Sunday, January 31, 2016

योगिराज तैलंग स्वामी

काशी में अनादि काठ से ऋषि मुनि साधना करते हुए है। कहा जाता है आज भी ऐसे सन्त है जो यहाँ गोपनीय ढंग से रहते है जिनके बारे में सामान्य लोगों को जानकारी नहीं है। जिनके मठ, आश्रम या सम्प्रदाय है, केवल उनके जानकारी है।
      काशी ही वह नगरी है जहाँ महर्षि वेदव्यास आए ओर उनकी स्थापना हुई। महात्मा बुद्ध ने भी अपना सर्वप्रथम उपदेश यही सारनाथ में दिया था। शास्त्रार्थ के लिए पतंजलि आदि थे यही पर एक चांडाल ने जगदमुख शंकराचार्य को परास्त कर तत्वज्ञान का बोध कराया था। कबीर ने यही अपने उपदेशों का ताना बाना फैलाया, तुलसी दाद जी ने यही अपने मर्मस्पर्शी अडान गाए। श्री वल्लाक्तचार्य ने यहाँ आकर महाप्रभु की बैठकस्थापित की। इनमें अधिकांश लोगों के मठ आश्रम है व अनेक प्रकार के शिष्य है।
      परन्तु तेंलग स्वामी ने कभी कोई मठ, मन्दिर, आश्रम स्थापित करने में रूचि नही ली। एक बार एक बड़े विद्वान ने काशी के लोगों से उनके पता ठिकाना व स्वभाव के बारे में पूछा तो उनके यह उत्तर मिला- ‘‘उनकी बात मत पूछिए। अजीब बाबा है न जात पात का विचार और न रहन सहन। जो कोई जो कुछ देता है, खा जाते है, किसी के साथ बात करना पसन्द नहीं करते। हमेशा नंगे रहते है। गार्मी में तप्त बालू पर सोते हुए मिलते है तो जाडे में गंगा में डूबे रहते है। सुनते है कि दो-दो, तीन-तीन दिन पानी से बाहर नहीं निकलते। कभी-कभी मुर्दे की तरह गंगा मैया के ऊपर तैरते पड़े रहते है। उनकी उम्र का भी कुछ अता पता नही है। कब से वो काशी में निवास कर रहे है यह भी किसी के ज्ञात नही है।’’ तेलंग स्वामी की एक ओर विशेषता थी जल्दी से किसी के शिष्य बनाना पसन्द नहीं करते थे। पंचगंगा घाट उनका प्रिय स्थान था। श्रदालु व भक्त उनके दर्शन हेतु वहाँ जाया करते थे।
      एक बार स्वामी जी एक आश्रम में बैठे हुए थे। श्रद्वालुओं की भीड़ लगी थी। स्वामी जी के दर्शन हेतु दो बंगाली बाबू आए। स्वामी जी को प्रणाम कर वहीं खड़े हो गए। स्वामी जी ने इन्हें वापिस जजाने का इशारा किया। एक बंगाली बाबू तो वहाँ से चले गए दूसरे अड़कर वहीं बैठ गए। स्वामी जी लोगों की भीड़ पसन्द नहीं करते थे। एक ग्वाला स्वामी जी के ईशार से लोगों के बाहर धकेलता था। स्वामी जी ने ग्वाले को ईशारा किया। ग्वाले ने आदेश पाते ही उस व्यक्ति के धक्का देते हुए कहा- ‘‘जल्दी बाहर निकलो। बाबा का दर्शन करने आए थे, वह हो गया। अब यहाँ बेकार भीड़ लगाने की जरूरत नही है।’’ उस व्यक्ति ने ग्वाले को धक्का देते हुए कहा- ‘‘मैं कही जाऊँगा। जाना है तो तुम जाओ। इस प्रकार दोनों आपस में झगडने लगे। यह दृश्य देखकर स्वामी जी ने उक्त बाबू व अपने एक सेवा मंगलदास के अपने निकट बुलाया। मंगलदास के दीवार पर लिखे संस्कृत के श्लोक का मतलब समझाने के कहा।
