Sunday, January 12, 2014

साधना समर - पातञ्जल योग दर्शन(अष्टांग योग)-6

ब्रह्मचर्य ऋषियों ने ब्रह्मचर्य की महिमा का गान बडे़ ही मार्मिक शब्दों में किया है। ऐसा कहा गया है-
 ”मरणं बिन्दु पातेण जीवन बिंदु धारयेत“ ॥हयो-३.८८॥
     यह श्लोक बताता है कि बिंदु अर्थात् वीर्य का पतन मृत्यु की ओर ले जाता है एवं वीर्य को धारण करना व्यक्ति को जीवन प्रदान करता है। जीवित कौन? आँखों पर चश्मा, सफेद बाल, पिचके हुए गाल, लड़खड़ाते कदम, झोले व दवाईयाँ क्या यही जीवन की परिभाषा है? क्या सृष्टा का अनुपम उपहार मानव जीवन यही है जिसको पाने के लिए देवता भी तरसते हैं? अधिकाँश व्यक्ति जिंदा लाश बनते चले जा रहे हैं जिनको किसी प्रकार अपने जीवन की अवधि पूरी करनी हैं यही कारण है आत्महत्या करने के 101 उपाय जैसी किताबें विदेशों में खूब बिकती हैं परन्तु भारत के ऋषि जीवन की यह परिभाषा स्वीकार नही करते, युगऋषि श्री राम आचार्य जी के शब्दों में-
”वही जीवित है जिसका मस्तिष्क ठंडा, रक्त गर्म और पुरुषार्थ प्रखर है।“
     ऋषि कहते है ‘जीवेम शरद शतम्’ यदि आप जीवन के साथ खिलवाड़ नही करते तो 100 शरद ऋतु आराम से पार कर सकते हैं ऋषि ने शरद ऋतु की बात कही है। प्राणवान व्यक्ति ही शरद ऋतु का आनन्द ले सकता है अर्थात् हम सौ वर्ष तक बड़े मजे से, सक्रिय जीवन जी सकते हैं।
     परन्तु दुर्भाग्य हमारा समाज के वासनात्मक और कामुक वातावरण ने हमारे जीवन रस (वीर्य) को निचैड़ कर रख दिया पूरा समाज आज वासना के कोढ़ से ग्रस्त हो गया है क्योंकि हमनें ब्रह्मचर्य की गरिमा को भुला दिया।
ऋषि पतंजलि का सूत्र हैः-
           ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्य लाभः। (योग दर्श साधन पाद-18)
     अर्थात् जीवन में ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा से वीर्य का लाभ होता है।
     ऐसा प्रतीत होता है कि इस श्लोक के द्वारा ऋषि समाज को अथवा मानव जीवन को सामथ्र्यवान बनाने का सूत्र बता रहे हैं। शास्त्रों में सामथ्र्यवान को वीर्यवान की उपमा दी गई है। उदाहरण के लिए श्रीमद्भागवत् गीता में पाण्डवों की सेना के महान् योद्धाओं को वीर्यवान कह कर सम्बोधित किया गया है।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराट द्रुपद महारथः ॥ (1/4)
धृड्ढकेतुकितानः काशिराज वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोज शैबय नरपुअङ्ग वः ॥ (1/5)
युधामन्यु विक्रान्त उत्तमौजा वीर्यवान्।
सौभद्रो द्रौपदेया सर्व एव महारथाः॥  (1/6)
     यहाँ पाण्डवों की सेना में बड़े-बड़े शूरवीर है जिनके बड़े-बड़े धनुष है व युद्ध में भीम व अर्जुन के समान है। युयुधान (सात्यकि) राजा विराट और द्रुपद जैसे महारथी है धृष्टकेतु, चेकितान तथा काशीराज जैसे पराक्रमी भी है पुरुजित् और कुन्तिभोज तथा मनुष्य में श्रेष्ठ शैब्य भी है, युद्धमन्यु जैसे पराक्रमी व उत्तमौजा जैसे वीर्यवान भी हैं। सुभद्रापुत्र अभिमन्यु और द्रौपद्री के पाँचों पुत्र (प्रतिविन्धय, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन) सबके सब महारथी है।
     प्राचीन काल में वातावरण पवित्र एवं सात्विक था नर और नारी परस्पर पवित्र दृष्टि रखते थे एवं लोग सहजता से ब्रह्मचर्य का पालन कर लेते थे। नर और नारी का सह-सामीप्य उमंग उल्लासपूर्ण और दिव्यता से भरा भी हो सकता है यदि दोनों की दृष्टि पवित्र है। इस परिस्थिति में नारी को पुरुष की शक्ति कहा जाता है परन्तु दुर्भाग्यवश आज नारी के भोग्य स्वरूप का समाज में इतना अधिक प्रचलन हो गया है व नारी भी स्वयं को उसी रूप से प्रस्तुत (प्रदर्शित) करने लगी है इस कारण ब्रह्मचर्य का पालन एक चुनौती (challenge) बन गया है।
     आयुर्वेद के अनुसार शरीर सात धातुओं से बना है जिसमें वीर्य एक महत्वपूर्ण धातु है युवा अवस्था में शरीर में वीर्य धातु पर्याप्त मात्रा में होती है इस कारण व्यक्ति सशक्त जीवन जीता है परन्तु 40 वर्ष के उपरान्त यह धातु कमजोर पड़ने लगती है अतः असावधान व्यक्ति तरह-तरह के गम्भीर रोगों से घिरने लगता है।
जो व्यक्ति स्त्री लोलुप होकर वीर्य धातु को दुर्बल बना लेते है अथवा जो स्त्री के विषय में संयमी रहकर वीर्य को पुष्ट बना लेते हैं उनके परिणाम के विषय में आयुर्वेद कहता है।
     भ्रम क्लमोरूदौर्बल्य बल धात्विन्द्रियि क्षयाः।
     अपर्वमरणं च स्यादन्यथागच्छतः स्त्रियिम्॥ 
     उपर्युक्त विधि पालन न करने से भ्रम, क्लम, जांघों में निर्बलता, बल व धातुओं का क्षय, इन्द्रियों में निर्बलता और अकाल मृत्यु- ये परिणाम होते हैं।और यदि इस विधि का पालन किया जाए तो-
     समृति मेधाऽऽपुरातोग्य पुष्टीन्द्रिय यशोबलैः।
     अधिकामन्दजरसौ भवन्ति स्त्रीषु संयता॥ 
     स्त्रियों के विषय में संयमी पुरुष याद्दाश्त, बुद्धि ,आयु, आरोग्य-पुष्टि, इन्द्रिय-शक्ति, शुक्र, यश और बल में अधिक होता है और बुढ़ापा उसको देर से आता हैं।
     ब्रह्मचर्य के विषय में हमें दो विरोधी विचार धाराओं का टकराव देखने का मिलता है। एक है पूर्व की धारा जिसको हम भारतीय संस्कृति कहते हैं व दूसरी है पश्चिम की धारा। हमारी संस्कृति ब्रह्मचर्य पालन पर बहुत जोर देती है व इसको तपों में सर्वोत्तम तप कहकर सम्बोधित करती है। पश्चिम (west) की संस्कृति में इस बात का जोर है कि इन्द्रियों के दमन से मानसिक विड्डतियाँ जन्म लेती हैं अतः व्यक्ति को स्वच्छंद जीवन जीना चाहिए। सैक्स (sex) से जीवन में रस आता है व सम्पूर्ण शरीर में एक प्रकार की charging होती है जो वीर्य निकलता है उसकी क्षति कुछ कैल्शियम, पोटाशियम, व minerals के द्वारा आसानी से हो जाती है। सैक्स(sex ) से व्यक्ति जवान बना रहता है नहीं, तो life dull होती जाती है। पश्चिम में सिग्मण्ड फ्रायड नामक एक दार्शनिक हुए हैं जिन्होंने इस दिशा में काफी शोध कार्य किया है। west की theory उन्हीं की researches पर आधारित है।
      पूर्व और पश्चिम के मतों में भिन्नता इसलिए है क्योंकि पश्चिम के लोग वासना की तृप्ति के लाभों को ही जान पाएँ उनकी शोधें काफी हद तक ठीक है, परन्तु भारत के लोगों ने वासना के रूपान्तर के ज्ञान को जाना। वासना के रूपान्तर के
