Tuesday, March 8, 2016

तैलंग स्वामी part-VII

 कुछ दिनों बाद तैलंग स्वामी भदैनी से हटकर हनुमान घाट के पास आकर रहने लगे। इस घाट के समीप दक्षिण भारतीयों की बस्ती बस गयी थी। शाम के समय स्थानीय लोग बाबा के पास आते और उनका उपदेश सुनते थे। सामान्य लोगों को ईश्वर की महिमा का उपदेश देते हुए कहते थे-‘‘ईश्वर की महिमा अपरम्पार है। उनकी आरती करने के लिए चन्द्र-सूर्य के दीप जल रहे हैंपवन चंवर कर रहा हैतरु-लता पुष्पराशि लेकर उन्हें सुगंध दे रहे हैंसभी विहंग कीर्तन सुना रहे हैंवज्र शंख निनाद करते हैंभक्तिश्रद्धाशन्तिकरुणामुक्ति जिनकी पद सेवा करते हैंवैराग्यज्ञानयोगधर्म जिनके द्वारा के प्रहरी है जो जीव के कर्मानुसार फल का विधान कर रहे हैं। लोग उन्हें भले ही भूल जायँपर वे किसी का त्याग नहीं करते। जो मायानिद्राभंगकर जाग्रत करने के लिए सभी का आह्नान कर रहे हैं। स्वयं निर्गुण होते हुए भी त्रिगुणों से त्रिजगत् को बांधे हुए हैं। उनकी आराधना करना हम सबका धर्म है।’’
            काशी में विभिन्न सम्प्रदाय के साधु-सन्त प्राचीनकाल से रहते आये हैं। नगर के लोग अपनी रुचि के अनुसार ऐसे संतों के यहाँ जाकर प्रवचन सुनते हैंउनके भोजन-वस्त्र का प्रबन्ध करते हैं। उनकी अभ्यर्थना करते हैं। तैलंग स्वामी के निकट भी उनकी योग विभूति से प्रभावित होकर लोग आते थे। ऐसे ही लोगों में श्यामदास नामक एक युवक काशी आया। बचपन से ही इन्हें योग सीखने की लालसा थी। देश के कोने-कोने में स्थित तीर्थ स्थानों में गया। वहाँ के अनेक साधु सन्तों से मिलापरन्तु उसे कहीं सफलता नहीं मिली। काशी आने पर तैलंग स्वामी की चर्चा सुनकर उनके पास आने-जाने लगा। स्वामीजी अपने प्रवचनों में आध्यात्म की बातें बडे़ सरल ढंग से समझाते थे।
            श्यामदास घर छोड़कर योग सीखने के उद्देश्य से यहाँ आया हैइस बात की जानकारी जब तैलंग स्वामी को ही गयी तब वे एक दिन उसे समझाते हुए कहने लगे-‘‘यह ठभ्क है कि आत्मज्ञान के लिए योग सीखना पड़ता है। इसके लिए गृहत्याग या अरण्यवास की आवश्यकता नहीं होती। इसके कुछ नियम हैं जिनका चिन्तन और तदनुरूप आचरण करने से योग-फल तथा आत्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए किसी प्रकार की कठिन साधना नहीं करनी पड़तीकेवल उसका अनुध्यान करने पर योगफल प्राप्त किया जा सकता है। इसे सरल योग कहते हैं। योग-फल प्राप्त करने के लिए जिन सब वृत्तियों का निरोध करना आवश्यक होता हैउनको किये बिना योग-फल की प्राप्ति नहीं हो सकती। उन नियमों और प्रकारों को इस नियमावली में स्थान दिया गया है। इस प्रकार आचरण करने और हृदय में इस प्रकार के भावों को ग्रहण करने पर निश्चय ही योग-फल की प्राप्ति हो सकती है।’’
            इतना कहने के बाद सहसा तैलंग स्वामी चुप हो गये। सामान्य श्रोताओं ने कोई प्रश्न नहीं कियापरन्तु श्यामदास जिज्ञासु प्रवृत्ति का होने के कारण पूछ बैठा- ‘‘कृपया उन नियमों को बताने का कष्ट करें।’’
            तैलंग स्वामी ने कहा- ‘‘पहलाअसंतुष्ट मनुष्य किसी को भी संतुष्ट नहीं कर सकता। जो सर्वदा संतुष्ट रहता हैवह सबको प्रफुल्ल कर सकता है।
            दूसरा- जिह्ना पाप की बातें कहने में बहुत ही तत्पर रहती हैउसे संयत करना आवश्यक है।
            तीसरा- आलस्य सब अनर्थों का मूल है। प्रयत्न करके इसका त्याग करना चाहिए।
            चैथा- संसार धर्माधर्म की परीक्षा की भूमि हैसावधान होकर धर्माधर्म की परीक्षा करके कार्य का अवलम्बन करें।
            पांचवां- किसी भी धर्म के प्रति अश्रद्धा न रखेंसभी धर्म का सार हैउनमे अवश्य ही सत्य निहित है।
