Tuesday, September 26, 2023

चेतना का दिव्य प्रवाह ३२.

  *अंध श्रद्धा वह दरिया है जिसमें घातक मगरमच्छ उत्पन्न होते हैं ।* 

 इस संसार में प्रकृति की एक शाश्वत व्यवस्था है कार्य के परिणाम स्वरूप तमाम सम्पत्तियां व विपत्तियां उत्पन्न होती है जैसे कहीं फूलों का बगीचा लगाया जाएगा तो चारों तरफ सुगंध व सौंदर्य ही दृष्टिगोचर होगा, वहां कोयल, मोर, भौंरे ,मधुमक्खियां व तितलियां गुंजन करते हुए,फूदकते हुए ,उड़ते हुए स्पष्ट दिखाई देंगे तथा वातावरण स्वर्गीय आनंद देने वाला बनेगा ।

ऐसे ही कीचड़, गंदगी, कूड़ा करकट चारों तरफ भरा होगा तो वहां चारों तरफ बदबू फैलेगी, मक्खी,मच्छर, खटमल , पिस्सू, घातक वायरस व बैक्टीरिया उत्पन्न होंगे ही होंगे ,उनसे बचने के लिए दवाइयां कारगर नहीं है बल्कि वातावरण की स्वच्छता ही उसका कारगर उपाय है ।

 ऐसे ही जहां अंध श्रद्धा उत्पन्न होती है वहां पर अराजक स्तर के व्यक्ति धर्म, अध्यात्म का आवरण ओढ़ कर, संत महात्माओं का चोला पहनकर , समाज सेवा का लबादा ओढ़कर, प्रचार तंत्र का प्रयोग करके, अराजक तत्वों को समाज सेवा का चोला पहनकर, संगठनों में ,संस्थाओं में, धार्मिक तंत्रों में, सामाजिक तंत्रों में जहां भी उनको अपना आर्थिक लाभ, नाम यश की पूर्ति का योग दिखता है वहां छल-छद्म , झूठ-कपट व पाखंड का सहारा लेकर प्रविष्ठ कर जाते हैं और अंध श्रद्धा के वातावरण में ये खूब फलते फूलते है ।

 समाज की अंध श्रद्धा एक प्रकार की दरिया है,नदी है जिसमें ऐसे ही घातक मगरमच्छ उत्पन्न होते हैं जो कुछ भी श्रेष्ठ है उसको निगल जाते है यदि कोई उस नदी में जल आचमन करने, अर्घ्य लगाने, स्नान करने व जल पान करने हेतु उतर जाता है तो ये मगरमच्छ व उनका कुनबा घात लगाकर आक्रमण कर देते है।अंध श्रद्धा में उनको उपयुक्त वातावरण व पोषण मिलता रहता है अंध श्रद्धालुओं की भीड़ में उनका व उनके कुकृत्यों का प्रतिकार करने वाला कोई होता बल्कि यह भीड़ तो उनको गुरु, भगवान, देवता व महान अवतारी चेतना मानकर उनकी चरण वंदना करके अपने को परम सौभाग्यशाली समझती है और इस स्थिति में वे निरंकुश होकर अपने कार्यों को अंजाम दे सकते हैं इसलिए जब तक संसार में अंध श्रद्धा रहेगी, विकृत लोग मगरमच्छों की तरह संगठनों व संस्थानों में उत्पन्न होते रहेंगे और उसे अंध श्रद्धालुओं की शक्ति के बल पर ,सामर्थ्य के बल पर व धन के बल पर अराजकता करते रहेंगे व अवसर का लाभ उठाते रहेंगे ,यह अनादि से होता रहा है और वर्तमान में भी खुली आंखों से इसकी झांकी सर्वत्र की जा सकती है ।

 आप अपना चिंतन करें आपकी श्रद्धा कहीं अंधी तो नहीं है ? श्रद्धा को हमेशा जिनके प्रति आरोपित करना होता है उनको आदर्शों , सिद्धांतों, नैतिक मूल्यों तथा चरित्र निष्ठा,त्याग, तप ,सादगी, सज्जनता , विनम्रता , जिम्मेदारी , बहादुरी की कसौटी पर कसकर देख लेना चाहिए अगर इस कसौटी पर व्यक्ति खरा नहीं उतरता है तो वह श्रद्धा व विश्वास का पात्र नहीं हो सकता है वह चाहे जितने बड़े विशाल तंत्र का अधिपति क्यों न बन गया हो या लंकाधिपति रावण जैसे बलशाली ,सिद्ध व प्रतापी ही क्यों ना हो । आप अपना आत्म विश्लेषण करें,चिंतन व मंथन करें और आप कहां खड़े हैं ? अंध श्रद्धा की छांव में या विवेकशीलता युक्त श्रद्धा की छांव में ।

 रामकुमार शर्मा   9451911234    

  *युग विद्या विस्तार योजना* 

(मानवीय संस्कृति पर आधारित एक समग्र शिक्षण योजना)।              

विद्या विस्तार राष्ट्रीय ट्रस्ट, दिल्ली (भारत)


Thursday, September 14, 2023

चेतना का दिव्य प्रवाह भाग 27

जो सबके लिए भोजन बनाता है वह कभी भूखा नहीं रह सकता है ।

जो माता पूरे परिवार के लिए भोजन बनाती है क्या कभी वह भूखी रह सकती है ? उत्तर होगा नहीं ! जो सबका पेट भरता है क्या कभी भूखे पेट रह सकता है ? उत्तर होगा नहीं ! इसके अलावा उसको बनाने और खिलाने का जो आनंद मिलता है , सेवा का अवसर मिलता है जिससे आत्मा प्रसन्न होती है, श्रद्धा सम्मान और धन भी मिलता है ।

ठीक इसी तरह से समाज को सुख देने वाला कभी दुःखी नहीं हो सकता है ।

समाज को ज्ञान देने वाला कभी भी अज्ञानी नहीं रह सकता है । 

समाज को सद्भावना देने वाले के जीवन में कभी भी सद्भावनाओं की कमी नहीं पड़ सकती है। 

समाज को सत् प्रेरणा देने वाला अपने जीवन में ईश्वरीय सत् प्रेरणाएं निरंतर प्राप्त करता है ।

