Wednesday, February 10, 2016

सर्दियों में पैरों के ठंडे पंजे

 सर्दियों में पैरों के पंजे बहुत ठंडे पड़ जाते हैं और अनेक तरह के पापड़ बेलने पर भी गर्म नहीं होते। यह समस्या पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में अधिक होती है। युवाओं में कम और बुजुर्गों में अधिक पाई जाती है शारीरिक दृष्टि से पैर ठंडे तब होते हैं जब आॅक्सीजन और रक्त का संचरण कम हो जाता है। रक्त संचार सुधरते ही यह समस्या समाप्त हो जाती है। हाथों की अंगुलियां भी ठंड में इसी कारण ठिठुरती हैं।
            यह व्याधि शूगर, रक्त अल्पता, परिधीय नाड़ी ;च्मतपचीमतल दमतअमेद्ध रोग, हाइपोथाइरायड, शराब, तम्बाकू के सेवन, कब्ज-कुपचन आदि से पीडि़त व्यक्तियों में अधिक होती है। इसके लिये कुछ घरेलू उपचार और सावधानियाँ नीचे दी गई हैं-
1.         गर्म तेल की मालिश- मालिश हाथों-पैरों को गर्म रखने का सरल उपचारात्मक तरीका है। सरसों, तिल या नारियल के तेल को थोड़ी देर माइक्रोवेव में रखकर पैरों की मालिश करें। लगभग पाँच मिनट तक एक पाँव तथा फिर दूसरे पाँव की मालिश करें। सोने से पहले मालिश करके गर्म जुराब डाल लें।
2.         जलीय उपचार- सोने से पहले 15-20 मिनट तक गर्म पानी में पैर डुबोये रखें। तौलिये से पोंछ कर गर्म जुराब डाल लें। दिन में धूप में बैठ कर पैरों को पहले 2-3 मिनट गर्म पानी में पैर डुबोये रखें। इस क्रिया को दिन में 3-4 बार दोहराएँ।
3.         पैरों की कसरत- पैरों में रक्त संचार बढ़ाने के लिये पैरों की कसरत आवश्यक है। पैरों के पंजों पर एक मिनट तक खड़े रहें। फिर धीरे-धीरे एडि़याँ जमीन पर टिका लें। पैर सामने की ओर फैला कर पंजों को खींच कर धीरे-धीरे गोल घुमाएँ। एडि़याँ उठाकर दस कदम पंजों पर चलें। फिर पंजे उठाकर 10-11 कदम एडि़यों पर चलें। दस मिनट तक इस क्रिया को सुबह-शाम दिन में दो बार करें।
4.         एपसम साॅल्ट ;डंहदपेपनउ ैनसंिजमद्ध - हाथ पैरों के ठंडे होने का एक कारण शरीर में मैगनीशियम की कमी भी होती है। आधा कप एपसम साॅल्ट एक टब पानी में अच्छे से घोल कर उसमें पैर डुबो कर बैठे रहें। इस क्रिया को प्रतिदिन नहीं करें। सप्ताह में पहले दो बार, फिर एक बार करें।
मेगनीशियम से विटामिन ‘डी’ का अवशोषण बढ़ जाता है। शरीर इस तत्व को अधिक लम्बे समय तक नहीं रोक सकता। अतः इसके लिये प्रतिदिन भोजन में इसे सम्मिलित करना आवश्यक है। इसके लिये सरसों का साग, शलगम, शकरकंद, तिल, अखरोट, बादाम आदि का सेवन बढ़ाएँ। यह तत्व लहसुन और लाल मिर्च में भी होता है।
5.         अदरक- अदरक के तत्व शरीर को गर्मी प्रदान करते हैं। धीमी आँच पर एक गिलास पानी में एक चम्मच अदरक के टुकड़े उबाल लें। शहद डालकर सप्ताह मं दो बार पिएँ। अदरक उबाल कर उसके पानी में पैर डुबोकर बैठ जाएँ। 10-15 मिनट बाद पैर निकालें। अदरक की चाय बनाकर भी पी सकते हैं।
6.         धूप में बैठना और घास पर चलना-सर्दियों में नंगे पैर घास पर चलने से उनमें रक्त संचरण बढ़ जाता है। दोपहर को धूप में बैठें। इससे पैरों की नसों-मांसपेशियों की ऐंठन समाप्त हो जाती है। इन क्रियाओं से विटामिन ‘डी’ की कमी पूरी हो जाती है।
7.         शरीर में लौह तत्व बढ़ाएँ- रक्त में हीमोग्लोबिन की कमी के कारण शरीर में आॅक्सीजन की पूर्ति नहीं हो पाती है। लौह तत्व पूर्ति के लिये खजूर, सेब, आँवला, मेवे, पालक, मेथी, अलसी आदि का सेवन अधिक करें।
8.         कुर्सी पर बैठकर पैर सामने स्टूल पर रखें। पैरों को अधिक देर तक लटका कर नहीं बैठें।
9.         तेज चाल से सैर प्रतिदिन करें। योगासन तथा प्राणायाम का अभ्यास बहुत लाभकारी है। इस अभ्यास से रक्त दबाव, मधुमेह ठीक रहेगा और हाथों-पैरों में रक्त संचार बढ़ जायेगा।

