल को अपने कमरे में बुलवाया और कहा- ‘‘आपकी दीक्षा-प्राप्ति का समय आ गया है इसलिए मैं ही आपको यहाँ लाया हँू।’’
      योगिराज के चरणों पर हितलाल लोट पड़े। महायोगी की कृपा प्राप्त करके हितलाल धन्य हो गये।
      योगिराज का पड़ोसी एक युवक चन्द्रमोहन दे अभी-अभी डाक्टरी पास करके घर लौटा है। चन्द्रमोहन, राममोहन के भाई थे। एक दिन चन्द्रमोहन ने आकर योगिराज को प्रणाम किया और आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना की। आशीर्वाद देकर योगिराज आधुनिक चिकित्सा के बारे में विधि विषयों पर पूछ-ताछ करने लगे। चन्द्रमोहन नये डाक्टर हुए हैं उत्साह की कोई कमी नहीं। आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान के तमाम पक्षे को वे समझाने लगे।
      योगिराज ने उनसे जानना चाहा कि चिकित्सा-विज्ञान में मृत की क्या संज्ञा है?
      मृत की संज्ञा के बारे में चन्द्रमोहन ने बतलाया।
      फिर मुस्कराते हुए मजाक के स्वर में योगिराज ने कहा- ‘‘चन्द्रमोहन मेरी जाँच करके देखो तो मैं जीवित हँू या मृत?’’
      चन्द्रमोहन ने जाँच की; लेकिन अवाक; योगिराज के शरीर में कही भी प्राण का संकेत नही। हृत्पिण्ड बन्द है । चन्द्रमोहन क्या कहें- सोच ही नहीं पा रहे हैं। अचानक योगिराज ने मुस्कराते हुए कहा- ‘‘तो फिर चन्द्रमोहन मुझे एक डेथ सर्टिफिकेट लिखकर दे दो।’’
      चन्द्रमोहन और भी आफत में पड़ गये। क्या उत्तर दें, सोच रहे हैं। अकस्मात उनके दिमाग में एक बात आई और उन्होंने कहा- डेथ सर्टिफिकेट तो लिख देता; किन्तु आप तो बात कर रहे हैं; मृत व्यक्ति तो बात नहीं कर सकता।
      योगिराज हँस पड़े और कहा- ‘‘ठीक ही कहते हो; किन्तु जान लो, तुम लोगों के आधुनिक विज्ञान से ऊपर और भी बहुत कुछ जानने के लिये है। वहाँ तुम लोगों के विज्ञान की पहुँच नहीं है, किन्तु योगी सहजता के साथ ही उस ज्ञान की खोज कर सकते है।’’
      यह घटना चन्द्रमोहन के जीवन की एक अविस्मरणीय घटना थी। परवर्तीकाल में एक सफल चिकित्सक होने के बावजूद वे अध्यात्म-मार्ग के पथिक थे।
      

योगिराज-श्यामचरण लाहिड़ी part-1

भगवान शंकर का विराट मंदिर ...। चहुँ ओर ‘ऊँ नमः शिवाय’ महामंत्र की गूँज! वायुमंडल घंटियों के नाद से तरंगित था। मंदिर के परिसर में एक छोटे से बालक ने प्रवेश किया । उसके संग थी, उसकी माता मुक्ताकेशी। बालक का पूरा नाम था-श्यामचरण लाहिड़ी।
     मंदिर की पवित्र सुरभि से श्यामा अभिभूत था । उसकी आँखें छोटी-छोटी थीं। पर जिज्ञासाओं की कुंड थीं। वह मंदिर की स्थूलता में सूक्ष्मता को ढूँढ़ रहा था। दृश्यों में अदृश्य को भाँप रहा था। एकाएक उसकी दृष्टि भगवान शिव की मूरत की ओर सरक गई। अनुपम आकर्षण ने उसे बाँध लिया। यह आकर्षण भौतिक चमक या गुलाबी गुलाबों के प्रति नहीं था। वैराग्य के सौन्दर्य ने उसे मोह लिया था। जटाजूट! तन पर रमी भस्म! साधनस्थ मुद्रा की भव्यता! महादेव के ध्यान की गहराई में मुँदे नेत्र श्यामा को भा गए थे। उनके भाल पर समाई अतुलनीय शांति श्यामा में जिज्ञासाओं की खलबली मचा रही थी।
     उसने माता मुक्ताकेशी से पूछा- ‘माँ! ये कौन से भगवान जी हैं? ये नेत्र मँूद कर ऐसे क्यों बैठे हैं?’ माता मुक्ताकेशी धार्मिक वृत्ति की थी। अपनी पूर्व जानकारी के आधार पर बोली- ‘श्याम! ये देवाधिदेव भगवान शिव हैं। ये नेत्र मूँद कर ध्यान में लीन हैं!’
     श्यामा- माँ! तुम कहती हो कि भक्त ध्यान लगता है, अपने भगवान को पाने के लिए। पर फिर भगवान किसको पाने के लिए ध्यान कर रहे हैं? भगवान शिव तो स्वयं भगवान हैं! फिर वे किसकी साधना कर रहे हैं?
