Wednesday, October 23, 2013

भामती की अदभुत साधना


वेदान्त दर्शन (ब्रह्मसूत्र) आध्यात्म विद्या का अत्यन्त सरस विषय है पर उतना ही क्लिष्ट भी। पंडित वाचस्पति मिश्र (कैयट) ने उसके भाष्य का संकल्प किया। उन्हीं दिनों उनका विवाह संस्कार भी हुआ जब उनके मस्तिष्क में इस भाष्य की कल्पना चल रही थी। इधर घर में धर्मपत्नी ने प्रवेश किया उधर पंडित जी ने भाष्य प्रारम्भ किया। विषय है ही ऐसा कि उसकी गहरार्इ में जितना डूबों उतनी ही अधिक गहरार्इ दिखार्इ देती चली जाये। पंडित जी को भाष्य पूरा करने में प्राय: 80 वर्ष लगे।
ग्रन्थ पूरा होते ही उन्हें स्मरण आया-वे विवाह कर धर्मपत्नी को घर लाये थे किन्तु अपनी साहित्य साधना में वे उन्हें बिल्कुल ही भूल गये। अपराध बोध के कारण बाचस्पति सीधा भामती के पास गये और इतने दिनों तक विस्मृत किए जाने का पश्चाताप करते हुए क्षमा याचना की। पति का स्नेह पाकर भामती भाव-विभोर हो गर्इ। पंडित जी ने पूछा-मैंने इतने दिनों तक आपका कोर्इ ध्यान नहीं दिया फिर भी दिनचर्या में कोर्इ व्यतिरेक नहीं आया जीवन निर्वाह की सारी व्यवस्था कैसे हुर्इ?

भामती ने बताया-स्वामी! हम जंगल से मूँज काट लाते थे। उसकी रस्सी बट कर बाजार में बेच आते थे। इससे इतनी आजीविका मिल जाती थी कि हम दोनों का जीवन निर्वाह भलीभाँति हो जाता था। इसी तरह हम दोनों के भोजन तेल, लेखन सामग्री आदि की सभी आवश्यक व्यवस्थायें होती चलीं आर्इ। आप इस देश, जाति, धर्म और संस्कृति के लिए ब्रह्मसूत्र के भाष्य जैसा कठिन तप कर रहे थे उसमें मेरा आपकी सहधर्मिणी का भी तो योगदान आवश्यक था? इस अभूतपूर्व कर्त्तव्य परायणता से विभोर वाचस्पति मिश्र ने अपना ग्रन्थ उठाया और उसके ऊपर ‘‘भामती’’ लिखकर गर्न्थ का नामकरण कर दिया। वाचस्पति मिश्र की अपेक्षा अपने नाम के कारण ‘‘भामती’’ ब्रह्मसूत्र की आज कहीं अधिक ख्याति है।

3 comments:

  1. धन्य हैं वाचस्पति जी और परम धन्य हैं उनकी सहधर्मिणी पतिपरायण भामती।

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  2. धन्य हैं वाचस्पति जी और परम धन्य हैं उनकी सहधर्मिणी पतिपरायण भामती।

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