Tuesday, January 29, 2013

लघु कथाएँ - 2



भविष्य को सुधारना
     एक भिखारी एक मन्दिर के प्रवेश द्वार के पास बैठता था। वह देखने में दयनीय लगता था, उसने एक मैला-सा चीथड़ा अपने शरीर पर लपेट रखा था, उसके बाल उलझे हुए और वह लकड़ी की तरह पतला था। कुछ गुजरते हुए लोग उसे सिक्के देते, मन्दिर में आये व्यक्ति उसे थोड़ा प्रसाद दे जाते-नारियल का टुकड़ा, केला और यदि उसकी किस्मत अच्छी हुर्इ तो उसे रोटी या पके चावल मिल जाते। उसे जो भी मिलता, भिखारी उसे सदा किसी के साथ बाँट कर खाता। कभी-कभी वह अपने संगी भिखारी के साथ बाँटता। यदि आस पास कोर्इ न हो तो अपने मामूली खाने में से वह गली के कुत्तों को एक हिस्सा दे देता।
     एक छोटे से लड़के का भिखारी की, खाना बाँटने की आदत पर ध्यान गया। एक दिन उसने भिखारी से कहा, ‘‘तुम्हें स्वयं खाने के लिये मुश्किल से कुछ टुकड़े मिलते हैं। उन टुकड़ों को तुम दूसरों के साथ क्यों बाँटते हो’’?
     भिखारी मुस्कुराया और छोटे बच्चे से कहने लगा, ‘‘नन्हें साहेब! मेरी बातों को ध्यान से सुनना। मैं अब भिखारी हूँ क्योंकि शायद मैंने अपने पिछले जन्म में, मेरे पास जो था, मैंने किसी के साथ नहीं बाँटा, अब मैं अपने अगले जन्म के लिये खुद को बेहतर तैयार करना चाहता हूँ।
     इसलिये चाहे जितना थोड़ा मिले, मैं किसी जरूरतमंद के साथ बाँटता हूँ।’’

मेरा अनंत घर कहाँ है?
     एक बहुत धनी स्त्री एक सुन्दर आलीशान भवन में रहती थी। उसे किसी चीज़ की कमी न थी। पैसों से खरीदे जाने वाले सब सुखों का वह उपभोग करती थी। किन्तु वह बड़ी स्वार्थी थी। उसे और किसी का ध्यान नहीं था। शुभ कार्यों के लिये दान या सहायता माँगने वालों के लिये उसके घर के द्वार हमेशा बन्द रहते थे। वह अपने धन में से किसी को एक पैसा भी नहीं देती थी।
     साल बीतते गये। उसकी लम्बी, स्वार्थी जिन्दगी का अंत समीप आ रहा था। एक दिन उसे एक अजीब सपना आया जिसमें उसने देखा कि वह मर गर्इ है और स्वर्ग लोक की ओर जा रही है। वह बड़ा अद्भुत मोहक स्थान था, जहाँ जाकर वह खो गर्इ और समझ नहीं पा रही थी कि किस ओर जाये। एक देवदूत को देखकर उसने पूछा, ‘‘क्या आप कृपा करके बता सकते हैं कि मेरे अनादि घर का कौन सा रास्ता है? मैं लम्बे जीवन के बाद स्वर्ग में आर्इ हूँ और वह स्थान देखना चाहती हूँ जहाँ मुझे अनन्त काल तक रहना है।’’
     देवदूत बोला, ‘‘मेरे साथ आओ, मैं तुम्हें रास्ता दिखाता हूँ। देवदूत उसे स्वर्गलोक के सुन्दर क्षेत्र से ले जाने लगा, जहाँ उसने विशाल महल, उत्कृष्ट बगीचे वाले घर, सुन्दर भवन देखे। किन्तु देवदूत उसको और आगे ले गया जहाँ झोपड़ियाँ थीं। देवदूत एक छोटी से टूटी-फूटी झोपड़ी के बाहर रूक गया और उस स्त्री से बोला, ‘‘यह तुम्हारा अनादि घर है।’’ झोपड़े को देखते ही वह स्त्री भयभीत होकर पीछे हट गर्इ। वह चिल्ला उठी, ‘‘यह कैसे संभव है? पृथ्वी पर तो भगवान ने मुझे रहने के लिए एक सुन्दर भवन दिया था। स्वर्ग में मेरा घर इतना गंदा और टूटा-फूटा कैसे हो सकता है?’’
     देवदूत बोला, ‘‘तुमने अपने जीवन में हमें यहाँ जो कुछ भेजा, उसी से तुम्हारा अनादि घर बना है। तुमने जो कुछ भेजा, उतने में हम अधिक से अधिक यह ही बना सके हैं।
     उस धनी स्त्री का सपना टूटा, वह पसीने से भीग गर्इ थी। उसने निश्चय कर लिया कि वह एक नया जीवन जियेगी जिसमें सब कुछ जरूरतमंदों के साथ बाँट कर खायेगी।
     जो रूपया हम गरीबों को देते हैं, वह विधाता के बैंक में हमारे खाते में जमा हो जाता है।