     मँ निरुत्तर हो गई। झुंझलाती हुई बोली- ‘तेरी छोटी सी बुद्धि की ये बड़ी-बड़ी उलझनें मैं नहीं सुलझा सकती। तू शिव जी से ही पूछ, वे ध्यान लगाकर क्या-क्या करते रहते हैं? ... और अभी चल, लोटा जल से भर और मेरे साथ कुछ पूजा-अर्चना कर लें।’
     कुछ समय के बाद माँ-बेटा वापिस घर लौट आए। पर श्यामा का मन और हृदय वहीं ध्यानस्थ शिव-मूरत के पास छूट गया था। घर के छोटे से मंदिर में स्थापित शिव-मूर्ति के सामने खड़ा होकर वह अक्सर पूछा करता- ‘भगवान जी! आप ध्यान क्यों लगाते हो?’
     एक दिन-मुक्ताकेशी की साँसें फूल रही थीं। जान साँसत में थी। वह श्यामा को खोज-खोज कर थक गई थी। उसका कुछ अता-पता नहीं था। उसके सारे मित्रों के घर-आँगनों में वह फेरी लगा आई थी। पर श्यामा कहीं नहीं मिला था। दोपरी के बाद... श्यामा मिला।
     मगर किस स्थिति में? गाँव के एक सुनसान क्षेत्र के एक वृक्ष की छाँव में! ध्यान की अवस्था में बैठा हुआ। अपनी देह पर उसने मिट्टी मली हुई थी। नेत्र मूँदे हुए वह गहनता में लीन था। गज़ब का स्वरूप था उसका- इतना दिव्य! इतना भव्य!
     मुक्ताकेशी तो ठगी-सी रह गई। विचारों की विद्युत उसके मानस में कौंध पड़ी- ‘हाय राम! जिस आयु में बालक मिट्टी में खेलते हैं, कपड़े सनते हैं- उसमें यह श्यामा मिट्टी को भभूति की तरह तन पर रमाकर बड़े-बड़े संन्यासियों जैसे ध्यान कर रहा है! चैकड़ी मारकर, रीढ़ तान कर, ऐसा अडोल बैठा है- मानो साक्षात् शिव की प्रतिमा हो!.... सच! अद्भुत है, मेरा श्यामा!’
     कुछ क्षणों के बाद, श्यामा ने आँखें खोलीं! मुक्ताकेशी उसके समीप ही बैठी थी। पहले शब्द जो श्यामा के मुख से झरे, वे थे- ‘माँ! मैं जान गया, शिव ध्यान लगाकर क्या करते हैं?’
     मुक्ताकेशी (श्यामा के कंधों पर से मिट्टी झाड़ते हुए)- क्या जाना तूने?
     श्यामा (गहरी वाणी में)- एक दिन मैं भी वही कार्य करुँगा।
     मुक्ताकेशी- ऐसा क्या करते हैं शिव? और ऐसा क्या करना है तुझे, जो शिव करते हैं?
     श्यमा मौन रहा। उसके स्वर गहन तंद्रा में खो गए। शायद उसकी चेतना को दिव्य रहस्य खोलना अभी मंजूर नहीं थ। पर आगे चलकर.... स्वयं समय ने सकल समाज को इन सवालों का जवाब दिया।
     33 वर्ष की आयु में श्यामा को गुरु मिले- महावतार बाबा। पूर्व जन्मों की साधना प्रखर रूप से प्रकट हुई। सुषुप्ति में सोया गुरुत्व जागृत हुआ। यही श्यामा प्रतिष्ठित हुआ- सद्गुरु श्यामाचरण लाहिड़ी के रूप में! वही सद्गुरु- जो जीवंत शिव हुआ करते हैं। साक्षात् महेश्वर के प्रतिरूप!
