Monday, October 14, 2013

युग ऋषि श्री राम जी की हिमालय यात्रा -1

विगत अंक में अपने पढ़ा कि परमपूज्य गुरुदेव देवात्मा हिमालय के अज्ञातवास के क्रम में सुमेरु पर्वत की तलहटी तक जा पहँुचे। मार्ग में उन्हें एक योगी मिले और उनके साथ चर्चा करते-करते वे एक झोंपड़ी तक जा पहँुचे। यहाँ उनकी भेंट अपने एक पूर्व शिष्य निखिल से हुर्इ, जिसने योग-साधना के माध्यम से अपने पार्थिव शरीर को अदृश्य करके दिखाया। पूज्य गुरुदेव ने उसको प्रोत्साहित करते हुए कहा कि इन विभूतियों को जीवन लक्ष्य मानना, साधना का उद्देश्य जीवनमात्र की सेवा ही है। इसके उपरांत गुरुवर तपोवन पहँुचे, वहाँ उनकी भेंट महावीर योगी से हुर्इ, जिन्होंने सात जन्मों में सात चक्रों के जागरण का वृत्तांत सुनाया। आइए पढ़ते हैं इसके आगे का विवरण.....
गुरुभार्इ का सान्निध्य
 उस योगी को आचार्यश्री ने वीरभद्र नाम दिया था। नाम इसलिए देना पड़ा कि वह अपना कोर्इ परिचय नहीं दे रहा था। पूछने पर यही कहता था कि गुरुदेव ने यहाँ भेजा है। अपने साथ लिवा लाने के लिए। इस बार वे नंदनवन में नही है। पिछली बार मार्गदर्शक सत्ता के जिस प्रतिनिधि ने मार्गदर्शन दिया था, उसका नाम वीरभद्र ही था। पिछली यात्रा में जिस वीरभद्र का सान्निध्य मिला था, वह मौन ही रहा था। उसे वीरभद्र के रूप में ही पहचाना था। अभी आए गुरुभार्इ को भी आचार्यश्री ने इसी नाम से पुकारा। उसी से पता चला कि गुरुदेव कैलास मानसरोवर के मार्ग में मिलेंगे। उससे बातचीत करते हुए आचार्यश्री को लग रहा था कि रास्ते में गुरुभार्इ से हिमालय के बारे में कर्इ नर्इ जानकारियाँ मिल सकती हैं। आचार्यश्री ने जब पहली बार वीरभद्र कहकर पुकारा तो उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। आचार्यश्री ने कहा- ‘‘मैं गुरुदेव को भगवान शंकर के रूप में देख रहा हँू। आप उनके गण या संदेशवाहक हैं। भगवान शंकर के गण तो वीरभद्र ही कहे जाते हैं न।’’
सुनकर योगी चुप रह गए। योगी तपोवन से ही साथ हो लिया था। उसके आने से पहले संकेत आने लगे थे कि आगे का मार्ग दुर्गम है। मर्इ, जून के महीने थे। मौसम थोड़ा सुहाना और शीतोष्ण हुआ था। मैदान जैसी गरमी तो नहीं थी, लेकिन हिमालय में रहने वाली शीतकाल जैसी सरदी भी नहीं थी। उस समय चारों ओर हरियाली छार्इ हुर्इ थी। आचार्यश्री के मन में इच्छा जागने लगी कि कुछ दिन यहाँ रहा जाए। योगी ने उसे निरस्त किया और कहा नंदनवन में ज्यादा समय लगेगा। आचार्यश्री ने उस योगी से अपने बारे में कुछ बताते चलने का अनुरोध किया। आशय यह था कि इससे रास्ता आसानी से कट जाएगा। वीरभद्र ने स्पष्ट मना कर दिया कि अपना जैसा कुछ रहा नहीं है। उसके बारे में बताने लायक भी कुछ नहीं है।
आचार्यश्री ने कहा-’’अपने निज के बारे में भले ही बताएँ। गुरुदेव के सान्निध्य में हुए लाभ और अनुभूतियों के बारे में ही बताते चलें। मुझे उनका प्रत्यक्ष सान्निध्य दो-तीन दिन के लिए ही मिला है। आप बड़भागी हैं। आपको उनका सान्निध्य प्राय: मिलता रहता है।’’ योगी ने आचार्यश्री की बात का खंडन किया। हिमालय के सिद्ध क्षेत्र में रहने से साधना में थोड़ी अनुकूलता रहती है। संसार क्षेत्र जैसे व्यवधान इधर नहीं आते। वहाँ के सिद्ध वातावरण का लाभ भी मिलता है, लेकिन प्रत्यक्ष सान्निध्य जैसे मोह से बचना पड़ता है। योगी का आशय था कि गुरुदेव का सान्निध्य उसे भी यहाँ बहुत सुलभ नहीं रहा है।
आचार्यश्री ने कहा कि गुरुदेव का संदेशवाहक बनकर आप बहुत सौभाग्यशाली सिद्ध हुए हैं। योगी ने कहा कि इस तरह तो श्रीराम तुम मेरी और मुझ जैसे हजारों शिष्यों की तुलना में लाख गुना ज्यादा सौभाग्यशाली हो। तुम्हें तो गुरुदेव ने लाखों, करोड़ों लोगों के लिए अपना संदेशवाहक चुना है। आचार्यश्री के पास वीरभद्र के इस उत्तर का कोर्इ प्रत्युत्तर नहीं था।
