Tuesday, September 26, 2023

चेतना का दिव्य प्रवाह भाग - ३७

शक्ति के बिना, संसार समर में कैसे विजयी बनोगे ?

 शास्त्रों में कहावत है "देवो दुर्बल घातक :" यानी दुर्बल के ऊपर देवता भी घात लगते हैं, इसलिए संसार में दुर्बलता अभिशाप है और शक्ति की हमेशा पूजा की जाती है ,शक्ति का आह्वान किया जाता है, शक्ति के लिए साधना की जाती है ।

 हे मानव ! यदि तुमने शक्ति का अर्जन नहीं किया, शक्ति की उपासना व साधना नहीं की तो तुम किसी भी कार्य को सिद्ध नहीं कर पाओगे , चाहे वह भौतिक जगत की शक्ति हो चाहे आध्यात्मिक जगत की, शक्तियों तुम्हें दोनों ही चाहिए ।

 तुम्हें अपने कर्म क्षेत्र को सफलता पूर्वक सम्पादित करने के लिए स्वस्थ व शक्तिशाली शरीर चाहिए ,सबल प्राण ऊर्जा चाहिए क्या तुम जागरूक होकर इसका ध्यान रखते हो , क्या तुम स्वस्थ शरीर के लिए आहार विहार का ध्यान रखते हो, क्या तुम शक्तिशाली प्राण के लिए गायत्री महामंत्र की साधना व अग्निहोत्र का प्रयोग करते हो ?

 तुम्हें मन में उच्च स्तरीय चिंतन करने के लिए , सकारात्मक विचारों को प्रवाहित करने के लिए, सृजनात्मक चिंतन का प्रवाह गतिशील करने के लिए तुम्हें उच्च स्तरीय ज्ञान की शक्ति चाहिए , क्या तुम उच्च स्तरीय सत् साहित्य की गहन स्वाध्याय साधना उसके लिए करते हो ?

 तुम्हें संसार की विकृतियों से लड़ने के लिए भौतिक जगत के झंझावातों से निपटने के लिए , सामने आई हुई विपरीत परिस्थितियों से जूझने के लिए अकूत धैर्य व आत्मविश्वास की शक्ति चाहिए, क्या तुमने इसको पाने के लिए अपने आप को संघर्षों में डालकर चुनौतियों को स्वीकार किया है ?

तुम्हें आदर्शों व सिद्धांतों तथा नैतिक जीवन मूल्यों की रक्षा करने के लिए आत्म शक्ति चाहिए , क्या तुमने अनाचार से समझौता न करने के लिए, हार न मानने के लिए नीति पर चलते हुए असफलताओं को शिरोधार्य करने का अपने भीतर साहस पैदा किया है ?

 तुम्हें प्रकृति को अनुकूल बनाने व अदृश्य जगत से शक्ति प्राप्त करने के लिए ब्रह्मबल की आवश्यकता है उसके लिए समर्पण योग व ध्यान योग की उच्च स्तरीय साधना की तुमको आवश्यकता है क्या तुमने उसको प्राप्त करने के लिए कभी साधनाएं की या कोई प्रयास किया ?

 यही सब शक्ति प्राप्ति के सृष्टि में शाश्वत मार्ग है, यही तुम्हारे शरीर बल, प्राणबल ,मनोबल , बुद्धिबल, आत्मबल व ब्रह्मबल प्राप्ति के मूल आधार है इन्हीं साधनाओं के पथ का अनुगमन करने से शक्ति उत्पन्न होगी और इसी शक्ति के सहारे तुम संसार समर में विजय प्राप्त कर सकोगे व जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकोगे ।

 रामकुमार शर्मा 9451911234

 *युग विद्या विस्तार योजना*

( मानवीय संस्कृति पर आधारित एक समग्र शिक्षण योजना) 

विद्या विस्तार राष्ट्रीय ट्रस्ट, दिल्ली (भारतवर्ष)

चेतना का दिव्य प्रवाह ३१.

