Sunday, July 14, 2013

चक्रव्यूह गठन

आज मानव जाति के उज्जवल भविष्य हेतु सूक्ष्म जगत में देवशक्तियों व आसुरी शक्तियों के बीच संग्राम छिड़ा हुआ है। आने वाले समय में यह इतना तीव्र होने जा रहा है कि धरती पर रहने वाला कोई भी मानव इससे अछूता नहीं रह पाएगा। महाभारत के समान या तो व्यक्ति को देवपक्ष में आना होगा या आसुरी पक्ष में वह खिंच जाएगा। यह व्यक्ति के संस्कारों व मनोभूमि पर निर्भर करेगा कि वह किधर जाता है। इस महासमर में हमारे सेनापति स्वंय परमपूज्य गुरूदेव हैं, जो असुरों के विरूद्ध मोर्चा सम्भाल रहे हैं। हम सबको उनके सहयोग के लिए आज और अभी से आगे आना हैं।

धरती पर उज्जवल भविष्य लाने के लिए हमें चक्रव्यूह का गठन करना हैं। इसका पहला व्यूह प्रचार है। इसके द्वारा हमें अधिक से अधिक लोगों को गायत्री चेतना के प्रति उन्मुख करना है। ध्यान रहे, जितने भी लोग गायत्री महामंत्र एवं गायत्री चेतना के प्रति उन्मुख होगें, उतना ही वे सब आसुरी प्रभावों से मुक्त होंगें। असुरता उनके मनों को विकृत न कर सकेगीं। आज नहीं तो कल, वे हमारे सहयोगी एवं सहभागी बनेंगे। इस चक्रव्यूह का दूसरा व्यूह विचार है। यह शक्ति परम पूज्य गुरूदेव ने हम सभी का प्रचुर मात्रा में सौंप रखी है। बस, केवल हमें उसका उपयोग व प्रयोग करना है। गायत्री चेतना से चिंतन को अनुप्राणित करने के लिए हमें सामूहिक प्रयास करने होंगे। इन प्रयासों के द्वारा ही जनजीवन गायत्री चेतना को अपने चिंतन में अवतरित कर सकेगा।

इस चक्रव्यूह का तीसरा और सबसे महत्त्वपूर्ण व्यूह है - जीवनशैली । यह विचारणीय-अनुकरणीय सच है कि सैनानियों को सैनिकों की भाँति ही कठोर जीवन का अभ्यास करना पड़ता है। इस असुर-विनाशक संग्राम  के लिए हमें भी तपस्वियों की जीवन शैली अपनानी पड़ेगी। जो गायत्री-साधना में तत्पर हैं, उन्हें इसकी शुरूआत वाद-विवाद से बचने एवं विषय-वासनाओं का लालच छोड़ने से करनी होगी। बाद में इस पथ पर क्रम-दर-क्रम आगे बढ़ा जा सकता है। तपस्वियों में शौक-मौज, ऐशोंआराम का कोई स्थान नहीं होता। हम सभी के जीवन में भी नहीं होना चाहिए।

इस चक्रव्यूह का चौथा व्यूह तपसाधना है। अपना देश भारत एक तपस्वी एवम धर्मशील राष्ट्र के रूप में सदैव विश्वविख्यात रहा है। पराक्रम, पुरूषार्थ एवं परमार्थ का स्वर इस राष्ट्र की वाणी में सदैव गूंजता रहा है, परन्तु समय के परिवर्तन के साथ-साथ यह राष्ट्र भाग्यवाद, भोगवाद एवं भीरूता के कुच्रक में उलझता चला गया। जिस राष्ट्र की नस-नस में संयम सदाश्यता, समर्थता व साहस का लहू बहता था, वही राष्ट्र आज व्यभिचार, वैमनस्य, विद्रोह एवं वैर भाव के कारण निस्तेज हो गया है। जिस राष्ट्र का कण-कण तेजस्विता, मनस्विता एवं विश्वसनियता के प्रकाश से जगमगाता था, वहीं आज सर्वत्र आडम्बर, अन्धविश्वास एवं अज्ञानता का अन्धकार व्याप्त है।

