Thursday, October 2, 2014

अवसाद-कारण और निवारण Depression, Causes, Prevention and Cure (Part-1)

               Depression आज के समाज में बड़े व्यापक स्तर पर फैल रहा है। इसलिए इसके बारे में हम सभी को जानकारी अवश्य होनी चाहिए। इस blog के लेखक Dr. R. K. Aggarwal की Depression की (माता जी की तरफ की)  पूरी family history रही है। लेखक स्वयं भी अनेक वर्षों तक depression की बीमारी से ग्रस्त रहा है व अपनी माता जी के इस भयानक रोग से 25 वर्षों से अधिक समय से (सन् 1988 से) fight करता आ रहा है। सौभाग्य से माता कुसुमलता जी 65 वर्षों से ऊपर की आयु पार कर चुकी हैं व आज भी ठीक जीवन जी रही हैं। परन्तु इस अवधि में उन्होंने अनेक ऐसे दर्दनाक उतार-चढ़ावों को पार किया है जिसमें उनके जीवन की आशा हम छोड़ चुके थे।
            इस कारण लेखक ने माताजी के इलाज के लिए सभी पैथियों जैसे ऐलोपैथी, आयुर्वेद व होम्योपैथी के अध्ययन का प्रयास किया है। व्यक्ति इस दर्दनाक रोग के चंगुल में न फंसे व यदि रोगग्रस्त है तो शीघ्र कैसे उबर पाए इस दिशा में शोध (Research) करना हम सभी बुद्धिजीवियों (Intellectuals) का कर्त्तव्य है। इस दिशा में किए गए प्रयासों से मानवता की बहुत बड़ी सेवा सम्भव है।
Depression Symptoms (लक्षण)
1. जीवन में प्रसन्नता का आंशिक अथवा पूर्ण रूप से लोप हो जाना।
2. जीवन को एक प्रकार से भार समझकर घसीटना।
3. किसी भी कार्य में मन न लगना।
4. किसी भी कार्य को करते समय Confidence की कमी महसूस होना।
5. लोगों से मिलने-जुलने में संकोच, भय अथवा अनिच्छा का बढ़ना।
6. मन में बार-बार निराशावादी विचारों का आना।
7. किसी भी प्रकार का भय मन पर हावी होते जाना।
8. अशुभ घटने के विचारों का बार-बार उदय होना।
9. सदा थका-थका सा अथवा कमजोरी अनुभव करना।
10. जीवन बहुत ही नीरस लगना व जीवन समाप्त करने के विचार आना।
Causes (कारण)