समाज को समय देने वाले का जीवन काल (आयु) प्रकृति व ईश्वर के आधीन हो जाता है । 

समाज को धन देने वाला, सामाजिक उत्कर्ष में लगाने वाला , समाज की पीड़ा व पतन को मिटाने में धन लगाने वाला कभी भी अभावग्रस्त नहीं रह सकता है यह सृष्टि का शाश्वत नियम है । 

संसार में बोओ व काटो का नियम काम करता है आप जो कुछ भी दूसरों के हित के लिए करोगे सृष्टि की व्यवस्था में परमात्मा के द्वारा बनाई गई व्यवस्था में उसका प्रतिफल मिलना सुनिश्चित है ।

ऐसे ही जो अपनी समस्त क्षमताओं (ज्ञान, प्रतिभा, पुरुषार्थ, समय ,श्रम ,धन व साधनों )को संसार के उत्कर्ष के लिए ,मानवता के विकास की लिए लगाता है उसके समग्र व्यक्तित्व का विकास हो जाता है , उसकी आत्मा का विकास हो ही जाता है ,उसको अखंड स्वास्थ्य ,अखंड शक्ति, अखंड आनंद ,अखंड ज्ञान व अखंड प्रेम सृष्टि व्यवस्था के अनुसार उपलब्ध होता ही है और यही जीवन की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है आप यहां पाने की कोशिश मत करो, आप संसार को देने की कोशिश करो जो कुछ दोगे वह अनंत गुणा होकर लौटेगा ।

हे मानव जीवन के त्रितापों अज्ञान ,अभाव व अशक्ति से मुक्ति का यह शाश्वत तथा निरपध राजमार्ग है ।

रामकुमार शर्मा  9451911234    

*युग विद्या विस्तार योजना* 

(मानवीय संस्कृति पर आधारित एक समग्र शिक्षण योजना)।              

विद्या विस्तार राष्ट्रीय ट्रस्ट, दिल्ली (भारत)


Tuesday, September 12, 2023

दवाओं के अनावश्यक प्रयोग से बचें

 रतिक्रिया क्षमता को बढ़ाने के लिए सबसे अधिक कौन-कौन सी आयुर्वेदिक दवाइयां खाई जाती हैं?

  • ये सभी ताकतवर जड़ी बूटी एक प्रकार लकड़ियां हैं, जो आसानी से नहीं पचती और फायदे के स्थान पर भयंकर हानि होती है।
  • आप कुछ भी खाएं, उसे पचाना अत्यंत आवश्यक है। हजम नहीं कर सकें, तो जल्दी दम निकल जायेगा।
  • आजकल के लोग एक दिन में 3 से 4 चमच (30/40 ग्राम) अश्वगंधा, शतावरी, सफेद मूसली, मुलेठी, हरड़, आंवला, कोंच के बीज आदि के चूर्ण बिना इस्तेमाल कर रहे हैं।
  • चिंतन मंथन जरूर करें क्या कभी आपने पचाने, हजम करने के बारे में भी विचार किया है। सोचेंगे, तो अहसास होगा कि आए दिन पट की खराबी, कब्ज, बी पी हाई, मधुमेह, बैचेनी का कारण यही निकलेगा।
  • चरक संहिता के चिकित्सा सुत्र का निर्देश है कि जो भी आप भक्षण कर रहे हैं उसका 75 फीसदी हिस्सा माल विसर्जन द्वारा निकलना जरूरी है अन्यथा आप कुछ सालों बाद अनेक भयानक बीमारियों से परेशान होने लगेंगे।
  • सावधान ये तकतवार जड़ी बूटियां आपको नामर्द, नपुंसक बना सकती हैं।
  • अतः आप वही खाएं, जिसे हजम कर सकें नहीं, तो दम निकल जायेगी।
  • द्रव्यगुण विज्ञान, भाव प्रकाश और आयुर्वेदिक निघंतुयों में, तो स्पष्ट लिखा है की अगर आप परिश्रमी हैं।
  • जड़ी बूटी रूपी लकड़ियों को पचाने का सामर्थ्य रखते, हों तभी इनका चूर्ण के रूप में सेवन करें अन्यथा इनका काढ़ा पीना ही लाभकारी रहेगा।
  • प्राचीन काल का मनुष्य बहुत मेहनती होता था और 20 से 30 किलोमीटर पैदल चलना उसके लिए आम बात होती थी। इसलिए ये समस्त ओषधि लकड़ियां आसानी से पीछा जाती थीं।

नहीं पचने के कारण चूर्ण विष हो जाते हैं।

  • आयुर्वेद के एक रहस्य को अच्छी तरह समझ लीजिए कि ये सब जड़ी बूटियों की लकड़ियां ताकतवर बहुत हैं। इन्हे पचाने के लिए विशेष परिश्रम की आवश्यकता होती है।
  • आज का आदमी मेहनत बिलकुल नहीं करता। इसलिए ये सब जड़ी बूटियों के चूर्ण या पाउडर फायदे की जगह नुकसान करेंगे। क्योंकि ये चूर्ण पचते नहीं हैं और शरीर में वात पित्त कफ को असंतुलित कर शरीर का पाचन तंत्र बिगाड़ देते हैं।
  • द्रव्यगुण विज्ञान के मुताबिक शक्ति वर्धक जड़ी बूटियों का चूर्ण पचाना आसान नहीं है।
  • अगर आपको ये सब ताकतवर चूर्ण खाने का शौक हो, तो किसी भी चूर्ण या समस्त चूर्ण के मिश्रण को 10 से 15 ग्राम लेकर शाम को 200 मिलीलीटर पानी में गलाकर सुबह एक चौथाई रहने तक उबालें और खाली पेट गुड़ मिलाकर पिएं।
  • निवेदन इतना है कि गुगल आदि सोशल मीडिया पर पड़ी हुई गलत जानकारी को अपना आधार न बनाकर स्वयं ही आयुर्वेद को पढ़ें और सबका भला करें।

Health is most Important

 


Saturday, September 9, 2023

श्री तैलंग स्वामी…

 

वाराणसी की गलियों में एक दिगम्बर योगी घूमता रहता है। गृहस्थ लोग उसके नग्न वेश पर आपत्ति करते हैं फिर भी पुलिस उसे पकड़ती नहीं, वाराणसी पुलिस की इस तरह की तीव्र आलोचनाएं हो रही थीं। आखिर वारंट निकालकर उस नंगे घूमने वाले साधू को जेल में बंद करने का आदेश दिया गया।

