Monday, July 20, 2020

आत्मबल बढ़ाने के तीन उपाय - सत्य, प्रेम व न्याय


            Face the truth no matter how painful it is.
                सत्य चाहे कितना कटु अथवा दर्द भरा हो उसको स्वीकार अवश्य करना चाहिए। भारतीय संस्कृति का मूलभूत सिद्धान्त है- सत्यमेव जयते। जो सत्य के मार्ग पर चलते हैं।
1. सत्य का अनुसंधान करने वाले, सत्य को स्वीकार करने वाले, सत्य से प्रेम करने वाले एवं सच्चाई की राह पर चलने वाले लोग चाहिए। ऐसे लोग ही इसका अभ्यास करते-करते स्थितप्रज्ञ हो जाते हैं।
2. ईश्वर व मानवता से प्रेम करने वाले, संवेदनशील हृदय चाहिए। दुःखी पीड़ित मानवता पर करुणा की शीतल धार जो बहा सकें वह उदार आत्मा चाहिए। ऐसे व्यक्ति ही ईश्वरीय कृपा के पात्र होते हैं। प्रेम का दायरा बढ़ाते-बढ़ाते व्यक्ति देवमानव बन जाता है।
3. ईश्वर न्यायकारी है अतः जो कुछ भी हमारे साथ घटर हा है वह हमारे ही कर्मों का परिणाम है। दूसरा हम धन, पद, प्रतिष्ठा के वशीभूत होकर अन्याय का साथ न दें। कर्ण, द्रोण, आदि जब अन्याय के साथ खड़े हुए तो वो भी मारे गए। अन्याय को जो साथ देता है उससे ईश्वरीय संरक्षण हट जाता है।
                समान्य मानव वह है जो अपने परिवार, मित्र, बन्धुओं से प्रेम करे। परन्तु महामानव, देवमानव वह होता है जो किसी से भी, अनजान से भी प्रेम करता है। आत्मा की महानता की माप प्रेम ही है। अतः संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की बात करती है। पूरी वसुधा को ही अपना कुटुम्ब अर्थात् परिवार मानकर सभी से प्रेम भाव स्थापित करना चाहिए।

Friday, April 24, 2020

कोरोना वायरस & High Immune Strategy (Part-1)


  ‘कोरोना को हराना है हमें अपने देश को बचाना है।’

        कोरोन से लड़ाई के  दो पक्ष हैं- पहला है Prevention दूसरा - Cure अर्थात् प्रथम स्तर पर कोरोना के  प्रसार को रोकना आवश्यक है तो दूसरे स्तर पर शरीर को हमें इस तरह विकसित करना है कि यदि इसके  विषाणु (Virus) हमारे सम्पर्क  में आ जाएँ तो वो घातक सिद्ध न हो सकें  व हमारे लिए लिए अल्प पीड़ादायक हों। क्या यह सम्भव है कि Preventive Measures के  द्वारा कोरोना जड़ से समाप्त हो जाएगा? इस संदर्भ में यदि हम डॉ॰ एन्थोनी स्टीफन फाउची जो कि अमेरिका के  प्रसिद्ध इम्यूनोलोजिस्ट व व्हाइट हाउस कोरोना टास्क फोर्स के  प्रमुख सदस्य हैं, के  विचार जानने का प्रयास करें तो उन्होंने कोरोना जड़ से खत्म ना होने की चेतावनी दी है। बुद्धिजीवियों के  एक वर्ग का मानना है कि इस वायरस से हमारे शरीर को लड़ना ही होगा यानी शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति को इसे हराना ही होगा। तो क्या हर व्यक्ति को कोरोना के  संक्रमण से एक बार या कई बार गुजरना पड़ेगा? यह सोचकर हम सभी की रूह काँप उठती है। अभी तो मात्र अनुमान ही लगाया जा सकता है व ईश्वर से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि कोरोना के  द्वारा नुकसान कम से कम हो।
        इसके  साथ-साथ हमें अपने प्रतिरोधी रक्षा तंत्र (Immune System) को मजबूत करने की दिशा में प्रयास आरम्भ कर देना चाहिए, क्योंकि प्यास लगने पर कुआँ खोदने का कोई लाभ नहीं होता। इसके  लिए हमें वायरस व हमारे शरीर के  रक्षा तन्त्र के  विषय में Basic Knowledege होना आवश्यक है। क्या धरती पर मौजूद सूक्ष्म जीव वायरस को रोकने की क्षमता इस विलक्षण मानव शरीर में नहीं हैं? यह सोचना समझदारी की बात नहीं है। इस विषय में यदि प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक लुई कुने को समझें तो हमारा Confidence बढ़ सकता है। उन्होंने अपने ऊपर प्रयोग किया। हैजा के  उतने कीटाणु मंगवाये जिससे 2 हजार व्यक्तियों को हैजा हो जाए। वो कीटाणु उन्होंने अपने भोजन में डाल दिए। इतनी बड़ी मात्रा में कीटाणु उनको रोगी न बना पाए। यह प्रयोग देख विश्व के  चिकित्सक व बुद्धिजीवी दंग रह गए। यदि रक्त शुद्ध व क्षारीय है तो कीटाणुओं का प्रभाव शरीर पर न्यून होता है। शोधन प्रक्रिया के  द्वारा यह संभव है।
        मनुष्य शरीर के  अन्दर व आस-पास के  वातावरण में लाखों करोड़ों की संख्या में सूक्ष्मजीव मौजूद रहते हैं जिनमें वायरस भी हैं।