अपनी श्रद्धा सीधे धर्म- संस्कृति, राष्ट्र व जीवन मूल्यों से जोड़िए।

 जो वस्तु जितनी बहुमूल्य होती है उस पर लुटेरों की दृष्टि भी उतनी तीव्र रहती है , श्रद्धा संसार की सर्वोपरि देवी संपदा है, अगर मानव के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण कोई चीज है तो वह श्रद्धा है, श्रद्धा हृदय के भावों की अभिव्यक्ति है,और जहां भाव जुड़ता है वहां व्यक्ति का अपनापन जुड़ जाता है , श्रद्धा आत्मा का प्रकाश है, यह जहां भी पड़ता है वहां सब कुछ अपना बना लेता है । 

 इसी श्रद्धा के गुण का लाभ उठाने बुद्धिमान लोग तत्काल सक्रिय हो जाते हैं और हर तंत्र में सक्रिय हो जाते हैं, चाहे राजतंत्र हो, चाहे समाज तंत्र या धर्म तंत्र हो, हर जगह श्रद्धा का ही दोहन होता है । श्रद्धा वह सीधी दुधारू गाय हैं जिसको हर कोई पकड़ कर बांध लेता है तथा इसका दूध पी - पी कर पुष्ट होता रहता है उसका बछड़ा (लोक कल्याण) बेचारा भूख रह जाता है तथा दुर्बल ही बना रहता है ।

 राजतंत्र की तरह धर्म तंत्र का कलेवर श्रद्धा के आधार पर ही चलता है जिसका आर्थिक आंकलन किया जाए तो वह राजतंत्र से कम नहीं अधिक बैठता है लेकिन इस श्रद्धा का दोहन करने के लिए बुद्धिमान लोग, विभिन्न तंत्रों में सक्रिय रहते हैं जिनको सामान्य जनमानस पहचान ही नहीं पाता है । उन सब के आवरण राष्ट्रभक्त, धर्मशील और आदर्शवादी दिखाई देते हैं और इसी की आड़ में युगों - युगों से श्रद्धा का दोहन होता आया है और आज भी हो रहा है । जब कभी सत्य उजागर होता है तो श्रद्धा अंधी हो जाती है और सत्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं होती या फिर श्रद्धा टूटती है तो मनुष्य नास्तिक बनता चला जाता है ,उसका विश्वास सबसे हटता चला जाता है । श्रद्धा का अंधा हो जाना या टूट जाना दोनों स्थितियों में जीवन की व समाज की भारी क्षति होती है ।

 हमारी श्रद्धा महान पुरुषों से, संतो व महात्माओं से तथा लोक सेवकों से जुड़ती है, धर्म के कार्यों से जुड़ती है , धर्म यानी सृष्टि का हित करने वाले महान मिशनों से जुड़ती है, उन सब के लिए काम करने वाले लोगों से जुड़ती है और जहां इन क्षेत्र में हल्के स्तर के लोकेषणा ,(यानी नाम यश के भूखे), वित्तेषणा (यानी धन का लोभ लाभ करने वाले), पुत्रेषणा(यानी अपने परिवार को, खून के रिश्तों को पद,प्रतिष्ठा व धन का लाभ पहुंचाने वाले) बुद्धिमान , चालक व धुर्त लोग प्रवेश कर जाते हैं तो उन अभियानों को, योजनाओं को, मिशनों को, विकृत कर देते हैं ऐसी स्थिति में आप व्यक्तियों से जुड़ने की बजाय अपनी श्रद्धा को ,धर्म- संस्कृति, राष्ट्र व जीवन मूल्यों से सीधे जोड़िए , आदर्शों और सिद्धांतों से जोड़िए और इस कसौटी पर आप प्रत्येक उस व्यक्ति को कस कर देखिए जिनके प्रति आप श्रद्धा कर रहे हैं । अगर आपकी श्रद्धा व्यक्तियों के साथ जुड़ी हुई है तो धोखा हो सकता है , जिन महान पुरुषों से हमारी श्रद्धा जुड़ती है आप जरा गौर करें उन महान पुरुषों ने हमेशा मानवता के उत्थान के लिए, धर्म-संस्कृति के लिए, राष्ट्र के लिए, जीवन मूल्यों के लिए काम किया है । अगर हमारे बीच में ऐसे महान पुरुष नहीं है पर उनकी योजनाएं और विचार विद्यमान है अतः हम व्यक्तियों के प्रति की जाने वाली श्रद्धा से ऊपर उठकर सीधे अपनी श्रद्धा को महानता के साथ जोड़े इसीमें हमारा, परिवार, समाज और राष्ट्र का कल्याण है ।