     लाहिड़ी महाशय का एक शिष्य था- कृष्णराम- एकनिष्ठ गुरु भक्त! अनूठी प्रीति थी, उसकी गुरु-चरणों के प्रति! गुरु के हाथों में वह शिलावत समर्पण कर चुका था। इसलिए लाहिड़ी महाशय भी उसके अस्तित्व के हर स्तर पर शिव के समान आसीन थे।
     एक दिन... लाहिड़ी महाशय के श्री चरण बनारस की गलियों को पावन कर रहे थे। कृष्णराम उनके पद्चिह्नों का अनुसरण कर रहा था। भीड़भाड़ वाली गलियों से दोनों तनिक आगे निकलकर खुले मैदान में पहुँच गए। सहसा लाहिड़ी जी का स्वर उभरा- ‘कृष्णराम! कपड़े का एक टुकड़ा मुझे देना।’
     कृष्णराम में थोड़ा अचम्भा जागा। उसने बुद्धि के अश्व दौड़ाए और बोला- ‘गुरु जी, कहीं की सफाई करनी है, तो मुझे बताइए। मैं वहाँ कपड़ा फेर देता हँू।
     लाहिड़ी जी रहस्यमयी भाव से मुस्कुराए, बोले- ‘सफाई तो करनी है। पर वह तुम नहीं कर पाओगे। हमें ही करनी होगी।... लाओ, हमें एक कपड़े का टुकड़ा दो।’
     जब गुरु-वचन मन-बुद्धि की पकड़ में न आएँ, तो शिष्य को बेतर्क-बेशर्त समर्पण कर देना चाहिए। वही कृष्णराम ने किया। तुरन्त अपनी धोती की किनारी को फाड़ा और टुकड़ा लाहिड़ी जी को सौंप दिया।
     गुरु और शिष्य पुनः मैदान में आगे बढ़ने लगे। अभी कुछ ही क्षण बीते होंगे... मैदान के पास स्थित पहाड़ी पर जो रास्ता था, उससे एक बैलगाड़ी गुज़र रही थी। सहसा उसका पहिया एक पत्थर से टकराया और उससे एक टुकड़ा छिटककर नीचे लुढ़कने लगा। लुढ़कता हुआ वह सीधा लाहिड़ी महाशय की टाँगा से जा टकराया। ऐसा आघात किया कि वहाँ गहरा घाव बन गया।
     कृष्णराम चीखा- ‘गुरु जी!... आह! यह कैसे...? आप यहाँ आइए...इधर...इधर... इस वृक्ष की छाँव तले बैठिए।’ कृष्णराम ने सहारा देकर लाहिड़ी महाशय जी को बिठाया। फिर उसने घाव देखा, जो कि गहरा था। रक्त-धार देखकर वह बौरा सा गया। अफरा-तफरी में उसने अपने गमछे से घाव को साफ किया। फिर बदहवास स्थिति में बड़बड़ाया- ‘औषधि!.... मैं कहीं आसपास से औषधि लेकर आता हँू। आप तनिक यहीं ठहरिए।’
     इधर लाहिड़ी महाशय सहज थे, स्थिर थे। ठीक जैसे एक राजा द्रष्टा बनकर अपने ही आदेश को क्रियान्वित होते देखता है। उन्होंने मुस्कुराते हुए कपड़े का वही टुकड़ा जो पहले ही कृष्णराम से लेकर अपने पास रख लिया था, उसे अपनी टाँग पर बाँधा और खड़े हो गए।
     औषधि के लिए इधर जाऊँ या उधर- कृष्णराम दाएँ-बाएँ ताँक-झाँक कर रहा था। लाहिड़ी जी ने उसके कंधे पर अपना हाथ रखा, उसे थपथपाया और समझाया- ‘ठहर जा कृष्णराम! ठहर जा!... कहीं नहीं जाना। हमने उस कपड़े से पट्टी बाँध ली है। यदि औषधि की दरकार होती, तो हम उसे भी संग लेकर चलते।’
     गुरु के ये वचन कृष्णराम पर बिजली से कौंधे। घबराहट को चीरकर विवके का प्रकाश प्रगटा। कृष्णराम ने दोनों हाथ जोड़ दिए। ‘गुरु जी!... इसका अर्थ है, आप पहले ही जानते थे कि यह दुर्घटना घटने वाली है! इसीलिए वह कपड़े का टुकड़ा आपने लिया था। है न जी?’ - कृष्णराम ने उत्सुकता से पूछा। लाहिड़ी महाशय जी के होठों पर सरल सी हँसी खेल गई।
     कृष्णराम के मन का अवसाद वाणी में भर आया- ‘तो फिर गुरु जी, आपने अपनी रक्षा क्यों नहीं की? जब चट्टान लुढ़क रही थी, तब आप आगे या पीछे हो जाते। स्वयं को यह पीड़ा क्यों होने दी? कहिए न!...’
     योगीराज ने तिरछी दृष्टि से कृष्णराम की ओर निहारा और रहस्योद्घाटन किया- ‘क्योंकि पगले, हम स्वयं ही यह दुर्घटना होने देना चाहते थे। हमने तुझे कहा था न, हमें सफाई करनी पडे़गी- इस दुर्घटना से कर्म-संस्कारों की ही सफाई करनी थी हमें।’
     कृष्णराम- पर गुरु जी, आप तो कर्म-बंधनों से मुक्त हैं। आप पर किसी कर्म-संस्कार की गठरी नहीं, फिर आपने यह फल क्यों भोगा?
     योगीराज लाहिड़ी- अरे भोलेराम, ये मेरे नहीं, तेरे कर्म-संस्कारों का प्रतिफल था। नियति ने तुझे आजीवन अपाहिज़ बना देने के लिए आज का दिवस तय किया था। इस पत्थर का असहनीय आघात तेरी टाँग पर होना था।
     घाव देखकर कृष्णराम के कलेजे पर जो भार पड़ा था, वह इस बात को सुनकर और अधिक भारी हो गया। नयनों के किवाड़ों पर जो अश्रु थमे थे, वे अपनी सीमा लाँघ गए। कृष्णराम सुबकने लगा। उसका कंठ ऐसा रुंधा कि आगे कुछ पूछ नहीं पाया। उसकी अंतरात्मा कैलाश की उस ऊँची चोटी का दर्शन कर उठी, जहाँ गुरुदेव योगीराज लाहिड़ी जी साक्षात् शिव स्वरूप में स्थित थे! शिष्य के कर्म-संस्कारों के संहारक शिव!