      According to NCBI (National Center for Biotechnology Info.) - there are 219 virus species that are known to be able to infect humans. Corona Virus are a group of viruses that usually cause mid illness, such as common cold. Most people get infected with corona viruses at some point in their lines and the majority of these infections are harmless. The new corona virus (Covid-19) illness is a notable exception. It is an RNA virus like the flu and measles and more prone to changes and mutation compared with DNA viruses such as herpes and small pox etc. The new corona virus spreads much more readily than the older ones. To infect cell, it uses its spike protein that binds to the cell membrane. So what makes the new viruses so much more infectious? It has a specific structure that allows it to bind ‘at least 10 times more tightly than others’ to the host cell membrane. Scientists are examining the nature of spike protein of the new corona virus to explain the viral life cycle and to develop the vaccine. Doing so could stop the corona virus from penetrating the cells. A new study has shown that using antibiodies from 4 mice that had been immunized against old SARS-COV reduced infection by 90% in cell cultures, caused by COVID-19. This is according to the information on how to prevent the spread of corona virus given by CDC (Centers for Diseases Control and Prevention)
        अब तक वायरस की 219 प्रजातियाँ खोज ली गई हैं जो मनुष्य को बीमार करती हैं व प्रति वर्ष 3-4 नए वायरस सामने आते हैं। वायरस जीव और निर्जीव के  बीच की कड़ी हैं। जीव खुद से अपनी प्रतिलिपि बना सकता है लेकिन निर्जीव नहीं है। जैसे बैक्टीरिया जीव होते हैं और ये खुद की प्रतिलिपि तैयार कर सकते हैं। वायरस अनुकूल परिस्थितियों में लम्बें समय तक पड़ा रह सकता है तो प्रतिकूल स्थिति में अल्पकाल में नष्ट हो जाता है लेकिन किसी जीव के  सम्पर्क  में आने पर अपने को बढ़ाने लगता है।
        कोरोना वायरस अनेक प्रकार के  होते हैं व अब से पूर्व भी फैलते रहे हैं। इनको फैलने के  मुख्य कारण चूजे, चूहे व चमगादड़ माने जाते रहे हैं। इनमें कुछ घातक होते हैं व कुछ सामान्य नजला, खाँसी, बुखार उत्पन्न करते हैं। सन् 2003 में SARS कोरोना वायरस ने दुनिया में 8,000 लोगों को बीमार किया जिसमें लगभग 800 लोगों की मौत हो गयी। इसका प्रकोप 8 माह तक रहा। इसका व नए कोरोना वायरस (Covid-19) का ळदवउपब ैजतनबजनतम लगभग 86% समान है। कोरोना एक परजीवी वायरस है जो इन्सान की कोशिकाओं में ही जीवित रह सकता है। कोरोना नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि इसकी सतह पर मुकुट (Crown) की तरह प्रोटीन की कील नुमा उभरी संरचनाएँ होती हैं। यह वायरस प्रोटीन और तैलीय लिपिड की बुलबुलेनुमा झिल्ली से ढंका होता है। इसका Incubation Period 5 दिन का होता है अर्थात् वायरस के  शरीर में प्रवेश करने के  बाद शरीर में इसके  लक्षण 5 दिन बाद दिखने शुरु हो जाते हैं।
        वायरस दो प्रकार के Genetic Material (DNA या RNA) से बनते हैं। DNA जीव है और RNA निर्जीव। कोरोना RNA (RNA Gnomes) वायरस है। शरीर में वायरस से लड़ने की प्रतिरक्षा प्रणाली है जो श्वेत रक्त कणिका (WBC) के  रूप में मानी जाती है। अगर कोई वायरस DNA वाला होता है तो वह शरीर के  अन्दर जाकर खुद को द्विगुणित करने लगता है। जिसकी पहचान शरीर की प्रतिरक्षा प्रणा (Immune System) आसानी से कर लेती है और उसको आसानी से खत्म कर देती है। लेकिन RNA वायरस खुद को नहीं बढ़ा सकता है। लिहाजा यह शरीर की कोशिका में प्रवेश करके  खुद को बढ़ाता है। प्रतिरक्षा प्रणाली उसे पहचानने में समय लेती है या पहचान नहीं पाती क्योंकि उसे लगता है कि यह शरीर का ही एक हिस्सा है।
        जब कोई वायरस शरीर पर हमला करता है तो शरीर के  अंदर युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाते हैं। वायरस के  प्रवेश करते ही आपके शरीर का इम्यून सिस्टम वायरस से लड़ने की कोशिश करता है। आपका शरीर वायरस को एक विदेशी हमलावर की तरह देखता है और पूरे शरीर को संकेत देता है कि शरीर पर हमला हुआ है। इसके  बाद वो वायरस को खत्म करने के  लिए साइटोकाइन नाम का केमिकल छोड़ना शुरु करता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति पूरे जोर से हमले का जवाब देने में जुट जाती है और इस कारण आपको बदन दर्द और बुखार भी हो सकता है। बुखार इसलिए होता है क्योंकि शरीर तापमान बढ़ाकर वायरस की शक्ति को कम करने की कोशिश करता है। बलगम या ड्रॉपलेट्स एक तरीके  से मृत कोशिकाएँ है जो शरीर से खाँसी के  माध्यम से बाहर निकाली जाती हैं।
