Tuesday, August 12, 2014

हनुमान जी व सुरसा का शिक्षाप्रद प्रंसग

     हम सभी ने रामायण का या प्रंसग सुना होगा कि जब हनुमान जी समुद्र लांघ रहे थे तो सुरसा नामक राक्षसी उनको खाने के लिए ललकारने लगी। हनुमान जी छोटा रूप कर समुद्र लांघ रहे थे। तुरन्त हनुमान जी ने अपना आकार बढ़ाया जिससे सुरसा उनका भक्षण न कर सके। सुरसा ने अधिक बड़ा मुख खोला, हनुमान जी ने उससे बचने के लिए अधिक बड़ा शरीर धारण किया। सुरसा ने उससे बड़ा मुख बनाया। हनुमान जी ने उससे विनती की कि अभी उन्हें जाने दिया जाय क्योंकि वो बहुत महत्वपूर्ण कार्य से जा रहे है जब सुरसा नहीं मानी तो उन्होंने अति लघु रूप धारण कर उससे मुख में प्रवेश किया व तुरन्त बाहर निकल आए। सुरसा अपने असली रूप में आ गयी व उन्हें आशीर्वाद दिया कि उनमें बल के साथ-साथ विवेक भी बहुत है अतः उन्हें अनके प्रयोजन में सफलता मिलेगी। सुरसा ने उन्हें बताया कि वो केवल उनकी परीक्षा लेने आयी थी।
     सुरसा नामक बाधा, कष्ट कठिनाई अथवा परीक्षा हम सभी के जीवन में आती है। इस दुनिया में दो तरह के लोग है- एक वो जिनके जीवन का उच्च आध्यात्मिक लक्ष्य है, ऐसे लोग बहुत कम है। दूसरे वो जो अपने पद प्रतिष्ठा, मान सम्मान, घर परिवार व धन संचय तक सीमित हैं। व्यक्ति जब भी उच्च लक्ष्य पर चलता है तो सुरसा नामक बाधाएँ उसके जीवन में बहुत आती है। उससे ऐसे लोग टकराते रहते है जो व्यर्थ में उसका रास्ता रोकने का प्रयास करते है। ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति के पास दो मार्ग हैं या तो दूसरे अंह के साथ टकराने में अपनी शक्ति व्यर्थ करता रहें या फिर दूसरे के अंह को बड़ा रख स्वयं छोटा बन वहाँ से निकल जाए। यदि हम दूसरों के अंह से टकराने रहेंगें तो हमारा शक्ति व समय का बड़ा भाग इसी उलझन में व्यर्थ होता रहेगा। कभी-कभी तो ऐसा होता है कि जिस लक्ष्य को लेकर हम चले थे वह पीछे छूट जाता है और आपसी टकराव व एक दूसरे से बदला लेने की भावना हमारे दिलोदिमाग पर हावी होती चली जाती है। भारत में अनेकों धार्मिक सामाजिक संस्थाएँ है इनमें अधिकांश श्रेष्ठ प्रयोजन के लिए समर्पित थी लेकिन आज अधिकांशत भीतरी अन्र्तकलह से जूझ रही है कही-कही यह विवाद इतना बढ़ जाता है कि जनता के समुख भी प्रकट हो जाता है कि संस्था के दो टुकडे़ हो गए अथवा एक ग्रुप को काबू करने के लिए पुलिस प्रशासन को हस्तेक्षप करना पड़ा।
     अन्यथा यह विवाद भीतर ही भीतर सुलगता रहता है। यह विवाद उन संस्थाओं में अधिक होता है जहाँ महत्वपूर्ण पदों पर rotation नहीं होता व कुछ तथाकथित लोग अपने को अधिक योग्य समझकर कुर्सी पर कब्जा जमाए रहते है। मानव जीवन में अपने बड़े लक्ष्य को पाने के लिए व्यक्ति को छोटे-छोटे विवादों में अधिक ऊर्जा खर्च न करने की कला सीखनी चाहिए। यह तभी सम्भव है जब हमें अपने व्यक्तिगत अंह को नियन्त्रित करना आ जाए। अन्यथा क्या होगा? एक सेना (जैसे श्री कृष्ण की यादव सेना) बहुत बलवान थी दुश्मन से लड़ने चली। परन्तु मार्ग में उनमें छोटी बातों को लेकर आपस में विवाद बढ़ गया जैसे यह मार्ग जाने के लिए अधिक उपयुक्त है यह युद्ध नीति अधिक श्रेष्ठ है आदि-आदि ‘अच्छा मेरी बात नहीं सुनी गयी, मुझे अधिक महत्व नहीं दिया गया, में क्यों तुम्हारा सहयोग कँरू।’ विवाद इतना बढ़ा इतना बढ़ा कि सेना में दो गुट हो गए ओर आपस में टकराव प्रारम्भ हो गया। शत्रु सेना से तो क्या युद्ध करेंगो आपस में ही लड़ मरें।
     जो व्यक्ति यह कला नहीं सींख पाते आस पास के घर परिवार, नौकरी, व्यापार के छोटे-छोटे विवाद उनको पथ भ्रष्ट कर देते हैं। ऐसा व्यक्ति कभी सफल जीवन नहीं जी पाता या जीवन में कोई महत्वपूर्ण कार्य करने में सफल नहीं हो पाता। इस पं्रसग के माध्यम से समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि अनावश्यक वाद विवादों में न स्वयं को उलझाया जाए। यदि सामने कला मूर्ख, नीच व बलवान है तो स्वयं को छोटा बना कर वहाँ से बचने का प्रयास करो। लड़ाई को अन्तिम विकल्प के रूप में सामने रखो। यदि दूसरा किसी भी प्रकार से आपको मार्ग नहीं दे रहा है फिर तो लड़ना ही पडे़गा।

     यदि हम हनुमान जी की तरह विवेक का प्रयोग कर छोटा रूप धारण करना सीख जाँए तो 90 प्रतिशत विवादों में बिना लड़े ही काम चल जाएगा, बहुत ही थोड़े cases में हमें लड़ना पडे़गा। हर जगह यदि उलझते रहें तो एक दिन यह बहुमूल्य जीवन में ही हाथ से निकल जाएगा ओर अनेक प्रकार के रोग, मानसिक अशान्ति व पश्चाताप ही हाथ आएगा। हनुमान जी व सुरसा का प्रंसग कैसे तो देखने में एक सामान्य बात लगती है परन्तु जीवन प्रबन्धन (Life Management) का एक गहरा सूत्र हमें समझाता है।     

