Saturday, October 20, 2012

प्रार्थना


मानव आज कितना चारों ओर भटक रहा है, चक्कर काट रहा है - ठिकाने के लिए, आश्रय के लिए, इलाज के लिए, रोषनी के लिए। यह उसका महादुर्भाग्य है कि वह आपको व आपकी कृपा को अनुभव नहीं कर पाता व माया के चक्कर में उलझ ठोकरें खा-खाकर लहुलुहान होता रहता है। कदाचित मानव आपके धर्मदाता रूप् को, कल्याणकर्ता रूप् को, पूर्ण उद्धारकर्ता व सुखदाता रूप को पहचान सके।
हे परम हित सम्पादक, हे अन्धकार से ज्योति की ओर ले जाने वाले, हे, असत्य से सत्य की ओर ले जाने वाले, हे मृत्यु से अमृत की ओर ले जाने वाले, हे देवलोक के सूर्य, हे आध्यात्मिक जगत के सिरमौर हे, पूर्ण पुरूश धर्म, हे एकमात्र सत्य और उपास्य हम आपकी “ारण में हैं हमारा उद्धार करिये।
हे दाता! ऐसा बल दो , मै अपना व दूसरों का सदा भला चाहूँ, भला ही सोचूँ व भला ही करूँ। मेरे भाव, मेरी सोच व मेरे कर्म सब शुभ में रंग जाएं। मुझे क्या अपना शुभ चाहते हुए अथवा किसी दूसरे का शुभ चाहते हूए बहुत प्रयास न करना पड़े, वह स्वत: होने लगे। यानि शुभ चाहना व शुभ करना मेरे स्वभाव का हिस्सा बन जाए। ऐसी समर्थ दो!
हे रक्षक! आप महाबली है, मेरी रक्षा कीजिए। प्राय: संसार में लोग अपने इष्ट से, अपने बाहरी दुश्मनों से रक्षा हेतु प्रार्थनाशील होते है, किन्तु आपकी कृपा से मैं ऐसा नहीं चाहता। क्योंकि बाहरी दुश्मनों से कुछ न कुछ रक्षा तो मैं अपने व अपनोंके बाहुबल, धनबल, दिमागी शक्तियों और पुलिस, प्रशासन व सरकार के दम पर कर ही लूँगा। परन्तु, मेरे स्वभाव में जो मेरी दुश्मन शक्तियाँ छुपी है,उनसे बचाने में मेरा शारीरिक बल, मानसिक शक्तियाँ, मेरे साथी, पुलिस प्रशासन व सरकार सब बेबस है। इन भीतरी दुश्मनों को तो केवल आपकी ज्योति व शक्ति ही दिखा सकती है व उनसे बचा सकती है, इसलिए इस ज्योति व शक्ति की मुझे अतिशय जरूरत है।
हे महादानी! मुझ पर तरस खाओ, मेरी मजबूरी व मेरी अयोग्यता को देखकर मुझ पर रहम करो, मुझे अपनी जीवन दायिनी ज्योति व शक्ति का दान दो। मेरे भीतर जो भी कारण इस ज्योति व शक्ति को प्राप्त करने में रूकावट हों, उन्हें नष्ट करो, ताकि मैं अपने भीतरी शक्तियों व दुश्मनों से सुरक्षित रह सकूँ। हे भगवान् कृपा करके मेरे जीवन में सच्चे सुख, शांति, चैन, नींद, सेहत का अपहरण करने वाले तथा मेरे आत्मबल को घटाने वाले इन शत्रुओं को दिखाओ व इनसे बचाओ! मेरी प्रार्थना कबूल करो!
हे देव! ऐसी प्रार्थना भी तो आपकी ही कृपा से सम्भव है। आपके इस अमूल्य दाने के लिए आपके श्रीचरणों की धूल में अपना नापाक सिर रखना, मैं अपना महासौभाग्य बोध करता हूँ, आपके साथ अपने संबंध बना पाना, अपना एहोभाग्य बोध करता हूँ और स्ंवय को राजा महाराजाओं से असख्यों गुणा अमीर बोध करता हूँ। काश, मैं सदा-सदा आपके देव दरबार का भिखारी बना रह सकूँ और आपकी ज्योति व शक्ति को पाने व योग्य आत्माओं तक उसे पहुँचाने का अधिकारी बना रह सकूँ। हे शुभकर्ता! आपका भी शुभ हो! मेरा शुभ हो! सबका शुभ हो!
सत्य देव संवाद-दिसम्बर 2012
प्रार्थना
हे सर्वाधार, सर्वान्तर्यामिन परमेश्वर! तुम्हारे आँचल में अविचल शान्ति तथा आनंद का वास है।तुम्हारी चरण-शरण की शीतल छाया में परम तृप्ति है,शाश्वत सुख की उपलब्धि है तथा सब अभिलशित पदार्थों की प्राप्ति है।
हे जगत पिता परमेश्वर! हममें सच्ची श्रद्धा तथा विश्वास हो। हम तुम्हारी अमृतमयी गोद में बैठने के अधिकारी बनें। अंत:करण को मलिन बनाने वाली स्वार्थ तथा संकीर्णता की सब क्षुद्र  भावनाओं से हम उँचे उठें।काम, क्रोध, लोभ, मोह, र्इष्र्या, द्वेष इत्यादि कुटिल भावनाओं तथा सब मलिन वासनाओं को हम दूर करें।अपने हृदय की आसुरी प्रवृत्तियों के साथ युद्ध में विजय पाने के लिए हे प्रभो! हम तुम्हें पुकारते है और तुम्हारा आँचल पकड़ते हैं।
हे परम पावन प्रभो! हम में सात्विक प्रवृत्तियाँ जागरित हों।क्षमा, सरलता, स्थिरता, निर्भयता, अहंकार शुन्यता इत्यादि शुभ भावनाएँ हमारी सम्पत्ति हो, आत्मा पवित्र तथा सुंदर हो, तुम्हारे संस्पर्श से हमारी सारी शक्तियाँ विकसित हो, हृदय दया तथा सहानुभूति से भरा हो। हमारी वाणी में मिठास हो तथा दृष्टि में प्यार हो। विद्या और ज्ञान से हम परिपूर्ण हों। हमारा व्यक्तित्व महान तथा विशाल हो।
हे प्रभो! अपने अशीर्वादों की वर्षा करो। दीनतिदीनों के मध्य में विचरने वाले तुम्हारे चरणारविदों में हमारा जीवन अर्पित हो। इसे अपनी सेवा में लेकर हमें कृतार्थ करें।
ओमशान्ति!शान्ति!!शान्ति!!!

