Monday, January 16, 2017

कब्ज की प्राकृृतिक चिकित्सा



कब्ज क्या हैः-
          कब्ज को सब रोगों की जननी कहा जाता है। हम जो भोजन करते हैं वह पचकर शरीर से मिलकर आत्मसात् होता रहता है, परंतु भोजन पचने के बाद जो भाग शरीर से मिलकर तद्रूप नहीं बन सकता वह शरीर के लिए अनुपयोगी व विजातीय द्रव्य है, जिसे शारीर बाहर निकालने का प्रयत्न करता है। यही प्रक्रिया निष्कासन व बहिष्करण क्रिया कहलाती है। यह स्वाभाविक न हो, रूकावट हो, शौच जाने भी पाखाना न हो तों उसे मलावरोध, कोष्ठबद्धता या कब्ज कहते हैं।
          जाने-माने प्राकृृतिक चिकित्सक बर्नर मैंकफेडन के अनुसार दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो कब्ज रोग का शिकार न हो इसलिए डाॅक्टर की मान्यता है कि यदि शत-प्रतिशत नहीं तों ९९ः लोग आजकल जरूर ही कब्ज के रोगी हैं।
          कब्ज के रोगी को पाखाना साफ ना होने के साथ-साथ अनेक परेशानियाॅं देखने को मिलती हैं। हमेशा आलस, सिरदर्द, अनिद्रा, भूख की कमी, भोजन में अरूचि, निराशा, खट्टी डकारें, पेट दर्द, त्वचा संबंधी विकार, मुॅंह और साॅंस में बदबू, स्फूर्ति और शक्ति का ह्यास, मन में चिंता, खिन्नता, स्मरणशक्ति की कमी आदि लक्षण बने रहते हैं। अंत में कब्ज के कारण अनेकानेक रोग जैसे बावासीर, संग्रहणी, पेचिस, मधुमेह, रक्ताल्पता, अतिसार, वातरोग एवं कई प्रकार के मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। बहुत ही कम रोग हैं जो कब्ज के कारण नहीं उत्पन्न नहीं होते हों इसलिए कब्ज को सभी रोगों की जननी कहा जा सकता है (आरोग्य मंदिर गोरखपुर के संस्थापक डाॅ. विठ्ठलदास मोदी के अनुसार तों कब्ज सब रोगों की नानी है) आयुर्वेद में सभी रोगों का कारण कब्ज अर्थात कुपित मल ही बताया है।- “ सर्वेषामेव रोगानां निदानं कुपितामलाः। ”
          एक बार अमेरिका के कई डाॅक्टरों ने विभिन्न रोगों से भरे हुए रोगियों की २८४ लााशों की परीक्षा की थी। पता चला कि उन लाशों में से २५६ लाशों की बड़ी आंतें सड़े हुए मल से भी पड़ी थीं। उनमें से किसी की तों बड़ी आॅंत मल से ठसाठस भरकर फूल उठने कारण दोहरी अथवा दोगुनी हो गई थी। परीक्षा करके देखा गया तों उनमें से अधिकांश की आॅंतों के भीतर मल सूखकर आॅंत की दीवारों में स्लेट पत्थर की तरह कठोर होकर चिपक गया था, किंतु आश्चर्य की बात यह है कि मृत्यु के पहले इन सब रोगियों का दैनिक मलत्याग बंद नहीं हुआ था। डाॅक्टरों ने उनके आच्छादित कठोर दीवारों को छुरी से तराशा और देखा कि उसके अंदर विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे कीड़े अपना घर बनाए निवास कर रहे ळें। किसी-किसी में कीड़ों के अंडों के समूह पाए गए और किसी-किसी की आॅतों में उन कीड़ों ने अपना घर बनाकर आॅंतों की दीवार में घाव पैदा कर दिए हैं। कब्ज की जिस भयानक अवस्था का पता डाॅक्टरों ने उर्पयुक्त प्रकार की लाशों को चीरकर लगाया। वह हममें से कितने ही जीवित व्यक्तियों की अवस्था से भिन्न नहीं हैं। अतः रोज-रोज थोड़ा  मल निकलने में ही हमें उस धोखे में न रहना चाहिए कि आॅत दूषित मल से भरी नहीं है।
कब्ज के प्रमुख कारणः-
(१)     अहितकर भोजनः- आधुनिक जीवन शौली की अंधी दौड़ में चीनी, चाय, काॅफी, नशे की चीजें, मसाले, तले-भुने खाद्य, मैदा से बनी चीजें, गरिष्ठ भोजन, फास्टफूड, ब्रेड, बिस्किट, बरगर, चाउमीन, पेस्टी, पेटीज आदि का प्रचलन इस रोग का कारण है। आजकल चोकर निकाले आटे की रोटी, कण निकाले हुए चावल का माॅड रहित भात, बिना छिलके की दाल एवं सब्जियाॅं सभ्यता की पहचान बन जाने के कारण कब्ज हो जाना स्वाभाविक ही है।