चक्रव्यूह का पाँचवा द्वार है पाँच वादो से उपर उठना। ये पाँच वाद हैं - व्यक्तिवाद, परिवारवाद, जातिवाद, संस्थावाद व क्षेत्रवाद। व्यक्तिवाद से व्यक्ति स्वंय को बड़ा दिखाने के चक्कर में पद प्रतिष्ठा में उलझा रहता हैं। अपनी फोटो खिंचाता है, जगह-जगह छपवाता हैं। इससे तरह-तरह के ईर्ष्या-द्वेष जन्म लेते है। अपने से अधिक प्रतिभाशाली को उभरते नहीं देख सकता। उसे नीचा गिराने के चक्कर में क्या-क्या स्वांग रचता है। परिवारवाद हावी होने पर हम सारा धन सारी प्रतिभा परिवार के लिए खपा देते हैं। पदाधिकारियों की नालायक औलादें मिशनों में अनेक प्रकार की समस्याँए उत्पन्न करती है। परंतु मोह में अन्धे पिता को कुछ भी दिखायी नहीं देता। राजा की इच्छा होती है कि उसके बाद उसका बेटा ही गद्दी सम्भाले, चाहे वह उस लायक है या नहीं। इससे मिशनो में वंशवाद पनपने लगता है और मिशन धीरे-धीरे समाप्त हो जाते है। अगला घुन है जातिवाद का। विशेष जाति के लोगों का मिशन में अधिक सम्मान होता है और विभिन्न पदो पर उसी जाति के लोगों को रखा जाता हैं। इससे एक जाति की भरमार दिखाई देने लगती है व अन्य जाति के लोग असंतुष्ट होते है। प्रयास किया जाए कि बड़ी संस्थाओ में सभी जातियों के योग्य लोगों को सामने लाया जाय। अगला कीड़ा संस्थावाद का हैं। जैसे विदेशी आक्रमण के समय यदि राजा लोग एकत्र हो जाते तो भारतीयों को इतनी दर्दनाक स्थिति न देखनी पड़ती। आज भी भारत में अनेक सशक्त मिशन है। यदि हम संस्थावाद से उपर उठ एक झण्ड़े के नीचे एकत्र हो जायें, तो आज धरती पर स्वर्ग आ जाए। परंतु इसके लिए हमें अपनी मानसिकता उदार बनानी पड़ेगी। दूसरे मिशनों का, दुसरे गुरूओं का सम्मान करना चाहिए। इसी प्रकार हम क्षेत्रवाद से ऊपर उठें। भारतीय संस्कृति बड़ी उदार रही है। इसने सबको गले लगाया है, बहुत ऊँची सोच रखी हैं।


चक्रव्यूह का छठा द्वार है - संगठन शक्ति। छोटे बड़े जितने संगठन है वे सभी समान मुद्दो पर एकत्र हों। जनसंख्या नियन्त्रण, पर्यावरण प्रदूषण व अश्लीलता पर रोक, गौ संरक्षण, अशिक्षा, जल बचाव, कुटीर उद्योग, खर्चीली शादियों का बहिष्कार आदि अनेक मुद्दे है, जिन पर विभिन्न संगठन एक साथ हल्ला बोलें। चक्रव्यूह का अन्तिम द्वार है - भारत में ऋषियों के सविंधान को लागू करना। हमारे संविधान में अभी अनेक कमियाँ है जिन्हें वोट बैंक के चक्कर में राजनेता लोग जानबूझकर दूर नहीं कर रहे हैं। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट धीरे-धीरे करके उन कमियों की ओर ध्यान आकर्षित कर रहा है, जैसे अपराधी मानसिकता के लोगों का नेता बनने से रोकना। पहले अंग्रेज स्वार्थ व भ्रष्टाचार फैलाकर भारत माता को कष्ट देते थे। अब अग्रेंजी मानसिकता के लोग छदम वेष में वही काम कर रहे हैं। किसी ने सही कहा है - "आजादी अभी अधूरी है, यह सोचना जरूरी है" आज की भारत की स्थिति इस प्रकार की है कि अच्छा आदमी, सच्चा आदमी समाज में एक प्रकार की घुटन दबाव महसूस करता है। अपनी संस्कृति से प्यार करने वाले आदमी को अनेक प्रकार के उपहासो का सामना करना पड़ता है। दुष्ट व चालबाज ही कामयाब होता प्रतीत होता हैं। इसका कारण है कि शिक्षा प्रणाली में मानवीय मूल्यों व राष्ट्रीय सोच के लिए जगह बहुत ही न्यून है इसलिए जो युवा convent schools में व उच्च professional colleges में पढकर निकलता है, वो केवल स्वार्थ में अंधा रहता हैं। हर क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है, तभी भारत का कायाकल्प सम्भव है।

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