1. ईर्ष्या (Jealousy) द्वेष से युक्त जीवन।
2. किसी से लम्बे समय तक घृणा करना।
     घृणा का असर व्यक्ति के शरीर पर बहुत खराब होता है विदेश की एक घटना है एक फैक्ट्री के मालिक जब भी अपनी फैक्ट्री जाते उनको फैक्ट्री में पहुॅंचने पर पेट के तीव्र दर्द का अहसास होता उन्होंने बहुत अच्छे-अच्छे चिकित्सों से इलाज कराया परन्तु कोई सही समाधान नहीं निकला। अन्त में वे एक बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक के पास गए। फैक्ट्री में सब-कुछ सही होते भी उन्होंने पेट दर्द क्यों होता है मनोवैज्ञानिक ने गम्भीरता पूर्वक उनके जीवन का, फैक्ट्री का व पुराने अनुभवों का निरीक्षण करना प्रारम्भ किया। एक दिन वो व मनोवैज्ञानिक घर से फैक्ट्री की ओर जा रहे थे। रास्ते में एक स्थान पर व्यक्ति के मुख पर विकृति उभरी एवं उसने अपने पेट पर हाथ रखा मनोवैज्ञानिक ने उनसे उस स्थान पर रूकने का आग्रह किया व उनसे अपने भावों का विश्लेषण करने के लिए बोला। उनसे पूछा इस स्थान पर विशेष पर उनके अन्दर कैसी भावना आई। व्यक्ति ने बताया कि इस स्थान के पास ही उनकी फैक्ट्री के पुराने पार्टनर का मकान है। जिसने उनके साथ बहुत धोखाधड़ी की। इसलिए इस स्थान पर आते उनके अन्दर उस व्यक्ति की पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं व हृदय घृणा व बदले की भावना से भर उठता है। मनोवैज्ञानिक को सारा रहस्य समझ आ गया उसने बताया कि यही उनके रोग का मूल कारण है यहाॅं आने पर उनके नाड़ीमण्डल से एक विषाक्त रस का स्त्राव होता है जो कि धीरे-धीरे पेट दर्द का कारण बन जाता है। इस प्रकार मनोवैज्ञानिक के रोग का निवारण संभव हो सका।
3. छोटी-छोटी बातों को हृदय से लगाकर रखना व दूसरों को नुक्सान पहुॅंचाने अथवा बदला लेने के गुप-चुप प्रयास करते रहना।
4. सहनशीलता व धैर्य का अभाव।
5. Negative Environment में रहना जहाॅं बहुधा व्यक्ति को अपमानित होना पड़ता है।
6. आलस्य प्रमाद अर्थात खाली पड़े-पड़े समय काटना।
7. अत्याधिक महत्त्वाकांक्षी होना।
8. सदैव स्वार्थपरक चिन्तन में लगे रहना।
9. जीवन में दूसरों से सच्चा प्यार न करना।
10. निकट सम्बन्धियों, मित्रों, परिचितों से धोखाधड़ी करना।
11. जीवन में दूसरों से अधिक आशाएॅं, अपेक्षाएॅं, उम्मीदें बाॅंधना।
12. अचानक कोई बड़ा आघात लगना अथवा नुक्सान पहुॅंचना।
         इन कारणों के अतिरिक्त कुछ पूर्व जन्मों के कर्मों से सम्बन्धित (Related) अथवा आध्यात्मिक कारण भी होते हैं जिनको नीचे लिखा जा रहा है-
13. कभी-कभी बहुत अच्छी प्रकृति के व्यक्ति भी इस रोग के शिकंजे में फंस जाते हैं क्योंकि पूर्व जन्मों में उनसे कुछ ऐसे दुष्कर्म हुए होते हैं जिनका परिपाक इस जन्म में हो रहा होता है। अतः व्यक्ति इस सन्दर्भ में किसी को दोष न दे।
14. कभी-कभी व्यक्ति भजन, कीर्तन, साधना अथवा शक्तिपात द्वारा कुछ समय तक अध्यात्म की ऊॅंची अवस्था में चला जाता है परन्तु उसके कुछ कुःसंस्कार अथवा परिस्थितियाॅं उसको वापिस सामान्य अवस्था में घसीट लाती हैं। ऐसा व्यक्ति भी कुछ समय के लिए depression में आ जाता है।
15. कभी-कभी कुण्डलिनी शक्ति से सम्बन्धित चक्रों की सफाई के क्रम में (मुख्यतः अनाहत चक्र) भी व्यक्ति इस बीमारी से ग्रस्त हो जाता है।
निवारण व रोकथाम (Prevention & Cure)
आध्यात्मिक उपचारः- जो व्यक्ति सनातन धर्म के सिद्धान्तों अथवा Universal Laws में विश्वास रखते हैं उनके लिए यह रोग सहना relatively आसान होता है। व्यक्ति को अधिक से अधिक ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए कि उसके अवगुणों को ठीक करने के लिए, गलत जीवनशैली में सुधार के लिए एवं पूर्व जन्मों में किए दूष्कर्मों के भुगतान के लिए जीवन में यह रोग आया है। यह रोग एक operation की तरह है जो कुछ समय कष्टप्रद तो होगा परन्तु उसके उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करेगा। उसे बहुत कुछ अच्छा सीखा कर जाएगा। युगऋषि श्रीराम आचार्यजी एक स्थान पर लिखते हैं-
