Wednesday, November 11, 2020

बवासीर का घरेलु निदान

       जब मलाशय की शिरायें फूल जाती हैं तो उनमें गाँठे बन जाती हैं। यह कब्ज के कारण होता है जो लोग अधिक समय तक गद्दी या कुर्सी पर बैठे रहते हैं, उनकी गूदा (Anus) की श्लैष्मिक झिल्ली में उत्तेजना पैदा होती है क्योंकि रक्तवाहीनियाँ दब जाती है। प्रोस्टेट गलैण्ड के बढ़ जाने तथा मूत्राशय में पथरी हो जाने के कारण बवासीर की शिकायत हो जाती है। गुदा में मस्से गुच्छों के रूप में उभर आते हैं। जो लोग कटु, अम्ल, लवण, तीक्ष्ण तथा गरम पदार्थों का सेवन अधिक करते हैं, उनको भी यह रोग हो जाता है।

रोग के लक्षण

      गुदाद्वार के भीतर तथा बाहर एक छोटी-सी गाँठ बन जाती है जिसमें सूजन होती है, गाँठों में टपकन, जलन तथा अकड़न पैदा हो जाती है। मल त्याग के समय दर्द होता है तथा खून गिरता है। (Anus) में जलन, दर्द, कड़ापन, बार-बार खुजली होती है। भूख कम हो जाती है, जोड़ों तथा जाँघों में दर्द होता है, लगातार कमजोरी उत्पन्न होती है।

उपचार

  • सुबह खाली पेट 2 चम्मच मूली का रस चुटकीभर नमक मिलाकर पीयें।
  • बादी बवासीर (सूखी और सूजन वाली) में नीम का तेल या कासीसादि या जात्यादि तेल का अन्दर पिचू लें (रबड़ की पाइप द्वारा) और बाहर मस्सों पर लगाएँ।
  • पके अनार के छिलकों को छाया में सूखाकर पीस लें और बारीक कपड़छन चूर्ण बना लें और रोजाना दिन में 3 बार 2-2 चम्मच चूर्ण को पानी या मट्ठे से सेवन करें।
  • 1 चम्मच आँवले का चूर्ण मट्ठे के साथ या पानी के साथ खायें।
  • गूदा पर दिखाई देने वाले बवासीर के मस्सों पर पपीते की जड़ पानी में घिसकर लगायें।
  • गाजर का रस एक कप तथा पालक का रस एक कप - दोनों को 8-10 दिनों तक नियमित रूप से पीने से बवासीर खत्म हो जाती है।
  • रीठे के छिलके तवे पर भूनकर पीस लें, फिर उसमें समभाग पपरिया कत्था मिलाकर मस्सों पर लगायें।
  • थोड़ी-सी फिटकरी और थोड़ी-सी हरड़ पिसी हुई - दोनों को मक्खन में मिलाकर गुदा पर लगायें।
  • 1 चुटकी त्रिफला चूर्ण शहद के साथ रोजाना सेवन करें ऊपर से मट्ठा या पानी पी लें।
  • सप्ताह में एक बार हल्के गरम पानी (1 लीटर) में 1 नीम्बू का रस मिलाकर एनिमा पाइप से एनिमा लें ताकि कब्ज की शिकायत न रहे।
  • गरम पानी को बड़े टब में भरकर नीचे (Hips) की सिंकाई करें।
  • रोजाना 4-5 लीटर पानी पीयें।
  • गुदा मार्ग की साफ-सफाई अच्छे से पानी डालकर करें।

      इन घरेलू उपायों को करते हुए आयुर्वेदिक/होम्योपैथिक/एलोपैथिक जो पद्धति आपको सही लगे वह दवा डॉक्टर के निर्देशन में सेवन करें।

Sunday, November 8, 2020

क्या आप तस्वीरों के माध्यम से स्वास्थ्य सलाह दे सकते हैं?

 


bY rAHUL pARASHAR

नाभि में छुपा है आपकी सेहत का राज

 

क्या आपकी नाभि में छुपा है आपकी सेहत का राज?

नाभि को शरीर का सेंट्रल पॉइंट कहा जाता है। इसी के द्वारा आप अपनी शरीर से जुड़ी समस्याओं का उपचार करके अच्छा स्वास्थ्य पा सकते हैं। नाभि में सेहत के राज छुपे हुए है। आओ जानते हैं:-

अगर आंखों की नसें और नज़र कमजोर हो गई है, तो घबराने की जरूरत नहीं है। नारियल का तेल और शुद्ध गाय के घी को मिलाकर रात को सोने से पहले नाभि में 3–4 बूंदे टपकाएं और 15–20 मिनट ऐसे ही लेटे रहे। नाभि इस तेल को सोख लेगी। कुछ महीनों के बाद ही यह समस्या दूर हो जाएगी है।

पीरियड्स के समय महिलाओं को दर्द होने पर नाभि में थोड़ी-सी ब्रांडी रूई में भिगोकर रखने से दर्द मिनटों में दूर हो जाता है।

