Friday, May 22, 2015

युग निर्माण का महाभियान !!

युग निर्माण के महाभियान में नया जोश उत्पन्न करने के लिये ब्रहमचर्य संपन्न 24,000 महान सेनानायको की आवश्यकता है| इनको पुस्तक में विश्वामित्र की संज्ञा दि गयी है| इनका चयन भगवान संव्य कर रहे है, यह पुस्तिका मात्र एक माध्यम है जो मुर्गे की बांग की तरह, घडी के अलार्म की तरह उनको जगाने में सहायक होगी| अनेक मिशन भारत के नव-निर्माण के लिये अपनी और से प्रयास कर रहे हैं परन्तु श्रेष्ट व शक्तिशाली नायको के अभाव में अभियान में तेजी नहीं आ रही है| यदि दूध को तीव्र गति से न विलोया जाये तो मक्खन नहीं निकलता| धीरे-धीरे पूरा दिन बिताते रहें लाभ नहीं होगा| यही स्थिति युग निर्माण मिशन की हो चुकी है कोई भी ऐतिहासिक कदम हम नहीं उठा पा रहे हैं| कारण कि हमारी सेना ही सशक्त व संगठित नहीं है|

       जो कठोर आत्म विश्लेष्ण नहीं करते वो कभी आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर पाते| इसी प्रकार जो मिशन अपनी प्रगति का, लक्ष्य का उचित विश्लेष्ण निर्धारित नहीं करते वो कभी बड़े अभियानों में सफलता प्राप्त नहीं कर पाते| युग निर्माण महाकाल का संकल्प है, वह पूर्ण होकर रहेगा इतना कहकर हम चैन की नींद सोते रहें तो क्या यह उचित है| सोमनाथ के मंदिर पर विदेशी आक्रमण की सम्भावना को लेकर राजा ने पुरोहितो की सभा की| पुरोहितो ने राजा को यह विश्वास दिलाया कि चिंता की कोई बात नहीं| भगवान के मंदिर का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता राजा निशिचिंत हो जाएं| इस मुर्खता का भयानक परिणाम सामने आया|

       युग निर्माण के लिये उचित सेना व सशक्त सेनानायको का गठन समय की आवश्यकता है| 24,000 सेनानायको की बात इसलिए की जा रही है कि यह अभियान विश्वव्यापी है वह इससे अनेक प्रकार के मोर्चो पर फतह हासिल करनी है| इस कारण दो चार अथवा दस बीस पुराने चेहरे मोहरों से काम चलने वाला नहीं हैं| एक विशाल सशक्त फौज का निर्माण आवश्यक है जिसमे आपस में उचित ताल-मेल हो| यह पुस्तिका इसी उदेश्य के पूर्ण करने के लिये लिखी गयी है|

       इसका उदेश्य किसी की भावनायों को आहात करना अथवा अपना कोई निजी मिशन खड़ा करना नहीं है| अपितु यह एक प्रकार का प्रोजेक्ट अथवा विचारधारा है जो इसमें व्यक्त की गयी है| रोगी को कडवी दवा पीनी पड़ती है| युग निर्माण अभियान की सफलता से आज कितने परिजन संतुष्ट हैं? यह अभियान भी रुग्ण अवस्था में संव्य को घसीट रहा है| अंत: कटु विश्लेष्ण करना अनिवार्य ही गया है| आज शातिकुन्ज नवयुग की गंगोत्री को खड़े हुए 40 वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं| अपने ही देश में लग-भग एक लाख गायों की प्रतिदिन 60,000 क़त्ल खानों में दर्दनांक हत्याएं हो रही हैं| हमने कभी सरकार पर इस दिशा में दबाव बनाने का प्रयास नहीं किया| मुठ्ठी भर मराठा मुगलों से भीड़ गए थे परन्तु हम सवा करोड़ गायत्री परिवार के लोग क्या कर पा रहे हैं| यह एक विचारणीय प्रश्न है| क्या आने वाली पीढ़ी हमारे मुंह पर नहीं थुकेगी कि हम केवल मंच से अच्छी-2 बाते करते हैं परन्तु नव-निर्माण की दिशा ने कोई भी ठोस कदम नहीं उठा पाते| कारण स्पष्ट है कि रचनात्मक व संघर्षत्मक मोर्चो पर हम बहुत कमजोर हैं| मात्र प्रचार-प्रसार कर व युग-निर्माण अभियान महाकाल के भरोसे छोड़कर निश्चिन्त है|

       युग-निर्माण मिशन को इस स्थिति से उबारने के लिये व युग शक्ति को कुछ साहसिक अभियानों की दिशा में मोड़ने के लिये वरिष्ट परिजनों को एकत्र होकर ठोस निर्णय लेने होंगे| डुल-मूल नीतियों से युग-निर्माण नहीं होने वाला है| जब तक पोलीथिन का प्रचलन है, कांग्रेस घास सब जगह विधमान है, स्वच्छ व स्वस्थ्य भारत का सपना देखना निरर्थक है| जब तक 24,000 विश्वामित्र हम नहीं तैयार कर लेते तब तक अभियानों को गति कैसे मिलेगी| युग-निर्माण अभियान एक समर की भांति हैं जो मीठी-मीठी बातों से नहीं जीता जा सकता| इसके लिये कुशल योद्दाओं की आवश्यकता हैं| हमारा ध्यान इन युग के विश्वामित्रो के चयन, संगठन, एंव सशक्तिकरण की और होना चाहिए यही आहवान पुस्तक के माध्यम से किया जा रहा है| 

Friday, May 15, 2015

युग निर्माण में बिलम्ब क्यों?