10.       स्वस्तिक आसन में बैठें।      
From Yog Manjari

Live as your Biological Clock

1.         प्रातः 3 से 5 बजे- यह ब्रह्म मुहूर्त का समय है। इस समय फेफड़े सर्वाधिक क्रियाशील रहते हैं। ब्रह्म मुहूर्त में थोड़ा-सा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना चाहिए। इस समय गहरे-लम्बे श्वास लेने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आॅक्सीजन) विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिवान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है और सोते रहने वालों का जीवन निस्तेज हो जाता है।
2.         प्रातः 5 से 7 बजे- इस समय बड़ी आँत क्रियाशील होती है। जो व्यक्ति इस समय भी सोते रहते हैं या मल-विसर्जन नहीं करते, उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं। अतः प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल त्याग कर लेना चाहिए।
3.         सुबह 7 से 9 बजे व 9 से 11 बजे- 7 से 9 बजे तक आमाशय क्रियाशील होता है। उसके बाद 9 से 11 बजे तक अग्नाशय व प्लीहा सक्रिय रहते हैं। इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। अतः करीब 9 से 11 बजे का समय भोजन के लिए उपयुक्त है। भोजन से पहले रं-रं-रं बीज मंत्र का जप करने से जठराग्नि और भी प्रदीप्त होती है। भोजन के बीच-बीच में गुनगुना पानी थोड़ी मात्रा में घूँट-घूँट करके पिया जा सकता है।
इस समय अल्पकालिक स्मृति सर्वोच्च स्थिति में होती है तथा एकाग्रता व विचारश्क्ति उत्तम होती है। अतः तीव्र क्रियाशीलता का समय है। इसमें दिन के महत्वपूर्ण कार्यों को प्रधानता देनी चाहिये।
4.         दोपहर 11 से 1 बजे तक- इस समय ऊर्जा का प्रवाह हृदय में विशेष होता है। करुणा, दया, प्रेम आदि हृदय की संवेदनाओं को विकसित एवं पोषित करने के लिए दोपहर 12 बजे के आसपास मध्यान्ह संध्या का विधान हमारी संस्कृति में है।
5.         दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक- इस समय छोटी आँत विशेष सक्रिय रहती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर ढकेलना है। लगभग इस समय अर्थात् भोजन के करीब 2 घटें बाद प्यास के अनुसार पानी पीना चाहिए, जिससे त्याज्य पदार्थों को आगे बड़ी आँतों की तरफ भेजने में छोटी आँत को सहायता मिल सके।
इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है।
6.         दोपहर 3 से 5 बजे- यह मूत्राशय की विशेष सक्रियता का काल है। मूत्र का संग्रहण करना यह मूत्राशय का कार्य है। 2-4 घंटे पहले पिये गए पानी से इस समय मूत्र त्याग की इच्छा होगी।
7.         शाम 5 बजे से 7 बजे तक- इस समय जीवनी शक्ति गुर्दों की ओर विशेष रूप से प्रवाहित होने लगती है। सुबह लिये गये भोजन की पाचन-क्रिया पूर्ण हो जाती है। अतः इस काल में हल्का भोजन कर लेना चाहिये। शाम को सूर्योस्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्योस्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल में) भोजन न करें। संध्याकालों में भोजन नहीं करना चाहिए। रात्रि में बहुत देर से भोजन वर्जित है। देर रात किया गया भोजन रोगों को लाता है। सुबह भोजन के 2 घंटे पहले, शाम को भोजन के 3 घंटे बाद दूध पी सकते हैं।
8.         रात्रि 7 से 9 बजे- इस समय मस्तिष्क विशेष सक्रिय रहता है। अतः प्रातःकाल के अलावा इस समय में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है। आधुनिक खोज से भी इसकी पुष्टि हुई है। शाम को शयन से पूर्व स्वाध्याय अपनी संस्कृति का अभिन्न अंग है।
9.         रात्रि 9 से 11 बजे- इस समय जीवनी-शक्ति रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरु रज्जु ;ैचपदंस बवतकद्ध में विशेष रूप से केन्द्रित होती है। इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से ैचपदंस बवतक को प्राप्त शक्ति ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है और इस समय का जागरण शरीर और बुद्धि को थका देता है।