शरीर में किसी भी प्रकार की कमजोरी होने पर रात को सोने से पहले नाभि में गाय का शुद्ध देसी घी लगाना चाहिए। इससे कुछ दिनों में ही शारीरिक कमजोरी दूर हो जाती है।

होंठ फटते हैं या काले पड़ गए हैं तो नाभि में सरसों का तेल कुछ दिन लगाने यह समस्या ठीक हो जाती है। इससे पुराना सिर दर्द ठीक होता है और बालों की अनेक प्रकार की समस्याएं भी दूर हो जाती हैं।

चेहरे को चमकदार और सुंदर बनाने के लिए नाभि में बादाम का तेल लगाना चाहिए। इससे सर्दियों में चेहरे की खुश्की भी दूर होती है।

चेहरे के कील-मुंहासे और दाग-धब्बों को दूर करने के लिए नाभि में नीम का तेल या नीम का रस बहुत ही लाभकारी माना गया है।

चेहरे को हमेशा मुलायम रखने के लिए शुद्ध देसी घी को नाभि पर लगाना चाहिए। इससे चेहरे की चमक बरकरार रहती है।

तिल का तेल लगाने से शरीर में दर्द से राहत मिलती है।

जैतून का तेल लगाने से जोड़ों के दर्द से छुटकारा मिलता है और मोटापा भी कम होता है। अरंडी का तेल भी जोड़ों के दर्द में फायदेमंद है।

इसके अलावा सरसों का तेल रोजाना नाभि पर लगाने से बहुत बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है।

with thanks from

ASHOK SACHDEVA

आयुर्वेदिक दवा "कामदुधा रस" के फायदे

 कामदुधा रस एक ऐसी आयुर्वेदिक दवा है जिसका उपयोग पाचन समस्याओं, पुराने बुखार, सीने की जलन, ऊर्ध्वाधर (वर्टिगो), मतली, उल्टी, कमजोरी आदि से आराम पाने के लिए किया जाता है। यह हर्बल और खनिज सामग्री से बना होने के कारण इसका प्रयोग कई बीमारियों के आयुर्वेदिक उपचार के लिए किया जाता है।

कामदुधा रस के गुण

  • एंटासिड
  • एंटी-ऑक्सीडेंट
  • एंटी-इंफ्लेमेटरी
  • उलटी रोकने वाला (एंटी-एमटिक)
  • टॉनिक
  • हल्का अवसाद विरोधी (एंटी-डिप्रेसेंट)
  • एडाप्टोजेनिक
  • सिर में चक्कर आने का विरोधी (एंटी-वर्टिगो)
  • 1. सूजन को कम करने में मदद करे

कामदुधा रस के औषधीय गुण पुरानी गैस्ट्र्रिटिस के मामलों में काफी प्रभावी होते हैं| यह पेट के अंदरूनी अस्तर की रक्षा करता है। यह शराब, दर्दनाशक और बैक्टीरिया के कारण होने वाली से परेशानियों की वजह से पेट को होने वाले नुकसान से पेट की रक्षा करता है।

2. एसिडिटी से राहत दिलाये

कामदुधा रस में पाई जाने वाली जड़ी बूटियाँ और खनिज गैस्ट्रिक एसिड से होने वाले प्रभाव को कम करने में मदद करते हैं। कामदुधा रस सीने की जलन को कम करने, पेट की जलन को कम करने में, खट्टे स्वाद और खट्टी मतली को ठीक करने में भी मदद करता है|

  • 3. पेप्टिक अल्सर को कम करे

कामदुधा रस गैस्ट्रिक अल्सर, ओसोफेजेल अल्सर और डुओडेनल अल्सर के साथ साथ पेप्टिक अल्सर को ठीक करने का भी एक अच्छा उपाय है।

  • कामदुधा ल्यूकोरिया और मासिक धर्म के दौरान भारी रक्तस्त्राव जैसी समस्याओं के लिए एक उपयोगी दवा है।
  • जब किसी को त्वचा के विकार से खून बह रहा हो, जलन हो रहा हो तो इसका उपयोग किया जाता है|
  • कामदूधा रस शीतवीर्य (ठंडा), क्षोभ नाशक और शक्तिदायक है तथा पाचनक्रिया, रुधिराभिसरण, वातवहन क्रिया और मूत्रमार्ग पर शामक असर पहुंचाता है। कामदूधा रस से जीर्णज्वर (पुराना बुखार), पित्तविकार, अम्लपित्त दाह (जलन), मूर्छा, भ्रम (चक्कर), उन्माद यह सब रोग नष्ट हो जाते है।

कामदुधा रस पोषक, रक्तशोधक, शरीरवर्धक, वीर्यवर्धक, बुद्धिवर्धक, ह्रदय की जलन का नाशक, ह्रदय पोषक, और वात-पित्त नाशक है। इसको पित्त से होने वाले सभी रोगों में निस्संकोच प्रयुक्त कर सकते है। आधुनिक रुक्ष (सूखा) और ऊष्ण युग में ऐसी शीत – स्निग्ध औषध सार्वजनिक उपयोग योग्य है।