            छठां- दरिद्र को दान दो। धनी को देना व्यर्थ हैक्योंकि उसे आवश्यकता नहींइसीलिए वह आनन्दित नहीं होता।
            सातवां- साधु का सहवास ही स्वर्ग तथा असत्संग ही नरकवास का मूल है।
            आठवां- आत्मज्ञानसत्पात्र में दान और संतोष का आश्रय करने पर ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।
            नौवां- जो शास्त्र को पढ़कर तथा उसके अभिप्राय को जानकर उसका अनुष्ठान नहीं करतेवे पापी से अधम है।
            दसवां- किसी भी कार्य के अनुष्ठानों के मूल में धर्म होना चाहिएनहीं तो सिद्ध नहीं होगी।
            ग्यारहवां- कभी किसी की भी हिंसा न करो। सत् या असत् उद्देश्य से कभी किसी प्राणी का वध न करो।
            बरहवां- जो आदमी पाप-कलंक को बिना धोयेमिताचारी और सत्यानुरागी बिना हुए गेरुआ वस्त्र धारण कर ब्रह्मचारी बनता हैवह धर्म का कलंक स्वरूप है।
            तेरहवां- बिना छप्पर के घर में जैसे वर्षा का पानी गिरता हैचिन्तन रहित मन में भी उसी प्रकार शुत्र प्रवेश करते हैं।
            चैदहवां- पापी लोग इहकाल में अनुतापाग्रि से दग्ध होते हैंवे जब-जब अपने कुकर्मों को याद करते हैं तब-तब उनके प्राणों में अनुताप जाग उठता है।
            पन्द्रहवां- (क) मननशीलता अमरत्व की प्राप्ति का मार्ग हैमनन-शून्यता मृत्यु का मार्ग है।
            (ख) गर्व न करोकामोपभोग का चिन्तन न करो।
            सोलहवां- शत्रु शत्रु का जितना अनिष्ट नहीं कर सकताकुपथगामी मन मनुष्य का उससे भी अधिक अनिष्ट करता है।
            सतरहवां- मधु मक्षिका जिस प्रकार पुष्प के सौदन्र्य अथवा सुगन्ध का अपचय न करके मधु संग्रह करती हैतुम भी उसी प्रकार पाप में लिप्त न होकर ज्ञान प्राप्त करो।
            अठारहवां- यह पुत्र मेरा हैयह ऐश्वर्य मेरा हैअति अज्ञानी लोग भी इस प्रकार चिन्तन करके क्लेश पाते हैं। वह स्वयं अपने लिए नहीं है तब पुत्र और सम्पत्ति किस प्रकार अपने हो सकते है।
            उन्नसवां- कम ही लोग भवसागर पार होते हैंअधिकांश लोग तो धर्म का ढोंग रचकर किनारे पर ही दौड़-धूप करते है।
            बीसवां- संग्राम में जिसने लाखों मनुष्यों को जीत लिया हैवह मनुष्य वास्तविक विजयी नहीं है। जिसने अपने आपको जीत लिया हैवही वास्तविक विजयी है।
            इक्कसवां- पाप मुझ पर आक्रमण नही कर सकता- यह सोचकर निश्चिन्त मत रहो। एक-एक बूंद से जल का घड़ा भर जाता हैवैसे ही निर्बोध मनुष्य क्रमशः पापमय हो जाते है।
            बाइसवां- किसी को कठोर वचन मत बोलो। कठोर वचन कहने से कठोर बात सुननी पड़ेगी। चोट करने पर चोट सहनी पडे़गी। रुलाने से रोना पड़ेगा।
            तेइसवां- जो लोग वासना को नहीं जीत सकतेउनका मन नंगे बदनजटा-धारणभस्म लेपनउपवासमृत्तिका शय्या इत्यादि से पवित्र नहीं हो सकता।
            चैबीसवां- दूसरों को जैसा उपदेश देते होस्वयं भी वैसा बन जाओ। जिसने अपने को वशीभूत कर लिया हैवह दूसरे को भी वश मे कर सकता। अपने को वश में करना कठिन है। 
            पचीसवां- पाप और पुण्य सब निज कृत होते हैं। कोई आदमी दूसरे को पवित्र नहीं कर सकता।
            छब्बीसवां- यह जगत् जल बुद-बुदमृग मरीचिका के समान है जो इस जगत् को तुच्छ जानता हैमृत्यु उसे नहीं देख पाती।
            सत्ताइसवां- दौड़ती हुई गाड़ी के समान उत्तेजित क्रोध को जो संयत कर सकता हैवह यथार्थ सारथि है। दूसरे लोग केवल रास पकड़े हुए हैं।
            अठाइसवां- प्रेम के बल से क्रोध को जीतोमंगल के द्वारा अमंगल को जीतो तथा सत्य के द्वारा मिथ्या को जीतो।
            उन्तीसवां- गुरु जो उपदेश देंउसे मन लगाकर सुनो और पालन करो।

