Tuesday, August 22, 2023

Ancient Indian Health tips

 कौनसा जूस या रस कितनी मात्रा में लेना चाहिए…

भैषज्य कल्पना विज्ञान ग्रन्थ के अनुसार…

【!v】हल्दी की मात्रा 25 से 50 mg तक निर्धारित है। इससे अधिक लेने पर गर्मी, खुश्की करती है।

【v】नीम इतना ही खाना चाहिए, जिससे कंठ कड़वा हो जाये। ज्यादा लेने पर यह पित्त की वृद्धि करता है।

  • सप्ताह में दो बार मूंग की दाल का पानी जरूर पिएं। हो सके, तो मूंग की दाल में रोटी गलाकर खावें। पेट के रोगों में यह बहुत मुफीद है।
  • रात को फल, जूस, सलाद के सेवन से बचें।
    अरहर की दाल सबसे ज्यादा कब्ज
    पैदा करती है।
  • सुबह बिना नहाए कुुुछ भी
    अन्न न लेवें। अधिकांश लोगों ने यह
    आदत बना ली है कि…सुबह चाय के
    साथ बिस्किट आदि बिना स्नान के ही
    लेते हैं, जो शरीर के लिए बेहद हानिकारक है।

आयुर्वेद चंद्रोदय, द्रव्यगुण विज्ञान, आयुर्वेदिक निघण्टु, भावप्रकाश शास्त्रों के अनुसार शरीर की गन्दगी दूर करने का तरीका-

【१】लोंकी का जूस 20 ml लेना लाभकारी है।

【२】करेले का रस 10 ml पर्याप्त है।

【३】नीम, बेल के पत्तों की 2 से 3 नई कोपल ही लाभदायक है।

【४】आयुर्वेद के अनुसार कोई भी चीज जितनी कम मात्रा में लेंगे, उतना कारगर होगी।

【५】अनेक लोग एक से दो चम्मच तक हल्दी का उपभोग करते हैं, यह हानिकारक है।

【६】रात में ठंडा दूध कफ बढ़ाता है और सुबह ठंडा दूध पियें, तो पित्त सन्तुलित होता है।

ऐसे बहुत से अनुपान आयुर्वेद में बताएं है।

【७】शहद और देशी घी बराबर लेने पर विष हो जाता है।

【८】दिन भर में एक से अधिक नीबू का रस लेने से नपुंसकता आने लगती है।

【९】अरहर की दाल खाएं, तो उस दिन पानी 4 गुना पियें।

【१०】उड़द की दाल की तासीर देशी घी से बेहतरीन होती है।

【११】दिन भर इन समुद्री या सादा नमक 60 फीसदी और सेंधा, काल नमक 40 फीसदी लेना चाहिए।

【१२】कुछ लोग केवल सेंधा नमक का ही इस्तेमाल करते हैं, जिससे रक्त नाड़ियाँ दूषित होने लगती हैं।

अमृतमपत्रिका से with thanks

Monday, August 21, 2023

अनैतिकता की नींव पर नैतिकता का भवन

अनैतिकता की नींव पर नैतिकता का भवन खड़ा नहीं हो सकता है। 


संसार में सारे धर्म, सारे संप्रदाय, सारे महामानव, सारे ऋषि - मनीषी, सारे शास्त्र व सभी मानवों की अन्तर्आत्मा एकमत से नैतिकता का समर्थन करते हैं, नैतिकता को धर्म का प्राण कहते हैं तो क्या नैतिक जीवन मूल्य इतना महत्वपूर्ण है? उत्तर होगा ! हां  नैतिकता विहीन व्यक्ति का प्राणबल ,मनोबल, आत्म बल सब नष्ट हो जाता है । जबकि बल ही संसार में सर्वोपरि संपदा है, शक्ति व सामर्थ्य है । 