स्त्रियोंके रक्तप्रदरमे कामदूधा रस उपयोगी है। सगर्भावस्थामे कड़वी, खट्टी, जलती हुई वमन (उल्टी) होती हो, तो वह भी कामदूधा रसके सेवनसे शमन होजाती है।

बालकोकी काली खांसी पर उपयोगी औषधियोंमे कामदूधा रस उत्तम औषधि है। अति निर्बलता आने पर और आमाशय ()मे अधिक उग्रता होने पर अन्य औषधिया जब निष्फल होजाती है तब यह लाभ पहुंचा देती है।

कामदुधा रस शीतवीर्य होने से इसका शामक प्रभाव पाचनक्रिया, रुधिराभिसरण क्रिया, वात वहन क्रिया और मूत्र मार्ग पर होता है। इन अवयवों में उत्पन्न दाह (जलन) कम होता है।

इसका कार्य भ्रम, चक्कर आदि विकारों से लेकर उन्माद (Insanity) की परिस्थिति तक मस्तिष्क के विकार, आमाशय (Stomach) से लेकर सब महास्त्रोतों के विकार, मूत्राघात (पेशाब की उत्पत्ति कम होना या पेशाब का रुकना), मुत्रोत्सर्ग, मूत्रकृच्छ (पेशाब में जलन) आदि मूत्रविकार तथा सामान्य रक्तस्त्राव और नाक से रक्तस्त्राव व रक्तपित्त की भयंकर स्थिति तक, सब पर विभिन्न अनुपनों से उपयोगी है।

इसका निर्माण अधिकतर सुधा (चुना) कल्प से होने के कारण शक्ति वर्धक भी होता है। जीर्णज्वर (पुराना बुखार) में शक्तिपात होता ही है उसे यह दूर करता है।

इसके योग घटक में शंख, कपर्दिक होने से प्लीहावृद्धि (Spleen Enlargement) दूर होकर वह स्वस्थ स्थिति में आ जाता है। मंदाग्नि दूर होकर भूख लगने लगती है।

शीत सह ज्वर (Malaria) में कड़वी (तिक्त) औषधियों का अधिक उपयोग किया जाता

  • कामदुधा रस के साइड इफेक्ट्स
  • कामदुधा रस ज्यादा खुराक लेने से कब्ज हो सकती है|
  • गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को इसे लेने से पहले डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
  • कामदुधा रस को अपने आप ही दवा के रूप में लेना खतरनाक है।
  • ज्यादा दवा लेने से झटके और चक्कर आ सकते हैं
with thanks SACHIN SAHU

Friday, November 6, 2020

दिव्य संदेश

     मनुष्य के चिन्तन और व्यवहार से मनुष्य का आचरण बनता है। जिस तरह का मनुष्य आचरण करता है, वैसा वातारण बनता है। वातावरण से परिस्थितियाँ बनती हैं और वही सुख, दुःख, स्थान, पतन का निर्धारण करती है। जमाना बुरा है, कलयुग का दौर है, परिस्थितियाँ कुछ प्रतिकूल बन गयी हैं, भाग्यचक्र कुछ उल्टा चल रहा है, यह कहकर लोग मन को हल्का करते हैं, पर इससे समाधान कुछ नहीं होता। जन समाज में से ही तो अग्रदूत निकलते हैं। प्रतिकूलता का दोषी मुर्धन्य राजनेताओं को भी ठहराया जा सकता है पर भूलना नहीं चाहिए इन सब का उद्गम केन्द्र मानवीय अन्तराल ही है। आज की विषम परिस्थितियों को बदलने की जो आवश्यकता समझते हैं उन्हें कारण की तह तक जाना होगा। अन्यथा सूखे पेड़, मुरझाते वृक्ष़ को हरा-भरा बनाने के लिए जड़ की उपेक्षा करके पत्ते सींचने जैसी विडम्बना ही चलती रहेगी। आज अन्तः के उद्गम से निकलने तथा व्यक्तित्व परिस्थितियों का निर्माण करने वाली आस्थाओं का स्तर गिर गया है। मनुष्य ने अपनी गरिमा खो दी है और संकीर्ण स्वार्थपरता का विलासी परिपोषण ही उसके जीवन का लक्ष्य बन गया है। वैभव सम्पादन और उद्धत प्रदर्शन, उच्छृंखलता दुरुपयोग ही सबको प्रिय है। समृद्धि बढ़ रही है पर उसके साथ रोग शोक कलह भी प्रगति पर है। प्रतिभाओं की कमी नहीं पर श्रेष्ठता संवर्धन व निकृष्टता उन्मूलन हेतु प्रयास ही नहीं बन पड़ते। लोक मानस पर पशु प्रवृतियों का ही आधिपत्य है। आदर्शों के प्रति लोगों का न तो रुझान है न ही उमंग है। दुर्भिच्छ सम्पदा का नहीं आस्थाओं का है। स्वास्थ्य की गिरावट, मनोरोगों की वृद्धि, अपराधी वृत्ति तथा उद्दण्डता सारे वातावरण में संव्याप्त हैं और ये ही अदृश्य जगत में उस परिस्थिति को विनिर्मित कर रही है जिसके रहते धरती महाविनाश युद्ध की विभिषिकाओं के बिल्कुल समीप आ खड़ी हुयी है।
ओउम् शान्ति शान्ति!