रात्रि 9 बजे के बाद पाचन-संस्थान के अवयव विश्रांति प्राप्त करते हैं। अतः यदि इस समय भोजन किया जाए तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है। पचता नहीं है और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते है, जो अम्ल ;।बपवेफद्ध के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।
10.       रात्रि 11 से 1 बजे तक- इस समय जीवनी-शक्ति पित्ताशय में सक्रिय होती है। पित्त का संग्रहण पित्ताशय का मुख्य कार्य है। इस समय का जागरण पित्त को प्रकुपित कर अनिद्रा, सिरदर्द आदि पित्त विकार तथा नेत्र रोगों को उत्पन्न करता है।
रात्रि को 12 बजे के बाद दिन में किये गये भोजन द्वारा शरीर के क्षतिग्रस्त कोशों के बदले में नये कोशों का निर्माण होता है। इस समय जागते रहोगे तो बुढ़ापा जल्दी आयेगा।
11.       रात्रि 1 से 3 बजे- इस समय जीवनी शक्ति यकृत ;स्पअमतद्ध में कार्यरत होती है। अन्न का सूक्ष्म पाचन करना स्पअमत का कार्य है। इस समय शरीर को गहरी नींद की जरूरत होती है। इसकी पूर्ति न होने पर पाचन-तंत्र बिगड़ता है।
इस समय जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएँ मंद होती हैं। अतः इस समय सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं।
आजकल पाये जाने वाले अधिकांश रोगों का कारण अस्त-व्यस्त दिनचर्या व विपरीत आहार ही है। हम अपनी दिनचर्या शरीर की जैविक घड़ी के अनुरूप बनाये रखें तो शरीर के विभिन्न अंगों की सक्रियता का हमें अनायास ही लाभ मिलेगा। इस प्रकार थोड़ी-सी सजगता हमें स्वस्थ जीवन की प्राप्ति करा देगी।
निम्न बातों का भी विशेष ध्यान रखें-
1.         ऋषियों व आयुर्वेदाचार्यों ने बिना भूख लगे भोजन करना वर्जित बताया है। अतः प्रातः एवं शाम के भोजन की मात्रा ऐसी रखें, जिससे ऊपर बताये समय में खुलकर भूख लगे।
2.         सुबह व शाम के भोजन के बीच बार-बार कुछ खाते रहने से मोटापा, मधुमेह उच्च रक्तचाप, हृदय रोग जैसी बीमारियों और मानसिक तनाव व अवसाद ;उमदजंस ेजतमेे ंदक कमचतमेेपवदद्ध आदि का खतरा बढ़ता है।
3.         जमीन पर कुछ बिछाकर सुखासन में बैठकर ही भोजन करें। इस आसन में मूलाधार चक्र, सक्रिय होने से जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। कुर्सी पर बैठकर भोजन करने से पाचन-शक्ति कमजोर तथा खड़े होकर भोजन करने से तो पाचन बिल्कुल बीमारी के रूप में बदल जाता है। इसलिए बुफे डिनर से बचना चाहिए।
4.         भोजन से पूर्व प्रार्थना करें, मन्त्र बोलें या गीता के पन्द्रहवें अध्याय का पाठ करें। इससे भोजन भगवत्प्रसाद बन जाता है मन्त्र है-
‘‘हरिर्दाता हरिर्भोक्ता हरिरन्न प्रजापतिः।
हरिः सर्वशरीरस्थो भुक्ते भोजयते हरिः।।’’
5.         भोजन के तुरन्त बाद पानी न पियें, अन्यथा जठराग्नि मंद पड़ जाती है और पाचन ठीक से नहीं हो पाता। अतः दो या डेढ़ घंटे बाद ही पानी पियें। फ्रिज का ठंडा पानी कभी न पियें क्योंकि मधुमेह का एक कारण यह भी होता है।
6.         पानी हमेशा बैठकर या घूँट-घूँट करके मुँह में घुमा-घुमा के पियें। इससे अधिक मात्रा में लार पेट में जाती है, जो पेट के अम्ल के साथ संतुलन बनाकर दर्द, चक्कर आना, सुबह का सिरदर्द आदि तकलीफें दूर करती है।
7.         भोजन के बाद 10 मिनट वज्रासन में अवश्य बैठें। इससे भोजन जल्दी पचता है।
8.         पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का लाभ लेने हेतु सिर पूर्व या दक्षिण दिशा में करके ही सोयें अन्यथा अनिद्रा जैसी तकलीफें होती हंै।
9.         शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को बत्ती बन्द करके सोयें।
            इस सन्दर्भ में हुए शोध चैंकाने वाले हैं। नार्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी के प्रो. डाॅ. अजीज के अनुसार देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और बत्ती चालू रख कर सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर स्वास्थ्य संबंधी भयंकर हानियाँ होती हैं। अँधेरे में सोने से यह जैविक घड़ी सही ढंग से चलती है। 
            अन्त में आप सभी से अनुरोध है कि अपनी दिनचर्या को Biological Clock के अनुसार रखेंगे तो हमारा जीवन सुखी एवं आनन्दित रहेगा।
           