पुलिस के आठ दस जवानों ने पता लगाया, मालूम हुआ वह योगी इस समय मणिकर्णिका घाट पर बैठा हुआ है। जेष्ठ की चिलचिलाती दोपहरी जब कि घर से बाहर निकलना भी कठिन होता है एक योगी को मणिकर्णिका घाट के एक जलते तवे की भाँति गर्म पत्थर पर बैठे देख पुलिस पहले तो सकपकायी पर आखिर पकड़ना तो था ही वे आगे बढ़े। योगी पुलिस वालों को देखकर ऐसे मुस्करा रहा था मानों वह उनकी सारी चाल समझ रहा हो। साथ ही वह कुछ इस प्रकार निश्चिन्त बैठे हुये थे मानों वह वाराणसी के ब्रह्मा हों किसी से भी उन्हें भय न हो। मामूली कानूनी अधिकार पाकर पुलिस का दरोगा जब किसी से नहीं डरता तो अनेक सिद्धियों सामर्थ्यों का स्वामी योगी भला किसी से भय क्यों खाने लगा तो भी उन्हें बालकों जैसी क्रीड़ा का आनन्द लेने का मन तो करता ही है यों कहिए आनंद की प्राप्ति जीवन का लक्ष्य है बाल सुलभ सरलता और क्रीड़ा द्वारा ऐसे ही आनंद के लिए “श्री तैलंग स्वामी” नामक योगी भी इच्छुक रहे हों तो क्या आश्चर्य?

पुलिस मुश्किल से दो गज पर थी कि तैलंग स्वामी उठ खड़े हुए ओर वहाँ से गंगा जी की तरफ भागे। पुलिस वालों ने पीछा किया। स्वामी जी गंगा में कूद गये पुलिस के जवान बेचारे वर्दी भीगने के डर से कूदे तो नहीं हाँ चारों तरफ से घेरा डाल दिया कभी तो निकलेगा साधु का बच्चा, लेकिन एक घंटा, दो घंटा, तीन घंटा, सूर्य भगवान् सिर के ऊपर थे अब अस्ताचलगामी हो चले किन्तु स्वामी जी प्रकट न हुए कहते हैं उन्होंने जल के अंदर ही समाधि ले ली। उसके लिये उन्होंने एक बहुत बड़ी शिला पानी के अंदर फेंक रखी थी और यह जन श्रुति थी कि तैलंग स्वामी पानी में डुबकी लगा जाने के बाद उसी शिला पर घंटों समाधि लगायें जल के भीतर ही बैठे रहते हैं।

उनको किसी ने कुछ खाते नहीं देखा तथापि उनकी आयु 300 वर्ष की बताई जाती है। वाराणसी में घर घर में तैलंग स्वामी की अद्भुत कहानियां आज भी प्रचलित हैं। निराहार रहने पर भी प्रतिवर्ष उनका वजन एक पौण्ड बढ़ जाता था। 300 पौंड वजन था उनका जिस समय पुलिस उन्हें पकड़ने गई इतना स्थूल शरीर होने पर भी पुलिस उन्हें पकड़ न सकी। आखिर जब रात हो चली तो सिपाहियों ने सोचा डूब गया इसीलिये वे दूसरा प्रबन्ध करने के लिए थाने लौट गये इस बीच अन्य लोग बराबर तमाशा देखते रहे पर तैलंग स्वामी पानी के बाहर नहीं निकले।

प्रातः काल पुलिस फिर वहाँ पहुँची। स्वामी जी इस तरह मुस्करा रहे थे मानों उनके जीवन में सिवाय मुस्कान और आनंद के और कुछ हो ही नहीं, शक्ति तो आखिर शक्ति ही है संसार में उसी का ही तो आनंद है। योग द्वारा सम्पादित शक्तियों का स्वामी जी रसास्वादन कर रहे हैं तो आश्चर्य क्या। इस बार भी जैसे ही पुलिस पास पहुँची स्वामी फिर गंगा जी की ओर भागे और उस पार जा रही नाव के मल्ला को पुकारते हुए पानी में कूद पड़े। लोगों को आशा थी कि स्वामी जी कल की तरह आज भी पानी के अंदर छुपेंगे और जिस प्रकार मेढ़क मिट्टी के अंदर और उत्तराखण्ड के रीछ बर्फ के नीचे दबे बिना श्वाँस के पड़े रहते हैं उसी प्रकार स्वामी जी भी पानी के अंदर समाधि ले लेंगे किन्तु यह क्या जिस प्रकार से वायुयान दोनों पंखों की मदद से इतने सारे भार को हवा में संतुलित कर तैरता चला जाता है उसी प्रकार तैलंग स्वामी पानी में इस प्रकार दौड़ते हुए भागे मानों वह जमीन पर दौड़ रहे हों। नाव उस पार नहीं पहुँच पाई स्वामी जी पहुँच गये। पुलिस खड़ी देखती रह गई।

स्वामी जी ने सोचा होगा कि पुलिस बहुत परेशान हो गई तब तो वह एक दिन पुनः मणिकर्णिका घाट पर प्रकट हुए और अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया। हनुमान जी ने मेघनाथ के सारे अस्त्र काट डाले किन्तु जब उसने ब्रह्म पाश फेंका तो वे प्रसन्नता पूर्वक बँध गये। लगता है श्री तैलंग स्वामी भी सामाजिक नियमोपनियमों की अवहेलना नहीं करना चाहते थे पर यह प्रदर्शित करना आवश्यक भी था कि योग और अध्यात्म की शक्ति भौतिक शक्तियों से बहुत चढ़ बढ़ कर है तभी तो वे दो बार पुलिस को छकाने के बाद इस प्रकार चुपचाप ऐसे बैठे रहे मानों उनको कुछ पता ही न हो। हथकड़ी डालकर पुलिस तैलंग स्वामी को पकड़ ले गई और हवालात में बंद कर दिया। इन्सपेक्टर रात गहरी नींद सोया क्योंकि उसे स्वामी जी की गिरफ्तारी मार्के की सफलता लग रही थी।

प्रस्तुत घटना “मिस्ट्रीज आँफ इंडिया इट्स योगीज” नामक लुई द कार्टा लिखित पुस्तक से अधिकृत की जा रही है। कार्टा नामक फ्राँसीसी पर्यटक ने भारत में ऐसी विलक्षण बातों की सारे देश में घूम घूम कर खोज की। प्रसिद्ध योगी स्वामी योगानंद ने भी उक्त घटना का वर्णन अपनी पुस्तक “आटो बाई ग्राफी आँफ योगी” के 31 वे परिच्छेद में किया है।