Friday, October 30, 2020

मूली के पत्तों में पोषक तत्त्व

 

मूली के पत्तों को स्वास्थ्य के लिए इतना लाभकारी क्यों माना जाता है?

बहुत से लोग मूली के पत्तों को तोड़कर बाहर फेंक देते हैं। मूली के पत्तों में बहुत पोषक तत्त्व पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभकारी माने गए हैं। आओ जानते हैं:-

1- अगर आप मूली के पत्तों का सेवन करते हैं तो आपको आयरन, कैल्शियम, फोलिक एसिड, विटामिन सी और फॉस्फोरस आदि प्राप्त होता है। यह पोषक तत्त्व स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभकारी हैं।

2- मूली के पत्तों में सोडियम होता है, जो शरीर में नमक की कमी को पूरा करता है। लो ब्लडप्रेशर के मरीजों के लिए भी यह बेहद लाभकारी है। इसके अलावा इसमें मौजूद एंथेकाइनिन दिल के लिए फायदेमंद होता है।

3- मूली के पत्तों में अधिक डायटरी फाइबर पाए जाते हैं, जिससे व्यक्ति का पाचन तंत्र बेहतर तरीके से काम करता है। यह मूली के पत्ते कब्ज और पेट फूलने जैसी समस्याओं से छुटकारा दिलाते हैं।

4- मूली के पत्तों में आयरन और फास्फोरस की मात्रा काफी होती है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सहायक हैं। इसकेे अलावा इसमें विटामिन सी, विटामिन ए और थायमिन जैसे पोषक तत्व थकान को दूर करने में मददगार होते हैं।

5- बवासीर जैसी कष्टकारी बीमारी को दूर करने के लिए मूली के पत्ते लाभदायक है। इसमें एंटी−बैक्टीरियल प्रॉपर्टीज होती है, जो सूजन व दर्द को कम करती है।

6- मूली पत्‍तों को चबा-चबाकर खाने से दांतों और मसूड़ों की बीमारियां दूर होती हैं।

7- मोटापे से छुटकारा पाने के लिए मूली के पत्तों के रस में नींबू और नमक मिलाकर पीने से लाभ मिलता है।

8- पीलिया के इलाज में भी मूली के पत्ते लाभदायक है। इसके इलाज के लिए पत्तियों का मिक्सी की मदद से रस निकाले और छानकर, एक गिलास रोजाना दस दिनों तक सेवन करने से पीलिया रोग ठीक हो जाता है।

9- मूली के पत्तो में भरपूर मात्रा में एंटी-कंजेस्टिव गुण होते है जो खांसी और कफ को दूर करने में मदद करते है।

10- मूली के पत्तों में ऐसे कई गुण होते हैं, जो रक्त में शर्करा के स्तर को कम करने में मदद करते हैं। इसके लिए आप मूली के पत्तों का साग बनाएं और उसका सेवन करें।

11- मूली के पत्तों का रस गुर्दे की पथरी को पिघलाने और मूत्राशय को साफ करने में मदद करता है।

12- मूली के पत्तों में मौजूद पोषक तत्व और रोगाणुरोधी और जीवाणुरोधी गुण शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकालने में मदद करते हैं।

इसलिए दोस्तों मूली के पत्तों को न फेंके बल्कि इसके स्वास्थ्य लाभ उठाएं


By Ashok Sachdeva

गया मर्द जो खाई खटाई, गई नार जो खाई मिठाई

 

'गया मर्द जो खाई खटाई, गई नार जो खाई मिठाई' इस कहावत का साधारण अर्थ और गूढ़ अर्थ क्या है?

इस कहावत को प्रायः बड़े सामान्य अर्थ में ले लिया जाता है और मजाक तक ही सिमित कर दिया गया है। पर ऐसा नहीं है, अपितु इसका हम सब के जीवन से बहुत ही गहरा और चिकित्स्कीय सम्बन्ध है। यह कहावत कह सकते हैं कि आयुर्वेदिक नुश्खा है :

'गया नर जो खाय खटाई, गई नर जो खाय मिठाई'

गया नर जो खाय खटाई : वह नर मरे हुवे के सामान है जो अत्यधिक मात्रा में खट्टे का सेवन करता है। तात्पर्य यह कि, बहुत ही ज्यादा खट्टी वस्तुओं का सेवन करने से पुरुष को शुक्रमेह अर्थात धातु रोग का शिकार हो जाने की सम्भावना रहती है। और शुक्रमेह से पीड़ित ब्यक्ति का स्वास्थय क्रमशः क्षीण होता जाता है। चेहरा निश्तेज और शरीर धीरे धीरे कृशकाय हो जाता है। उनका पूरा जीवन का ढांचा ही बदल जाता है।