द्वारा कैसे व्यक्ति तेजस्वी, वर्चस्वी, औजस्वी बन सकता है इस विद्या पर हमारे यहाँ बहुत शोधकार्य हुआ है जैसे जल नीचे की ओर गिरता है, बिखरा रहता है परन्तु यदि उसको भाप बना कर एक निश्चित दिशा में प्रयोग किया जाएँ तो वह बहुत शक्तिशाली हो जाता है कुछ-कुछ इसी तरह का सिद्धांत हमारे ऋषि देते हैं।
     सिग्मण्ड फ्रायड मनोरोगियों पर परिक्षण करते थे और उसी आधार पर उन्होंने अपने परिणाम दुनिया के सामने रखे एक डॉक्टर के क्लीनिक में यदि ऐसे दस मरीज आएँ कि घी खाकर पेट गड़बड़ हो गया और डॉक्टर कहने लगे कि घी खाने से स्वास्थ्य खराब होता है तो यह जानकारी अधूरी होगी यह कहना उचित होगा कि जिनका पाचन कमजोर हो वे ना लें परन्तु अच्छे पाचन वाले व्यक्ति घी खाकर बलवान बन सकते हैं इसी प्रकार जो लोग वासना के रूपातरूण में सफल हो जाते हैं वो अत्यन्त शक्तिशाली बन सकते हैं मनोरोगी तो वो बनते है जो इस विद्या को ठीक से सीख नही पाते व लम्बे समय तक वासनाओं का दमन करते हैं।
     विद्युत शक्ति के साथ खिलवाड़ किया जाएँ तो वो झटका मार देती है परन्तु यदि नियन्त्रित कर लिया जाए तो वह वरदान बन जाती है यह बात वासना एवं ब्रह्मचर्य के विषय में भी स्टीक बैठती है इसलिए ऋषि पतंजलि समाज को संयमी जीवन जीने की शिक्षा देते है।
     यद्यपि भारतीय धर्मग्रन्थों में ब्रह्मचर्य पालन की बड़ी (सुंदर-जीवन by माधव पण्डित) महिमा बखान की गयी है। परंतु अध्यात्म द्वारा नियन्त्रित जीवन में कामेच्छा की उचित भूमिका को अस्वीकार नहीं किया गया है। उसकी उचित माँग स्वीकार की गयी है किंतु उसे आवश्यकता से अधिक महत्व देने से इंकार किया गया है। जब व्यक्ति आध्यात्मिक परिपक्वता प्राप्त कर लेता है तब यौन-आकर्षण स्वयं ही विलीन हो जाता है उसका निग्रह करने के लिए मनुष्य को प्रयत्न नहीं करना पड़ता, वह पके फल की भाँति झड़ जाता है। इन विषयों में मनुष्य को अब और रूचि नहीं रह जाती। समस्या केवल तभी होती है जब मनुष्य चाहे सकारात्मक, चाहे नकारात्मक रूप में कामेच्छा में तल्लीन या उससे ग्रस्त होता है। दोनों ही परिस्थितियों में मनुष्य यौन चिंतन करता है व ऊर्जा का अपव्यय करता रहता है।
     इस संदर्भ में श्री अरविन्द कहते हैं कि जब हम यौन ऊर्जा के संरक्षण की या ब्रह्मचर्य की बात करते हैं तब प्रश्न यह नहीं होता कि कामवृत्ति बुरी है या अच्छी, पाप है या पुण्य। यह तो प्रकृति की एक देन है। प्रत्येक मानव शरीर में कुछ द्रव्य होते हैं, ज्यों-ज्यों शरीर का विकास होता है वे संचित होते जाते हैं शारीरिक विकास की एक विशेष अवस्था आने पर प्रकृति जोर लगाने व दबाव डालने का तरीका काम में लेती है ताकि वे यौन द्रव्य बाहर निक्षिप्त कर दिए जाएँ और मानव जाति की अगली कड़ी (पीढ़ी) का निर्माण हो सके।
     अब जो व्यक्ति प्रकृति का अतिक्रमण करना चाहता है, प्रकृति के नियम का अनुसरण करने, और प्रकृति की सुविधाजनक मंथर गति से, आगे बढ़ने से संतुष्ट नहीं होता वह अपनी शक्ति के संचय-संरक्षण के लिए यत्नशील होता है, जिसे वह बाहर निक्षिप्त नहीं होने देता। यदि इस शक्ति की तुलना पानी से की जाए तो जब यह संचित हो जाती है तब शरीर में गरमी की, उष्णता की एक विशेष मात्रा उत्पन्न होती है यह उष्णता ‘तपस’ प्रदीप्त ऊष्मा कहलाती है। वह संकल्प शक्ति को, कार्य निष्पादन की सक्रिय शक्तियों को अधिक प्रभावशाली बनाती है। शरीर में अधिक उष्णता, अधिक ऊष्मा होने से मनुष्य अधिक सक्षम बनता है, अधिक सक्रियतापूर्वक कार्य संपादन कर सकता है और संकल्प शक्ति की अभिवृद्धि होती है। यदि वह दृढ़तापूर्वक इस प्रयत्न में लगा रहे, अपनी शक्ति को और भी अधिक संचित करता रहे तो धीरे-धीरे यह ऊष्मा प्रकाश में, ‘तेजस’ में रूपांतरित हो जाती है। जब यह शक्ति प्रकाश में परिवर्तित होती है तब मस्तिष्क स्वयं प्रकाश से भर जाता है, स्मरणशक्ति बलवान हो जाती है और मानसिक शक्तियों की वृद्धि और विस्तार होता है। यदि रूपांतर की अधिक प्रारंभिक अवस्था में सक्रिय संकल्प-शक्ति को अधिक बल मिलता है तो प्रकाश में परिवर्तन रूपांतर की इस अवस्था में मन की, मस्तिष्क की शक्ति में वृद्धि होती है। इससे भी आगे शक्ति-संरक्षण की साधना से ऊष्मा और प्रकाश दोनों ही विद्युत् में, एक आंतरिक वैद्युत् शक्ति में परिवर्तित हो जाते हैं जिसमें संकल्प शक्ति और मस्तिष्क दोनों की ही प्रवृद्ध क्षमताएँ संयुक्त हो जाती हैं। दोनों ही स्तरों पर व्यक्ति को असाधारण सामथ्र्य प्राप्त हो जाती है। स्वाभाविक है कि व्यक्ति ओर आगे बढ़ता रहेगा और तब यह विद्युत् उस तत्व में बदल जाती है जिसे ‘ओजस्’ कहते हैं। ओजस् अस आद्या सूक्ष्म ऊर्जा ‘सर्जक ऊर्जा’ के लिये प्रयुक्त संस्कृत शब्द है जो भौतिक सृष्टि की रचना से पूर्व वायुमंडल में विद्यमान होती है। व्यक्ति इस सूक्ष्म शक्ति को जो एक सृजनात्मक शक्ति है, प्राप्त कर लेता है और वह शक्ति उसे सृजन की व निर्माण की यह असाधारण क्षमता प्रदान करती है। (सुन्दर-जीवन)
आचार्य श्री राम जी काम वासना के सन्दर्भ में लिखते हैं-
     धन की तरह ही इस संसार में एक अनर्गल आकर्षण है- काम वासना का। यह एक ऐसा नशा है जो विचार शक्ति की दिशा को अपने भीतर केन्द्रित करता और उसे असन्तोष की आग में जलाता रहता है। यह प्रवृत्ति एक मानसिक उद्विग्नता के रूप में विचार शक्ति का महत्वपूर्ण भाग ऐसे उलझाए रहती है जिसमें लाभ कुछ नहीं, हानि अपार है। मानसिक कामुकता के जंजाल में असंख्य व्यक्ति पड़े हुए अपनी चिन्तन क्षमता को बरबाद करते रहते हैं। इसलिए महामना मनुष्य अपनी प्रवृत्ति को इस दिशा में बढ़ने नहीं देते साथ ही दृष्टिशोधन का ध्यान रखते हैं। भिन्न लिंग के प्राणी का सौन्दर्य उन्हें प्रिय तो लगता है पर अवांछनीयता की ओर आकर्षित  नहीं करता। अश्लील साहित्य, गन्दी फिल्म, उपन्यास, अर्धनग्न चित्र, फूहह प्रसंगो की चर्चा आदि के द्वारा यह कामुक प्रवृत्ति भड़कती है।