 रामकुमार शर्मा  9451911234    

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(मानवीय संस्कृति पर आधारित एक समग्र शिक्षण योजना)।              

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चेतना का दिव्य प्रवाह ३२.

  *अंध श्रद्धा वह दरिया है जिसमें घातक मगरमच्छ उत्पन्न होते हैं ।* 

 इस संसार में प्रकृति की एक शाश्वत व्यवस्था है कार्य के परिणाम स्वरूप तमाम सम्पत्तियां व विपत्तियां उत्पन्न होती है जैसे कहीं फूलों का बगीचा लगाया जाएगा तो चारों तरफ सुगंध व सौंदर्य ही दृष्टिगोचर होगा, वहां कोयल, मोर, भौंरे ,मधुमक्खियां व तितलियां गुंजन करते हुए,फूदकते हुए ,उड़ते हुए स्पष्ट दिखाई देंगे तथा वातावरण स्वर्गीय आनंद देने वाला बनेगा ।

ऐसे ही कीचड़, गंदगी, कूड़ा करकट चारों तरफ भरा होगा तो वहां चारों तरफ बदबू फैलेगी, मक्खी,मच्छर, खटमल , पिस्सू, घातक वायरस व बैक्टीरिया उत्पन्न होंगे ही होंगे ,उनसे बचने के लिए दवाइयां कारगर नहीं है बल्कि वातावरण की स्वच्छता ही उसका कारगर उपाय है ।

 ऐसे ही जहां अंध श्रद्धा उत्पन्न होती है वहां पर अराजक स्तर के व्यक्ति धर्म, अध्यात्म का आवरण ओढ़ कर, संत महात्माओं का चोला पहनकर , समाज सेवा का लबादा ओढ़कर, प्रचार तंत्र का प्रयोग करके, अराजक तत्वों को समाज सेवा का चोला पहनकर, संगठनों में ,संस्थाओं में, धार्मिक तंत्रों में, सामाजिक तंत्रों में जहां भी उनको अपना आर्थिक लाभ, नाम यश की पूर्ति का योग दिखता है वहां छल-छद्म , झूठ-कपट व पाखंड का सहारा लेकर प्रविष्ठ कर जाते हैं और अंध श्रद्धा के वातावरण में ये खूब फलते फूलते है ।