परम पूज्य गुरूदेव की अपने अंग-अवयवों से अपेक्षा


परम पूज्य गुरूदेव द्वारा सूक्ष्मीकरण के पहले मार्च 1984 में लोकसेवी कार्यकर्त्त्-समयदानी-समर्पित शिष्यों को दिया गया महत्त्वपूर्ण निर्देश। यह पत्रक स्वंय परम पूज्य गुरूदेव ने सभी को वितरित करते हुए इसे प्रतिदिन पढ़ने और जीवन में उतारने का आग्रह किया था।
परम पूज्य गुरूदेव की अपने अंग-अवयवों से अपेक्षा
1-यह मनोभाव हमारी तीन उँगलियाँ मिलकर लिख रही है। पर किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि जो योजना बन रही है और कार्यन्वित हो रही है, उसे प्रस्तुत कलम, कागज या उँगलियाँ ही पूरा करेंगी। करने की जिम्मेदारी आप लोगों की, हमारे नैष्ठिक कार्यकर्त्त्ााओ की है। 
2-योजना बड़ी हैं। उतनी ही बड़ी, जितना कि बड़ा उसका नाम है-’’युग परिवर्तन।’’ इसके लिए अनेक वरिष्ठों का महान् योगदान लगना है। उसका श्रेय संयोगवश किसी को भी क्यों न मिले।
3-प्रस्तुत योजना को कर्इ बार पढ़ें। इस दृष्टि से कि उसमें सबसे बड़ा योगदान उन्हीं का होगा, जो इन दिनों हमारे कलेवर के अंग-अवयव बनकर रह रहे है। आप सबकी समन्वित शक्ति का नाम ही वह व्यक्ति है, जो इन पंक्तियों को लिख रहा है।
4-कार्य कैसे पूरा होगा? इतने साधन कहाँ से आएँगें? इसकी चिन्ता आप न करें। जिसने करने के लिए कहा है, वही उसके साधन भी जुटाऐगा। आप तो सिर्फ एक बात सोचें कि अधिकाधिक श्रम व समर्पण करने में एक दूसरे में कौन अग्रणी रहा?
5-साधन, योग्यता, शिक्षा आदि की दृष्टि से हनुमान उस समुदाय में अकिंचन थे। उनका भूतकाल भगोड़े सुग्रीव की नौकरी करने में बीता था, पर जब महती शक्ति के साथ सच्चे मन और पूर्ण समर्पण के साथ लग गए, तो लंका दहन, समुद्र छलांगने और पर्वत उखाड़ने का, राम-लक्ष्मण को कंधे पर बिठाये फिरने का श्रेय उन्हें ही मिला। आप लोगों में से प्रत्येक से एक ही आशा और अपेक्षा है कि कोर्इ भी परिजन हनुमान से कम स्तर का न हो। अपने कतर्ृव्य में कोर्इ भी अभिन्न सहचर पीछे न रहे। 
6-काम क्या करना पड़ेगा? यह निर्देश और परामर्श आप लोगों को समय-समय पर मिलता रहेगा। काम बदलते भी रहेंगे और बनते-बिगड़ते भी रहेंगे। आप लोग तो सिर्फ एक बात का स्मरण रखें कि जिस समर्पण भाव को लेकर घर से चले थे ( हमसे जुड़े थे) उसमें दिनों-दिन बढ़ोत्त्ारी होती रहे। कहीं कोर्इ रार्इ-रत्त्ाी भी कमी न पड़ने पाये।
7-कार्य की विशालता को समझें। लक्ष्य तक निशाना न पहुँचे, तो भी वह उस स्थान तक अवश्य पहुँचेगा, जिसे अद्भुत, अनुपम, असाधारण और ऐतिहासिक कहा जा सके। इसके लिए बड़े साधन चाहिए, सो ठीक है। उसका भार  दिव्य सत्त्ाा पर छोड़े। आप तो इतना ही करें कि आपके श्रम, समय, गुण-कर्म, स्वभाव में कहीं कोर्इ त्रुटि न रहे। विश्राम की बात न सोचें, अहर्निश एक ही बात मन में रह कि हम इस प्रस्तुतीकरण में पूर्णरूपेण खपकर कितना योगदान दे सकते है? कितना आगे रह सकते है? कितना भार उठा सकते है? स्वंय को अधिकाधिक विनम्र, दूसरों को बड़ा मानें। स्वंयसेवक बनने में गौरव अनुभव करें। इसी में आपका बड़प्पन है।
8-अपनी थकान और सुविधा की बात न सोचें। जो कर गुजरें, उसका अहंकार न करें वरन् इतना ही सोचें कि हमारा चिंतन, मनोयोग एवं श्रम कितनी अधिक उँची भूमिका निभा सका? कितनी बड़ी छलाँग लगा सका? यही आपकी अग्नि परिक्षा है। इसी में आपका गौरव और समर्पण की सार्थकता है। अपने साथियों की श्रद्धा व क्षमता घटने ने दें। उसे दिन दूनी-रात चौगुनी करते रहें।
9-स्मरण रखें कि मिशन का काम अगले दिनों बहुत बढ़ेगा। अब से कर्इ गुना अधिक। इसके लिए आपकी तत्परता ऐसी होनी चाहिए, जिसे उँचे दर्जे की कहा जा सके। आपका अन्तराल जिसका लेखा-जोखा लेते हुए अपने को कृत-कृत्य अनुभव करे। हम फूले न समाएँ और प्रेरक सत्त्ाा आपको इतना घनिष्ठ बनाए, जितना कि राम पंचायत में छठे हनुमान् भी घुस पड़े थे।
10-कहने का सारांश इतना ही है, आप नित्य अपनी अन्तरात्मा से पूछे कि जो हम कर सकते थे, उसमें कहीं रार्इ-रत्त्ाी त्रुटि तो नहीं? आलस्य-प्रमाद को कहीं चुपके से आपके क्रिया-कलापों में घुस पड़ने का अवसर तो नहीं मिल गया? अनुशासन में व्यतिरेक तो नहीं हुआ? अपने कृत्यों को दूसरे से अधिक समझने की अंहता कहीं छदम रूप में आप पर सवार तो नहीं हो गयी?
यह विराट् योजना पुरी होकर रहेगी। देखना इतना भर है कि इस अग्नि परीक्षा की वेला में आपका शरीर, मन और व्यवहार कहीं गड़बड़ाया तो नहीं। उँचे काम सदा उँचे व्यक्वित्व करते है। कोर्इ लम्बार्इ से उँचा नहीं होता, श्रम, मनोयोग, त्याग और निरहंकारिता ही किसी को उँचे बनाती है। अगला कार्यक्रम उँचा है। आपकी उँचार्इ उससे कम न पड़ने पाए, यह एक ही आशा, अपेक्षा और विशवास आप लोगों पर रखकर कदम बढ़ रहे है। आप में से कोर्इ इस विषम वेला में पिछड़ने न पाए, जिसके बाद में पशचाताप करना पड़े।