Friday, August 8, 2014

संत ज्ञानेशवर का आत्मनिर्माण Part - 5

            मुक्ता ने पाॅंचवी बार द्वार खटखटाया। फिर अगला अभंग गाया-
            संत उसे कहते हैं जग में, दया क्षमा है जिसके मन में।
            लोभ अहंता निकट न आवै, वह विरक्त साधु कहलावै।
            सदा नाम लेता ईश्वर का, मार्ग प्रशस्त कर आगे बढ़ता।
            मिथ्या श्रम तुम छोड़ दो भाई, सत्य मार्ग पर चलो।
            खोलो किवाड़ भईया मेरे, मुझ पर थोड़ी कृपा करो।।
            भावार्थ- भईया, आप और निवृत्ति भईया ही तो कहते हैं कि संत वही है, जिसके हृदय में करुणा और क्षमा भाव है! लोभ और अहंकार जिसके निकट नहीं आता, वही सच्चा साधु, विरक्त वैरागी कहलाता है। ऐसा महात्मा सदा परब्रह्म के आदि-नाम का सुमिरन करता रहता है। इधर-उधर की बातों या व्यवहारों में नहीं उलझता। वह तो इस लोक में और परलोक में अपने लिए दिव्य राहें बनाता रहता है। इसलिए भईया, आप भी किसी तरह का व्यर्थ चितंन मत करो। अपनी सत्य की राह को पकड़ो। आनंदित होकर किवाड़ खोलो और अपनी छोटी बहन के लिए बाहर आओ।
            मुक्ता ने छठी बार द्वार खटखटाया। फिर अगला अभंग गाया-
            सरल हृदय ऋजुता अपनावो, निज समीप ईश्वर को पावो।
            बतलाने की बात नहीं है, जहाॅं देखो वहाॅं दृश्य वही है।
            गंगाजल सम तुम बन जावो, गुप्त आत्मधन अतुलित पावो।
            जन तारो मुक्ता कहे, साथ ही आप स्वयं तरो।
            खोलो किवाड़ भईया मेरे, मुझ पर थोड़ी कृपा करो।।
            भावार्थ- ज्ञानेशा भईया! जितना-जितना वह दृश्य मन में दोहराओगे, उतनी-उतनी कटुता पनपती जाएगी। इसलिए छोड़ो न, जो भी हुआ! अपनी दृष्टि, अपना ध्यान, अपना मन और चित्त वहाॅं से हटा कर ईश्वर में लगाओ। उसके सर्वव्यापी दृश्यों में उसका दर्शन करो। उसकी कृपाओं को याद करो। पतितपाविनी गंगा जैसे शुद्ध और शीतल बन जाओ। छोड़ो बाहर के मांडे-वांडे! अपने अंदर के गुप्त आत्म-धन (जिस पर विसोबा चाटी की दृष्टि तक नहीं पड़ सकती) में आनंद मनाओ। उसके दर्शन का स्वाद उठाओ। यही भवसागर तरने की युक्ति है। इसलिए आनंदित होकर किवाड़ खोलो और अपनी छोटी बहन के लिए बाहर आओ।
            मुक्ता ने सातवीं बार द्वार खटखटाया। अगला अभंग गाया-
            जिसका भाव अशुद्ध नहीं है, ईश्वर उसके पास वहीं है।
            स्वयं शुभ में रमिए, सबका शुभ करते रहिए।
            मुझ ‘बच्ची’ में क्या शक्ति है,
            आपको क्या समझा सकती है,
            आपमें सद्गुरु की दृढ़ भक्ति है,
            वही आपका संरक्षण करती है।
            आपकी लाडली मुक्ताई बुला रही-
            ‘सब छोड़ भव-तरने का यत्न करो!’
            खोलो किवाड़ भईया मेरे,
            मुझ पर थोड़ी कृपा करो।।
            भावार्थ- ज्ञानेश्वर भईया! इस साधना-पथ पर हमारा एक ही तो संघर्ष है। अपने मनोभावों को शुद्ध और पावन रखने के लिए ही तो हम जूझते रहते हैं। क्योंकि हम जानते हैं- यदि मन सुन्दर है, तो हरि दूर नहीं है। इसलिए भईया, अपने मन को शुभ और सकारात्मक विचारों में ही रमाईए। दूसरों को भी रमना सिखाइए... वैसे मैं तो एक नादान बच्ची हूॅं। मैं आपको क्या समझाऊॅं? आपकी तो सद्गुरु में निरन्तर भक्ति है। वे ही आपको सूक्ष्म रूप से हर पल समझाते रहते हैं। आपकी प्यारी और लाडली मुक्ताई तो बस इतना चाहती है- आप ये सब छोटे-मोटे चिंतन छोडि़ए। केवल आत्म-कल्याण पर चित्त लगाइए। आनंदित होकर किवाड़ खोलिए और अपनी छोटी बहन के लिए बाहर आइए।
            अबकि बार मुक्ता को द्वार नहीं खटखटाना पड़ा। वह स्वयं ही खुल गया। ज्ञानेशा आनंदित होकर बाहर निकल आया। उसके नेत्रों से झमझम अश्रु बरस रहे थे। भावातिरेक में उसने छोटी बहन मुक्ता को अपने कंठ से लगा लिया। मुक्ता की भी आॅंखों से अश्रु-मोती लुढ़क गए। ज्ञानेशा ने उन्हें पोंछा और कहा’ ‘नहीं... नहीं मुक्ता! रो मत बहन! तू तो साक्षात् परब्रह्म की चित्तकला है। तू ब्रह्मवादिनी है। तेरे मुख में वाग्देवी का वास है। मैं धन्य हुआ ऐसी बहन को पाकर! आज तक तो मैं तुझे ‘अन्नपूर्णा’ कहता था, जो हमारे उदर को पोषित करती है। पर आज से तुझे ‘आत्मपूर्णा’ भी कहूॅंगा, जो हमारी आत्मा को भी अपने ब्रह्म-विचारों से पोषित कर सकती है।’
            हाॅं, आज तो हमारी मुक्ता माई ने हमें ‘ताटी के अभंगों’ का महा-भोज कराया है।’- श्री निवृत्ति ध्यान से उठते ही बोले। सोपान भी नेत्र खोल चुका था। उसने भी अपने स्वर जोड़े- ‘सच! अगली बार ‘ताटी के अभंग’ कब सुनाओगी, मुक्ता आई? मुक्ता लजा सी गई। चारों भाई-बहन खिलखिला कर हॅंस दिए। सिद्ध दीप पर छाए उदासी के काले बादल छट गए। इतने में ही...