     वापिस आश्रम में.... माता काशीमणि (लाहिड़ी जी की पत्नी) को कृष्णराम ने सारी बात बताई। वे औषधि व लेप आदि लेकर योगीराज के कक्ष में पहुँची। संग में कृष्णराम भी था, जो कृतज्ञता के भार से सिर नहीं उठा पा रहा था।
     काशीमणि (कक्ष में प्रवेश करते ही)- स्वामी, वह कृष्णराम बता रहा था कि....
     योगीराज लाहिड़ी- हाँ! हाँ!... छोटी-मोटी चोट ही है। कृष्णराम तो बतंगड़ बना रहा है।
     कृष्णराम मौन रहा। बस उसने झुककर योगीराज की धोती तनिक ऊपर की और काशीमणि को बंधी हुई पट्टी दिखाई। काशीमणि ने तुरन्त पट्टी खोली। यह क्या!! चर्म स्वस्थ थी। घाव था ही नहीं!...
     इतने में काशीमणि की नज़र दूसरी टाँग पर गई। उन्होंने वहाँ से धोती हटाकर देखा, तो बड़ा गहरा घाव वहाँ दिखाई दिया। काशीमणि अचम्भित! बौराई आँखों से वह कभी पट्टी देखतीं, कभी घाव, तो कभी योगीराज का मुखमंडल! कृष्णराम भी प्रहेलिका में उलझा था।
     योगीराज हँसते हुए बोले- ‘इसमें इतना अचकचाने की क्या बात है!... उस समय यह पगला कृष्णराम तो बदहवास था। औषधि के लिए इधर-उधर ताँक-झाँक कर रहा था। इसलिए मैंने स्वयं ही पट्टी बाँध ली थी। इसे संभालने के चक्कर में मुझे भी ध्यान नहीं रहा। मैंने गलती से दूसरी टाँग पर पट्टी बाँध ली।... चलो छोड़ो! लाओ, भई लाओ, लेप लगाओ इस घाव पर!’
     कृष्णराम- आप और गलती? जो गुरुदेव विधि के जटिल गणित में हेर-फेर कर अपने नए समीकरण बनाते हैं- वे पट्टी बाँधने में गलती कर दें! ऐसा मैं मान ही नहीं पा रहा, योगीराज। आप मुझे क्या समझना चाहते हैं, कृपया स्पष्ट शब्दों में समझाएँ।
     योगीराज लाहिड़ी- कृष्णराम! घाव दे हके हैं। पीडाएँ देह की हैं। तू देह में रहता है, इसलिए इन यातनाओं से बद्ध है। मैं आत्मा में रहता हँू, ब्रह्म में स्थित हँू। इसलिए मुझे ये पीड़ा-तीड़ा नहीं व्यापती। पंचभूत निर्मित देह लेकर इसीलिए साकार होता हूँ ताकि...

     कृष्णराम (सुबकता हुआ)-ताकि मुझ जैसे निम्न कोटि के, देहासक्त साधक के कर्म-संस्कारों को अपनी देह पर भोग सकें! हैं न जी?... परन्तु गुरुदेव, आपकी यह पावन-पुनीत देह संसार के लाखों अनुयायिों के जीवन का केन्द्र है। यह मेरे कारण आहत हो, यह मुझे गंवारा नहीं। हे योगीराज! मैं संकल्प करता हँू, ऐसी साधना करुँगा कि मेरे पूर्व कर्म-संस्कार ज्ञानाग्नि में दग्ध हो जाएँ! मन-वचन-कर्म से आपको इतना समर्पित रहूँगा कि नए कर्म-संस्कारों की गठरी न बनने पाए।    

Monday, January 4, 2016

अनन्त सुप्त शक्तियों का भाँडागार-सहस्त्र कमल


शास्त्रों में कुण्डलिनी को अनेक शक्तियों का प्राण कहा है। सुषुप्त पड़ी कुण्डलिनी को जागृत कर लेने वाला इस लोक के अनन्त ऐश्वर्य का स्वामी वन जाता है। भारतवर्ष में इस विद्या की शोध की गई है। कुण्डलिनी शक्ति की कोई सीमा और थाह नहीं है।
किन्तु कुण्डलिनी जागृत कर लेना जीव का अन्तिम लक्ष्य नहीं है। जीव का अन्तिम लक्ष्य है मोक्ष की प्राप्ति या ब्रह्म निर्वाण। अपने आपको ब्रह्म की सायुज्यता में पहुँचा देना ही मनुष्य देह धारण करने का उद्देश्य है अनेक साधन और योग उसी के लिये बने हैं। कुण्डलिनी का भी वही उद्देश्य है उस पर अपनी टिप्पणी करते हुए योग प्रदीपिका में लिखा है-
उद्घाटयेत्कपार्ट तु यथा कुँचिकया हठात्।
कुँडलिन्या तथा योगी मोक्ष द्वारं विभेदयेत्॥
(105)
अर्थात् जिस प्रकार कोई मनुष्य अपने बल से द्वार पर लगी हुई अगँला आदि को ताली से खोलता है उसी प्रकार योगी कुण्डलिनी के अभ्यास द्वारा सुषुम्ना के मार्ग का भेदन करता है और ब्रह्म-लोक में पहुँच कर मोक्ष को प्राप्त होता है।