            आप दुःखों से डरिए मत। घबराईए मत, काॅंपिए मत, उन्हें देखकर चिंतित या व्याकुल मत होईए वरन उन्हें सहन करने को तैयार रहिए। कटुभाषी किन्तु सच्चे सहृदय मित्र की तरह उससे भुजा पसारकर मिलिए। वह कटु शब्द बोलता है, अप्रिय समालोचना करता है, तो भी जब जाता है तो बहुत सा माल खजाना उपहार स्वरूप दे जाता है। बहादुर सिपाही की तरह सीना खोलकर खड़े हो जाईए और कहिए कि ऐ आने वाले दुःखों! आओ!! ऐ मेरे बालकों, चले आओ!! मैंने ही तुम्हें उत्पन्न किया है, मैं ही तुम्हें अपनी छाती से लगाऊॅंगा। मैं कायर नहीं हूॅं। जो तुम्हें देखकर रोऊॅं, मैं नपुंसक नहीं हूॅं, जो तुम्हारा भार उठाने से गिड़गिड़ाऊॅं, मैं मिथ्याचारी नहीं हूॅं। जो अपने किए हुए कर्म का फल भोगने के लिए मुॅंह छिपाता फिरूॅं। मैं सत्य हूॅं, शिव हूॅं, सुन्दर हूॅं, आओ मेरे अज्ञान के कुरूप मानस पुत्रों। चले आओ। मेरी कुटी में तुम्हारे लिए भी स्थान है। मैं शूरवीर हूॅं, इसलिए हे कष्टों! तुम्हें स्वीकार करने से मुॅंह नहीं छिपाता और न तुमसे बचने के लिए किसी की सहायता चाहता हूॅं। तुम मेरे साहस की परीक्षा लेने आए हो, मैं तैयार हूॅं, देखो गिड़गिड़ाता नहीं हूॅं, साहसपूर्वक तुम्हें स्वीकार करने के लिए छाती खोले खड़ा हूॅं।
            कहने का तात्पर्य है कि जब भी व्यक्ति पर कोई दुःख आए अथवा सुख आए तो उसको आध्यात्मिक दृष्टिकोण के साथ सहना सीखें।
           इसी प्रकार अपने किसी प्रियजन अथवा संतति की मृत्यु पर भी व्यथित न होकर संतोष कर लेना चाहिए कि ईश्वर ने कुछ दिन के लिए उसे हमारे पास रखने के लिए दी थी और प्रभु ने अपनी वस्तु वापस ले ली है। ऐसा सोचकर मन को शांत रखना चाहिए।
एक संत के दो पुत्र थे। दोनों एक दिन सड़क पर खेल रहे थे कि अचानक किसी वाहन की टक्कर से दोनों कि मृत्यु हो गई। माता को जानकारी मिलने पर वह दोनों बच्चों के मृत शरीर अपने घर ले आई। तत्पश्चात् उन्हें नहला-धुलाकर नये कपड़े पहनाकर पलंग पर सुला दिया और उनके ऊपर चादर डाल दी। संत घर पर आते ही बच्चों के बारे में पूछने लगे। पत्नी ने कहा -पहले खाना खा लें। खाना खिलाते समय पत्नी ने संत से प्रश्न किया कि किसी ने उसे दो अमूल्य हीरे रखने को दिये थे, अब वह उन्हें वापस लेना चाहता है, मेरी लौटाने की इच्छा नहीं है, क्या करू? संत क्रोधित होकर बोले -हीरे फौरन लौटा दो, हमें लालच नहीं करना चाहिए। इस पर पत्नी ने मृत बच्चों की ओर संकेत करते हुए संत को बताया कि भगवान ने ये दो हीरे हमें पुत्र रूप में 57 वर्ष के लिए दिए थे और आज उन्होंने उन हीरों को वापस ले लिया है। संत शांत होकर पत्नी की सहनशीलता और ईश्वर परायणता पर बलिहारी हो गए ।
            आचार्य जी का कथन है दुःख को तप बनाओ और सुख को योग बनाओ अर्थात् सुख में भगवान को धन्यवाद दो जिससे कि अहंकार का उदय न हो, दुःख में अधिक से अधिक नियम, संयम व सहनशीलता का विकास करो जिससे के शान्ति से उस दुःख की निवृत्ति का समाधान ढूॅंढा जा सके।
         आध्यात्मिक उपचार में सर्वप्रथम हम आए हुए कष्टों दुःखों कठिनाईयों को अपने द्वारा कृत पाप कर्मों का प्रतिफल मानते हुए शान्त मन से उनको स्वीकार करते हैं। जो व्यक्ति आध्यात्मिक नहीं होता वह आए हुए कष्टों और दुःखों को देखकर रोना, कलपना, हाय-तौबा मचाना प्रारम्भ कर देता है। जिससे उसका उपचार कठिन हो जाता है और दुःख बढ़ जाता है।