Tuesday, February 9, 2016

युग के विश्वामित्र का आवाहन (बसंत पंचमी 2016)

            कभी अपना देश भारत पूरे विश्व में जगतगुरु के रूप में प्रतिष्ठित था। यहाँ के 33 करोड लोगो का चिन्तन, चरित्र ओर व्यवहार इतने उच्च कोटि के होते थे कि पूरी दुनिया यहाँ के लोगो के देवी देवताओं की तरह सम्मान देती थी। ऐसा किस कारण था? यहाँ दो विशेषताएँ थी क्षात्र तेज ओर ब्रहम तेज। वीर शिवाजी, राणा प्रताप, तात्याँ टोपे, लक्ष्मी बाई, एवं सिक्खों के महान गुरुओं के क्षात्र तेज की गाथाएँ आज हम बड़ी श्रद्धा व आश्चर्य से सुनते है। राणा प्रताप का भाला इतना वजनी है कि आज मात्र पहलवान स्तर के लोग ही उसके उठाने की हिम्मत कर सकते है। लक्ष्मी बाई दोनो हाथों से तलवार चलाते हुए निर्भयतापूर्वक शुत्र की सेना पर विद्युत गति के आक्रमण करती थी। निर्दोष व्यक्तियों की रक्षा व मातृभूमि की सुरक्षा यह क्षात्र तेज के द्वारा ही सम्पन्न होती थी। इसी विशेषता रही है भारत का ब्रहम तेज। दूध का दूध व पानी का पानी अर्थात सच को सच कहना व झूठ को झूठ एवं निर्भयतापूर्वक सत्य का साथ देना यह भारत के ब्रहम तेज की विशेषता रही है। डाकू अंगलिमाल आम्रपाती का हृदय परिवर्तन, बढती चीनी सैनिको का मनोबल तोड देना ब्रहम बल के द्वारा ही सम्भव है। भारत पर आक्रमण करने को तत्पर सिकन्दर ने अपने गुरु से पूछा कि भारत से उनके लिए क्या लाया जाए? उनके गुरु ने उत्तर दिया ‘‘ब्रहम तेज से युक्त महापुरुष’’ जिसमें यूनान के लोगों का हृदय परिवर्तन हो ओर के सत्य, प्रेम व न्याय के लिए जीवन जीए न कि अंहकार भरा जीवन। इस पर सिकन्दर ने पूछा कि उसकी पहचान क्या है। गुरु ने उत्तर दिया ऐसा मनुष्य शस्त्र रहित होने पर भी मृत्युभय से मुक्त होगा, साधनहीन होने पर भी राजाओं की तरह अलमस्त होगा। भारत के ब्रहम तेज ओर क्षात्र तेज का सम्मान पूरा विश्व करता था। परन्तु आज हमने अपने निजी स्वार्थ व महत्वाकांक्षाओ के चलते पद, धन, वैभव सम्पन्न व्यक्तियों की चापलूसी व गुलामी स्वीकार कर ली है। चरित्र चाहे कैसा भी रहा हो डस्।ए डच् या कोई सेठ होना चाहिए। उन्ही से फीता व झण्डा रोहण कराना हम अपनी शान समझते है। देश तो आजाद हो गया पर बड़े पैसे व पद वालो की गुलामी हमें रक्त में बस गयी ।हम अपने स्वाभिमान अपने गौरव के भूल भेड़ बकरियों की तरह अपना जीवन जीने के लिए विवश है।
            परन्तु अब सन् 2011 से समय परिवर्तित हो रहा है। ‘महावतार’ प्रक्रिया के अन्तर्गत क्षात्र तेज व ब्रहम तेज का विकास भारत के युवाओं में हेमा प्रारम्भ हो चुका है। ऐसे युवाओं व महान आत्माओं की खोज, संरक्षण, प्रशिक्षण एवं आवाहन के लिए यह पुस्तक लिखी गयी है।