शिर के मध्य से (ब्रह्मरंध्र) में 1 हजार पंखुड़ियों का कमल है उसे ही सहस्रार चक्र कहते हैं उसी में ब्राह्मी शक्ति या शिव का वास बताया गया है यहीं आकर कुण्डलिनी शिव से मिल गई है। इसे आत्मा का स्थान, सूत्रात्मा धाम आदि कहते हैं। यहीं से सारे शरीर की गतिविधियों का उसी प्रकार संचालन होता है जिस प्रकार पर्दे में बैठा हुआ कलाकार उँगलियों को गति दे-देकर कठपुतलियों को नचाया करता है। विराट् ब्रह्माण्ड में हलचल पैदा करने वाली सूत्र शक्ति और विभाग इस सहस्रार कमल के आसपास फैल पड़े हैं। यहीं अमृत पान का सुख, विश्व-दर्शन संचालन की शक्ति और समाधि का आनन्द मिलता है। यहाँ तक पहुँचना बड़ा कठिन होता है। अनेक साधक तो नीचे के ही चक्रों में रह जाते हैं उनमें जो आनन्द मिलता है उसी में लीन हो जाते हैं। इसलिये कुण्डलिनी साधना द्वारा मिलने वाली प्रारम्भिक सिद्धियों को बाधक माना गया है। जिस प्रकार धन-वैभव ऐश्वर्य और सौंदर्यवान युवती पत्नियों का सुख पाकर मनुष्य संसार को ही सब कुछ समझ लेता है उसी प्रकार कुण्डलिनी का साधक भी बीच के ही छः चक्रों में दूर दर्शन, दूर श्रवण, दूसरों के मन की बात जानना, भविष्य दर्शन आदि अनेक सिद्धियाँ पाकर उनमें ही आनन्द का अनुभव करने लगता है और परम-पद का लक्ष्य अधूरा ही रह जाता है।
सहस्रार चक्र में पहुँच कर भी साधक बहुत समय तक उस पर स्थिर नहीं रह पाते हैं। वह साधक की आन्तरिक और आध्यात्मिक शक्ति तथा साधना के स्वरूप पर निर्भर है कि वह सहस्रार में कितने समय तक रहता है उसके बाद वह फिर निम्नतम लोकों के सुखों में जा भटकता है पर जो अपने सहस्रार को पका लेते हैं वह पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त कर अनन्त काल तक ऐश्वर्य सुखोपभोग करते हैं।
सहस्रार दोनों कनपटियों से 2-2 इंच अन्दर और भौहों से भी लगभग 3-3 इंच अन्दर मस्तिष्क के मध्य में “महाविवर” नामक महाछिद्र के ऊपर छोटे से पोले भाग में ज्योति-पुँज के रूप में अवस्थित है। कुण्डलिनी साधना द्वारा इसी छिद्र को तोड़ कर ब्राह्मी स्थिति में प्रवेश करना पड़ता है इसलिये इसे “दशम द्वार” या ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं।
इस स्थान पर पहुँचने की शक्यों का वर्णन करते हुए शास्त्रकार ने कहा है-तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारी भवति” अर्थात् वह परम विज्ञानी, त्रिकालदर्शी और सब कुछ कर सकने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है वह चाहे जो कुछ करे उसे कोई पाप नहीं होता। उसे कोई जीत नहीं सकता।
ब्रह्मरंध्र एक प्रकार से जीवात्मा का कार्यालय इस दृश्य जगत में जो कुछ है और जहाँ तक हमारी दृष्टि नहीं पहुँच सकती उन सबकी प्राप्ति की प्रयोगशाला है। भारतीय तत्त्वदर्शन के अनुसार यहाँ 17 तत्त्वों से संगठित ऐसे विलक्षण ज्योति पुँज विद्यमान् हैं जो दृश्य जगत में स्थूल नेत्रों से कहीं भी नहीं देखे जा सकते। समस्त ज्ञानवाहक सूत्र और बात नाड़ियाँ यहीं से निकल कर सारे शरीर में फैलती हैं। सूत्रात्मा इसी भास्कर श्वेत दल कमल में बैठा हुआ चाहे जिस नाड़ी के माध्यम से शरीर के किसी भी अंग को आदेश-निर्देश और सन्देश भेजता ओर प्राप्त करता रहता है। वह किसी भी स्थान में हलचल पैदा कर सकता है किसी भी स्थान की बिना किसी बाध्य-उपकरण के सफाई ओर प्राणवर्धा आदि, जो हम सब नहीं कर सकते वह सब कुछ कर सकता है। यह सब ज्योति पुञ्जों के स्स्रण आकुंचन-प्रकुञ्चन आदि से होता है। नाक, जीभ, नेत्र, कर्ण, त्वचा इन सभी स्थूल इन्द्रियों को यह प्रकाश-गोलक ही काम कराते हैं और उन पर नियन्त्रण सहस्रारवासी परमात्मा का होता है। ध्यान की पूर्वावस्था में यह प्रकाश टिमटिमाते जुगनू