साधना प्रखार हम करें, दृढ़ संकल्प मन में धरें। 
खिल उठे सहस्रदल कमल, सृजित हो नवयुग विमल॥
एक बार दो गरीब व्यक्ति घर से थोड़े चने लेकर रोजगार ढूंढने दुसरे शहर की और रवाना हुए| जेब में धन नहीं था पैदल चलते-2 चने खा लिए| अब फिर भूख लगी, जंगल से गुजर रहे थे| एक व्यक्ति ने अपने दुसरे साथी से कहा की बहुत भूख लगी है क्या करें? दुसरे व्यक्ति ने सांत्वना देते हुए कहा कि खाली मुहं ऐसे ही चला लेते है| जिससे की चने चबाने का अहसास हो जाये| दोनों लाचार होकर मुंह ऐसे ही चलाने लगे| क्या इससे भूख मिट पायेगी?

      यह तो मात्र एक प्रंसग था क्या हम गायत्री परिजनों की यही स्थिति नहीं हो गयी है| सन 80-85 से हम हवन कराते हैं व पुस्तके बेचते हैं और कहते हैं कि महाकाल ने गायत्री परिवार को युग निर्माण के लिए चुना है| 30-35 वर्षो से हम यही करते आ रहे हैं| जिससे गायत्री परिवार का प्रचार तो रहा है गायत्री परिवार बढ़ भी रहा है| परन्तु युग निर्माण का कार्य एक समर जैसा है जिसे युग सैनिको ने पूरा करना है| यदि सेना विशाल हो परन्तु बन्दुक चलाना न जानती हो, युद् से डरती हो तो क्या युद् जीता जा सकेगा| यही प्रशन चिह्न हमारे ऊपर भी लगा हैं| यदि हमने 24,000 लोगो का चयन कर उनको उच्च-साधना के द्वारा समर्थ बनाया होता तो हम एक Milestone पार कर पाते| लोग हम पर हँसते हैं व आक्षेप लगाते हैं कि 21वी सदी की गंगोत्री जो शांतिकुंज हरिद्वार से निकलती थी कहाँ खो गयी। हम लाचार हाथ पर हाथ धरे बैठे चुपचाप सब कुछ सुनते व सहते रहते हैं|

      गायत्री परिवार में सब तरह के लोग हैं| एक तो वह जो खुद की इच्छायों, समस्याओं तक ही सीमित हैं उनका परिवार सुख शांति से चलता रहे, वो गुरु जी, गायत्री माता की जय बोलते रहेंगे| दुसरे वो जो महत्त्वकांक्षी है, स्वार्थ व सम्मान से जुड़े हैं उन्हें पद, प्रतिष्ठा मिलती रहे वो गुरु जी का काम करते रहेंगे| मिशन के लिए चंदा जुटाते रहेंगे| ऐसे लोग अधिक ध्यान गद्दी की सुरक्षा में लगाते हैं, गुटबाजी करते हैं व अपने चारों और चापलूस देखना-पलना पसंद करते हैं इससे उनकी गद्दी सुरक्षित नज़र आती हैं| तीसरे वो लोग हैं जो वास्तव में अध्यात्मिक हैं, गुरु जी की प्राण चेतना से जुड़े हैं, राष्ट्र की मानवता की, मिशन की सचमुच सेवा करना चाहते हैं| त्याग और तप का आदर्श लेकर विपरीत परिस्थितियों से जूझते रहते हैं| असुरी शक्तियों के घातक बार भी इन्ही लोगो पर होते हैं परन्तु सब कुछ सहकर वीर सैनिको की भांति अपने पथ से विचलित नहीं होते| गायत्री परिवार की भीड़ में से ऐसे समर्पित लोगो को चुनना है और उनको सावित्री साधना द्वारा समर्थ बनाना है जिससे वो शक्ति के अवतरण को धारण करने का विज्ञान जाने व असुरी शक्तियों का डटकर मुकाबला कर संगठन का नेतृत्त्व कर सके| जब तक नेतृत्त्व अयोग्य, कायर व संकीर्ण लोगो के हाथ में रहेगा हम युग निर्माण की दिशा में कोई भी सार्थक कदम नहीं उठा पाएंगे| युवाओं के सम्मलेन तो होते रहेंगे परन्तु साहसिक अभियानों को गति नहीं मिल पायेगी| राजनेताओं से भेटें तो होती रहेगी परन्तु मात्र गुलदस्तों व शालों का आदान-प्रदान चलता रहेगा| सरकार पर कुछ नया करने का दबाव नहीं बना पाएंगे| धर्म-तन्त्र का कार्य है राजतन्त्र पर दबाव बनाकर उनसे राष्ट्र पर जो संकट मंडरा रहे हैं उनके लिए ठोस कदम उठाने की बात की जाये| आज देश पर निम्न प्रकार के संकट मंडरा रहे धर्माधिकारी व नेता इस दिशा में बोलने का साहस भी नहीं जुटा पा रहे हैं|