          क्रान्तिवीर चन्द्रशेखर आजाद

          यहाँ परम क्रान्तिवीर चन्द्रशेखर आजाद के बचपन चर्चा प्रासंगिक होगी। यूँ तो वह बचपन से साहसी थे। पर कुछ चीजें उन्हें डरा देती थी। इनमें से एक अँधेरा था और एक दर्द। दस-बारह साल की उम्र में उनके यहाँ एक महात्मा आये। यह महात्मा महावीर हनुमान जी के भक्त थे। हनुमान जी की पूजा करना और रामकथा कहना यही उनका काम था। चन्द्रशेखर के गाँव में भी उनकी रामकथा हो रही थी। रामकथा के मार्मिक अंश बालक चन्द्रशेखर को भावविह्नल कर देते थे। तो कुछ प्रसंगों को सुनकर वह रोमाँचित हो जाता। अपनी भावनाओं के उतार-चढ़ावों के बीच बालक चन्द्रशेखर ने सोचा कि ये महात्मा जी जरूर हमारी समस्या का समाधान कर सकते हैं।
            और बस उसने अपनी समस्याएँ महात्मा जी को कह सुनायी। उसने कहा-स्वामी जी! मुझे अँधेरे से डर लगता है। महात्मा जी बोले-क्यों बेटा? तो उन्होंने कहा कि अँधेरे में भूत रहते हैं इसलिए। यह सुनकर महात्मा जी बोले- और भी किसी चीज से डरते हो। बालक ने कहा हाँ महाराज- मुझे मार खाने बहुत डर लगता है। उनकी यह सारी बातें सुनकर महात्मा जी ने उन्हें साँझ के समय झुरमुटे में बुलाया। और अपने पास बिठाकर बातें करते रहे। जब रात थोड़ी गाढ़ी हो चली तो वह उन्हें लेकर गाँव के बाहर श्मशान भूमि की ओर ले चले। जहाँ के भूतों के किस्से गाँव के लोग चटखारे लेकर सुनाते थे।
            राह चलते हुए महात्मा जी ने उनसे कहा-जानते हो बेटा-भूत कौन होते हैं? बालक ने कहा नहीं महाराज। तो सुनो, वे स्वामी जी बोले-भूत वे होते है जिनकी अकाल मृत्यु होती है। जो जिन्दगी से डरकर आत्महत्या कर लेते हैं। जो आदमी अपनी जिन्दगी में डरपोक था वह पूरे जीवन कुछ ढंग का काम न कर सका वह भला मरने के बाद तुम्हारा क्या बिगाडे़गा? रही बात मार खाने से डरने की तो शरीर तो वैसे भी एक दिन मरेगा और मन-आत्मा मरने वाले नही है। इन बातों को करते हुए वे महात्मा गाँव के बाहर श्मशन भूमि में आ गये। श्मशान भूमि में कहीं कोई डर का कारण न था। इस अनुभव ने बालक चन्द्रशेखर को परम साहसी बना दिया। हाँ यह जरूर है कि महात्मा जी ने उन्हें रामभक्त हनुमान जी की भक्ति सिखायी। महात्मा जी की इस आध्यात्मिक चिकित्सा ने उन्हें इतना साहसी बना दिया कि अंग्रेज सरकार भी उनसे डरने लगती। उन महात्मा जी का यह भी कहना था कि यदि कोई विशिष्ट आध्यात्मिक प्रयोग करने हों तो किसी तपस्थली का चयन करना चाहिए, क्योंकि ये आध्यात्मिक चिकित्सा के केन्द्र होते हैं।

स्वाध्याय (Self Study/ Study of Self)