        विज्ञान कहता है कि एक बार किसी वायरस का संक्रमण होने के  बाद इन्सान की रोग प्रतिरोधक शक्ति उस वायरस से लड़ना सीख जाती है। इस कारण फिर वह वायरस उस इन्सान के लिए घातक नहीं होता है। मानव शरीर पर जब किसी वायरस का आक्रमण होता है हमारा प्रतिरोधी तन्त्र (Immune System) उस वायरस को पहचान कर उसके  एण्टीबॉडी बना लेता है। यदि उस वायरस का उसके  शरीर में पूर्व में संक्रमण हो चुका है तो उसकी एण्टीबॉडी का कोड हमारे शरीर में सुरक्षित रहता है और उस स्थिति में शरीर का काम केवल शरीर में घुसने वाले वायरसों की संख्या के  आधार पर नए एण्टीबॉडीज का निर्माण करना है जिससे वायरस को मार भगाया जा सके। इसलिए पूर्व में संक्रमित हो चुके  किसी वायरस से हम ज्यादा बीमार नहीं पड़ते हैं। परन्तु जब यह वायरस हमारे शरीर के  लिए नया होता है तो शरीर को उस वायरस की संरचनात्मक स्थिति को समझकर उसके  अनुसार एंण्टीबॉडी बनाने में कम से कम तीन दिन लग जाते हैं और यह उस व्यक्ति की इम्यूनिटी पर भी निर्भर करता है। इस बीच वह वायरस अपनी संख्या शरीर में बढ़ा लेता है और हमारे शरीर को नुकसान पहुँचाना शुरु कर देता है। हमारा प्रतिरोधी तन्त्र एण्टीबॉडी बनाकर और उनका उत्पादन शुरु करके लगभग 7 दिनों में वायरसों का शरीर से खात्मा कर देता है। इस प्रकार अगर व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता ठीक है व धातुएँ पुष्ट हैं तो यह शरीर में 10 से 14 दिनों के  लिए आएगा व थोड़ी बहुत उथल-पुथल मचाकर चला जाएगा। इसमें डरने की कोई भी आवश्यकता नहीं है। AIMS, Delhi के  Director रणदीप गुलेरिया के  अनुसार इस वायरस से संक्रमित 80% व्यक्ति बिना दवा के  कुछ दिनों आसानी से ठीक हो जाते हैं व मृतकां की संख्या 5% से अधिक नहीं है।
        कठिनाई तब होती है जब या तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम है या फिर हमारी धातुएँ कमजोर हैं। जैसे कमजोर दीवार पर हल्का धक्का मारने पर भी गिरने का भय रहता है वैसे ही कमजोर धातुएँ वायरस के  दुष्प्रभाव को सहन नहीं कर पाती व शरीर में नुकसान अधिक हो जाता है। धातुएँ 7 होती हैं. रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि, मज्जा एवं शुक्र। इन धातुओं के  विषय में यदि विस्तार से जानना है अथवा केसे उनको मजबूत किया जाए यह समझना है तो लेखक की पुस्तक 'स्वस्थ भारत (A Manual for Healthy Life & Healthy India)' का अध्ययन करें।
        कोरोना के  कहर से IT Sector में हलचल मची हुई है। उसके  निक नेम से एक और विधा Immune Technology प्रारम्भ हो चुका है जिसकी आवश्यकता आज पहले वाले IT से अधिक है। इस लेख में प्रतिरोधी क्षमता (Immune System) बढ़ानें व धातु पुष्टि के कुछ नुस्खों का विवरण दिया जा रहा है।
1. रक्त की pH Value 7.4 होती है, जो कि हल्का क्षारीय है। जैसे ही रक्त अम्लीय होने लगता है अर्थात् pH Value 7 से कम होने लगती है वैसे ही प्रतिरोधक क्षमता तेजी से घटने लगती है। pH Value को ठीक बनाए रखने के  लिए हमारी हड्डियों से केल्शियम कार्बोनेट आदि महत्त्वपूर्ण तत्त्व खि्ांच कर रक्त में आने लगते हैं जिससे हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं। अतः भोजन में क्षारीय तत्त्वों (Alkaline Foods) का अधिक से अधिक समावेश करें। माँसाहार का एकदम परित्याग करें क्योंकि यह रक्त को अम्लीय बनाता है यदि आज माँस खाया तो इसका प्रभाव रक्त पर 5-7 दिन तक बना रह सकता है। जब चीन जैसे देश में लोग माँसाहार त्यागकर शाकाहार अपनाने का प्रयत्न कर रहे हैं तो हम भारतीय क्यों नहीं?
2. किसी भी होम्योपैथिक दुकान से कालमेघ (Andrographis Paniculata) का टिंचर लेकर 50 उस पानी में उसकी 7-8 बूँदें डालकर सुबह शाम खाली पेट 5 से 10 दिन तक सेवन करें।
3. भारत में अडूसा/वासा (Justicia adhatoda) बहुतायत से मिलता है, जिसको ग्रामीण भाषा में बाँसा भी कहते हैं। इसकी ताजी कोमल पत्तियाँ एवं फूल (5-7) प्रातः सांय पानी के  साथ चबाना बहुत ही लाभकारी है। बाजार में यह अनेक तरह से मिलता है जैसे वासा अवलेह इत्यादि। लेखक के  अनुभव के  अनुसार उपरोक्त विधि से ताजा सेवन करना सर्वोत्तम है।