जैसे मानवीय शरीर व जीवन प्राण के प्रवाह के कम होने से दुर्बल व रोगी हो जाता है, प्राण विहीन होने से मृत लाश बन जाता है ,उस शरीर में दुर्गंध आने लगती है, कीड़े पड़ जाते हैं ,उनके आंतरिक अंग अववयों का क्षय होने लगता है । ठीक इसी तरह नैतिकता रूपी प्राण जब जीवन से निकल जाता है तो धर्म रूपी शरीर एक लाश के रूप में बन जाता है, उसके अंदर विकृतियों के कीड़े उत्पन्न होने लगते हैं, उसकी दुर्गंध से मानवता परेशान होने लगती है, धर्म के क्षेत्र में छल - छद्म , झूठ,पाखंड, अन्याय , व अत्याचार भी प्रवेश कर जाता है और ऐसे नैतिकता विहीन पाखंडी, अधर्म को धर्म का रूप बनाकर प्रस्तुत करते हैं । क्योंकि अनैतिकता मानव को जो विपरीत बुद्धि का बना देती है, जनहित का चिंतन समाप्त कर निजहित के चिंतन में केन्द्रीत कर देती है इसीलिए अनैतिकता को संसार में त्याज्य कहा गया है लेकिन आज जब हम सत्य की कसौटी पर, नैतिकता की कसौटी पर समाज, राष्ट्र, धर्म- संस्कृति व राजनीति का नेतृत्व करने वालों को कसते हैं तो 100 में 99 फेल होते हैं । जब हम गहराई से बड़े-बड़े राजनेताओं ,बड़े-बड़े धर्माचार्यों ,बड़े-बड़े सामाजिक संगठनों के संचालकों को, बाहर नैतिकता का ढोल पीटने वाले, नैतिकता के आंदोलन चलाने वाले, मंच और माइक पर चिल्ला चिल्ला कर नैतिकता के लिए जमीन आसमान एक करने वाले लोगों के निजी जीवन के भीतर झांककर देखते हैं तो अनैतिकता कूट-कूट कर भरी हुई दिखाई देती है । अगर सचमुच में नैतिक जीवन मूल्यों पर आधारित अभियान खड़े होते, राष्ट्र का निर्माण करने वाले धर्म के आचार्य खड़े होते, राजनेता खड़े होते ,सामाजिक संगठन खड़े होते, जातीय संगठन खड़े होते तो आज संसार की स्थिति, देश और समाज की स्थिति कुछ और होती, प्राणबल ,मनोबल ,आत्मबल से व्यक्ति, परिवार, समाज व राष्ट्र संपन्न होता और ब्रह्मबल (ईश्वरिय) बल की इन सब पर अटूट वर्षा होती लेकिन दुर्भाग्य अनैतिकता का सहारा लेने वाले, छोटी-छोटी सफलताओं के लिए अनैतिकता का उपयोग करने वाले यहां कहां सोचते है ?  संसार के सारे धर्मों का, धर्म संप्रदायों का ,कर्मकाण्डों का, उपासनाओं व साधनाओं का,योग व अध्यात्म की सारी क्रियाओं का मूल उद्देश्य देखा जाए तो वह एक ही है कि मानव नैतिक बने । नैतिकता विहीन व्यक्ति अपने परिवार, समाज व राष्ट्र के लिए कोढ़ स्वरूप है और कहीं महान मिशन में ऐसे अनैतिकता का सहारा लेने लोग बैठ जाए तो उन मिशनों का सर्वनाश कर देते हैं , उनकी भक्ति करने वाले लाखों-करोड़ों लोगों में अपनी प्रवृतियों का समावेश उनके जीवन को पतन के गर्त में गिरा देते हैं । बाहर से पूजा, पाठ, प्रार्थना ,नमाज, कीर्तन, भजन के, दिखावा प्रदर्शन के कितने ही सरंजाम क्यों न खड़ा किया जाए सब सारहीन व ढकोसला मात्र रह जाते हैं इसलिए हे मानव ! नैतिकता जीवन का प्राण है,धर्म का प्राण है , अध्यात्म का प्राण है, जीवन मूल्यों का प्राण है, भारत जब कभी भी जगतगुरु और सोने की चिड़िया रहा उसका मूलाधार नैतिकता ही रही तथा इसी ने इस देश के लोगों को देवता बनाया था लेकिन आज हम कहां खड़े हैं ? हमारा नैतिक मूल्य कितना ऊंचा रहा इस तथ्य को थॉमस बुनरो मैकाले (टी बी मैकाले ) ने भारत आकर जब सर्वेक्षण किया व उन तथ्यों को 2 फरवरी 1835 में हाउस ऑफ कॉमन्स में रखते हुए मैकाले कहता है कि *"मैंने भारत के कोने कोने की यात्रा कि मुझे इस देश में एक भी व्यक्ति चोर और एक भी व्यक्ति भिखारी नहीं मिला"* तो आप कल्पना करिए इन 188 वर्षों में हमारा राष्ट्र क्या से क्या बन गया, कहां गए हमारे जीवन मूल्य ?  हजारों वर्षों तक विदेशी आक्रांताओं के आक्रमणों से हमारी लूट हुई, गुलामी की अवस्था में जिए फिर भी हमने नैतिक मूल्यों का परित्याग नहीं किया यही कारण है कि भारत और भारत की संस्कृति जीवित रही लेकिन आज इस समाज व राष्ट्र को नैतिकता की कसौटी पर कसा जाय व देखा जाए तो नैतिक जीवन मूल्यों में जीने वालों का अकाल पड़ा है । 188 वर्षों में हमारे जीवन मूल्य, हमारी संस्कृति, हमारे संस्कार, हमारी वेशभूषा व हमारी भाषा सब कुछ बदल गए , आओ हम मिलकर फिर अपने जीवन को नैतिकता की कसौटी पर कसते हुए संचालित करें तथा समाज व राष्ट्र का नेतृत्व करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस कसौटी पर कसे तो निश्चित हम इस राष्ट्र को नवीन दिशा देंगे, समाज को नई दिशा देंगे । इससे कम में बात बनने वाली नहीं यह व्यवस्था आज करो या हजार साल के बाद करना पड़े, जब भी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र का सही मायने में उत्थान करने की अभिलाषा होगी तो हमें नैतिक जीवन के मूल्यों को गहन आस्था के साथ अपने जीवन में धारण करना होगा तभी हमारे जीवन में, समाज व राष्ट्र के जीवन में देवत्व की स्थापना होगी । इस तथ्य को समाज व राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति जिन्हें राष्ट्र का निर्माण करने की अभिलाषा है अपने हृदय के अंतः स्थल में गहराई से प्रवेश करा दें कि *"अनैतिकता की नींव पर नैतिकता का भवन कभी भी खड़ा न हो सकेगा" ।