      म्ंगलदास बोलने लगे- ‘‘तुम बाहर 18 रूपये का खरीदा नया जूता खोलकर मुझे देखने आए हो। अगर कोई उसे युवा ले गया तो तुम्हें यहाँ से नंगे पैर वापिस जाना पड़ेगा। यही बात तुम सोच रहे हो। अब तो तुम साधु के संग के लिए आसक्त हो अथवा अपने जूते के लिए। तुम्हें चिता करने के जरूरत नहीं है। अभी जूता सुरक्षित है शीद्य्र वापिस जाकर पहन लो।’’
      वहाँ जितने लोग मौजूद थे यह सुनकर सभी अवाक्र रह गए। बाहर आने पर लोगो ने उनसे पूछा कि क्या वो वास्तव में जूते के बारे में सोच रहे थे। उक्त व्यक्ति ने कहा- ‘‘हाँ महाशय! वास्तव में अपने जूते के बारे में चिन्ता कर रहा था।’’
      एक व्यक्ति उमा चरण स्वामी जी के पास अक्सर आया करते थे व उनसे दीक्षा लेने की इच्छा रखते थे। स्वामी जी उन्हें अक्सर बल देते थे। एक बार वे स्वामी जी के पास बैठकर अपने आवेग के रोक नही सके व जोर-जोर से रोने लगे। स्वामी जी ने उन्हें शान्त बैठने की आज्ञा दी व कल सुबह आने को कहा। इससे उन्हें आशा बंधी कि कल दीक्षा मिल सकती है। वह अगले दिन प्रातः गंगास्नान करके बड़े उत्साह के साथ स्वामी जी के पास आए व उनका चरण रज लेकर उनके पास बैठ गए। उनके एक पत्थर का टुकडा, एक लोटा पानी व गेरू देकर घिसने का ईशारा किया। उमाचरण दोपहर तक गेरू घिरते रहे। दोपहन के स्वामी जी ने भोजन के लिए भेज दिया। जब लौटकर आए तो पुनः गेरू घिरने के आदेश हुआ। सांयकल एक ब्रहमचारी वहाँ आए व गेरू से आश्रम की दीवार पर श्लोक लिख दिए। इस प्रकार 15 दिन तक यही क्रम चलता रहा। इससे उनके हाथ की हालत बिगड गयी व हाथ से भोजन करना भी कठिन हो गया। जब 28 दिन गेरू घिसने पर उनका हाथ बेकर हो गया तो वे बाबा के चरणो पर माथ टेककर रोने लगे।
      अब उनके दूसरा काम सौंप दिया गया। हिन्दी के श्लोके का बंगाली में अनुवाद कराया गया। धीरे-धीरे करके स्वामी जी व उमाचरण में अध्ययन के विषम में ज्ञान प्रश्नोतरी चलने लगी। उमाचरण प्रसन्न थे कि अक्सर मौन रहने वाले स्वामी जी उनसे बातें करने लगें हैं।
      उमाचरण ने कहा- ‘‘जब आपकी मुझपर इतनी कृपा हुई है तब मेरा उद्धार कर दीजिए।’’
      ‘‘यह अत्यन्त कठिन समस्या है। अब तक तुम आजाद पक्षी की तरह उड़ रहे हो। दीक्षा लेने पर बंधनों में फंस जाओगे। इस वक्त जाओ। रात को आना तब बातचीत की जायगी।’’
      शाम के समय आने पर बाबा उन्हें साथ लेकर छोटी कोठरी में आये। यहाँ बैठने के साथ बोले- ‘‘तुम मुझसे योग-शिक्षा लेने को सोच रहे हो। लेकिन तुम योग-शिक्षा के लिए अनधिकारी हो। इससे अच्छा है कि उपासना-मार्ग अपनाओ। इसी माघ महीने की तृतीया तिथि, पुष्य नक्षत्र में चन्द्रग्रहण होगा। ग्रहण तक तुम्हें प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। क्योंकि बिना शुद्ध देह हुए दीक्षा नहीं दी जायगी। इसी चन्द्रग्रहण के दिन तुम्हारा शरीर शुद्ध कर दूँगा।’’