4. फेफड़ों एवं श्वसन तन्त्र (Respiratory Track) की ताकत को बढ़ाने के  लिए अंजीर का सेवन लाभकारी होता है। ठंडा होने के  कारण यह पित्त प्रकृति के लोगों के लिए विशेष लाभप्रद है। दो अंजीर रात को भिगोकर रखें व सुबह चबाकर खाएँ। कफ प्रकृति के  एवं मोटे लोग अंजीर का अधिक सेवन न करें अथवा इसके  साथ बादाम व पिस्ता भी खाएँ। इससे अंजीर के  दोषों का शमन होता है। अंजीर में विटामिन ‘ए’ होता है इससे यह आँख के  कुदरती गीलेपन को बनाए रखता है। यह पढ़ने वाले बच्चों के  नेत्रों के  लिए बहुत उपयोगी है। अंजीर बालकों की कब्जियत मिटाने के  लिए भी लाभकारी है।
        कब्जियत के  कारण जब मल आँतों में सड़ने लगता है, तब उसके जहरीले तत्त्व रक्त में मिल जाते हैं और रक्तवाही धमनियों में रुकावट डालते हैं, जिससे शरीर के  सभी अंगों में रक्त नहीं पहुँचता। इसके फलस्वरूप शरीर कमजोर हो जाता है तथा, दिमाग, नेत्र, हृदय, जठर, बड़ी आँत आदि अंगों में रोग उत्पन्न हो जाते हैं। शरीर दुबला-पतला होकर जवानी में ही बुढ़ापा नजर आने लगता है। ऐसी स्थिति में अंजीर का उपयोग अत्यंत लाभदायी होता है। यह आँतों की शुद्धि करके रक्त बढ़ाता है एवं रक्त-परिभ्रमण को सामान्य बनाता है।
5. प्रकृति के अनुसार औषधि अथवा वनस्पति का चयन। उदाहरण के  लिए हल्दी, लहसुन व अलसी के  गुणों से Internet भरा पड़ा है। परन्तु पित्त प्रकृति के  लिए यें हानिप्रद ही सिद्ध होते हैं या फिर इनको कुछ अलग विधियों द्वारा देने का विधान है, अन्यथा एसिडिटी बनती है।
6. तमोगुणी व नकारात्मक लोगों पर कोरोना की मार बहुत पड़ती है। पश्चिमी देशों में तमोगुणी लोग बहुतायत से हैं उनकी प्राण ऊर्जा दूषित होती है अतः हमें सतोगुण की वृद्धि करनी होगी। सतोगुण बढ़ाने के  लिए प्रातः काल सूर्योदय के  पूर्व उठने से बहुत लाभ होता है। अब से 20-25 वर्ष पूर्व परिवार में 5-7 बच्चे आराम से पल जाया करते थे। परन्तु आज मात्र 1-2 बच्चों का पालन बड़ा कठिन पड़ता हैं। कारण परिवारों में तमोगुण बढ़ने से अब बच्चे आज्ञाकारी नहीं रहे। सतोगुणी बालक ही बड़ों के प्रति श्रद्धा व सहयोग का भाव रखता है।
        तमोगुणी व्यक्ति ताड़ना (प्रताड़ना) के  द्वारा ही सन्मार्ग पर आता है ऐसा गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है-
        ‘ढ़ोल ग्वार क्षुद्र पशु नारी, सकल ताड़न के अधिकारी।’
                यहाँ पर उस नारी की बात कही है जो पशुवत आचरण करती है।
        मदर शिप्टन अपने अनुयायियों को तमोगुणी मन के  सम्बन्ध में एक कहानी सुनाती थी। एक दयालु सन्त थे उन्हें रास्ते में कीचड़ में पड़ा एक सुअर का बच्चा दिखा। बच्चा बड़ा सुन्दर था। उन्हें उस पर तरस आ गया। उसको कीचड़ से निकालकर साफ सुथरे बाड़े में रखा। एक बार बाड़े का दरवाजा खुला रह गया। वह सुअर का बच्चा तुरन्त दौड़ कर फिर कीचड़ में घुस गया। यही दशा तमोगुणी मन की होती है। मौका पाते ही वह तुरन्त नीच व दुष्टकर्मों में संलिप्त हो जाता है। उसे सख्ती के साथ बाँध कर रखना पड़ता है। तमोगुणी व्यक्ति कुरूर होता चला जाता है युद्ध कला में प्रवीण होते हैं। रजोगुणी व्यक्ति महत्वाकाँक्षी होता है। सतोगुणी आदर्शों व सिद्धान्तों पर चलने वाला होता है। अर्जुन सतोगुणी थे अतः युद्ध नहीं करना चाहते थे परन्तु तमोगुणी दुर्योधन को युद्ध प्रिय था। कृष्ण की अपनी सेना में मदिरापान से तमोगुण बढ़ गया था।
7. जहाँ-जहाँ Vaccination अधिक हुआ होगा वहाँ-वहाँ Immune System कमजोर होगा। जिन रोगों का Vaccine हुआ होगा उनके  प्रति रक्षा तन्त्र अधिक कारगर होता है परन्तु दूसरे किसी नए रोग के  लिए कमजोर हो जाता है। अतः Vaccination सोच समझ कर कराया जाया जैसे पोलियो आदि आवश्यक Vaccine ही लगवाएँ।
8. कोरोना का वायरस यदि नाक से घुसता है तो अधिक हानिकारक होता है अतः नाक में देसी घी अथवा सरसो का तेल प्रातः व रात्रि सोते समय डालें।
9. घर में दीपक अवश्य जलाएँ। यदि सम्भव हो तो सप्ताह में एक बार लघु हवन अवश्य करें। गाय के  उपले अथवा गोले के  टुकड़े पर गुगल, कपूर, घी व हवन सामग्री, नीम के  पत्ते आदि से होम करें।
10. हर्रे अथवा त्रिफला का सेवन करें। हरड़ का शोधन करके  ही प्रयोग करें। इससे पेट साफ रहता है। जिनको कब्ज रहता है उनके  रक्त के  दूषित होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
