Sunday, September 22, 2013

साधना समर - चुनौतियाँ और समाधान-III

भूमिका
प्रत्येक राष्ट्र का अपना इतिहास होता है, संस्कृति होती है, पूर्वजों की एक रूचि होती है। वहाँ के नागरिकों के रक्त में वो संस्कार घुले होते हैं अतः उनका चिन्तन व प्रयास उसी दिशा में चलता है। वहाँ लोग बड़ी कम्पनियाँ सुख समृद्धि, भौतिक चकाचैध  को लक्ष्य मानते हैं। कही वासना की प्रधानता पायी जाती है, ऐसे लोग श्रृगार फैशन परस्ती, तुच्छ कामुकता के जंजाल में ही उलझे रहते है। किसी जगह के पूर्वजों का मारकाट का इतिहास रहा है, उनके दिमाग में वैसा ही फितूर घूमेगा कि कैसे लूटपाट, मारकाट की जाए। किसी देश में धन वैभव, व्यापार पर जोर दिया गया।
सौभाग्यवश हमने जिस भारत भूमि में जन्म लिया वहाँ के पूर्वजों का इतिहास बहुत ही गौरवपूर्ण रहा है। हमारी संस्कृति को देव संस्कृति कहा जाता है। हमने न तो कभी किसी अन्य देश में जाकर व्यर्थ लूटपाट की न कभी धन वैभव अथवा तुच्छ वासनाओं को अपना लक्ष्य चुना। वरण इन सबसे ऊपर उठकर धर्म, अध्यात्म, परमात्मा व साधना को महत्व दिया। हमारे पूवजों ने सदा तप साधनाओं से जीवन के निखारकर सम्पूर्ण विश्व में ज्ञान, शँाति व सच्चे आनन्द का सन्देश दिया है।
शायद ही कोई ऐसा देश रहा हो जो भारतीय संस्कृति से प्रभावित न रहा हो, हमारे पूर्वजों की इन अद्भुत खोजों का सम्मान न करता हो। प्राचीन काल से ही विदेशियों में भारत से ज्ञान व आध्यात्म का प्रकाश लेने की तीव्र अंकाक्षा रही है। सिंकन्दर जब भारत विजय के लक्ष्य से निकलें तो अपने गुरु अरस्तू से पूछा कि वो उनके लिए भारत से क्या लाएँ? उनके गुरु ने उत्तर दिया कि भारत के ब्रह्मा ज्ञानी ऋषि को लेकर आना जिनका मार्गदर्शन पाकर हम भी जीवन को सफल बना सकें। रुस जो कभी धर्म अध्यात्म का कटर विरोधी था आज वहाँ बड़ी तेजी से लोग परमात्मा के प्रकाश को पाने के लिए व्याकुल है।
अमेरिका जहाँ सुख समृद्धि व विज्ञान चश्म पर है अनेक विकृत्तियों से जूझ रहा है वहाँ के दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक कहते है कि अमेरिका की संस्कृति जीवनशैली लोगो में सड़न पैदा कर रही है जो उनके देश के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। समाधान के रूप में वो भारत के गुरूयों की ओर कातर दृष्टि से देख रहे है कि फिर कोई विवेकानन्द, योझानन्द अमेरिका आए ओर उनको जीवन की सही दिशाधारा प्रदान करें।
श्री अरविन्द आश्रम पंाडिचेरी, इस्कान मन्दिरों व अन्य संस्थाओं में लगातार विदेशियों का बड़े पैमाने पर आगगमन भारत माँ का सिर गर्व से ऊँचा करता है।
जिन साधनाओं के बल पर अपने पूर्वजों ने अपनी आध्यात्मिक उन्नति की व अपने आपको इतना महान बनाया उनमें हम कैसे सफल हो सकते है इसका विश्लेषण करना ही इस पुस्तक का मूलभूत प्रयोजन है। दिव्यदृष्टा कहते है कि धरती एक नए आयाम की ओर मुड़ चुकी है इससे लोगों में बड़े पैमाने पर साधनाओं के लिए आर्कषण व दबाव बनेगा। श्री अरविन्द सन् 1926 से एक कमरे तक सीमित हो गए थे और उन्होेंने जीवन के अन्तिम 24 वर्ष अति मानस के अवतरण के लिए कठोर तप किया। श्री सम आचार्य जी ने 1926 से गायत्री के 24 महापुरुशचरण जो की रोटी पर करके 24 लाख उच्च स्तरीय साधकों (ब्रह्मकमल) के निर्माण का संकल्प लिया व अके द्वारा एक करोड़ लोगों की ऐसी टीम बनाने की सोची जोक सम्पूर्ण विश्व में सतयुगी वातावरण लाने में समर्थ होगी। समय बहुत उथल पुथल भरा चला रहा है। आसुरी शक्तियाँ अपने अस्तित्व के बचाने के लिए पूरा जोर मार रही है। तीनों के फुंसस्कारों का लाभ उठाकर अनीति, अन्याय, वासना व घृणा का नंगा नाच मचा रही है। दूसरी ओर इसके विरूद्व देव सत्ताएँ श्रेष्ठ आत्माओं के एक ऐसा संगठन खड़ा करना चाहती हैं जो इस धरती के उज्जवल भविष्य प्रदान कर सकें। जिनका विवेक जागृत हैं वो सजग होकर अपने कुंसस्कारों परिस्थितियों व प्रारब्धों से जूझ रहे है व परमात्मा का प्रकाश पाने के लिए तड़प रहे हैं।
         आध्यात्मिक साधनाओं के दो पक्ष हैं- पहला पक्ष जिसमें व्यक्ति स्वयं को सुधारने का प्रयास करता है अपने कुःसस्कारों, प्रारब्धों को काटने के लिए सघर्ष करता है। इसको गायत्री कहा जाता है। दूसरा पक्ष है शक्ति जागरण का। जब व्यक्ति की पात्रता थोड़ी विकसित हो जाती है, ऐसे अवस्था में वह भाँति-2 की शक्तियों को जाग्रत करने व उनको सम्भालनें की कला सीखता है। इस पक्ष को सावित्री कहा जाता है। पूज्यवर ने साधना के पहले पक्ष को दुनिया के सामने रेखा व गायत्री परिवार की स्थापना की। अभी तक दूसरा पक्ष गोपनीय रहा है। समय आ रहा है, यह दूसरा पक्ष भी सुपात्रों के सामने प्रकट होना चाहता है। जिससे व्यक्ति दिव्य शक्तियों के अर्जन द्वारा स्वयं को महामानवों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर सके एवं युग परिवर्तन के कार्य में तेजी आए। ऐसे ही व्यक्ति मानव जीवन को धन्य बन सकेंगे व लाल मशाल के वाहक बनकर अपना नाम इतिहास में रोशन करेंगे।

