Friday, November 9, 2012

देवासुर संगा्रम एंव उज्जवल भविष्य का अवतरण


अगले दिनों देवासुर संग्राम होने वाला है उसमें मनुष्य और मनुष्य आपस में नहीं लडेगें वरन् आसुरी और दैवी प्रवृत्तियों में जम कर अपने-अपने अस्तित्व के लिए सघर्ष होगा। असुरता अपने पैर जमाये रहने के लिए, देवत्व अपनी स्वर्ग सम्भावनायें चरितार्थ करने के लिए भरसक चेष्टा करेगें। इस विचार संघर्ष में देवत्व के विजयी हो जाने पर वे परिस्थ्तियाँ उत्पन्न होंगी, जिनमें हर व्यक्ति को उचित न्याय, स्वातन्त्रय, उल्लास, साधन और सन्तोष मिल सके।
      असुरता इन दिनों अपने पूर्ण विकास पर है। देवत्व, सुषुप्त और विश्रृंखलित पड़ा है। आवश्यकता इस बात की है कि देवत्व जगे, संगठित हो तो युग की आवश्यकता एवं र्इश्वरीय आकांक्षा की पूर्ति के लिए कटिबंध हो। जिन आत्माओं में दैवी प्रकाश का आवश्यक अंश विद्यमान है उनकी अन्तरात्मा में युग की पुकार सुनने और अपने पुनीत कर्तव्य की दिशा में अग्रसर होने की अत: पुकार उठ रही है, पर अभी वह इतनी धीमी है कि प्रोत्साहन की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। युग निर्माण योजना के अंतर्गत यही प्रयोजन पूरा किया जा रहा है।
     आशा करनी चाहिये कि वह दिन हम लोग अपनी इन्हीं आँखों से इसी जीवन में देखेगें जबकि अगणित देव प्रवृति के व्यक्ति अपने-अपने स्वार्थो को तिलांजलि देकर विश्व के नव-निर्माण में ऐतिहासिक महापुरूषों की तरह प्रवृत होगे और इन दिनो जिस पशुता एंव पैशाचिक प्रवृत्ति ने लोक-मानस पर अपनी काली चादर बिछा रखी है उसे तिरोहित करेगे। अनाचार का अंत होगा और हर व्यक्ति अपने चारों ओर प्रेम, सौजन्य, सद्भाव सहयोग, न्याय, उल्लास ,सुविधा एवं सज्जनता से भरा सुख शातिंपूर्ण वातावरण अनुभव करेगा।
उस शुभ दिन को लाने का उत्तरदायित्व देव वर्ग का है। उसी को जगना है, उसी को संगठित होना है, उसी को अविवेक के विरूद्ध संघर्ष में तत्पर होना है। वे जितने कम समय में अपना उत्तरदायित्व वहन करने को तत्पर हो सकें, उतना ही शीघ्र नवयुग का स्वर्णिम प्रभात उदय होते हुए हम देखेगें और धन्य होगे।
     मनुष्य शरीर में प्रसुप्त देवत्व का जागरण करना ही आज की सबसे बड़ी र्इश्वर पूजा है। युग धर्म इसी के लिये प्रबुद्ध आत्माओं का आह्वान कर रहा है। नवयुग निर्माण की आधारशिला यही है। जिस असुरता की दुष्प्रवृत्तियों ने संसार को दु:ख दारिद्रय भरा नरक बनाया, जिस अविवेक ने परमात्मा के पुत्र आत्मा को निकृष्टतम कीड़े से गये गुजरे स्तर पर ला पटका, उसक उन्मूलन देवत्व के अभिवर्धन से ही होना है। अंधकार को मिटाने के लिए प्रकाश उत्पन्न करने के अतिरिक्त और कोर्इ मार्ग नहीं। मनुष्य की आन्तरिक संकिर्णता एवं अविवेक ग्रस्त स्थिति का अन्त किये बिना उज्जवल भविष्य की आशा अन्य किसी प्रकार नहीं की जा सकती। धन वैभव बढ़ने से नहीं, सद्भाव बढ़ने से मानीवय गौरव का पुनरूत्थान संभव होगा।
