Wednesday, July 6, 2016

मनोकायिक रोग और योग (Psychosomatic Diseases)

    आज के समाज में बढ़ती हुई अनैतिकता और असामाजिकता के कारण मानव मानसिक और शारीरिक बीमारियों से घिरता जा रहा है। बीमारियां पैदा करने में शरीर की तुलना में मन हजार गुना अधिक शक्तिशाली है। उसी प्रकार शरीरिक रोगों की तुलना में मानसिक रोगों से होने वाली क्षति भी अत्यधिक है। मनौकायिक रोग वे कहलाते हैं जो मन से शुरू होकर शरीर में आते हैं। ऐसे रोग मन और शरीर दोनों को रोगी बना देते हैं। शरीर रोगी रहे लेकिन मस्तिष्क स्वस्थ हो तो मनुष्य अनेक मानसिक पुरुषार्थ कर सकता है किन्तु यदि मस्तिष्क विकृत हो जाए, तो शरीर के पूर्ण स्वस्थ होने पर भी सब कुछ निरर्थक हो जाता है। अधिकांश रोगों का जन्मदाता हमारा मन है, जिसके बारे में वैज्ञानिक और डाॅक्टर बहुत कम बात करते हैं। मन का साम्राज्य बहुत तेजी से फैलता है। काम, क्रोध, मोह, लोभ, द्वेष आदि मानसिक विकार नकारात्मकता पैदा करते हैं। इन सबके कारण चिन्ता, भय, आशंका, असंतोष, निराशा, उदासी, उद्वेग, आत्महीनता, अपराध प्रवृति आदि किसी भी वृति का जब आदमी पर नियंत्रण हो जाता है, जब मन संस्थान का संतुलन बिगड़ जाता है। नकारात्मकता विचारों में लम्बे समय तक बनी रहे तो शरीर और मन अनेक व्याधियों, जैसे कि तनाव (Stress), चिंता (anxiety), अवसाद (depression), सनक (obession), भ्रम (delusionephobia), मति भ्रम (hallucination), आक्रामकता (agression) आदि शरीर में घर कर लेते हैं। भावनाओं और दबी हुई इच्छाओं के शक्तिशाली वृत्त बनते जाते हैं। भंवर से पीड़ित व्यक्ति बाहर नहीं निकल पाता है। जब व्यक्ति और विचार-शक्ति शिथिल होने लगती हैं, तब उसे अपने नीरस जीवन में अपात्तियां, कठिनाइया और असफलताएं ही दिखाई देती हैं। मनोकायिक रोगों की गहराई पीड़ित व्यक्ति के मन और विचार के मध्य बने रिश्ते की घनिष्ठता पर निर्भर करती है। 
 मनोकायिक रोगों का कारण मन की परतों के नीचे दबी हुई भावनाएं, इच्छाएं, कामनांए, कुंठाएं इत्यादि होती है। नकारात्मक भावनाएं सोच पर पूरा अधिकार जमा लेती हैं। लम्बे समय तक दुविधा में उलझा व्यक्ति यह निर्णय नहीं कर पाता कि इन इच्छाओं को पूरा करूं भी कि नहीं। अपनी दबी भावनाओं का वह दूसरों के सामने वर्णन भी नहीं करना चाहता तथा ‘करूं या न करूं’ के असमंजस में सोचने की अपनी आदत को छोड़ना भी नहीं चाहता। न चाहते हुए भी मन और विचार की दोस्ती गहरी हो जाती है। आदत जितनी पुरानी होती है, दोस्ती उतनी ही घनिष्ठ होती है। विचार और मन के बीच की घनिष्ठता पीड़ित व्यक्ति को आदत बदलने में असमर्थ और असहाय बनाती है। कमजोर इच्छा-शक्ति के आगे उसका शरीर और मन इसे कभी न जाने वाला रोग मान लेता है। हतोत्साहित पीड़ित व्यक्ति ठीक होने की उम्मीद ही छोड़ देता है।
 शरीर नकारात्मक विचारों को अपने ऊपर हमला मान लेता है। रक्षा प्रणाली विचारों के इस भंवर से शरीर का बचाने के लिए शक्तिशाली हाॅर्मोन्स का स्त्राव रक्त में उँडेलती है। इसकी एडिनल ग्रन्थियों से  लगातार काॅर्टिसोल हार्मोन का स़्त्राव आरम्भ हो जाता है। यह हार्मोन लीवर में पहुंच कर उसमें जमा ग्लाइकोजन को शर्करा में बदल देता है। इससे शरीर में ऐंठन, जकड़न, कड़ापन और तनाव बढ़ते जाते हैं। पीड़ित व्यक्ति की रक्त संचालन क्रिया तथा हृदय गति बढ़ जाती है। वह कभी ब्लड प्रैशर, कभी हृदय रोग तो कभी नाभि गिर गई का इलाज कराता घूमता रहता है। पीड़ित व्यक्ति यह समझ नहीं पाता कि रोग कहां है और इलाज क्या है। असहाय -सा वह मन का रोगी शरीर को भी रोगी बना लेता है। दवाइयां मदद करती हैं लेकिन रोग मुक्त नहीं करती। ऐसे रोगों का इलाज मन को ठीक करे बिना संभव नहीं होता है। 
