Friday, June 7, 2013

Sex Rules for Married Life part-1 (वैवाहिक जीवन में काम विज्ञान )

प्राचीन काल में वातावरण पवित्र था। व्यक्ति अपने जीवन के आरम्भिक  25  वर्ष ब्रह्मचर्य आश्रम में पूर्ण संयम के साथ बिताता था। उस समय उसकी जीवन शक्ति शारीरिकमानसिक व आत्मिक विकास में खपती थी। 25  वर्ष के आसपास ही व्यक्ति को यौन उत्तेजना अथवा यौन आकर्षण का अनुभव होता था। परन्तु आज का विद्यार्थी वर्ग 20 वर्ष की आयु तक भी बड़ी कठिनाई से स्वयं को यौन उत्तेजनाओं से रोक पाता है। क्योंकि वातावरण में इतनी अश्लील सामग्री व कामुकता भरी पड़ी है कि कोई भी सरलता से उसकी चेपट में आ जाता है। पहले ऐसा नहीं होता था। 25  वर्ष की आयु के उपरान्त ही प्राकृतिक रूप से उसको यौन उत्तेजना के अनुभव होता था। इस कारण व्यक्ति शारीरिक, मानसिक व आत्मिक रूप से इतना सुदृढ होता था कि उसकी गृहस्थ आश्रम में कोई कठिनाई नहीं आती थी। वह अपनी इच्छानुसार गृहस्थ जीवन में काम कला का आनन्द लेता था।

कमजोर के साथ कठिनाई यह है कि उसको उत्तेजना तो बार-बार होगी पर सुख एंव तृप्ति का अनुभव कम होगा। जैसे यदि व्यक्ति को बढि़या भूख लगे व दो बार दिन में खाए तो स्वस्थ रहेगा,  भोजन स्वादिष्ट लगेगा एंव सुख व तृप्ति का अनुभव होगा। परन्तु हमने सब कुछ विकृत कर डाला। बार-बार खाते है बिना भूख लगे खाना मजबूरी बन गया है अन्यथा बात विकार या कमजोरी महूसस देती है। खाने का पाचन बढि़या नहीं होता। रस रक्त शुद्ध नहीं बनता एंव व्यक्ति किसी न किसी रोग से पीडि़त रहता है।


यही समस्या व्यक्ति के यौन के सम्बन्ध में भी है। उसकी वीर्य धातु स्वप्न दोष अथवा हस्तमैथुन के कारण कमजोर हो गयी है। यदि वीर्य धातु साल छः माह कमजोर रह जाए तो शरीर में कोई न कोई विकार घेर लेता है। जैसे नेत्र का चश्मा लगाना,  बाल सफेद होना अथवा रीढ़ व मस्तिष्क का कमजोर होना। इसका दृश्परिणाम व्यक्ति को  जीवन भर भुगतना पड़ता है। यदि व्यक्ति का 25  वर्ष का जीवन संयमित रहे तो वैवाहिक जीवन भी स्वतः संयमित व प्रकृति के अनुरूप चलेगा। इस लेख के लिखने की अधिक आवश्यकता नहीं होगी। परन्तु यौन शिक्षा की आवश्यकता इसलिए पड़ती है क्योंकि हमारे जीवन के हर पहलू पर कृत्रितमता घुस पड़ी है।


गृहस्थ आश्रमः

25  वर्ष से 50  वर्ष की आयु तक गृहस्थाश्रम होता है। यदि ब्रह्मचर्य आश्रम दृढ़़तापूर्वक नियमानुसार पूर्ण हुआ है तो गृहस्थाश्रम बड़ा ही आनन्ददायी होगा परन्तु यदि व्यक्ति ब्रह्मचर्य आश्रम से कोई कुसंस्कार  दुर्गुण अपने साथ ले आए (जिस कारण उसका सुमुचित विकास नहीं हो पाए) तो यही गृहस्थाश्रम नरक बन जाता है। पति-पत्नी के बीच तनाव, दुर्बल सन्तानें, धन का अभाव, भांति-भांति के रोगों से ग्रस्त मानव की कीड़े-मकोड़ों की भांति दुर्गति होती है। इसी को देखकर गोस्वामी तुलसीदास जी को कहना पड़ा-