 समाज की अंध श्रद्धा एक प्रकार की दरिया है,नदी है जिसमें ऐसे ही घातक मगरमच्छ उत्पन्न होते हैं जो कुछ भी श्रेष्ठ है उसको निगल जाते है यदि कोई उस नदी में जल आचमन करने, अर्घ्य लगाने, स्नान करने व जल पान करने हेतु उतर जाता है तो ये मगरमच्छ व उनका कुनबा घात लगाकर आक्रमण कर देते है।अंध श्रद्धा में उनको उपयुक्त वातावरण व पोषण मिलता रहता है अंध श्रद्धालुओं की भीड़ में उनका व उनके कुकृत्यों का प्रतिकार करने वाला कोई होता बल्कि यह भीड़ तो उनको गुरु, भगवान, देवता व महान अवतारी चेतना मानकर उनकी चरण वंदना करके अपने को परम सौभाग्यशाली समझती है और इस स्थिति में वे निरंकुश होकर अपने कार्यों को अंजाम दे सकते हैं इसलिए जब तक संसार में अंध श्रद्धा रहेगी, विकृत लोग मगरमच्छों की तरह संगठनों व संस्थानों में उत्पन्न होते रहेंगे और उसे अंध श्रद्धालुओं की शक्ति के बल पर ,सामर्थ्य के बल पर व धन के बल पर अराजकता करते रहेंगे व अवसर का लाभ उठाते रहेंगे ,यह अनादि से होता रहा है और वर्तमान में भी खुली आंखों से इसकी झांकी सर्वत्र की जा सकती है ।

 आप अपना चिंतन करें आपकी श्रद्धा कहीं अंधी तो नहीं है ? श्रद्धा को हमेशा जिनके प्रति आरोपित करना होता है उनको आदर्शों , सिद्धांतों, नैतिक मूल्यों तथा चरित्र निष्ठा,त्याग, तप ,सादगी, सज्जनता , विनम्रता , जिम्मेदारी , बहादुरी की कसौटी पर कसकर देख लेना चाहिए अगर इस कसौटी पर व्यक्ति खरा नहीं उतरता है तो वह श्रद्धा व विश्वास का पात्र नहीं हो सकता है वह चाहे जितने बड़े विशाल तंत्र का अधिपति क्यों न बन गया हो या लंकाधिपति रावण जैसे बलशाली ,सिद्ध व प्रतापी ही क्यों ना हो । आप अपना आत्म विश्लेषण करें,चिंतन व मंथन करें और आप कहां खड़े हैं ? अंध श्रद्धा की छांव में या विवेकशीलता युक्त श्रद्धा की छांव में ।

 रामकुमार शर्मा   9451911234    

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Thursday, September 14, 2023

चेतना का दिव्य प्रवाह भाग 27

जो सबके लिए भोजन बनाता है वह कभी भूखा नहीं रह सकता है ।

जो माता पूरे परिवार के लिए भोजन बनाती है क्या कभी वह भूखी रह सकती है ? उत्तर होगा नहीं ! जो सबका पेट भरता है क्या कभी भूखे पेट रह सकता है ? उत्तर होगा नहीं ! इसके अलावा उसको बनाने और खिलाने का जो आनंद मिलता है , सेवा का अवसर मिलता है जिससे आत्मा प्रसन्न होती है, श्रद्धा सम्मान और धन भी मिलता है ।

ठीक इसी तरह से समाज को सुख देने वाला कभी दुःखी नहीं हो सकता है ।

समाज को ज्ञान देने वाला कभी भी अज्ञानी नहीं रह सकता है । 

समाज को सद्भावना देने वाले के जीवन में कभी भी सद्भावनाओं की कमी नहीं पड़ सकती है। 

समाज को सत् प्रेरणा देने वाला अपने जीवन में ईश्वरीय सत् प्रेरणाएं निरंतर प्राप्त करता है ।

समाज को समय देने वाले का जीवन काल (आयु) प्रकृति व ईश्वर के आधीन हो जाता है । 

समाज को धन देने वाला, सामाजिक उत्कर्ष में लगाने वाला , समाज की पीड़ा व पतन को मिटाने में धन लगाने वाला कभी भी अभावग्रस्त नहीं रह सकता है यह सृष्टि का शाश्वत नियम है । 

संसार में बोओ व काटो का नियम काम करता है आप जो कुछ भी दूसरों के हित के लिए करोगे सृष्टि की व्यवस्था में परमात्मा के द्वारा बनाई गई व्यवस्था में उसका प्रतिफल मिलना सुनिश्चित है ।

