Sunday, June 23, 2013

दुर्योधन द्वारा श्रीहरि को बाँधने का दुस्साहस

भगवान श्रीहरि अपने कृष्णावतार में शांतिदूत बनकर कौरव सभा में गए उद्देश्य यही था कि महाभारत का महाविनाश रुक जाए सभी प्रेम से रह सकें, लेकिन अभिमानी दुर्योधन ने उन्हें बाँधने की ठान ली तब कौरव सभा में भगवान ने दिखाया अपना विराट स्वरूप महाभारत के इस अंश का काव्यस्वरूप प्रदान किया है महाकवि दिनकर ने, जो पठनीय, मननीय और चिंतनीय है -
हरि ने भीषण हुंकार किया,
      अपना स्वरूप विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
      भगवान कुपित होकर बोले
जंजीर बढ़ाकर साध मुझे,
      हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे
यह देख, गगन मुझमें लय है,
      यह देख पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन संसार सकल,
      मुझ में लय है संसार सकल
अमरत्व फूलता है मुझमें,
      संहार झूलता है मुझमें
उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
      भूमंडल वक्षस्थल विशाल
भुजपरिधि बंध को घेरे हैं,
      मैनाक मेरु पग मेरे हैं
दिपते जो यह नक्षत्र निकर,
      सब हैं मेरे मुख के अंदर
दुग हों तो दृश्य अकांड देख,
      मुझमें सारा ब्रह्यांड देख,
चर-अचर-जीव,जग,क्षर-अक्षर,
      नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर
शतकोटि सूर्य, शतकोटि चंद्र,
      शतकोटि सरित, सर-सिंधु, मंद्र
शतकोटि विष्णु ब्रह्य महेश,
      शतकोटि विष्णु, जलपति, धनेश,
शतकोटि रुद्र, शतकोटि काल,
      शतकोटि दंडधर लोकपाल
जंजीर बढ़ाकर साध इन्हें,
      हाँ, हाँ दुर्योधन ! बोध इन्हें
भूलोक, अत्तल, पाताल देख,
      गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि सृजन,
      यह देख महाभारत का रण
मृतकों से पटी हुर्इ भू है,
      पहचान, कहाँ इसमें तू है
अंबर में कुंतल जाल देख,
      पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
      मेरा स्वरूप विकराल देख
सब जन्म मुझी में पाते हैं,
      फिर लौट मुझी में जाते हैं
जिà से कटती ज्वाल सघन,
      साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,
      हँसने लगती है सृष्टि उधर
मैं जभी मूँदता हँू लोचन,
      छा जाता चारों ओर मरण
बाँधने मुझे तो आया हैं,
      जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
      पहले तो बाँध अनंत गगन
सूने को साध सकता है,
      वह मुझे बाँध कब सकता है?
      कौरव सभा में भगवान ने अपना यह विराट रूप दिखाया अवश्य, पर सब उसे देख सके महात्मा विदुर, महात्मा भीष्म को ही यह सौभाग्य मिल सका, बाकी तो बेहाश हो गए हाँ, धृतराष्ट्र ने अवश्य इसे देख पाने के लिए कृपा की भीख माँग ली और देख पाए श्रीमद्भगवद्गीता का यह एकादश अध्याय भगवान के उसी विश्वरूप, विराट स्वरूप का साक्षात्कार कराता है उसी की तत्त्वकथा कहता है।  

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