पूज्य गुरुदेव अपने जीवन के अन्तिम चरण में व्यथित थे। उन्हें कोई ऐसा योग्य उत्तराधिकारी नहीं मिल पाया जिसको वो जाने से पहले इस सारे ज्ञान विज्ञान से अवगत करा सकते। अतः साधनाओं को सरल बनाने व सुपात्रों को देने के लिए आज भी देवसत्ताएँ व्याकुल हैं। शीघ्र ही समर्थ साधकों का एक ऐसा समूह उभरने जा रहा है जो राष्ट्र की बलिदेवी पर अपने जीवन की आहुति समर्पित करेगा व अपना देश भारत विश्वमित्रके गरिमामय पद से सुशोभित होगा।
       भारत की मिटृी में पले बढ़े होने के कारण लेखक बचपन से ही धर्म कर्म अध्यात्म में रूचि रखता रहा है। सौभाग्य से युग ऋषि श्री राम जी जैसे महान व्यक्तित्व का सम्बल मिला। उनके संरक्षण में अनेक आत्म ज्ञानी महापुरुषों के पढ़ने समझने का मौका मिला। भाँति-2 के साधको के सम्पर्क में आने से साधना विज्ञान का एक ऐसा अनुभव मिला जिसको सभी तक बाँटने करने की इच्छा प्रतीत हुयी, जिससे सभी उसका लाभ उठा सकंे। यह पुस्तक हर वर्ग के लिए लाभप्रद होगी जो साधना में रूचि रखते है उनके लिए भी व जो एक श्रेष्ठ सुखी जीवन जीना चाहते है उनके लिए भी, ऐसा हमारा विश्वास है।

पाठकों से निवेदन है कि इस पुस्तक के साथ हमारी पहली पुस्तक ;इंेपे इववाद्ध सनातन धर्म का प्रसाद भी पढ़ें इससे विषय की उचित जानकारी मिलेगी। इस विषय के जो विस्तार से समझना चाहें वो निम्न इसवह अवश्य पढें़। 

देव सत्तााओं से निवेदन है कि हमारी पात्रता इतनी विकसित हो कि हम अपने लक्ष्य में सफल हो सकें व मानव जीवन के सार्थक कर पाएँ। 

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