Wednesday, July 24, 2013

लाहिडी महाशय की विनम्रता

 क्रिया-योगावतार लाहिडी महाशय आध्यात्मिक जगत के सूर्य माने जाते हैं, अध्यात्म पथ पर चलने वाला कौन इनके नाम से अपरिचित हो सकता है व इनकी कृपा से अछूता रह सकता है। काशी उन दिनों दो प्रसिद्ध सिद्ध पुरूषों की लीलास्थली थी: एक त्रैलंग स्वामी जिनकों चलते फिरते काशी के शिव (Walking Shiv of Kashi) कहा जाता था। उनकी उम्र का अनुमान पाँच सौ वर्ष के आस पास माना जाता है। सुनते हैं उन्होंने तीन सौ वर्ष नेपाल के जंगलों में कठिन साधना कर अनगिनत शक्तियाँ पायी थी। वो हमेशा नग्न रहते थे। एक बार एक अंग्रेज़ अफसर ने उनके नंगा घूमता देख पकड़ लिया व कारागार में बन्द करवा दिया। एक घण्टे बाद अंग्रेज अधिकारी कारागार की छत पर घूम रहे थे। उसको यह देखकर चक्कर आ गए कि अभी तो इनको अन्दर बन्द किया था अभी सलाखें से बाहर कैसे आ गए। उस अधिकारी ने इनसे क्षमा मांगी व फिर किसी साधु सन्त व भारतीय से अभद्र व्यवहार न करने का प्रण किया।
   एक बार लाहिडी महाशय त्रैलंग स्वामी जी से मिलने पहुंचे। त्रैलंग स्वामी जी अपने सैकड़ों शिष्यों के साथ विराजमान थे। जैसे ही त्रैलंग स्वामी ने लाहिडी जी को आते हुए देखा तुरन्त उठकर उनके पास जाने लगे। लाहिडी महाशय स्वामी जी के चरण स्पर्श के लिए झुके तो स्वामी जी ने उनको गले लगा लिया। शिष्य यह देख आश्चर्यचकित रह गए। शिष्यों ने त्रैलंग स्वामी से पूछा कि आप सन्यासी हैं फिर भी आपने गृहस्थ को (लाहिडी महाशय) इतना सम्मान दिया। त्रैलंग स्वामी बोले ‘‘जिस परम पद को पाने के लिए मैंने लंगोटी भी त्याग दी उसी पद पर लाहिडी जी गृहस्थ आश्रम में रहकर सुशोभित हैं। लाहिडी जी किसी भी तरह से मुझसे कम नहीं है।’’
   वही लाहिडी महाशय इतने विनम्र थे कि जो भी छोटा-बड़ा उनसे मिलने आता उसी के चरण छूने का प्रयास करते। लोगों ने पूछा आप इतने बड़े सिद्ध पुरूष होकर भी इतने विनम्र कैसे? इस पर उन्होंने अपने गुरू महावतार बाबा का एक प्रसंग सुनाया ‘‘जब मैं साधना की प्राम्भिक स्थिति में था तो कुम्भ स्नान करने प्रयाग गया। वहां मेरे मन में साधु-सन्तों के वेश व चाल-चलन देखकर रोष उत्पन्न हुआ व विचार आया कि इन ढोंगी पाखण्डी साधु समाज ने संस्कृति का सबकुछ तहस नहस कर दिया व इनके प्रति घृणा के भाव आने लगे। कुछ आगे ही बढ़ा था कि देखा साक्षात बाबा जी (महावतार) एक दोने में पानी भर कर कुछ साधुओं के पैर धो रहे थे। मुझे विश्वास नहीं हुआ व मैने अपनी आंखें मली व खोली तो वही दृश्य सामने था। मैं दौड़कर उनके पास पहुंचा व मेरे मुंह से निकला- बाबाजी आप!’’ ‘‘हां बेटा! ये साधु लोग दूर-दूर से कुम्भ में आए हैं इनकी पीड़ा निवारण हेतु इनके पैर धो रहा हूँ बाबा जी बोले।’’ इतना सुनते ही मेरे मन के घृणा-घमण्ड सब धुल गया व उस दिन से में सबमें बाबा जी के दर्शन कर सबको प्रणाम करता हूँ।’’ यह बोलकर लाहिडी जी ध्यान मग्न हो गए व शिष्यों के बीच एक तीख शान्ति छा गई। वास्तव में साधक में विनम्रता, सरलता, सौम्यता, करूणा, सदभाव ही दिव्य आभूषण हैं। साधना की पूर्णता तक इनका बने रहना आवश्यक है। यही शिक्षा सिद्ध पुरूष अपने शिष्यों को देते आए हैं व यही आदर्श उनके सम्मुख प्रस्तुत करते रहे हैं।

   एक बार की बात है कि आचार्य शंकर देव संस्कृति दिग्विजय अभियान पर निकले हुए थे। काशी में गंगा स्नान कर जब वो जाते थे तो भीड़ से उनके शिष्य उनका रास्ता खाली कराते थे। एक बार एक चांडाल उनके रास्ते में अड़ गए। शिष्यों के बहुत कहने-सुनने पर भी नहीं माने। आचार्य शंकर जब वहां से निकले तो बोले, ‘‘क्या तुम्हें दिखता नहीं कि हम यहां से गुजरने जा रहे हें? फिर भी एक चण्डाल होकर तुमने हमें अपवित्र करने की कोशिश की।’’ चण्डाल बोले, ‘‘दिखता तो आपको नहीं है कि आपके सामने कौन है? आपमें, हममे, सबमें क्या भेद है? बाहर तो सब कुछ पंच तत्वों का बना है व भीतर सब कुछ एक है।’’ चाण्डाल के मुख से यह सुनकर आचार्य शंकर चौकें, ध्यान से देखने पर पता चला कि सामने साक्षात महादेव खड़े हैं जो चाण्डाल का वेश भरकर उनको शिक्षा देने आए थे। उसके पश्चात् आचार्य शंकर अद्वैतवाद के प्रतिपादक बन गए व सबमें एक परमब्रह्म के दर्शन करने लगे। वास्तव में सृष्टि में सब कुछ गोल है उसी में हम सब घूम रहे हैं। आज मैं तुम्हें पढ़ा रहा हूँ, हो सकता है अगले जन्म में तुम मुझे पढ़ाओ। आज हम पंचतत्वों के इस ढाँचे को मैं-मैं बड़ा करते घूम रहे हैं। आज से बीस चालीस वर्ष बाद पता नहीं पंचतत्वों के किस ढाँचे को मैं-मैं स्वीकार करेंगे? अरे जब अपना ही पता नहीं पता, तो व्यर्थ में क्यों दुनिया भर के ढकोसले पाल रखे हैं। बड़ा ज्ञानी अथवा साधक होने का स्वांग रचा रखा है। इन ईर्ष्या, द्वेष, व्यर्थ के आडम्बरों से बाहर आएं व जिसके परमात्मा ने जो सामर्थ्य दी है उससे सेवा का पथ अपनाएं, प्रेम का पथ अपनाएं। इसी में अपनी आत्मा का, जगत का कल्याण है।

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