तीन दिल
     एक संत से किसी ने पूछा, ‘‘भगवान को प्रेम करने का सही तरीका क्या है?’’ उसने उत्तर दिया, ‘‘भगवान को प्रेम करने के लिये हमें तीन हृदयों की आवश्यकता होती है:-
1-   अग्नि का हृदय जो भगवान, और केवल भगवान का चिंतन करे और उसी की बातें करे और उसी की बातें करे। और भगवान की इच्छा से जो कुछ घटित हो, उसमें खुश रहे।
2-    एक मांस का हृदय जो दीन-हीन के अनचाहे, प्रेम से वंचित, निराशा व बेघर लोगों के प्रति सहानुभूति से स्पंदित हो।
3-    एक कांसे का दिल, जो इतना बल दे कि हम प्रलोभन का डट कर मुकाबला करें और विकृत स्वभाव की दुष्ट प्रवृतियाँ पर नियंत्रण रखें।’’

भगवान तेरा धन्यवाद है
   एक स्त्री का पति गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। जो डाक्टर उसका इलाज कर रहे थे, उसकी दशा से निराश होने लगे। उन्होंने उस स्त्री को बताया, ‘‘आपके पति छ: महीने से अधिक जीवित नहीं रहेंगे।’’
   वह स्त्री अत्यधिक आस्थावान थी। उस दिन से उसने प्रतिदिन ईश्वर को हज़ारों बार धन्यवाद कहना शुरू कर दिया। वह बार बार कहती, प्रभु तेरा धन्यवाद है, प्रभु तेरा धन्यवाद है। प्रभु तेरा धन्यवाद है कि तुम मेरे प्रति की देख-भाल कर रहे हो। प्रभु धन्यवाद कि तुमने मुझे सहारा और हौसला दिया।“ चाहे उसके पति की हालत में सुधार का कोर्इ चिन्ह न था, किन्तु उसने प्रार्थना जारी रखी।
   आश्चर्य की बात, कुछ महीने बाद जब उसका पति परीक्षण के लिये गया तो डॉक्टर उसका चमत्कारी सुधार देखकर दंग रह गये और बोल उठे, ‘‘हमसे ऊपर व हमसे बढ़ कर भक्ति ने काम किया है’’। चाहे हम कैसी भी परिस्थितियों में हों, चाहे हम कितने भी कष्टों से गुज़र रहे हों,  हमें हर समय भगवान का धन्यवाद करना चाहिये। जब हम ऐसा करते हैं तो हमारे दिल विशाल हो जाते हैं और हम भगवान की सहायक व राहत देने वाली शक्ति को ग्रहण करने योग्य बन जाते हैं।

एक माँ की अडिग आस्था
   स्ंत आगस्टार्इन रोमन कैथेलिक चर्च के महान विख्यात संतों में से एक थे। उनकी लिखी किताब ‘‘कन्फ्रैशनस’’ एक अति उत्तम कृति है जिसे हर अध्यात्मिक साधक को पढ़ना चाहिये।
   आगस्टार्इन उच्च शिक्षा प्राप्त युवक थे जब जीवन के एक मोड़ पर वे बुरी संगत में पड़ गये। वे एक और को घर ले आये और उसके साथ अनैतिक जीवन बिताने लगे।
   उसकी माँ मोनिका का दिल टूट गया। वह अपने बेटे के व्यवहार से दुखी थी और उसे सही रास्ते पर लोने में नाकाम, तब उसने प्रार्थना की शरण ली। दिन-रात वह प्रभु से प्रार्थना करती कि वह उसके बेटे को पाप के गढ्ढे से निकाले। श्रृद्धापूर्वक, पक्के इरादे व एकाग्रता से अपने उद्देष्य में अडिग रह कर उसने 27 साल तक प्रार्थ जारी रखी।
   27 साल के बाद आगस्टार्इन को अपनी गलती का अहसास हुआ और वह भगवान की ओर उन्मुख हुआ।
   यह एक माँ की प्रार्थना की शक्ति थी जिसने उस पापी को एक संत, भगवान के प्रिय व्यक्ति, में बदल दिया।

 अन्याय का विरोध


    पौधों में जीवन के विश्लेषक सुप्रसिद्ध जगदीश चंद्र बसु इंग्लैंड से कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से विज्ञान-स्नातक होकर भारत लौटे थे। यहाँ आकर उन्होंने देखा कि प्रेसीडेंसी कॉलेज में, अंग्रेजों की तुलना में भारतीय अध्यापकों को कम वेतन दिया जाता था।
    आचार्य बसु ने वेतन लेने से इंकार कर दिया। उन्होंने इस अन्याय का विरोध करते हुए कहा, मैं वेतन लूंगा तो पूरा, अन्यथा लूंगा ही नहीं।
    पूरे तीन साल तक उन्होंने वेतन लिया ही नहीं। वेतन लेने के कारण आर्थिक तंगी हो गर्इ। कलकत्ता का महंगा मकान छोड़कर हर से दूर उन्होंने एक सस्ता-सा मकान लिया।
    नित्य कलकत्ता आने के लिए वह स्वयं नाव खेकर हुगली नदी पार करते। उनकी पत्नी भी साथ होतीं, जो स्वयं नाव खेकर वापस ले जातीं और शा को बसु को लेने दोबारा नाव लातीं। परन्तु इन घोर कष्टों के बीच भी आचार्य ने धैर्य नहीं छोड़ा।
    अंत में विरोधियों ने घुटने टेक दिये। उन्हें अंग्रेजों के बराबर वेतन दिया जाना स्वीकार किया गया और नए वेतन के अनुसार पूरे तीन साल का वेतन उन्हें एक साथ दिया गया। न्याय के लिए संघर्ष पथ पर डटे रहने वाले ऐसे निर्भीक और साहसी थे आचार्य जगदीश चंद्र बसु।
 


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