प्रातः काल ठंडी हवा बह रही थी थानेदार जी हवालात की तरफ की तरफ आगे बढ़े तो पसीने में डूब गया, जब उन्होंने योगी तैलंग को हवालात की छत पर मजे से टहलते और वायु सेवन करते देखा। हवालात के दरवाजे बंद थे, ताला भी लग रखा था। फिर यह योगी छत पर कैसे पहुँच गया? अवश्य ही संतरी की बदमाशी होगी। उन बेचारे संतरियों ने बहुतेरा कहा कि हवालात का दरवाजा एक क्षण को खुला नहीं फिर पता नहीं साधु महोदय छत पर कैसे पहुँच गये। वे इसे योग की महिमा मान रहे थे पर इन्सपेक्टर उसके लिए बिलकुल तैयार नहीं था आखिर योगी को फिर हवालात में बंद किया गया। रात दरवाजे में लगे ताले को सील किया गया चारों तरफ पहरा लगा और ताली लेकर थानेदार थाने में ही सोया। सवेरे बड़ी जल्दी कैदी की हालत देखने उठे तो फिर शरीर में काटो तो खून नहीं। सील बेद ताला बाकायदा बंद। सन्तरी पहरा भी दे रहे उस पर भी तैलंग स्वामी छत पर बैठे प्राणायाम का अभ्यास कर रहे। थानेदार की आँखें खुली की खुली रह गईं उसने तैलंग स्वामी को आखिर छोड़ ही दिया।

श्री तैलंग स्वामी के बारे में कहा जाता है कि जिस प्रकार जलते हुये तेज कड़ाहे में खौल रहे तेल में पानी के छींटे डाले जाएं तो तेल की ऊष्मा बनाकर पलक मारते दूर उड़ा देती है। उसी प्रकार विष खाते समय एक बार आँखें जैसी झपकती पर न जाने कैसी आग उनके भीतर थी कि विष का प्रभाव कुछ ही देर में पता नहीं चलता कहाँ चला गया। एक बार एक आदमी को शैतानी सूझी चूने के पानी को लेजाकर स्वामी जी के सम्मुख रख दिया और कहा महात्मन्! आपके लिए बढ़िया दूध लाया हूँ स्वामी जी उठाकर पी गये उस चूने के पानी को, और अभी कुछ ही क्षण हुये थे कि कराहने और चिल्लाने लगा वह आदमी जिसने चूने का पानी पिलाया था। स्वामी जी के पैरों में गिरा, क्षमा याचना की तब कहीं पेट की जलन समाप्त हुई। उन्होंने कहा भाई मेरा कसूर नहीं है यह तो कुदरत का नियम है कि हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया अवश्य है।

मनुष्य शरीर एक यंत्र, प्राण उसकी ऊर्जा, ईंधन आवा शक्ति, मन इंजन और ड्राइवर चाहे जिस प्रकार के अद्भुत कार्य लिए जा सकते हैं इस शरीर से भौतिक विज्ञान से भी अद्भुत पर यह सब शक्तियाँ और सामर्थ्य योग विद्या, योग साधना में सन्निहित हैं जिन्हें अधिकारी पात्र ही पाते और आनन्द लाभ प्राप्त करते है…

Wednesday, August 30, 2023

जिंदगी में क्या सीखना सबसे जरूरी है?

एक गधा पेड़ से बंधा हुआ था।
शैतान आया और उसने उस गधे की रस्सी खोल दी।
वो गधा खेत में घुसा और उधम मचाना शुरू किया।
उस खेत के मालिक की बीवी ने उस गधे को बंदूक चला कर धराशाई कर दिया।
गधे के मालिक को ये देख कर प्रकोपकारी गुस्सा आ गया। उसने बड़ा सा पत्थर उस खेत के मालिक के बीवी के सिर में डाल कर उसे ढेर कर दिया।
खेत का मालिक घर आया, अपनी बीवी को खून से लथपथ देख कर उसने उस गधे के मालिक को मार डाला।
अब गधे के मालिक की बीवी ने अपने बच्चो को उस किसान के घर को आग लगाने का कहा।रात के अंधेरे में उस किसान के बचने के कोई आसार नहीं रहेंगे इस खुशी में वो दोनो बच्चे घर आए।
पर उस आग में से को किसान बच गया और घर आ कर उसने उस गधे के मालिक की बीवी बच्चो को गोली से उड़ा दिया।
जेल की सलाखों के पीछे अपना पूरा घर परिवार, पड़ोसी, जमीन जायदाद सब खो चुका किसान सोच में पड़ा रहा। उसने शैतान से पूछा, ये सब कैसे हुआ?
शैतान बोला," मैंने कुछ भी नहीं किया इस बार, मैंने सिर्फ गधे को संखल से मुक्त किया। तुम उस पर क्रिया प्रतिक्रिया करते रहे और अपने अंदर के शैतान को मुक्त किया।"
तो अब किसी बात का जवाब देते वक्त, प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, किसी को कुछ जानकारी देते हुए, बदला लेते हुए, किसी को कोसते हुए….., रुकिए और विचार कीजिए।
खयाल रखिए, क्युकी आज कल शैतान क्या करता है….कुछ भी नहीं करता, वो सिर्फ आप के अंदर के गधे की सांखल खोलता है।

रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना

 7 मार्च 1679 ई0 की बात है, ठाकुर सुजान सिंह अपनी शादी की बारात लेकर जा रहे थे, 22 वर्ष के सुजान सिंह किसी देवता की तरह लग रहे थे, ऐसा लग रहा था मानो देवता अपनी बारात लेकर जा रहे हों।
उन्होंने अपनी दुल्हन का मुख भी नहीं देखा था, शाम हो चुकी थी इसलिए रात्रि विश्राम के लिए “छापोली” में पड़ाव डाल दिये। कुछ ही क्षणों में उन्हें गायों में लगे घुंघरुओं की आवाजें सुनाई देने लगी, आवाजें स्पष्ट नहीं थीं, फिर भी वे सुनने का प्रयास कर रहे थे, मानो वो आवाजें उनसे कुछ कह रही थी।
सुजान सिंह ने अपने लोगों से कहा, शायद ये चरवाहों की आवाज है जरा सुनो वे क्या कहना चाहते हैं। गुप्तचरों ने सूचना दी कि युवराज ये लोग कह रहे है कि कोई फौज “देवड़े” पर आई है। वे चौंक पड़े। कैसी फौज, किसकी फौज, किस मंदिर पे आयी है?
जवाब आया “युवराज ये औरंगजेब की बहुत ही विशाल सेना है, जिसका सेनापति दराबखान है, जो खंडेला के बाहर पड़ाव डाल रखी है। कल खंडेला स्थित श्रीकृष्ण मंदिर को तोड़ दिया जाएगा। निर्णय हो चुका था।
एक ही पल में सब कुछ बदल गया। शादी के खुशनुमा चहरे अचानक सख्त हो चुके थे, कोमल शरीर वज्र के समान कठोर हो चुका था। जो बाराती थे, वे सेना में तब्दील हो चुके थे, वे अपनी सेना के लोगों से विचार विमर्श करने लगे। तब उनको पता चला कि उनके साथ सिर्फ 70 लोगो की सेना थी।
तब रात्रि के समय में बिना एक पल गंवाए उन्होंने पास के गांव से कुछ आदमी इकठ्ठे कर लिए। करीब 500 घुड़सवार अब उनके पास हो चुके थे।
अचानक उन्हें अपनी पत्नी की याद आयी, जिसका मुख भी वे नहीं देख पाए थे, जो डोली में बैठी हुई थी। क्या बीतेगी उसपे, जिसने अपनी लाल जोड़े भी ठीक से नहीं देखी हो।
वे तरह तरह के विचारों में खोए हुए थे, तभी उनके कानों में अपनी माँ को दिए वचन याद आये, जिसमें उन्होंने राजपूती धर्म को ना छोड़ने का वचन दिया था, उनकी पत्नी भी सारी बातों को समझ चुकी थी, डोली की तरफ उनकी नजर गयी, उनकी पत्नी महँदी वाली हाथों को निकालकर इशारा कर रही थी। मुख पे प्रसन्नता के भाव थे, वो एक सच्ची क्षत्राणी का कर्तव्य निभा रही थी, मानो वो खुद तलवार लेकर दुश्मन पे टूट पड़ना चाहती थी, परंतु ऐसा नहीं हो सकता था।
सुजान सिंह ने डोली के पास जाकर डोली को और अपनी पत्नी को प्रणाम किये और कहारों और नाई को डोली सुरक्षित अपने राज्य भेज देने का आदेश दे दिया और खुद खंडेला को घेरकर उसकी चौकसी करने लगे।
लोग कहते हैं कि मानो खुद कृष्ण उस मंदिर की चौकसी कर रहे थे, उनका मुखड़ा भी श्रीकृष्ण की ही तरह चमक रहा था।
8 मार्च 1679 को दराबखान की सेना आमने सामने आ चुकी थी, महाकाल भक्त सुजान सिंह ने अपने इष्टदेव को याद किया और हर हर महादेव के जयघोष के साथ 10 हजार की मुगल सेना के साथ सुजान सिंह के 500 लोगो के बीच घनघोर युद्ध आरम्भ हो गया।
सुजान सिंह दराबखान को मारने के लिए उसकी ओर लपके और मुगल सेना के 40 लोगो को मौत के घाट उतार दिया। ऐसे पराक्रम को देखकर दराबखान ने पीछे हटने में ही भलाई समझी, लेकिन ठाकुर सुजान सिंह रुकनेवाले नहीं थे। जो भी उनके सामने आ रहा था वो मारा जा रहा था। सुजान सिंह साक्षात मृत्यु का रूप धारण करके युद्ध कर रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो खुद महाकाल ही युद्ध कर रहे हों।
इस बीच कुछ लोगों की नजर सुजान सिंह पे पड़ी, लेकिन ये क्या सुजान सिंह के शरीर में सिर तो है ही नहीं…
लोगों को घोर आश्चर्य हुआ, लेकिन उनके अपने लोगों को ये समझते देर नहीं लगी कि सुजान सिंह तो कब के मोक्ष को प्राप्त कर चुके हैं। ये जो युद्ध कर रहे हैं, वे सुजान सिंह के इष्टदेव हैं। सबों ने मन ही मन अपना शीश झुकाकर इष्टदेव को प्रणाम किये।
अब दराबखान मारा जा चुका था, मुगल सेना भाग रही थी, लेकिन ये क्या, सुजान सिंह घोड़े पे सवार बिना सिर के ही मुगलों का संहार कर रहे थे। उस युद्धभूमि में मृत्यु का ऐसा तांडव हुआ, जिसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुगलों की 7 हजार सेना अकेले सुजान सिंह के हाथों मारी जा चुकी थी। जब मुगल की बची खुची सेना पूर्ण रूप से भाग गई, तब सुजान सिंह जो सिर्फ शरीर मात्र थे, मंदिर का रुख किये।
इतिहासकार कहते हैं कि देखनेवालों को सुजान के शरीर से दिव्य प्रकाश का तेज निकल रहा दिख था, एक अजीब विश्मित करने वाला प्रकाश निकल रहा था, जिसमें सूर्य की रोशनी भी मन्द पड़ रही थी।
ये देखकर उनके अपने लोग भी घबरा गए थे और सब ने एक साथ श्रीकृष्ण की स्तुति करने लगे, घोड़े से नीचे उतरने के बाद सुजान सिंह का शरीर मंदिर की प्रतिमा के सामने जाकर लुढ़क गया और एक शूरवीर योद्धा का अंत हो गया।
माँ भारती के इस शूरवीर योद्धा को कोटि कोटि नमन।

Monday, August 28, 2023

भगवान व मौत को याद रखें

 राबिया बसरी एक महशूर फ़क़ीर हुई है! जवानी में वह बहुत खूबसूरत थी | एक बार चोर उसे उठाकर ले गए और एक वेश्या के कोठे पर ले जाकर उसे बेच दिया | अब उसे वही कार्य करना था जो वहाँ की बाक़ी औरते करती थी |