ऐसे ही जो अपनी समस्त क्षमताओं (ज्ञान, प्रतिभा, पुरुषार्थ, समय ,श्रम ,धन व साधनों )को संसार के उत्कर्ष के लिए ,मानवता के विकास की लिए लगाता है उसके समग्र व्यक्तित्व का विकास हो जाता है , उसकी आत्मा का विकास हो ही जाता है ,उसको अखंड स्वास्थ्य ,अखंड शक्ति, अखंड आनंद ,अखंड ज्ञान व अखंड प्रेम सृष्टि व्यवस्था के अनुसार उपलब्ध होता ही है और यही जीवन की सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है आप यहां पाने की कोशिश मत करो, आप संसार को देने की कोशिश करो जो कुछ दोगे वह अनंत गुणा होकर लौटेगा ।

हे मानव जीवन के त्रितापों अज्ञान ,अभाव व अशक्ति से मुक्ति का यह शाश्वत तथा निरपध राजमार्ग है ।

रामकुमार शर्मा  9451911234    

*युग विद्या विस्तार योजना* 

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विद्या विस्तार राष्ट्रीय ट्रस्ट, दिल्ली (भारत)


Tuesday, September 12, 2023

दवाओं के अनावश्यक प्रयोग से बचें

 रतिक्रिया क्षमता को बढ़ाने के लिए सबसे अधिक कौन-कौन सी आयुर्वेदिक दवाइयां खाई जाती हैं?

  • ये सभी ताकतवर जड़ी बूटी एक प्रकार लकड़ियां हैं, जो आसानी से नहीं पचती और फायदे के स्थान पर भयंकर हानि होती है।
  • आप कुछ भी खाएं, उसे पचाना अत्यंत आवश्यक है। हजम नहीं कर सकें, तो जल्दी दम निकल जायेगा।
  • आजकल के लोग एक दिन में 3 से 4 चमच (30/40 ग्राम) अश्वगंधा, शतावरी, सफेद मूसली, मुलेठी, हरड़, आंवला, कोंच के बीज आदि के चूर्ण बिना इस्तेमाल कर रहे हैं।
  • चिंतन मंथन जरूर करें क्या कभी आपने पचाने, हजम करने के बारे में भी विचार किया है। सोचेंगे, तो अहसास होगा कि आए दिन पट की खराबी, कब्ज, बी पी हाई, मधुमेह, बैचेनी का कारण यही निकलेगा।
  • चरक संहिता के चिकित्सा सुत्र का निर्देश है कि जो भी आप भक्षण कर रहे हैं उसका 75 फीसदी हिस्सा माल विसर्जन द्वारा निकलना जरूरी है अन्यथा आप कुछ सालों बाद अनेक भयानक बीमारियों से परेशान होने लगेंगे।
  • सावधान ये तकतवार जड़ी बूटियां आपको नामर्द, नपुंसक बना सकती हैं।
  • अतः आप वही खाएं, जिसे हजम कर सकें नहीं, तो दम निकल जायेगी।
  • द्रव्यगुण विज्ञान, भाव प्रकाश और आयुर्वेदिक निघंतुयों में, तो स्पष्ट लिखा है की अगर आप परिश्रमी हैं।
  • जड़ी बूटी रूपी लकड़ियों को पचाने का सामर्थ्य रखते, हों तभी इनका चूर्ण के रूप में सेवन करें अन्यथा इनका काढ़ा पीना ही लाभकारी रहेगा।
  • प्राचीन काल का मनुष्य बहुत मेहनती होता था और 20 से 30 किलोमीटर पैदल चलना उसके लिए आम बात होती थी। इसलिए ये समस्त ओषधि लकड़ियां आसानी से पीछा जाती थीं।