      1. जनसँख्या वृदि
      2. बढती अश्लीलता व कामुकता
      3. कृषि भूमि का खादों व उर्वरको द्वरा विनाश
      4. गलत आरक्षण नीति द्वारा समाज में असंतोष
      5. सरकारी कार्यलयों में भ्रस्टाचार
      6. गो सरंक्षण
      7. कचरा प्रवन्धन
      8. विवाहों पर अंधाधुन्द खर्च
      9. प्रदुषण

      क्या केवल मीठी-2 बाते बनाने से काम चल जाएगा? क्या केवल दीपक की बात करने से रोशनी हो जाएगी? इसके लिए किसी को दीपक जलने की पहल करनी होगी|

      एक दृष्टांत से बात समझायी जा रही है| पहाड़ के उस पार दुश्मन की सेना खड़ी है| कायर सेनापति से सेना पूछती है क्या करें| सेनापति आदेश देता है जाओ 10 लोग चोटी पर चढ़कर देखो कि शत्रु सेना में क्या हलचल है| सैनिक चोटी पर चढ़कर देखते हैं कि शत्रु सेना युद्ध की तैयारी कर रही है| सेनापति से पूछा जाता है कि अब क्या करें तो सेनापति कहता है कि पुन: ठीक प्रकार से देखकर आओ कि शत्रु सेना क्या कर रही है? तो सैनिक चोटी पर चढ़कर देखते हैं व कहते हैं कि शत्रु सेना ने भी पहाड़ी पर चढ़ना प्रारम्भ कर दिया है| सेना ने फिर पूछा क्या करें तो सेनापति कहते हैं कि जाओ अनुमान लगाओ कि शत्रु सेना कितनी तेजी से आगे बढ़ रही है| सैनिक ऊपर चढ़ते हैं तो पता चलता है कि शत्रु सेना भी चोटी के निकट पँहुचने वाली है| अंत: सेनापति अपने सैनिको को कहता है कि शांति प्रस्ताव लेकर जाओ सम्भव हैं वो मान जाये| सैनिक शांति प्रस्ताव लेकर जाते हैं तो शत्रु सेना अस्वीकार कर देती है| सेनापति कहता है कि उनको कुछ धन आदि देकर वापिस भेजने का प्रयास करो|

      क्या यही कार्य हम भी तो नहीं कर रहे हैं? 40 वर्षो से मिशन का प्रचार-प्रसार में जुटें हैं| आज भी उसी पर जोर दे रहे हैं| सद विचारो का प्रचार आज समाज में खूब हैं ज्ञान की अच्छी बात आपको हर कोई सुना देगा परन्तु सद विचारो की स्थापना नहीं हैं| सदाविचारो की बलपूर्वक स्थापना करने के लिए शक्ति चाहिए जिसका हम मे अभाव है| इसी कारण हम केवल मेले ठेले लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान बैठते हैं| ठीक है गुरुदेव ने कहा था कि विचारो को घर-घर पंहुचाओ लेकिन गुरुदेव ने अभियान के समय सीमा 2000 तक निर्धारित की थी| इस अभियान से बड़ी भीड़ हमारे पास आयी अब उसमे से योग्य लोग चुनकर उनको समर्थ युग सैनिक बनाने से हम क्यों कतरा रहे हैं? क्या हमारी थाली में छेद हैं जो दुसरो को ऊपर उठता देख डर लगता है? यह तो इस तरह हुआ कि खुद में कुछ करने का साहस नहीं दुसरो को भी आगे बढ़ने नहीं देंगे|

