Wednesday, July 18, 2012

प्रार्थना की महिमा


किसी ने कहा है
जब और सहारे छिन जाते,  किनारा मिलता है
तूफान में टूटी किस्ती का,
भगवान सहारा होता है
    सच्चे हृदय की पुकार को वह हृदयस्थ परमेश्वर जरूर सुनता है, फिर पुकार चाहे किसी मानव ने की हो या किसी प्राणी ने गज की पुकार को सुन कर स्वयं प्रभु ही ग्राह से उसकी रक्षा करने के लिए बैकुण्ठ से दौड़ पड़े थे, यह तो सभी जानते है
पुराणों में कथा आती है -
एक पपीहा पेड पर बैठा था वहां उसे बैठा देखकर एक शिकारी ने धनुष पर बाण चढाया आकाश से भी एक बाण उस पपीहे को ताक रहा था इधर शिकारी ताक में था और उधर बाज पपीहा क्या करता? कोई और चारा देखकर पपीहे ने प्रभु से प्रार्थना की हे प्रभु! तू सर्व समर्थ है इधर शिकारी है, उधर बाज है अब तेरे सिवा मेरा कोई नहीं हे प्रभु! तू ही रक्षा कर.....
पपीहा प्रार्थना में तल्लीन हो गया वृक्ष के पास बिल मे से एक साँप निकला उसने शिकारी को दंक मारा शिकारी का निशाना हिल गया हाथ में से बाण छूटा और आकाश में जो बाज मँडरा रहा था उसे जाकर लगा शिकारी के बाण से बाज मर गया और साँप के काटने से शिकारी मर गया पपीहा बच गया
इस सृष्टि का कोई मालिक नहीं है ऐसी बात नहीं है यह सृष्टि समर्थ संचालक की सत्ता से चलती है
सृष्टि में चाहे किनी भी उथल-पुथल मच जाये लेकिन जब अदृश्य सत्ता किसी की रक्षा करना चाहती है तो वातावरण में कैसी भी व्यवस्था करके उसकी रक्षा कर देती है ऐसे तो कई उदाहरण हैं
कितना बल है प्रार्थना में! कितना बल है उस अदृश्य सत्ता में अदृश्य सत्ता कहो, अव्यक्त परमात्मा कहो, एक ही बात है लेकिन वह जरूर उसी अव्यक्त, अदृश्य सत्ता को साक्षात्कार करना यही मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य है

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