            पाण्डिचेरी आश्रम महर्षि श्री अरविन्द के शिष्य नलिनीकान्त गुप्त ने स्वाध्याय के बारे में अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कई मार्मिक बातें कही है। यहाँ ध्यान दिलाना आवश्यक है कि नलिनीकान्त अपनी सोलह वर्ष की आयु से लगातार श्री अरविन्द के पास रहे। श्री अरविन्द उन्हें अपनी अन्तरात्मा का साथी-सहचर बताते थे। वह लिखते हैं कि आश्रम में आने पर अन्यों की तरह मैं भी बहुत पढ़ा करता है। अनेक तरह के शास्त्र एवं अनेक तरह की पुस्तकें पढ़ना स्वभाव बन गया था। एक दिन श्री अरविन्द ने बुलाकर उनसे पूछा-इतना सब किसलिए पढ़ता था। उनके इस प्रश्र का सहसा कोई जवाब नलिनीकान्त को न सूझा। वह बस मौन रहे।
            वातावरण की इस चुप्पी को तोड़ते हुए श्री अरविन्द बोले-देख पढ़ना बुरा नहीं है। पर यह पढ़ना दो तरह का होता है- एक बौद्धिक विकास के लिए, दूसरा मन-प्राण-अन्तर्चेतना को स्वस्थ करने के लिए। इस दूसरे को स्वाध्याय कहते हैं और पहले को अध्ययन। तुम इतना अध्ययन करते हो सो ठीक है, पर स्वाध्याय भी किया करो। इसके लिए अपनी आन्तरिक स्थिति के अनुरूप किसी मन्त्र या विचार का चयन करो। और फिर उसके अनुरूप स्वयं को ढालने की साधना करो। नलिनीकान्त लिखते हैं, यह बात उस समय की है, जब श्री अरविन्द सावित्री पूरा कर रहे थे। मैंने इसी को अपने स्वाध्याय की चिकित्सा की औषधि बना लिया।
            फिर मेरा नित्य का क्रम बन गया। सावित्री के एक पद को नींद से जगते ही प्रातःकाल पढ़ना और सोते समय तक प्रतिपल-प्रतिक्षण उस पर मनन करना। उसी के अनुसार साधना की दिशा-धारा तय करना। इसके बाद इस तय क्रम के अनुसार जीवन शैली-साधना शैली विकसित कर लेना। उनका यह स्वाध्याय क्रम इतना प्रगाढ़ हुआ कि बाद के दिनों में जब श्री अरविन्द से किसी ने पूछा-कि आपके और माताजी के बाद यहाँ साधना की दृष्टि से कौन है? तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा-नलिनी। इतना कहकर थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोले, ‘नलिनी इज़ इम्बाॅडीमेण्ट आॅफ प्यूरिटी’ यानि कि नलिनी पवित्रता की मूर्ति हैं। नलिनी ने वह सब कुछ पा लिया है जो मैंने या माता जी ने पाया है। ऐसी उपलब्धियाँ हुई थीं स्वाध्याय चिकित्सा से नलिनीकान्त को। हालांकि वह कहा करते थे कि स्वस्थ जीवन के लिए शुरूआत अपनी स्थिति के अनुसार मन के स्थान पर तन से भी की जा सकती है। इसके लिए हठयोग की विधियाँ श्रेष्ठ हैं।

पं. रामप्रसाद बिस्मिल

            एक भटकता हुआ आवारा किशोर महान् क्रान्तिकारी इतिहास पुरुष बन गया। हाँ यह सच्चाई पं. रामप्रसाद बिस्मिल के जीवन की है। ‘सरफरोशी का तममा अब हमारे दिल में है’- का प्रेरक स्वर देने वाले बिस्मिल किशोर वय में कुसंग एवं कुटेव के कुचक्र में फंस गए थे। गलत लोगों के गलत साथ में उनमें अनेको गलत आदतें डाल दी। स्थिति कुछ ऐसी बिगड़ी कि जैसा उनका व्यक्तित्व ही मुरझा गया।
            इसी दौर में उनके कुछ शुभ संस्कार जगे, कुछ पुण्य बीज अंकुरित हुए और उनकी मुलाकात एक महापुरुष से हुई। ये महापुरुष संन्यासी थे और नाम था स्वामी सोमदेव। इनकी साधना अलौकिक थी। इनका तप बल प्रबल था। वे पं. रामप्रसाद को देखते ही पहचान गए। उन्होंने अपने परिचित जनों से कहा कि यह किशोर एक विशिष्ट आत्मा है। इसका जन्म भारत माता की सेवा के लिए हुआ है। पर विडम्बना यह है कि इसके उच्चकोटि के संस्कार अभी जाग्रत नहीं हुए। और किसी जन्म के बुरे संस्कारों की जागृति ने इसे भ्रमित कर रखा है। क्या होगा महाराज इसका? इन संन्यासी महात्मा के कुछ शिष्यों ने इनसे पूछा। वे महापुरुष पहले तो मुस्कराए फिर हंस पड़े और बोले- इस बालक की आध्यात्मिक चिकित्सा करनी पड़ेगी। और इसे मैं स्वयं सम्पन्न करूँगा। बस तुम लोग इसे मेरे समीप ले आओ।    
            ईश्वर प्रेरणा से यह सुयोग बना। पं. रामप्रसाद इन महान् योगी के सम्पर्क में आए। इस पवित्र संसर्ग में पं. रामप्रसाद का जीवन बदलता चला गया। वह यूं ही अचानक एवं अनायास नहीं हो गया। दरअसल उन महान् संन्यासी ने अपनी आध्यात्मिकऊर्जा का प्रयोग करके इनके बुरे संस्कारों वाली परत हटानी शुरू की। एक तरह से वह अदृश्य ढंग से अपनी आध्यात्मिक दृष्टि एवं शक्ति का प्रयोग करते रहे। तो दूसरी ओर दृश्य रूप में उन्होंने रामप्रसाद को गायत्री महामंत्र का उपदेश दिया। उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ के लिए तैयार किया। दिन मास वर्ष के क्रम में युवक रामप्रसाद में नया निखार आया।