इसी प्रकार, गई नर जो खाय मिठाई : वह स्त्री मरे हुवे के सामान है जो अत्यधिक मात्रा में मिठाई का सेवन करती है। क्योंकि, अत्यधिक मात्रा में स्त्री द्वारा मिठाई का सेवन करने के उपरांत श्वेत प्रदर नामक बीमारी लग जाने की सम्भावना होती है। बोलचाल की भाषा में इसे सफ़ेद पानी आना भी कहते हैं और प्रायः यह देखा जाता है कि इसे एक सामान्य प्रक्रिया मान कर नजर अंदाज कर दिया जाता है। जबकि यह स्राव बढ़ने पर वे अत्यंत क्षीण और दुर्बल हो जाती है जिससे जीवन कष्टकर हो जाता है।

Friday, October 23, 2020

ईश्वर प्राप्ति के पंच सूत्र

      हिमालय में रहकर वर्षों की अखंड तपस्या सम्पन्न कर संत शांतिदेव सविकल्प समाधि की अवस्था से अभी-अभी बाहर निकले थे। समाधि की चरम व गहन अवस्था में पहुँचकर उनकी आत्मा ब्रह्मज्ञान की ज्योति से जगमगा चुकी थी। उनकी आत्मा में परमात्मा का प्रकाश, उतर आया था और उनके हृदयसागर में करुणा, प्रेम, क्षमा सत्य आदि ईश्वरीय गुणों की ऊँची-ऊँची लहरे उठ रही थीं और उन ऊँची-ऊँची लहरों के बीच बैठे संत शांतिदेव मानो सम्पूर्ण सृष्टि, सम्पूर्ण ब्रह्मांड कर आलिंगन कर रहे थे।

      वे अपने शरीररूपी पिंड में ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड का दिग्दर्शन कर रहे थे और उससे निस्सृत दिव्य एवं ईश्वरीय आनंद का आत्मिक अनुभूति कर रहे थे। अपने खुले हुए नेत्रों से वे ऊँचे नीले गगन को निहार रहे थे और उसी नीले गगन में चमकते, जगमगाते सूर्य, चंद्र, तारे आदि सबको अपने अंतस् के आकाश में चमकने, दमकने की प्रत्यक्ष अनुभूति कर रहे थे। उनके रोम-रोम में आनंद भरी पुलकन की एक दिव्य सिहरन हुए जा रही थी।

      इसी आत्मिक भावदशा में घंटों बैठे-बैठे वे इस जगत को साक्षीभाव से, द्रष्टाभाव से निहार रहे थे। इस जगत के सम्पूर्ण प्राणियों को स्नेह व करुणाभरी दृष्टि से देख रहे थे। जगत के कल्याण हेतु उनके मन में दिव्य प्रेरणायें कहीं ऊँचे लोक से उतर रही थीं। वे सोच रहे थ कि जगत के लोगों के कल्याण हेतु उन्हें अवश्य ही कुछ करना चाहिए। शायद उनके लिए यह ईश्वरीय संदेश भी था और प्रेरणा भी।

      इसी दिव्य संदेश व प्रेरणा को हृदय में धारण किए हुए वे हिमालय से नीचे उतरे और अगले ही दिन जन-जन के बीच जाकर ज्ञान का अलख जगाने को निकल पड़े। कई तीर्थों की यात्रायें करते हुए, भ्रमण करते हुए वे जन-जन के बीच जाकर उन पर परमात्मा के अमृततुल्य ज्ञान का अभिसिंचन करने लगे। चलते-चलते वे गंगा तट पर पहुँचे और फिर वहीं एक छोटी-सी कुटिया बनाकर रहने लगे। अपनी नियमित तप साधना से निवृत्त होकर वे अपना शेष समय प्रायः लोगों को ईश्वर का अमृतमय उपदेश, संदेश देने में ही बिताया करते थे।

      उस समय सोमवती अमावस्या होने के कारण गंगा तट पर लोगों की बड़ी भारी भीड़ उमड़ आयी थी। लोग गंगा स्नान के बाद स्वतः ही संतप्रवर की कुटिया के पास एकत्रित होने लगे थे। देखते-ही-देखते वहाँ हजारों लोग जमा हो गए। सबने संतप्रवर का अभिवादन किया एवं वहीं स्थान ग्रहण किया। वे अभी भी मौन थे, कि तभी उस भीड़ में बैठे एक श्रद्धालु व्यक्ति ने संतप्रवर के चरणों में अपना प्रणाम निवेदित करते हुए कहा- ‘‘भगवन्! हम सब अज्ञानी हैं, हमें शास्त्रों का ज्ञान नहीं है। हम गृहस्थ हैं और गृहस्थी के कार्यों में ही संलग्न रहते हैं। क्या कोई ऐसा मार्ग है, उपाय है, जिसे अपनाकर हम जैसे सामान्य लोग भी ईश्वरप्राप्ति जैसे परम लक्ष्य को पा सकें? भगवन्! अज्ञान पड़े हुए हम जैसे लोगों के संशय का निवारण आप जैसे सर्वगुणसम्पन्न संत व दुर्लभ महात्मा ही कर सकते हैं। इसलिए हे भगवन्! आप हम सब का मार्गदर्शन करें।