            तीसवां- व्यर्थ मत बोला करोजो अधिक बोलता हैवह निश्चय ही अधिक झूठ बोलता है। जहाँ तक होबातें कम करने की चेष्टा करो। उसके साथ ही शन्ति प्राप्त होगी।

तैलंग स्वामी part-vi

            यह स्वामी जी के इलाहाबाद रहने के समय की घटना है। एक दिन स्वामीजी नदी किनारे चुपचाप बैठे थे। कुछ लोग स्नान कर रहे थे और कुछ स्नान के बाद घर की ओर जा रहे थे। अचानक तेज हवा चलने लगी। बालू उड़ने लगा। नदी में लहरें नृत्य करने लगीं। देखते ही देखते मूसलाधार पानी बरसने लगा। जो लोग नदी किनारे थे, वे अपना-अपना सामान लेकर सुरक्षित स्थान की ओर भागने लगे।
            रामतरण भट्ठचार्य नामक एक व्यक्ति जो कि स्वामीजी से परिचित था, उनके पास आकर बोला-‘‘स्वामीजी पानी में क्यों भींग रहे हैं। चलिये, सामने की दुकान में बैठें।’’
            गणपति स्वामी रेत पर पद्यासन लगाये बैठे थे। उन्होंने कहा-‘‘मेरे लिए चिन्तित होने की जरूरत नहीं है। मुझे कोई कष्ट नहीं हो रहा है। तुम जा सकते हो।’’
            रामतरण ने पुनः कहा-‘‘पानी रुक जाने पर आ जाइयेगा। यहाँ भींगने से बीमार हो सकते हैं।’’
            स्वामीजी ने कहा-‘‘मैं यहाँ एक आवश्यक कार्य के लिए बैठा हँू। अभी जाना सम्भव नहीं है।’’
            इस भयंकर आंधी-पानी में कोई-सा आवश्यक कार्य है, यह रामतरण समझ नहीं सका। तभी स्वामीजी ने नदी की ओर इशारा करते हुए कहा-‘‘उधर देखो, एक नाव आ रही है जिस पर कुछ यात्री बैठे हैं। वह डूबनेवाली है। उन्हें अकाल-मुत्यु से बचाना है।’’
            रामतरण ने देखा- बहुत दूर यात्रियों से लदी एक नाव लहरों के थपेड़े से बुरी तरह डगमगा रही है। लेकिन वह समझ नहीं सका कि नाव के डूबने पर स्वामीजी यहाँ बैठे-बैठे कैसे बचायेंगे। कौतूहलवश वह देखने के लिए रुक गया और वर्षा में भींगता रहा। अचानक उसने देखा कि नाव सचमुच डूब गयी। इधर स्वामीजी अपनी जगह से गायब दिखाई दिये। कुछ ही क्षणों में उसने जो दृश्य देखा, उसे देखकर उसे अपार विस्मय हुआ। यात्री से लदी वह नाव पानी के ऊपर आ गयी है। नाव के एक छोर पर स्वामीजी बैठे दिखाई पड़ रहे थे।
            धीरे-धीरे नाव घाट पर आकर लग गयी। सभी यात्री स्वामीजी को प्रणाम करने के बाद चले गये। रामतरण ने स्वामीजी के पैर पकड़ते हुए कहा- ‘‘महाराज यह चमत्कार आपने कैसे किया। आपको कैसे मालूम हुआ कि नाव डूबनेवाली है और आप अपने आसन से अचानक गायब होकर नावपर दिखाई दिये। यह सब कैसे हुआ?’’
            गणपति स्वामी ने कहा- ‘‘यह कार्य कोई भी कर सकता है। इसके लिए केवल दृढ़ इच्छा-शक्ति चाहिए जो केवल भगवद्-कृपा से प्राप्त होती है। मैंने कुछ भी नहीं किया। मेरे मन में उन्हें बचाने की भावना उत्पन्न हुई, ईश्वर ने मेरे माध्यम से स्वयं किया, इसमें आश्चर्य की क्या बात है?’’
            रामतरण की साधारण बुद्धि में यह बात नहीं आयी। उसने कल्पना की कि स्वामीजी अवश्य कोई अलौकिक पुरुष है। इस घटना के बाद से रामतरण बाबा की सेवा में लगा रहता था।
            इलाहाबाद में स्वामीजी चार वर्ष तक थे। रामतरण तथा कुछ अन्य भक्तों के अलावा स्वामीजी के बारे में अन्य किसी को कोई विशेष जानकारी नहीं हुई।
            सन् 1030 ई. में जब अवध का पतन होने लगा और इलाहाबाद में गृहयुद्ध प्रारम्भ हुआ तब स्वामीजी काशी चले आये। यहाँ नगर के दक्षिणी भाग स्थित एक सुनसान स्थान में आकर रहने लगे। उन दिनों जंगमबाड़ी के आगे सम्पूर्ण क्षेत्र जंगली इलाका था जो भद्रवन (भदैनी) के नाम से प्रसिद्ध था। अस्सी के समीप जहाँ तुलसीदास जी रहते थे, उन दिनों उसका नाम तुलसीदास का बाग था। यहाँ रहते समय स्वामीजी टहलते हुए कभी-कभी लोलार्क कुण्ड तक चले आते थे। स्वामीजी की भाषा और रंग-रूप देखकर लोग कहते तैलंगाना से एक बाबाजी यहाँ आये हुए हैं।
            स्वामीजी का वास्तविक नाम स्थानीय जनता नहीं जानती थी। तैलंगाना स्वामी के स्थान पर आपका नाम तैलंग बाबा, तैलंग स्वामीहो गया। यहाँ के लोगों के इस संबोधन से सम्पूर्ण भारत में यही नाम प्रचारित हुआ।
            एक दिन तैलंग स्वामी लोलार्क कुण्ड के समीप आये तो देखा-कुष्ठ रोग से पीडि़त एक आदमी दर्द से कराह रहा है। दयार्द्र होकर स्वामीजी ने पूछा- ‘‘यहाँ रास्ते में क्यों पड़े होत्र तुम्हें घर पर रहना चाहिए।’’
            रोगी ने कहा- ‘‘यहाँ मेरा घर नहीं है। मेरा घर अजमेर में है। इस रोग के कारण मुझे मेरे परिवार वालों ने घर से निकल दिया है। सभी मुझसे नफरत करने लगे तब मैं बाबा के दरबार में चला आया। यहाँ मरने से मुक्ति मिल जायेगी पता नहीं, किस जन्म का पापा भोग रहा हँू।’’
            स्वामीजी ने पूछा- ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’
            ‘ब्रह्मा सिंह ।