(२)     अनियमित भोजन क्रमः- प्रकृति का नियम है कि जब भूख लगे तब भोजन करें, जब प्यास लग तब पानी पीएॅं। भोजन करते समय पानी पीते रहने की आदत गलत है, इससे पाचक रसे अपना कार्य सही ढंग से नहीं कर पाते, आमाश्य का आवश्यक तापक्रम भी गड़बड़ा जाने से पाचन क्रिया बाधित होती है। भोजन के डेढ़-दो घंटे बाद पानी पीना चाहिए। भोजन करते समय चित्त प्रसन्न रखें। मन तनाव, चिंता, भय, क्रोध, आवेश अदि तिव्रमनोेवेग से ग्रस्त हो, तब भोजन न करें तों ही अच्छा है। ऐसे समय में किया गया भोजन ठीक तरह  नहीं पचता है। भोजन करतें समय खूग चबा-चबाकर  भोजन को पानी की तरह पतला बनाकर ही निगलें, इस नियम पालन से आॅतों की सर्पिल गति (पंरिस्टाल्टिक मूवमेंट) सुचारू रूप से चलती हैए जिससे कब्ज नहीं होता है तथा मुॅंह में स्थित लार ग्रंथियों से पाचक-रस निकलकर भोजन से मिलकर पाचन में सहायक होता है।
(३)     शौच रोकनाः- शौच नियमित समय पर ही जाना चाहिए। शौच की इच्छा होने पर रोकना नहीं चाहिए। मल एवं मूत्र के वेग को रोकने से कई व्याधियाॅं जन्म लेती हैं। पखाने की शंका हो तब भी तुरंत जाना चाहिए। यह स्मरणीय तथ्य है कि शौच की इच्छा होने पर बार-बार उपेक्षा करने से नाड़ी मस्तिष्क को आदत पड़ जाती है कि वह मलाश्य को मल निष्कासन की आज्ञा संबंधित नाड़ियों द्वारा न भेजे, फलतः कब्ज की स्थिति बन जाती है।
(४)     अन्य कारणः- व्यायाम एवं श्रम का अभाव भी इस रोग को जन्म देता है। नशीली वस्तुएॅं- तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, चाय, काॅफी, अफीम, चरस तथा शराब आदि उत्तेजक पदार्थ होने के कारण शरी की नस-नाड़ियों को कमजारे कर देते हैं। इसलिए इनसे कब्ज होता है। देर रात तक जागने से अपर्याप्त निद्रा का प्रभाव बड़ी आॅंत पर पड़ता है, जिससे कब्ज होता है।
          भोजन में सलाद, छिलकायुक्त अनाज, चोकरयुक्त आटे की रोटी न होने के कारण कब्ज होता है। मानसिक असंतुलन, अवसाद आदि मानसिक रोगी को भी कब्ज होती है।
          प्रकृति ने पेड़ों पर लगने वाली मिठाइयाॅं दी हैं, जैसे-खजूर, मुनक्का, किशमिश, छुआरा, केला, चीकू, पपीता, आम आदि। ये स्वास्थ्य के लिए अत्याधिक लाभकरी हैं। पचने में अत्यंत सरल हैं। शरीर का पाचनतंत्र सशक्त बनाता है। नई शक्ति देने वाले गुण फलों में मौजूद हैं। इन्हें छोड़कर कृत्रिम रंग-बिरंगी मिठाइयाॅं खाएॅंगे तों कब्ज तों होगी ही। अपनी गलतियाूं को सुधारना होगा। प्रकृति की शरण में पहुॅंचकर ही सच्चा आरोग्य प्राप्त किया जा सकता है।
          दूध को कई बार उबालने या अधिक उबालने से वह कब्जकारक हो जाता है। अतः दूध हल्का एक उबाल का ही लें। दूध पीते समय एक गिलास दूध को पाॅंच मिनल में धीरे-धीरे पीने का नियम आवश्यक याद रखा जाना चाहिए।
कब्ज निवारण के उपायः-
(१) कड़ी भूख लगने पर भोजन करें। भोजन में कच्ची सब्जियाॅं (सलाद) तथा छिलकेयुक्त दाल, चोकरयुक्त आटा की रोटी हो।
(२) भोजन करते समय मन को शांत रखें धीरे-धीरे ठीक तरह चबाकर आधा घंटे में भोजन करें। शाम का भोजन सूर्यास्त से पूर्व कर लेना चाहिए।
(३) स्वाद के नाम पर आचार, मिर्च-मसालों से बचें। ताजी चटनी ले सकते हैं।
(४) प्रातः काल उठकर पानी पीना तथा सोते समय पानी पीने का क्रम अवश्य बना लें।
(५) भोजन के एक घंटे पूर्व तथा भोजन के दो घंटे बाद पर्याप्त पानी पीते रहें।
(६) भोजन के तत्काल बाद वज्रासन की स्थिति में १० मिनट अनिवार्य रूप से बैठना चाहिए। भोजन करने के तत्काल बाद भाग-दौड़ करने से पाचन गड़बड़ा जाता है।
(७) फास्ट फूड, जंग फूड, मैदा, चीनी एवं मिठाइयों से बचें।
(८) अमरूद, नाशपाती, सेब, संतरा, पपीता, मौसमी आदि फल तथा गाजर, मूली, टमाटर, पŸाागोभी, चुकंदर, खीरा, ककड़ी आदि की सलाद को भोजन में सम्मिलित करें। पक्का बेलफल पेट रोगों में बड़ा लाभकारी है।