अपना उद्धार स्वयं करें

     बारह वर्षों की घनघोर तपस्या व ध्यान- साधना के फलस्वरूप वर्धमान महावीर को केवल ज्ञान (विशुद्धज्ञान) की परम उपलब्धि हुई थी। 'केवल ज्ञान' यह महापुरुषों की वह अवस्था है, जब उनके लिए ज्ञान से भिन्न कुछ नहीं रह जाता है, केवल ज्ञान ही रह जाता है।
    जैसे वसंत ऋतु में वृक्षों से पुराने पल्लव स्वयमेव झरते जाते हैं, गिरते जाते हैं, टूटते जाते हैं और वृक्षों की डालियों में नए पल्लव, नए रंग- बिरंगे पुष्प उग आते हैं वैसे ही केवल ज्ञान, निर्वाण, कैवल्य, आत्मसाक्षात्कार की अवस्था में साधक के मन से राग-द्वेष, लोभ-मोह, आसक्ति आदि सभी विकार मिट जाते हैं और साधक के हृदय में ज्ञान का अमृत अरुणोदय होता है और साधक का आत्मलोक ज्ञान के अमृत प्रकाश से जगमगा उठता है।
    12 वर्षों की लंबी तपस्या व ध्यान-साधना के फलस्वरूप महावीर का अंतस् भी केवल ज्ञान से जगमगा उठा था। वे ज्ञानरूप हो गए। उनके लिए तब कुछ भी ज्ञेय नहीं रहा। 'मैं ज्ञाता हूँ' यह भान भी उनके लिए शेष नहीं रह गया। केवल और केवल ज्ञान ही रह गया। महावीर ज्ञानरूप हो गए। सत्यरूप हो गए, प्रेमरूप हो गए, आनंदरूप हो गए।
    उनके रोम-रोम से वह दिव्य ज्ञान, प्रेम व सत्य स्वतः प्रवाहित होने लगा। उनके उपदेशों से उनके ज्ञान, प्रेम व सत्य की सुगंध चहुँओर फैलने लगी और वातावरण व जनमानस को सुगंधित - करती गई, आप्लावित करती गई। ज्ञान की उसी भावदशा में भगवान महावीर मध्यमा नगरी पहुॅचे। और वहाँ पर महासेन नामक एक उद्यान ठहरे। उनके आगमन की चर्चा सगंध के समान सर्वत्र फैल गई।
    हजारों नर-नारी उनके दर्शन व उपदेश पाने को वहाँ एकत्रित हुए। भगवान महावीर ने मिध्या धारणाओं में भटकती जनता के समक्ष उस महासत्य को प्रकट किया, जिसे उन्होंने कठिन तपस्या व ध्यान-साधना के द्वारा जाना था ।
    उन्होंने अपने अमृत उपदेश में कहा कि अपना उद्धार स्वयं करो । आत्मोद्धार के लिए आध्यात्मिक जीवनचर्या आवश्यक है। आत्मोद्धार के लिए न तो नारीत्व बाधक है और न ही पुरुषत्व साधक है। आत्मोद्धार के लिए पवित्र जीवनचर्या, संयम और सम्यक ज्ञान आवश्यक है। जीवन में सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह का होना आवश्यक है। साथ ही प्राणिमात्र के लिए सेवा, सहकार व प्रेम की भावना का होना भी आवश्यक है।
    उन्होंने आगे कहा-' "तुम्हारे सुख-दुःख के लिए कोई और नहीं, बल्कि तुम्हारे कर्म ही जिम्मेदार हैं। जब तुम अच्छे या शुभ कर्म के रूप में अच्छे कर्मबीज बोते हो तो तुम्हें सुख प्राप्त होता है और जब तुम बुरे कर्म के बीज बोते हो तो दुःख प्राप्त होता है। मनुष्य अपना जीवन ईश्वर की दया व क्रोध पर अवलंबित मानकर अपने को आलसी और परावलंबी बना बैठा है, पर सच तो यह है कि तुम्हारे सुख-दुःख तुम्हारे ही कर्मों पर अवलंबित हैं, ईश्वर की दया या क्रोध पर नहीं। तुम जो भी हो, जैसे भी हो, तुम अपने अच्छे या बुरे कर्मों के कारण ही हो।"
    वे फिर बोले- "इसलिए यदि सुखी रहना चाहते हो तो आलस्य, प्रमाद का त्याग कर श्रम करो, संयम करो, पुरुषार्थ करो, शुभ और अच्छे कर्म करो पर हाँ, अच्छे कर्म भी आसक्ति से रहित होकर ही करो जिससे कि तुम किसी कर्मबंधन में नहीं बँधो और मोक्ष प्राप्त कर आनंद की अनुभूति कर सको। तुम्हारा सुखी या दुःखी होना ईश्वर के ऊपर नहीं, स्वयं तुम्हारे ऊपर ही निर्भर है; क्योंकि • ईश्वर मनुष्य स्वयं है । तुम्हें ' अहं ब्रह्मास्मि' ' मैं ही ब्रह्म हूँ' इस वाक्य को आत्मसात् कर उसे अपने जीवन में चरितार्थ करके दिखाना चाहिए। तुम सब के लिए और मनुष्य मात्र के लिए मेरा यही संदेश है कि तुम अपनी आत्मशक्ति को देखो। तुम अपने महान स्वरूप को पहचानो और अपने महान परम रूप की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करो। तुम अपना उद्धार स्वयं करो। "
    भगवान महावीर ने कहा- “सत्य ही भगवान है । सत्य चंद्र से भी अधिक सौम्य और सूर्य से भी अधिक तेजस्वी है। इसलिए जीवन में सत्य की उपासना करो । सत्य की आराधना करो। सत्य की अभ्यर्थना करो। सत्य का आचरण करो । आध्यात्मिक जीवनचर्या का पालन करते हुए अपने ईश्वरीय रूप को पहचानो, अपनी शक्ति को पहचानो और अपने कर्त्तव्य का पालन करो। इसी से तुम्हें सच्चा सुख, शांति और आनंद प्राप्त हो सकेगा।"
    भगवान महावीर के अमृत उपदेश को पाकर वहाँ उपस्थित सभी नर-नारी अभिभूत हुए बिना नहीं रह सके और अपने जीवन को तदनुरूप गढ़ने की मनोभूमि बनाने लगे व साथ ही उसी अनुरूप जीने को संकल्पित भी हुए।