इस नए घर में पहली रात को उसके पास एक आदमी लाया गया | उसने फौरन बातचीत शुरू कर दी | ' आप जैसे भले आदमी को देखकर मेरा दिल बहुत खुश है " वह बोली | ' आप सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ जाये , में में थोड़ी देर परमात्मा की याद में बैठ लूँ | अगर आप चाहे तो आप भी परमात्मा की याद में बैठ जाएँ | 'यह सुनकर उस नवजवान की हैरानी की कोई हद न रही | वह भी राबिया के साथ ज़मीन पर बैठ गया | फिर राबिया उठी और बोली ' मुझे विश्वास है की अगर में आपको याद दिला दूँ की एक दिन हम सबको मरना है तो आप बुरा नही मानोगे | आप यह भी भली भाँति समझ ले की जो गुनाह करने की आपके मन में चाहा है , वह आपको नर्क की आग में धकेल देगा | आप खुद ही फैसला कर ले की आप यह गुनाह करके नर्क की आग आग में कूदना चाहते है या इससे बचना चाहते है|'
यह सुनकर नवजवान हक्का बक्का रह गया| उसने संभलकर कहा, ऐ नेक और पाक औरत, तुमने मेरी आँखे खोल दी , जो अभी तक गुनाह के भयंकर नतीजे की और बंद थी | मै वादा करता हूँ की फिर कभी कोठे की तरफ कदम नही बढ़ाऊंगा |
हर रोज नए आदमी राबिया के पास भेजे जाते | पहले दिन आये नवजवान की तरह उन सबकी जिंदगी भी पलटती गयी | उस कोठे के मालिक को बहुत हैरानी हुई की इतनी खूबसूरत और नवजवान औरत है और एक बार आया ग्राहक दोबारा उसके पास जाने के लिए नही आता, जबकि लोग ऐसी सुन्दर लड़की इए दीवाने होकर उसके इर्दगिर्द | ऐसे घूमते है जैसे परवाने शमा के इर्दगिर्द | यह राज जानने के लिए उसने एक रात अपनी बीवी को ऐसी जगह छुपाकर बिठा दिया, जहां से वह राबिया के कमरे के अंदर सब कुछ देख सकती थी | वह यह जानना चाहता था की जब कोई आदमी राबिया के पास भेजा जाता है तो वह उसके साथ कैसे पेश आती है?
उस रात उसने देखा की जैसे हीं ग्राहक ने अंदर कदम रखा, राबिया उठकर खड़ी हो गई और बोली,आओ भले आदमी, आपका स्वागत है | पाप के इस घर में मुझे हमेशा याद रहता है की परमात्मा हर जगह मौजूद है | वह सब कुछ देखता है और जो चाहे कर सकता है | आपका इस बारे में क्या ख्याल है ? यह सुनकर वह आदमी हक्का बक्का रह गया और उसे कुछ समझ न आई की क्या करे ? आखिर वह कुछ हिचकिचाते हुए बोला, हाँ पंडित और मौ।लवी कुछ ऐसा ही कहते है |राबिया कहती गई, 'यहाँ गुनाहो से घिरे इस घर में, में कभी नही भूलती की ख़ुदा सब गुनाह देखता है और पूरा न्याय भी करता है वह हर इंसान को उसके गुनाहो की सजा देता है | जो लोग यहाँ आकर गुनाह करते है, उसकी सजा पाते है | उन्हें अनगिनत दुःख और मुसीबत झेलनी पड़ती है | मेरे भाई, हमे मनुष्य जन्म मिला है भजन बंदगी करने के लिए दुनिया के दुखो से हमेशा के लिए छुटकारा पाने के लिये, ख़ुदा से मुलाकात करने के लिए, न की जानवरो से भी बदतर बनकर उसे बर्बाद करने के लिए |
पहले आये लोगो की तरह इस आदमी को भी राबिया की बातो में छुपी सच्चाई का अहसास हो गया | उसे जिंदगी में पहली बार महसूस हुआ की वह कितने घोर पाप करता रहा है और आज फिर करने जा रहा था | वह फूटफूट कर रोने लगा और राबिया के पाव पर गिरकर माफ़ी मांगने लगा|
राबिया के शब्द इतने सहज, निष्कपट और दिल को छु लेने वाले थे की उस कोठे के मालिक की पत्नी भी बाहर आकर अपने पापो का पश्चाताप करने लगी | फिर उसने कहा ऐ नेक पाक लड़की, तुम तो वास्तव में फ़क़ीर हो | हमने कितना बड़ा गुनाह तुम पर लादना चाहा | इसी वक्त इस पाप की दलदल से बहार निकल जाओ ' इस घटना ने उसकी अपनी जिंदगी को भी एक नया मोड़ दे दिया और उस पाप की कमाई हमेशा के लिए छोड़ दी |
उस मालिक के सच्चे भक्त जहां कही भी हो, जिस हालात में हो, वे हमेशा मनुष्य जन्म के असली उद्देश्य की ओर इशारा करते है और भूले भटके जीवो को नेकी की रह पर चलने की प्रेरणा देते है।
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शिक्षाप्रद कहानी