      यदि गुरदेव के सच्चे सपूत हैं तो इस मानसिकता को हमें छोड़ना होगा नहीं तो आने वाली पीढ़ी हमारी छाती पर पैर रखकर रास्ता बनाने जा रही है जो हमारे लिए बड़ा दुखदायी होगा| यदि हम स्वेच्छा से उनको ऊपर उठाते हैं तो हमारा भी सम्मान होगा| यदि उनको डाउन करने का प्रयास करते हैं तो एक दिन तो सब्र का बांध टूटेगा ही व पानी सिर के ऊपर से गुजरेगा| युग निर्माण महाकाल का संकल्प हैं| वैसे तो हम स्वयं को गुरु  जी के करीब समझते हैं परन्तु इतनी छोटी बात समझ नहीं पाते| स्वार्थ और पद के लोभ में जो अन्धे हो चुके हैं उनके लिए ब्रह्मदंड ही एक मात्र उपाय शेष है| महाकाल भी क्या करे जिनको अपने हाथ से पाल-पोस कर बड़ा किया अरमान सजाए उनको दंड कैसे दें? परन्तु महाकाल धर्मयुद में केवल सत्य के साथ रहेगा किसी की भी अन्याय अनीति सहन नहीं करेगा चाहे वो उसका कितना प्रिय पात्र रहा हो|  अभी तक गुरु जी अपने सोम्य रूप से कार्य कर रहे थे परन्तु अब महाकाल अपने रूद्र रूप को धारण करने जा रहा है| गायत्री परिजनों से यही अनुरोध है कि सदा सत्य का साथ देना सीखें, पद प्रतिष्ठा का लोभ त्यागकर उच्चस्तरीय तप व त्याग बलिदान के भावो को अपने भीतर विकसित करें| इस जीवन में कुछ ऐसा कर पाए कि आने वाली पीढ़ी हम पर सदा गर्व करे व हम जहाँ भी हो जिस भी लोक में हो दिव्या जीवन व सद्गति को प्राप्त हों|

      जो बाते इस लेख में लिखी गयी हैं वो बाते बहुत से लोग जानते हैं परन्तु आपनी कमियों को छुपाने के लिए स्पष्ट चिंतन नहीं करते| आज हमारे गुरु जी इज्जत दाँव पर लगी है, हमारे प्राण भले ही चले जाएँ परन्तु हम अपने जीते जी युग निर्माण से पीछे नहीं हटेंगे ऐसा साहस हमारे भीतर होना चाहिए| सच्चाई को जानते हुए भी सच्चाई उजागर करने का साहस हममे नहीं है क्योकि इसके दुष्परिनाम हम सभी जानते हैं, इसलिए चुप रहते हैं व अन्दर ही अन्दर घुटते रहते हैं| परन्तु जब सवेरा महसूस कर एक मुर्गा बांग देता है तो बाकी मुर्गे भी बोलने लगते हैं| युग निर्माण का सूर्य उदय होने जा रहा है अतः सत्य कहने का साहस, सच्चाई पर चलने का साहस हमें बटोरना होगा| क्या हमारे गुरु ने विपरीत परस्थितियों में कार्य नहीं किया, समाज की गलतियों का विरोध नहीं किया, उसके लिए खतरों से नहीं खेला| यदि हम महाकाल से वास्तव में जुड़े हैं तो हमें निर्भय होना सीखना होगा| हम कुत्ते के पिल्लै नहीं हैं जो जगह-जगह पूंछ हिलाते घुमे वरण सिंह की सन्तान हैं जो अपने स्वाभिमान के लिए जियेंगे व अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए कोई भी मूल्य चुकाने से पीछे नहीं हटेंगे| हमें भले ही गीता पर बड़े-बड़े भाषण करना न आता हो परन्तु गीता हमारी आत्मा में बसी हैं| हमे भले ही गुरु पर बड़ी शोध करना न आता हो परन्तु गुरु हमारी आत्मा में बसा हैं| उपदेशो का समय समाप्त हो रहा है, कुछ कर गुजरने का समय आ रहा है जो इस मानसिकता को रखते है, संस्कृति की रक्षा के लिए, युग सेना के लिए जीवन दान दे सकते हों, ऐसे महान सपूतो को मेरा नमन् |
इस लेख का मूल प्रयोजन यह है की मधुमक्खी के छत्ते में सिर्फ मधुमक्खियाँ ही न रहें अपितु शहद का भी प्रयोजन पूरा हो | इसी प्रकार गायत्री परिवार में हम भीड़ देख कर खुश न हों केवल पुस्तकों व हवनों तक सीमित न रहें अपितु युग निर्माण की दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए जायें जिन्हें ऐतिहासिक कहा जा सके| यह तभी संभव है जब सवा करोड़ की विशाल गायत्री परिवार की सैन्य का नेतृत्त्व २४००० कुशल सेनापति करें| अधिक से अधिक युवाओं का भागीदारी हो उन्हें तेजस्वी तपस्वी व समर्थ बनाया जाए| जगह जगह शक्तिपीठों पर पांच सात वृद्ध एकत्र हिसाब किताब को लेकर तू तू मैं मैं करते रहें इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं हैं| रचनात्मक व संघर्षात्मक मोर्चों की उचित भूमिका युग सैनिकों के द्वारा निभाई जाये यही इस लेख का उद्देश्य हैं .
                                                                             :- विश्वामित्र राजेश 