Sunday, August 20, 2023

चेतना का दिव्य प्रवाह

1.दो छोर(किनारे) 

यह सृष्टि, यह संसार दो धाराओं से बना है एक चेतन (ब्राह्मिसत्ता) और दूसरा जड़ (भौतिक पदार्थ ) । प्रथम चेतन का प्रवाह सतोगुणी है, वह उत्थान की ओर ले जाता है, मानव को दिव्यता की ओर ले जाता है, देवत्व की ओर ले जाता है, चेतना को अंतर्मुखी करता है, विचारों की शक्ति का जागरण करता है, विवेकशीलता को जगाता है । 

दूसरा प्रभाव भौतिकता का है जिसमें पांच महाभूत प्रकृति(पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि व आकाश तथा प्राणतत्व) से शरीर की रचना है । इसका प्रभाव अधोगामी होता है, नीचे की ओर लाता है, इसका प्रवाह बहिर्मुखी है । जल का प्रवाह स्वाभाविकता से हमेशा नीचे की ओर बहता है उसके लिए उसे कोई प्रयास नहीं करना पड़ता लेकिन जब उसको ऊपर उठाना होता है तब सूर्य को तपना पड़ता है तब यह जल को उठाकर आकाश में ले जाता है, तथा इतना ही नहीं उसको शुद्ध एवं पवित्र करके ले जाता है उपयोग करने योग्य बना कर ले जाता है तो उसके लिए सूर्य का तपना ही पड़ेगा। 

हे मानव ! अपनी आत्मा को, चेतना को, उत्थान की ओर ले जाना है तो जीवन में तप करना ही पड़ेगा है और जो तप करने की महाविद्या है, वही हमारी जीवन शैली है,वही हमारी देव संस्कृति है, वही हमारी योग संस्कृति है, वही हमारी भारतीय संस्कृति है, वही हमारी ऋषि संस्कृति है वही हमारी आर्य संस्कृति है , जिसे संसार हिंदू संस्कृति कहता है ,मानवीय संस्कृति कहता है, जिसने भोगों को नहीं, त्याग को महत्व दिया है, जिसने, दया, करूणा ,ममता, प्रेम, आत्मीयता , सहयोग , सहकार, उदारता जैसी भाव संवेदनाएं प्रदान की तथा सर्व हित को महत्व दिया है । 

लेकिन जो अधोगामी संस्कृति है मानव को पतन की ओर ले जाती हैं उसका प्रवाह हमेशा निम्न गामी होता है और चिंतन के प्रवाह को बह्रिमुखी करती है, वह हमेशा मानव को पतन की ओर दौड़ाती है, इसके दुष्प्रभाव से मानव का चिंतन लोकेषणा,वित्तेषणा व पुत्रैषणा में डूब जाता है तथा इन तीनों एषणाओं के चलते मानव के जीवन में सारे कुकर्मों का उदय होने लगता है तथा हृदय की भाव संवेदनाएं मर जाती है और मानव चेतना लोभ,मोह, अहंकार , के चक्कर ब्यूह में फंसाकर, नर पशु ही नहीं , नर पिशाच बन जाती है और वे क्रूर कर्म करता है जिससे मनुष्यता तड़पती है, मानवता तड़पती है तथा उनको देखकर उसको शांति मिलती है । 

जहां भी ऐसे पतन का प्रवाह देखो तो समझ लो की जिन देव मानवों का, जागृतों का, सोये समाज की चेतना को,जन-जन जगाने का दायित्व था, ज्ञान की साधना में जीने वालों का ,तप करने वालों परम कर्तव्य बनता है कि वे अज्ञान में पड़े हुए लोगों को ज्ञान की ओर ले चले लेकिन वे लोग अपने ही तप मुक्ति के साधन में लग रहे, अपनी ही चेतना के विकास में लगे रहे, अपनी ही आत्मा के कल्याण में लग रहे और यह भी एक प्रकार की संकीर्णता है तथा पाप है और जब मानव अपने कर्तव्य धर्म का पालन नहीं करता तो संसार में विकृतियां फैलती है, अन्याय,अत्याचार, अनाचार फैलता है और अत्याचार व अनाचार का शिकार वही व्यक्ति व समाज बनता है जो स्वयं तो जागा था लेकिन उसने सारे समाज को नहीं जगाया, स्वयं तो ज्ञानी बन गया लेकिन समाज को ज्ञानी बनाने का कोई प्रयास नहीं किया । 