     दुर्भाग्यवश आज नर और नारी घिनौनी हरकतें करके उल्टे-सीधें वस्त्र एवं चाल-चलन अपना कर एक दूसरे के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं इससे पूरे समाज में स्वास्थ्य का संकट, मर्यादा का संकट उत्पन्न हो गया है। आवश्यकता है ऐसे जागरूक समाजसेवियों की जो इस विनाश की आँधी को रोकने में सक्षम (समर्थ) हों।

साधना समर - पातञ्जल योग दर्शन(अष्टांग योग)-5

     हे व्रतपति परमेश्वर! मैं व्रत का पालन करने की अभिलाषा करता हूँ। मुझे वह शक्ति दो, जिससे व्रत को निभा सकूँ। मैं असत्य से सत्य की ओर बढ़ना चाहता हूँ। सच्चे मन से सदुद्देश्य के लिए की गई प्रार्थना को प्रभु सुनते हैं और तदनुकूल बल और प्रकाश भी प्रदान करते हैं। यदि हमारी निष्ठा सच्ची होगी, तो परमेश्वर वह बल हमें भी अवश्य प्रदान करेंगे।
अहिंसा
     हमारे मन वचन और कर्म इस प्रकार के हों कि उससे किसी को नुकसान न पहुंचे इस भाव को अहिंसा कहते हैं। ऋषियों का उद्घोष है आत्मबल सर्वभुतेषु अर्थात् सब प्राणियों में एक ही आत्मा का वास है अथवा सबको अपने जैसा ही समझो यदि हम किसी को नुकसान पहुँचाने का प्रयास करेंगे उसकी प्रतिक्रिया वश वह नुकसान हमें भी उठाना पडे़गा। जिस समाज में अहिंसा का सिद्धांत फलता-फूलता है वहाँ खुशियाँ आती है, प्रकृति अपना प्यार उस समाज को देती है परन्तु जहाँ हिंसा होती है गाय, भैंस, बकरे, मुर्गे काटे जाते हैं प्रकृति रुष्ट होकर भूकम्प, बाढ़ों के रूप में अपना प्रकोप वहाँ बरसाती है। यह बात वैज्ञानिक भी सिद्ध कर चुके हैं कि जहाँ कत्लखानें, बुचड़खानें होते हैं वहाँ एक प्रकार की pain waves रहती हैं। ये तंरगें बढ़ते-बढ़ते सृष्टि में कम्पन, असंतुलन पैदा करती हैं।
     जो व्यक्ति मांस भक्षण करते हैं उनके भीतर भी ये pain waves जाकर उसके सूक्ष्म शरीर को विकृत करती हैं। एक समय ऐसा आता है जब व्यक्ति किसी भयानक रोग अथवा संकट में फँस जाता है अतः सुखी जीवन के लिए हम सभी को अहिंसा का मार्ग अपनाना चाहिए।
     जो लोग हिंसा के रास्ते पर चलते हों उनको समझाएँ कि वे इसका बहिष्कार करें यह भी हमारा दायित्व है। जो अपने दायित्व को भलीभाँति निभाता है परमात्मा उसकी रक्षा करते हैं। उत्तराखण्ड की त्रासदी में जहाँ हजारों लोगों की दर्दनाक मौत हुई अनेक ऐसे लोग बच भी निकले जो उसको एक चमत्कार ही मानते हैं।
     कुरूक्षेत्र के सुविस्तृत मैदान में दूर-दूर तक महाभारत युद्ध में मरे योद्धाओं की लाशें बिछी पड़ी थीं गिद्ध  और कौऐ उन्हें नोंच-नोंच कर खा रहे थे। उस घमासान के कारण सब कुछ कुचला पड़ा था। शिष्यों समेत शमीक ऋषि उधर से निकले तो इस महानाश के बीच दो पक्षी शावकों को एक गज घंटा के पास चहचहाते देखा गया। शिष्यों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने महर्षि से पूछा-भला, इस सब कुछ कुचल डालने वाले घमासान में ये बच्चे कैसे बच गए?
      शमीक ने कहा- शिष्यों, युद्ध के समय आकाश में उड़ती हुई चिडि़या को तीर लगने से वह भूमि पर गिर पड़ी और उसने दो अण्डे प्रसव किये। संयोगवश एक हाथी के गले का घंटा टूट कर अंडों पर गिरा जिससे उनकी रक्षा हो गई। अब परिपक्व होकर वे बच्चों के रूप में घंटे के नीचे की मिट्टी हटाकर बाहर निकले हैं, सो तुम इन्हें उठा लो और आश्रम में ले जाकर इनका पालन-पोषण करो। एक शिष्य ने पूछा- जिस दैव ने इन बच्चों की, ऐसे महासमर में रक्षा की क्या वह इनका पोषण न करेगा? महर्षि ने कहा- प्रिय, जहाँ दैव का काम समाप्त हो जाता है वहाँ से मनुष्य का कार्य आरम्भ होता है। दैव ने मनुष्य को दया और सामथ्र्य का वरदान इसीलिए दिया है कि उनके द्वारा दैव के छोड़े हुये शेष कार्य को पूरा किया जाए।
     यदि हमारे अन्दर अहिंसा की भावना दृढ़ हो गई है तो चाहे आसमान टूट जाएँ, धरती फट जाएँ। लेकिन जहाँ पर हम खड़े है उस स्थान पर कुछ नही बिगडे़गा अर्थात् अहिंसा की दृढ़ता होने पर पूरी सृष्टि में कोई भी नुकसान नही पहुँचा सकता। परन्तु इसके लिए हमें वैर-भाव का त्याग करना होगा, छोटी-छोटी बातों में उलझने से बचना होगा, प्राणी मात्र के प्रति आत्मीयता और सद्भाव बढ़ाना होगा, लोगों को क्षमा करना सीखना होगा। पूरे विश्व का मित्र बनकर विश्वामित्र की भूमिका में पहुँचना होगा। हम अपने मन में किसी के भी प्रति ईष्र्या-द्वेष न पालें। हमारे अन्तःकरण में कभी किसी का नुकसान देखने की इच्छा ना हो सबके प्रति प्रेम सबके कल्याण की भावना हमारे अन्दर रहें।
     इतिहास में ऐसे अनेकों उदाहरण आते हैं जब ईसा-मसीह को सूली पर लटकाया गया तो उन्होंने किसी को श्राप नहीं दिया जबकि उनके हृदय से जो भाव फूटें वो बहुत अद्भुत थे। उन्होंने कहा ”हे प्रभु! इन्हें क्षमा कर देना क्योंकि इन्हें नहीं पता कि ये क्या करने जा रहे है“ जब राम और रावण का युद्ध हुआ। रावण मृत्यु शैय्या पर था तो श्री राम ने लक्ष्मण जी को रावण से ज्ञान ले कर आने के लिए कहा। इस पर लक्ष्मण जी को आश्चर्य हुआ तो श्रीराम ने उन्हें समझाया कि यह रावण महाज्ञानी था अहंकार ने इसके ज्ञान को ढ़क लिया था। आज इसका अहंकार नष्ट हो गया है व इसके भीतर पुनः वह ज्ञान प्रकट हो गया है। अपने शुत्र के प्रति भी कितना ऊँचा भाव था उनका। किसी ने सत्य ही कहा है- "सद्भावना हम सबमें जगा दो। पावन बना दो हे देव सविता"

