Thursday, March 28, 2013

आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास


पहले संत दशकों तक जंगलों में तप करते थे। सिद्धि प्राप्त होने पर भी अपना प्रचार नहीं करते थे। स्वयं को छिपाकर रखते थे। चेले बनाने से बचते थे। कहावत थी गुरू कीजे जानकर-पानी पीजे छानकर। तब संतो का जीवन न्यूनतम आवश्यकताओं के कारण प्रकृति के साथ सन्तुलनकारी होता था। पर जब से धार्मिक टी. वी. चैनल बढ़े हैं। तब से धर्म का कारोबार भी खूब चल निकला है। अब कथावाचकों और धर्माचार्यों का यश रातो-रात विश्व भर में फैल जाता है। फिर चली आती है चेलों की बारात, लक्ष्मी की बरसात और लगने लगती है गुरू सेवाकी होड़। नतीजतन हर चेला अपनी क्षमता से ज्यादा गुरू सेवामें जुट जाता है। भावातिरेक में गुरू के उपदेशों का पालन करने की भी सुध नहीं रहती। परिणाम यह होता है कि चेले गुरू के जीवनकाल में ही गुरू के आदर्शो की अर्थी निकाल देते हैं। रोकने-टोकने वाले को गुरूद्रोह का आरोप लगाकर धमका देते हैं। गुरू की आड़ में अपनी दबी हुर्इ महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में जुट जाते हैं।
संत कहते हैं कि पैसे वाला और सुन्दर स्त्री गुरू को ही शिष्य बना लेते हैं । खुद शिष्य नही बनते हैं। परिणाम यह होता है कि विरक्त संतो के शिष्य ही ऐश्वर्य का साम्राज्य खड़ा कर लेते हैं। शंकराचार्य जी ने सारे भारत का भ्रमण कष्टपूर्ण यात्रा में किया और बेहद सादगी का जीवन जीया। आज आपको शंकराचार्यों का वैभव देखकर आदिशंकराचार्य के मूल स्वरूप का आभास भी नहीं हो सकता। इसके अपवाद संभव हैं। सूली पर चढ़ने वाले चरवाहों के साथ सादगी भरा जीवन जीने वाले यीशु मसीह की परम्परा को चलाने वाले पोप रोम स्थित वेटिकन सिटी में चक्रवर्ती सम्राटों जैसा जीवन जीते हैं। गरीब की रोटी से दूध और अमीर की रोटी से खून की धार टपकाने वाले गुरू नानक देव जी गुरूद्वारों  के सत्ता संघर्ष को देखकर क्या सोचते होंगे ? यही हाल लगभग सभी धर्मों का है ।
अब सवाल आता है कि धर्माचार्यों के अस्तित्व, ऐश्वर्य, शक्ति व विशाल शिष्य समुदायों की उपेक्षा तो की नहीं जा सकती। उनके द्वारा की जा रही गुरू सेवाको रोका भी नहीं जा सकता है, पर क्या उसका मूल्यांकन करना गुरूद्रोह माना जाना चाहिए? अब एक संत ने कहा कि अपने नाम के प्रचार से बचो, अपने फोटो होर्डिग, पोस्टरों और पर्चों में छपवाकर बाजारू औरत मत बनो। पर उनके ही शिष्य रात-दिन अपनी फोटो अखबारों और पोस्टरों में छपवाने में जुटे हों, तो इसे आप क्या कहेंगे? संत कहते हैं कि प्रकृति के संसाधनों का संरक्षण करो, उनका विनाश रोको। पर उनके शिष्य प्राकृतिक संसाधनों पर महानगरीय संस्कृति थोपकर उनका अस्तित्व ही मिटाने पर तुले हो तो इसे क्या कहा जाए?  संत कहते हैं कि राग द्वेष से मुक्त रहकर सबको साथ लेकर चलो तभी बड़ा काम कर पाओगे। पर चेले राग द्वेष की अग्नि में ही जलते रहते हैं,  उन्हें लक्ष्य से ज्यादा अपने अहं की तुष्टि की चिंता रहती है। ऐसे चेले भौतिक साम्राज्य का विस्तार भले ही कर लें, पर संत की आध्यात्मिक परम्परा को आगे नहीं बढ़ा पाते। संत के समाधि लेने के बाद उसके नाम के सहारे अपना कारोबार चलाते हैं पर संत हृदय नवीनतम समाना। संत  का हृदय मक्खन के समान कोमल होता है। वे अपने कृपा पात्रों के दोष नहीं देखते। इसका अर्थ यह नहीं कि उनके चेले हर वह काम करें जो संत की रहनी और सोच के विपरीत हो?
जहां-जहां धर्माचार्यों के मठ या आश्रम हैं वहीं-वहीं सेवा के अनेक प्रकल्प भी चलते हैं। जब तक यह सेवा शिक्षा, स्वास्थ्य, गऊ सेवा, भजन, प्रवचन या प्रार्थना तक सीमित रहती है तब तक समाज में कोर्इ समस्या पैदा नहीं होती, पर जब उत्साही चेले ग्रामीण विकास या जल, जंगल व जमीन के विकासकी चिंता करने लगते हैं तब बहुत बड़ा खतरा पैदा हो जाता है। इन सभी समस्याओं को गहरी और अनुभवी सोच के बिना हल करना संभव नहीं होता, क्योंकि बिना समझ के किया गया विकास प्राय: विनाशकारी होता है। वह प्रकृति के संसाधनों पर भार बन जाता है। ऐसा सेवा और ऐसे विकास से तो अपने परिवेश को उसके हाल पर छोड़ देना बेहतर होगा। कम से कम गलत आदर्श तो स्थापित नहीं होगें, पर सुनता कौन है? जब छप्पड़ फाड़कर पैसा आता है तब बुद्धि उल्लू की संवारी करने लगती है। मदहोश होकर चेले अपने गलत निर्णय को भी बुल्डोजर की तरह बाकी लोगों पर थोपने लगते हैं। ऐसे में मठो में सत्ता संघर्ष शुरू हो जाते हैं। आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास। इससे समाज का बड़ा अहित होता है, क्योंकि चेलों की मार्फत गुरू आज्ञाके संदेश पाने वाले भोले-भाले अनुयायी चेलों की वाणी को ही गुरूवाणी मानकर उसका पालन करने में जुट जाते हैं। फिर सेवा कम और अहं तुष्टि ज्यादा होती है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं ।
आवश्यकता इस बात की है कि यदि किसी संत या उनके शिष्यों के पास अकूत दौलत बरस रही हो और वे समाज की सेवा करना चाहते हैं या पर्यावरण को सुधारना चाहते हैं तो उन्हें ऐसे लोगों की बात सुननी चाहिए जो उस क्षेत्र के विशेषज्ञ या अनुभवी हों। एक तरह का सेतु बंधन हो। सही और सार्थक ज्ञान का समन्वय यदि समर्पित शिष्यों के उत्साह के साथ हो जाए तो बड़े-बड़े लक्ष्य बिना भारी लागत के भी प्राप्त किए जा सकते हैं। इसकी विपरीत परिस्थिति में भारी संसाधन खपाकर छोटा-सा भी लक्ष्य प्राप्त करना दुष्कर हो जाता है। पर ऐसे चेलों रूपी बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? यह कार्य तो संत और गुरू को ही करना होगा। एक फोड़े को फोड़ने के लिए गुरू को सर्जन की तरह अपने सभी शिष्यों की मानसिक शल्यचिकित्सा करनी होगी। तभी उनका संकल्प सही मायनों में पूरा होगा।

From news paper writer Vineet Narayan

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