युगो युगो से देवता दिखने वाले, धर्मशील दिखने वाले लोग, हमेशा सताए जा रहे हैं, मार खा रहे हैं, प्रताड़ित किये जा रहे हैं ,चारों ओर से दुःखी होते है इसका कारण यही है कि उन्होंने अपने दायित्व को समझा नहीं, अपने कर्तव्य की घोर उपेक्षा की और इसी बात का दण्ड संसार में युगों युगों से मानव को, व्यक्ति, परिवार, समाज व राष्ट्र को मिलता आ रहा है । जब तक यह सृष्टि रहेगी यह शाश्वत ईश्वरीय व्यवस्था चलती रहेगी । 

अब आप चिंतन करो, प्रथम आप किस श्रेणी में खड़े हो ? देवत्व वाली उत्थान की श्रेणी में या पतन की अज्ञान वाली श्रेणी में ? क्या अपने कर्तव्य कर्म धर्म का बोध करके उसके दायित्व को अंगीकार करेंगे तथा विश्व में सुख ,शांति, समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करेंगे ? 

हे मानव ! सारे बंधन तोड़ कर उठ चलो, मानवीय संस्कृति की ओर क्योंकि तुम ईश्वर के महान पुत्र हो ? 

 *युग विद्या विस्तार योजना*। (मानवीय संस्कृति पर आधारित एक समग्र शिक्षण योजना) विद्या विस्तार राष्ट्रीय ट्रस्ट (दिल्ली) भारत  रामकुमार शर्मा 94519 11234

Saturday, August 19, 2023

कलयुग के पाँच संकेत

महाभारत युद्ध के उपरांत पांडव श्री कृष्ण के साथ वन विहार कर रहे थे अचानक उन्होंने कुछ अजीबो-गरीब दृश्य अपने ध्यान में देखे। भगवान् कृष्ण ने उनका स्पष्टीकरण निम्न प्रकार किया:
  1.  भीम ने देखा कि गाय अपने बछड़े को साफ होने के बाद भी उसे इस कदर चाट रही है कि वह घायल हो रहा है, इससे पता चलता है कि कलयुग में माता-पिता अपने बच्चों को बहुत लाड-प्यार करेंगे, अत्याधिक सुविधाएँ देंगे, जिससे उनके भविष्य, व्यक्तित्व और क्षमताओं का नाश होगा।
  2. अर्जुन ने एक पक्षी को देखा, जिसकी पंखों पर वैदिक मंत्र थे, लेकिन उसी समय वह अन्य पशुओं का मांस खा रहा था। यह बताता है कि कलयुग में धर्माधिकारियों द्वारा धर्म और संस्कृति को बनाए रखने का काम तो होगा, लेकिन उनका व्यक्तित्व उच्चकोटि का नहीं होगा। वो अपने लाभ के लिए भक्तों का शोषण करेंगे व भोग-विलास में लिप्त होंगे।
  3. युधिष्ठिर ने दो सूंडों वाले हाथी को देखा, जिसका संकेत है कि इस दुनिया के हर कोने में दो चेहरे वाले लोग होंगे, शासक बड़ी मधुर-मधुर बातें बनायेंगे परन्तु उनके कर्म बहुत घटिया व भ्रष्ट होंगे, जिससे सामान्य लोगों के दुख बढ़ेंगे।
  4. सहदेव ने देखा कि एक कुआँ चार और कुएँ से घिरा हुआ है और चारों बह रहे हैं, लेकिन बीच में खाली है। इससे संकेतित होता है कि गरीबी होगी और धनी और अमीर लोग जो विशाल संपत्ति रखते हैं, उसे अपने लाभ के लिए उपयोग करेंगे, लेकिन गरीब को एक पैसा नहीं देंगे।
  5. नकुल ने देखा कि पहाड़ से एक बड़ा पत्थर गिर रहा है, हर पेड़, इमारत, दीवार आदि को कुचलते हुए, लेकिन एक छोटी सी पौधे ने उसे रोक दिया। उसी तरह, मानवों के साथ, उनके नैतिकता और नैतिक मूल्य गिरेंगे, और उनकी लालसा सब कुछ कुचल देगी जो उनके रास्ते में आएगा, लेकिन वे केवल तभी रुकेंगे जब वे भगवान के नाम का जाप करेंगे।

Ayurvedic Tips

 पुरुष के लिए सबसे ताकतवर शक्तिवर्धक दवाइयां कौन सी है?

मेरा नमस्कार स्वीकार करे,

भारत की संस्कृति और ज्ञान की अथाह सीमा है, शायद जैसे समुद है वैसे, परन्तु उसके जानने की समझने की कमी के कारणों से हम सब जनजीवन परेशान व तकलीफ सहन करते रहते है। आइये इस प्रश्न के संबंध में क़ुछ समझनें की कोशिश करे

सबसे जरूरी है, की आप पुरुष की किस उम्र के संदर्भ में ये यह देखना है कि उसे क्या लेना चाहिए, क्या औषधि का सेवन करना चाहिए?