            ‘साधो! साधो! पर केवल अभंगों और आत्म-विचारों से उदर की अग्नि तो शांत नहीं होती, बालकों!’- आॅंगन के बाहर से स्वर उभरा। चारों की दृष्टि स्त्रोत की ओर घूम गई। सामने सोमेश्वर शास्त्री खड़े थे। उनके हाथ में आटे की पोटली थी। वे यह कहते हुए भीतर प्रवेश कर रहे थे- ‘मुझे थोड़ी देर पहले ही पता चला, विसोबा चाटी का दुव्र्यवहार... इसलिए यह आटा लाया हूॅं। भोजन पकाओ और फिर हरि के गुण भी गाओ।’
            श्री निवृत्ति ने आगे बढ़कर सोमेश्वर शास्त्री जी को प्रणाम किया - ‘आप धन्य हैं, शास्त्री जी। आप हरि के ही दूत हैं।’
            ज्ञानेशा का अंतःकरण आंदोलित-सा हो उठा। कुछ सोचते हुए उसने कहा- ‘दादा! ऐसा क्यों होता है कि ... जैसे ही हम अशुभ विचारों से संघर्ष करके शुभ्रता की ओर बढ़ने लगते हैं, तो कोई शक्ति झट से आकर हमें थाम लेती है। हमारी हर जरूरत पूरी कर देती है। हर पराजय  को जय में बदल डालती है। मानो उस शक्ति ने ही पहले दूर बैठकर हमारी परीक्षा के लिए सारा खेल रचा हो... और हमें उस परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ देखकर फिर वही शक्ति पुरस्कारस्वरूप अपनी प्रसन्नता का प्रसाद भेज देती है। सबकुछ अच्छा और बढि़या कर देती है।’ श्री निवृत्ति पुनः रहस्यमयी रूप से मुस्करा दिए।
            ‘हरि ¬! तुम दिव्य बालकों की दिव्य बातें तुम ही जानो। मैं तो चला। सूरज ढलने वाला है। वापिस गाॅंव भी पहुॅंचना है।’ इतना कहकर सोमेश्वर शास्त्री जी ने विदा ले ली। उनके जाते ही सोपान बोला-’अब हमारे पास दो विकल्प हैं। एक, हम इस आटे की सीधी सादी रोटी बनाकर खा लें... या फिर मुक्ता की बनाई हुई कंद-मूल की सब्जी और चटनी से मांडे खाएॅं। वैसे, मेरी दृष्टि में दूसरा विकल्प श्रेय भी है और प्रेय भी!’
मुक्ता (हॅंसते हुए)- पर सोपान भईया, आपका यह श्रेय-प्रेय का मार्ग खपरैल के बिना बड़ा दुर्गम है।
            दोनों भाई-बहन हॅंस दिए। पर निवृत्ति ने ज्ञानदेव की ओर देखा। ज्ञानदेव आत्मलीन था। कुछ सोच कर वह बोला - ‘कोई बात नहीं, मुक्ता। तुम आटा गूॅंथो। आज हम मांडे ही खाएॅंगे। ‘पराजय’ को पूर्ण ‘विजय’ बनाएॅंगे।’
मुक्ता (उत्सुकता से)- पर कैसे, भईया?
ज्ञानेशा - साधक की योग-साधना के बल पर! जाओ, तुम सारी तैयारी करके आटा मेरे पास ले आओ।
            मुक्ता ने वैसे ही किया। अब ज्ञानेशा पाल्थी मारकर बैठ गया। थोड़ा सा झुक कर औंधा हुआ। योगबल से उसने देह में उष्णता पैदा की। देखते ही देखते उसकी पीठ तप्त हो गई। ज्ञानेशा ने आह्वान किया - ‘मुक्ता, त्वरा करो! सारे मांडे सेक लो।’
            मांडे बनाने का क्रम आरम्भ हुआ। मुक्ता बेल-बेल कर मांडे ज्ञानेशा की पीठ पर डाल देती। वे तुरन्त ही योगाग्नि से सिक कर करारे हो जाते। फिर मुक्ता उन्हें निवृत्ति और सोपान की थाली में परोस देती।
            यह दृश्य आलौकिक था। साथ ही, सांकेतिक भी कि साधक चाहे, तो अपनी साधना के बल पर असंभव से असंभव कार्य को ‘संभव’ कर सकता है।
            अब तक विसोबा चाटी के गुप्तचर ने उन तक सूचना पहुॅंचा दी थी। विसोबा चाटी सिद्ध दीप की एक झाड़ी के पीछे छिपकर सारा दृश्य देख रहे थे। बालकों को रोते-बिलखते देखने का उनका अरमान धूमिल हो गया था। पहले तो उनकी आॅंखें आश्चर्य से विस्फारित हुईं। फिर घोर पश्चात्ताप से नम! जो बात उन्हें बड़े-बड़े शास्त्रार्थी नहीं समझा सकते थे, वह इन साधकों की साधना ने समझा दी थी।

            कुछ पलों बाद... विसोबा चाटी धराशायी थे। इन बालकों की चरण-धूलि में लोट रहे थे। यह साधकों की विजय-दशमी थी, जिसमें अहं, ईष्र्या, द्वेष, भेदभाव आदि शत्रु पराजित हो गए थे। पर हाॅं... जिस हृदय में ये शत्रु थे, उसे इन साधकों ने जीत लिया था।

संत ज्ञानेशवर का आत्मनिर्माण Part - 4