(९) सूर्यभेदी प्राणायाम, सर्वांगासन, मत्स्यासन, भुजंगासन, योगमुद्रा, हलासन, पश्चिमोŸाासन तथा नौली आदि यौगिक क्रियाएॅं पाचन संस्थान को सुदृढ़ बनाती हैं।
(१०) इन क्रियाओं को प्रातः नित्य अपनाएॅं। आॅंतों की स्वाभाविक शक्ति लौैटाने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा का निम्न सरल क्रम अपनाना चाहिए।
(११) प्रातः ४.४५ बजे जागरण तथा आधा नींबू एक-डेढ़ गिलास पानी में निचोड़कर पीएॅं,
शौच जाएॅं।
(१२) तत्पशचात् १० मिनट कटि स्नान लेकर खुली हवा में टहलने निकल जाएॅं। लगभग ४-५ किलोमिटर अवश्य टहलें। कमजोरी हो तों अपनी क्षमतानुसार टहलें या लेटकर विश्राम करें। टहलने के बाद कुछ योगासन-व्यायाम करें। फिर ठंडे पानी से हाथ से रगड़कर स्नान करें।
(१३) उपासना, ध्यान आदि के बाद नाश्ता करें। नाश्तें में २५० ग्राम ताजे फल, ५० ग्राम किशमिश या मुनक्के पानी में रातभर भिगोए हुए तथा ४० ग्राम अंकुरित अन्न खूब चबाकर खाएॅं।
(१४) प्रातः ७ बजे पेडू पर मिट्टी की पट्टी (२० मिनट) इसके बाद एनिमा लेकर कोष्ठ साफ करें।
(१५) दोपहर ११ बजे भोजन- २ या ३ गेहॅंू के चोकरदार आटे की रोटी, सब्जी, ३५० ग्राम हरी सब्जी बिना मिर्च-मसाले की १५० ग्राम सलाद तथा १०० ग्राम ताजी दहीं लें।
(१६) अपराहृ २ बजे- मौसम के अनुसार उपलब्ध किसी एक फल का रस २५० ग्राम या गाजर का जूस या सब्जियों का सूप।
(१७) शाम का भोजन-दोपहर की तरह। यदि इस भोजन क्रम से भी लाभ न हो तों ३ दिन फलाहार दिन में ३-३ घंटे के अंतर से २५० ग्राम ताजे फल लें। यदि फल उपलब्ध नहीं हों तब २५०-२५० ग्राम उबली सब्जी ले सकते हैं। तीन दिन रसाहार-रसाहार में फलों का रस ३-३ घंटे के अंतर से २५० ग्राम लें। (यदि फल उपलब्ध न हों तों हरी सब्जियों का सूप बनाकर ले सकते हैं।) तीन दिन का उपवास-उपवास में मात्र नींबू का रस मिलाकर पानी पीते रहें। दिनभर में ४ नींबू ले सकते हैं। शुद्ध शहद २-२ चम्मच तथा आधा नींबू एक गिलास पानी में लेते रहिए। दिनभर में साढ़े तीन-चार लीटर पानी अवश्य पीएॅं। अब उपवास के बाद रसाहार फिर फलाहार १-१ दिना अपनाकर भोजन का क्रम अपनाना चाहिए। भोजन में धीरे-धीरे पूर्णाहार लेना चाहिए। पहले दिन १ रोटी दूसरे दिन २ रोटी तीसरे दिन ३ रोटी लेकर पूर्ण भोजन क्रम अपनाना  चाहिए। आॅंतों को एकदम बोझ डालने से उपवास का लाभ नहीं मिलता। अभी अल्पकालीन तीन दिन उपवास का क्रम ही बताया जा रहा है। घर में रहकर लंबे उपवास नहीं किए जा सकते उसके लिए प्राकृतिक चिकित्सालय में रहकर उचित देखरेख में १५ दिन का उपवास कर सकते हैं। रसादार, फलाहार, उपवास में नित्य मिट्टी की पट्टी देने के बाद एनिमा लेना अनिवार्य है। एनिमा द्वारा आॅंतों में स्थित मल एवं विष बाहर निकलता है। यदि मिट्टी की पट्टी न उपलब्ध हो सके तों एक सूती तौलिया को चार परत कर लें, ठंडे पानी में भिगोकर पेट पर रखें। इससे ठंडक पहुॅंचाकर आॅंतों की क्रियाशीलता व शक्ति बढ़ाई जा सकती है। १०-१५ मिनट तक बदल-बदलकर ठंडी तौलिया पेट पर रखें। रात को सोते समय पेट को ठंडे पानी से भीगी सूती पट्टी की लपेट देकर ऊपर से ऊनी कपड़े की पट्टी लपेट दें।
(२) एनिमा केवल हल्के गरम पानी (शरीर के तापमान का) लिया जाता है। एनिमा पात्र में एक लीटर लगभग पानी लें तथा एनिमा के नाॅजल में रबर की नली (केथेटर) लगा लें, जिससे एनिमा लेते समय मलद्वार में खरोंच का खतास न रहे। केथेटर मेडिकल स्टोरों में उपलब्ध रहता है। एनिमा में साबुन का पानी या ग्लिसरीन का एनिमा नुकसानदायक है। पानी में नींबू का रस मिला सकते हैं।
(३) एनिमा उपचार काल में नित्य लेते रहें, परंतु हमेशा लेते रहने की आदत न डालें। यह शरीर शोधन के लिए उपयोगी हैं तथा यौगिक बस्तिक्रिया का सरल विकल्प है।