सुमेरु पर्वत की सीमा पार हो चुकी थी। वरुण वन शुरू हो गया था। वहाँ की मिट्टी नम थी, कहीं-कहीं इतनी गीली कि कीचड़ सी लगने लगती थी, लेकिन इस वन में वनस्पतियाँ बहुत थी। देखकर आचार्यश्री को नंदनवन याद हो आया। चौखंभा शिखर दूर से ही दिखार्इ दिया। कहते हैं कि पांडवों ने यहीं से स्वर्गारोहण किया था। इसी तरह का एक शिखर तिब्बत के पास भी है। योगी ने बताया कि हिमालय में इस तरह के शिखर, सरोवर और पर्वतों की भरमार है।
योगी के साथ चलते हुए शाम ढलने लगी। तपोवन की सीमा जहाँ समाप्त होती थी, वहीं गौरी सरोवर था। मान्यता है कि पार्वती यहाँ सरोवर रूप में विराजती हैं। पर्वत को शिव का रूप मानते हैं। गंगा ग्लेशियर के सहारे-सहारे आगे बढ़े़। कुछ मील चलने पर एक झील दिखार्इ दी। उस झील किनारे दो संन्यासी ध्यान लगाए बैठे थे। वस्त्र के नाम पर उन्होंने विचित्र तरह का कौपीन पहना हुआ था। वह पत्तों और वृक्ष की छालों से बना था। कारीगरी इतनी बारीक थी कि तपस्वियों को उसके लिए समय निकालने की बात नहीं सोची जा सकती थी। इस तरह के वस्त्र किन्हीं श्रद्धालुओं या आस-पास कोर्इ बस्ती हो तो वहाँ के लोगों ने ही दिए होंगे। चौखंभा शिखर के पास से गुजरते हुए दूर कुछ झोंपड़ियाँ दिखार्इ दीं। समतल मैदान वहाँ नहीं था। झोंपड़ियाँ बनाने के लिए समतल मैदान का उपयोग किया गया था।
‘‘किसी समय यहाँ एक बड़ा गाँव था सैंकड़ों साल पहले। तब यहाँ सिद्ध साधक रहते थे। अब उनके वंशज रहते हैं।’’ साथ चल रहे योगी ने बताया कि इस गाँव में होते हुए चलना चाहिए। उस गाँव का नाम था कलाप यह नाम क्यों पड़ा? आचार्यश्री के मन में प्रश्न तो उठा, लेकिन उसमें ज्यादा उलझे नहीं। योगी ने कह दिया था कि गाँव हजारों वर्ष पुराना है। महाभारत के समय भी यहाँ सिद्ध पुरुषों का वास था। धृतराष्ट्र ने इसी क्षेत्र में आकर उग्र तप किया था और परमधाम गए थे। भागवत में यहाँ सिद्धों, ऋषियों और तापस महात्माओं के सत्र लगने का उल्लेख आता है।
योगी के साथ आचार्यश्री ने कलाप ग्राम में प्रेवश किया। वे सीमा पर ही थे कि तीव्र प्रकाश की अनुभूति हुर्इ। दिन का समय था। सूर्य का प्रकाश होना स्वाभाविक ही था, लेकिन दिखार्इ दे रहा प्रकाश आभायुक्त था, जैसे किसी स्वर्ण नगरी में पहँुच गए हों। गाँव में प्रेवश करते ही वल्कल पहने योगी, कौपीन धारण किए बटुक और घुटे हुए सिर के संन्यासी दिखार्इ दिए थे। ये सभी लोग स्वस्थ थे। प्रत्येक की आयु में बाल, युवा और वृद्ध जैसा अंतर था, लेकिन शरीर सभी के सक्रिय और सक्षम थे।
कलाप का अद्भुत लोक
गाँव में गुलाब की भीनी-भीनी सुगंध व्याप्त थी। लगता था जैसे किसी उद्यान में गए हों। जहाँ-तहाँ सुगंधित फूलों के पौधे लगे थे। झाड़ियाँ भी थीं और क्यारियाँ भी। उपवननुमा इस बस्ती में कहीं-कहीं हवन कुंड बने थे। कुछ संन्यासियों को एक जगह बैठा देखकर योगी और आचार्यश्री रुके। सबसे बुजुर्ग दिखार्इ दे रहे उन संन्यासियों में से एक ने हाथ उठाकर आचार्यश्री को आशीर्वाद दिया।
उस संन्यासी का नाम सत्यानंद था। अपने बारे में वे बताने लगे कि पिछले साठ वर्षों से यहाँ निवास कर रहा हँू। महायोगी त्र्यंबक बाबा ने मुझे यहाँ दीक्षा दी थी और साधन मार्ग की शेष यात्रा यहीं पूरी करने के लिए कहा था। तब से कलाप ग्राम छोड़कर कहीं और जाना नहीं हुआ। अपनी बात बीच में रोककर सत्यानंद आचार्यश्री से पूछने लगे-’’तुमने भागवत शास्त्र में कलाप ग्राम का उल्लेख पढ़ा है ?’’