नहीं पचने के कारण चूर्ण विष हो जाते हैं।

  • आयुर्वेद के एक रहस्य को अच्छी तरह समझ लीजिए कि ये सब जड़ी बूटियों की लकड़ियां ताकतवर बहुत हैं। इन्हे पचाने के लिए विशेष परिश्रम की आवश्यकता होती है।
  • आज का आदमी मेहनत बिलकुल नहीं करता। इसलिए ये सब जड़ी बूटियों के चूर्ण या पाउडर फायदे की जगह नुकसान करेंगे। क्योंकि ये चूर्ण पचते नहीं हैं और शरीर में वात पित्त कफ को असंतुलित कर शरीर का पाचन तंत्र बिगाड़ देते हैं।
  • द्रव्यगुण विज्ञान के मुताबिक शक्ति वर्धक जड़ी बूटियों का चूर्ण पचाना आसान नहीं है।
  • अगर आपको ये सब ताकतवर चूर्ण खाने का शौक हो, तो किसी भी चूर्ण या समस्त चूर्ण के मिश्रण को 10 से 15 ग्राम लेकर शाम को 200 मिलीलीटर पानी में गलाकर सुबह एक चौथाई रहने तक उबालें और खाली पेट गुड़ मिलाकर पिएं।
  • निवेदन इतना है कि गुगल आदि सोशल मीडिया पर पड़ी हुई गलत जानकारी को अपना आधार न बनाकर स्वयं ही आयुर्वेद को पढ़ें और सबका भला करें।

Health is most Important

 


Saturday, September 9, 2023

श्री तैलंग स्वामी…

 

वाराणसी की गलियों में एक दिगम्बर योगी घूमता रहता है। गृहस्थ लोग उसके नग्न वेश पर आपत्ति करते हैं फिर भी पुलिस उसे पकड़ती नहीं, वाराणसी पुलिस की इस तरह की तीव्र आलोचनाएं हो रही थीं। आखिर वारंट निकालकर उस नंगे घूमने वाले साधू को जेल में बंद करने का आदेश दिया गया।

पुलिस के आठ दस जवानों ने पता लगाया, मालूम हुआ वह योगी इस समय मणिकर्णिका घाट पर बैठा हुआ है। जेष्ठ की चिलचिलाती दोपहरी जब कि घर से बाहर निकलना भी कठिन होता है एक योगी को मणिकर्णिका घाट के एक जलते तवे की भाँति गर्म पत्थर पर बैठे देख पुलिस पहले तो सकपकायी पर आखिर पकड़ना तो था ही वे आगे बढ़े। योगी पुलिस वालों को देखकर ऐसे मुस्करा रहा था मानों वह उनकी सारी चाल समझ रहा हो। साथ ही वह कुछ इस प्रकार निश्चिन्त बैठे हुये थे मानों वह वाराणसी के ब्रह्मा हों किसी से भी उन्हें भय न हो। मामूली कानूनी अधिकार पाकर पुलिस का दरोगा जब किसी से नहीं डरता तो अनेक सिद्धियों सामर्थ्यों का स्वामी योगी भला किसी से भय क्यों खाने लगा तो भी उन्हें बालकों जैसी क्रीड़ा का आनन्द लेने का मन तो करता ही है यों कहिए आनंद की प्राप्ति जीवन का लक्ष्य है बाल सुलभ सरलता और क्रीड़ा द्वारा ऐसे ही आनंद के लिए “श्री तैलंग स्वामी” नामक योगी भी इच्छुक रहे हों तो क्या आश्चर्य?

पुलिस मुश्किल से दो गज पर थी कि तैलंग स्वामी उठ खड़े हुए ओर वहाँ से गंगा जी की तरफ भागे। पुलिस वालों ने पीछा किया। स्वामी जी गंगा में कूद गये पुलिस के जवान बेचारे वर्दी भीगने के डर से कूदे तो नहीं हाँ चारों तरफ से घेरा डाल दिया कभी तो निकलेगा साधु का बच्चा, लेकिन एक घंटा, दो घंटा, तीन घंटा, सूर्य भगवान् सिर के ऊपर थे अब अस्ताचलगामी हो चले किन्तु स्वामी जी प्रकट न हुए कहते हैं उन्होंने जल के अंदर ही समाधि ले ली। उसके लिये उन्होंने एक बहुत बड़ी शिला पानी के अंदर फेंक रखी थी और यह जन श्रुति थी कि तैलंग स्वामी पानी में डुबकी लगा जाने के बाद उसी शिला पर घंटों समाधि लगायें जल के भीतर ही बैठे रहते हैं।