(४)) त्रिफला चूर्ण एक तोला लगभग, नींबू रस मिले जल से प्रातः लें केवल पांच सात दिन ताकि पुराना जमा मल एक बार साफ हो जाए। लम्बे समय तक प्रयोग न करें।

लघनं परम औषधम््


         
          दीर्घायु व निरोग जीवन के लिये व्यक्ति औषधियाॅं ढूंढता रहता है। इससे अधिक महत्वपूर्ण है स्वस्थ रहने के विषय में आवश्यक जानकारी का सही रूप में उपलब्ध होना व उसका जीवन में पालन ंका सतत प्रयास करना। महर्षि चरक ने स्वस्थ जीवन के लिए दो बातों पर बहुत जोर दिया है। वह हैं- उपवास व ब्रह्मचर्य। आज की व्यस्त जीवन शैली में व्यक्ति चाहकर भी बहुत नियमित खान पान नहीं कर पाता है, जिसके दुष्प्रभाव स्वास्थ्य पर ना पड़े इस हेतु उपवास का अत्याधिक महत्व है।
          उपवास की बात हम जैसे ही करते हैं व्यक्ति के मन में यह भय उत्पन्न होने लगता है कि कहीं लम्बे समय तक भूखें न रहना पड़े। आज स्थिति तों इतनी भयावह हो चुकी है कि यदि जागने के बाद चाय न पी लें तों सिर दर्द या अन्य दिक्कतें महसूस होना शुरू कर देती हैं। ऐसे में व्यक्ति भूखें कैसे रह सकता है। फिर आज के संदर्भ में व्रत व उपवास की क्या प्रासंगिकता रह जाती है। इस विषय को यदि सही में समझा जाये तों यह बहुत ही महत्वपूर्ण है । सप्ताह, दस अथवा पन्द्रह दिन में एक दिन जैसे रविवार, वीरवार अथवा एकादशी का चयन किया जाए उसको स्वस्थ दिवस के रूप में सोचा जाए। स्वास्थ्य के लिये हमारे लिये क्या उपयोगी हैं व क्या अुनपयोगी यह सब विश्लेषण किया जाए। जैसे यदि हम चाय दिन में चार बार पीते हैं तों उपवास के दिन दो बार पीएं। शाम को सोचें कि क्या हम एक माह में दो बार चाय पीकर रह सकते हैं। यदि हम लाल मिर्च व नमक अधिक खा रहे हैं तों व्रत वाले दिन हल्का सेंधा नमक व बिना मिर्च के भोजन करें। इस प्रकार के अनेक प्रकार के अच्छे संकल्प व्रत वाले दिन व्यक्ति के अन्दर उठने चाहिएं जो उसके स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद हैं।
          जैसे-जैसे व्यक्ति का शरीर शुद्ध होता जाए उसकी पौष्टिकता बढ़ती जाए अथवा धातुएॅं मजबूत होती जाएॅं तब वह उपवास के सही व प्राचीन स्वरूप को अपना सकता है जिसमें दोपहर 12 बजे तक मात्र नींबू पानी के अलावा कुछ न लिया जाए तथा एक समय हल्का सूपाचय भोजन लिया जाए व दूसरे समय दूध अथवा फलाहार पर रहा जाए।
उपवास के मुख्य उद्देश्य हैंः-
1.      शरीर को ज्वगपदे से रहित किया जाए।
2.      स्पअमत को विश्राम दिया जाए।
3.      चर्बी व कोलेस्ट्रोल के स्तर को कम किया जाए।
4.      रक्त को शुद्ध किया जाए।
5.      अनवाश्यक विषो का निराकरण किया जाए।

          उपवास में यदि कठिनाई आती है तों खाना न छोड़ें केवल खाद्य पदार्थों को बदलें। कच्चा मूली, गाजर, सलाद, फलों का अधिक सेवन इस दिन करें। विभिन्न रसों का सेवन भी लाभप्रद है परन्तु बाजार से लाए गये किसी रस का सेवन ना किया जाए, क्योंकि इसमें च्तमेमतअंजपअमे सोडियम बेजाएंट मिले होते हैं। खाद्य गुणवता के विषय भारत में कड़े न होने के कारण अनेक कम्पनियाॅं अपने लाभ के लिये अधिक समय तक सड़ने से बचाने के लिए आवश्यकता से अधिक च्तमेमतअंजपअमे मिलाते हैं। इसलिए जो स्वस्थ रहना चाहते हैं उन्हें बाजारी खाद्य पदार्थों पर अपनी निर्भरता कम करनी चाहिए।

Friday, December 23, 2016

विश्वामित्र राजेश