Tuesday, May 12, 2015

चना & काजू


Read my book "100 Golden Rules for Health" cost Rs 12/- each  postal charge extra mail at rkavishwamitra@gmail.com or phone on 09354761220 (Vishal) or 09466213501 (Rasika Mittal). Kindly send Rs 100/- (or more) to get soft copy of the book and other health related wonderful material. Annual membership of  स्वस्थ भारत अभियान is Rs 500/-। Money would be used for the research work of an extra ordinary book "स्वस्थ भारत " to be published in 2016. Free consultation for various diseases would be given by Dr. R. K. AGGARWAL.
चना



भारतीय आहार का मुख्या नायक है चना| चना उर्चा का बेजोड़ स्त्रोत है| अधिक श्रम, व्यायाम या पहलवानी के बाद बादाम की जगह अंकुरित चना खाया जाता है| यह शक्ति के प्रतिक घोड़े का मुख्या आहार है| चना शारीरक श्रम करने वाले को स्वस्थ्य रखने वाला तथा सर्वोतम टॉनिक है| यह कहावत प्रसिद है कि जो चना चबाता है वह हमेशा स्वस्थ्य बना रहता है| दुधारू मवेशियों को चना बेहद पसंद है| चना मुख्यतः दो प्रकार का होता है – काला तथा काबुली| मोटा, मध्यम तथा छोटा तीनो आकर के सभी प्रकार के चने होते है| चने में सभी प्रकार के पोषक तत्व मिल जाते है| इसमें प्रचुरता से प्रोटीन, उत्तम किश्म के कार्बोज तथा वसा मिलती है|



       अंकुरित चना विटामिन ‘ए’, ‘बी’ काम्प्लेक्स, ‘सी’, सभी प्रकार के विटामिन, एन्जाइम तथा खनिज लवन पर्याप्त मात्रा में होता है| चने का छिलका उतारकर या बेसन के रूप में नहीं खाना चाहिए| चने के छिलके में रक्तशोधक तथा कब्जनिवारक गुण होता है| चने को अंकुरित करके तथा हरा चना (छोला) खाना ही श्रेष्ट है| मेहनतकश मजदूरों तथा पहलवानों के लिये अंकुरित चना श्रेष्ट पोष्टिक आहार है| मेहनत-विरत, बैठे ठाले जीवनयापन करने वालों को चने का प्रयोग अधिक नहीं करना चाहिए| मिट्टी के बर्तन में भीगे चने का पानी पिने से दस्त, खसरा, चेचक, हैजा, पेचिश, मधुमेह, तृषा में लाभ होता है| इसे आँख में डाल सकते है| आंख के रोग ठीक होते है|



       आयुर्वेद की दृष्टी से चना कषाय रसयुक्त, विष्टम्भ्क, वातकारक, शीतल एंव रुक्ष, शक्ति एंव पुष्टिकारक, स्वास्थ्यवर्द्धक एंव पित्त रक्त विकार, कफ तथा ज्वरनाशक है| ह्रदयरोगरोधक एंव निवारक होता है| आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली द्वारा किये गये कुछ प्रयोगों से यह सिद्ध हो गया है कि भीगा हुआ अंकुरित चना कोलेस्ट्रोल के स्तर को कम करता है, शर्करा पर नियंत्रण रखता है| अंत: चना ह्रदय तथा मधुमेह रोगीयो के लिये श्रेष्ट आहार है| हरा चना न गर्म होता है, न ठण्डा| इसका प्रभाव सम्यक होता है| इसलिए इसे सभी खा सकते है| 25 से 50 ग्राम तक चना रात्रि को भिगों दे| सुबह इसके पानी में निम्बू तथा शहद मिलाकर पियें| यह सभी प्रकार के चर्म रोग तथा नपुंसकता को दूर करता है| भीगे चने को कपडे में बांधकर 6-6 घंटे के अन्तराल पर पानी से तर करें| गर्मियों में ठंडी जगह पर तथा ठण्ड के दिनों में कम्बल में लपेटकर भीगे चने की पोटली को रखे| अंकुरित होने पर खूब चबा-चबाकर खाए| स्वाद के लिये गुड मिला सकते है|



       इससे ह्रदय रोग, मधुमेह, उन्माद, प्रदर, रक्तचाप, स्नायविक तथा धातु सम्बन्धी दोष दूर होते है| चने के साथ नमक न खाएं| अंकुरित चने वीर्य गाढ़ा तथा शुक्रानुओ की सक्रियता एंव संख्या बढ़ जाती है| अंकुरित चना खाने के बाद दूध पिने से वीर्य पुष्ट होता है, ब्र्ह्चार्य पालन में सहायता मिलती है| शरीर, मन एंव बुद्धि आभायुक्त, सतेज एंव स्वस्थ्य होती है| रात्रि काल में भुना चना खाकर दूध पिने से कब्ज, कफ तथा जुकाम दूर होता है|