            ‘‘जाओ, कुण्ड में स्नान कर आओ। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करुँगा। घबराने की कोई बात नहीं है। सब ठीक हो जायगा।’’
            ब्रह्मा सिंह अति कष्ट से स्न्नान करके लौटा तब स्वामी जी ने उन्हें कुछ बेलपत्र देते हुए कहा- ‘‘इसे चबाकर खा जाओ। अब नित्य कुण्ड में स्नान करने के बाद मेरे पास चले आना। मैं पास ही में रहता हँू। जल्द ही यह रोग दूर हो जायगा।’’
            ब्रह्मा सिंह की आँखें प्रसन्नता स ेचमक उठीं। वह लगातार महीनों तक यह क्रिया करता रहा। उसने महसूस किया कि उसका रोग क्रमशः ठीक हो रहा है एक दिन श्रद्धा से गद्गद् होकर उसने बाबा से निवेदन किया- ‘‘आपने मुझे जीवनदान दिया है। आज से यह शरीर आपका है। कृपया मुझे सेवक के रूप में स्वीकार कर लें। मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।’’
            कुछ दिनों बाद स्वामीजी तुलसी बाबा से हटकर वेदव्यास में आकर रहने लगे। एक दिन ब्रह्मा सिंह के साथ स्नान करने के लिए गंगा किनारे आये तो देखा-एक जगह भीड़ लगी हुई है। पास जाने पर मालूम हुआ कि एक बंगाली युवक जो कि अर्से से तपेदिक से परेशान था, शायद आज उसका काल आ गया है। खून की कै कर रहा है।
            तैलंग स्वामी ने कहा- ‘‘आप लोग जरा हट जाइये। मैं जरा उसे देखना चाहता हँू।’’ स्थानीय लोग बाबा से अच्छी तरह से परिचित थे। दो-चार लोगों को विश्वास हो गया कि शायद बाबा की कृपा पाकर यह स्वस्थ हो जाय या आराम मिले।
            तैलंग स्वामी ने पूछा-‘‘कहाँ रहते हो?’’
            तभी भीड़ में से किसी ने कहा- ‘‘केदार घाट के पीछे एक बंगाली के मकान में रहता है नाम है सीतानाथ वंद्योपाध्याय।’’
            स्वामीजी उसके पास बैठकर छाती सहलाने लगे। थोड़ी सी राहत महसूस होने के बाद वह उठकर बैठ गया।
            स्वामीजी ने कहा- ‘‘अभी बैठे रहो । तुम्हारा कष्ट दूर हो जायगा।’’
            इतना कहने के पश्चात् तैलंग स्वामी नदी किनारे से थोड़ी सी मिटृी लाकर बोले-‘‘लो थोड़ा-सा खा लो। बाकी मिटृी का प्रलेप छाती पर लगा लो। नित्य स्नान करने के बाद यहीं गंगा की मिटृी का प्रलेप लगाते रहना आराम हो जायगा।’’
            कुछ दिनों बाद सीतानाथ पूर्णरूप से स्वस्थ हो गया। कृतज्ञता प्रकट करने के लिए स्वामीजी के पास आकर उसने कहा- ‘‘स्वामीजी, अगर आप कृपा न करते तो मैं मर ही जाता। बड़ी कृपा होगी, अगर आप मुझे मंत्र देकर शिष्य बना लें। मैनंे अभी तक दीक्षा नहीं ली है।’’
            स्वामीजी ने कहा- ‘‘मैं किसी को दीक्षा नहीं देता। मेरा कोई शिष्य भी नहीं है। ब्रह्मा सिंह मेरे साथ रहता है, इससे पूछा लो। यह केवल मेरी सेवा करता है।’’
            इस उत्तर को सुनकर सीतानाथ चुप हो गया, फिर कुछ कहने का साहस नहीं हुआ।
            हरिश्चन्द्र घाट स्थित श्मशान काशी का प्राचीन श्मशान है चैक स्थित महाश्मशान के आसपास बस्तियाँ बस जाने के कारण मणिकर्णिका घाट पर प्राचीन श्मशान आ गया था। यही वजह है कि बाहर से आने वाले अधिकांश शव हरिश्चन्द्र घाट पर आने लगे।
            एक दिन ब्रह्मा सिंह को साथ लेकर तैलंग स्वामी श्मशान की ओर आये। कुछ देर बाद अनेक लोग एक शव को लेकर किनारे उतारने लगें शवयात्रियों के पीछे एक महिला जोर-जोर से रोती हुई आ रही थी। ज्यों ही शव को भूमि पर लोगों ने रखा त्योंही उक्त महिला उससे लिपट गयी। बड़ी मुश्किल से उस महिला को शव से अलग किया जा सका।
            स्वामीजी ने ब्रह्मा सिंह को शव यात्रियों के पास घटना की जानकारी के लिए भेजा तो पता लगा कि मृत व्यक्ति की पत्नी शव के साथ सती होना चाहती है। निस्सन्तान ब्राह्मणी है। दूसरी जाति की होती तो पुनर्विवाह कर लेती।
            सारी बातें सुन लेने के बाद स्वामीजी उक्त महिला के पास आये। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले-‘‘शान्त हो जा बेटी।’’
            स्नेह भरे इस शब्द को सुनते ही महिला ने एक बार स्वामीजी की ओर देखा और फिर उनके चरणों पर अपना मस्तक रखती हुई बोली- ‘‘मैं अब जीना नहीं चाहती। बाबा जी, इन लोगों को समझाइये। अब मैं किसके लिए जीऊँ?’’
            स्वामीजी ने कहा- ‘‘मेरा पैर तो छोड़ तुझे तो अभी जीवित रहना है। पति की सेवा करनी है।’’
            ‘पति की सेवा करनी है?’ यह बात सुनते ही महिला ने चीखकर पूछा- ‘‘क्या?’’
            उपस्थित लोग विस्मय से बाबा को देखने लगे। तभी तैलंग स्वामी ने शव के नाभिस्थल में पैर का अंगूठा लगा दिया। क्षण भर बाद लाश कुनमुनाने लगी। स्वामीजी ने कहा- ‘‘इसके बंधन खोल दो।’’
            लोग शव के बधन खोलने लगे। शेष लोग चकित दृष्टि से शव को जीवित होते देखने में लगे रहे। स्वामीजी चुपचाप अन्तर्धान हो गये। महिला, जीवित ब्राह्मण तथा साथ आये लोगों में कोई अपनी कृतज्ञता प्रकट नहीं कर सका।
           