प्रेरणाप्रद वाक्य




 किसी से मत कहो कि ‘तुम बुरे हो’ बस कहों कि ‘तुम अच्छे हो, और भी अच्छे बनो।’
यह दुर्भाग्य की बात है कि हम आत्मिक उन्न्ति के मूल्य पर सांसारिक सुखों को खरीदते हैं।
 म्न के लिए स्वाध्याय वैसा ही है, जैसा “ारीर के लिए व्यायाम।
स्ंसार में अपने पंखों को फैलाना सीखो, दूसरों के पंखों के सहारे उड़ना सम्भव नहीं।
 मोह जैसा कोर्इ बन्धन नहीं, तृश्ण जैसी कोर्इ वेगधारा नहीं, राग जैसी कोर्इ अग्नि नहीं - तीनों से दूर रहो।
सच्चे सौन्दर्य का रहस्य सच्ची सरलता है।
साधन निरन्तर अपने मन से संघर्शरत रहता है।
 जब ज्ञान-दीप से मनुश्य का अन्र्तमन प्रकाषित हो जाता है, तो वह आत्मा की स्वतन्त्रता का अनुभव करता है।
ये पाँच मनुश्य जल्दी नश्ट हो जाते हैं - दुराग्रही, लोभी, अभिमानी, कामी और द्वेशी।
आचार्य चाणक्य
 