भारतवर्ष में अनेक आध्यात्मिक संस्थाए सक्रिय है जिनमें लगभग 24 संस्थाए तो ऐसी है जिनमे से प्रत्येक से कम से कम एक-एक करोड़ व्यकित जुड़ा है। इनमे से पाँच के नाम दिए जा रहे हैं-
1.    गायत्री परिवार
2.    राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ
3.    ब्रहम कुमारीज
4.    आर्य समाज
5.    इस्कान
    यदि ये संस्थाए वास्तव में राष्ट्र हित व जनहित के लिए समर्पित हैं तो इनको हाथ मिलाना चाहिए। राष्ट्र हित के मुद्दो पर एक साथ मिलकर कार्य करना चाहिए। जो संस्था यह कहती है कि वो केवल आध्यात्मिक हैं समाज सुधार से उनका कोई लेना-देना नहीं है वो सम्भवतः बड़ी भूल पर हैं। यदि किसी मोहल्ले में आग लगी है और उस मोहल्ले का कोई व्यक्ति यह कहे कि मेरा इस आग से कोई लेना-देना नहीं हैं तो वह आध्यात्मिक कैसे हो सकता है। आज समाज अनेक कुरीतियांे की आग मेें जल रहा है उसको बुझाना हम सभी का दायित्व है। बन्दा वैरागी आत्म-कल्याण के लिए एकान्त में तप कर रहे थे। पूज्य गुरुदेव गोविन्द सिंह जी उनसे मिले व उन्होंने उनकी आत्मा को झनकझोल कि आध्यात्मिक व्यक्ति स्वार्थी कैसे हो सकता है। अर्जुन ने भी श्री कृष्ण को यही समझाया था कि कर्म योग को नजरन्दाज कर जो आध्यात्मिक होने की बात करता है वह ढोंगी है वह अपने अहं की पुष्टि करता है।
    संस्थाओं के पास ऐसी बड़ी जन शक्ति है जो संवेदनशील है अच्छी परम्पराओं के लिए ग्रहणशील हैं व संस्थाओं के प्रति किसी न किसी रूप में समर्पित हैं। यदि 24 करोड़ की इस जन शक्ति को हम युग निर्माण के हिसाब से प्रशिक्षित करें तो एक बड़ा आन्दोंलन सम्भव है।
    परन्तु संस्थाओं के इस अभियान में अनेक प्रकार की बाधाएँ समाज के समने आ रही है।
1. पहल कठिनाई यह है कि अधिकतर जगह विस्तार अर्थात Quantity  का ही हल्ला मचा हुआ है। अर्थात संस्थाए बड़ी सँख्या में अपने सदस्य बनाकर अपना विस्तार कर रही हैं। भीतरी सुधार अथवा Quality  पर ध्यान नहीं दिया जा रहा हैं पर अभियान में कोई सफलता नहीं मिल रही है। हिमालय की ऋषि सत्ताओं ने सन 2011 में इस गलत नीति पर अपना रोष जाहिर किया था।
2. दूसरी कठिनाई यह है कि अनेक संस्थाओ में   Lower Conscious अर्थात अपरिपक्व व्यक्तित्व बड़े पदो पर बैठे हैं जिन्हे समाज सुधार से अधिक अपनी पद-प्रतिष्ठा की चिन्ता है। इससे वहाँ कार्यकत्ताओं में बड़ा असन्तोष उत्पन्न होता है। ठलुओं, चापलुसों व अंहकारियों को हलवा-पूरी मिलती है व निष्ठावान बेचारे भटकते रहते हैं। अतः या तो पद Rotation में हो या ऐसे व्यक्तियों को पद छोड़ने के लिए मजबूर किया जाए।
3. संस्थाओं में रजोगुण व तमोगुण बढ़ने पर Negative Carriers उत्पन्न हो जाते हैं। उसका कारण यह होता है कि ऐसे व्यक्ति संस्थाओं में बड़े जोश-खरोश के साथ जुड़ते हैं परन्तु कोई न कोई उनकी महत्वाकांक्षा भी साथ रहती है। पाँच-दस वर्ष कार्य करने पर जब उनका वह उद्देश्य (Hidden objective) पूरा नहीं होता तो वो पस्त हो जाते हैं व Negative Carriers की तरह व्यवहार करना प्रारम्भ कर देते हैं अब उनके द्वारा समाज को केवल
Negativity ही दी जाती है।                                 Catch Negative                       Great Negative                                                                                                 Give Negative