11. रोज सुबह खाली पेट पानी के साथ तुलसी की 7 पत्तियों के  सेवन से स्मरण शक्ति, रोग प्रतिरोधक क्षमता, बल और तेज बढ़ता है। तुलसी की पत्तियों को दही या छाछ के  साथ सेवन करने से वजन कम होता है, शरीर की चर्बी घटती है, थकान मिटती है व शरीर सुडौल बनता है, दिन भर स्फूर्ति बनी रहती है और रक्त कणों में वृद्धि होती है। तुलसी से हृदय एवं गुर्दों की कार्यशक्ति में वृद्धि होती है। इसके  सेवन से मंदाग्नि, कब्जियत, गैस आदि रोग दूर होते हैं। कफ प्रकृति के व्यक्ति तुलसी का सेवन शहद के साथ भी कर सकते हैं। शहद में विटामिन ‘बी’ होता है जिससे शरीर की ताकत बढ़ती है। शहद को जिस औषधि के साथ मिलाया जाता है यह उस औषधि के गुणों को बढ़ा देता है। यह दूध की तरह मधुर, पौष्टिक और सम्पूर्ण आहार भी है। शहद जैसे-जैसे पुराना होता है वैसे-वैसे गुणकारी बनता है। एक वर्ष के  बाद शहद पुराना माना जाता है।
12. आयुर्वेद के आचार्य वाग्भट्ट के अनुसार यदि लम्बी जिंदगी जीना चाहते हो तो हरड़ के सेवन का अभ्यास करें। पाचन शक्ति ठीक करने के  लिए यह सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इसके सेवन से पूर्व इसका शोधन आवश्यक है। 100-200 ग्रा. छोटी हरड़ लेकर तक्र (छाछ) में भिगों दें। छाछ इतना ही ले कि ये सोख ले। 6-7 घंटे के  उपरांत इनको छाछ से निकाल कर छाया में सुखा लें। तत्पश्चात उनको देसी घी में हल्की आंच पर सेक कर काँच के बर्तन में रख दें। 40 दिन तक 1-1 हरड़ सुबह-शाम सेवन करें। हरितकी एक श्रेष्ठ रसायन द्रव्य है जो शरीर से विकृत का तथा मल का नाश करके नेत्र तथा अन्य इन्द्रियों का बल बढ़ाती है। शरीर में मल संचय होने पर बुद्धि तथा इन्द्रियाँ बलहीन हो जाती हैं। हरड़ इस संचित मल का शोधन करके  धातु शुद्धि करती है। हरड़ को मेध्या कहा जाता है क्योंकि यह बुद्धिवर्धक है। हरड़ धात्वग्नि बढ़ाती है जिससे धातुएँ शुद्ध व पुड्ढ होती है। दुर्बल व उष्ण प्रड्डति के  लोग यदि हरड़ लेते हैं तो भोजन में घी का उपयोग अवश्य करें।
13. नारियल पानी पीने से रक्त क्षारीय होता है। यह बहुत लाभप्रद है।
14. विटामिन ‘सी’ से भरपूर डाइट लें। खट्टे फल, नीम्बू संतरा आदि जिता आपका शरीर आसानी से सह सके  व हजम कर सके। कुछ व्यक्ति खट्टा फल खाने या गला खराब की शिकायत करने लगते हैं। इनको सीमित मात्रा में लेना चाहिए।
15. मौसमी फल और हरी सब्जियों में भरपूर मात्रा में एण्टी ऑक्सीडेंट्स होते हैं। जिनसे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
16. संकट में सकारात्मक सोच रखें- पता नहीं भूत व्यक्ति को कोई हानि पहुँचाता है या नहीं परन्तु भूत का भय बहुत ही खतरनाक होता है। इसी प्रकार आज हमारे आस-पास कोरोना के  भय का महौल बढ़ता जा रहा है। डॉक्टर्स का कहना है कि डर हमारे इम्यूनिटी सिस्टम को कमजोर करता है। मन के  साथ इम्यूनिटी का बड़ा संबंध है। यदि मन मजबूत है तो बड़ी आयु में भी शरीर वायरस का मुकाबला करने में सक्षम सिद्ध होगा। भारत में ईश्वर विश्वास के  द्वारा व्यक्ति को निर्भय होने में मदद मिलती है। आस्तिक व आध्यत्मिक व्यक्ति संकट में भी सकारात्मक सोच के  द्वारा बड़ी-बड़ी विपत्तियों पर विजय पाने में सफल होता है।
17. कोरोना वायरस से लड़ने के  लिए एक अच्छे सैनिटाइजर को 60%-80% एल्कोहल ग्रेड की आवश्यकता होती है। थोड़ी मात्रा में Hand Sanitizer का प्रयोग पर्याप्त नहीं होता है। यदि 100% एल्कोहल वाला सैनिटाइजर प्रयोग किया गया तो यह त्वचा पर बैक्टीरिया या वायरस को मारने से पहले उड़ जाता है। साबुन को वायरस मारने के  लिए सैनिटाइजर से अच्छा माना जाता है। साबुन के फैटी एसिड वायरस की बाहरी परत को निष्क्रिय कर देते हैं।
18. नमक चीनी कम स्वस्थ रहे हम. रक्त में Sugar का स्तर जैसे ही आवश्यकता से अधिक होता है व्यक्ति में संक्रमण (Infection) बढ़ने लगता है। अतः कृत्रिम शुगर जैसे गुड़, खांड, चीनी का प्रयोग बन्द करें केवल फ्रूट शुगर ले वो भी थोड़ा। फ्रूट शुगर में फ्रक्टोज होता जो शीघ्र शुगर का स्तर नहीं बढ़ाता है। नमक को भी बहुत सीमित कर देना चाहिए इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।
19. चाय, काफी, Cold Drinks, चॉकलेट आदि Acidic होते हैं अतः इनका प्रयोग बहुत सीमित करें।
20. पंसारी की दुकान से बायविडंग खरीदें यह काली मिर्च के  आकार की भूरी, जामनी  रंग की गोलियाँ होती है। इन्हें थोड़ा कूटकर पानी में डालें व हल्की आँच पर गर्म कर अथवा उबालकर रख लें। वह पानी खाली पेट तीन समय पीयें अथवा उसमें गरारे करें। बायविडंग कृमिनाशक होता है दाँतो से लेकर आँतो तक, बच्चों के  पेट के  कीड़े सब समाप्त कर देता है।
21. गिलोय की तीन चार इंच तने को लेकर मसल कर 50 मिली. पानी में भिगो दें। उसके 3 घंटे बाद वह सब पी लें गिलोय चबाकर खा लें। गिलोय के तने पत्ते का काढ़ा उबालकर पीना लाभप्रद रहता है। इसमें चिरायता (नेपाली) भी मिला दें तो यह बहुत शक्तिशाली रोगप्रतिरोधक होता है।