      इसके बाद कुछ सामानों के नाम लिखवाने के बाद बोले- ‘‘गंगा स्नान करने के बाद एक आसन पर बैठकर जप करना पड़ेगा।’’
      इसके बाद एक मंत्र उन्होंने लिखवाया और कहा कि जप समाप्त होने के बाद सारी सामग्री किसी सत् ब्राह्मण को दान में देना। उमाचरण को यह मालूम था कि ग्रहण के समय सत् ब्राह्मण दान नहीं लेते। जब उन्होने यह समस्या स्वामीजी के सामने रखी तब बाबा ने हँसते हुए कहा- ‘‘उन सामग्रियों का नाम लेकर जो ब्राह्मण तुमसे दान मांगेगा, उसे दे देना। इससे काम सिद्ध हो जायेगा।’’
      आसानी से काम सिद्ध हो जाने पर उमाचरण की उत्कण्ठा समाप्त हो गयी। अब वे माघ तृतीया की प्रतीक्षा करने लगे। ग्रहण के दिन सारी क्रिया करने के बाद ज्योंही वे आसन से उठे त्योंही एक ब्राह्मण आया और उन सामग्रियों का नाम लेकर दान मांगा।
      सारी सामग्री लेकर वह व्यक्ति भीड़ में गायब हो गया। दूसरे दिन उमाचरण नित्य की भांति बाबा के पास आकर बोले- ‘‘बाबा, आपकी आज्ञा के अनुसार सारा कार्य समाप्त हो गया।’’
      ‘‘अब तुम्हारा शरीर भी शुद्ध हो गया। तुम्हें दीक्षा दे दूँगा।’’
      इसी दिन तीसरे पहर कुछ संन्यासी स्वामीजी के पास बैठे किसी विषय पर विचार-विमर्श करते रहे। बाबा के पास अक्सर ऐसे संत आते रहते हैं। अपनी समस्या का समाधान कराते हैं। सन्तों के जाने के बाद अचानक तेज बारिश होने लगी। यह देखकर उमाचरण ने घर जाने की आज्ञा मांगी। बाबा ने कहा- ‘‘अभी नहीं, बैठे रहो।’’
      बाहर वर्षा का वेग बढ़ता गया। मकानों से गिरनेवाली जलाधार से गलियाँ भरने लगी। बिजली के कड़कने और मेघों का गर्जन निरन्तर जारी रहा। दो घंटे गुजर गये, पर पानी रुकने का नाम नहीं ले रहा था। इस बीच आज्ञा प्राप्त न होने पर उमाचरण ने सोचा- शायद आज बाबा आश्रम में ही रखेंगे?
      इतना सोचना था कि बाबा ने कहा- ‘‘अब तुम जा सकते हो।’’
      इस आदेश को सुनकर उमाचरण बाबू व्याकुल हो उठे। बाहर वर्षा में कोई कमी नहीं हुई थी। वेग से पानी गिरने और बहने की आवाजें सुनाई दे रही थीं। ऐसे भयंकर मौसम में कैसे घर तक जायेंगे? बाबा की ओर करुणा दृष्टि से देखते हुए उमाचरण ने कहा- ‘‘जरा पानी का वेग कम हो जाय तब-’’
      बात पूरी भी नहीं हुई थी कि बाबा ने कहा- ‘‘नहीं, तुरन्त रवाना हो जाओ देर मत करो।’’
      इस आदेश की अवहेलना करने का साहस उन्हें नहीं हुआ। सहन पार करने के बाद मंगलदास से मुलाकात हुई। उसे अपनी मुसीबत कहने की गरज से उमाचरण ने कहा- ‘‘बाहर घना अंधकार है। पानी रुक भी नहीं रहा है। ऐसे भयंकर मौसम में बाबा का आदेश हुआ कि तुरन्त घर चले जाओ। अब आप ही बताइये घर कैसे जाऊँ?’’
