Wednesday, October 23, 2013

सबसे ऊँची प्रेम सगार्इ-हनुमान भक्ति


रामराज्य की स्थापना के बाद की बात है। एक बार अवध की पुष्पाच्छादित, सुरभित सुगंधित वाटिका में राघवेंद्र श्री जानकी संग अप्रतिम रूप की क्रांति बिखेरते हुए शोभायमान थे। उनके श्री चरणों में बैठे थे-हनुमान! जहाँ भक्त, भगवान और भक्ति का ऐसा प्रयागराज स्थापित हो, वहाँ चित्त को निर्मल करने वाली सद्चर्चा की पवन प्रवाहित हो, भला ऐसा कैसे संभव है? प्रभु ने अपने परमभक्त हनुमान से पूछा- हनुमंत, क्या तुम्हें वह घटना याद है जब लंबी अवधि के बाद हमारा और तुम्हारामिलन ऋष्यमूक पर्वत पर हुआ था?’
हनुमान जी- भला अपने जीवन के सबसे अनमोल पलों को मैं कैसे भूल सकता हँू, प्रभु!
प्रभु राम- पर तब हम तुम्हारे व्यवहार से अत्यंत आश्चर्यचकित हुए थे।
हनुमान जी-क्यों प्रभु?
प्रभु राम- क्योंकि उस समय तुमने हमारी ब्रह्मसत्ता को तो स्वीकारा था। हमारी ठकुरार्इ को जाना था। पर हमारे साथ व्यवहार ऐसा किया था, जैसे कि हम कोर्इ साधारण जीव हों। अन्यथा, तुम ही बताओ, रचयिता को उसकी ही रचना (काँधे पर) धारण करने का दावा कैसे कर सकती है? धारण तो सदैव र्इश्वर किया करते हैं। पर तुमने तो अपने काँधे पर बिठाकर हमारी सुग्रीव से भेंट करवार्इ थी।
यह सुनना था कि मारुतिनंदन झट कह उठे- हे प्रभु! प्रभु! मुझे तो आपको कंधे पर बैठाने का विचार ही जँचा। क्योंकि अपनी पकड़ पर मुझे विश्वास नहीं! पर जानता हँू कि आपकी पकड़ कभी ढीली नहीं पड़ती। हमारा बल क्षीण हो सकता है, आपका नहीं! आपके जीव ने ऐसा साहस आपके द्वारा उच्चारित किए गए वाक्य को श्रवण करके ही किया था।
प्रभु राम- कौन सा वाक्य?
हनुमान जी- आपने ही तो अपना परिचय देते हुए कहा था- कोसलेस दसरथ के जाए.....’ कि हम राजा दशरथ की संतान हैं। संतान अर्थात् उन्होंने अवश्य आपको वर्षों अपनी गोद में खिलाया होगा, बाहों के पलने में झुलाया होगा! प्रभु, यह सुन मेरे मन में विचार उत्पन्न हुआ कि नि:सन्देह यूँ तो आप परब्रह्म हैं, परन्तु यदि ब्रह्म को राजा दशरथ माता कौसल्या अपनी गोद में बिठा सकते हैं तो हम भक्त क्यों नही उन्हें अपने कंधे पर बिठा सकते?
प्रभु राम-उचित है, हनुमंत! चलो, हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि तुम पिता दशरथ माँ कौसल्या से प्रभावित हो ऐसा करने के लिए तत्पर हुए। परन्तु यदि ऐसा ही था, तो तुम भी हमें गोद में धी धारण करते, कंधे पर धारण करने का विचार क्यों आया?
हनुमान जी (हाथ जोड़कर)-प्रभु! मात्र भक्त का लोभ!
प्रभु राम-लोभ! कैसा लोभ, लोभी महाराज!