     इस महान कार्य को भौतिक स्तर पर किये गये उथले क्रिया-कलापों द्वारा सम्पन्न नहीं किया जा सकता। इनके लिये अधिक गहरार्इ में उतरना होगा और उस स्तर पर प्रयत्न करना होगा जहाँ से मानवीय अंत:करण का स्पर्श एवं प्रभावित किया जा सके। अध्यात्म ही वह आधार हो सकता है। मनुष्य की प्रकृति को बदलने और गतिविधियों को उलटने का कोर्इ महत्वपूर्ण परिवर्तन तभी होगा जब उसका अंत:करण बदले और अंत:करण का परिवर्तन मात्र भौतिक साधनों एवं प्रयत्नों से सम्पन्न नहीं हो सकता। रक्त वाहिनी नाड़ियों में कोर्इ औषधि प्रवेश करने के लिए इन्जेक्शन की सुर्इ ही उपयुक्त होती है, इसी प्रकार मानवीय अंत:करण को प्रभावित करने की प्रक्रिया आध्यात्मिक भावनाओं के माध्यम से ही सम्पन्न की जाती है
यों चाहते सभी है कि समाज में फैली हुर्इ बुराइयाँ दूर हो और व्यक्ति अधिक र्इमानदार बने। इसके लिये वहीं दो मोटे उपकरण सूझ पड़ते है, जो आमतौर से अन्य जानकारियाँ बढ़ाने के लिए काम में लाये जाते है- लेखनी और वाणी। इन्हीं दो साधनों से स्कुलों में बच्चों को हिसाब, भूगोल इतिहास आदि की शिक्षा दी जाती है। कृषि, शिल्प, स्वास्थ्य आदि विषय की जानकारी भी आमतौर से इन्हीं माध्यमों से मिलती है। नेता लोग कोर्इ आन्दोलन भी इन्हीं साधनों से चलाते है। प्रचार आज का एक शक्तिशाली साधन माना जाता है। जनसाधारण को अभीष्ट दिशा में मोड़ने के लिये विज्ञापनबाज व्यापारियों से लेकर धर्मोपदेशक और राज-नेता तक इन्हीं दो साधनों को काम में लाते है।

पिछले बहुत दिनों से मानीवय प्रवृत्ति को पतन से उत्थान की ओर मोड़ने के लिये कुछ प्रयत्न छुट-पुट आन्दोलन के रूप में चलते रहे है सो उनका थोड़ा बहुत प्रभाव भी देखा है, पर वह था उतना ही नगण्य जिसके आधार पर कोर्इ बड़ी आशा नहीं की जा सकती। कारण यही रहा है कि प्रयत्नकर्ता यह भूलते रहे है कि जिस बात की जानकारी न हो उसे लेखनी, वाणी से जताया जा सकता है पर जिसे जानते तो है, पर मानते नहीं, उसे मनवाने के लिये कुछ अधिक उँचे एवं अधिक शक्तिशाली माध्यम अपनाने की आवश्यकता है। सर्व साधारण को दया धर्म, सदाचार, संयम, भक्ति आदि की महत्व माहात्म्य मालूम न हो या वे उसे अस्वीकार करते हों ऐसी बात नहीं। वे दूसरों को उपदेश भी इन बातों का देते है, पर कठिनार्इ यह है कि स्वंय उस पर चल नहीं पाते, यह असमर्थता और दुर्बलता उनके शरीर मन आदि की नहीं वरन् अंत:करण की है, इसलिये उपचार भी उसी दुर्बल अंग का किया जाना चाहिये। गुर्दे की बिमारी पैरों में तेल लगाने से दूर नहीं हो सकती। जो व्यथित अंग है उस तक उपचार का प्रभाव पहुँचे तब कुछ काम चले। लेखनी और वाणी जो घिसे-पिटे शब्दों में पेशेवर लोगों द्वारा प्रस्तुत की जाती है, मस्तिष्क तक एक छोटी लहर पहुँचा कर वायु मण्डल में तिरोहित हो जाती है। देखा जाता है कि घिसे-पिटे प्रचारात्मक प्रयत्न मानीवय अंत:करण को वासना, तृष्णा के आकर्षणों से विरत कर पवित्रता और परमार्थ की दिव्य ज्योति उत्पन्न करने में प्राय: असफल ही रहते है। हममें से अनेको ने सद्भावनापूर्वक कितने ही सुधारात्मक