      मंगलदास ने कहा- ‘‘घबराने की कोई बात नहीं है, बंगाली बाबू। आप बाबा का नाम लेकर रवाना हो जाइये। इस आदेश के पीछे कोई रहस्य है, वर्ना वे ऐसा न कहते।’’
      मंगलदास की सलाह से उमाचरण को विश्वास हो गया। वे बाबा के पास आकर उनका चरण-स्पर्श कर मूसलाधार बारिश में रवाना हो गये। बाहर गलियों में घुटने भर पानी जमा था। अंधेरा होने के कारण सामने कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। तेज बारिश के कारण कान सुन्न पड़ गये। लेकिन इस यात्रा में उन्हें विचित्र अनुभव हुआ। वर्षा का एक बूँद जल भी उनके शरीर पर नहीं गिर रहा था। लगता था जैसे सिर के ऊपर बड़ी छतरी लगाये हुए हैं। कुछ दूर आगे बढ़ने पर एक गली से एक आदमी आगे-आगे लालटेन लेकर चलने लगा। इस भयंकर अंधेरे में रोशनी का सहारा पाकर उमाचरण आश्वस्त हो गये।
      आगे-आगे चलनेवाले व्यक्ति को कई बार आवाज दी ताकि उसके साथ-साथ चलें, पर उसने सुना नहीं। उन्होंने सोचा- शायद तेज बारिश के कारण उसे मेरी आवाज सुनाई नहीं दी। वे स्वयं तेजी से आगे बढ़ने लगे ताकि उसके पास पहुँच जायँ। इधर उमाचरण तेजी से चलने लगे तो लालटेन वाले व्यक्ति की गति भी तेज हो गयी। दोनों व्यक्तियों के फासले में कोई कमी नहीं हुई।
      अन्त में थकर अपनी चाल से वे चलने लगे। आश्चर्य की बात यह रही कि लालटेन वाला व्यक्ति उनके आगे-आगे उन्हीं मार्गों से चलता रहा, जिस रास्ते वे घर जाते हैं। घर के पास आते ही लालटेन वाला व्यक्ति न जाने कहाँ गायब हो गया। समझते देर नहीं लगी कि यह चमत्कार बाबा की कृपा से हुआ है। यही वजह है कि बाबा ने इस दुर्योग में जाने का आदेश दिया था।
      नियमानुसार दूसरे दिन उमाचरण को बाबा के साथ गंगा-स्नान के लिए जाना पड़ा। बाबा अपने ढंग से स्नान करते हैं। कम-से-कम दो घंटे लगते हैं। कभी बहाव के उल्टी तरफ तैरते हैं, कभी शवासन लगाये भासमान रहते हैं और कभी पानी में डुबकी लगाकर न जाने कहाँ गायब हो जाते हैं। जबतक बाबा पानी से बाहर नहीं निकलते तबतक उमाचरण को घाट की सीढि़यों पर बैठकर उनके आने का इन्तजार करना पड़ता है।
      उस दिन बाबा जब स्नान करके ऊपर आये तब उनका शरीर उमाचरण ने रोज की तरह पोंछ दिया। बाद में आश्रम पर आ गये। आश्रम में आकर उन्होंने कहा- ‘‘आज तुम्हें दीक्षा दूँगा। शान्त होकर बैठो।’’
      पहले बाबा ने कुछ क्रियाएँ बतायीं। इसके बाद कान में बीज मंत्र सुनाया। बोले- ‘‘इसी मंत्र का जाप करते रहना।’’

      कुछ देर ठहरकर बोले- ‘‘अब कुछ महत्व की बातें बता रहा हँू, इन्हें ध्यान से सुनो। इन बातों का पालन करते रहना। जिस कार्य के लिए जितना बोलना हो, उतना ही कहना। व्यर्थ की बातें मत करना। इससे तेज क्षय होता है। किसी धर्म से द्वेष मत करना। जिसे जिस धर्म पर विश्वास है, उसे उसी धर्म से मुक्ति मिलती है। आहारदि से धर्म नष्ट नहीं होता, केवल मुक्ति पाने मे देर होती है। मुसलमानों को भी मुक्ति प्राप्त होती है। व्याकुल भाव से उन्हें जो पुकारेगा, वह उन्हें प्राप्त करेगा। जिन घटनाओं को देखकर तुम चकित हुए हो, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मनुष्य अगर वास्तविक मनुष्य हो तो वह भी यह सब कार्य कर सकता है। केवल आहार-विहार करने के लिए मनुष्य की सृष्टि नहीं हुई है। भगवान् में जितनी शक्ति है, मनुष्य में भी वही शक्तियाँ है। भगवान् ने मनुष्य को यह सब शक्तियाँ देकर उसे श्रेष्ठ बनाया है। कोई भी व्यक्ति उस शक्ति का उपयोग करना नहीं जानता। भगवान् हमेशा हमारे साथ रहते हैं। उन्हें जानने या देखने की इच्छा किसी को नहीं होती।’’

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