Sunday, March 6, 2016

नस पर नस चढ़ना के कुछ घरेलू उपचार

  • अगर आपकी नस पर नस चढ़ जाती है तो आप जिस पैर की नस चढ़ी है तो  उसी तरफ के हाथ की बीच की ऊँगली के नाखून के नीचे के भाग को दबाए और छोड़ें ऐसा जब तक करें जब तक ठीक न हो जाए!
  • नस पर नस चढ़ना एक बहुत साधारण सी प्रक्रिया है, लेकिन जब भी शरीर में कहीं भी नस पर नस चढ़ना जाए, जान ही निकाल देती है और अगर रात को सोते समय पैर की नस पर नस चढ़ना जाए तो व्यक्ति चकरघिन्नी की तरह घूम कर उठ बैठता है,नस पर नस चढ़नासूजन और दर्द अलग | तो यदि आपके साथ हो जाये तो तुरंत ये उपाय करें
(आप लंबाई में अपने शरीर को आधा आधा दो भागों में चिन्हित करें, अब जिस भाग में नस चढ़ी है उसके विपरीत भाग के कान के निचले जोड़ पर उंगली से दबाते हुए उंगली को हल्का सा ऊपर और हल्का सा नीचे की तरफ बार बार 10 सेकेंड तक करते रहें | नस उतर जाएगी |)
  • सोते समय पैरों के नीचे मोटा तकिया रखकर सोएं।
  • आराम करें। पैरों को ऊंचाई पर रखें।
  • प्रभाव वाले स्थान पर बर्फ की ठंडी सिकाई करे। सिकाई 15 मिनट, दिन में 3-4 बार करे।
  • अगर गर्म-ठंडी सिकाई 3 से 5 मिनट की (दोनों तरह की बदल-2 कर) करें तो इस समस्या और दर्द – दोनों से राहत मिलेगी।
  • आहिस्ते से ऎंठन वाली पेशियों, तंतुओं पर खिंचाव दें, आहिस्ता से मालिश करें।
  • वेरीकोज वेन के लिए पैरों को ऊंचाई पर रखे, पैरों में इलास्टिक पट्टी बांधे जिससे पैरों में खून जमा न हो पाए।
  • यदि आप मधुमेह या उच्च रक्तचाप से ग्रसित हैं, तो परहेज, उपचार से नियंत्रण करें।
  • शराब, तंबाकू, सिगरेट, नशीले तत्वों का सेवन नहीं करें।
  • सही नाप के आरामदायक, मुलायम जूते पहनें।
  • अपना वजन घटाएं। रोज सैर पर जाएं या जॉगिंग करें। इससे टांगों की नसें मजबूत होती हैं।
  • फाइबर युक्त भोजन करें जैसे चपाती, ब्राउन ब्रेड, सब्जियां व फल। मैदा व पास्ता जैसे रिफाइंड फूड का सेवन न करें।
  • लेटते समय अपने पैरों को ऊंचा उठा कर रखें। पैरों के नीचे तकिया रख लें, इस स्थिति में सोना बहुत फायदेमंद रहता है।
    भोजन :