            अध्यात्म का दूसरा सिद्धान्त यह कहता है कि जो परमात्मा पूर्ण शक्तिशाली है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का संचालन व नियंत्रण करता है उसका एक अंश आत्मा के रूप में मानवीय सत्ता को संचालित करता है यही आत्मा अगर जाग्रत हो जाए तो बहुत कुछ सिद्ध हो जाता है अतः अपने आप को कभी भी कमजोर मत समझो अपितु यह भावना करो कि हमारी आत्मा आए हुए दुःखों संकटों का मुकाबला करने में पूर्ण सक्षम है। मन की काली परत आत्मा की शक्ति को दबाए रखती है काले बादल सूर्य की धूप को छिपा देते हैं जैसे-जैसे मन को पवित्र करने का प्रयास किया जाता है वैसे आत्मा प्रखर व तेजस्वी रूप में प्रकट होता है व व्यक्ति को सही ज्ञान, शक्ति एवं आनन्द प्रदान करती है। अतः आत्मशक्ति को जगाने के लिए सदा सन्मार्ग पर चलने का प्रयास करें। व अपना दिल छोटा कर हिम्मत न हारें।
            आध्यात्मिक उपचारों में अगला क्रम जप, ध्यान व स्तुति का आता है। उदाहरण के लिए हनुमान चालीसा, घी का दीपक जला कर पढ़े इससे व्यक्ति का मनोबल बढ़ता है व दिमाग, मस्तिष्क शान्त होता है व गलत विचारों से मुक्ति मिलती है। दूसरे क्रम में हम feel good प्रणायाम करें। अर्थात् श्वास खिचतें हुए यह भावना करे कि हमारा शरीर स्वस्थ बन रहा है। हमारे अन्दर ताकत आ रही है। हमें दिन-प्रतिदिन अच्छा महसूस हो रहा है। श्वास छोड़ते हुए भावना करें कि हमारे अन्दर की कमजोरी निराशा बाहर निकल रही है। इस प्रकार श्वास पर ध्यान व्यक्ति को बहुत राहत देता है। अन्य उच्चस्तरीय प्रयोगों में दोनों बोहों के बीच के स्थान पर अर्थात् आज्ञा चक्र पर उगते हुए स्वर्णिम सूर्य का ध्यान कर सकते हैं। इसके साथ-साथ गायत्री अथवा महामृत्युंजय मंत्र का जप भी कर सकते हैं। उगते हुए स्वर्णिम सूर्य के ध्यान से निराशाएॅं, पाप, कषाय, कल्मष सभी कुछ धीरे-धीरे करके हटने लग जाते हैं व जीवन स्वस्थ व आशावादी बनता है।
         प्रत्येक व्यक्ति के भीतर सतोगुण, रजोगुण व तमोगुण विद्यमान होता है जिसके द्वारा उसके दैनिक क्रियाकलाप व आचरण संचालित होता है।
      जब व्यक्ति के भीतर रजोगुण व तमोगुण बढ़ जाता है व सत्वगुण कम हो जाता है तो व्यक्ति के depression में जाने की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है। कई बार आध्यात्म के पथ पर चलनें वाले व्यक्ति भी इसकी चपेट में आ जाते है। इसका कारण होता है कि कई बार व्यक्ति के अवचेतन मन अथवा चित्त में रजोगुण व तमोगुण की परतें पड़ी होती है जो उसके पुरानें जन्मों के संस्कार स्वरूप बनती है इस जन्म में सात्विक सा दिखने वाला व्यक्ति जब कुण्डलिनी शक्ति के प्रभाव में आता है तो सर्वप्रथम यह शक्ति उसके भीतर की गन्दगी सतह पर ला फेंकती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे डॉक्टर चीरा लगाकर भीतर की पस को बाहर निकालता है। अन्यथा यह पस उसके लिए भविष्य में खतरनाक सिद्ध हो सकती है। कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होकर व्यक्ति के भोगों में शीघ्रता लाती है जिससे उसकी ईश्वर प्राप्ति सहज हो सकें।
         रजोगुण व तमोगुण की प्रधानता व्यक्ति के भीतर एक प्रकार का ऋणात्मक प्रभाव (negative effect) उत्पन्न करती है और व्यक्ति की उर्जा negative direction में बहनें लगती है। इससें व्यक्ति के भीतर हर समय नकारात्मक विचारों का कोहराम मचने लगता है और व्यक्ति बहुत अशांत व खिन्न रहने लगता है।
          यदि व्यक्ति के भीतर सतोगुण बढ़ा दिया जाए तो रोगी के नकारात्मक विचारों का घेरा धीरें-धीरें करके कमजोर पड़ता चला जाता है। उसके भीतर शांति व प्रसन्नता झलकने लगती है। सतोगुण की वृद्धि करके ही कोई व्यक्ति स्थायी शांति पा सकता है, परन्तु यह कार्य भी सरल नहीं है। तमोगुणी जड़ता, इन्द्रिय लोलुपता, दूसरे को व्यर्थ मे नुकसान पहुँचाने को भाव से जो घिरा होता है वह सहजता के इन विकारों से मुक्त नहीं हो पाता।
         इसी प्रकार रजोगुणी महत्वकाक्षाँए, पद प्रतिष्ठा, लोभ लालच व्यक्ति को अपने शिकंजे में उलझाए रखती है। व्यक्ति को धैर्यपूर्वक सतोगुण का संचय करना पड़ता है|