आचार्यश्री ने सिर हिलाकर हाँ कहा। सत्यानंद फिर कहने लगे-’’उसके दशम स्कंध में नारद आदि ऋषियों के यहाँ आने और सृष्टि के बारे में विचार करने का उल्लेख आता है। पृथ्वी पर जब भी कार्इ संकट आता है या बड़े परिवर्तन आते हैं तो सिद्ध संत यहाँ मिल बैठते और सूक्ष्मजगत में संतुलन लाने के लिए विचार करते हैं।’’
सत्यानंद ने कहा-’’यह अकेला स्थान नहीं है। अवलोकित क्षेत्र, सिद्धाश्रम, ज्ञानगंज, कैलास और संबोधि भूमि इसी तरह के केंद्र हैं। इनके अलावा और क्षेत्र भी होंगे। उनके संबंध में मुझे विशेष जानकारी नहीं है।’’ अपने गुरु त्र्यंबक बाबा के बारे में सत्यानंद ने बताया कि उनके कर्इ नाम हैं- महामुनि बाबा, महायोगी, शिवबाबा। प्रसिद्ध योगी श्यामाचरण लाहिड़ी ने उनके लिए महावतार बाबा का श्रद्धापद चुना। अब वे इसी नाम से जाने जाते हैं। सन् 1883 में सर्वसाधारण के सामने उनका थोड़ा सा परिचय आया। सत्यानंद को अपने गुरु के संबंध में अलग ही तरह का अनुभव हुआ था।
सत्यानंद को बचपन से ही धुन सवार थी कि जीवन को परमसत्य की खोज में ही व्यतीत करना है। परंपरा के अनुसार आयु के तेरहवें वर्ष में यज्ञोपवीत हुआ और तभी से नियमित संध्या गायत्री का जप और पूजा-पाठ करने लगा। यज्ञोपवीत संस्कार के डेढ़ साल बाद उन्हें मलेरिया बुखार हुआ। उस समय मलेरिया का कोर्इ इलाज ढूँढा नहीं जा सका था। सत्यानंद की हालत दिनोदिन खराब होती गर्इ। डॉक्टर ने बचने की उम्मीद छोड़ दी। कह दिया कि रोगी जो भी खाना चाहे, खाने दें। जैसे रहना चाहे, रहने दें। परहेज और इलाज से कोर्इ फायदा नहीं होगा। घर के लोग रोने-पीटने लगे। सत्यानंद तब अर्द्धचेतन अवस्था में थे। वे भी अपने जीवन से निराशा हो गए थे। सिरहाने बैठी माँ भगवद्गीता का पाठ सुनाने लगी। उस अवस्था में ही सत्यानंद ने अनुभव किया कि एक कन्या सिरहाने बैठी है और कह रही है कि आप चिंता करें, आापका मृत्यु योग टल गया है।
कन्या सत्यानंद के सिर पर हाथ भी फेरती जा रही थी। उसके हाथ फेरने के कुछ क्षण बाद ही बुखार उतरने लगा, घरवालों के चेहरे पर प्रसन्नता खिलने लगी। तीन दिन में ज्वर पूरी तरह ठीक हो गया। डाक्टरों ने देखा तो उन्हें भी आश्चर्य हुआ। सत्यानंद को बाद में बोध हुआ कि रुग्ण अवस्था में उन्हें दर्शन देने और ढाढ़स बँधाने वाली शक्ति कोर्इ और नहीं स्वयं वेदमाता गायत्री ही थीं। इस घटना के बाद सत्यानंद ने आगे पढ़ना छोड़ दिया, उस वर्ष की परीक्षा भी नहीं दी। विद्यालय या शिक्षा अधिकारियों की ओर से कोर्इ रुकावट नहीं थी। सत्यानंद का नही नहीं हुआ कि परीक्षा दें। वैराग्य जाग गया और सात-आठ महीने बाद हिमालय की ओर निकल गए। त्र्यंबक बाबा ने यहीं दर्शन दिए। उन्हीं के दिए संकेतों के आधार पर कलाप ग्राम पहुँचे और इसे अपनी साधना-भूमि बनाया।