     हे भारत उठ, गौतम बुद्ध को याद कर, महावीर स्वामी को याद कर, ईसा-मसीह को याद कर, उनके जैसा प्रेम और करुणा से भरा अन्तःकरण अपने भीतर विकसित कर। हे भारत, विराट वट वृक्ष बन जा, और भोगवाद की अग्नि में झुलसते पूरे विश्व को अपनी शीतल छाया प्रदान कर। पूरा विश्व आज हमारी ओर देख रहा है कि हम एक बार फिर से उनको प्रेम और शान्ति का पाठ पढ़ाएँ। संकीर्णता की दीवारें टूटे पूरा विश्व एक राष्ट्र बनें। देवात्मा हिमालय का "Global citizen and one nation" का सिद्धांत फलींभूत हो उठे।

साधना समर - पातञ्जल योग दर्शन(अष्टांग योग)-4

     काश, हम महात्मा बुद्ध  की इस शिक्षा को प्रारम्भ से ही अपने जीवन में धारण कर लेते।
आरोग्यपरमा लाभा यन्तुटिठ परमं धनं।
विस्सास परमा ञति निब्वानं परमं सुखं ॥ 
     आरोग्य सबसे बड़ा लाभ है, संतोष सबसे बड़ा धन है। विश्वास सबसे बड़ा बंधु है, और निर्वाण बड़ा सुख है॥ 
     जीवन लक्ष्य निर्वाण तक पहुँचने के लिए अर्थात् समाधि तक जाने के लिए पहली सीढ़ी सत्य है। यदि हम इस सीढ़ी पर नहीं चढ़े, यदि हमने सत्य को नहीं अपनाया तो हम चाहे कितने भी पूजा-पाठ, जप-ध्यान, तीर्थ-सेवन, दान-पुण्य करें परन्तु दैव कृपा हमें  नही मिलेगी, आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो पाएगी। जप-तप की ऊर्जा हमारे अन्दर इस प्रकार के भंवर पैदा कर देगी कि हम जाल में फंसी मछली की तरह तड़पड़ते, छटपटाते रहेंगे। अतः हे भारत उठ! और सत्य पर चल कर अपनी आत्मा को सशक्त बना, अपने राष्ट्र को ऊँचा उठा।
     शास्त्रकारों ने बहुत मर्म की बात कही है-"सत्यमेव जयते"। अर्थात् जहाँ सच्चाई है वही जय है। जो व्यक्ति सच्चाई पर चलता है हँसते-हँसते परम संतोष के साथ अपने प्राण छोड़ता है, वह परमात्मा की गोदी में वर्षों विश्राम करता है। इस लोक में उसका जीवन कष्टों से भरा हो सकता है परन्तु उसका परलोक बहुत ही शांत और आनन्दमय रहता है इसके विपरीत असत्य पर चलने वाला व्यक्ति कुछ सुख-सुविधा अधिक बटोर ले परन्तु जीवन के अन्तिम वर्षों में एक प्रकार की पीड़ा व असंतोष से घिर जाता है। शरीर की शक्ति क्षीण हो जाती है, आत्मा धिक्कारने लगती है कि तेरा ये जीवन अनावश्यक ताने-बाने बुनने में ही व्यर्थ चला गया इसी पीड़ा पश्चाताप के साथ वह शरीर छोड़ता है और वर्षों नरक की अग्नि में झुलसता रहता है।
जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान् महावीर का कथन है-
     "सदा सावधान और प्रमादरहित होकर सत्य का पालन करें। संसार के सभी सत्पुरुषों ने असत्य को निंदित ठहराया है। क्रोध में, भय में, हास्य-विनोद में भी असत्य भरे पाप वचन न बोलें। खूब सोच-विचार कर परिमित ही बोलना चाहिए, ताकि असत्य का उच्चारण न हो। आत्म कल्याण के इच्छुक साधक को परिमित, असंदिग्ध, परिपूर्ण, स्पष्ट, वाचलतारहित और किसी को पीड़ा न पहुँचाने वाली सत्य से युक्त मधुर-वाणी ही बोलनी चाहिए।"
श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे-
     "कलियुग की तपस्या सत्य भाषण है। सत्य के बल से भगवान् को प्राप्त किया जा सकता है। असत्य को अपनाने वाले मनुष्य का धीरे-धीरे सर्वनाश ही हो जाता है।"
स्वामी रामतीर्थ का कथन है-
     "चाहे सारी दुनिया भी तुम्हारे विरुद्ध होती हो, तो भी तुम सत्य पर आरूढ़ रहो। सत्य बहुत ही मूल्यवान है, उसे प्राप्त कर सको तो ब्रह्म की प्राप्ति सहज है। सत्य के लिए यदि अभावग्रस्त जीवन अपनाना पड़े, सांसारिक कामनाओं और महत्त्वाकांक्षाओं से विमुख होना पड़े, कुटुंबी और रिश्तेदारों को नमस्कार करना पड़े, यहाँ तक कि चिर-पोषित अन्य विश्वासों को भी छोड़ना पड़े तो उन्हें छोड़ देना ही उचित है यह सत्य के साक्षात्कार का मूल्य है। जब तक उस मूल्य को न चुकाया जायेगा-सत्य की उपलब्धि न हो सकेगी।"
श्री अरविंद की अनुभूति है-
     "सच्चाई समस्त सच्ची प्राप्तियों का मूल आधार है। यही साधन, मार्ग और लक्ष्य है। सच्चे बनने पर तुम दिव्य जीवन से संबंधित हो सकोगे।"
महात्मा गाँधी ने कहा है-
     "परमेश्वर का सच्चा नाम ‘सत्’ अर्थात् सत्य है। इसलिए परमेश्वर सत्य है, यह कहने की अपेक्षा ‘सत्य ही परमेश्वर है’-यह कहना अधिक अच्छा है। सत्य की आराधना के लिए ही हमारा अस्तित्व है, इसी के लिए हमारी प्रत्येक प्रवृत्ति और इसी के लिए हमारा श्वासोच्छवास होना चाहिए। साधारणतया सत्य का अर्थ सच बोलना मात्र समझा जाता है, परंतु विचार में, वाणी में और आचार में सत्य का होना ही सत्य है। इस सत्य को पूर्णतया समझने वाले के लिए जगत् में और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता। सत्य को परमेश्वर मानना मेरे लिए अमूल्य धन रहा है। मैं चाहता हूँ कि यही हममें से सबके लिए हो।"
आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने लिखा है-
     "सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग के लिए सर्वदा उद्यत रहना चाहिए। सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य का विचार कर करने चाहिए। जो भक्त उपासना का अभ्यास करना चाहे उसके लिए उचित है कि वह किसी से बैर न रखें। सबसे प्रीति करें। सत्य बोलें। मिथ्या कभी न बोलें। चोरी न करें। सत्य का व्यवहार करें। जितेंद्रिय हों, लंपट न हों, निरभिमानी हों। राग-द्वेष छोड़ भीतर-बाहर से पवित्र रहें।"
     भक्त-संतों ने भी ईश्वर उपासना में सत्य को ही प्रारंभिक एवं आवश्यक साधन माना है।
कबीर कहते है-
     साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
     जाके हृदय साँच है, ताके हृदय आप।
     हरि का मिलन सहज है, जो दिल साँचा होय।
     साँई के दरबार की, राह न रोके कोय॥ 
 संत दादू दयाल का वचन है-
     सीधा मारग साँच का, साँचा होय सो जाय।
     झूठे को कुछ ना मिले, दादू दिया बताय॥ 
     दया धर्म का रूखड़ा, सत् से बढ़ता जाय।
     संतों को फूलै फलै, वही अमर फल खाय॥ 
 भक्त पलटूदास की उक्ति है-
     पलटू पकडे़ साँच को झूठे से रह दूर।
     दिल में आवे साँच तो साहब हाल हजूर॥ 
रामायण में सत्य की महत्ता प्रकट करने वाली अनेक चैपाइयाँ हैं-
     (1)   सत्य मूल सब सुकृत सुहाये।
           वेद पुराण विदित मनु गाये (राम चरितमानस 2.28/3)
     (2)   नहिं असत्य सम पातक पुंजा।
           गिरी सम होंहि कि कोटिक गुंजा॥  (राम चरितमानस 2.28/3)
     (3)   तनु तिय तनय धाम धन धरनी।
           सत्यवंत कहूँ तृन सम बरनी॥  (अयोध्या कांड 34/4)
     यदि अपने पैर सत्य को अपनाने में लड़खड़ाते हों, साहस न होता हो, आंतरिक दुर्बलताएँ हताश करती हों तो भी निराश नहीं होना चाहिए। समस्त बलों के केंद्र उस परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह सत्य व्रत पालन करने से हमें साहस, बल, धैर्य, निष्ठा और इस मार्ग में जो कष्ट आयें, उन्हें सहन करने की क्षमता प्रदान करें। वेद में एक ऐसी ही प्रार्थना आती है-
           अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयम्।