22. पंसारी से कुटकी चिरायता लें। 2-3 ग्रा. प्रति 100 मिली. पानी में रात को भिगो कर रखें प्रातः छानकर पी लें। धूप में इसको सुखाएँ व शाम को पुनः भिगो दें ऐसा 2-3 दिन करें। यह तीव्र शोधक है व इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है। इससे कई बार पेट तेजी से साफ होता है डरे नहीं। 5 दिन से अधिक इस सेवन न करें।
      नोट-इस प्रयोग के  उपरान्त 2 घंटे तक दूध व उससे बने पदार्थों का सेवन न करें।
23. बाजार से ताजा सुदर्शन चूर्ण किसी अच्छी कम्पनी का खरीदें। छः माह से पुराना न हो। 3 ग्रा. सुबह शाम खाली पेट लें।
24. किसी न किसी प्रकार उपवास रखने का प्रयास करें।
        वैसे तो सभी प्रयोग सुरक्षित है परन्तु फिर भी उनको किसी वैद्य अथवा अनुभवी आचार्य की देख-रेख में करें। एक साथ सभी प्रयोग न कर डालें। शरीर की प्रकृति व आयु के अनुसार औषधि की मात्रा तय करें। यदि लेखक की किसी बात में कोई संशय है तो अधिक जानकारी के लिए लेखक की पुस्तक ‘स्वस्थ भारत’  पढ़ें।

Tuesday, April 7, 2020

वाह रे करोना


वाह रे करोना, असम्भव को सम्भव तूने कर दिखाया,
अमेरिका, यूरोप जैसे दादाओं को तूने खूब रूलाया।
मशीन बन चुष्े  मानव ने फिर दीप जलाया।
नदियाँ, आकाश, जलवायु सबको शु(, पवित्र बनाया।
प्रड्डति पर होते अत्याचार को बलपूर्वक रुकवाया।
वाह रे करोना, असम्भव को सम्भव तूने कर दिखाया,
लोग डरे हैं, घरों में छुपे हैं, आतंक मचाया।
बड़े-बड़े वैज्ञानिकों को तूने अंगूठा दिखाया।
अनगिनत निरीह पशु-पक्षियों की जान को बचाया।
दानव बन रहे मानव से माँसाहार छुड़वाया।
वाह रे करोना, असम्भव को सम्भव तूने कर दिखाया,
जो हैं शु( सात्विक प्राणी उनको जीवन दान कराया।
स्वस्थ भारत का स्वप्न पूरा होगा यह विश्वास दिलाया।
आयुर्वेद व प्राड्डतिक चिकित्सा को सम्मान दिलाया।
आपसी सहयोग व मिलजूल कर सबको रहना सिखाया।
बढ़ रही गन्दगी को साफ करने, बीड़ा तूने उठाया।
सारी दुनिया तुझको कोसे, प्रड्डति ने तेरा आभार जताया।
करो प्रड्डति, पर्यावरण, प्राणियों का सम्मान यह हमको समझाया।
वाह रे करोना, क्या गजब का चमत्कार दिखाया।
जो कोई न कर पाया वह तूने सम्भव कर दिखाया।।

Monday, January 16, 2017

कब्ज की प्राकृृतिक चिकित्सा



कब्ज क्या हैः-
          कब्ज को सब रोगों की जननी कहा जाता है। हम जो भोजन करते हैं वह पचकर शरीर से मिलकर आत्मसात् होता रहता है, परंतु भोजन पचने के बाद जो भाग शरीर से मिलकर तद्रूप नहीं बन सकता वह शरीर के लिए अनुपयोगी व विजातीय द्रव्य है, जिसे शारीर बाहर निकालने का प्रयत्न करता है। यही प्रक्रिया निष्कासन व बहिष्करण क्रिया कहलाती है। यह स्वाभाविक न हो, रूकावट हो, शौच जाने भी पाखाना न हो तों उसे मलावरोध, कोष्ठबद्धता या कब्ज कहते हैं।
          जाने-माने प्राकृृतिक चिकित्सक बर्नर मैंकफेडन के अनुसार दुनिया में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो कब्ज रोग का शिकार न हो इसलिए डाॅक्टर की मान्यता है कि यदि शत-प्रतिशत नहीं तों ९९ः लोग आजकल जरूर ही कब्ज के रोगी हैं।
          कब्ज के रोगी को पाखाना साफ ना होने के साथ-साथ अनेक परेशानियाॅं देखने को मिलती हैं। हमेशा आलस, सिरदर्द, अनिद्रा, भूख की कमी, भोजन में अरूचि, निराशा, खट्टी डकारें, पेट दर्द, त्वचा संबंधी विकार, मुॅंह और साॅंस में बदबू, स्फूर्ति और शक्ति का ह्यास, मन में चिंता, खिन्नता, स्मरणशक्ति की कमी आदि लक्षण बने रहते हैं। अंत में कब्ज के कारण अनेकानेक रोग जैसे बावासीर, संग्रहणी, पेचिस, मधुमेह, रक्ताल्पता, अतिसार, वातरोग एवं कई प्रकार के मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। बहुत ही कम रोग हैं जो कब्ज के कारण नहीं उत्पन्न नहीं होते हों इसलिए कब्ज को सभी रोगों की जननी कहा जा सकता है (आरोग्य मंदिर गोरखपुर के संस्थापक डाॅ. विठ्ठलदास मोदी के अनुसार तों कब्ज सब रोगों की नानी है) आयुर्वेद में सभी रोगों का कारण कब्ज अर्थात कुपित मल ही बताया है।- “ सर्वेषामेव रोगानां निदानं कुपितामलाः। ”