Thursday, December 8, 2016

युग नायक क्षमताओं का दोहन न करें


         युग सैनिक देवात्मा हिमालय के युग निर्मण के महायज्ञ में अपनी भागीदारी निभाते हुए युग नायकों की श्रेणी में आ रहे हैं। देवात्मा हिमालय की चैबीस हजार नायको की माँग की पूर्ति हेतु यह दिव्य अभियान चल रहा है। इस अभियान की सफलता हेतु प्रज्ञा परिजनों को अनेक सावधानियाँ रखनी है। जिसमे एक विशेष सावधानी यह है कि युग सैनिक अपनी क्षमताओं व सम्पदाओं का दोहन न करें। महाकाल प्रज्ञा पुत्रों को तीन सम्पदाएँ प्रदान कर रहा है- ओजस (अच्छा स्वास्थय), तेजस (प्रचण्ड मनोबल) एवं वर्चस (आध्यात्मिक विभूतियाँ)
यह विनम्र निवेदन है कि परिजन अपनी शारीरिक क्षमताओं का देाहन न करें। शरीर की अपनी सीमाएँ हैं। प्रत्येक युग निर्माणी को अपने शारीरिक क्षमताओं का उचित आंकलन करना चाहिए व उसी अनुसार अपने दायित्वों का वहन करना चाहिए। आवश्यकता से अधिक बोझ लम्बे समय तक उठाना शारीरिक सम्पदा का दोहन माना जाएगा जो उम्र बढ़ने के साथ-साथ समस्याएँ भी लेकर आएगा।
टापकी ईष्र्या, द्वेष, पद-प्रतिष्ठा की महत्त्वाकांक्षा से व्यक्ति की मानसिक क्षमताओं का दोेहन हो जाता है। कई बार अनेक प्रकार के भयों की चपेट में व्यक्ति फंस जाता है। प्रज्ञा परिजन इस प्रकार तालमेल बैठाएँ जिससे उनका तेजस बढ़ता रहे। 
टनेक परिजनों को महाकाल ने आध्यात्मिक विभूतियाँ प्रदान की। जिससे व्यक्ति में लोगों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन देने की इच्छा उत्पन्न हुई। दूसरो को ऊपर खींचने के चक्कर में व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक क्षमताओं का दोहन कर बैठा। यह ध्यान रखें कि डूबते हुए को बचाने के लिए रस्सी डाली जाए अपनी भुजा न पकडायी जाए। रस्सी यदि हम न खींच पाए तो छोड़कर अपना बचाव किया जा सकता है। परन्तु भुजा यदि पकड़ में आ गई तो वह हमें भी अपने साथ डुबाकर ले जा सकता है।
विशेष रूप से ध्यान रखने वाली बात यह है कि यदि किसी की किसी प्रकार के कष्ट निवारण में सहायता भी करनी है तो स्वयं कर हैं यह भाव न लाएँ। वरण गुरु सत्ता को बीच में अवश्य लाएँ। उनसे प्रार्थना करें। इससे वह भार व्यक्ति के ऊपर सीधा नहीं आएगा अपितु महाकाल की समर्थ सत्ता के अनुसार ही कार्य होगा व भार भी वही ग्रहण करेंगे। साधक में थोड़ा सा अहं बचा होता है तो वह स्वयं को बीच में ले आता है पता तब चलता है जब उसकी कमर उस भार से टूट जाती है।
यदि हमारी शारीरिक, मानसिक अथवा आध्यात्मिक क्षमताओं में कमी आती है तो हम नायक पद से वंचित हो जाएँगें। यह ठीक ऐसा है जैसे खिलाड़ी अपनी सामथ्र्य का ध्यान में रखते हुए मैदान में खेल का अभ्यास करते हैं। मान लीजिए मैं बैडमिन्टन का खिलाड़ी हूँ। पाँच मैच की मेंरी सामथ्र्य है उतना खेलकर मुझमें ताजगी व शक्ति प्रतीत होती है परन्तु जोश में आकर 10 मैच खेल जाता हूँ जिससे बड़ी थकान व टूटन प्रतीत होती है। यह मेरे लिए हानिकारक सिध्द हो सकता है। माॅस पेशियों के बजाय मजबूत होने के उनमे विकृतियाँ आ सकती है। मैंने ऐसे कई खिलाड़ी देखे है जो पहले बहुत बैडमिन्टन खेलते थे परन्तु उनकी माॅस-पेशियाँ खिचाव में आ कई व डाक्टर्स की राय से उनको खेलना छोड़ना पड़ा।
क्षमताओं के लगातार दोहन से बैटरी डिसचार्ज हो जाती है जो किसी काम की नहीं रहती। बिगड़ी हुई चीज को संवारने में, घायल हुए सैनिक के इलाज में बहुत समय, साधन खर्च होते हैं।
जब कोई प्रज्ञा परिजन भावनावश इस प्रकार की कोई मूर्खता कर बैठता है तो देवसत्ताओं को उसको सही करने में बहुत ताकत लगानी पड़ती है। अतः यह निवेदन है कि भावावेश में आकर अपनी क्षमताओं का दोहन न किया जाय।
यह बात भी सत्य है कि भगवान महाकाल सर्व समर्थ है व हमारा कुछ भी नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। परन्तु भगवान भी प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करता है वह भी नियमों के अन्तर्गत मर्यादा से बंधा हैं अतः तेज दौड़ने के कारण यदि कहीं गिर जाए तो भगवान सम्भालने अवश्य आएगा परन्तु चोट लग ही चुकी होगी।
महाकाल की सत्ता ने हमें एक आदर्श जीवन जीकर दिखाया अन्तिम समय तक वो शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक शक्तियों से भरे पूरे रहे। शरीर से इतने बलिष्ठ थे कि लगभग 65-70 वर्ष की अवस्था में जग एक सांड नियंत्रण से बाहर होकर आश्रम को नुकसान पहुँचाने लगा तो उसको भी काबू कर बाहर निकाल फेंका।
चाकूओं के अनेक घाव सहकर भी उनके मनोबल में कोई कमी नहीं आयी। कहने का बड़ा सीधा अर्थ है कि हमें शरीर, घर परिवार, आर्थिक स्थिति व युग निर्माण की गतिविधियाँ सभी में उचित तालमेल बैठाकर इस प्रकार चलना है कि हमारा कोई भी पक्ष कमजोर न रहे। समाज के सम्मुख एक आदर्श उदाहरण बनने का प्रयास करना है तभी आचार्य के रूप में समाज हमें स्वीकार कर पाएगा व हमसे सच्चे हृदय से जुड़ेगा व प्रेरणा पाएगा। पुस्तकें बेचने, प्रवचन करने, मेले ठेले लगाने व कथा कहानियाँ बांचने से काम नहीं चलने वाला क्योंकि यह सब कार्य तो अनेक संस्थाए अब अच्छे रूप में कर ही रही हैं। हममे यदि कुछ विशेषता है तो हम उनसे एक कदम आगे बढ़कर दिखाएँ।
आज का प्रबुध्द वर्ग केवल कोरी बातों पर विश्वास नहीं करता। हर कोई यही कह रहा है कि उनका गुरु सबसे बड़ा है व उनका मिशन सबसे बढ़िया है व उनका साधन पथ सर्वोत्तम है। यदि हमारा सर्वोपरि है तो सिध्द करके दिखाएँ, प्रमाणित करें अन्यथा कार्य के बाद विवाद में न उलझें। यह तभी सम्भव होगा जब हमारी शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक क्षमताएँ उच्च हांेगी व जनता भी उसको स्वीकार करेगी। अभी हम मात्र पुस्तकों की बात करते हैं, गुरु की बात करते हैं वह आवश्यक भी है परन्तु इसके साथ-साथ स्वयं का आदर्श प्रस्तुत करना भी परम आवश्यक है।                                                                                                         (विश्वामित्र राजेश)