‘‘ईश्वर अंश जीव अविनाशीचेतन अमल सहज सुखराशि।

सो माया बस बंधऊ गोसाईफंस्यो कीट मरकट की नांई। 
जीव ईश्वर प्रदत्त अनेक क्षमताओं विभूतियों से सम्पन्न होने पर भी कैसे माया (अज्ञानता) के वश होकर अपनी दुर्गति कराता है। इसी माया (अज्ञानता) के निराकरण के लिए ब्रह्मचर्य आश्रम में धर्म का ज्ञान आवश्यक होता है। शिक्षा भले ही बहुत उच्च हो या निम्न परन्तु धर्म के सूत्रों को प्रत्येक विद्यार्थी के आचरण में घोल दिया जाता था। आज न तो पढ़ा-लिखा सुखी है न ही अनपढ़ क्योंकि धर्म की शिक्षाओं को आचरण में लाने का अभ्यास किसी ने अपने ब्रह्मचर्य आश्रम में ही नहीं किया।

गृहस्थ आश्रम तक आते-आते स्वभाव परिपक्व होने लगता है। अतः स्वभाव में परिवर्तन लाना अब बहुत कठिन जान पड़ता है। गृहस्थाश्रम में धनोपार्जन करना, भोगों की अतृप्ति को दूर करना दो ही मुख्य कार्य हैं। विवाहोपरान्त अपनी गृहस्थी को आश्रम के नियमानुसार चलाने का प्रयास करना चाहिए।

विवाह के तुरन्त पश्चात् सन्तानोत्पत्ति की शीघ्रता नहीं करनी चाहिए एक वर्ष तक पति-पत्नी को आपसी समझ व एक दूसरे के साथ तालमेल बैठाने का प्रयास करना चाहिए। इस एक वर्ष में दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित हो जाता है व काम वासना का दबाव भी हल्का हो जाता है। वैदिक काल में स्थिति दूसरी थी। पत्नी स्वयं अपने से श्रेष्ठ वर का चयन करती थी और उसके लिए अपना सर्वस्व समर्पण कर देती थी। इसे ही पतिव्रत धर्म की संज्ञा दी जाती थी। यह पतिव्रत धर्म नारियों के लिए बहुत शक्तिशाली व तप स्वरूप हुआ करता था क्योंकि वो अपनी समस्त इच्छाओं का त्याग करते हुए पति की इच्छा के अनुरूप अपने जीवन का उत्सर्ग कर देती थी। इस पतिव्रत धर्म के पालन से उन्हें समस्त ऋद्धिया-सिद्धियां मिल जाती थी परन्तु इसका बहुत दुरुपयोग हुआ। विकृति काल (मुगल व अंग्रेज काल) में आदमियों में अहंकार बढ़ता गया और उन्होंने नारियों को दबाना व प्रताडि़त करना प्रारम्भ कर दिया। वैदिक काल में यदि नारियां त्याग करती थी तो षुरुष उनका सम्मान करता था। मनु जी कहते है- 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।' आज स्थिति वैसी नहीं है। षुरुष वर्ग नारी वर्ग को कमजोर समझकर लगातार सताता है अतः आज पतिव्रत धर्म के स्थान पर 'मित्रवत धर्म' का सिद्धान्त लाना अधिक उपयोगी रहेगा। पति व पत्नी दोनों में प्रगाढ़ मित्रता स्थापित हो जानी चाहिए। समर्पण में एक को प्रधान माना जाता है दूसरे को गौण परन्तु मित्रता में दोनों बराबर होते हैं।

विवाह के पश्चात् दो-तीन माह तो वासना पूर्ति के उद्देश्य से ही निकल जाते हैं। तत्पश्चात् एक दूसरे के व्यवहार, इच्छाओं, भावनाओं में तालमेल बैठाकर एक वर्ष तक अच्छे मित्र बन जाने चाहिएं। पति और पत्नी में मित्रता (understanding) जितनी अच्छी होगी दाम्पत्य सुख व सन्तानोत्पत्ति में उतनी ही सफलता मिलेगी। एक वर्ष पश्चात् वासना का दबाव सीमित होने लगे तब सन्तानोत्पत्ति की ओर विचार करना चाहिए। सन्तानोत्पत्ति के लिए जब उचित मानस तैयार हो जाए तभी सन्तानोत्पत्ति करनी चाहिए इससे गर्भ में ऊंची व सशक्त आत्मा आती है। यदि एक वर्ष में पति पत्नी में मित्रवत सम्बन्ध स्थापित होने के स्थान पर कटु सम्बन्ध बनने लगे तो सन्तानोत्पत्ति का विचार छोड़ देना चाहिए। पहले सम्बन्धों को अच्छे बनाने का ही प्रयास करना चाहिए। जहां अच्छे सम्बन्ध नहीं होते वहां सन्तान के दुर्बल,  रुग्ण व कुसंस्कारी होने के अवसर बढ़ जाते हैं इससे तो अच्छा निःसन्तान रहना है क्योंकि ऐसी संतान पूरे जीवन दुःख ही देती हैं। ऐसे बहुत सारे परिवार हैं जिनमें पति-पत्नी के बीच अधिकतर तनाव रहता है उनके बच्चों में जन्म से ही हृदय में छेद, न्यूरल विकृत्तियां, निमोनियां, पैर चपटे (flat foot) मासंपेशियों की कमजोरी से सम्बन्धित रोग पाए जाते हैं जिससे रात-दिन चिकित्सकों के चक्कर काटते-काटते ही सारा समय व धन नष्ट हो जाता है।