          एक बार अमेरिका के कई डाॅक्टरों ने विभिन्न रोगों से भरे हुए रोगियों की २८४ लााशों की परीक्षा की थी। पता चला कि उन लाशों में से २५६ लाशों की बड़ी आंतें सड़े हुए मल से भी पड़ी थीं। उनमें से किसी की तों बड़ी आॅंत मल से ठसाठस भरकर फूल उठने कारण दोहरी अथवा दोगुनी हो गई थी। परीक्षा करके देखा गया तों उनमें से अधिकांश की आॅंतों के भीतर मल सूखकर आॅंत की दीवारों में स्लेट पत्थर की तरह कठोर होकर चिपक गया था, किंतु आश्चर्य की बात यह है कि मृत्यु के पहले इन सब रोगियों का दैनिक मलत्याग बंद नहीं हुआ था। डाॅक्टरों ने उनके आच्छादित कठोर दीवारों को छुरी से तराशा और देखा कि उसके अंदर विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे कीड़े अपना घर बनाए निवास कर रहे ळें। किसी-किसी में कीड़ों के अंडों के समूह पाए गए और किसी-किसी की आॅतों में उन कीड़ों ने अपना घर बनाकर आॅंतों की दीवार में घाव पैदा कर दिए हैं। कब्ज की जिस भयानक अवस्था का पता डाॅक्टरों ने उर्पयुक्त प्रकार की लाशों को चीरकर लगाया। वह हममें से कितने ही जीवित व्यक्तियों की अवस्था से भिन्न नहीं हैं। अतः रोज-रोज थोड़ा  मल निकलने में ही हमें उस धोखे में न रहना चाहिए कि आॅत दूषित मल से भरी नहीं है।
कब्ज के प्रमुख कारणः-
(१)     अहितकर भोजनः- आधुनिक जीवन शौली की अंधी दौड़ में चीनी, चाय, काॅफी, नशे की चीजें, मसाले, तले-भुने खाद्य, मैदा से बनी चीजें, गरिष्ठ भोजन, फास्टफूड, ब्रेड, बिस्किट, बरगर, चाउमीन, पेस्टी, पेटीज आदि का प्रचलन इस रोग का कारण है। आजकल चोकर निकाले आटे की रोटी, कण निकाले हुए चावल का माॅड रहित भात, बिना छिलके की दाल एवं सब्जियाॅं सभ्यता की पहचान बन जाने के कारण कब्ज हो जाना स्वाभाविक ही है।
(२)     अनियमित भोजन क्रमः- प्रकृति का नियम है कि जब भूख लगे तब भोजन करें, जब प्यास लग तब पानी पीएॅं। भोजन करते समय पानी पीते रहने की आदत गलत है, इससे पाचक रसे अपना कार्य सही ढंग से नहीं कर पाते, आमाश्य का आवश्यक तापक्रम भी गड़बड़ा जाने से पाचन क्रिया बाधित होती है। भोजन के डेढ़-दो घंटे बाद पानी पीना चाहिए। भोजन करते समय चित्त प्रसन्न रखें। मन तनाव, चिंता, भय, क्रोध, आवेश अदि तिव्रमनोेवेग से ग्रस्त हो, तब भोजन न करें तों ही अच्छा है। ऐसे समय में किया गया भोजन ठीक तरह  नहीं पचता है। भोजन करतें समय खूग चबा-चबाकर  भोजन को पानी की तरह पतला बनाकर ही निगलें, इस नियम पालन से आॅतों की सर्पिल गति (पंरिस्टाल्टिक मूवमेंट) सुचारू रूप से चलती हैए जिससे कब्ज नहीं होता है तथा मुॅंह में स्थित लार ग्रंथियों से पाचक-रस निकलकर भोजन से मिलकर पाचन में सहायक होता है।
(३)     शौच रोकनाः- शौच नियमित समय पर ही जाना चाहिए। शौच की इच्छा होने पर रोकना नहीं चाहिए। मल एवं मूत्र के वेग को रोकने से कई व्याधियाॅं जन्म लेती हैं। पखाने की शंका हो तब भी तुरंत जाना चाहिए। यह स्मरणीय तथ्य है कि शौच की इच्छा होने पर बार-बार उपेक्षा करने से नाड़ी मस्तिष्क को आदत पड़ जाती है कि वह मलाश्य को मल निष्कासन की आज्ञा संबंधित नाड़ियों द्वारा न भेजे, फलतः कब्ज की स्थिति बन जाती है।
(४)     अन्य कारणः- व्यायाम एवं श्रम का अभाव भी इस रोग को जन्म देता है। नशीली वस्तुएॅं- तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, चाय, काॅफी, अफीम, चरस तथा शराब आदि उत्तेजक पदार्थ होने के कारण शरी की नस-नाड़ियों को कमजारे कर देते हैं। इसलिए इनसे कब्ज होता है। देर रात तक जागने से अपर्याप्त निद्रा का प्रभाव बड़ी आॅंत पर पड़ता है, जिससे कब्ज होता है।
          भोजन में सलाद, छिलकायुक्त अनाज, चोकरयुक्त आटे की रोटी न होने के कारण कब्ज होता है। मानसिक असंतुलन, अवसाद आदि मानसिक रोगी को भी कब्ज होती है।
          प्रकृति ने पेड़ों पर लगने वाली मिठाइयाॅं दी हैं, जैसे-खजूर, मुनक्का, किशमिश, छुआरा, केला, चीकू, पपीता, आम आदि। ये स्वास्थ्य के लिए अत्याधिक लाभकरी हैं। पचने में अत्यंत सरल हैं। शरीर का पाचनतंत्र सशक्त बनाता है। नई शक्ति देने वाले गुण फलों में मौजूद हैं। इन्हें छोड़कर कृत्रिम रंग-बिरंगी मिठाइयाॅं खाएॅंगे तों कब्ज तों होगी ही। अपनी गलतियाूं को सुधारना होगा। प्रकृति की शरण में पहुॅंचकर ही सच्चा आरोग्य प्राप्त किया जा सकता है।
          दूध को कई बार उबालने या अधिक उबालने से वह कब्जकारक हो जाता है। अतः दूध हल्का एक उबाल का ही लें। दूध पीते समय एक गिलास दूध को पाॅंच मिनल में धीरे-धीरे पीने का नियम आवश्यक याद रखा जाना चाहिए।
कब्ज निवारण के उपायः-
(१) कड़ी भूख लगने पर भोजन करें। भोजन में कच्ची सब्जियाॅं (सलाद) तथा छिलकेयुक्त दाल, चोकरयुक्त आटा की रोटी हो।
(२) भोजन करते समय मन को शांत रखें धीरे-धीरे ठीक तरह चबाकर आधा घंटे में भोजन करें। शाम का भोजन सूर्यास्त से पूर्व कर लेना चाहिए।
(३) स्वाद के नाम पर आचार, मिर्च-मसालों से बचें। ताजी चटनी ले सकते हैं।