अध्यात्मिक उपचारों के साथ साथ हमें लौकिक उपचारों व आयुर्वेदिक चिकित्सा का भी सहारा लेना चाहिए। यदि समस्या अधिक बढ़ हुई है तो एलोपैथी उपचार लेने में भी संकोच नहीं करना चाहिए।
            लौकिक उपचारः- लौकिक उपचारों में सर्वप्रथम अपने विचारों को सृजनात्मक एवं सकारात्मक दिशा देना है। लौकिक उपचारों में हमारे विचारों का हमारे रोग पर बहुत प्रभाव पड़ता है। यदि हम यह सोचना प्रारम्भ कर दें कि रोग कभी ठीक नहीं हो पाएगा तो वैसी ही परिस्थितियाॅं बनती जाएॅंगी और यदि हम यह मान कर चले कि यदि आज खराब दिन है तो अच्छे दिन भी आएॅंगे जो दुःख आया है वह निश्चित रूप से कट जाएगा तो उसी प्रकार की परिस्थितियाॅं विनिर्मित होती चली जाएगी अतः हम भावना करे कि हम दिन-प्रतिदिन स्वस्थ सुदृढ़ शक्तिशाली बन रहे हैं।
            एक कीट होता है जिसे भृंगी कीट कहते हैं वह अपने अण्डे बच्चे नहीं देता बल्कि किसी भी अन्य छोटे कीड़े को अपने बिल में उठा लाता है और उस पर लम्बे समय तक भिन-भिनाता रहता है। वह कीड़ा चाहे किसी भी प्रजाति का हो परन्तु धीरे-धीरे करके भृंगी कीट में परिवर्तित हो जाता है। अतः यदि हम मनःस्थिति ऊॅंची बनाने का प्रयास करते रहेंगे तो निश्चित रूप से रोग की तीव्रता में कमी आएगी और जो दवाईंया नकारात्मक चिन्तन के कारण अपना असर नहीं दिखा पा रही है वो अपना असर दिखाने लगेंगी। एक छोटी सी घटना है एक बार एक राजा थे, उसका एक छोटा बेटा था दूर्भाग्यवश वह बेटा कुबड़ा था। राजा ने घोषणा करवाई जो भी उसे ठीक कर देगा उसे मुॅंह माॅंगा ईनाम दिया जाएगा। जगह-जगह से बहुत सारे चिकित्सक उसका ईलाज करने आए परन्तु कोई भी उसका कुबड़ापन दूर न कर सका। यह देख कर राजा निराश हो गया।
            उसी समय एक बुढ़ी माता राजा के पास आई। उसने उसके बेटे को ठीक करने का दावा किया। उस माता ने राजा को महल के आॅंगन में राजकुमार का पुतला लगवाने को कहा। यह भी माॅंग रखी कि पुतला हू-ब-हू राजकुमार जैसा होना चाहिए। पर उसमें किसी तरह का कोई कुबड़ापन न हो। वह पुतला बिना किसी अपाहिजता के कमर से सीधा खड़ा होना चाहिए। राजा ने ऐसा ही पुतला बनाने का आदेश दिया। पुतले को आॅंगन के बीचोंबीच खड़ा कर दिया गया। अब राजकुमार जब भी आॅंगन में खेलता, उसकी नजर पुतले पर पड़ती। धीरे-धीरे वह खुद को उस पुतले में देखने लगा। उसके विचार, भाव, सोच व प्रवृत्ति ने अवचेतन स्तर (sub-conscious level) पर खुद को उस पुतले में पहचानना शुरु कर दिया। वह पुतला जिसमें कोई कमी, कोई बीमारी नहीं है! जो सीधा खड़ा है! इस तरह समय बीतता गया।
            एक साल के अन्दर ही सभी को राजकुमार के शारीरिक ढाॅंचे में सुधार दिखाई देने लगा। ऐसे ही एक और साल बीत गया। अब राजकुमार के कुबड़ेपन का पूरी तरह इलाज हो चुका था। यह घटना बिल्कुल सिद्ध करती है कि मन की शक्ति का हमारे शरीर पर कितना गहरा असर होता है।
     व्यक्ति द्वारा किया गया प्रत्येक विचार दो प्रकार का होता है या तो सृजनात्मक या ध्वंसात्मक। हमे सदा प्रयत्नपूर्वक सृजनात्मक विचारों का चयन करना चाहिए। तभी हमारा भविष्य खुशियों से भर सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं, Depression से घिरा व्यक्ति इस दिशा में आगे बढ़ने में कई बार अपने आप को बहुत मासूम पाता है क्योंकि वह अपने विचारों को नियंत्रित करने में समर्थ नहीं होता। अपितु उल्टे विचार, उस पर हावी रहते हैं। फिर भी व्यक्ति को हार नहीं माननी चाहिए। अपनी ओर से अच्छे विचारों का घेरा बनाने का प्रयास अवश्य करना चाहिए। लौकिक उपायों के लिए भाग-2 में कुछ प्रकाश डाला गया है।
Appeal to Luminous Souls
            इस दिशा में मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सकों (Psychiatrists) व अनुभवी वैद्यों अथवा जनसामान्य से यह अनुरोध है कि हमारा मार्गदर्शन करें वो जो भी विचार सुझाव हमें देंगे उनको उनकी इच्छानुसार नाम, पता, फोन न. आदि समेत इस लेख के 2nd part के रूप में छाप (Publish) दिया जाएगा। हम अधिकतर कार्य निःस्वार्थ भाव से करते हैं व अच्छे व्यक्तियों का सदा सम्मान करते हैं। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकतावाली कहावत के अनुसार एक दिशा में कार्य करने वाले लोगों के समूह तैयार हों जो तन-मन-धन से उस समस्या के निवारण हेतू प्रयास करें।