इस तरह की समस्याएं न उत्पन्न हों, पति-पत्नी व संतानों का जीवन नरक न बने इसके लिए प्रारम्भ से ही ध्यान रखा जाना चाहिए। ऐसे जोड़ों का चयन किया जाए जिनकी विचारधारा में समानता हो। आजकल समाज में धन और जाति बस दो ही बात देखी जाती हैं विचारधारा की समानता की ओर कम ही ध्यान दिया जाता है जबकि सफल गृहस्थ जीवन के लिए विचारधारा में समानता होना अति महत्वपूर्ण है। प्राचीनकाल में चार जातियां होती थी- ब्राह्मण,  क्षरित्र, वैश्य, शुद्र। ये जातियां वास्तव में विचारधाराएं ही थी। सन्तानोत्पत्ति के लिए किन मर्यादाओं का पालन किया जाना चाहिए इसका वर्णन पुंसवन संस्कार में किया जा चुका है।

पहले तो सहवास का क्या क्रम होना चाहिए गृहस्थाश्रम में। इसके लिए शास्त्रों में कुछ नियम दिये हैं जैसे मासिक धर्म के समय पर सहवास नहीं करना चाहिए क्योंकि इस समय नारी के शरीर की स्थिति नाजुक होती है व शरीर के विकारो का निष्कासन होता है। इस समय सहवास करने से नर व नारी दोनों के शरीर में रोगों व गर्मी बढ़ने की सम्भावना सर्वाधिक रहती है। इसी प्रकार सहवास के लिए आयुर्वेद में एक श्लोक आता है-

              "सेवेत कामतः कामं तृप्तोवाजीकृतां हिमे।
              त्र्यहाद्वसन्त शरदो पक्षाद् वर्षानिदाधयो।।"
शीतकाल में उत्तम वाजीकारक औषधियों से तृप्त और बलवीर्य से पृष्ट शरीर वाला मनुष्य इच्छानुसार काम का सेवन करे। वसन्त और शरद ऋतु में तीन दिन छोड़कर और वर्षा व ग्रीष्म ऋतु में 15 दिन में एक बार काम का सेवन करे।

यह श्लोक बताता है कि आयुर्वेद के अनुसार कितने अन्तर से सहवास करना चाहिए। सामान्यतः आजकल के शरीर के अनुसार शरद व बसन्त ऋतु में हफ्ता-दस दिन में एक बार व ग्रीष्म व वर्षा ऋतु में दस-पन्द्रह दिन में एक बार सहवास करना चाहिए। इच्छानुसार सहवास अथवा तीन दिन में सहवास करना तभी सम्भव है जब वाजीकारक औषधियों का सेवन किया जाए। यह सेवन बहुत कम लोगों के द्वारा ही किया जा सकता हैक्योंकि जो लोग बहुत शारीरिक कार्य (physical work)  करते हैं वो वाजीकारक औषधियों को प्रबन्ध नहीं कर पाते जैसे- शतावर,  विधारा,  अश्वगन्धा आदि। 

जो लोग बहुत मानसिक कार्य करते हैं वो धनवान होते हैं परन्तु वाजीकारक औषधियों के पाचन की क्षमता उनके पास नहीं होती। कम ही वर्ग ऐसा है कि जो कठिन शारीरिक श्रम भी करता हो व धनवान भी हो।