(४) प्रातः काल उठकर पानी पीना तथा सोते समय पानी पीने का क्रम अवश्य बना लें।
(५) भोजन के एक घंटे पूर्व तथा भोजन के दो घंटे बाद पर्याप्त पानी पीते रहें।
(६) भोजन के तत्काल बाद वज्रासन की स्थिति में १० मिनट अनिवार्य रूप से बैठना चाहिए। भोजन करने के तत्काल बाद भाग-दौड़ करने से पाचन गड़बड़ा जाता है।
(७) फास्ट फूड, जंग फूड, मैदा, चीनी एवं मिठाइयों से बचें।
(८) अमरूद, नाशपाती, सेब, संतरा, पपीता, मौसमी आदि फल तथा गाजर, मूली, टमाटर, पŸाागोभी, चुकंदर, खीरा, ककड़ी आदि की सलाद को भोजन में सम्मिलित करें। पक्का बेलफल पेट रोगों में बड़ा लाभकारी है।
(९) सूर्यभेदी प्राणायाम, सर्वांगासन, मत्स्यासन, भुजंगासन, योगमुद्रा, हलासन, पश्चिमोŸाासन तथा नौली आदि यौगिक क्रियाएॅं पाचन संस्थान को सुदृढ़ बनाती हैं।
(१०) इन क्रियाओं को प्रातः नित्य अपनाएॅं। आॅंतों की स्वाभाविक शक्ति लौैटाने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा का निम्न सरल क्रम अपनाना चाहिए।
(११) प्रातः ४.४५ बजे जागरण तथा आधा नींबू एक-डेढ़ गिलास पानी में निचोड़कर पीएॅं,
शौच जाएॅं।
(१२) तत्पशचात् १० मिनट कटि स्नान लेकर खुली हवा में टहलने निकल जाएॅं। लगभग ४-५ किलोमिटर अवश्य टहलें। कमजोरी हो तों अपनी क्षमतानुसार टहलें या लेटकर विश्राम करें। टहलने के बाद कुछ योगासन-व्यायाम करें। फिर ठंडे पानी से हाथ से रगड़कर स्नान करें।
(१३) उपासना, ध्यान आदि के बाद नाश्ता करें। नाश्तें में २५० ग्राम ताजे फल, ५० ग्राम किशमिश या मुनक्के पानी में रातभर भिगोए हुए तथा ४० ग्राम अंकुरित अन्न खूब चबाकर खाएॅं।
(१४) प्रातः ७ बजे पेडू पर मिट्टी की पट्टी (२० मिनट) इसके बाद एनिमा लेकर कोष्ठ साफ करें।
(१५) दोपहर ११ बजे भोजन- २ या ३ गेहॅंू के चोकरदार आटे की रोटी, सब्जी, ३५० ग्राम हरी सब्जी बिना मिर्च-मसाले की १५० ग्राम सलाद तथा १०० ग्राम ताजी दहीं लें।
(१६) अपराहृ २ बजे- मौसम के अनुसार उपलब्ध किसी एक फल का रस २५० ग्राम या गाजर का जूस या सब्जियों का सूप।
(१७) शाम का भोजन-दोपहर की तरह। यदि इस भोजन क्रम से भी लाभ न हो तों ३ दिन फलाहार दिन में ३-३ घंटे के अंतर से २५० ग्राम ताजे फल लें। यदि फल उपलब्ध नहीं हों तब २५०-२५० ग्राम उबली सब्जी ले सकते हैं। तीन दिन रसाहार-रसाहार में फलों का रस ३-३ घंटे के अंतर से २५० ग्राम लें। (यदि फल उपलब्ध न हों तों हरी सब्जियों का सूप बनाकर ले सकते हैं।) तीन दिन का उपवास-उपवास में मात्र नींबू का रस मिलाकर पानी पीते रहें। दिनभर में ४ नींबू ले सकते हैं। शुद्ध शहद २-२ चम्मच तथा आधा नींबू एक गिलास पानी में लेते रहिए। दिनभर में साढ़े तीन-चार लीटर पानी अवश्य पीएॅं। अब उपवास के बाद रसाहार फिर फलाहार १-१ दिना अपनाकर भोजन का क्रम अपनाना चाहिए। भोजन में धीरे-धीरे पूर्णाहार लेना चाहिए। पहले दिन १ रोटी दूसरे दिन २ रोटी तीसरे दिन ३ रोटी लेकर पूर्ण भोजन क्रम अपनाना  चाहिए। आॅंतों को एकदम बोझ डालने से उपवास का लाभ नहीं मिलता। अभी अल्पकालीन तीन दिन उपवास का क्रम ही बताया जा रहा है। घर में रहकर लंबे उपवास नहीं किए जा सकते उसके लिए प्राकृतिक चिकित्सालय में रहकर उचित देखरेख में १५ दिन का उपवास कर सकते हैं। रसादार, फलाहार, उपवास में नित्य मिट्टी की पट्टी देने के बाद एनिमा लेना अनिवार्य है। एनिमा द्वारा आॅंतों में स्थित मल एवं विष बाहर निकलता है। यदि मिट्टी की पट्टी न उपलब्ध हो सके तों एक सूती तौलिया को चार परत कर लें, ठंडे पानी में भिगोकर पेट पर रखें। इससे ठंडक पहुॅंचाकर आॅंतों की क्रियाशीलता व शक्ति बढ़ाई जा सकती है। १०-१५ मिनट तक बदल-बदलकर ठंडी तौलिया पेट पर रखें। रात को सोते समय पेट को ठंडे पानी से भीगी सूती पट्टी की लपेट देकर ऊपर से ऊनी कपड़े की पट्टी लपेट दें।
(२) एनिमा केवल हल्के गरम पानी (शरीर के तापमान का) लिया जाता है। एनिमा पात्र में एक लीटर लगभग पानी लें तथा एनिमा के नाॅजल में रबर की नली (केथेटर) लगा लें, जिससे एनिमा लेते समय मलद्वार में खरोंच का खतास न रहे। केथेटर मेडिकल स्टोरों में उपलब्ध रहता है। एनिमा में साबुन का पानी या ग्लिसरीन का एनिमा नुकसानदायक है। पानी में नींबू का रस मिला सकते हैं।
(३) एनिमा उपचार काल में नित्य लेते रहें, परंतु हमेशा लेते रहने की आदत न डालें। यह शरीर शोधन के लिए उपयोगी हैं तथा यौगिक बस्तिक्रिया का सरल विकल्प है।

(४)) त्रिफला चूर्ण एक तोला लगभग, नींबू रस मिले जल से प्रातः लें केवल पांच सात दिन ताकि पुराना जमा मल एक बार साफ हो जाए। लम्बे समय तक प्रयोग न करें।