       काला चना 35 ग्राम तथा त्रिफला चूर्ण 20 ग्राम एक साथ भिगोकर चने को अंकुरित कर खाएं, बचे पानी को पी जायें| 3 माह तक प्रयोग करने से सफ़ेद कुष्ट तथा अन्य हठीले चर्म रोग दूर होते है| काले चने का काढ़ा गर्भपात, यकृत, प्लीहा तथा गुर्दे के रोग में उपयोगी होता है| गर्भपात को रोकने के लिये अंकुरित गेंहू तथा चना उपयोगी है|







                        काजू


(वानस्पतिक नाम—Anacardium Occidentale, अंग्रेजी नाम---Cashew Nut)

एक मिथक के अनुसार थक कर ब्रहाजी गहरी नींद में सो गये| सरस्वती स्रष्टिसृजन का काम करने लगी| उन्होंने आम का रंग, नाशपाती, का आकर तथा संतरे की कोमलता को लेकर नया फल बनाया| तभी ब्रहाजी जागे| जल्दी में सरस्वती ने नाशपाती के ऊपर गड्ढा कर मेवे के टुकड़े को चिपकाकर पेड़ से लटका दिया| इस प्रकार काजू का जन्म हुआ| काजू समुंदर तटीय जमीन में खूब पनपता है तथा इसकी गहरी जड़े मानसूनी कटाव से समुंद्र तट की रक्षा करती हैं| काजू को फूलने-फलने में 5 वर्ष लगते हैं| हरेक पेड़ प्रत्येक मौसम में 25 किलो काजू देता है| पोषण विज्ञानियों में अनुसार 6 माह से 6 साल तक के बच्चे को प्रतिदिन 100 ग्राम तथा धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाते हुए बारह साल के बच्चे को 200 ग्राम काजू देने से सभी प्रकार के एमिनो एसिड्स (प्रोटीन) की पूर्ति हो जाती है| काजू पर फफूँदी आदि नहीं लगती|



      काजू के वृक्ष की छाल में एनाकर्डियक एसिड तथा कार्डोल नामक टॉनिक पाया जाता है, जिसका बाहर् का लेप खुजली, दृष्ट व्रण, कुष्ट पर किया जाता है| इसका तेल अतिदाहक है| इसके पेड़ से प्राप्त गोंद क्रमिध्न होता है| इसे ग्रंथियों एंव सूजन पर बांधने से लाभ होता है| काजू से एनाकर्डियक एसिड बनाया जाता है| आयुर्वेद की दृष्टी से काजू लघु, मधुर, सिनग्ध, उष्ण, वातशामक, मष्तिक तथा नाड़ी बाल्य, जठराग्नि प्रदीपक, शुक्रवर्धक, केश्य, संग्रहनी, अर्श, गुल्मोदर, व्रण, कर्मी आदि रोगों को दूर करने वाला तथा पितनाश्क है| इसका तेल पोषक एंव सिनग्ध तथा प्रतिदाहक है| इसके तेल से एनाकर्डियक एसिड बनाया जाता है| इसका तेल कुष्ट, दर्दु तथा दृष्ट व्रण को ठीक करता है|



      कनाडा के मोंट्रियल विश्विधालय के वैज्ञानिकों ने खोज की है कि काजू मधुमेह की रोकथाम में काफी मदद करता है| इन वैज्ञानिकों का शोध लेख प्रमुख जर्नल ‘मोलेक्युलर न्यूट्रीशन एंड फ़ूड रिसर्च’ में प्रकाशित हुआ है| मुख्या शोधकर्ता पियरे एस हडाड के अनुसार काजू खाने से शारीर में इंसुलिन का लेवल बढ़ जाता है, इंसुलिन का लेवल बढ़ने से शारीर की मांशपेशिय कोशिकाएं शर्करा का भलीभांति जज्ब कर उपयोग करने लगती हैं| इतना ही नहीं इंसुलिन मष्तिक बैरियर को पर करके अपने साथ काजू, खरोटआदि में मौजूद ट्रीप्टोफेन को दिमाग में पंहुचा देता है जिससे सेरोटोनिन का उत्तपादन बढ़ जाता है| सेरोटोनिन हैप्पी हार्मोन है जो डिप्रेशन तनावादि को दूर करता है| एक अन्य प्रयोग से प्रमाणित हुआ है कि अल्झीमर्स की प्रारम्भिक अवस्था में दिमाग में इंसुलिन का लेवल कम हो जाता है| दिमागी कार्यकुशलता, याददाश्त एंव बुद्धिमता के लिये इंसुलिन बेहद जरुरी जैव रसायन है, इसी के द्वारा दिमाग के सूचना संसार का नेटवर्क संचालित होता है| काजू इंसुलिन के लेवल को बढाता है| 



