Monday, January 21, 2013

हिंदुओं में अंधविष्वास


हमारे देश में एक बड़ी विचित्रता है कि एक ओर तो यहाँ उँचे दार्षनिक और बौद्धिक सिद्धातों की चर्चा सुनने में आती है और दूसरी ओर मूढ़ से मूढ़ अंध्विष्वासों के दृष्य दिखार्इ पड़ते हैं। संसार  के विद्वान इस देश को ज्ञान की भूमि मानते हैं और उपनिशद, दर्शनों के सिद्धातों को पढ़कर मुग्ध होते हैं, पर यहाँ के बड़े-बड़े पंडित एक छींक हो जाने या कुत्ते के कान फटफटा देने पर भी ठिठक जाते हैं और आवष्यक काम को भी स्थागित कर देते हैं। यहाँ के स्त्री-पुरूष, बालक-वृद्ध सब श्रेणी और वर्गों के लोग अंधविश्व सों पर इतनी अधिक श्रद्धा  रखते हैं कि देखकर आश्चर्य होता है। इस प्रकार का वातावरण यहाँ इतना व्यापक है कि आधुनिक शिक्षा-प्राप्त और नए विचारों के कहे जाने वाले लोग भी उससे सर्वथा मुक्त नहीं रह सकते और घर के पुराने संस्कारों के वष या दूसरों की देखा-देखी अंधविष्वासों को मान्यता देते ही हैं।
छींक आने, बिल्ली के रास्ता काट जाने, भरा या खाली पानी का घड़ा सामने आते देखकर लोग कार्य की सफलता-असफलता की भावना पहले से ही कर लेते हैं और अकारण ही कार्य को स्थगित कर अपनी हानि करते हैं।
छोटी श्रेणी के लोगों में और विषेशत: स्त्रियों में जादू-टोना, मंत्र-तंत्र, झांड़-फूँक, नजर-गुजर का  बड़ा प्रचलन है और इनके बड़े कुपरिणाम समय-समय पर देखने में आते हैं।
वे लाल मिर्च की धूनी देकर भी नजर का पता लगाती हैं, जिससे सबको खाँसी आने लगती है। इस प्रकार की मूढ़ता के कारण बहुत कम उम्र के कमजोर बच्चे तो मर भी जाते हैं। अनेक स्त्रियाँ एक दौने या मिट्टी के बर्तन में फूल, पताशा, सिंदूर आदि कर्इ चीजें रखकर चौराहे पर रख आती हैं और समझती हैं कि ऐसा करने से बच्चे की बीमारी किसी और व्यक्ति के पास चली जाएगी। इस प्रकार की मूढ़ताओं का परिणाम यह होता है कि बीमारी बढ़ जाती है और फिर इलाज  करने से भी कोर्इ नतीजा नहीं निकलता।
हिंदुओं में अंधविशवास की इतनी अधिक प्रबलता है कि धर्म के संबंध में उन्होंने बुद्धि को गिरवी रख् दिया है और जो कोर्इ जैसे बहका देता है, वैसे ही र्इट-पत्थरों के सामने नाक रगड़ने को तैयार हो जाते हैं। हतने सुना है कि एक देहाती मेले में एक भिखारी और कुछ पाकर एक मील के पत्थर पर सिंदूर लगाकर, उसकी पूजा करने लगा। उसे देखकर बहुत से ग्रामीण उसी पर भेंट चढ़ाने लग गए और उसने सौ-पचास रूपये कमा ही लिए।
जो अपनी भलार्इ के लिए दूसरों के घरों में आग लगाने में संकोच नहीं करते, वे समाज के साथ शत्रुता का कार्य करने से कैसे रूक सकते हैं? जो लोग बनावटी देवी-देवताआं पर हजारों रूपये भेंट चढाकर आशीर्वाद और वरदान पाने के लालच में रहते हैं, वे परोपकार के कामों में कब आर्थिक सहायता कर सकते हैं?
इस तरह के स्वार्थी और मतिहिन लोगों से जो समाज भरा हुआ है, वह सर्वहितकारी किसी कार्यक्रम पर कब आगे कदम बढ़ा सकता है? वास्तव में अंधविशवास व्यक्तिगत और सामुदायिक प्रगति में एक बड़ी बाधा के समान है। जब तक करोड़ों व्यक्तियों का धन, समय और परिश्रम इस प्रकार के उलटे, उन्नति विरोधी कामों में लगता रहेगा, तब तक हितकरी और कल्याणकारी कार्यों की पूर्ति की आशा नहीं की जा सकती। इस दृष्टी से देशभर की एक बहुत बड़ी जनसंख्या में फैले हुए ये तरह-तरह के विश्वास  अंधविवास उपेक्षा के विषय नहीं हैं और मिटाने के लिए हर प्रकार से प्रयत्न करते रहना सब समाज हितैशियों का कर्तव्य है।

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