उम्र 28 से 50 साल - सबसे पहले सब मनुष्यो को आने खान पान और शारीरिक अवस्था का बहुत ध्यान और परहेज रखना चाहिए, जैसे कि किस समय, किस ऋतु में क्या खाना है, क्या नही खाना चाहिये, हमें उसका बहुत ध्यान रखना चाहिए, जो कि 90 प्रतिशत लोग नही रखते है, इस बारे में कभीं और समझेंगे, आइए प्रश्न के उत्तर पर चलतें है।

25 वर्ष से 50 वर्ष की उम्र:-

हमे बाजीकरण की विशेष जड़ी बूटियों का इस्तेमाल करना चाहिए, उदहारण के लिए, अश्वगंधा, विदारीकंद, वंशलोचन, गोखरू, कौंच के बीज, सेमर का।मूसला, सफेद मूसली, आदि जो विशेष रूप से इस उम्र के दौरान लेनी चाहिए। 50 वर्ष की अवस्था से पहले किसी भी भस्म का इस्तेमाल नही करना चाहिए, अन्यथा परिणाम बहुत घातक हो सकते है। किसी भी अवस्था मे इस दौरान भस्म के इस्तेमाल न करे।

50 वर्ष से 65 वर्ष तक कि अवस्था:- इस उम्र के दौरान पुष्पधन्वा रस, लौह भस्म, रजत भस्म, त्रिवंग भस्म, नाग भस्म लेनी चाहिए

by shri hari sharma

कलयुग के कालनेमि

*एक कबूतर और एक क़बूतरी एक पेड़ की डाल पर बैठे थे।*

*उन्हें बहुत दूर से एक आदमी आता दिखाई दिया ।*

*क़बूतरी के मन में कुछ शंका हुई औऱ उसने क़बूतर से कहा कि चलो जल्दी उड़ चले नहीं तो ये आदमी हमें मार डालेगा।*

*क़बूतर ने लंबी सांस लेते हुए इत्मीनान के साथ क़बूतरी से कहा..भला उसे ग़ौर से देखो तो सही, उसकी अदा देखो, लिबास देखो, चेहरे से शराफत टपक रही है, ये हमें क्या मारेगा..बिलकुल सज्जन पुरुष लग रहा है...?*

*क़बूतर की बात सुनकर क़बूतरी चुप हो गई।*

*जब वह आदमी उनके क़रीब आया तो अचानक उसने अपने वस्त्र के अंदर से तीर कमान निकाला औऱ झट से क़बूतर को मार दिया...औऱ बेचारे उस क़बूतर के वहीं प्राण पखेरू उड़ गए....*

*असहाय क़बूतरी ने किसी तरह भाग कर अपनी जान बचाई औऱ बिलखने लगी।उसके दुःख का कोई ठिकाना न रहा औऱ पल भर में ही उसका सारा संसार उजड़ गया।*

*उसके बाद वह क़बूतरी रोती हुई अपनी फरियाद लेकर राजा के पास गई औऱ राजा को उसने पूरी घटना बताई।*

*राजा बहुत दयालु इंसान था।*

*राजा ने तुरंत अपने सैनिकों को उस शिकारी को पकड़कर लाने का आदेश दिया।*

*तुरंत शिकारी को पकड़ कर दरबार में लाया गया।शिकारी ने डर के कारण अपना जुर्म कुबूल कर लिया।*

*उसके बाद राजा ने क़बूतरी को ही उस शिकारी को सज़ा देने का अधिकार दे दिया औऱ उससे कहा कि " तुम जो भी सज़ा इस शिकारी को देना चाहो दे सकती हो औऱ तुरंत उसपर अमल किया जाएगा "।*

*क़बूतरी ने बहुत दुःखी मन से कहा कि " हे राजन,मेरा जीवन साथी तो इस दुनिया से चला गया जो फ़िर क़भी भी लौटकर नहीं आएगा, इसलिए मेरे विचार से इस क्रूर शिकारी को बस इतनी ही सज़ा दी जानी चाहिए कि अगर वो शिकारी है तो उसे हर वक़्त शिकारी का ही लिबास पहनना चाहिए , ये शराफत का लिबास वह उतार दे क्योंकि शराफ़त का लिबास ओढ़कर धोखे से घिनौने कर्म करने वाले सबसे बड़े नीच होते हैं....।"*

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*इसलिए अपने आसपास शराफ़त का ढोंग करने वाले बहरूपियों से हमेशा सावधान रहें..........सतर्क रहें औऱ अपना बहुत ख़याल रखें.........!!

Thursday, August 10, 2023

मराठे इतिहास

 सन 1680 में औरंगजेब को समझ आ चुका था कि शिवाजी को रोकने उसे स्वयं ही दक्खन जाना होगा। पांच लाख की विशाल फौज लेकर वह दक्खन की ओर निकला और उसके वहां पहुंचने के पहले ही छत्रपति की मृत्यु हो गई।

औरंगजेब को लगा अब तो मराठों को पराजित करना अत्यंत आसान होगा।

परन्तु छत्रपति सम्भाजी ने 1689 तक उसे जीतने नहीं दिया। अपने सगे साले की दगाबाजी की वजह से छत्रपति सम्भाजी पकड़े गए और औरंगजेब ने अत्यन्त क्रूर और वीभत्स तरीके से उनकी हत्या करवा दी।

अब छत्रपति बने राजाराम मात्र 20 वर्ष के थे और औरंगजेब के अनुभव के सामने कच्चे थे। एकबार फिर उसे दक्खन अपनी मुट्ठी में नज़र आने लगा था।

यहीं से इतिहास यह बताता है कि छत्रपति शिवाजी ने किस आक्रामक संस्कृति की नींव डाली थी। हताश हो कर हथियार डालने के बजाय संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव के नेतृत्व में राजाराम को छत्रपति बना कर संघर्ष जारी रहा।