प्रयत्न आरम्भ किये है पर उनका स्तर उथला था, साधन हलके थे, इसलिए थोड़ी-सी छटा दिखा करके वे और उनका प्रतिफल भी अन्तर्धान होता रहा। समस्त मानव समाज में एक व्यापक और सशक्त हलचल उत्पन्न  कर सकने की, पतन के प्रचण्ड प्रवाह को पलट सकने की  क्षमता केवल उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रयोगों से ही होती है और उनका जब कभी भी ठीक तरह प्रयोग हुआ है, अभीष्ट परिणाम भी सामने आया है। इस स्तर के प्रयोग कभी असफल नहीं हो सकते।
भारत के वर्चस्व का इतिहास उसके आत्म-बल की सफलता का उद्घोष है। चिर अतीत में हमारे महान् ऋषि ही इस देश की महान् परम्पराओं के निर्माता रहे है। उनके पास भौतिक साधन कम थे पर आत्मबल इतना प्रचण्ड था कि वे जनसमुह को अपने प्रवाह में एक निर्धारित समय में उसी प्रकार बहा ले चलते थे, जिस प्रकार प्रबल वेग से बहती हुर्इ नदियाँ तिनकों को अपने साथ बहते चलने के लिये विवश कर देती है। कीचड़ में फँसे हाथी को सहसत्रों मेंढकों की चेष्टा भी उबार नहीं पाती, उसे समर्थ हाथी ही युक्तिपूर्वक मजबूत रस्सी की सहायता से बाहर निकाल पाते है। आन्तरिक दुर्बलता का अभाव आत्म-बल सम्पन्न लोगों के द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। ऋषियों ने यही किया। चुँकि वे स्वंय प्रकाशमान थे, इसलिये उन्होने अपने समस्त क्षेत्र को प्रकाशित कर दिया। कहना न होगा कि इस देश के निवासी जिन दिनों आध्यात्मिक मान्यताओं और भावनओं से प्रभावित थे, उन दिनों धरती पर स्वर्ग बिखरा पड़ा था, हर मनुष्य के भीतर देवत्व झाँकता था और उस लाभ की लोभ लालसा से समस्त विश्व के लोग भारतवासियों का मार्गदर्शन, सहयोग एवं प्रकाश पाने के लिये लालयित रहते थे। इन्ही विशेषताओं के कारण, भारतीय संस्कृति समस्त विश्व का सर्वोत्तम आकर्षण बनी हुर्इ थी।
प्रकाश स्तम्भों के बुझ जाने पर अंधकार फैल जाना स्वाभाविक है। जैसे-2 उच्च आत्म- बल सम्पन्न हस्तियाँ घटती गयी वैसे-2 जन-मानस की उत्कृष्टता भी गिरती गयी। इस गिरावट को ओछे लोग प्रचारात्मक साधनों से रोक नहीं सकते थे और वे रोक भी नहीं सके। हम अपने लंबे इतिहास पर दृष्टिपात करते है तो उच्च आत्म-बल सम्पन्न आत्माओं के अवतरण अवसाद के साथ-2 जन-मानस का उत्थान पतन भी जुड़ा हुआ देखते है। जिन दिनों महापुरूष जन्मे उन दिनों कोर्इ भी युग बीत रहा हो सतयुग का वातावरण उत्पन्न हुआ है। भगवान् राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, गाँधी आदि की विचारधारा से कोटि-2 लोग प्रभावित हुए। समर्थ गुरू गोविंदसिंह आदि की प्रेरणा से लोगों ले एक से एक बढे़-चढ़े त्याग, बलिदान प्रस्तुत करने में प्रतिस्पर्द्धा उपस्थित कर दी। अभी कल परसों गाँधी की आँधी में लाखों लोगों ने जिस आदर्शवादिता की  परिचय दिया उससे यह मान्यता सार्थक सिद्ध हुर्इ है कि उच्चस्तरीय आत्म-बल सम्पन्न आत्मायें ही जन मानस की दिशा बदल देने में समर्थ हो सकती है। मामूली प्रचार साधन उपयोगी तो है पर उतने भर से इस दिशा में कोर्इ प्रभावी परिणाम नहीं हो सकता।