ऐसा न करने पर परिणाम क्या होंगे इसका उत्तर भी अगले ही श्लोक में इस प्रकार दिया गया है-

                 "भ्रम क्लमोरूदौर्बल्य बल धात्विन्द्रिय क्षयाः।
             अपर्वमरणं च स्यादन्यथागच्छतः स्त्रियम्।।"
            उपर्युक्त विधि पालन न करने से भ्रम,  क्लम,  जांघों में निर्बलता, बल व धातुओं का क्षय, इन्द्रिय में निर्बलता और अकाल मृत्यु- ये परिणाम होते हैं।               
और यदि इस विधि का पालन किया जाए तो-
                 "स्मृति मेधाऽऽपुरातोग्य पुष्टीन्द्रिय यशोबलैः।
             अधिकामन्दजरसौ भवन्ति स्त्रीषु संयता।।
      स्त्रियों के विषय में संयमी पुरुष याददाश्त,  बुद्धि, आयु, आरोग्य, पुष्टि, इन्द्रिय शक्ति,  शुक्र,  यश और बल में अधिक होता है और बुढ़ापा उसको देर से आता है। सक्षम,  सशक्त,  नियम-संयम वाला पृष्ट शरीर का व्यक्ति अपनी साधारण रूप रंग वाली पत्नी के साथ भी सन्तुष्ट और सुखी रह सकता है। इसके विपरीत बल पौरुषहीन व्यक्ति के लिए स्वप्न सुन्दरी जैसी रूपवती स्त्री भी किसी काम की नहीं। अतः स्वास्थ्य व बलवीर्य रूपी अपनी पूंजी का ठीक-ठीक नियोजन करना चाहिए। बैंक बैलेन्स ठीक रखकर,  बैलेन्स को देखते हुए ही चेक काटना चाहिए वरना चेक डिसआनर होंगे और व्यक्ति की इज्जत दो कौड़ी की होकर रह जाएगी। यदि स्त्री को यौन संतुष्टि नहीं मिल पाती तो स्त्री उस पुरुष से घृणा करने लगती है। यह अलग बात है कि वह अपनी घृणा प्रकट न कर पाए और मानसिक कुण्ठा से ग्रस्त होकर चिड़चिड़ी,  उदासीन,  विरक्त,  अरसिक,  सिरदर्द,  हिस्टीरिया,  चक्कर आदि व्याधियों से ग्रस्त हो जाए। अनिद्रा और विरक्ति की स्थिति का शिकार हो जाए। बहुत ही कम पत्नियां ऐसे स्वभाव की होती हैं जो ऐसी स्थिति को आसानी से सहन कर पाती हैं।
सनातन धर्म कहता है कि माँ बालक की प्रथम गुरु होती है जो संस्कार वह गर्भ में बालक को देती है वह जीवन पर्यत अमिट रहते हैं। कहते हैं कि अभिमन्यु ने चक्रव्यूह तोड़ना माँ के गर्भ में सीख लिया था, परन्तु जब अर्जुन अपनी पत्नी को चक्रव्यूह से बाहर निकलना समझा रहे थे तब सुभद्रा को नींद आ गयी थी इस कारण अभिमन्यु वह नहीं सीख पाए। आज के वैज्ञानिक भी यह मानते है कि गर्भ में बच्चे की ग्राह्य शक्ति बहुत ही तीव्र होती है। इस कारण बच्चा गर्भ में जो भाव ग्रहण कर लेता है वह जीवन भर उसके ऊपर हावी रहते हैं।

माँ जो संस्कार बच्चे को देना चाह रही है पिता को उसमें सहयोग देना चाहिए। पहले माता-पिता दोनों को मिलकर यह निश्चित करना चाहिए कि उन्हें कैसी सन्तान चाहिए। सन्तानोत्पत्ति के पूर्व जैसी मनोभूमि बनाकर रखें उसी प्रकार की आत्मा उनकी मनोभूमि से आकर्षित होकर गर्भ में प्रवेश करेगी। यह बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है जिसको आजकल नजरंदाज किया जाता है। इसी कारण अधिकांश परिवार अपने बच्चों की करतूतों से दुःखी रहते हैं जिसकी सारी जिम्मेदारी माँ-बाप के ऊपर आती है, परन्तु अब पछताए क्या होत है जब चिडि़याँ चुग गई खेत।"  यह कहावत चरितार्थ होती है।
from Sanatan Dhram ka Prasad (Page No. 219)

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