Monday, November 14, 2016

युग नायकों की समीक्षा व निवेदन

जब तक था अज्ञान का अंधेरा
गलतियाँ हुई
अब है समय भरपाई का
एक स्थान पर 24 कुण्डी यज्ञ का आयोजन हुआ। बड़े मनोयोग से गायत्री परिवार के कार्यकर्ताओं ने इसकी तैयारी की। निमन्त्रण पाकर मुझे भी यज्ञ में सम्मिलित होने का सुअवसर प्राप्त हुआ। पहले दिन कलश यात्रा थी। यह क्या यहाँ तो 24 कलश उठाने के लिए 24 महिलाएँ नहीं मिल पा रही हैं। कार्यकर्ता बेचारे शर्म के मारे पानी-पानी हुए थे। मेरी आँखों में भी आँसू थे। जहाँ कभी अश्वमेघ यज्ञ हुआ था लाखों लोग एकत्र हुए थे वहाँ आज यह स्थिति।
     दूसरे दिन उपस्थिति थोड़ा बढ़ी परन्तु आँकड़ा तीन अंको तक नहीं पहुँच पाया। अन्तिम दिन रविवार को फिर भी उपस्थिति ठीक रही।
    मेरी आत्मा में अनेक प्रश्न उभरे! क्या सन् 2000 के उपरान्त गायत्री परिवार में वृ(ि हुई अथवा गिरावट आयी। क्या हम अपनी समीक्षा करने से डरते हैं? परीक्षा के लिए कितनी तैयारी है कया विद्यार्थी को उसका आंकलन नहीं करना चाहिए?
युग निर्माण के लिए हम कितना सशक्त हैं कितने संगठित है। क्या यह समीक्षा हमारे लिए अनिवार्य नहीं है? विस्तृत समीक्षा ‘युग के विश्वामित्र का आहवान्’ पुस्तक ;लेखक डा. राजेश अग्रवालद्ध में पढ़ने को मिलती है। यहाँ पर भी कुछ चर्चा की जा रही है।
शास्त्रों के अनुसार ‘गायत्री ब्राहम्ण की कामधेनु है’ 
इसका सीधा सा अर्थ है कि गायत्री का प्रयोग यदि सतोगुणी हुआ तो वह कामधेनु के समान साधक के जीवन में फलदायी हो जाती है। थोड़ा विस्तार में चिन्तन करें तो पाँएगें कि गायत्री जप से जो ऊर्जा उत्पन्न होती है व्यक्ति का मन उसका प्रयोग तीन तरह के प्रयोजनों को पूरा करने में करता है। पहला सतोगुणी, दुसरा रजोगुणी, तीसरा तमोगुणी। आत्म-चिन्तन करें कि हमारे मन मेें किस प्रकार के भाव अधिक उठते हैं-
1. मुझे अपने गुरु का काम करना है व एक आचार्य की भूमिका निभानी है।
2. मैंने जो मंच से बोला वह मेरे गुरु की प्रेरणा थी।
3. मान-अपमान मेरे गुरु को समर्पित है।
4. जीवन की आहुति गुरु के चरणों में, कर्म खर्च में निर्वाह।
5. अपने लिए कठोर व दूसरो के लिए उदार।
6. मेरी ख्याति गायत्री परिवार में दिन रात बढ़ रही है। मैं व मेरा परिवार पूजनीय बन जाए।
7. मुझे गायत्राी परिवार में बड़ा पद प्राप्त हो। मुझे लोग मुखिया की तरह सम्मान करें।
8. मैं अपनी तप साधना से किसी का भी भला-बुरा कर सकता हूँ।
9. मैं बड़ा लेखक, वक्ता हूँ मेरे भाषण व लेखन से इतने लोग प्रभावित होते हैं।
10. मैं गायत्री परिवार में इतने लम्बे समय से जुड़ा हूँ मैंने गुरुदेव का बहुत साहित्य पढ़ा है मुझे अब कुछ और पढ़ने की आवश्यकता नहीं है।
11. उसने मेरे चरित्र पर दोष लगाया जरा मिल जाए उसकी अच्छी तरह खबर लूँगा।
12. उसने मेरा इतना नुकसान कर दिया इसका बदला मैं लेकर रहूँगा।
13. उसे पता नहीं उसने किसका अपमान किया है उसका सर्वनाश हो जाएगा।
14. बहुत अच्छा हुआ जो उसका कार्यक्रम फलाप हो गया हमसे पूछे बिना कैसे कार्य सम्पन्न हो सकता था।
15. अच्छा हुआ जो उस पर कष्ट आया, मुझे उसने परेशान कर रखा था। भविष्य में भी वह कभी सुखी नहीं रहेगा।
यह समझाने के लिए एक सैम्पल बनाया गया है जिसमंे पहले 5 विचार सतोगुणी, दूसरे 5 विचार रजोगुणी व तीसरे 5 विचार तमोगुणी प्रकृति के हैं
अनेक साधकों की यह कुण्ठा रहती है कि इतना गायत्री जप किया फिर भी कुछ नहीं मिला। यदि हमारे मन में सतोगुणी विचारों की प्रधानता है तो ही गायत्री मन्त्र हमरे लिए कामधेनु के समान फलीभूत होने लगेगा। यह नहीं सोचना चाहिए कि रजोगुण व्यर्थ है जीवन निर्वाह के लिए रजोगुण चाहिए व सुरक्षा के लिए तमोगुण भी चाहिए। आसुरी शक्तियों से मिशन को बचाने के लिए तमोगुण भी आवश्यक है। यह खेल थोड़ा उलझा हुआ है व जो त्रिगुणतीत है वही तीनों गुणों को आवश्यकतानुसार उपयोग करने में समर्थ हैं।
संसार के अधिकतर प्राणी रजोगुण व तमोगुण की चपेट में हैं। जिसका परिणाम बड़ा ही घातक हो रहा है। सभी मिशनों की लगभग एक सी ही राम कहानी है-
इतना किया जप-तप, हाथ नहीं कुछ आया है।
लोगों को दिए उपदेश बहुत, स्वयं कुछ नहीं पाया है।।
यदि मिशनों के नामी-गिरामी कार्यकत्र्ताओं की सर्जीकल सटाइक हो जाए तो पता चलेगा कि किसी का दिल रोगी है तो किसी का पेट रोगी है तो कोई सिर दर्द व कमर दर्द से परेशान है।
धर्म-तन्त्र भी रजोगुण व तमोगुण की चपेट में है। एक ही गुरु के दो शिष्य एक-दूसरे को नीचे गिराने के लिए एक दूजे के ऊपर तन्त्र प्रयोग कर रहे हैं इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है।
परमपूज्य गुरुदेव ने प्रारम्भ से ही मिशन को रजोगुणी लोगो से बचाकर भावनाशीलों व त्याग द्वारा पोषित किया। इसी क्रम में उन्होंने अनेक धनवानों के प्रभाव से मिशन को बचाया यह सर्वविदित है। कुछ धनवानों का उन्होंने गुप्त रूप से सहयोग लिया परन्तु उनको मिशन में कहीं भागीदारी नहीं दी। ऐसे कईं उद्योगपति हैं जो डूबती हुई स्थिति में गुरुदेव के पास आए। गुरुदेव ने उनसे धन का एक भाग युग-निर्माण के लिए मांगा परन्तु उनको मिशन की योजनाओं से अलग रखा।