            जैसे कि इस Article के पत्रक छपवाकर वितरित किए जा सकते हैं। अथवा E-Mail से इसको सभी तक भेजें। हम अपने किसी भी लेख का Copyright नहीं करते, युगऋषि श्रीराम आचार्यजी के आदर्शों का पालन करते हैं। व्यक्तिगत रूप से किसी से कुछ नहीं माॅंगते, श्रद्धा भाव से जो भी समाज का सहयोग मिलता है उसको स्वीकार करते हैं। इस दिशा में अधिक मार्गदर्शन के लिए हमारी दो पुस्तकें (सनातन धर्म का प्रसाद, साधना समर - चुनौतियाॅं एवं समाधान) पढ़ें व व्यक्तिगत परामर्श के लिए हमारे सहायक बन्धु श्री विशाल जी से फोन (Mob. 9354761220) पर सम्पर्क करें।

6 comments:

  1. very nice and useful account on depression

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  2. very nice and useful account on depression

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  4. इस लेख को पड़ कर बहुत ख़ुशी हुई और मन मैं उत्पन अवसाद की भावना मैं थोड़ी कमी आयी और सब से बड़ी बात की इस लेख को पड़ने के बाद ध्यान अब अध्यात्म की और बड़ा है और मुझे अपने परमात्मा के ऊपर विश्वास होने लगा जिसने हमें अपने सब से सुन्दर रचना के रूप मैं इस पृथवी पर भेजा है हमें सब चीज़ों को ख़ुशी से अपनाना चाहिए

    आपका हार्दिक धन्यवाद

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