बस्ती में शांति व्याप्त थी, लेकिन वह शांति सन्नाटे का प्रतिरूप नहीं थी। उसमें उल्लास का पुट था। गाँव में पैंतीस-चालीस कुटियाएँ थीं। प्रत्येक कुटिया में एक साधक परिवार था। परिवार का अर्थ गुरु और उनके शिष्य से है। सत्यानंद ने स्वयं कहा और भागवत का उल्लेख भी किया। द्वापर के अंत में आसुरी आतंक बढ़ने लगा और सत्ता की होड़ में नीति-अनीति, पुण्य-पाप, धर्म-अधर्म का भेद भुलाया जाने लगा। स्वार्थ और आपा-धापी ने मनुष्य को नरपिशाच बना दिया तो कलाप ग्राम में मुनियों का सत्र आयोजित हुआ। उसमें नारद, व्यास, मैत्रेय, जमदग्नि, गौतम आदि ऋषियों ने अपने समय की समस्याओं पर गहन विचार किया। पृथ्वी पर र्इश्वरीय चेतना से हस्तक्षेप की रूपरेखा बनार्इ और सृष्टि का संरक्षण, पोषण करने वाली दिव्य चेतना को स्थूल रूप में व्यक्त होने के लिए मनाया गया।
सत्यानंद ने कहा कि कृष्णावतार या उससे भी पहले राम, परशुराम आदि अवतारों को सृष्टि में संतुलन के लिए दैवी हस्तक्षेप के रूप में ही समझना चाहिए। ऐसा हस्तक्षेप जिसे ऋषिस्तर की चेतनाएँ आमंत्रित करती हैं। उस चर्चा के बाद योगी और आचार्यश्री कलाप ग्राम से बाहर निकले और आगे की यात्रा पर निकल पड़े। यह यात्रा पैदल ही हो रही थी। कहीं ऊँची चढ़ार्इ चढ़नी होती तो कहीं उतार होता। ì-खाइयों से बचने के लिए पर्याप्त सावधानी आवश्यक थी। आचार्यश्री को इसकी चिंता नहीं थी। मार्गदर्शक सत्ता के भेजे हुए प्रतिनिधि के लिए हिमालय के ये अगम्य क्षेत्र सुपरिचित से थे।
गौरीशंकर के पास पहुँचते-पहँुचते चारों ओर बरफ ही बरफ दिखार्इ देने लगी। वृक्ष-वनस्पति या जीव-जंतु का कहीं नामोनिशान नहीं था। योगी ने एकाध स्थान पर सावधान किया कि सँभल कर चलना। यहाँ बरफ पर पाँव फिसल सकता है। आचार्यश्री ने विनोद किया कि गुरुदेव के संरक्षण में यात्रा हो रही हो, आप जैसा सिद्ध संन्यासी साथ में हो तो फिसलने का भी क्या भय है? कदाचित् कोर्इ पाँव उलटा-सीधा पड़ गया तो आप सँभाल ही लेंगे।
योगी ने इस विनोद को आगे बढ़ाया-’’अगर तुम्हारी बात का सचमुच यही आशय है तो यह भी ध्यान रखना चाहिए कि गुरुदेव पाँव की हड्डी को चटखने की अनुमति भी दे देंगे।’’ एक स्थान पर बरफ की बनी हुर्इ गुफा दिखार्इ दी। उसमें से हर-हर महादेव की ध्वनि रही थी। यह ध्वनि जप साधना में लगे किसी साधक के मुँह से निकली हुर्इ आवाज नहीं थी। लग रहा था जैसे कोर्इ स्नान कर रहा हो। आचार्यश्री ने विस्मित होते हुए कहा-’’इस गुफा में भी कोर्इ झरना है क्या? लगता है कोर्इ तपस्वी स्नान कर रहा हो।’’

उत्तर मिला-’’नहीं। कोर्इ तपस्वी नहीं, बल्कि तपोनिष्ठ विभूति हैं-बाबा कीनाराम। प्रत्यक्ष जगत से उपराम होने के बाद इसी सिद्ध क्षेत्र में रमण कर रहे हैं।’’

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