            उनकी अन्तर्चेना में पवित्र संस्कार जाग्रत् होने लगे। पवित्र संस्करों ने भावनाओं को पवित्र बनाया, तदानुरूप विचारों का ताना-बाना बुना गया। और एक नये व्यक्तित्व का उदय हुआ। एक भ्रमित-भटके हुए किशोर के अन्तराल में भारत माता के महान् सपूत पं. रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म हुआ। इस नव जन्म ने उनके जीवन में सर्वथा नए रंग भर दिए। यह सब चित्त के संस्कारों की आध्यात्मिक चिकित्सा के बलबूते सम्भव हुआ। जिसने पूर्वजन्म के शुभ संस्कारों को जाग्रत् कर एक नया इतिहास रचा।

Sunday, February 7, 2016

पुराणपुरुष लाहिडी महाशय

प्रारम्भ प्रयोजन
            पांतजन योग दर्शन के साधन पाद में समाधि तक पहँुचने के लिए क्रियायोग के अनिवार्य बताया गया है।
‘‘तप स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि क्रिया योगः । स हि क्रियायोगः समाधि भावनार्थः क्लेशतन्करणार्थश्च ।।’’
साधनपाद 2/1-2
            भावार्थ यह है कि तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्राणिधान क्रिया योग के मुख्य अंग है। (विस्तृत जानकारी के लिए साधना समर पढ़े) इस क्रियायोग के द्वारा ही समाधि तक पहुँचा जा सकता है यह अविद्या के कारण उत्पन्न क्लेशों को क्षीण करता है। प्रत्येक मनुष्य द्वन्द्व में जीता है। समाधि ह ीवह अवस्था है जिसमें मनुष्य पूर्ण आनन्द से जीता है। समाधि से पूर्व वह अनेक प्रकारो के क्लेशो से घिरा रहता है जिसका विवरण पांतजल योगदर्शन में सूत्र रूप में दिया गया है।
            जिस क्रियायोग के द्वारा इन क्लेशो का शमन होता है व समाधि का द्वारा खुलता है उस क्रियायोग का सन्देश महावतार बाबा जी ने लाहिडी महाशय के माध्यम से पूरे विश्व को दिया। कुछ ऐसी क्रियाएँ जिनके माध्यम से षटचक्रो में चेतना का प्रवाह चले व कुण्डलिनी का जागरण हो क्रियायोग के अन्तर्गत आती है। एक सरल प्रयोग नीचे दिया जा रहा है ।
            प्रातः काल सूर्योदय के समय सूर्य नमस्कार आसन करें फिर गहरी-गहरी श्वास लें। श्वास के नाभि तक ले जाएँ, फिर नाडी शोधन प्राणयाम करें। पाँच-सात मिनट आसन पाँच-सात मिनट प्राणायाम व 15 मिनट ध्यान। उगते हुए स्वार्णिम सविता का ध्यान अपने आज्ञा चक्र पर करें व अपना शरीर व मन प्रकाशवान, ज्ञानवान, विवेकवान हो रहा है इस प्रकार की भावना करते हुए गायत्री सूत्र का जप करें। यह एक क्रिया कही जा सकती है। काल के अनुसार क्रिया में परिवर्तन सम्भव है।
            जो सन्देश श्री कृष्ण ने अर्जुन के क्रियायोग के विषय में दिया था आज का मानव उतना शारीरिक रूप से मजबूत नही है अतः ठीक वही पद्यठि का अनुसरण हानिकारक भी हो सकता है। जैसे हठयोग के द्वारा मत्सेन्द्रनाथ, गोरखनाथ जी वे अपने शरीर को बज्र के समान कठोर बना लिए था। वह उस समय की आवश्यकता थी क्योंकि भ्रष्ट तान्त्रिको के भयानक ऊर्जा के आघात इन्हें अपने शरीरो पर सहने पड़ते थे।
            पहले अपने शरीर के इतना मजबूत बनाया कि तन्त्र के कारण प्रयोग द्वारा शरीर की हानि न हो पाए फिर उन तान्त्रिको से संघर्ष किया। परन्तु आज यदि लोग हठ योग की वह प्रक्रियाएँ अपनाते है तो शारीरिक रोगों की उत्पत्ति हा जाती है। कारण बड़ा स्पष्ट है शीतल जल में स्नान किसी के लिए लाभप्रद रहता है व किसी के लिए हानिप्रद इसी प्रकार घी के सेवन से किसी का शरीर बलवान बनता है तो किसी के हृदयाघात ;भ्मंज ंजजंबाद्ध की सम्भावना बढ़ जाती है। 