    – भोजन में नीबू-पानी, नारियल-पानी, फलों – विशेषकर मौसमी, अनार, सेब, पपीता केला आदि शामिल करें।
    – सब्जिओं में पालक, टमाटर, सलाद, फलियाँ, आलू, गाजर, चाकुँदर आदि का खूब सेवन करें।
    – 2-3 अखरोट की गिरि, 2-5 पिस्ता, 5-10 बादाम की गिरि, 5-10 किशमिश का रोज़ सेवन करें।

Friday, March 4, 2016

तैलंग स्वामी PART-V

      रामापुरा मुहल्ले में पण्डित शिवप्रसाद मिश्र रहते थे वे नित्य स्नान करने के लिए दशाश्वमेध घाट आते थे। तैलंग स्वामी के निकट लोगों की भीड़ देखकर उनके मन में आशा का संचार हुआ। उनका एक मात्र पुत्र काफी दिनों से लकवा रोग से पीडि़त था। एक नि उसे गोद में लेकर तैलंग स्वामी के पास आये।
     तैलंग स्वामी के चरणों के पास उसे रखते हुए उन्होंने बताया  िकइस लड़के का इलाज काफी जगह कराया। झाड़-फूंक, टोटका, जिसने जो कहा, सब किया, पर जरा-सा लाभ नहीं हुआ। यह स्वयं कष्ट पा रहा है और हम सबको कष्ट दे रहा है। इसका कष्ट अब हम लोगों से देखा नहीं जा रहा है। स्वामीजी, इसे ऐसा आर्शीवाद दीजिए ताकि यह ठीक हो जाय या इसे मुक्ति मिल जाय। इतना कहते-कहते मिश्रजी फफककर रो पड़े।
     करुणामय तैलंग स्वामी ने बालक को नीचे से ऊपर तक कई बार देखा। इसके बाद उसके सिर पर हाथ फेरने के बाद बोले-‘‘इस बालक को अब तुम घर ले जाओ। इसका भोगदण्ड समाप्त हो गया है। कुछ दिन और प्रतीक्षा करो। भगवान् इस बालक पर अवश्य कृपा करेंगे।’’ 
     आशा की क्षीण-रेखा पाकर मिश्रजी आनन्द से विभोर हो उठे। तैलंग स्वामी के चरणों की धूल बच्चे के तथा अपने सिर से लगाने के पश्चात् घर चले आये। इस घटना के एक सप्ताह बाद बालक पूर्णरूप से स्वस्थ हो गया। लेकिन यह घटना तैलंग स्वामी के लिए मुसीबत बन गयी। अनेक पीडि़त लोग आपके पास आने लगे।
     इस मुसीबत से बचने के लिए उन्होंने मौन व्रत धारण कर लिया। इसके बावजूद पीडि़त अभावग्रस्त लोग आते रहे। आनेवाले लोगों में एक व्यक्ति स्वभाव का क्रूर था। जब उसकी इच्छा की पूर्ति नहीं हुई तब उसने तैलंग स्वामी को तड़पाकर मारने की युक्ति निकाली।
     एक हडि़या में चूने का घोल बनाकर लाया और कहा- ‘‘स्वामीजी, आपके लिए भैंस का गाढ़ा दूध लाया हँू। कृपया इसे ग्रहण कीजिए।’’ यह व्यक्ति जब कीाी स्वामीजी के पास आता तब देखता कि आगन्तुक लोग स्वामीजी को काफी भोजन देते हैं। स्वामीजी प्राप्त सभी भोजन को अनायास खा जाते हैं। एक बार एक सेठ ने लगभग आधा मन खाद्य पदार्थ खिलाया था। दूसरी ओर स्वामीजी बिना भोजन के चार-पांच दिन तक अनाहार रह जाते थे।
     इस व्यक्ति का क्या उद्देश्य है, स्वामीजी समझ गये। वह व्यक्ति भी पक्का धूर्त था। अपने सामने स्वामीजी को घोल पी जाने के लिए आग्रह करता रहा ताकि इनका मौन भंग हो जाय। पीड़ा से चिल्लाने लगें। स्वामीजी बिना हिचके सारा घोल पी गये। इस व्यक्ति का अन्दाजा था कि थोड़ी देर बाद स्वामीजी छटपटाने लगेंगे।
     थोड़ी देर बाद स्वामीजी अपने स्थान से उठकर एक स्थान पर पेशाब करने लगे। पेशाब के साथ सारा चूना निकल गया। इशारे से उस व्यक्ति को बुलाकर उन्होंने यह दृश्य दिखाया।
     उस दृश्य को देखते ही भय से उसकी आँखें फटने लगी। बिना कुछ बोले वह तेजी से घर की ओर भाग गया। घर पर आते ही पेट-पीड़ा से छटपटाने लगा। उसकी चिन्ताजनक स्थिति देखकर परिवार के लोग घबड़ा गये। अचानक इसे क्या हो गया। पूछने पर उसने अपने पाप की कहानी सुनायी। परिवार के वृद्ध पुरुष ने कहा-‘‘इसे डाक्टर वैद्य ठीक नहीं कर सकेंगे। इसे तुरत स्वामीजी के पास ले जाओ। अगर वे क्षमा कर देंगे तो ठीक होगा, वर्ना सन्तों के साथ छल करने का पाप भोगेगा।’’
     इस सुझाव को मानकर लोग उसे तैलंग स्वामी के पास ले आये। परिवार के सदस्यों के अलावा उसने स्वयं स्वामीजी के पैर पकड़कर क्षमायाचना की।
     करुणामय की करुणा जागी। उन्होंने उसके पेट और मस्तक पर हाथ फेरा। थोड़ी ही देर में कष्ट दूर हो गया।
     दशाश्वमेध घाट के जिस स्थान पर स्वामीजी रहते थे, वहाँ वे हमेशा पूर्ण रूप से नंगे रहते थे। अपने स्थान से अन्यत्र जाते समय कोपीन जरूर पहन लेते थे।
     एक बार कुछ सैलानी यात्रियों की शिकायत पर पुलिस तैलंग स्वामी को पकड़ ले गयी। मुगलों का शासन समाप्त हो गया था। जिलाधीश अंग्रेज था उसकी अदालत में स्वामीजी को पेश किया गया।
     सारी बातें सुनने के बाद जिलाधीश ने कहा- ‘‘स्वामीजी, समाज में इस तरह रहना कानूनन अपराध है। मैं यह जानता हँू कि भारतीय संन्यासी अधिकतर नंगे रहते हैं। पर वे मठ में रहते हैं। खुले आम सड़क पर नंगे रहने पर सजा होगी। अगर आपको लोगों के बीच रहना है तो कपड़े पहनकर......।
     कहते-कहते जिलाधीश रुक गया। उसने यह देखा कि स्वामीजी मेरी बातों पर ध्यान देने की जगह वह दूसरी ओर देख रहे हैं। यह उपेक्षा उसके लिए असहनीय हो उठी। उसने आदेश दिया-‘‘बाबाजी को पकड़कर जेल में बन्द कर दिया जाय।’’
     स्वामीजी को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस ज्योंही कठघरे के पास आयी त्योंही वे गायब हो गये। सारी आदलत भौचक्क रह गयी।
     स्वामीजी पकड़े गये है’, सुनकर काशी के अनेक नागरिक अदालत में आये थे। जिलाधीश के फैसले पर लोग अप्रसन्नता प्रकट कर रहे थे। तभी यह घटना घटी और लोग खुशी से नाच उठे-‘‘हर-हर महादेव! बाबा साक्षात् भोलेनाथ हैं। उनकी नगरी में उन्हें कौन गिरफ्तार कर सकता है?’’- कहने लगे।
     जिलाधीश के आदेश पर अदालत के बाहर उनकी खोज की गयी, पर कहीं कुछ पता नहीं चला। इस अपमान से जिलाधीश बौखला गया।
     बाबा के एक बंगाली भक्त इसी अदालत में जज थे। जब उन्हें बाबा की गिरफ्तारी की सूचना मिली तब वे तुरन्त जिलाधीश की अदालत में आये। सारी घटना सुनने के बाद उन्होंने जिलाधीश से कहा- ‘‘भारत में अधिकांश संन्यासी निर्वस्त्र रहते हैं। धार्मिक स्थलों के नागरिक इनकी इस आदत को बुरा नहीं मानते। फिर तैलंग स्वामी सिद्ध योगी हैं। आपको उन्होंने अपनी योग-शक्ति दिखाई है। मेरा अनुरोध है कि आप इस मामले को डिसमिस कर दीजिए।’’
     बात समाप्त होते ही स्वामीजी प  ुनः उसकी कठघरे में दिखाई दिये, जहाँ वे पहले खड़े थे। जिलाधीश इस चमत्कार से प्रभावित हो गया। उसका सारा क्रोध पल भर में शान्त हो गया।