           तन्मे राध्यतां इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि॥       -युज.  

साधना समर - पातञ्जल योग दर्शन(अष्टांग योग)-3

     हमारी विडम्बना यह है कि हम झूठ कपट में डूबे रहते हैं Luxurious life जीना चाहते हैं, पसीना नहीं बहाते, श्रम से जी चुराते हैं। कोई रोग आता है तो आसन, प्राणायाम करके ठीक करना चाहते हैं। जब तक आधारभूत सिद्धांतों पर व्यक्ति नहीं चलेगा उसको कष्टों, रोगों से मुक्ति नहीं मिलेगी। यदि हमने ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया व कपाल-भाति ज्यादा लगा लिया तो यह हमारे लिए खतरनाक भी सिद्ध हो सकता है। व्यक्ति के लोकिक जीवन के पश्चात् आध्यात्मिक जीवन की बारी आती है। जो व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति करना चाहते हैं उन्हें पाँच नियमों पर चलना होगा-शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर प्राणिधान।
सत्य ऋषि पतंजलि सत्य को सर्वोपरि महत्व देते हैं। गाँधी जी बचपन में बड़े दुर्बल व कायर व्यक्ति थे। हरिश्चन्द्र का नाटक देख उन्होंने सत्य और अहिंसा पर चलना प्रारम्भ किया और वो एक आत्मबल सम्पन्न महामानव बन सके। उन्होंने अपनी जीवनी का नाम भी ‘मेरे सत्य के साथ प्रयोग’ (my experiments with truth) दिया है। सत्य का सामान्य अर्थ है सच्चाई के मार्ग पर चलना (follow the righteous path) अर्थात् सही बात अपनाना। क्या सही है क्या गलत? यह व्यक्ति को अपने विवेक से पता चलता है अथवा उसकी आत्मा उसको इस बात का बोध अवश्य कराती है।
     लोग कहते हैं कि समाज झूठ के रास्ते पर चलकर पनप रहा है जो सच्चाई पर चल रहे हैं वो दुःख कष्ट उठा रहे हैं। ये सब उथली (surface level) मान्यताएँ है। जो परिश्रम नही करना चाहते, बुद्धिमान नहीं हैं अथवा प्रारब्ध वश जिनको सफलता नहीं मिलती वो भी यह कहने लगते हैं कि हम सच्चाई के कारण सफल नहीं हो पाए लेकिन पीछे खोजने पर कारण कुछ और मिलते हैं। कुछ लोग श्री कृष्ण जी का उदाहरण देने लगते हैं कि उनको भी असत्य का सहारा लेना पड़ा। इस विषय में यह ही कहना चाहूँगा कि अपवाद स्वरूप कभी-कभी परिस्थितिवश झूठ का सहारा लेना उचित होता है। जैसे यदि गाय के पीछे कसाई लगा है और बलपूर्वक आप उसको नहीं रोक पा रहे हैं तो असत्य बोलकर गाय की जान बचाइये। अपने लिए असत्य का सहारा नहीं लिया, स्वार्थ वश ऐसा नहीं किया अपितु निरीह प्राणी की रक्षा के लिए जो झूठ बोला उससे पाप और पुण्य दोनों का उदय हुआ। जो पाप था, वह बहुत छोटा था; गाय की रक्षा कर जो पुण्य मिला, वह बहुत बड़ा। अतः बड़े लाभ के लिए छोटी-मोटी हानि सहनी पड़ती है। अच्छा तो यह होता कि हम कसाई को बलपूर्वक रोक देते परन्तु यदि ऐसा सम्भव नहीं है तो दूसरा रास्ता अपनाना पड़ा। महाभारत के युद्ध में भी भगवान् श्री कृष्ण ने यही सीख दी कि अपनी नीयत सत्य के लिए दृढ़ रखो परन्तु यदि कभी-कभी मजबूरी हो तो असत्य का सहारा भी लेना पड़ सकता है।
     यह ठीक ऐसा है जैसे हम किसी के यहाँ गए मजबूरी वश भारी भोजन किया तो पेट दर्द से बचने के लिए हमने कुछ हल्का एल्कोहल (झण्डु पंचारिष्ट) ले लिया तो वह लाभप्रद ही रहेगा। परन्तु यह यदि रोज लिया जाने लगे, स्वभाव का एक अंग बन जाए तो यही हमारे लिए हानिप्रद हो जाएगा।
     सत्य पर चलने की जगह यदि हम जीवन में झूठ-कपट को स्थान देने लगें, रोज दूध में पानी मिलाने लगें, आफिस में बैठकर रिश्वत लेने लगें तो यह हमारे अपने व समाज के लिए बहुत घातक हो जाएगा। जो सत्य का आश्रय लेते हैं वो ठीक निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं क्योंकि पूरी प्रड्डति उनको सही मार्ग (guidance) देती है। यदि आप सही-सही चल रहे हैं तो न्यूटन के नियमानुसार आपको सब कुछ सही-सही मिलेगा। आपको सही जीवन साथी मिलेगा सही नौकरी मिलेगी, सही जगह जन्म मिलेगा। बहुत से लोग दूसरों से पूछते हैं कि नौकरी करें या व्यापार, संशय में रहते हैं। जो व्यक्ति सत्य पर चलता है उसकी आत्मा ही उसको सही बात बताने में समर्थ होती जाती है।
     एक बार एक व्यक्ति किसी गम्भीर बीमारी में फंस गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह PGI Chandigarh दिखाए या IMS,Delhi दिखाए या गंगा राम में अपना ईलाज करवाए। बड़ी उलझन उसके दिमाग में चल रही थी। यदि व्यक्ति ने जीवन में अधिकतर सच्चाई को चुना है तो इस विषम समय में उसकी आत्मा उसका सही मार्गदर्शन करेगी। इस प्रकार हम देखते हैं कि सच्चाई के रास्ते पर चलने से हमें छोटी-मोटी कठिनाईयों का सामना करना पड़ सकता है परन्तु हमारी आत्मा इतनी सशक्त हो जाती है कि हम हर परिस्थिति में सही निर्णय ले पाते हैं व बड़ी मुसीबतों से भी अपने को बचा ले जाते हैं।