चमकते तारे, चमकीली कलियाँ, मोमबत्ती, आधे या पूर्ण चन्द्रमा आदि के प्रकाश-सा झलकता है। धीरे-धीरे उनका दिव्य रूप प्रतिभासित होने लगता है उससे स्थूल इन्द्रियों की गतिविधियों में शिथिलता आने लगती है और आत्मा का कार्य-क्षेत्र सारे विश्व में प्रकाशित होने लगता है। सामान्य व्यक्ति को केवल अपने शरीर और सम्बन्धियों तक ही चिन्ता होती है उस पर योगी की व्यवस्था का क्षेत्र सारी पृथ्वी, और दूसरे लोकों तक फैल जाता है उसे यह भी देखना पड़ता है कि ग्रह-नक्षत्रों की क्रियायें भी तो असंतुलित नहीं हो रही। स्थूल रूप से इन गतिविधियों से पृथ्वी वासी भी प्रभावित होते रहते हैं इसलिये अनजाने में ही ऐसी ब्राह्मी स्थिति का साधक लोगों का केवल हित संपादित किया करता है। उसे जो अधिकार और सामर्थ्य मिली होती हैं वह इतने बड़े उत्तरदायित्व को संभालने की दृष्टि से ही होती है। वैसे वह भले ही शरीरधारी दिखाई दे पर उसे शरीर की सत्ता का बिलकुल ज्ञान नहीं होता। वह सब कुछ जानता, देखता, सुनता और आगे क्या होने वाला है वह सब पहचानता है।

विज्ञानमय कोष और मनोमय कोष के अध्यक्ष मन और बुद्धि यहीं रहते हैं और ज्ञानेन्द्रियों से परे दूर के या कहीं भी छिपे हुए पदार्थों के समाचार पहुँचाते रहते हैं। आत्म-संकल्प जब चित्त वाले क्षेत्र से बुद्धि क्षेत्र में पदार्पण करता है तब दिव्य दृष्टि बनती है और वह आज्ञा चक्र से निकल कर विश्व ब्रह्माण्ड में जो अनेक प्रकार की रश्मियाँ फैली हैं उनसे मिलकर किसी भी लोक के ज्ञान को प्राप्त कर लेती है। विद्युत तरंगों के माध्यम से जिस प्रकार दूर के अन्तरिक्ष यानों को पृथ्वी से ही दाहिने-बायें (ट्रीवर्स) किया जा सकता है। जिस प्रकार टेलीविजन के द्वारा कहीं का भी दृश्य देखा जा सकता है उसी प्रकार बुद्धि और संकल्प की रश्मियों से कहीं के भी दृश्य देखे जाना या किसी भी हलचल में हस्तक्षेप करना मनुष्य को भी सम्भव हो जाता है। मुण्डक और छान्दोग्य उपनिषदों में क्रमशः खण्ड 2 और 9 में इन साक्षात्कारों का विशद वर्णन है और कहा गया है-हिरण्यभये परेकोणे विरजं ब्रह्म निष्फलं, तच्छुत्रं ज्योतिषाँ ज्योति तद् परात्मनो बिदुः” अर्थात् आत्मज पुरुष इस हिरण्मयं कोष में शुभ्रतम ज्योति के रूप में उस कला रहित ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं।

धीरे-धीरे विज्ञान भी इन मान्यताओं पर पहुँचने लगा है। पाश्चात्य देशों में मस्तिष्क के अनेक आश्चर्यजनक तथ्यों की खोज की गई है। यद्यपि अभी उनकी जानकारी बहुत स्वल्प और सीमित है तथापि उससे भारतीय तत्त्व दर्शन की पुष्टि को बड़ा बल मिला है। लोग यह मानने लगे हैं कि मस्तिष्क में ऐसे तत्त्व हैं जो अधिक नहीं तो किसी भी पुस्तक के 20 अरब पृष्ठों से भी अधिक ज्ञान भण्डार अपने मस्तिष्क में सुरक्षित रख सकते हैं। एक व्यक्ति एक दिन में लगभग 50 लाख चित्र देखता है। चित्रों के साथ ही वह उनकी बनावट, रंग-रूप ध्वनि, सुगन्ध और मनोभावों का भी आकलन करता है। कुछ समय बाद वह चित्र और पढ़ा हुआ सब विस्तृत हो जाता है। हम केवल यह बातें याद रख पाते हैं जो या तो बहुत आकर्षक रहीं हो अथवा जिनसे अपने जीवन का कोई अंश या सम्पूर्ण जीवन बहुत तीव्रता से प्रभावित हुआ है। ऐसी अविस्मरणीय घटनाओं को छोड़ कर शेष सब भूल जाता है किन्तु ऐसा सोचना भारी भूल है। जिस तरह प्रभावी घटनाओं को हम सेकेण्डों में दोहरा लेते हैं उसी प्रकार मस्तिष्क के तहखानों में संगृहीत प्रति सेकेण्ड एक चित्र की दर से अब तक जो कुछ देख, सुन सके हैं उस सबको कभी भी किसी भी समय मस्तिष्क की पेटी से खोलकर ढूँढ़ा और उसी तरह रंग, वर्ण, सुगन्ध आदि के साथ देखा जा सकता है जिस तरह किसी समय देखा गया है।