       काजू स्नेहन, अनुलोमन, मूत्रल, कुष्ट, वेदनास्थापक, रक्तशोधक तथा ह्रदय होता है| यह श्रेष्ट कोटि का पौष्टिक मेवा है| इसमें पूर्ण तथा प्रथम श्रेणी का प्रोटीन होता है| काजू का प्रोटीन यूरिक एसिड तथा यूरिया का निर्माण नहीं करता| इसलिए यह सामिष आहार से भी उच्च कोटि का प्रोटीन आहार है| इसमें श्रेष्ट किस्म की वसा (46.9 प्रतिशत) होती है| जो जैतून एंव जन्तुज वसा से श्रेष्ट है| इस वसा को खाने से वजन टो बढता है परन्तु रक्त में कोलेस्ट्रोल नहीं बढता| इसमें प्रचुरता से विटामिन ‘बी’ कोम्पलेक्स थायमिन होता है जो नाड़ी मण्डल एंव पाचन संस्थान को शक्तिशाली बनाता है| यह मन्दाग्नि, अवसाद तथा स्नायु दौर्बल्य को दूर करता है| इसका लोहा शीघ्र अवचूषित होकर रक्तहीनता को दूर करता है| काजू को किशमिश, खजूर आदि सूखे मीठे फलो के साथ खाने से कब्ज, जनरल डेबिलिटी आदि अनेक प्रकार की बिमारिया दूर होती है तथा यह काफी स्वादिष्ट होता है| काजू में श्रेष्ट किस्म का ऑलिइक एसिड (73 प्रतिशत), लिनोलिक एसिड, स्टियरिक तथा पामिटिक एसिड नामक ग्लिसराइड्स वसाम्ल पाए जाते है| काजू का तेल घी से भी श्रेष्ट होता है| इसमें कैरोटिन विटामिन ‘ए’ होने से इसका रंग हल्का पीला होता है| काजू की गिरी कच्ची ही खाए| वैसे इसे भुन-तलकर तथा तलने के बाद नमक-मिर्च लगाकर भी खाते है| तलने-भूनने से इसके पोषक तत्व कम हो जाते है| 5-10 काजू के दाने रात्रि को भिगोकर सुबह उसे सिलबट्टे पर छोटी इलायची तथा खजूर डालकर पिसें| यह बहुत ही स्वादिष्ट, बल, वीर्य, स्वस्थ्य एंव सौन्दर्यवर्द्धक पेय है| प्रतिदिन 5 काजू खूब चबा क्र खाने के बाद एक चम्मच शहद चाटें| यह मष्तिक तथा नाड़ीमंडल को ताजगी प्रदान करता है तथा सभी प्रकार की कमजोरी को दूर करता हैं|

Saturday, May 9, 2015

स्वास्थ्य को नज़रंदाज़ न करें

इंसान भी कितना विचित्र है जो दौलत पाने के चक्कर में स्वास्थ्य खो देता है व स्वास्थ्य वापिस लाने के लिए दौलत खो देता है। न उसके पास दौलत बचती है न ही स्वास्थ्य। इसलिए आईये अपना हाथ बढ़ाएं व 'स्वास्थ्य भारत' के निर्माण का संकल्प करिएँ, इसी में हम सबकी भलाई हैं।

जवानी के जोश में व्यक्ति होश खो बैठता है उसे नज़र आता है शराब व कवाब का मजा व उसमे जग उठती है अंधाधुन्द धन कमाने की इच्छा| दौलत कमाने के चक्कर में अपना स्वास्थ्य खो बैठता है और फिर जीवन का सत्य नज़र आता है कि वह यह क्या कर गया| जब एक मजदुर को चैन की नींद सोते देखता है| बड़े अस्पतालों के चक्कर लगाते-2 उसकी नींद व शांति दोनों ही छीन चुकी होती हैं| आज उस डॉ. से समय (Appointment) लेना है तो आज दुसरे से| पर अब पछतावा क्या होता है जब चिड़िया चुग गयी खेत| अपनी मुर्खता पर आंसू बहाने के आलावा उसके पास कोई रास्ता नहीं रहता| 

      जैसे ही व्यक्ति 45 पर करता है निम्न रोंगों व दवाओं का कुचक्र उसको बर्बाद करने के लिए सामने खड़ा नज़र आता है|  

                  1.       उच्च रक्तचाप की दवा

                  2.       मधुमेह की दवा

                  3.       यूरिक एसिड कम करने की दवा

                  4.       कोलेस्ट्रोल कम करने की दवा

                  5.       एसिडिटी दूर करने की दवा

                  6.       नींद लेन की दवा

                  7.       डिप्रेशन दूर करने की दवा

                  8.       Anxiety नियंत्रण करने की दवा

                  9.       कव्ज दूर करने की दवा

                 10.      दर्द दूर करने की दवा


इन दस दवाओं में से कोई दो या तीन दवाएँ लगभग एक चोथाई जनता को 45 वर्ष से ऊपर की उम्र में देने की आवश्यकता आन पड़ी हैं| और यदि समाज में स्वास्थ्य के प्रति जाग्रति न आयी तो आने वाले 5 वर्षो में इस दवाओं की खपत दुगनी हो जाएगी| ये सभी दवाएँ Slow Poison हैं जो हमारे Liver को धीरे-2 करके Damage करती चली जाती है व व्यक्ति में अनेक जटिलताएं उत्पन्न होती हैं| यदि हम इनसे पीछा छुड़ाना है तो हमें युवा उम्र में ही कोई न कोई स्वास्थ्य संवर्धन का तरीका अवश्य अपनाना होगा| चाहे कोई योग केंद्र में जाएँ और चाहे कोई खेलकूद अपनाएं| अन्यथा स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही बढती उम्र हमारे लिए बहुत दर्दनाक साबित हो सकता हैं|