दोनों अपने आॅंगन तक पहुॅंच गए। निवृत्ति और मुक्ता उत्सुक कदमों से उनकी तरफ बढ़े। ज्ञानेशा कुछ नहीं बोला। कुटिया में प्रवेश कर, उसने किवाड़ बंद कर लिए। भीतर से सांकल भी जड़ दी। बाहर आॅंगन में सोपान ने रोते-रोते सारा प्रसंग कह सुनाया।
अब हम जरा साधारण स्तर पर विचार करें। सामान्यतः ऐसी स्थिति में क्या प्रतिक्रिया होती है? भयंकर विलाप! तीव्र उबाल व उफान! प्रचंड प्रतिशोध का धधक उठना! मुख से अपशब्दों के अंगार उगलना..... और यदि ये सब न भी हों, तो घोर मानसिक हिंसा होना। अक्सर हम और आप अपमानित होने पर ऐसी ही प्रतिक्रिया करते हैं।
            लेकिन इन प्रगतिशील साधकों का क्या व्यवहार रहा? (वैसे तो शास्त्र मत है कि श्री ज्ञानदेव महाराज साक्षात् भगवान विष्णु के ही अवतार थ। परन्तु यहाॅं इस प्रसंग में उन्होंने अपने भाई-बहनों के संग संघर्षशील साधक कैसे होते हैं - इसकी अभिव्यक्ति की है।)
            सारी बात सुनते ही श्री निवृत्ति तुरन्त सक्रिय हुए। सोपान के मस्तक पर हाथ धरा और कहा- ‘धैर्य! धैर्य धरो, सोपान!... मुक्ता, जा इसके लिए शीतल जल ले आ।’ मुक्ता मिट्टी के कुल्हड़ में जल ले आई। सोपान गटागट पी गया। पर तब भी उसकी हिचकियाॅं बंद नहीं हुई। आवाज सुबकियों के फंदे में अब भी फंसी थी। कुपोषित देह काॅंप रही थी। सोपान ने अपनी विवशता व्यक्त की - ‘निवृत्ति दादा! धैर्य नहीं बंध रहा। क्या करूॅं’
            श्री निवृत्ति तुरन्त बोले - ‘ध्यान करो! परम-चेतना का चिंतन करो! साधना में लीन हो जाओ!’ सोपान ने एक पल का भी विलम्ब नहीं किया। वह एकदम से उठा और श्री निवृत्ति को प्रणाम कर बरगद की छाॅंव तले रखी शिला पर जा बैठा। पद्मासन लगाया और उच्च स्वरों में उच्चारण की उठा - ‘ओऽऽऽऽउ...म्...!’ ओउम् धुन धीरे-धीरे मद्धम हुई, फिर मौन हो गई। सोपान अंतर्जगत् की गहराईयों में पैठता चला गया। ऐसी गहराई, जहाॅं परम-चैतन्यमयी माॅं का ममतामयी प्यार भी था, परम-पिता का सांत्वना भरा दुलार भी था। उसे अपने से अपने का संरक्षण मिल रहा था।
            इधर बहन मुक्ता ने धीमे से स्वर में, लगभग फुसफुसाते हुए श्री निवृत्ति से कहा- ‘दादा! क्या हमें सोपान को तनिक समझाना नहीं चाहिए था? उसे सांत्वना भरे दो शब्द ही कह देते तो... उसे सहारा मिल जाता!’ श्री निवृत्ति ने गहरी सांस भरी, मानो आत्मज्ञान के सागर में डुबकी लगाकर अमूल्य मोती निकाला हो- ‘नहीं मुक्ता! अभी कोई भी बात करना उचित नहीं था। सोपान से कुछ भी कहते, तो वह व्यावहारिकता से ओत-प्रोत होता। व्यावहारिक गणित के पास इस स्थिति का कोई हल नहीं है। इसलिए अभी बातचीत करने से अगर कुछ हाथ लगता, तो सिर्फ नकारात्मकता! हम अपने मन पर द्वेष और गहरा रमा देते। अपना आत्म-पतन कर डालते। पर अब ऐसा नहीं होगा। पतन नहीं, उत्थान होगा। (सोपान की ओर देखते हुए)...वह देख मुक्ता, सोपान सीढि़याॅं चढ़ रहा है। वह मन बु़िद्ध और व्यावहारिकता के गणित के पार जा रहा है।’
            मुक्ता एकटक सोपान को देखती रही। उसकी सुबकियाॅं गुम हो गई थीं। वह आत्मलीन था। उसके चेहरे पर सौम्यता बिखर आई थी। माथे की सिलवटें भी गायब हो चुकी थीं। वह ठहर गया था। ठीक जैसे किसी घड़ी की चलायमान सूइयाॅं प्रगाढ़ चुम्बकीय क्षेत्र में पहुॅंचकर थम जाती हैं। वह समर्पित सा दिख रहा था। ठीक जैसे एक उत्पाती बालक थक-हार कर अपनी माॅं के सामने आत्म-समर्पण कर देता है- ‘तू जो करे, जैसे करे- तेरी इच्छा! मैं समर्पित हूॅं!’
            पाठकगणों! यह तर्कों से परे की स्थिति होती है। यहाॅं पहुॅंचकर साधक का दिमाग जमा-घटा करना छोड़ देता है। शून्य को अर्पित हो जाता है। सोपान इसी अवस्था में स्थित हो गया था। उसकी इस सूक्ष्म अवस्था को मुक्ता देख रही थी, समझ पा रही थी। क्योंकि उसके पास भी आत्मज्ञान की दृष्टि थी। वह खुश हो गई। श्री निवृत्ति उसके पास आए और कान में धीरे से बोले- ‘क्या तेरे और मेरे असहाय शब्दों से उसे इतनी सहायता मिल पाती? देख, अब उसे हमारी जरुरत ही नहीं। उसे जो चाहिए था, वह भीतर मिल रहा है!’