सफलता का मार्ग खतरो का मार्ग है। जिसमें खतरों से लड़ने का साहस और संघर्ष में पड़ने का चाव हो, उसे ही सिद्धि के पथ पर कदम बढ़ाना चाहिए।
जो खतरो से डरते है, जिन्हें कष्ट सहने से भय लगता है, कठोर परिश्रम करना जिन्हें नहीं आता उन्हें अपने जीवन को उन्नतिशील बनाने की कल्पना नहीं करनी चाहिए। अदम्य साहस, अटूट साहस, अविचल धैर्य, निरन्तर परिश्रम और खतरों से लडने वाल पुरूषर्था ही किसी जीवन को सफल बना सकता है।
‘‘ देख-देख कर बाधाओं को पथिक न घबरा जाना।
सब कुछ करना सहन किन्तु मत पीछे पैर हटाना।।
यह न समझना चला गय मैं, हूँ सर्वदा तुम्हारे पास।
है विश्वाश कि पूर्ण करोगे, तुम सब परिजन मेरी आस।।
 तुम रहना नि​िश्चंत न पग में, ठोकर भी लगने दुँगा।
अब भी तत्पर हूँ तुमको, देने को निर्मल मृदुहास।।
कर इड़ा पिगला को जाग्रत में, अजर अमर हो  जाता हूँ।
ब्रह्मरन्ध के महाशुन्य में, जब चाहे खो जाता हूँ।।
- श्री राम आचार्य
तपस्वी व साहसी इन्सान कभी तूफानों से घबराया नहीं करते।
वो क्या बंदें मुसीबत में जो मुस्कराया नहीं करते।
गिराये जांए गिरि से या गिरी ही आ पड़े उन पर।
भंयकर मौत भी आए तो भय खाया नहीं करते।
सदाकत के लहू से सीचं कर पाले है  जो गूंचे।
खिंजा भी आए तो वो फूल कुम्हलाया नहीं करते।
भरोसा है जिन्हें अपने सिदक पर और र्इश्वर पर।
तमन्नाओं में वो दामन को उलझाया नहीं करते।
 जो अवसर राज आने का समझ जाते है।
वो जग तें एक दफा आकर भी फिर आया नहीं करते।
‘‘हजारों टन सिद्धातों की अपेक्षा गा्रम भर आचरण अधिक लाभप्रद्र है प्रारम्भ में केवल थोंड़े से ऐसे संकलपों का चयन कीजिए जिनसे आपको स्वभाव और चरित्र में भले ही थोंड़ा पंरतुु निश्चित सुधार हो। - स्वामी शिवानंद
‘‘आदर्शो के अपनाने का शुभ मुहूर्त आज का ही होता है। कल की प्रतीक्षा में बैठे रहने वालो का कल तो मरण के उपरांत ही आती है।’’
‘‘सुबह का बचपन हँसते देखा, दोपहर की मस्त जवानी।
शाम का बुढ़ापा ढलते देखा, रात को खत्म कहानी।।’’
‘‘ हे राजन्! र्इश्वर तो उन अकिचंनो (विरलों) का धन है,जिन्होंने सब वस्तुओं का त्याग कर दिया है-यहाँ तक कि अपनी आत्मा के संबंध में भी इस भावना का कि यह मेरी है, पूर्ण त्याग कर दिया है।’’ - पवहारी बाबा
      ‘‘इंद्रियाँ ऐसी बलवान है कि चारों और से उपर नीचे दशो दिशाओं से जब उन घेरा डाला जाता है तभी कब्जे में रहती है।’’
- महात्मा गाँधी
‘‘ मनुष्य के सामने दो ही मार्ग है-तप या पत, दोनों एक दूसरें के उलटे है तप का अर्थ है उपर उठना, पत का अर्थ है पतित होना। जो तप नहीं करता उसका पतन होना स्वाभाविक है और जो आत्मिक पतन से बचना चाहता है, उसे तपन के लिए अग्रसर होना पडेगा। दोनों में से एक ही मार्ग को चुना जा सकता है।’’ - आचार्य श्री राम