            इसी प्रकार क्रियायोग के स्वरूप पर हिमालय की ऋषि संसद में खोज बीन चलती है व आज क मानव के लिए क्या उपयुक्त है वही धरती पर भेजा जाता है। लेखक के अनुसार क्रियायोग का एक सरल प्रारूप बताया गया है ‘आज्ञा चक्र पर ध्यान’। जब आज्ञा चक्र में चेतना का स्फुरण होने लगे तो उसके सहस्त्रार पर ले जाना होता है फिर पीछे से चेतना को नीचे उतारते हुए अन्य चक्रो का जागरण करना होता है।
            इसके साथ-2 तप, स्वाध्याय व समर्पण इनका अभ्याद अनिवार्य है यह तीन सूत्र प्रत्येक कल में आवश्यक है अतः इनके खुला रखा गया बाकी चतंबजपबंस क्रिया के गोपनीय कर दिया गया। तप का सीधा अर्थ है श्।सूंले जतल जव विससवू जीम तपहीजमवने चंजीश् आस पड़ोस सभी उल्टा सीधा तइोक अजाकर धन, वैभव, विलास भरा जीवन जी रहे है। नही धर्म, मर्यादा ओर त्याग के साथ ही भोग (‘तेन त्यक्तेन मुंजोथ’) की अनुमति शस्त्र देता है यही तप है। स्वाध्याय का अर्थ है अच्छे विचारो व अच्छे व्यक्तियों का संग। समर्पण का अर्थ है आध्यत्मिक मार्ग पर चलते हुए जो भी सुख दुख मिल रहा है उसे ईश्वर की इच्छा अथवा प्रारब्ध का योग मानकर स्वीकर करना। यह मानना कि सब हमारे भले के लिए ही हो रहा है।
            जिस क्रियायोग का शुभरम्भ बाबा जी द्वारा आज से 150 वर्ष पूर्व किया गया उसका चरम कुछ वर्षो पश्चात् देखने को मिलेगा। लगभग एक लाख आत्माएँ क्रियायोग के द्वारा योग की उच्च अवस्थाओं को प्राप्त होने जा रही है जो भी व्यक्ति तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान रूपी क्रियायोग के अनुशासन के जीवन में धारण करने का प्रयास करेगें उन्हें सूक्ष्म जगत से क्रियायोग की दीक्षा अर्थात् शक्तिपात होगा।
            भारत की भूमि पुनः विश्व की आध्यात्मिक लीता स्थली बनने जा रही है। इसके लिए बाबा जी की महावतार प्रक्रिया सन् 2011 से प्रारम्भ हो चुकी है व आने वाले 40 वर्षो में पिछले 2000 वर्षो की गन्दगी का सफाया होकर पीछे का संविधान लागू हो जाएगा।
            इस विलक्षण समय में अपने हृदय के सद्भाव, भक्तिभाव से मुख्य व मस्तिष्क के सद ज्ञान व विवेक से परित कर योग की उच्च अवस्थाओं के प्राप्त कर सकें इस हेतु ‘योगी चरितामृत’ की एक श्रृंखला प्रारम्भ की गयी है। 12 वर्ष की आयु के अनेक बच्चों ने जब इन पुस्तकें के पढ़ना प्रारम्भ किया तो उन्हें अपनी संस्कृति की महानता का परिचय प्राप्त हुआ। घर-घर में इन महायोगियों की गाथाएँ सुनायी जाएँ जिसमें उच्च संस्कारो की स्थापना भारत के परिवारों में हो सकें, यही उद्देश्य लेकर इस श्रृंखला का शुभरम्ीा सन 2016 से किया जा रहा है। पुस्तक का मूल्य लेखक की ओर से कम से कम रखने का प्रयास किया गया है। पिछले वर्षों में आर्थिक घाटा उठाकर की ‘साधना समर’ के जन-जन तक पहँुचाने का प्रयास किया गया जिसके परिणाम बहुत ही सुन्दर रहे। यह तो युग की माँग है कि इस राष्ट्र की संस्कृति को बचाने के लिए हम सभी किसी न किसी रूप में अपना सहयोग अपना प्रयास जारी रखें।
            उच्च आत्माएँ यह संकल्प लें कि इस ‘योगी चरितामृत’ की पुस्तकें 24 नए घरो में पहुँचाएगे। यह ऋषि ऋण होता है जो ज्ञान मिल रहा है उसे बाँटना आवश्यक है। आशा है इस पुनीत कार्य में पाठको के सहयोग मिलता रहेगा। इसी के साथ सबके उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए यह पावन चरित आपके समक्ष प्रस्तुत है देवात्मा हिमालय से भी प्रार्थना है कि क्रियायोग का यह दिव्य प्रसाद आपके घर तक पहुँे व जीवन के दुखे कष्ट को दूर कर उच्च स्तरीय आनन्द व ज्ञान प्रदान करें।

            जय बाबा जी! जय देवात्मा हिमालय! जय पुराणपुरुष लाहिडी महाशय!