            मुक्ता ने झूमते हुए हल्की-सी ताली बजा दी- ‘सच भईया! आप ठीक कह रहे हैं। सोपान भईया तो ब्रह्मलोक की सैर पर निकल गए हैं। अब उनकी कोई चिंता नहीं... पर भईया....’ मुक्ता के चेहरे पर पुनः काली घटाएॅं घिर आईं। वह बरबस ही कुटिया की ओर घूम गई। द्वार अब भी बंद था। मुक्ता ने निरही नज़र से श्री निवृत्ति की ओर देखा। उसकी आॅंखों में बड़ा सा प्रश्नचिह्न था, जो उनसे मार्गदर्शन माॅंग रहा था।
            श्री निवृत्ति गंभीर वाणी में बोले-‘मुक्ता! यह जो हमारा ज्ञानदेव है, यह संसार में रहकर भी संसार से बहुत ऊपर रहता है। शायद विसोबा चाटी के व्यवहार से थोड़ा क्षुब्ध हो गया है। ऐसे में, हमें उसकी आत्म-स्थिति का उसे फिर से बोध कराना होगा। वह तुम ही कर सकती हो, मुक्ता। जाओ...’ मुक्ता की पीठ थपथपा कर श्री निवृत्ति स्वयं ध्यानस्थ हो गए।
            मुक्ता आगे बढ़ी। द्वार खटखटाया, बोली- ‘ज्ञानेशा भईया! किसी से रूठे हो क्या? दरवाजा खोलो न!’ मुक्ता के स्वर में मनुहार थी। पर फिर भी दूसरी ओर से कोई उत्तर नहीं मिला। सन्नाटा छाया रहा। ऐसा लगता था, मानो ज्ञानदेव गुमसुम हो गए हैं। मुक्ता ने पुनः सरस पुकार लगाई- ‘ज्ञानू भईया! एक बार बाहर तो आओ। देखो न, आपकी छोटी सी, प्यारी सी बहन मुक्ता आपसे कुछ कहना चाहती है।’ प्रत्युत्तर अब भी मौन ही था।
            इतिहास बताता है, यह नन्हीं-सी साधिका मुक्ता ज्ञानवृद्धा थी। जब उसने अपने बड़े भाई ज्ञानदेव को मूक पाया, तो उसकी साधकता प्रखर हो उठी। उसके अंतःकरण से ऐसे अभंग प्रकट हुए, जिनमें गीता जैसा सार था! आत्मज्ञान का भाव था! इनका लक्ष्य था - ज्ञानदेव आनंदकंद होकर दरवाजा खोल दें और कुटिया के बाहर आ जाएॅं। इन अभंगों की हर अंतिम पंक्ति में मुक्ता कहती है-  द्वार खोलो, भईया ज्ञानेश्वर!
            मुक्ता ने तीसरी बार द्वार खटखटाया और गा उठी-
हे योगी! मन पावन रखिए। सबके अपराधों का सहिए।
विश्व भले ही आग लगावै। संत तुरंत पानी बन जावै।।
शब्दशस्त्र के घाव हुए जो, मल्हम संत-उपदेश को समझो।
एक ही धागा विश्ववस्त्र में, परब्रह्म को राखो मन में।।
क्रोध तजो दुःख को त्यागो, मन अपने को शांत करो।
खोलो किवाड़ भईया मेरे, मुझ पर थोड़ी कृपा करो।।
            भावार्थ- हे ज्ञानेशा भईया! आप तो महान योगी हैं। आपका मन परम-पावन है। जन-साधारण के अपराधों पर मन मैला मन करो। जब विश्व में कहीं भी आग लगती है, तो संत पानी बनकर अग्नि को बुझाते हैं। मैं जानती हूॅं, आप पर विसोबा चाटी ने बड़ी निर्दयता से शब्दों के शस्त्र चलाए हैं। उनसे आपके अंतर्मन में बहुत क्लेश हुआ है। पर भईया, इस शब्द-शस्त्र के आगे आप ‘ज्ञान-शस्त्र’ छोड़ दो। संतों के उपदेशों को याद करो। सब संतों ने कहा है- यह सम्पूर्ण विश्व एक विराट वस्त्र है, जो एक ही धागे से बना हुआ है। वह धागा है- परब्रह्म परमेश्वर! वही एक वास्तविकता है, अन्य कुछ नहीं! इसलिए भईया, उन परब्रह्म पर चित्त लगाओ। आनंदित होकर किवाड़ खोलो और अपनी छोटी बहन के लिए बाहर आओ।
मुक्ता ने चैथी बार द्वार खटखटाया। फिर अगला अभंग गाया-
            अपने हाथों चोट लगे जब, क्या हम हाथ काटते हैं तब?
            कभी जीभ दाॅंतों से दबती, दंतपंक्ति नहीं तोड़ी जाती।
            सब अपने हैं, नहीं पराए, एक ब्रह्म के सब हैं जाये।।
            उन पर यदि तुम रोष करोगे, परमपित को ही दुःख दोगे।
            परब्रह्म को यदि है पाना, हॅंसते-हॅंसते सब सह जाना।।
            विकारों के वश न होकर, श्रेष्ट विचार ही धारण करो।
            खोलो किवाड़ भईया मेरे, मुझ पर थोड़ी कृपा करो।।
भावार्थ- सोचो भईया, जब अपने ही हाथों से हमें कभी चोट लग जाती है, तो क्या हम उस हाथ को काट डालते हैं? जब अपने ही दाॅंत जीभ को आहत करते हैं, तो क्या हम अपनी दंत-पंक्ति तोड़ देते हैं? नहीं न! इसी तरह हम सभी उस परब्रह्म पिता की विराट देह के अंग हैं। कोई अपना, कोई पराया नहीं; हम सभी उसी की अभिव्यक्ति हैं। ऐसे में अगर एक अंग (व्यक्ति) अज्ञानता के कारण दूसरे अंग (व्यक्ति) को कष्ट दे बैठता है, तो आहत हुए अंग को कभी रोष नहीं करना चाहिए। क्योंकि इससे अंततः दुःख तो परमपिता को ही होगा। भईया, हम याद रखें, चाहे सुख है या दुःख- सब परमपिता के ही प्रसाद हैं। हमारे निर्माण के लिए ही वह इन्हें हम तक भेज रहा है। इसलिए जब जो आए, जैसा आए- सब सहते जाएॅं- यही सोचकर कि हमारा लक्ष्य परम-पिता को प्रसन्न करना है। प्रभु को पाना है। इसलिए आनंदित होकर किवाड़ खोलो और अपनी छोटी बहन के लिए बाहर आओ!