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादातपसो वाप्यलिगांत्।                            
यह आत्मा किसी बलहीन  को प्राप्त नहीं होती और न ही तप में प्रमाद करने वालो को।
‘‘ तपश्चर्या में जीवन के विविध-विधि बिखरावों को रोककर उद्देश्यपूर्ण प्रयोजन में ही उन्हें नियोजित करने का कौशल सीखाना पड़ता है।’’                                        
- आचार्य श्री राम
‘‘ कष्ट सहिष्णुता को परमाथ्र्ाी जीवन को एक अनिवार्य साधना माना जाए। स्वार्थ का परमार्थ पर उत्सर्ग करने के लिए यही करना पड़ता है। त्याग बलिदान का परिचय दिए बिना आत्म कल्याण की साधना में एक इंच भी प्रगति नहीं हो सकती। सच्चे आत्मवादी को तो त्याग, बलिदान के अंतिम चरण तक पहूँचना पड़ता है’’
- आचार्य श्री राम ( प्रसुप्ति से जागृति की ओर 4;13)
व्यक्ति सीखना चाहे तो जीवन की प्रत्येक भूल उसको शिक्षा दे सकती है। समुद्र तूफान में भी अपनी गंभीरता नहीं छोड़ता, उसी प्रकार विप​ित्त्ा काल में मानव को साहस नहीं छोड़ना चाहिए।
‘‘हम क्या करते है इसका महत्त्व कम है, किंतु हम उसे किस भाव से करते है इसका बहुत अधिक महत्त्व है’’  आचार्य श्री राम
‘‘युवैव धर्मशील स्यात्’’
जाग ऐ मानव! जब तक यौवन की यह घटा विद्यमान है, तब तक कुछ कर लें, तब तक आत्मा को पाने का यत्न कर। यह घटा सदा नहीं रहेगी, इसे एक दिन समाप्त होना है। यह तेरे जीवन को स्वर्ण युग है, इस स्वर्ण काल को व्यर्थ की बातों में खोएगा तो स्मरण रखना, फिर वृद्धावस्था आएगी निश्चित रूप से, उस समय हाथ काम नहीं करेंगे, फिर क्या करेगा? उस समय शरीर चलेगा नहीं फिर आत्मा का दर्शन पाने के लिए जाएगा कहाँ? उस समय घुटनों में दर्द होगा, तब आसन में कैसे बैठेगा? उस समय कान सुनेंगे नहीं,  तब सत्संग में जाने से क्या लाभ होगा? नहीं मेरे भार्इ। मेरी बच्चें समय अब है, अब आगे बढ़। इस स्वर्ण युग स्वर्ण पथ पर चलो। इसलिए हमारे पूर्वजो ने कहा-’’युवैव धर्मशील: स्यात्। अर्थात यौवन में धर्मशील बनो। वृद्धावस्था में बहुत कुछ होने वाला नहीं।
- महात्मा आनंद स्वामी

सदैव याद रखिए कि आपकी निंदा करने वाला आपका मित्र है जो कि आपको बिना मूल्य एक मनोचिकित्सक की भाँति आपकी गलतियों व आपकी खामियों  की तरफ ध्यान खिंचवता हैं।

कराची में एक सार्वजनिक अस्पताल बन रहा था। निर्माता उसके लिए दान माँग रहे थे। दस हजार देने वाले के नाम का पत्थर अस्पताल की दीवार पर लगाने की घोशणा थी।
 एक उदार दानी मानकदास ने दस हजार में एक रूपया कम दिया ताकि उनके दान का विज्ञापन न हो और पुण्य क्षीण न हो।