     बंगाली जज ने पुनः कहा-‘‘पूज्य स्वामीजी के लिए वास-भवन और कारागार समान है। क्रोध, हिंसा, अपमान, भय से आप ऊपर उठ गये हैं। ऐसे महान् विभूति के साथ हमें श्रद्धा का व्यवहार करना चाहिए।’’

विजय कृष्ण गोस्वामी ओर तैलंग स्वामी PART-IV

     बंगाल में अनेक सन्तों की ख्याति है जिनमें लोकनाथ ब्रहमचारी, श्यामाचरण लाहिडी प्रभुपाद विजय कृष्ण गोस्वामी ओर स्वामी रामकृष्ण परमहंस प्रमुख है। प्रभुपाद विजय कृष्ण गोस्वामी भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के दादा गुरु थे। विजय कृष्ण गोस्वामी के योग साधना के मार्ग पर तैलंग स्वामी ने ही लगाया था। एक जमाना था जब गोस्वामी जी कहर ब्रह्म समाजी थे। सम्पूर्ण बंगाल उन्हें ब्रहम समाज के नेता के रूप में जानता था। आगे चलकर उन्होंने ब्रहम समाज छोड़ना पूर्ण योगी व भक्त का जीवन जिया।
     उन दिनों गोस्वामी जी के मन में आध्यात्मिक उन्नति व सन्तों के दर्शन की इच्छा उत्पन्न हो रही थी। आप इसकी पूर्ति हेतु काशी आए। प्रथम दर्शन में तेलंग स्वामी ने इनके ऊपर कीचड़ व मेला फेंक दिया ताकि घृणावश वो उनके पास न जाएँ। परन्तु बाद में इनमें आपस में पर्याप्त प्रेम हो गया था।
     एक दिन गोस्वामी की तेलंग स्वामी से पूछा-‘‘मैं अपने गुरु की तलाश में निकला हँू। ब्रहम समाजी होने के कारण कोई मुझे शिष्य नहीं बनाता एवं बिना गुरु के पूण्ज्र्ञ ज्ञान होना सम्भव नहीं है।’’
     इसके उत्तर में स्वामी जी बोले-‘‘गोस्वामी तुममें वो लक्षण प्रस्फुटित हो रहे हैं जो ईश्वर प्राप्ति के लिए आवश्यक है। परन्तु इस तरह गुरु की तलाश करना व्यर्थ है। मैं जानता हूँू तुम्हारे वास्तविक गुरु कौन है। समय आने पर वे तुम्हें अपने पास बुला लेगें। उससे पहले तुम्हें स्वयं को उस लायक बनाना होगा। सर्वप्रथम तुम गुरु की महत्ता जानो। इतना कहने के पश्चात् उन्होंने अपने सेवक मंगल के दरवाजा बन्द करने के लिए कहा जिसमें कोई भीतर न आने पाए। इसका कारण यह था कि गुरु की महत्ता जान अन्य लोग भी स्वामी जी को अपना गुरु बनाने का आग्रह करने लगते।
     तैलंग स्वामी बोले-‘‘गुरु शब्द का अर्थ है-ग से गतिदाता, र शब्द सेे सिद्धिदाता ओर 3 शब्द से मुक्तिदाता। अर्थात् जिसके सम्पर्क से साधना में गति मिले, जो साधना के सिद्धि की ओर ले जाए ओर मुक्तिदाता बन अज्ञान रूपी अन्धकार के जीवन से नष्ट कर सके। शिष्य के भवसागर से पार कराने की पूरी जिम्मेदारी गुरु की हो जाती है। इसलिए गुरु के शिष्य व शिष्य के गुरु बहुत सोच विचारकर ही बनाना चाहिए। गुरु ही विधाता है, गुरु ही माता पिता है, गुरु के द्वारा ही आत्मज्ञान शिष्य पूर्ण मनायोग से गुरु की सेवा करें।’’
     गोस्वामी जी ने हँसते हुए कहा- ‘‘ऐसे गुरु आजकल मिलते कहाँ है? आजकल के गुरु तो पहले यह देखते है कि चेला जिनता मालदार है, वेतन कितना पाता है, दान दक्षिणा कितनी दे सकता है।’’
     तेलंग स्वामी बोले- ‘‘यह सत्य है कि गुरु बनना आजकल एक व्यवसाय हो गया है। ये लोग कर्म दोष से गुरु पद की हानि कर रहे हैं। शिष्य का उद्धार न करने से गुरु के महापाप होता है। जब तक शिष्य करबद्ध होकर प्रार्थना न करे, शिष्य के पूरा परखा न जाय तब तक दीक्षा देने की शीद्य्रता नहीं करनी चाहिए। आजकल गुरु के चेले अन्य लोगों को पकड-पकड़कर आश्रम लाते है व जबरदस्ती दीक्षा दिलवाते है, जो महापाप है। इसके पीछे आर्थिक लोभ व अहं ही एक मात्र कारण होता है इसके बाद शिष्य ठीक से जप कर रहा है या नहीं, कोई विघन तो नहीं हो रहा है, कितनी प्रगति हुई? इन सभी बातों का गुरु कोई ध्यान नहीं रखते।’’
     गोस्वामी जी ने पूछा- ‘‘ऐसे सद्गुरु की पहचान हम कैसे कर सकेंगे? शिष्य तो अज्ञानी होता है सद्गुरु की पहचान कैसे कर सकते है?’’
     तेलंग स्वामी ने कहा- ‘‘भगवान के लिए अगर तुम्हारा हृदय व्याकुल होगा तब निश्चित है कि भगवान तुम्हारा सहायक बनकर सद्गुरु से मुलाकात कर देंगे। सद्गुरु राह चलते नहीं मिलते। प्राचीन काल में सद्गुरुओं का अभाव नही था। सशिष्य बिना बने सद्गुरु नहीं मिलते। उपयुक्त गुरु न होने के कारण ही मानव की यह दुर्दशा है। सडे गते बीज को पौधेजन्म नहीं लेते, इसलिए बीज का चुनाव ठीक से करके ही दीक्षा लेनी चाहिए। दीक्षा देना व दीक्षा लेना दोनों ही सहज कार्य नहीं है।’’
     गोस्वामी जी ने कहा- ‘‘फिर तो जैसे सद्गुरु के बारे में आपने बताया है, ऐसे गुरु का मिलना ही असंभव प्रतीत होता है।
     तेलंग स्वामी ने इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया। गोस्वामी जी तेलंग स्वामी के साथ रात्रि में कई बार ठहर जमा करते थे। वे रात्रि में उनके योगश्वर्य दिखाया करते थे। एक दिन गोस्वामी जी बोले- ‘‘आप मुझे इतनी योग विभूति दिखाते हो, पर मुझे विश्वास नहीं होता। कुछ ऐसा करें कि इन घटनाओं पर मेरा विश्वास जम जाए व मेरे भी योगमार्ग पर श्रद्धा टिक जाए।’’
     रात के एक बज चुके थे। भंयकर सर्दी की। अचानक तेलंग स्वामी बोले- ‘‘विजय जाओ, गंगा स्नान करके आओ, देर मत करो।’’ इस पर गोस्वामी जी बोले आधी रात को इतनी सर्दी में नहाकर मरना थोडे ही है।
     तेलंग स्वामी ने कहा- ‘‘मेरी आज्ञा है जाओ।’’
     गोस्वामी जी बोले कि वह इस समय नहाने नहीं जा पाएँगे, उन्हें रोगी होने का भय लगता है। तेलंग स्वामी तैश में आइाए- ‘‘क्या कहा, नहाएगा नहीं? तेरे योग मार्ग पर चलने की शभु घड़ी आ गयी है। तू इतने दिन से योगमार्ग पर चलने की इच्छा व्यक्त कर रहा है व अब भयभीत हो रहा है। मैं तुझे अभी दीक्षा दूँगा।