संत ज्ञानेशवर का आत्मनिर्माण part - 3

     इन्द्रायणी नदी का तट.. बालक ज्ञानेशा (श्री ज्ञानदेव जी) पसीने से लथपथ था। सूर्य का भीषण ताप उसके अंगों को झुलसा रहा था। ज्ञानेशा स्नान करने आया था। इन्द्रायणी के शीतल जल को अपलक दृष्टि से देखता हुआ वह सीढि़याँ उतरने लगा। तभी भीषण गर्जना हुई। यह एक कट्टरपंथी ब्राह्मण का स्वर था- ‘ओ लड़के! भाग यहाँ से! इस सरिता में ब्राह्मण स्नान करते हैं। इसे अपनी काया तो क्या, छाया से भी मैली मत कर...’ ज्ञानेशा के कदम ठिठक गए। उसने धीरे से कहा- ‘बाबा, नदी के इस ओर पानी में गाय, बैल, भैंसे और कई पशु नहाते हैं। मैं भी इधर कोने में ही डुबकी लगाऊँगा और चला जाऊँगा। नहाने दो न मुझे।’
     ‘ओए! तू अपनी बराबरी ब्राह्मणों की गायों से करता है! तेरी इतनी हिम्मत! तू तो पशुओं से भी हीन है। जा, कोई नाली-नाला ढूँढ़ नहाने के लिए...भाग यहाँ से!’- ब्राह्मण मुख से आग उगल रहा था। पास ही, कुछ ब्राह्मण-कुमार खेल रहे थे। अवसर भाँपते ही उन्हें तो खेल सूझ गया। उन्होंने तटवर्ती कंकड़-पत्थर उठाए और ज्ञानेशा को निशाना बना-बनाकर फेंकने लगे। ज्ञानेशा की कोमल देह जगह-जगह से छिल गई। बड़ी मुश्किल से बचता-बचाता, कंकरीले तट पर रास्ता बनाता हुआ वह बच निकला। कुटिया की ओर... राह में... ज्ञानदेव की देह घायल थी। पर उससे अधिक मन आहत था। ज्ञानेशा का हृदय चीस उठा- ‘हे विठोबा! हमारा क्या अपराध है? उन ब्राह्मणों द्वारा खोदे गए कुँओं पर तो हम जाते ही नहीं। पर अब क्या तेरी नदियों पर भी हमारा अधिकार नहीं? पशुओं तक का है, हमारा नहीं! क्यों है ऐसा देव? वो ऊँचे, हम नीचे कैसे? पग-पग पर ये अपमान की चोटें क्यों?... हमारे माता-पिता ने अपने जीवन तक का त्याग कर दिया। फिर भी इनकी घृणा का विष दूर नहीं हुआ! अन्याय की भी कोई सीमा होती है, केशवा! उफ! कैसे हैं ये लोग?’
     ज्ञानेदव के मन में प्रश्नों का झंझावात उमड़ने-घुमड़ने लगा था। किसी प्रकार का तर्क या तथ्य उसे उत्तर नहीं दे पा रहा था। कोई गणित इस स्थिति में सटीक नहीं बैठता था। ऐसे में कैसे मन-बुद्धि को समझाया जाए? एक ही पंथ शेष था-मन-बुद्धि से परे का पंथ-आत्मा की राह! ज्ञानेशा की अंतरात्मा में गीता का एक श्लोक गूँज उठा, जिसका भावार्थ था-
     शीत ऊष्ण सुख दुःख तथा शत्रु मित्र समान,
     बन निःसंग विचरे सदा सहे मान-अपमान।
     निंदा-स्तुति सम जानता तोष भरा मन में,
     स्थिरमति प्रिय वह भक्त है सर्वोपरि जग में।
     यह था एक साधक का अपना सनातन तर्क, अपना अलौकिक गणित- ‘मुझे क्रुद्ध नहीं होना चाहिए। यह तो एक दिव्य परिस्थिति है, जो मेरे लिए ही निर्मित की गई है ताकि मेरा निर्माण हो सके! मुझमें संयम पैदा हो सके! मुझमें सहनशक्ति, क्षमा जैसी सद्वृत्तियाँ जाग पाएँ! मुझमें समभाव विकसित हो जाए! अच्छा है... अच्छा है...ऐसी स्थितियों में ही तो स्थिर मति बनती जाती है। इसलिए क्षुब्ध क्यों होना? भला एक अनगढ़ पत्थर छैनी-हथौड़ी से कोई गिला-शिकवा करता है? नहीं न! तो तू क्यों करता है, ज्ञानेशा? इन्हें धैर्य से सहन कर!’ ज्ञानेशा इस महातर्क की औषधि स्वयं को पिलाते हुए वापिस लौटने लगा। इसलिए घर पहुँचने तक उसके आहत मन के सारे घाव सूख गए।
     निर्जन स्थान में बनी, अपनी कुटिया के आँगन में... भाई निवृत्ति, सोपान और मुक्ता- तीनों किसी गहन मंत्रणा में व्यस्त थे। ज्ञानेशा ने एक मृदु सी मुस्कान मुख पर लिए आँगन में प्रवेश किया। बड़े भाई निवृत्ति (जो ज्ञानेशा के आध्यात्मिक-गुरु भी माने गए हैं) को झुककर प्रणाम किया। फिर छोटी बहन मुक्ता से पूछा- ‘क्यों मुक्ताई, क्या मंत्रणा चल रही है? किसी गहन विषय पर सोच-विचार करते लग रहे हो सभी!’ मुक्ता और सोपान खीं-खीं करके हँस दिए। मुक्ता बोली- ‘हाँ, ज्ञानू भईया, बहुत ही गहन-गंभीर विषय पर हम सभी गोष्ठी कर रहे थे।’
     ज्ञानेशा (उत्सुकता से)- बताओ न, किस विषय पर?