     आजादी से पूर्व हमने बहुत कुछ खोया, हमारे अन्दर बहुत कमियाँ थी जैसे जाति-भेद, लिंग-भेद, सती-प्रथा आदि परन्तु उस समय आम आदमी सच्चाई के रास्ते पर चलना पसन्द करता था इस कारण हम राष्ट्र पर आए बड़े-बड़े संकटों से अपने आप को उभार ले गए आज बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हमारे देश की जनता का बहुत बड़ा भाग स्वार्थवश सच्चाई से हटता चला जा रहा है। पद-प्रतिष्ठा, धन-वैभव ने हमको अंधा कर दिया है। ठीक है हमको अच्छी सुख-सुविधाएँ मिल जाएँगी परन्तु अपनी आत्मा का हनन करके हम कभी भी सुखी नहीं रह पाएँगे। ठीक है बड़े-बड़े अस्पताल भी होंगे; बड़ा बैंक बैलेंस भी होगा परन्तु Diabetes, Cancer, Nervous-Disorder जैसी कष्ट दायक और असाध्य बीमारियाँ भी हमारे सामने एक चुनौती बन कर खड़ी हो जाएँगी। उस समय हमें बड़ा भारी पश्चाताप् होगा कि यह हम क्या कर बैठे जिस सुख के चक्कर में हमने धोखाधड़ी और भ्रष्ट रास्ता अपनाया वह तो पता नही मिला या नही मिला हाँ दुःखों का एक सैलाब हमारे ऊपर अवश्य टूट पड़ा।

साधना समर - पातञ्जल योग दर्शन(अष्टांग योग)-2

     परंतु योग के अभ्यास से बुद्धि  प्रज्ञा में परिवर्तित, रूपांतरित हो जाती है। तब उसे प्राप्त होता है-प्रकाश, मानो कि बुद्धि नेत्रहीन से नेत्रवान हो गई हो। हाँ, ऐसी स्थिति में बुद्धि में दृष्टि आती है। यानी कि देखने की क्षमता। दोनों में अंतर बस, अंधे और देख सकने वाले का होता है। अंधा केवल टटोल सकता है, यानी कि अनुमान, तर्क, विश्लेषण, विवेचन, व्याख्या से काम चलाता है। ये सभी प्रक्रियाएँ टटोलने की हैं जबकि देखने वाले को टटोलने की कोई जरूरत नहीं है, वह सीधे देख सकता है। बात दृष्टि की है, देख पाने की शक्ति की है, योगी की यह शक्ति है प्रज्ञा का प्रकाश। यह कुछ ऐसे कार्य करता है, जैसे कि हमारे हाथ में ली हुई टॉर्च। टॉर्च के स्विच को ऑन करके इसके प्रकाश को हम जहाँ भी प्रक्षेपित करते हैं, हमें वहीं की चीजें दिखाई देने लगती हैं। बस, इसी तरह यदि संयमसिद्ध योगी किसी पदार्थ की आणविक संरचना देखना चाहे तो वह उसे देख सकता है। औषधियों के सूक्ष्म गुणों को वह आसानी से पहचान सकता है। योगी की यह प्रकाशित प्रज्ञा इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप से भी कहीं अधिक क्षमता से कार्य करती है। जिस तरह से वह सूक्ष्म चीजें देख सकता है, ठीक उसी तरह से वह छिपी हुई चीजें भी देख सकता है। धरती में दबे हुए खनिज, खजाने, समुद्र में छिपे हुए प्राकृतिक  सत्य-ये सभी योगी अपनी प्रकाशित प्रज्ञा से देख सकता है। इतना ही नहीं इस प्रक्रिया से शरीर व मन की आंतरिक बीमारियाँ पहचानी जा सकती है। न केवल इतना भर, बल्कि वहाँ प्रकाश व प्राण भेजकर इनका निवारण-निराकरण भी किया जा सकता है।
    ऋषि पतंजलि ने अपने योग दर्शन एवं साधना विषयक अनुशासन को चार भागों 1. समाधि पाद 2. साधन पाद 3. विभूति पाद और 4. कैवल्य पाद में विभक्त किया है जिनमें क्रमशः 55, 51, 55 एवं 34 अर्थात् कुल 195 सूत्र है। समाधिपाद के प्रथम दो सूत्र बहुत सार गर्भित है।
अथ योगानुशासनम् ॥ सूत्र 1 ॥  
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ सूत्र 2 ॥ 
     पहला सूत्र कहता है-अब योग के अनुशासन का प्रारम्भ होता है अर्थात योग साधना एक प्रकार का अनुशासन है जिसको जीवन में पालन करना होता है दूसरा सूत्र कहता है-योग से चित्त भी वृत्तियों का निरोघ होता है अर्थात यदि योग के अनुशासन का ठीक से पालन करें तो चित्त की वृत्तियाँ शान्त हो जाती है। इसके स्पष्ट होता है कि योग साधना चित्त के परिष्कार के लिए है। व्यक्ति के मन में जो हलचल है वह चित्त के संस्कारों के कारण है। साधना के द्वारा अन्तर्मुखी होकर उन संस्कारों को काटना होता है। यह कार्य लिखने कहने में जितना सरल है परन्तु वास्तव में है बहुत कठिन। उदाहरण के लिए अनेक जन्म की भोग-वृत्ति के कारण निर्मित संस्कार मनुष्य को सदा भोगों की ओर ही आकर्षित करते रहते है। चित्त की वृत्तियाँ कितने प्रकार की होती है तथा उन्हें कैसे रोका जाए यह विज्ञान ही योग शास्त्र में वर्णित  है।
अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः ॥  सूत्र 12 ॥ 
अर्थात अभ्यास और वैराग्य से चित्त वृत्तियों का निरोध सम्भव है।
     साधक पाद में अष्टांग योग का वर्णन किया गया है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान समाधि ये थोड़ा के आठ अंग बताए गए है।
     ऋषि पतंजलि अपने योग दर्शन में सर्वप्रथम पाँच यम व पाँच नियमों का वर्णन करते हैं। सृष्टि के संचालन व विधि व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिन अनुशासनों का पालन कठोरता-पूर्वक करना होता है उन्हें यम कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार यम सृष्टि को सन्तुलित व नियन्त्रित करने वाले देवता हैं। यदि यम की उपेक्षा प्रारम्भ हो गयी तो विनाश हो जाएगा, धरती पर जीवन का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। अतः किसी भी प्रकार का व्यक्ति हो यम सबके लिए अनिवार्य (mandatory) है अन्यथा जीवन में दुर्गति होगी। यम के अन्तर्गत पाँच बातें आती हैं। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह एवं अस्तेय (non - stealing)।