Friday, May 8, 2015

जटिल रोंगों का उपचार

भारतीय समाज में जटिल रोंगों (chronic diseases) की संख्या तेजी से बढ़ रही हैं| chronic रोंग उसे कहते है जो व्यक्ति का जल्दी से पीछा नहीं छोड़ते| पहले कोई दस-बीस हजार में एका-दुक्का इस प्रकार के रोग से पीड़ित होता था परन्तु अब हमारे समाज का दसवा भाग जटिल रोंगों के शिकंजे में फस चूका है| यदि यही स्थिति रही तो एक चोथाई जनता आने वाले पांच-सात वर्षो में नारकीय जीवन जीने को मजबूर होगी| 

    जटिल रोगों से तात्पर्य है – उच्च रक्तचाप, मधुमेह, एलर्जी, दमा, कैंसर, गाड़िया बाय, माइग्रेन, मिर्गी, न्युरोम्स्कुलर रोग आदि|

    यदि हम समग्र चिकित्सा (Integrated Therapies) को अपनाएं तभी इनका उपचार सम्भव है| अंग्रेजी पधति से इनको दबाया जाता है| इससे रोग किसी दुसरे रूप में उभर कर सामने आता है|
जटिल रोंगों के उपचार के लिए हमें पांचो कोषों पर एक साथ उपचार की आवश्यकता पड़ती है| ये कोष निम्न है|

               1.       अन्नमय कोष
               2.       प्राणमय कोष
               3.       मनोमय कोष
               4.       विज्ञानमय कोष
               5.       आनन्दमय कोष
 
     अन्नमय कोष में हम सात्विक भोजन व जड़ी-बूटी चिकित्सा तथा अन्य चिकित्सा पधतीयों (जैसे – प्राक्रतिक चिकित्सा आदि) को शामिल करते हैं|

     प्राणमय कोष में हम मुख्यत: गहरी साँस लेना व ब्रहाचर्य पालन को सर्वाधिक महत्त्व देते है| इसके अतिरिक्त इसमें यज्ञ चिकित्सा, चुम्बक, एक्यूप्रेशर आदि भी आते हैं| पर्वतीय क्षेत्रो में अथवा हरे-भरे क्षेत्रो में प्राण वायु अधिक होती है इस कारण वहाँ रोग का उपचार सरलता से होता है|

     मनोमय कोष में हमें अपना मनोबल ऊँचा रखना होता है मै शीघ्र स्वास्थ्य हो रहा हूँ इस प्रकार के भावो के कारण लाभ प्राप्त होता हैं| यह भी पाया गया कि एक महिला लोंगो से सहानभूति पाने के चक्कर में कमर दर्द का बहाना करती थी| उसे कामो से जी चुराने की भी आदत पड़ती गयी| धीरे-धीरे करके उसके कमर में दर्द बैठ गया और वह bed rest पर चली गयी| एक बार उन्होंने समस्या निवारण के लिए हम लोंगो से गायत्री का 24 घंटे का अखंड जप कराया हमारी टोली के एक साधक ने समस्या को भाप लिया व उस महिला को उसके रोंग का कारण बताया| पहले तो वह महिला आग बबूला हुयी किन्तु धीरे-2 उसने गायत्री जप को स्वीकार कर अपनी गलती में सुधार किया| जिसके आश्चर्यजनक परिणाम सामने आए| साढ़े तीन साल तक bed पर लेटी रही परन्तु एक दिन अपने मनोबल के सहारे उठकर चल दी| जब तक दवाइयां चलती रही महिला का रोग बढ़ता गया परन्तु जब एक साल से सारी दवाइयां बंद हो गयी वह महिला उढ़कर चल दी व स्वास्थ्य होती गयी|

     विज्ञानमय कोष में मन्त्र जप, तत्वज्ञान, देव सरक्षण व चक्र साधना आदि आते हैं| विज्ञानमय कोष बहुत ही शक्तिशाली माध्यम है रोंगों को ठीक करने का| जटिल रोंगों से मुक्ति पाने के लिए इसी कोष का उपचार ऋषि मुनि करते आए है| कहते है कि ऋषियों, देव शक्तियों के वरदान से व्यक्ति रोंग मुक्त हो गए|

     आनन्दमय कोष परमात्मा के समीप है| शांति व आनन्द से भरा है| इस कोष के द्वारा व्यक्ति में दिव्यता, आनन्द व शान्ति का संचार होता है जिससे उसका शीघ्र ही रोग निवारण हो जाता है|