एक दिन बहू ने गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया!!!
सफाई कर रही थी मुंह में सुपारी थी पीक आया तो वेदी में थूक दिया पर उसे आश्चर्य हुआ कि उसका थूक स्वर्ण में बदल गया है।
अब तो वह प्रतिदिन जान बूझकर वेदी में थूकने लगी और उसके पास धीरे-धीरे स्वर्ण बढ़ने लगा
महिलाओं में बात तेज़ी से फैलती है इसलिऐ कई और महिलाएं भी अपने-अपने घर में बनी यज्ञवेदी में थूक-थूक कर सोना उत्पादन करने लगी!
धीरे-धीरे पूरे गांव में यह सामान्य चलन हो गया।
सिवाय एक महिला के !
उस महिला को भी अनेक दूसरी महिलाओं ने उकसाया... समझाया...!
“अरी तू क्यों नहीं थूकती?”
“जी, बात यह है कि मैं अपने पति की अनुमति बिना यह कार्य हर्गिज नहीं करूंगी और जहाँ तक मुझे ज्ञात है वह अनुमति नहीं देंगे!”
किन्तु ग्रामीण महिलाओं ने ऐसा वातावरण बनाया कि आख़िर उसने एक रात डरते-डरते अपने ‎पति‬ को पूछ ही लिया।
“खबरदार जो ऐसा किया तो...!
यज्ञवेदी क्या थूकने की चीज़ है?”
पति की गरजदार चेतावनी के आगे बेबस...
वह महिला चुप हो गई पर जैसा वातावरण था और जो चर्चाएं होती थी, उनसे वह साध्वी स्त्री बहुत व्यथित रहने लगी।
ख़ास कर उसके सूने गले को लक्ष्य कर अन्य स्त्रियां अपने नए-नए कण्ठ-हार दिखाती तो वह अन्तर्द्वन्द में घुलने लगी!
पति की व्यस्तता और स्त्रियों के उलाहने उसे धर्मसंकट में डाल देते।
“यह शायद मेरा दुर्भाग्य है...
अथवा कोई पूर्वजन्म का पाप...
कि एक सती स्त्री होते हुए भी मुझे एक रत्ती सोने के लिए भी तरसना पड़ रहा है”
“शायद यह मेरे पति का कोई गलत निर्णय है”
“ओह, इस धर्माचरण ने मुझे दिया ही क्या है?”
“जिस नियम के पालन से ‎दिल‬ कष्ट पाता रहे उसका पालन क्यों करूँ?”
और हुआ यह कि वह बीमार रहने लगी।
पतिदेव‬ इस रोग को ताड़ गए और उन्होंने एक दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही सपरिवार ग्राम त्यागने का निश्चय किया।
गाड़ी में सारा सामान डालकर वे रवाना हो गए। सूर्योदय से पहले पहले ही वे बहुत दूर निकल जाना चाहते थे।
किन्तु...
अरे, यह क्या...???
ज्यों ही वे गांव की कांकड़(सीमा) से बाहर निकले!
पीछे भयानक विस्फोट हुआ।
पूरा गांव धू-धू कर जल रहा था!
सज्जन दम्पत्ति अवाक् रह गए।
और उस स्त्री को अपने पति का महत्त्व समझ आ गया।
वास्तव में... इतने दिन गांव बचा रहा,
तो केवल इस कारण...
कि उसका परिवार गांव की परिधि में था।
धर्मांचरण करते रहें...
कुछ पाने के लालच में इंसान बहुत कुछ खो बैठता है...
इसलिए लालच से बचें...😎😊😍
भजन सिमरण करते रहे सतगुरु हमे सही राह चलाए

हमारे दांत मजबूत और चमकदार दांत हो, इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

सुंदर सशक्त दांत हमारे चेहरे को सही आकार देते हैं ,भारत व अन्य विकासशील देशों में अभी दांतो की केयर पर उतना खर्च प्रति व्यक्ति नहीं जितना युरोप व अमेरिका में करते हैं. यदि दांतों की सफाई बचपन से न की जाय तो 15/20 वर्ष की आयु में दंतक्षय शुरू हो जाता है और एक महत्व पूर्ण बात , दांतों का संपूर्ण इलाज ओपन हार्ट सर्जरी से अधिक मंहगा है उदाहरण एक दांत की फिलिंग व रूट कनाल (दांत की जड़ को सजीव रखने की क्रिया) एक दांत का खर्च 3 से 7 हजार तक है और इस पर सेरामिक या मेटालिक कैप का खर्चा भी 3से 7हजार अलग से, और यदि दांत हटाकर नया जबड़े की हड्डी में बोल्ट से सेरामिक दांत लगाया जाय तो 20 से 40 हजार प्रति दांत खर्च हो सकते हैं ,अब गिन लें यदि 15 /20 दांतों में यह किया तो 6 से 9 लाख खर्चा तक हो सकता है साथ ही इस प्रक्रिया को अलग अलग एक एक दांत के लिऐ अलग अलग करवाया तो डेंटल सर्जन के पास आपको 30 बार जाना पड़ सकता है और प्रति विज़िट 2 घंटे साथ दर्द वाली संभावना व खाने की दवाओं का खर्च भी होगा.अब गिन लें ओपन हार्ट सर्जरी में दर्द इससे आधा भी नहीं होता और पेशेंट 4 से 8 दिन में स्वस्थ हो घर वापिस इसका कुल पैकेज का खर्च 3.5 से 6 लाख है.
अब आते हैं दांतो को हमेशा सुरक्षित कैसे रखें . खुराक ,हड्डियों व दांतों की मजबूती के लिये कैल्शियम , विटामिन डी युक्त भोजन ,दूध से बने आहार मछली या काड् लिवर आयल सुनहरे जैली भरे कैप्सूल दो रोज़ ले और वर्ष में कम से कम 100 दिन 35 मिनट धूप का सेवन आपके खाऐ विटामिन डी व कैल्शियम को शरीर में घोलने का काम करेगा . 40 की आयु पश्चात भोजन के अतिरिक्त बाहरी रुप से गोली या एक ग्राम पाऊच, शायद calciferol या ऐसे नाम से 1 ग्राम का पाऊच मिलता है वर्ष भर में 25/ या 30 तक पाऊच अवश्य लें और सही एकदम सटीक जानकारी चाहिए तो बस एकबार हड्डी रोग विशेषज्ञ से मिल कर पूछें प्रति सप्ताह एक दूध में डालकर लेना है इसका पूरा असर दूध में लेने साथ साथ धूप में रोज 30 मिनट बैठने से शरीर इसको शोषित करता है नहीं तो आधा अधूरा असर होता है , हो सके तो जो खा सकते हैं वो दो उबले अंडे रोज़ व सप्ताह में दो बार मछली व अखरोट बादाम अलसी के भुने बीज भी खाऐं नहीं तो सबको 40/45 की आयु पश्चात सबको हड्डियों का क्षरण (घिसना व नये हड्डी के ऊतक नहीं बनना ) होता है विशेषकर महिलाओं को मेनोपॉज के बाद इसकी अधिक आवश्यकता पड़ती है. आपने मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) आयू के बाद देखा होगा कि महिलाओं में घुटनों में दर्द व चलने सीढ़ी चढ़ने में दर्दे या दिक्कतें आती हैं वह इसी की कमी से इसी आयु में शारीरिक परिवर्तन से होता है और सारी आयू इस दर्द को झेलना एक मजबूरी बन जाती है।
केवल सुबह 5 - 7 मिनट ब्रश पेस्ट घिसना जितना लाभ देता है उतना ही नुकसान भी , पहली बात और समझ : हम हमेशा दांतों को घिसकर सारी आयु मूर्खता करते , समझते हैं कि हो गई सफाई जबकि वस्तु स्थिति यह है कि यदि मसूढ़े वृक्ष हैं तो दांत तना व टहनियां हैं अत: जब तक जड़ मजबूत नही तब तक तना भी स्वस्थ नहीं अतः मसूड़ों जीभ , तालू की उंगलियों से मालिश और अधिक जरूरी है , ब्रश को साबुन से मसल धो कर रखें ये नहीं कि एक ही झूठे ब्रश व रोज के बैक्टीरिया से भरे ब्रश से सफाई हो और अब पढ़ें दांतों की सफाई की आसान और सही प्रक्रिया