उनको किसी ने कुछ खाते नहीं देखा तथापि उनकी आयु 300 वर्ष की बताई जाती है। वाराणसी में घर घर में तैलंग स्वामी की अद्भुत कहानियां आज भी प्रचलित हैं। निराहार रहने पर भी प्रतिवर्ष उनका वजन एक पौण्ड बढ़ जाता था। 300 पौंड वजन था उनका जिस समय पुलिस उन्हें पकड़ने गई इतना स्थूल शरीर होने पर भी पुलिस उन्हें पकड़ न सकी। आखिर जब रात हो चली तो सिपाहियों ने सोचा डूब गया इसीलिये वे दूसरा प्रबन्ध करने के लिए थाने लौट गये इस बीच अन्य लोग बराबर तमाशा देखते रहे पर तैलंग स्वामी पानी के बाहर नहीं निकले।

प्रातः काल पुलिस फिर वहाँ पहुँची। स्वामी जी इस तरह मुस्करा रहे थे मानों उनके जीवन में सिवाय मुस्कान और आनंद के और कुछ हो ही नहीं, शक्ति तो आखिर शक्ति ही है संसार में उसी का ही तो आनंद है। योग द्वारा सम्पादित शक्तियों का स्वामी जी रसास्वादन कर रहे हैं तो आश्चर्य क्या। इस बार भी जैसे ही पुलिस पास पहुँची स्वामी फिर गंगा जी की ओर भागे और उस पार जा रही नाव के मल्ला को पुकारते हुए पानी में कूद पड़े। लोगों को आशा थी कि स्वामी जी कल की तरह आज भी पानी के अंदर छुपेंगे और जिस प्रकार मेढ़क मिट्टी के अंदर और उत्तराखण्ड के रीछ बर्फ के नीचे दबे बिना श्वाँस के पड़े रहते हैं उसी प्रकार स्वामी जी भी पानी के अंदर समाधि ले लेंगे किन्तु यह क्या जिस प्रकार से वायुयान दोनों पंखों की मदद से इतने सारे भार को हवा में संतुलित कर तैरता चला जाता है उसी प्रकार तैलंग स्वामी पानी में इस प्रकार दौड़ते हुए भागे मानों वह जमीन पर दौड़ रहे हों। नाव उस पार नहीं पहुँच पाई स्वामी जी पहुँच गये। पुलिस खड़ी देखती रह गई।

स्वामी जी ने सोचा होगा कि पुलिस बहुत परेशान हो गई तब तो वह एक दिन पुनः मणिकर्णिका घाट पर प्रकट हुए और अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया। हनुमान जी ने मेघनाथ के सारे अस्त्र काट डाले किन्तु जब उसने ब्रह्म पाश फेंका तो वे प्रसन्नता पूर्वक बँध गये। लगता है श्री तैलंग स्वामी भी सामाजिक नियमोपनियमों की अवहेलना नहीं करना चाहते थे पर यह प्रदर्शित करना आवश्यक भी था कि योग और अध्यात्म की शक्ति भौतिक शक्तियों से बहुत चढ़ बढ़ कर है तभी तो वे दो बार पुलिस को छकाने के बाद इस प्रकार चुपचाप ऐसे बैठे रहे मानों उनको कुछ पता ही न हो। हथकड़ी डालकर पुलिस तैलंग स्वामी को पकड़ ले गई और हवालात में बंद कर दिया। इन्सपेक्टर रात गहरी नींद सोया क्योंकि उसे स्वामी जी की गिरफ्तारी मार्के की सफलता लग रही थी।