इस दिशा में प्रसिद्ध अमरीकी डाक्टर बिल्डर पेनफील्ड ने उल्लेखनीय खोजें की हैं। उन्होंने मस्तिष्क की अनेक बात नाड़ियों की विद्युत इलेक्ट्रान छुआकर देखा कि कोई विशेष नस या नाड़ी उत्तेजित करने से विलक्षण याददाश्तें आती हैं। उन्होंने एक एक बार 9 वर्षीय लड़की पर प्रयोग किया। मस्तिष्क के एक भाग पर विद्युत आवेश देते ही वह एक घटना सुनाने लगी-मैं अपने भाइयों के साथ खेत में घूम रही थी। मेरे भाई मुझे चिढ़ाने के लिये खेत में छुप-छुप जाते। इस तरह मैं उनसे भटक गई तभी एक आदमी दिखाई दिया। कोई सपेरा था। उसने मुझे साँपों का थैला दिखाया तो मैं डर गई और भागकर हाँफते हुए घर पहुँची।”
जब डा.पेनफील्ड ने उस लड़की की माता से पूछा तो माता ने बताया कि सचमुच जब वह 3 वर्ष की थी तब ऐसी घटना घटी थी। आमतौर पर 3 वर्ष की बालिका को कोई घटनायें याद नहीं रहतीं पर इस प्रयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि मनुष्य के मस्तिष्क में न जाने कितने जीवनों के संस्कार छिपे पड़े हैं और वह फिल्म की रील की तरह जाग्रत और स्वप्नावस्था में गूँजते रहते हैं।
यह घटना ऐसी थी जो केवल वर्तमान जीवन के ही अदृश्य भाग से सम्बन्धित थी पर एक बार उन्होंने एक लड़के पर जब ऐसा ही प्रयोग किया तो वह लड़का एक मधुर गीत गुनगुनाने लगा। वह गीत रिकार्ड पर लिया गया। यद्यपि उसे वह लड़का भी नहीं जानता था पर पीछे पता लगाने पर मालूम हुआ कि वह गीत किसी अन्य भाषा का अर्थयुक्त सुन्दर गीत था। इस घटना को मस्तिष्क की “सर्वज्ञता” शक्ति के रूप में भी लिया जा सकता है और पुनर्जन्म के भी रूप में। किसी भी रूप में ले सूत्रात्मा की अमरता या उनकी अक्षय शक्ति ही सिद्ध होती है। डा.पेनफील्ड ने अनेक ऐसे प्रयोग किये जो कर्मफल की भी पुष्टि करने में समर्थ हैं।
डा. पेनफील्ड के पास ऐसा रोगी आया जिसे मिर्गी आती थी। उसका आपरेशन करके उन्होंने देखा कि जब मिर्गी आती है तो एक विशेष नस ही उत्तेजित होती है उसे काटकर अलग कर दिया तो वह रोगी सदा के लिए अच्छा हो गया। बाद में पेनफील्ड ने बताया कि मस्तिष्क में कई अरब प्रोटीन-अणु पाये जाते हैं इन प्रोटीन-अणुओं में औसत आयु 70 वर्ष के लगभग सवा दो अरब सेकेण्ड होते हैं इन क्षणों में जागृत स्वप्न में वह जो कुछ देखता, सुनता और अनुभव करता है वह सब मस्तिष्क के कार्यालय में जमा रहता है और उसमें से किसी भी अंश को विज्ञान की मदद से पढ़ा जाना सम्भव है। मस्तिष्क के 10 अरब स्नायु नसों में अगणित आश्चर्य संगृहीत है उन सबकी विधिवत् जानकारी करने वाला कोई यन्त्र बना सका तो जीव किन-किन योनियों में कहाँ-कहाँ जन्म लेकर आया है और उसने कब क्या पाप, क्या पुण्य किया है उस सबकी जानकारी प्राप्त करना सम्भव हो जायेगा। उन सबकी याददाश्त दिलाने वाला सहस्रार में बैठा हुआ वह क्रिस्टल मात्र है जिसे हमारे धर्म ग्रन्थों में सूक्ष्मात्मा कहते हैं।
इस आचरण की पुष्टि के लिये हनावा होकाइशी (जापान) का एक उदाहरण दिया जा सकता है। 101 वर्ष की आयु में मरने वाले इस ज्ञान के अवतार का जन्म सन् 1722 में हुआ था और मृत्यु 1883 में। जब वह सात वर्ष का था विधाता ने उससे नेत्र-ज्योति छीन ली। उसने नेत्रहीन होकर भी ज्ञानार्जन की साधना आरम्भ की। उसने 40 हजार पुस्तकें पढ़ीं। कुछ ग्रन्थ तो उसे केवल एक बार ही सुनाये गये थे। उसके मस्तिष्क में ज्ञान का अनन्त भण्डार जमा हो गया। वह ऐसे उदाहरण प्रस्तुत कर देता था जो कभी औरों की कल्पना में भी न आते थे। अपने मित्रों के आग्रह पर उसने एक पुस्तक लिखी जो 2810 खण्डों में तैयार हुई। क्या इसे मस्तिष्क की साधारण शक्ति कहा जा सकता है?