     यदि हम सच बोलना छोड़ते रहे तो पूरे विश्व में कोई एक दूसरे पर विश्वास ही नहीं करेगा सब जगह धोखाधड़ी होने से जीवन संकटों से भर जाएगा। यदि हमने अहिंसा को महत्त्व नहीं दिया तो चारों ओर मार काट मच जाएगी। इसी प्रकार यदि ब्रह्मचर्य के प्रति श्रद्धा नहीं रही तो चारों ओर कामुकता फैल जाएगी और जीवनी शक्ति का ह्यास हो जाएगा। इसी प्रकार धरती के संसाधन (resources) सीमित हैं। यदि एक व्यक्ति जरूरत से ज्यादा उपभोग करेगा तो दूसरा भूखा मरेगा। इसलिए आवश्यकतानुसार सीमा के भीतर सामान प्रयोग करें। जैसे यदि लकड़ी, जल आदि को अनावश्यक बरबादी करेंगे तो संकट खड़ा हो जाएगा। अतः सुखी रहने के लिए आवश्यकताएँ कम करें। इस मानसिकता (philosophy) को अपरिग्रह कहते है। अस्तेय का अर्थ है हक-हलाल की कमाई करें। किसी दूसरे के माल पर अपनी नीयत न खराब करें।


साधना समर - पातञ्जल योग दर्शन(अष्टांग योग)-1

किसी भी आध्यात्मिक गतिविधि के दो पक्ष होते हैं एक क्रियापक्ष तथा दूसरा भावपक्ष। जैसे प्राण के बिना शरीर का मूल्य नहीं होता वैसे ही भावपक्ष के बिना क्रियापक्ष बेजान रहता है। परन्तु व्यक्ति मात्र क्रियापक्ष अथवा कर्मकाण्ड में ही उलझा रहता है व भावपक्ष को नहीं अपनाना चाहता। यदि हम भारत के योग के सन्दर्भ में बात करें तो इसका भावपक्ष है महर्षि पतंजलि का योगदर्शन एवं यदि क्रियापक्ष देखें तो वह मत्स्येन्द्रनाथ व गोरखनाथ जी द्वारा दिया हुआ हठ योग।
     समाज में जो योग अथवा योगा के नाम से प्रचलित है वह बहुत ही छोटा पक्ष है जिसमें कुछ शरीर की क्रियाएँ व कुछ श्वास-प्रश्वास की क्रियाएँ आती है। जनता इनके लाभों से ही सुखद अनुभव करती है व अपने सभी रोगों व समस्याओं के समाधान खोजती है। परन्तु यह पक्ष छोटी-मोटी बीमारियों समस्याओं में लाभप्रद हो सकता है।
     यदि कोई व्यक्ति समस्याओं का जड़ से निबटारा करना चाहें अथवा अपनी आध्यात्मिक उन्नति करना चाहें तो उसे योग के सभी पक्षों को विस्तार से अध्ययन व हृदयंगम करना पडे़गा। व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक उन्नति क्यों करना चाहता है इसका बड़ा स्पष्ट उत्तर है- मानव प्रकृति के बन्धनों में बंधा तड़फ रहा होता है। दैहिक, दैविक, भौतिक तापों से त्रस्त रहता है। इसलिए जगत को दुःखरूप कहा गया है। परन्तु यदि व्यक्ति अपने प्रारब्धों को काटकर एक सीमा तक आध्यात्मिक उन्नति कर ले तो यही जगत् व्यक्ति से लिए आनन्दरूप बन जाता है। प्रत्येक व्यक्ति यही चाहता है कि वह आनन्दमय बन सके, निरोग रह सके, जगत् के सत्य से परिचित हो सके। महात्मा बुद्ध कहते हैं कि मानव जीवन का लक्ष्य निर्वाण प्राप्त करना है, अर्थात् एक ऐसी स्थिति या अवस्था पाना जिसमें पहुँचकर सम्पूर्ण दुःखों से निवृत्ति हो जाती है। शास्त्र कहते हैं जीवन का लक्ष्य है मोक्ष, अर्थात् सत, चित्त, आनन्द की प्राप्ति। यह तभी सम्भव है जब चित्त की वृत्तियों का निरोघ सम्भव हो सके। मानव स्वयं में आनन्दमय है परन्तु चित्त की वृत्तियाँ (वासना, तृष्णा, अहंता) उसे इधर-उधर भटकाती रहती हैं। अब देखते हैं कि चित्त वृत्तियों के निरोघ के लिए योग क्या ज्ञान विज्ञान है?
     अध्यात्म के कुछ मूलभूत सिद्धांत हैं। योग ग्रन्थ, उपनिषद, भागवद् गीता सभी शास्त्र तरह-तरह से मनुष्य को उसी दिशा में ले जाने का प्रयास करते हैं। यदि हम सरल शब्दों में कहें तो हमें तीन बातों का जीवन में ध्यान रखना होगा- निःस्वार्थता, पवित्रता एवं भगवान् को समर्पण अर्थात् हम निःस्वार्थी बने, पवित्र बने एवं ईश समर्पित जीवन जीने का प्रयास करें। जो जितना इस दिशा में प्रगति करेगा उतना अपनी आत्मिक उन्नति करता चला जाएगा। इसमें भी सबसे पहला सिद्धांत (निःस्वार्थ) सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। जैसे-जैसे व्यक्ति निःस्वार्थ होगा, अल्प प्रयास से पवित्र होता जाएगा। धीरे-धीरे उसमें ईश्वर के प्रति समर्पण का भी उदय होगा।