     गोस्वामी जी बोले- ‘‘आपने तो कहा था कि मेरा दीक्षा गुरु कोई और है। आपसे में दीक्षा क्यों लूँगा? आप तो खडे़-खड़े शिवलिंग पर पेशाब करते हैं।’’ परन्तु तेलंग स्वामी ने विजय गोस्वामी का गला पकड़ा व गंगा किनारे ले जाकर डुबकी दिलाने लगे। बाद में सिर पर हाथ रखकर बोले- ‘‘विश्वास बन जाए’’। उसी दिन से गोस्वामी जी के मन में उत्पन्न हो गया। तब उन्होंने गोस्वामी जी के कान में तीन मन्त्र दिए व कहा- ‘‘तुम्हारे एक निर्दिष्ट गुरु हैं। वे ही तुम्हें यथासम्भव दीक्षा देंगे। यह तो साधना मार्ग का शुभरम्भ है। सिद्धि तक तुम्हें वही पहुचाएँगें।’’
     गोस्वामी जी ने पूछा- ‘‘बाबा यह बताइये कि मेरे वास्तविक गुरु कहाँ मिलेंगे?’’ ‘‘यह जानने से कोई लाभ नहीं। समय आने पर वे स्वयं तुम्हें बुला लेंगे या तुम्हारे पास चले आयेंगे। अपनी इच्छा से कोशिश करने पर तुम उनके पास नहीं पहुँच सकते। उनसे बीज मन्त्र पाने के बाद ही तुम्हारा साधक जीवन प्रारम्भ होगा। गोस्वामी जी ने कहा-‘‘अर्थात् जब तक मेरे वास्तविक नहीं मिलेंगे तब तक मुझे इधर उधर भटकते रहना पडेगा।’’
     तेलंग स्वामी ने कहा- ‘‘प्रतीक्षा तो करनी ही पडेगी। लेकिन इस बीच मेरे द्वारा दिए मन्त्र का जप करते रहेगें तो समय की दूरी कम हो जाएगी। सुबह ओर शाम दोनों समय शान्त भाव से बीज मन्त्र का जप करें। अधा घण्टा से प्रारम्भ कर तीन घण्टा तक बढ़ाते जाएँ अथवा तब तक समय बढ़ाएँ जब तक आलोक दर्शन न हो जाए। मुझसे यह नही हो सकेगा यह कहने से काम नही चल सकेगा। योग साधना सामान्य प्रक्रिया नही है। मुझे जितना करना था उसे पूरा कर दिया।’’ इसके पश्चात् गोस्वामी जी ब्रहम समाज के किसी हेतु गया गए। उनका अतृप्त हृदय बराबर उस गुरु की तलाश में लगा रहा जिसके बारे में अधिकांश साधक आश्वासन देते आ रहे थे। यहाँ गया में उनको पता चला कि समीप आकाश गंगा पर्वत पर अनेक सिद्ध योगी रहते है। यहाँ उनकी मूर्ति एक अद्भुत संन्यासी से हुयी। वो अपने आसन पर ध्यानस्थ है उनके मस्तिष्क से ज्योति निकलकर चारों ओर प्रकाशमान है। यह दृश्य देख वो विस्माभिभूत हो उठे। काफी देर तक वे अपतृक दृष्टि से उस योगी को देखते रहे। कुछ देर बाद जब योगी उठे तो उन्हें प्रणाम करने के बाद गोस्वामी जी ने पूछा- ‘‘आपके मस्तिष्क से अद्भुत ज्योति निकल रही थी। इस वक्त वह गायब हो गयी। ऐसा कैसे हुआ?’’
     योगी ने कहा- ‘‘साधना के माध्यम से जब कुडालिनी शक्ति षटचक्र भेदन करती हुई मस्तिष्क के सहस्त्रदल कमल में पहुँचती है तब वह ज्योति निकलती है।’’ यह सुनने पर गोस्वामी जी समझ गए कि योगी उच्चकोटि के सिद्ध साधक है व इनसे दीक्षा लेनी चाहिए। वो बोले- ‘‘जाने क्यो मुझे शान्ति नहीं मिलती, बराबर बैचेन रहता हँू। योगी जी बोले- ‘‘यह बात अपने गुरु से कहो। वे इसका उपाय बतायेंगे।’’
     गोस्वामी जी बोले-‘‘ब्रहम समाज के नेता होने के कारण मेरा गुरुवाद में विश्वास नहीं था इस कारण मेरा कोई गुरु नहीं है परन्तु अब मैं गुरु बनाना चाहता हँू, कृपया मुझे गुरु दीक्षा दें।’’
     उनका मतव्य सुनकर योगी ने कहा- ‘‘मुझे अभी दीक्षा देने का अधिकार प्राप्त नहीं हुआ है। ऊपर मेरे गुरु रहते है, आप उनसे विनती कीजिए।’’
     इस प्रकार भटकते-भटकते एक दिन उनके हृदय की तृष्णा शान्त हुई। रामशिला पर्वत पर उन्हें अपने गुरु के दर्शन हुए। आँखे चार होते ही उनके हृदय में भक्ति का ज्वार उमड़ पड़ा। फूट-फूट कर रोने लगे। गोस्वामी जी का हाथ पकड़कर वो बोले- ‘‘मेरे लिए इतना व्याकुल होने की जरूरत नहीं है। वक्त आने पर सब मिल जाएगा। साधना में मन लगाओं कठोर साधना से ही ईश्वर लाभ होता है।’’
     गोस्वामी जी के गुरु का नाम ब्रहमानन्द स्वामी था। नानकपंथी यानि पंजाबी थे। अधिकतर वे मान सरोवर में रहते है कभी-कभी शिष्यों से मिलने चले आते है।
     गुरु की आज्ञा से गोस्वामी जी आकाशगंगा पहाड पर कठोर साधना करने लगे। आहार निद्रा त्यागकर साधना में जुट गए। एक दिन धर्मचर्चा में अपने गुरुदेव से पूछा- ‘‘शास्त्रो में जितनी सिद्धि की बाते हैं, क्या वह सब सत्य है?’’
     गुरुदेव ने कहा- ‘‘क्या तुम्हें विश्वास नहीं होता? शास्त्रों में जिन सिद्धियों का वर्णन है, वह सब तपस्या के जरिए प्राप्त किया जा सकता है। आओ, आज तुम्हें दिखाता हँू।’’  
     इसके बाद गोस्वामी जी के अपने साथ लेकर गुरुदेव एक निर्जन स्थान पर आए। एक के बाद एक उन्होंने उनको सभी सिद्धियाँ दिखायीं कभी हवा में छोटा बनकर पक्षी की तरह आकाश में उड़ने लगे। कभी मृत शरीर में प्रवेश कर उसको जीवित कर दिए। कभी अणु के समान सूक्ष्म होकर पहाड़ को भेदते हुए दूसरी ओर निकल गए।’’ यह सारा दृश्य देखकर गोस्वामी जी रोमाचित हो उठे व अपने गुरुदेव को प्रणाम किया।
     लगभग बीस वर्ष उपरान्त गोस्वामी जी तेलंग स्वामी से मिलने काशी आए। अपने प्र्रथम गुरु तेलंग स्वामी के पास आने पर उन्हें ज्ञात हुआ कि आजकल वे मेम रहते हैं। गोस्वामी जी के देखकर उन्होंने ईशारे से अपने पास बुलाया। उनकी हथेली पर हाथ चला कर उन्होंने पूछा-याद हे?’

     गोस्वामी जी ने विनयपूर्वक कहा- ‘‘हाँ आपकी कृपा अच्छी तरह याद है। आपने जो मंत्र दिया था, उससे मुझे साधना में बहुत लाभ मिला था।’’ दिनभर स्वामी जी मौन रहते थे परन्तु रात्रि में वो गोस्वामी जी से प्रसन्नतापूर्वक जमकर बातें करते थे। उस समय उन्होंने अजगर व्रत नहीं लिया था। आगे चलकर उन्होंने अजगर व्रत अपना लिया तब ईशारा करना भी बन्द कर दिया था।