आज रजोगुणी व तमोगुणी लोगो के बढ़ते प्रभाव से मिशन में गुड़-गोबर की स्थिति उत्पन्न हो गयी है। जगह-जगह बड़े-बड़े भवनों का निर्माण हुआ है परन्तु भावनाशीलों की सख्यँा घटी है। शक्तिपीठो पर झगड़े झंझट बढे़ हैं। इसी कारण नए युवा मिशन से नहीं जुड़ पाए।
जो सम्पर्क में आए स्थिति व मानसिकता देखकर भाग खड़े हुए। गायत्री परिवार के शुभ-चिन्तकों, बड़े कार्यकत्ताओं, नायकों से यह विनम्र अनुरोध है कि वो अपनी जिम्मेदारी समझें व आसुरी शक्तियों द्वारा उत्पन्न मतिभ्रम से बाहर निकलें। समुद्र मंथन की भाँति आत्म चिन्तन करें। सारी बात समझ आएगी परतें खुलती जाँएगी, अहं के असुरी मकड़ जाल से मुक्ति मिलेगी। जब बालक को प्यार की भाषा समझ नहीं आती तो दूसरी भाषा बड़ी कष्टदायी होती है। मैं अपनी कलम से इसको नहीं लिखना चाहता हूँ।
युग नायकों की मानसिकता जिस दिन सही हो जाएगी। उस दिन युग-निर्माण के उपर छाया कोहरा हटने लगेगा। एक छोटी सी कहानी के द्वारा यह समझाया जा रहा है-
यूरी गैलर- ज्ीवनहीज च्वूमत या संकल्प शक्ति से चलती घड़ियों व संकल्प शक्ति से अंकुरित हो गया।
युग नेतृत्व के लिए उदारता आवश्यक- एक बार एक राजा जो बहुत ही न्यायप्रिय था भेष बदल कर घूमा करता था। वह एक गाँव में पहुँचा वहाँ गन्ने की बहुत अच्छी फसल हुयी थी। एक बूढ़ी माता खेत की देखभाल कर रही थी। 
मुसाफिर के भेष में राजा ने बूढ़ी माता से उसकी फसल के विषय में पूछताछ की। माता ने पहले तो मुसाफिर को गन्ने का रस पिलाया। मुसाफिर उसके अतिथि सत्कार से बहुत प्रसन्न हुआ। ऐसा रस उसने कभी नहीं पिया था। माता ने अतिथि को बताया कि राज्य का स्वामी बहुत ही श्रेष्ठ व्यक्ति है उसी के प्रताप से गाँव-खेत हरे भरे रहते हैं।
अब राजा को यह लगा कि जब उसके प्रताप से खेती हरी-भरी है तो इसका एक भाग उसके राज कोष को मिलना चाहिए। राजा ने अब प्रजा पर कर लगा दिया। राज कोष भरता रहा व राजा खुब प्रसन्न हुआ। इस प्रकार जीन वर्ष बीत गए। राजा एक बार वेश बदलकर प्रजा का हाल जानने के लिए निकला व उसी स्थान पर पहुँचा।
बूढ़ी माता ने पुनः दो गन्नें तोड़े व रस निकाला। गिलास इस बार आधा भरा था। राजा ने रस पिया तो उतना स्वादिष्ट भी नहीं लगा। मुसाफिर के भेष में राजा ने पूछा कि पहले तो गन्ने से अधिक रस निकलता था अब कम क्यों? इस पर बूढ़ी माता ने बड़ा सुन्दर उत्तर दिया-
‘‘जब से राजा दया हीन हुआ है यह धरती भी रस हीन हो गयी है।’’
राजा यह उत्तर सुनकर भौचक्का रह गया उसे अपनी गलती पर भारी पश्चाताप हुआ व उसने तुरन्त कर वापिस दिए।
आज भी समाज की यही विडम्बना है। अनेक मिशनों के पास भारी सम्पत्ति है धन-दौलत है परन्तु कार्यकत्र्ताओं में असन्तोंष है।
रजोगुणी व्यक्तित्वों का सहयोग मिशन को अवश्य लेना चाहिए परन्तु युक्तिपूर्वक उनके हाथ में मिशन की कमान न सौंपे। वर्षों पुरानी बात है हमारे छप्ज् में स्वदेशी पर एक बड़ा आयोजन हुआ। एक बड़े उद्योगपति को उसका मुख्य अतिथि बनाया गया जिससे कार्यक्रम का खर्च निकल आए। मैं भी कार्यक्रम के आयोजको में से एक था। मुख्य अतिथि का भाषण हुआ स्वदेशी की जोरदार वकालत हुई परन्तु छप्ज् के एक विद्यार्थी ने खड़े होकर मुख्य अतिथि से प्रश्न किया ‘‘ ैपत आप जिस गाड़ी में आए हैं वह तो विदेशी कम्पनी की है व यहाँ स्वदेशी की वकालत कर रहे हैं।’’ मुख्य अतिथि का तो मानो खू नही सूख गया व कार्यक्रम प्राणहीन सा नजर आने लगा। हमारी एक मुर्खता ने 15 दिन की मेहनत पर पानी फेर दिया।
इस प्रकार नायकों की त्रुटियाँ, अविवेकपूर्ण निर्णय, व्यक्तित्व की खामियाँ युग-निर्माण की गाड़ी में बैक गियर लगा देती है। युग-निर्माण में सुलझें हुए नायकों की भर्ती आवश्यक है। अच्छा तो यही है कि जो स्वयं को इस लायक नहीं समझते या जिनसे यह पवित्र प्लेटफार्म दूषित हो रहा है वो स्वयं को शीघ्र परिवर्तित कर लें या इसको छोड़ दें। उचित व समर्थ लोगों को सौंपने का प्रयास करें। इससे उनका सम्मान भी बना रहेगा एव वो विपत्तियों से भी बचे रहेंगे। युग-निर्माण में विलम्ब देवशक्तियाँ सहन नहीं करेंगी।
युग-नायको से विनम्र अनुरोध है कि वो अपने व्यक्तित्व को इस लायक बनाएँ कि एक श्रेष्ठ आचार्य के रूप में जनता उसका सम्मान करे। गलतियाँ आगे और नहीं सही जा सकती हैं। अब तो भरपाई का समय है जो पुरानी त्रुटियाँ हुई हैं ईमानदारी से उनकी भरपाई होनी चाहिए।
युग-निर्माण की टेन जितना लेट चल रही ह ैअब उसके सुपर-फास्ट गति से दौड़ने का समय आ गया है।
लेखक का विनम्र अनुरोध है व युगऋषि की चेतावनी।
पहले तो जन सामान्य को चेतावनी दी जाती थी अब पाँच करोड़ के विशाल गायत्री परिवार के लिए भी चेतावनी जारी हो चुकी है। युग-निर्माण की चुनौती के लिए एक-एक कदम सोच समझकर रखें जो कि हमारे गुरु को प्रसन्नता प्रदान कर सके।
विश्वामित्र राजेश।