उपचार- सर्वप्रथम मन और विचारों की दोस्ती को तोडने का प्रयास करें। इस सच्चाई पर विश्वास करें कि नकारात्मक विचार किसी का कल्याण नहीं कर सकते। इस विश्वास को स्थापित करने के लिए लम्बा समय चाहिए। नकारात्मकता का परिणाम सदैव अज्ञानता और दुःख ही होता है। सोचने की इस आदत को बदलने के लिए अपने इष्टदेव पर या ईश्वर की शरणागत हो जाएं। ईश्वर पर किया गया विश्वास अपने स्वयं के कई बार करना पडे़गा, लम्बे समय तक करना पडे़गा। अभ्यास से ऊबें नहीं, छूट जाए तो फिर आरम्भ कर दें। अपना धैर्य, विश्वास बनाए रखें। नकारात्मक विचारों के प्रतिपक्ष सकारात्मक विचार पैदा करें। इन पहले दो चरणों का अभ्यास अति आवश्यक है।
 विचारों को सकारात्मक बनाने में आसन अत्यन्त सहायक होते हैं। लम्बे समय से नकारातमक विचारों के शरीर पर बने दुष्प्रभाव के कारण मांसपेशियां, नस-नाड़ियां ऐंठ जाती हैं एवं काॅटिसोल हार्मोन का स्त्राव रक्त को विषाक्त कर देता है। आसनों से अकड़न-जकड़न समाप्त कर देता है। रक्त का संचरण कोशिकाओं से विषैले पदार्थो को बाहर निकाल देता है। आसनों के अभ्यास के बाद किया गया प्राणायाम का अभ्यास मस्तिष्क में फैले न्यूराॅन के जाल को ढीला कर देता है। प्राणायाम के अभ्यास से न्यूराॅन पर छाए आवरण उतर जाते हैं। आसन और प्राणायाम का अभ्यास शरीर में आॅक्सीटोन (Oxytone) के स़्त्राव को बढ़ा देता है। 
 यह हार्मोन शरीर को हल्का और निर्मल करता है तथा शरीर और मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। जैसे-जैसे इस हाॅर्मोन का स्त्राव शरीर में बढ़ता है, पीड़ित व्यक्ति का हौसला और विश्वास भी उसी अनुपात में बढ़ता है।
क्रिया- योग का अभ्यास मनोकायिक रोगो को जड़मूल से समाप्त कर देता है। अपने अभ्यास में चार बातों पर लगाता ध्यान बनाएं-
1. सर्वप्रथम विचारों को बदलने का अभ्यास, जिसके लिए आसन और प्राणायाम का सहारा अत्यन्त आवश्यक है।
2. दूसरा, शिथिलीकरण की क्रियाएं, जिसमें शवासन तथा योग निद्रा का अभ्यास साथ-साथ बनाए रखें। इससे मन और शरीर के तनाव धीमे पड़ जाते है। हार्मोन के स्त्राव बदल जाते हैं और एक नई ऊर्जा का संचार होने लगता है।
3. तीसरा, भोजन की सात्विकता की ओर सजग रहें। भोजन शरीर की आवश्कतानुसार तथा मौसमानुसार करने से पाचन के तनाव कम हो जाते हैं।
4. चैथा, सजगता-पूर्वक ध्यान के अभ्यास से पीड़ित व्यकित में ईश्वरीय शक्तियों का उदय होता है। 

केवल ध्यान या प्राणायाम के अभ्यास से बात नहीं बनेगी। सबसे पहले आसन, फिर प्राणायाम तथा उसके बाद किया गया ध्यान पीड़ित व्यक्ति को मनोकायिक रोग से मुक्ति दिला देता है।

 From YOG MANJRI by Shri Ved Prakash Rathi

1 comment:

  1. Bahut hi acha, informative Article hai Sir Ji,apka bht bht dhanyawad

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