  1. सुबह की बजाय रात को दांत साफ कर सोयें ,रात में दांतों व मुंह की सफाई न होने से बैक्टीरिया 10 गुना जल्दी से फैलता है,रात को दांत साफ करें तो यह बैक्टीरियल हमला नहीं होता.
  2. सबसे पहले साबुन से हाथ धोकर उंगली से मसूड़ों की 1 या डेढ़ मिनट अंदर बाहर हल्की मालिश करें इससे मसूढों मे रूका तरल बाहर निकलता है , साथ ही जीभ भी दो उंगलियों से साफ करे ,टंग क्लीनर से न करें यह जीभ को छीलता है और जीभ पर जो बिंदिया नुमा टेस्ट बडस् होते हैं उन्हें नुकसान पहुंचता है और खाना खाते समय मिर्चें अधिक लगती हैं
  3. अब टुथपेस्ट उंगली पर लगा कर (ब्रश से नहीं) फिर से मसूड़े व दांत दोनों की 2 मिनट मालिश करें व जीभ पर और जीभ नीचे के अंदर की साईड की भी मालिश और एक या दो मिनट का समय छोड़ दें मुँह में असर होते होते समय लगता है ,इससे पेस्ट का सही असर दांतो व मसूढो़ पर होता है , अब इसके बाद एक मिनट मात्र मीडियम नरम ब्रश से नीचे से उपर व उपर से नीचे ,अंदर बाहर सफाई करें, यदि दो दांतो के बीच कुछ गैप है तो एक स्पेशल ब्रश (नीचे चित्र में फोटो देखें) से उस गैप में यदि कुछ फंसा है तो निकालें यह हरेक के लिऐ नहीं केवल दांतों में गैप है तो वही इसे प्रयोग करें. आप बिना भूले यदि इस तरह से नियमित दांत साफ करते रहें तो मेरा दावा है कि प्रोढ़ायू तक दांत मजबूत चमकदार व मसूढ़े स्वस्थ्य रहेंगे ,रात में यह करने से सुबह आप चाहें तो ब्रश न कर केवल टुथपेस्ट से मात्र डेढ़ मिनट साफ करें इससे सुबह का समय भी बचता है . इसके अतिरिक्त सप्ताह में एक बार फिटकरी का टुकड़ा पानी में सात बार हिलाकर उसकी दो कुल्ली करें या इसके स्थान पर डेंटल ऐंटिसेप्टिक लोशन (चित्र संलग्न है यह मात्र जानकारी के लिए है जरुरी नहीं कि यही लें किसी भी अच्छी कंपनी का लें ) की 8/10 बूंदें मुंह मे मलकर एक कुल्ली कर लें याद रहे यह प्रक्रिया रोज़ाना नहीं केवल सप्ताह में दो बार करनी है ,यदि रोज़ करेंगे तो दांतो के एनामल घिस सकता है और ठंडा गरम लगने की शिकायत हो सकती है. इसके अतिरिक्त हर बार खाने के बाद हर बार पानी से कुल्ली करने की आदत बनाऐं , आजकल कई प्रकार के लिक्विड रंग बिरंगे माउथवॉश भी बाजार में हैं ,पर यदि आप इस लेख के बताऐ तरीके से दांत साफ रखें तो माऊथवाश एक खर्चीली आदत से अधिक कुछ विशेष नहीं वैसे जो कर रहे हैं या करने की क्षमता है तो करें कोई हर्ज नहीं और यह भी ध्यान रहे कि ओरल माउथवॉश तरल मंहगे व पूर्णतया कैमिकल्स ही हैं ये हमारे मुँह के अंदरूनी भाग में खराब बैक्टीरिया के साथ मुँह में कुछ मित्र (लाभकारी) बैक्टीरिया को भी मारता है जिससे पेट के गुड बैक्टीरिया कम होने से पाचनतंत्र कमजोर हो सकता है . ,कुछ व्यक्तियों को मसूढ़ों की सूजन का रोग होता है इसे पायोरिया नाम से जाना जाता है.जिसका स्वंय को महसूस नहीं होता पर दूसरे व्यक्ति उस व्यक्ति के अति नजदीक अपना मुंह करने में असहज महसूस करते हैं यह स्थिति जानने के लिये घर के मेंम्बर से कह कर पूंछें कि वह आपका मुँह सूंघें ओर बताऐं कि तेज बदबू तो नहीं है और यदि ऐसा है तो तुरंत डेंटल सर्जन से चेकअप करा पूरा इलाज कराना जरूरी है अन्यथा घर पर कितने ही दांत साफ कर लें जब तक मसूढे पूर्ण स्वस्थ नहीं होते तो 50/55की आयु में सब दांत गिरने शुरू हो सकते हैं।
अपने अनुभव व क्षमता के अनुसार मैंने बहुत डिटेल्ड उत्तर दिया है ,यदि अपनाया जाये तो गारंटी है कि सत्तर हों या अस्सी साल दांत सही मजबूत रहेंगे. उत्तर पसंद आया तो सोच में न पड़ें आज रात्रि से शुभ प्रारंभ करें ,और विशेष यह कि एक अपवोट भी चाहें तो करें धन्यवाद . तिथि :- 23.सेप्टेंबर.2021…….
विशेष नोट:- लेखक के पास कोई मेडिकल डिग्री या विशेषज्ञता नहीं है ,यह स्वंय के सहज ज्ञान व अनुभव आधारित लिखा गया है , किसी भी सामान्य या टिपिकल रोग निदान हेतु डाक्टर की राय प्रथम लें. चित्र में दिये उत्पाद केवल उदाहरण व पाठकों की जागृति हेतु हैं व लेखक का इन उत्पादों या इनके निर्माता से किसी प्रकार का संबध नहीं. 🙏 भारतमाता की जय .वंदेमातरम