      संप्रवर बोले- ‘‘वत्स! यह सम्पूर्ण सृष्टि साक्षात् ईश्वर की ही अभिव्यक्ति है। इस सृष्टि के रूप में, संसार के रूप में परमपिता परमेश्वर स्वयं को ही अभिव्यक्त कर रहे हैं। इसलिए इस जगत को ईश्वर का रूप मानकर इसकी सेवा करना साक्षात् ईश्वर की ही सेवा है। इस सृष्टि में तुम्हारे द्वारा किया गया हर कर्म ही ईश्वर के चरणों में अर्पित हो रही पूजन सामग्री है। इसलिए तुम्हारे द्वारा किए गए प्रत्येक शुभ व पुण्यकर्म ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।

      वे आगे बोले- ‘‘ईश्वर ने मानव जीवन के रूप में हम सबको एक बहुमूल्य उपहार दिया है। हमारे पास जो भी समय है, श्रम है, साधन है, प्रतिभा है वह स्वयं के पेट, परिवार प प्रजनन की संकीर्ण परिधि में रहकर, उसे समाप्त कर देने के लिए नहीं है। ईश्वर द्वारा प्रदत्त ये सारे साधन हमें इस सृष्टि की सेवा के लिए मिले हैं, जन-जन की सेवा के लिए मिले हैं। इस संसार में सेवा के बीज बोकर हम औरों के साथ-साथ स्वयं अपना भी भला कर सकते हैं; क्योंकि हमारे द्वारा किए गए सेवा के कार्यों से हमारे चित्त की शुद्धि होती है, जिसमें हमारे लिए एक ओर तो हमारे द्वारा किए गए शुभ कर्मों से जो हमें पुण्य प्राप्त होता है, उससे हमें भौतिक सुख-समृद्धि भी प्राप्त होती है।’’

      संत आगे बोले- ‘‘द्वितीय सूत्र यह है कि तुम सब हमेशा अपनी मृत्यु का स्मरण रखो। यह जीवन क्षणभंगुर है। मृत्यु का स्मरण रखने से तुम इस संसार के प्रति होने वाली आसक्ति के बंधन से मुक्त रह सकोगे।’’ तृतीय महत्त्वपूर्ण सूत्र यह है- ‘‘तुम्हें इस बात का हमेशा स्मरण रहना चाहिए कि ईश्वर सर्वत्र है, सर्वव्यापी है, न्यायकारी है। जो ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वव्यापी है, न्यायकारी है; हम हमारे द्वारा किए जाने वाले हर कर्म का साक्षी है। इस बात का स्मरण रहने से तुम सदैव बुरे, अशुभ व पापकर्म करने से बचे रहोगे और हमेशा शुभ कर्म करते रहने से तुम्हें हमेशा शुभ फल, मधुर फल ही प्राप्त होंगे।’’

      संत ने आगे कहा, ‘‘चतुर्थ महत्त्वपूर्ण सूत्र यह है कि सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति कोमलता का व्यवहार करना, व्यवहार में सरल व निश्छल होना, मीठे वचन बोलना, आलस्य-प्रमाद व निंदा चुगली से दूर रहना, देवताओं, पितरों और अतिथियों को उनका भाग देना, सात्त्विक आहार ग्रहण करना, वीतराग पुरुषों का संग करना, उन्हें गुरु रूप में वरण करना, उनकी आज्ञापालन करना एवं नित्य-निरंतर पुण्यकर्मों में लगे रहना आदि निश्चित ही कल्याण के मार्ग हैं। इनसे उद्देश्य की प्राप्ति होने के कुछ संशय नहीं है।’’ वत्स! पंचम सूत्र यह है कि तुम सब हमेशा शास्त्रों का स्वाध्याय करना। शास्त्रों का स्वाध्याय करने से तुममें सदा शुभ विचारों, प्रेरणाओं व संकल्पों का जागरण होगा; जिसके प्रभाव में रहकर तुम सदा सच्चाई के मार्ग पर चल सकोगे और शुभ कर्म कर सकोगे। तुम पर कभी बुरे व अशुभ विचार हावी नहीं हो सकेंगे।

      संतप्रवर के इस अमृतमय संदेश को श्रवण कर वहाँ उपस्थित हजारों लोग स्वयं को धन्य-धन्य महसूस करने लगे। आज उन्हें लग रहा था कि आज जल स्नान के साथ-साथ ब्रह्मोपदेश पाकर सचमुच ही अमृत स्नान भी कर लिया है। संतप्रवर की दिव्य अमृतवाणी को हृदय में धारण किए हुए व उसे अपने जीवन में जीने की सत्प्रेरणा लिए हुए भी श्रद्धालु भक्तगण वहाँ से अपने-अपने गंतव्य को प्रस्थान हुए।

अखण्ड ज्योति जून-2020

Monday, October 19, 2020

हमें सर्दी के मौसम में ज्यादा पेशाब क्यों आती हैं?