     सोपान (भारी भरकम स्वर निकालता हुआ)- ...कि आज मांडे कैसे पकाए जाएँ! गर्मागर्म, पतले-पतले, मृदु मांडे! चारों भाई-बहन हँस दिए। मुक्ता ने बात आगे बढ़ाई- ‘ज्ञानू भईया! हमारे निवृत्ति दादा (बड़े भाई) ने आज इच्छा की है, मांडे खाने की।’
     ज्ञानेशा- निवृत्ति दादा की इच्छा, माने गुरु की आज्ञा! मुक्ता, अब तो हर स्थिति में उसे पूरा करना ही करना है।
     सोपान- ठीक कहते हो, भइया। आप और मैं मधुकरी में आटा माँग कर लाते हैं। रास्ते में (कुम्हारिन) कमला मौसी के घर से खपरैल (मटका) भी उठा लाएँगे। मुक्त उसे उल्टा करके मांडे सेक लेगी।
     मुक्ता- हाँ! हाँ! मुझे सुबह वन में कुछ कंद मूल मिले थे। तब तक मैं उनसे सब्जी और चटनी बना लेती हँू। वाह! आज तो दावत हो जाएगी!
     दादा निवृत्ति ने बड़ी अर्थ भरी मुस्कान दी। ज्ञानदेव ने झोला टाँगा और सोपान के संग गाँव आलंदी की ओर बढ़ गया। गाँव पहुँचकर...पहला द्वार खटखटाया... भिक्षाम् देहि! मधुकरी दे दो, बाबा... भिक्षाम् देहि! झटके से द्वार खुला। सामने एक बोदी वाला रूढि़वादी नकचढ़ा पोंगा शास्त्री आ खड़ा हुआ। उसका नाम था- विसोबा चाटी। उसकी भृकुटियाँ चढ़ी हुई थीं। मुखाकृति वक्र थी। नेत्र द्वेष से तप्त थे। दोनों बालकों को देखते ही उसने धावा बोल दिया- ‘अरे ओ पाखंडी संन्यासी की औलादों! दूर भागो! मेरे आँगन में अपनी पापी छाया मत डालो। तुम वो जंगल छोड़कर इधर गाँव में कैसे आ गए-नासपीटों! वहीं भूखे-प्यासे रहकर मर-खप क्यों नहीं जाते? बार-बार अपनी मनहूस सूरत दिखाने क्यों चले आते हो? क्या आलंदी में छूत की महामारी फैलाओगे?’
     तलवार से भी अधिक धारदार ताने! उफ! सुनने वाले को काट-काट के टुकड़े कर डाले! पर हमारे इन ज्ञानी साधकों की क्या प्रतिक्रिया थी, जानते हैं? संयम! संयम! संयम! ज्ञानेशा ने मुस्कुराते हुए मीठा सा उत्तर दिया- ‘विसोबा काका! दूर भगाना है, तो क्रोध और द्वेष को भगाओ! देखो, ये आपका कितना अहित कर...’ अभी ज्ञानेशा की पंक्ति पूरी भी नहीं हुई थी, विसोबा चाटी बोल उठे- ‘ओ भीखमंगों! मुझ पर उपदेश झाड़ने चले हो? ठहरो, तुम्हारी तो...!!’ विसोबा ने द्वार पर रखा मोटा डंडा उठा लिया। बालकों की ओर लपके। ज्ञानेशा और सोपान ने आव देखा न ताव... सिर पर पैर रखकर भागे।
     ‘आटा तो मिल नहीं, चाँटा ज़रूर मिल जाता, भईया’-सोपान हाँॅफते हुए बोल उठा। ज्ञानेशा ने भी लम्बी गहरी साँस भरी- ‘कोई बात नहीं, कोई बात नहीं, सोपान! विसोबा काका को मन ही मन क्षमा कर दो।  नही ंतो, भीतर बैर जन्म ले लेगा, जो आगे चलकर बड़ा मानसिक क्लेश मचाएगा।’ पर सोपान तनिक विद्रोही हो चला था। दाँत पीसता हुआ बोला- ‘मेरा बस चले तो, इन ढपोलशंखी धूर्त मार्तंडों को इनकी बोदी से ही पकड़कर गोल-गोल घुमा दूँ और ज़ोर से धरा पर पटक डालूँ! ज्ञानेशा ने तुरन्त अपनी बाँह छोटे भाई के कंधों पर रख दी, समझाया- ‘नहीं, नहीं, सोपान! इतना उबाल अच्छा नहीं। निवृत्ति दादा कहते हैं न, आनंद मनाना है, तो परमानंद को ध्याओ। इन छोटी-मोटी बातों पर क्या विचार करना? देखो, ज़रा संयम धर कर देखो, तुम स्वयं को कितना ऊँचा, कितना विराट अनुभव करोगे। मैं भी ऐसा ही करता हँू।’
     सोपान- आप ठीक कहते हो, भईया। वैसे भी हमें अपने लक्ष्य से नहीं भटकना चाहिए, जो है- ‘मांडे!’ दोनों भाई हँस दिए और अगले द्वार की ओर बढ़ चले। द्वार खटखटाया, पुकारा- ‘भिक्षाम् देहि! मधुकरी दे दो, माई!’ स्त्री ने द्वार खोला। ‘तनिक ठहरो!’ कहकर भीतर जाने ही लगी थी कि ज्ञानेशा ने विनय की- ‘आज मधुकरी में आटा दे दो, माई।’ स्त्री उदार थी। बर्तन भर कर आटा लाई और ज्ञानेशा का पूरा झोला ही भर दिया। दोनों बालक प्रसन्न हो उठे। कुम्हारिन कमला के घर की ओर बढ़ गए। अब तो सोपान चल नहीं, फुदक रहा था। अत्यंत उमंगित था। बार-बार झोले का भार अपने हाथों में ले लेता था। भार अनुभव करते ही तालियाँ बजाता और खिलखिलाता था। ज्ञानेशा ने फिर से सोपान को सावधान किया-‘सोपान! अधिक हर्ष मत मनाओ। दादा निवृत्ति कहते हैं-हर्ष कब संघर्ष में बदल जाए, कुछ पता नहीं।’