कुछ वर्ष पूर्व इच्छा शक्ति के चमत्कारों का प्रत्यक्ष प्रदर्शन के लिए डॉ. एलेक्जेण्डर ने एक सार्वजनिक प्रदर्शन मैक्सिको में किया था। प्रदर्शन यह था कि आकाश में छाये बादलों को किसी भी स्थान से- किसी भी दिशा में हटाया जा सकता है और उसे कैसे ही शकल दी जा सकती है। उन्हें बुलाया जा भगाया जा सकता है। नियत समय पर प्रदर्शन हुआ। उस समय आकाश में एक भी बादल नहीं था। पर प्रयोगकर्ता ने देखते-देखते घटायें बुला दीं और दर्शकों की माँग के अनुसार बादलों के टुकड़े अभीष्ट दिशा में बखेर देने और उनकी विचित्र शक्लें बना देने का सफल प्रदर्शन किया।
अमेरिका के अलवामा राज्य में ‘गाड्स डेन’ नगर के समीप एक इसी प्रकार का आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न युवक फ्रैंक रेन्स रहता है। उसे सिर्फ अंग्रेजी ही आती है। इस युवक की विशेषता यह है कि आप दुनिया की कोई भी भाषा उसके सामने किसी भी लहजे में बोलें, वह आप के साथ-साथ उसी लहजे में धारा प्रवाह बोलता चला जायेगा। एक शब्द के बाद दूसरा कोन-सा शब्द बोला जाएगा यह उसे खुद-ब-खुद मालूम हो जाता है और सेकेंड का भी अन्तर किये बिना वह सारी बातें उस व्यक्ति के साथ-साथ बोलता चला जाता है। इसे देखने में ऐसा लगता है मानो एक ही ग्रामोफोन से बस्टिरियों की तरह दो लाउडस्पीकर जुड़े हुए हों। टी. वी. के कुछ कार्यक्रमों में फैंकरेन्स ने गाने भी गाये। गीत साथ वाले गायक के स्वर लय से मिलाकर इस प्रकार गाया गया मानो फ्रैंक को वह गीत पहले से ही आता हो। एक अन्य अवसर पर रेन्स को लोलोब्रिगिडा नामक एक महिला से पाला पड़ा। वह अनेक भाषाएँ जानती थी, किन्तु फ्रैंक उन सभी भाषाओं को उसी प्रकार दोहराता गया जैसे वह महिला बोल रही थी। लोलोब्रिगिडा ने कुछ बनावटी शब्द भी कहे जिनका न तो कोई अर्थ था न ही वे किसी भाषा से संबद्ध थे। पर फ्रैंक ने उन्हें ज्यों का त्यों दुहरा दिया।

वैज्ञानिकों के लिए अतीन्द्रिय क्षमताएँ चुनौती और गुत्थी बनकर खड़ी हैं जो उनके वैज्ञानिक नियमों को ऐसे लांघ जाती हैं जैसे वायु बहुमंजिली इमारतों को। इटली का गियोवानी गलान्ती रात के अन्धेरे में ऐसे पढ़ता है जैसे सूरज की रोशनी में सामान्य आदमी। जम्मू शिक्षा विभाग के एक कर्मचारी गोपीकृष्ण साधारण हिन्दी पढ़े हैं, छोटी कक्षाओं के अध्यापक थे। एक बार उन्हें ऐसा लगा कि वे कई भाषाएँ जानते हैं। तब से वे जर्मन, फ्रेंच, ग्रीक, अरबी, संस्कृत आदि कई भाषाओं में न केवल वार्तालाप करने लगे वरन् भावभरी कविताएँ भी रचने लगे। उस विलक्षण उभार के सम्बन्ध में अनेक अनुसंधानकर्ताओं ने खोजबीन भी की है।