 [1] ठंड में बार-बार टॉयलट – ठंड यानी की स्वेटर, कंबल और रजाई के साथ पक्की यारी वाला वक्त। रात में रजाई में घुसने के साथ ही बस ये सोचना के जल्दी से रजाई गर्म हो जाएं और बस फिर कोई भी इसमें से निकलने को ना कह दें। और अगर ऐसे में कोई रजाई में से निकल कर कोई काम करने को कह दे, तो बस फिर तो गुस्सा आना लाज़मी ही हैं।

लेकिन, किसी और काम को तो टाला जा सकता है पर अगर बात हो नेचर कॉल यानी की टॉयलट जाने की, तो उसके लिए तो ना चाहते हुए भी रजाई से बाहर आना ही पड़ेगा।

पर ठंड में बार-बार टॉयलट जाना पड़ता है तो एक सवाल दिमाग में ज़रूर कौंधता है कि आखिर ठंड में बार-बार टॉयलट क्यों जाना पड़ता है?

जी हां, ठंड के मौसम में ये सवाल भी बार-बार दिमाग में आता है कि आखिर ठंड में बार-बार टॉयलट क्यों आता है? और खासकर अगर एसी चल रहा हो तो बस क्या ही कहना ! वैसे आपको बता दूं कि ये बेवजह नहीं होता बल्कि इसके पीछे बहुत ही खास वजह है जो शायद आपको नहीं पता होगी।


जैसे हमारे शरीर में सब कुछ अपने एक प्रोसेस के अनुरूप होता है, जब शरीर को ऊर्जा होती है तो भूख लगने लगती है, जब थकान ज्यादा हो जाती है तो नींद आने लगती है, प्यास लगना इस बात का इशारा होता है कि शरीर को पानी की ज़रूरत है। इसी तरह निवृत्त होने के लिए भी हमारी बॉडी सिग्नल देती है।


ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या ठंड के मौसम में पेशाब ज्यादा आने के पीछे भी कोई ऐसी ही वजह है तो मै आपको बता दूं कि इसके पीछे की वजह बहुत खास है। दरअसल, जब हमे ठंड लगती है तो बॉडी का तापमान सामान्य की तुलना में गिरने लगता है। ऐसे में शरीर में गर्मी को बनाए रखने के लिए हमारी बॉडी शरीर के कुछ हिस्सों में, जैसे कि हथेली और पैर के तलवों में खून का फ्लो कम कर देती है।


अब जब ब्लड के फ्लो का एरिया पहले से कम हो जाता है तो ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है। क्योकि ब्लड का अमाउंट तो सेम होता है लेकिन एरिया कम हो जाता है, इसलिए ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है।

बढ़ते ब्लड प्रेशर से शरीर को सुरक्षित रखने के लिए हमारी किडनी सामान्य से ज्यादा काम करना पड़ता है। और इसलिए हमारी किडनी ब्लड को प्यूरिफाई करने का काम तेज़ कर देती है।

अब ये तो स्पष्ट है कि अगर खून प्यूरिफाई ज्यादा होगा तो अपशिष्ट पानी भी ज्यादा निकलेगा। यही अपशिष्ट पानी गॉल ब्लैडर में जमा हो जाता है और इसी वजह से ठंड में बार-बार टॉयलट आती है।

तो ये हुई पूरी थ्योरी। अब कुछ लोग ऐसे में पानी पीना छोड़ देते हैं जिससे की टॉयलट कम आएं लेकिन ये पूरी तरह से गलत है।

क्योकि अगर आप पानी पीना छोड़ देते हैं तब भी किडनी उसी तरह अपना काम करती है लेकिन ऐसे में पेशाब पीली आने लगती है जो स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।


इन वजहों से ठंड में बार-बार टॉयलट आता है – तो अब आगे से कोई पूछे कि ठंड में सूसू ज्यादा क्यों आती है तो बिना देर किए उन्हे ये जानकारी पढ़वा दीजिएगा ताकि उनका भी ज्ञान बढ़े।

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Priya Sharma

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बाल झड़ना रोकने के लिए कारगर घरेलू उपाय

 संतुलित और पौष्टिक आहार लें । बालों के लिए अलसी के बीज, अखरोट, बादाम और देशी घी विशेष लाभदायक हैं । नियमित रूप से इनका सेवन करें ।

➤ एक कप लौकी के जूस में दो चम्मच आँवले का जूस मिलाकर प्रतिदिन सेवन करें । इससे बाल स्वस्थ और मजबूत होंगे ।

➤ आँवला, जैतून, बादाम अथवा नारियल के तेल से सप्ताह में एक या दो बार उँगलियों के पोरों से बालों की जड़ों में आहिस्ते - आहिस्ते मालिश करें ।

➤ जैतून, अरंडी और नारियल का तेल बराबर मात्रा में लेकर गुनगुना कर लें । इसे रात में लगाकर सुबह बाल धो डालें । ऐसा महीने में एक बार करें ।

➤ महीने में दो बार गो - मूत्र में थोड़ा सा पानी मिलाकर बाल धोएँ । यह दिव्य और प्राकृतिक कंडीशनर है । इससे बाल घने, काले, चमकदार और मजबूत बनेंगे ।