भावी नव-निर्माण में अध्यात्म को ही प्रमुख भुमिका सम्पन्न करनी पड़ेगी। प्रभात काल की शुभ सूचना लाने वाली उषा के साथ-साथ और प्रयास आरम्भ भी हो गये है।  श्री रामकृष्ण परमहंस और योगी अरविंद की तपश्चर्या का यदि कोर्इ रहस्योद्घाटन कर सके तो उसे लगेगा कि पिछली शताब्दी की सारी राजनैतिक और सुधारात्मक चेतनाओं का सूत्र संचालन इन दो दिव्य आत्माओं ने किया, कठपुतली कितनी ही पर्दे पर आती जाती रहीं और उसके विभिन्न अभिनय लोगों में उत्साह उत्पन्न करते रहे पर उनके सूत्र इन आत्म-बल के धनी महामानवों द्वारा ही संचालित होते रहे। भारत का हजार वर्ष की गुलामी से मुक्त होना और कतिपय सुधारात्मक चेतनाओं का उद्भव अपने सामने इस शताब्दी की दो महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ है। इनका प्रत्यक्ष श्रेय किनको मिला किनको नहीं मिला, इस विवाद में पड़ने से बचकर भी हमें यह जान ही लेना चाहिए कि इस महान् जागरण के पीछे कुछ विशिष्ट अविदित रहस्यमय आध्यात्मिक शक्तियाँ भी काम कर रही थी। आगे जो महान कार्य फैला पड़ा है, नये युग का जो नया निर्माण होने वाला है उसमें भी अध्यात्म की, अध्यात्म बल  सम्पन्न उच्चस्तरीय महामानवों की प्रधान भूमिका होगी। प्रत्यक्ष श्रेय भले ही किन्हीं को इतिहासकार देते रहें।
विश्व की भावी नवनिर्माण उत्कृष्टता के अभिवर्धन पर अवलम्बित होगा। इसके लिये प्रेरक केंद्र कोर्इ भी क्यों न हो, उसे सहसत्रों सहयोगियों की आवश्यकता पड़ेगी। वे भले ही उँची योग्यताओं के न हों पर आत्मिक  उत्कृष्टता की विशेषता तो अनिवार्य रूप से होनी ही चाहिए। इन दिनों इसी उत्पादन को सबसे बड़ा कार्य माना जाना चाहिए।
पूर्व जन्मों की अनुपम आत्मिक संपत्ति जिनके पास संग्रहीत है। ऐसी ही आत्मायें इस समय मौजूद है। पिछले कुछ समय से अनुपयुक्त परिस्थितियों में पड़े रहने से इन फौलादी तलवारों पर जंग लग गयी। इस जंग को छुड़ाने की प्रक्रिया युग निर्माण योजना के प्रस्तुत कार्यक्रमों के अंवर्गत चल रही है। इन दिनों जो व्यक्ति बिलकुल साधारण स्तर के दिखार्इ पड़ते है और जिनसे किसी बड़े काम की सम्भावना नहीं मानी जा सकती, ऐसे कितने ही व्यक्ति असाधारण प्रतिभा और क्षमता लेकर कार्यक्षेत्र में उतरेगें और नव-निर्माण का महान् कार्य जो आज एक स्वप्न मात्र दिखार्इ पड़ता है, कल मूर्तिमान सचार्इ के रूप में प्रस्तुत करते परिलक्षित होगें।
मनुष्य के आवरण के भीतर प्रसुप्त स्थिति में एक प्रबल देवता विद्यामान है। इसे जगाया जा सके  तो फिर असम्भव जैसी कोर्इ बात शेष नहीं रहेगी। देवत्व के जागरण का हमारा वर्तमान अभियान संसार का भावनात्मक नव-निर्माण करने में सफल होकर रहेगा, क्योंकि उसका आधार उथले ओछे प्रचार उपकरण नहीं वरन् आत्म-शक्ति के वही प्रयोग होगें जो समय-समय पर असंख्य बार सफल होते रहे है।
महाकाल और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया से  

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