प्रस्तुत घटना “मिस्ट्रीज आँफ इंडिया इट्स योगीज” नामक लुई द कार्टा लिखित पुस्तक से अधिकृत की जा रही है। कार्टा नामक फ्राँसीसी पर्यटक ने भारत में ऐसी विलक्षण बातों की सारे देश में घूम घूम कर खोज की। प्रसिद्ध योगी स्वामी योगानंद ने भी उक्त घटना का वर्णन अपनी पुस्तक “आटो बाई ग्राफी आँफ योगी” के 31 वे परिच्छेद में किया है।

प्रातः काल ठंडी हवा बह रही थी थानेदार जी हवालात की तरफ की तरफ आगे बढ़े तो पसीने में डूब गया, जब उन्होंने योगी तैलंग को हवालात की छत पर मजे से टहलते और वायु सेवन करते देखा। हवालात के दरवाजे बंद थे, ताला भी लग रखा था। फिर यह योगी छत पर कैसे पहुँच गया? अवश्य ही संतरी की बदमाशी होगी। उन बेचारे संतरियों ने बहुतेरा कहा कि हवालात का दरवाजा एक क्षण को खुला नहीं फिर पता नहीं साधु महोदय छत पर कैसे पहुँच गये। वे इसे योग की महिमा मान रहे थे पर इन्सपेक्टर उसके लिए बिलकुल तैयार नहीं था आखिर योगी को फिर हवालात में बंद किया गया। रात दरवाजे में लगे ताले को सील किया गया चारों तरफ पहरा लगा और ताली लेकर थानेदार थाने में ही सोया। सवेरे बड़ी जल्दी कैदी की हालत देखने उठे तो फिर शरीर में काटो तो खून नहीं। सील बेद ताला बाकायदा बंद। सन्तरी पहरा भी दे रहे उस पर भी तैलंग स्वामी छत पर बैठे प्राणायाम का अभ्यास कर रहे। थानेदार की आँखें खुली की खुली रह गईं उसने तैलंग स्वामी को आखिर छोड़ ही दिया।

श्री तैलंग स्वामी के बारे में कहा जाता है कि जिस प्रकार जलते हुये तेज कड़ाहे में खौल रहे तेल में पानी के छींटे डाले जाएं तो तेल की ऊष्मा बनाकर पलक मारते दूर उड़ा देती है। उसी प्रकार विष खाते समय एक बार आँखें जैसी झपकती पर न जाने कैसी आग उनके भीतर थी कि विष का प्रभाव कुछ ही देर में पता नहीं चलता कहाँ चला गया। एक बार एक आदमी को शैतानी सूझी चूने के पानी को लेजाकर स्वामी जी के सम्मुख रख दिया और कहा महात्मन्! आपके लिए बढ़िया दूध लाया हूँ स्वामी जी उठाकर पी गये उस चूने के पानी को, और अभी कुछ ही क्षण हुये थे कि कराहने और चिल्लाने लगा वह आदमी जिसने चूने का पानी पिलाया था। स्वामी जी के पैरों में गिरा, क्षमा याचना की तब कहीं पेट की जलन समाप्त हुई। उन्होंने कहा भाई मेरा कसूर नहीं है यह तो कुदरत का नियम है कि हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया अवश्य है।

मनुष्य शरीर एक यंत्र, प्राण उसकी ऊर्जा, ईंधन आवा शक्ति, मन इंजन और ड्राइवर चाहे जिस प्रकार के अद्भुत कार्य लिए जा सकते हैं इस शरीर से भौतिक विज्ञान से भी अद्भुत पर यह सब शक्तियाँ और सामर्थ्य योग विद्या, योग साधना में सन्निहित हैं जिन्हें अधिकारी पात्र ही पाते और आनन्द लाभ प्राप्त करते है…