सन 1700 में छत्रपति राजाराम भी मारे गए।

अब उनके दो साल के पुत्र को छत्रपति मान कर उनकी विधवा ताराबाई, जो कि छत्रपति शिवाजी के सेनापति हंबीराव मोहिते की बेटी थी, आगे आई और प्रखर संघर्ष जारी रहा। समय पड़ने पर ताराबाई स्वयं भी युद्ध के मैदान में उतरी।

संताजी और धनाजी ने मुगल सम्राट की नींद हराम कर दी।

कभी सेना के पिछले हिस्से पर, कभी उनकी रसद पर तो कभी उनके साथ चलने वाले तोपखाने के गोला बारूद पर हमले कर मराठों ने मुगलों को बेजार कर दिया। सब लोग इस खौफ में ही रहते थे कि कब मराठे किस दिशा से आएंगे और कितना नुकसान कर जायेंगे।

एक बार संताजी और उनके दो हजार सैनिकों ने सर्जिकल स्ट्राइक की तर्ज पर रात में औरंगजेब की छावनी पर हमला बोल दिया और औरंगजेब के निजी तंबू की रस्सियां काट दी। तंबू के अंदर के सभी लोग मारे गए। परन्तु संयोग से उस रात औरंगजेब अपने तंबू में नहीं था इसलिए बच गया।

27 साल मुगलों का सम्राट, महाराष्ट्र के जंगलों में छावनियां लगा कर भटकता रहा। रोज यह भय लेकर सोना पड़ता था कि मराठों का आक्रमण न हो जाए।

27 साल कुछ हजार मराठे लाखों मुगलों से लोहा भी ले रहे थे और उन्हें नाकों चने भी चबवा रहे थे। 27 वर्ष सम्राट अपनी राजधानी से दूर था। लाखों रुपए सेना के इस अभियान पर खर्च हो रहे थे। मुगलिया राज दिवालिया हो रहा था। अन्तत: सन 1707 में औरंगजेब की मृत्यु हो गई। 27 वर्षों के सतत युद्ध और संघर्ष के बाद भी मराठों ने घुटने नहीं टेके। छत्रपति के दिए लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हजारों मराठे कट गए।

यह इतिहास भी कहां पढ़ाया जाता है?

कितने लोग है जिन्हें ताराबाई, संताजी और धनाजी के नाम भी मालूम है, पराक्रम तो छोड़ ही दीजिए?

Friday, July 14, 2023

हार्ट अटैक -Heart Attack का मुख्य कारण और समाधान

हार्ट अटैक -Heart Attack: भारत में 3000 साल पहले एक बहुत बड़े ऋषि हुये थे। नाम था महाऋषि वागवट जी उन्होंने एक पुस्तक लिखी, जिसका नाम है, अष्टांग हृदयम Astang hrudayam इस पुस्तक में उन्होंने बीमारियों को ठीक करने के लिए 7000 सूत्र लिखें थे। यह उनमें से ही एक सूत्र है। वागवट जी लिखते हैं कि कभी भी हृदय को घात हो रहा है मतलब दिल की नलियों मे blockage होना शुरू हो रहा है तो इसका मतलब है कि रक्त blood में acidity अम्लता बढ़ी हुई है अम्लता आप समझते हैं, जिसको अँग्रेजी में कहते हैं acidity अम्लता दो तरह की होती है एक होती है पेट की अम्लता और एक होती है रक्त blood की अम्लता आपके पेट में अम्लता जब बढ़ती है तो आप कहेंगे पेट में जलन सी हो रही है, खट्टी खट्टी डकार आ रही हैं , मुंह से पानी निकल रहा है और अगर ये अम्लता acidity और बढ़ जाये तो hyperacidity होगी और यही पेट की अम्लता बढ़ते-बढ़ते जब रक्त में आती है तो रक्त अम्लता blood acidity होती है और जब blood में acidity बढ़ती है तो ये अम्लीय रक्त blood दिल की नलियों में से निकल नहीं पाती और नलियों में blockage कर देता है तभी heart attack होता है इसके बिना heart attack नहीं होता और ये आयुर्वेद का सबसे बढ़ा सच है जिसको कोई डाक्टर आपको बताता नहीं क्योंकि इसका इलाज सबसे सरल है ! इलाज क्या है ? वागवट जी लिखते हैं कि जब रक्त (blood) में अम्लता (acidity) बढ़ गई है तो आप ऐसी चीजों का उपयोग करो जो क्षारीय हैं आप जानते हैं दो तरह की चीजें होती हैं अम्लीय और क्षारीय ! acidic and alkaline अब अम्ल और क्षार को मिला दो तो क्या होता है ? acid and alkaline को मिला दो तो क्या होता है ? neutral होता है सब जानते हैं तो वागवट जी लिखते हैं कि रक्त की अम्लता बढ़ी हुई है तो क्षारीय (alkaline) चीजें खाओ ! तो रक्त की अम्लता (acidity) neutral हो जाएगी ! और रक्त में अम्लता neutral हो गई ! तो heart attack की जिंदगी मे कभी संभावना ही नहीं ! ये है सारी कहानी !