हनुमान जी-प्रभु! सीधा सा गणित है! जब हम किसी को गोद में धारण करते हैं, तो उसे संभालना भी स्वयं पड़ता है, अपने हाथों की पकड़ मजबूत रखनी पड़ती है। ऐसे में सम्पूर्ण एकाग्रता चाहिए और सजगता भी। परन्तु ठीक इससे विपरीत, जब किसी को हम अपने कंधे पर सवार कर लेते हैं, तो सारे कर्त्तव्य बैठने वाले के ही हो जाते है। वह स्वयं हमें थामता है, स्वयं अपनी पकड़ मजबूत बनाकर रखता है। स्वयं को गिरने नहीं देता। धारण करता है और धारण किए रहता है। इसलिए प्रभु! मुझे तो आपको कंधे पर बैठाने का विचार ही जँचा। क्योंकि अपनी पकड़ पर मुझे विश्वास नही! पर जानता हँू कि आपकी पकड़ कभी ढीली नहीं पड़ती। हमारा बल क्षीण हो सकता है, आपका नहीं! हे सर्वसमर्थवान प्रभु! हमारा सामथ्र्य आपके आगे कुछ भी नहीं। इसलिए आपको कंधे पर बिठाकर मैंने तो मात्र अपना लोभ पूरा किया, प्रभु!
काँधे बिठा तुम्हें रघुवर, लोभ अपना इक साध लिया, अर्पित कर सर्वस्व चरणन में, नाता तुम संग बाँध लिया। अब थामो जीवन डोरी, हाथ कभी तुम छोड़ो , प्रेम बंधन बाँधा तुम संग, हे राम इसे तुम तोड़ो न। मैं असमर्थ, बलहीन प्रभु! नाता निभा पाऊँगा, पक्की पकड़ नहीं मेरी, तुम्हें गोद बिठा पाऊँगा। इसलिए हे राम, कसकर अपने बंधन से बाँधो मुझे, हे सर्वसमर्थ! कृपानिधि! अपना जान स्वीकारो मुझे।
इतना कह हनुमान जी भाव-मग्न होने लगे। जानकी जी ने उन्हें भाव-तंद्रा से निकालने के लिए कहा- हनुमंत, हमें भी तुम्हारे एक कार्य ने आश्चर्यचकित कर दिया था
हनुमान जी-कैसा कार्य, माते!
जानकी जी- पुत्र! मेरी खोज करते हुए तुमने सौ योजन विशाल समुद्र लाँघा और लंका चले आए। वहाँ अशोक वाटिका में मुझसे भेंट करने के बाद, तुमने मुझसे फल ग्रहण करने की आज्ञा माँगी थी। स्मरण है?     
हनुमान को वे रसीले फल याद गए। मुख में पानी भर आया! झट कह उठे- फल! हाँ माँ, बड़े रसीले थे वे फल!’
सीता जी- हाँ, वही रसीले फल! उन्हें खाने की आज्ञा मैंने तुम्हें प्रदान की थी। लेकिन वाटिका उजाड़कर लंका दहन करने की तो नहीं।
हनुमान जी-माते! वह तो मात्र फल खाने का ही प्रतिफल था।
सीता जी- फल का प्रतिफल, अर्थात्?
हनुमान जी-प्यारी मैया! आप भक्ति स्वरूपा हैं। लेकिन रावण की वाटिका लंका दुर्गुणों का स्वरूप थी। जहाँ राक्षसी प्रवृत्तियों के घने वृक्ष रोपित थे। विकारों की लताएँ वृक्षों पर आच्छादित थीं। दूषित वृत्तियों के शाक-पात थे। और भक्ति देवी की कृपादृष्टि प्राप्त हो जाने पर दृष्प्रवृत्तियों की लताएँ उजड़ें, शोक की हेतु बनी अशोक वाटिका उजड़े, विषाक्त प्रवृत्तियों के फल झड़ें और विकारों की जड़ें उखड़ें, मोह की स्वरूप लंका जले तो जीवन में भक्ति देवी की कृपादृष्टि संदेहास्पद हो जाएगी। इसलिए यह तो मेरा परम कर्त्तव्य आपकी आज्ञा में छिपी गुप्त आज्ञा थी, जिसे स्वीकार करने से आपका बालक, भला पीछे कैसे हट सकता था?
प्रकटे भक्ति उर अंतर तो, सदज्ञान सद्वृत्तियाँ जागें, दूशित मन भी निर्मल होवे, दुर्विकार दुर्भावना भागें। दुर्गुणों का साम्राज्य रहे , लंका जले अज्ञान की, पुनीत पवित्र तनम कर देती, गंगा भक्ति ज्ञान की।

हनुमान जी के ऐसे उद्गारों को श्रवण कर माँ जानकी का वरदहस्त स्वत: ही आशीष लुटाने के लिए उठ गया।

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