     दोनों कुम्हारिन कमला के आँगन में पहुँच गए। तरह-तरह के मटकों की कतारें सुशोभित थीं। ज्ञानेशा ने पुकारा- ‘कमला मौसी... कमला मौसी! एक खपरा दे दोगी क्या?’ कमला का चारों बालकों के प्रति स्नेह अपार था। ज्ञानेशा का स्वर सुनते ही वह दौड़कर बाहर आ गई। सोपान ने निजी इच्छा रखी- ‘मौसी, आज हमने मांडे खाने की योजना बनाई है। निवृत्ति दादा की यही इच्छा है। इसलिए मांडे सेकने के लिए एक खपरा चाहिए।’
     कमला- हाँ, हाँ... क्यों नहीं! बहुत बढि़या! अभी देती हँू एक चपटा खपरा... मुक्ता को कहना, चूल्हे पर इसे उल्टा रख दे। कमला पंक्ति में से एक उपयुक्त खपरा उठाने लगी। तभी... एक प्रचण्ड भूचाल आँगन में आ धमका। इस भूचाल का नाम था- विसोबा चाटी। अपने सेवकों से कहकर उसने बालकों पर नज़र रखवाई हुई थी। उन्हीं के खबर देने पर वह कमला के आँगन पहुँचा था। उसकी कुटिल दृष्टि सीधी ज्ञानेशा की लदी-फंदी झोली पर गई। फिर कमला के हाथों में टिके खपरा पर! उस धूर्त को समझते देर न लगी। कुत्सित स्वर में चीख पड़ा- ‘आ हा... ये कंगाल भीखमंगे माँग-माँग के मांडे उड़ाने की सोच रहे हैं। दो-दो गज लंबी जीभ हो गई तुम दुष्टों की! पूरी आलंदी को मूर्ख बनाते हो। पेट की आग बुझाने का बहाना बनाते हो... और मांडों की ललक रखते हो! थोड़ी बहुत भी लज्जा है या सारी हया घोल कर पी गए हो, पाखंडियों! टुकड़खोर चोर कहीं के!’
     कमला भी सहम गई थी पर फिर भी हिम्मत बटोर कर वह बोली- ‘साहब! बालक ही तो हैं। सालों में एक बार मांडे पकाकर खा भी लिए तो क्या?... वही आटा है...! ‘चुप कर, कुम्हारिन! अपनी औकात में रह!’ विसोबा चाटी पहले से भी ऊँचे व उग्र स्वर में चीखे- ‘तूने ही इन ठीकरों को सिर चढ़ा रखा है!... इतना कहते-कहते चाटी क्रोध से पागल हो गए। ताव में आकर पाँव चलाने लगे। कुम्हारिन के मटके एक-एक करके चूर-चूर करते गए। कमला के हाथ से भी खपरा छीन कर चकनाचूर कर डाला।
     दोनों बालक अपनी आँखों के सामने विनाशकारी तांडव देख रहे थे। कमला के नेत्र भी डबडबा आए थे। सोपान में रोष का उफान उठा गया था। वह प्रबल प्रतिक्रिया करने वाला था कि तभी ज्ञानेशा ने उसका हाथ दबाया और आँखों ही आँखों में शांत रहने को कहा। बालकों की यह शांति देखकर विसोबा चाटी ज्यादा जल-भुन गया। मुख से अंगारे उगलता हुआ आगे बढ़ा और ज्ञानेशा का झोला छीनकर पटक दिया।  सारा आटा टूटे मटकों के टुकड़ों और मिट्टी में जा मिला। विसोबा चाटी ने अंतिम धमकी दी- ‘नरक के कीड़ों! मैं टुकड़ा भर भी मांडे तुम्हें खाने नहीं दूँगा। तुम्हारी तो ऐसी की तैसी!’
    
     फिर चाटी ने अकड़ में अपना अंगरखा झाड़ा और तमतमाता हुआ आँगन से चला गया। आँगन में चारों ओर विध्वंस ही विध्वंस था। प्रलयकारी तूफान आया था और सबकुछ लील कर चला गया था। दोनों बालक थरथर काँप रहे थे। सोपान के कंठ में हिचकियाँ भर गई थीं। घोर संताप दोनों के मन में उबल रहा था। ज्ञानेशा ने एक नज़र उठाकर कमला की ओर देखा। उसकी भी ऐसी ही दशा थी। दोनों भाई लुटे-पिटे कदमों से अपने सिद्ध द्वीप की ओर चल पड़े। अब तो ज्ञानेशा का संयमचारी मन भी सिसकने लगा था- ‘इतना अपमान! इतना तिरस्कार! इतना अनादर! इतनी उपेक्षा! हे ईश्वर, हमारा अस्तित्व ही तूने क्यों गढ़ा?...’

     दोनों अपने आँगन तक पहँुच गए। निवृत्ति और मुक्ता, दोनों उत्सुक कदमों से उनकी तरफ बढ़े। ज्ञानेशा कुछ नहीं बोला। कुटिया में अकेले प्रवेश कर, उसने किवाड़ बंद कर लिए। भीतर से सांकल भी जड़ दी। बाहर आँगन में सोपान ने रोते-रोते सारा प्रसंग कह सुनाया। अब आगे इन बालकों की क्या प्रतिक्रिया रहेगी? इस घोर अपमान को वे कैसे आत्म-निर्माण की सीढ़ी बनाएँगे, ऐसी कौन-सी दिव्य योजना होगी इन नन्हें साधकों की, जो विसोबा चाटी जैसे क्रूर और महा-हिंसक जीव को भी इनके चरणों में गिरने को विवश कर देगी?