     कहते है विज्ञान परमात्मा के अस्तित्व को नहीं मानता। परन्तु विश्व के बड़े निःस्वार्थ वैज्ञानिक प्रभु की सत्ता को स्वीकार करते रहे हैं। हो सकता है अपने जवानी अथवा शोध के प्रारम्भ में ईश्वर को न मानते हो! परन्तु अनुभव बढ़ने पर उन्होंने किसी सर्वोपरि सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार किया है। उदाहरण के लिए अल्बर्ट आइंसटीन जब भी जहाज आदि में सफर करते थे एक माला अपने साथ रखते थे व जप करते थे। एक बार बर्लिन हवाई अड्डे पर वो जहाज में बैठे व अपनी माला निकालकर जप करने के तैयार हुए। समीप बैठे युवक ने उनको टोका कि वो इन रूढि़वादी परम्पराओं का घोर विरोधी है वह एक ऐसे दल का नेतृत्व करता है जो लोगों को इन बातों से हटाकर वैज्ञानिक उन्नति करने की प्रेरणा देता है। इतना कहकर युवक ने अपना कार्ड उनकी ओर बढ़ाया। आइंस्टीन ने उससे पूछा आप किस वैज्ञानिक को अपना आदर्श मानते हो तो युवक ने तपाक से उत्तर दिया, ‘अल्बर्ट आइंस्टीन को’। यह सुनकर आइंस्टीन महोदय ने अपना कार्ड युवक की ओर बढ़ाया व उसे समझाया-अध्यात्म और विज्ञान दोनों ही सत्य की खोज में जुटे हैं। विज्ञान के साथ-साथ अध्यात्म भी बहुत जरूरी है अन्यथा अकेला विज्ञान विश्व के लिए विनाशकारी भी सिद्ध हो सकता है।
     कहने का तात्पर्य है कि लगभग सभी बड़े वैज्ञानिक निःस्वार्थ रहे है। बहुत बड़े स्तर पर व्यक्ति तब ही पहुँच सकता है जब वह स्वार्थी न हों। लोभी व्यक्ति तो माया के चक्कर में इधर-उधर भटकता रहता है। जो लोग पैशन (passion) के लिए काम करते हैं पैसे के लिए नहीं, वही कुछ आश्चर्यजनक कार्य करने में सक्षम होते हैं।
     भारत की भूमि सदा से ही त्यागी-तपस्वी लोगों की भूमि रही है। यहाँ ऋषि , मुनि, योगी सदा से ऊँचे आदर्शों से भरा निःस्वार्थ जीवन जीते आ रहे हैं। परन्तु आज के लोगों का घटिया जीवन देखकर बड़ी शर्म आती है और यह सोचने को मजबूर करती है कि ‘क्या हम उन्ही के वंशज हैं?’ भेड़ों के झुण्ड में भटके शेर के बच्चे अपने को भेड़ मानने लगते हैं। मुगलों, अंग्रेजों के आक्रमण के बावजूद व पश्चिम के भोग-विलास की आँधी में आज भी हम अपना अस्तित्व बचा कर रखने में समर्थ हैं। इतना ही नहीं पूरे विश्व को ज्ञान दान एवं उनकी कायापलट कर सकते हैं। अब वो समय आ गया है जब एक नहीं हजारों विवेकानन्द इस देश की धरती पर अवतरित हो चुके हैं। धीरे-धीरे वो अपने असली स्वरूप को पहचान रहे हैं।
     शास्त्रों के अनुसार इस संसार में दो प्रकार का ज्ञान है एक अपरा व दूसरा परा ज्ञान। सामान्य भाषा में कह सकते हैं स्थूल प्रकृति व सूक्ष्म प्रकृति का ज्ञान। तकनीकी अथवा भौतिकी विज्ञान स्थूल जगत् के नियमों की व्याख्या करता है जबकि योग दर्शन में ऋषि-मुनि सूक्ष्म जगत के नियमों की शोध एवं व्याख्या करते हैं। 
     यदि हम स्थूल जगत् के नियमों को तोड़ने लगें तो हम घोर विपत्ति में फंस सकते हैं। इसी प्रकार यदि जाने-अनजाने हम सूक्ष्म जगत् के नियमों की अवहेलना करते रहें तो जीवन में अनेक कठिनाईयों के पहाड़ टूट पड़ते हैं। भौतिक इच्छाओं के चलते हम सूक्ष्म जगत् के नियमों को समझना नहीं चाहते इसी कारण आज चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है।

     जैसे यदि हमें स्थूल जगत के नियमों का पता न हो तो उसे भी विज्ञान का चमत्कार कह देते हैं। इसी प्रकार क्योंकि हमें सूक्ष्म जगत के नियमों का पता नहीं होता ऐसी ही हम सिद्ध पुरुषों के क्रियाकलापों को चमत्कार कहते हैं। यदि हम सूक्ष्म जगत् (seattle world) के Lanes को follow करने लगे तो वह चमत्कार हमारे जीवन में भी घटित होने लगेंगे। बहुत पुरानी घटना है एक बार एक पादरी छत्तीसगढ़ के कुछ आदिवासी लोगों के पास गए। उन्होंने सोचा कि इन भोले-भाले लोगों को कुछ चमत्कार दिखाकर अपने मत में परिवर्तित किया जाए। इसके लिए उन्होंने आदिवासियों से कहा-"तुम सबने कभी ऐसे व्यक्ति को देखा है, जो अपने सारे दाँत निकालकर फिर से उन्हें मुँह में लगा दे।" इस पर सभी एक स्वर से बोले-"नहीं।" तब उन पादरी महोदय ने अपने मुँह से बत्तीसी निकाली और फिर से उन सबको दिखाते हुए वापस लगा ली।         आदिवासी उनकी इस बात से चकित व चमत्कृत हुए, लेकिन पादरी महोदय यह केवल इसलिए कर सके, क्योंकि उनकी वह बत्तीसी नकली थी। इसके बाद उन्होंने उनसे फिर से पूछा-"क्या तुमने किसी छोटे से डिब्बे को गाते हुए सुना है?" उत्तर में फिर सभी ने एक स्वर से कहा-"नहीं।" इस पर पादरी महोदय ने अपने ट्रांजिस्टर का स्विच ऑन किया और वहाँ पर सुरीला संगीत गूँजने लगा। आदिवासी इससे अतिशय चमत्कृत हुए जबकि वास्तविक रूप से यह कार्य तो ध्वनि ऊर्जा के निमयों के अनुसार ही संपन्न हो सका। इस घटनाक्रम को सुनाते हुए युग-ऋषि श्रीराम ‘आचार्य’ का कहना था कि सृष्टि में कहीं किसी तल पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जो प्रकृति के नियमों के अनुरूप न हो। इन नियमों के विपरीत किसी घटनाक्रम का घटित होना संभव ही नहीं। ऐसी बातें न केवल अवैज्ञानिक हैं, बल्कि इनका आध्यात्मिकता से भी कोई मतलब नहीं।