➤ मुल्तानी मिट्टी को खूब महीन पीस कर छान लें । फिर इसे कई दिन के रखे हुए खट्टे दही में मिला कर बालों में अच्छी तरह से लगाएँ और दो घंटे बाद धो डालें । बालों के लिए अदभुत और चमत्कारिक है ।

➤ 4-5 चम्मच मेथीदाना एक कप पानी में रात में भिगो दें । सुबह इसे उबाल कर छान लें । अब इस पानी में दो चम्मच अरंडी का तेल (कैस्टर ऑयल) मिलाकर बालों में अच्छे से लगाएँ और ऊपर से तौलिया लपेट लें । उसके दो घंटे बाद बालों को धो डालें । ऐसा सप्ताह में दो बार करें । इससे बालों का झड़ना रुकेगा और बाल मजबूत होंगे ।

➤ आधा कप नारियल के तेल में एक मुट्ठी करी पत्ता डालकर इतना पकाएँ कि पत्ते काले हो जाएँ । उसके बाद तेल को छानकर उससे बालों की मालिश करें और एक घंटे बाद धो डालें ।

➤ किसी ताँबे के बर्तन में दही रख कर उसे पाँच दिन के लिए छोड़ दें । पाँच दिन बाद आप देखेंगे कि दही का रंग हरा हो गया है । अब इस दही को उसी बर्तन में अच्छी तरह घोटकर गंजे हो चुके स्थान पर लगाएँ । कुछ दिन ऐसा करने से वहाँ बाल फिर से उग आएँगे । यह प्रयोग स्त्री - पुरुष दोनों कर सकते हैं । दाढ़ी के गंजेपन में भी इसे लगा सकते हैं ।

➤ प्याज कूटकर उसका रस निकाल लें । अब एक कटोरी में दो चम्मच प्याज का रस लें । उसमें एक चम्मच नारियल का तेल, आधा चम्मच एलोवेरा जेल तथा आधा चम्मच नींबू का रस मिलाएँ । इसी में विटामिन ई - 600 का एक कैप्सूल भी काटकर मिला लें । रात में सोने से पहले इसे बालों में लगाएँ और सुबह धो डालें । ऐसा हफ्ते में दो बार करें । इससे बाल घने, लंबे, काले व मजबूत होंगे । बालों का झड़ना बन्द होगा ।

➤ एक कप नारियल का तेल लेकर कड़ाही में गर्म करें । इसमें ततैया (बर्र या भिड़) का एक बड़ा छत्ता और चौथाई कप गुड़हल के पत्तों का रस डाल कर अच्छी तरह पकाएँ । इस तेल को छान कर रात में बालों में लगाएँ और सुबह धो डालें । यह प्रयोग हफ्ते में दो बार करें । कुछ ही दिनों में बालों का झड़ना बंद हो जाएगा । नए बाल भी उगेंगे ।

➤ एक कप नारियल के तेल में पाँच गुड़हल के फूल डालकर इतना पकाएँ कि फूल जलकर कोयला हो जाएँ । इसे छान कर रात में बालों में लगाएँ और सुबह धो डालें । बालों की बहुत उत्तम औषधि है ।

➤ एलोवेरा के पत्तों को छील कर एक कप उसका गूदा निकालें । इसमें एक कप नारियल का तेल मिलाकर अच्छी तरह पका लें । फिर इसे छान कर किसी शीशी में भरकर रख लें । हफ्ते में दो बार यह तेल लगाने से बालों की खुश्की और रूसी दूर होगी । बाल मजबूत होकर उनका झड़ना रुकेगा । एलोवेरा बालों के लिए बहुत अच्छी औषधि है ।

➤ दो चम्मच नारियल का तेल लेकर उसमें एक चम्मच आँवला पाउडर और एक चममच प्याज का रस मिला लें । रात में बालों की जड़ों में इसकी अच्छे से मसाज करें और सुबह धो डालें । इससे बाल मजबूत भी होंगे और काले भी ।

➤ आधा कप नारियल के तेल में 4 आँवले के टुकड़े करके पकाएँ । जब आँवले जलकर काले हो जाएँ तो उन्हें उसी में खूब अच्छी तरह घोट कर बालों में लगाएँ । उसके एक - डेढ़ घंटे बाद धो डालें । इससे बाल घने, लंबे और मजबूत होंगे । नए बाल आएँगे और सफेद बाल काले भी होंगे । पुरुषों की दाढ़ी में गंजापन हो तो भी यह प्रयोग अत्यंत कारगर है ।

➤ पुरुषों की दाढ़ी में यदि गंजे पैचेज हों तो कैस्टर ऑयल को हल्का गुनगुना करके रोज लगाएँ । कुछ दिन में नए बाल निकाल आएँगे ।

ये तो हुए बालों का झड़ना रोकने के कुछ प्रमुख उपाय | परन्तु बालों की समस्या को जड़ से समाप्त करने के लिए बालों के बारे में और भी बहुत कुछ जानना - समझना जरूरी है | बालों के सम्पूर्ण समाधान के लिए मेरे ब्लॉग के इस लिंक पर जाकर अवश्य पढ़ें - बालों की संपूर्ण सुरक्षा (FULL HAIR PROTECTION)

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LAYAK RAM MANAV