For more detail read the book स्वस्थ भारत part I & II. Cost 200Rs for both. 

email: rkavishwamitra@gmail.com



Wednesday, June 14, 2023

राबिया बसरी एक मशहूर फ़क़ीर हुई है! जवानी में वह बहुत खूबसूरत थी

 एक बार चोर उसे उठाकर ले गए और एक वेश्या के कोठे पर ले जाकर उसे बेच दिया।अब उसे वही कार्य करना था जो वहाँ की बाक़ी औरते किया करती थी।इस नए घर में पहली रात को उसके पास एक आदमी लाया गया। उसने फौरन बातचीत शुरू कर दी।

"आप जैसे भले आदमी को देखकर मेरा दिल बहुत खुश है " वह बोली। "आप सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ जायें , मैं थोड़ी देर परमात्मा की याद में बैठ लूँ। अगर आप चाहें तो आप भी परमात्मा की याद में बैठ जाएँ।"

यह सुनकर उस नौजवान की हैरानी की कोई हद न रही। वह भी राबिया के साथ ज़मीन पर बैठ गया।

फिर राबिया उठी और बोली- "मुझे विश्वास है कि अगर मैं आपको याद दिला दूँ कि एक दिन हम सबको मरना है तो आप बुरा नहीं मानोगें। आप यह भी भली भाँति समझ लें की जो गुनाह करने की आपके मन में चाह है , वह आपको नर्क की आग में धकेल देगा। आप खुद ही फैसला कर लें कि आप यह गुनाह करके नर्क की आग में कूदना चाहते हैं, या इससे बचना चाहते हैं?"

यह सुनकर नौजवान हक्का बक्का रह गया।उसने संभलकर कहा, "ऐ नेक और पाक औरत! तुमने मेरी आँखे खोल दी, जो अभी तक गुनाह के भयंकर नतीजे की और बंद थी मै वादा करता हूँ कि फिर कभी कोठे की तरफ कदम नही बढ़ाऊंगा।"

हर रोज नए आदमी राबिया के पास भेजे जाते। पहले दिन आये नौजवान की तरह उन सबकी जिंदगी भी पलटती गयी।

उस कोठे के मालिक को बहुत हैरानी हुई की इतनी खूबसूरत और नौजवान औरत है और एक बार आया ग्राहक दोबारा उसके पास जाने के लिए नही आता।

जबकि लोग ऐसी सुन्दर लड़कियों के दीवाने होकर उसके इर्दगिर्द ऐसे घूमते है जैसे परवाने शमा के इर्दगिर्द।

यह राज जानने के लिए उसने एक रात अपनी बीवी को ऐसी जगह छुपाकर बिठा दिया, जहां से वह राबिया के कमरे के अंदर सब कुछ देख सकती थी। वह यह जानना चाहता था की जब कोई आदमी राबिया के पास भेजा जाता है तो वह उसके साथ कैसे पेश आती है?

उस रात उसने देखा कि जैसे हीं ग्राहक ने अंदर कदम रखा, राबिया उठकर खड़ी हो गई और बोली,"आओ भले आदमी, आपका स्वागत है। पाप के इस घर में मुझे हमेशा याद रहता है कि परमात्मा हर जगह मौजूद है। वह सब कुछ देखता है और जो चाहे कर सकता है। आपका इस बारे में क्या ख्याल है ?"

यह सुनकर वह आदमी हक्का बक्का रह गया और उसे कुछ समझ न आया कि क्या करे ?

आखिर वह कुछ हिचकिचाते हुए बोला, हाँ पंडित और मौलवी कुछ ऐसा ही कहते हैं।

राबिया कहती गई, 'यहाँ गुनाहों से घिरे इस घर में, मैं कभी नही भूलती कि ख़ुदा सब गुनाह देखता है और पूरा न्याय भी करता है। वह हर इंसान को उसके गुनाहो की सजा देता है। जो लोग यहाँ आकर गुनाह करते है, उसकी सजा पाते हैं। उन्हें अनगिनत दुःख और मुसीबत झेलनी पड़ती है। मेरे भाई, हमें मनुष्य जन्म मिला है, भजन, बंदगी करने के लिए दुनिया के दुखों से हमेशा के लिए छुटकारा पाने के लिये, ख़ुदा से मुलाकात करने के लिए, न की जानवरों से भी बदतर बनकर उसे बर्बाद करने के लिए।

पहले आये लोगों की तरह इस आदमी को भी राबिया की बातों में छुपी सच्चाई का अहसास हो गया। उसे जिंदगी में पहली बार महसूस हुआ की वह कितने घोर पाप करता रहा है और आज फिर करने जा रहा था।वह फूटफूट कर रोने लगा और राबिया के पाव पर गिरकर माफ़ी मांगने लगा।

राबिया के शब्द इतने सहज, निष्कपट और दिल को छू लेने वाले थे कि उस कोठे के मालिक की पत्नी भी बाहर आकर अपने पापो का पश्चाताप करने लगी।

फिर उसने कहा-" ऐ नेक पाक लड़की, तुम तो वास्तव में

फ़क़ीर हो। हमने कितना बड़ा गुनाह तुम पर लादना चाहा। इसी वक्त इस पाप की दलदल से बहार निकल जाओ।"

इस घटना ने उसकी अपनी जिंदगी को भी एक नया मोड़ दे दिया और उसने पाप की कमाई हमेशा के लिए छोड़ दी।

मालिक के सच्चे भक्त जहां कहीं भी हों, जिस हालात में हो, वे हमेशा मनुष्य जन्म के असली उद्देश्य की ओर इशारा करते हैं और भूले भटके जीवों को नेकी की राह पर चलने की प्रेरणा देते हैं। 


By Lokesh Sharma